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सोमवार, 6 अगस्त 2012

आज़ादी का आंदोलन और भारतीय मुसलमान


पिछले दिनों प्रोफ़ेसर शांतिमय रे की किताब 'फ्रीडम मूवमेंट एंड इंडियन मुस्लिम्स' का अनुवाद किया। इसी से एक हिस्सा...
किताब अब उपलब्ध है सो उसका कवर भी लगा  रहा हूँ. नेशनल बुक ट्रस्ट से मात्र ८०/ रुपये में ख़रीदी जा सकती है 



राष्ट्रवाद के उभार का दौर (1857-1905)   


1857 से 1905 के बीच के दौर को उभरते भारतीय राष्ट्रवाद का दौर कहा जा सकता है. मुस्लिम समुदाय का तीखा साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष 1871 तक अपना दौर पूरा कर चुका था. विद्रोह के बाद के दमन के दौरान वहाबियों ने आर-पार की अपनी अंतिम लड़ाई लड़ी और गुलामी की चांदी की जंजीर पहनने की जगह अंडमान के सेल्यूलर जेल की काल-कोठरियाँ चुनीं.
1858 के महारानी विक्टोरिया के घोषणापत्र के साथ भारत में ब्रिटिश राज में मानीखेज परिवर्तनों के चिन्ह दिखाई देने लगे.
(1) भारतीय समाज में हिन्दू और मुस्लिम के नाम पर, और हिन्दूओं के बीच ऊंची जातियों, जैसे ब्राह्मण और नीची जातियों, जैसे चांडाल के नाम पर उपस्थित व्यापक विभेद पर ध्यान देते हुए यह तय किया गया कि रोमन साम्राज्य की तरह ब्रिटिश शासन को कायम रखने के लिए बांटो और राज करो की नीति अपनाई जाय.[1] 
(2) व्यवहारिक राजनीति के सन्दर्भ में ब्रिटिश अधिकारियों के एक हिस्से ने मुस्लिमों के उच्च वर्ग के हितों के समर्थन करने की नेतृत्वकारी भूमिका अपना ली, जिससे कि वे प्रशासनिक पदों में अपना वाजिब हिस्सा और 1861 के कौंसिल एक्ट के ढाँचे में राजनीतिक महत्व प्राप्त कर सकें.[2]
(3) यही वह वक़्त था जब विलियम हंटर ने अपनी प्रसिद्ध किताब द इन्डियन मुसलमान लिखी और अब्दुल लतीफ ने 1850 के दशक के अंत में मुस्लिम लिटरेरी सोसायटी शुरू की थी. कर्नल बीक के साथ सर सैयद अहमद ने 1876 में अलीगढ़ में एंग्लो-ओरिएंटल कालेज का आरम्भ किया.[3]
(4) इस बाबत गंभीरता से तय किया गया कि पुराने सामंती रिश्तों में कोई व्यवधान नहीं पैदा किया जाएगा और पुराने पड़ चुके मूल्य-मान्यताओं और भारतीय लोगों की युगों पुरानी अंध-विश्वासी प्रथाओं से कोई छेड़छाड़ नहीं की जायेगी.[4]
(5) इलियट, डावसन, एल्फिन्स्टोन और ब्रिग्स जैसे पूर्व-नागरिकों को भारत में मुस्लिम शासन के इतिहास के बारे में हिंदुओं के ऊपर मुस्लिम अत्याचार के रूप में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिसमें राजपूतों और मराठों ने वीरतापूर्ण प्रतिरोध दर्ज किया. टाड की एनाल्स आफ राजस्थान आरंभिक हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए काफी हद तक अपने भावनात्मक संघटन के निर्माण हेतु सबसे अधिक इच्छित पुस्तक बन गयी.[5]
(6) यह दौर राजा राम मोहन राय, डेराजियो, रेव कृष्णा मुखर्जी, अक्षय कुमार दत्ता, इश्वर चन्द्र विद्यासागर, माइकल मधुसूदन दत्त और अन्य द्वारा मुख्यधारा के राष्ट्रवाद में विभिन्न प्रणालियों में विपथन का भी गवाह है. जब मैक्समूलर ने आर्यों की महिमा को पुनरुज्जीवित किया तो इसे उत्साहपूर्वक स्वीकार किया गया और इसका प्रचार किया गया. राजनारायण बोस ने एक हिन्दू मेला आयोजित किया और हिन्दू धर्मेर श्रेष्ठता नामक किताब भी लिखी.[6]
(7) जबकि नील विद्रोह (1859) की आग मद्धम पड़ रही थी और वहाबी विद्रोह की आखिरी चिंगारियां भी बुझ रही थीं तो पंजाब में राम सिंह कूका एक छोटा सा धार्मिक मुद्दा उठा कर पंजाब के दबंग किसानों को आंदोलित कर रहे थे जो भू वितरण के मुद्दे  पर पहले से ही असंतोष के शिकार थे. बाबा रामसिंह कूका अपने एक सौ अड़तालीस अनुयायियों के साथ तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिए गए.[7] केवल छः साल बाद महाराष्ट्र के एक और नेता बलवंत फड़के (1876-78) ने धार्मिक बाने में इब्राहिम खान के साथ मिलकर फिरंगी राज से देश को मुक्त कराने के लिए महाराष्ट्र के किसानों को संगठित किया. इसका भी दमन कर दिया गया. लेकिन इसकी धार्मिक रंगत प्रभावी थी.
(8) यह वह दौर था जब दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की और वेदों तथा उपनिषदों की श्रेष्ठता पर जोर देते हुए हिंदुओं के पुनर्जागरण पर ध्यान दिया. बंकिम चन्द्र चटर्जी, विवेकानंद और उनकी शिष्या बहन निवेदिता ने उभरते राष्ट्रवाद को  एक नया अर्थ, अंतर्वस्तु और नई दिशा दी. हिन्दू बौद्धिक वर्ग के बीच, खासतौर पर वे जो निम्न मध्यवर्ग से आते थे उनके बीच हिन्दू मिथकीय पदों और मुहाविरों का पूरे उत्साह के साथ और जोश-ओ-खरोश से प्रचारित किया गया.
(9) यह एक ऐसा माहौल था जिसमें आरम्भिक संवैधानिक विरोध आंदोलनों ने अपना आकार ग्रहण किया जब शिशिर कुमार घोष और उनकी प्रसिद्ध अमृत बाजार पत्रिका ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सुरेन्द्र नाथ बंदोपाध्याय ने आनंद मोहन बोस के साथ इन्डियन एसोसियेशन (1876) की स्थापना की. 1870 के दशक में इस तरह के संगठन पूरे देश में, खासतौर पर बम्बई, मद्रास और बाद में लाहौर में स्थापित किये गए.जब 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ तो प्रभावी राष्ट्रीय माहौल हिन्दू पुनरुत्थानवादी स्वर से भरा हुआ था.

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यहाँ हमें थोड़ी देर के लिए ठहरना चाहिए और मुस्लिम मष्तिष्क के पुनर्विचार की प्रक्रिया की ओर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रयास करना चाहिए.
एक आधुनिक इतिहासकार ने मुस्लिम मस्तिष्क को ब्रिटिश समर्थक तथा ब्रिटिश विरोधी की जगह आधुनिक तथा पारंपरिक के रूप में विभाजित किया है.[8] ब्रिटिश समर्थक मुस्लिम नेताओं में अब्दुल लतीफ, सर सैयद अहमद और आमिर अली को विशिष्ट प्रवृति की तरह समझा जा सकता है. ये सभी मुसलमानों, खासतौर पर ढहते हुए कुलीन तंत्र और उनके परिजनों तथा पुरोहित वर्ग, जिसे उलेमा कहा जाता है उनकी अथाह कुंठा के कारण संत्रासग्रस्त थे. इन सभी ने वहाबियों के आत्मघाती प्रतिरोध का विरोध किया और खासतौर पर उलेमाओं के नकारात्मक रवैये का.
उन सभी ने ब्रिटिश शासन को मुक्ति के रूप में स्वीकार करने गंभीर अपील की और मुसलमानों को फारसी की जगह अंग्रेजी को वरीयता देते हुए पश्चिमी ढंग से शिक्षित करने के अथक प्रयास किये.
अब्दुल लतीफ ने कलकत्ता में लिटरेरी सोसायटी (1859) शुरू की, सर सैयद ने अलीगढ़ में 1875 में एंग्लो-ओरिएंटल कालेज शुरू किया. सैयद आमिर अली की प्रसिद्ध किताब द स्प्रिट आफ इस्लाम और द हिस्ट्री आफ सारासेन ने शिक्षित मुसलमानों में उनकी प्राचीन धरोहर के बारे में नया आत्मविश्वास पैदा किया. हालांकि उनमें से सभी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बहिष्कार के लिए, क्योंकि उस पर हिन्दू राष्ट्रवादियों का प्रभाव था, पुरजोर अपील की बावजूद इसके उन्होंने भारत को भारतीय मुसलमानों की मातृभूमि के रूप में स्वीकार किया और अपनी सामाजिक तथा सांस्कृतिक जिंदगी में स्पष्ट सेकुलर दृष्टिकोण अपनाया. वे कुरआन और हदीस को तेजी से बदलती दुनिया की रौशनी में नए अभिसंस्करण देना चाहते थे.[9] 
अंग्रेजी सरकार ने मुस्लिम अभिजात वर्ग को सर सैयद अहमद, अब्दुल लतीफ और सैयद आमिर अली द्वारा शुरू किये गए अंग्रेजी पढ़ने के रास्ते पर प्रवृत करने के लिए हर संभव सहायता दी. 1860 से 1905 के दौरान ब्रिटिश प्राधिकारियों के प्रत्यक्ष संरक्षण में  एक शिक्षित मुस्लिम बौद्धिक वर्ग उभरा. वे उभरते हुए राष्ट्रवाद तथा कांग्रेस द्वारा रखी गयीं राष्ट्रीय मांगों के खिलाफ अंग्रेजों के सहयोगी बने.
उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ थे वे उनके सहयोगी बन गए, और जो उनके सहयोगी थे वे विरोधियों में बदल गए.
मुस्लिम नवजागरण केवल अंग्रेजी शिक्षा तक ही सीमित रह गया. उनके पास आम तौर पर किसी विचारधारात्मक संघर्ष का अनुभव नहीं था जिससे वे इस्लाम की सीमाओं से पार जा पाते.
लेकिन यह कहना गलत होगा कि मुस्लिम आधुनिकतावादियों के अलावा और कोई चिंतन प्रक्रिया नहीं थी. मुस्लिम समुदाय की महान औलादें, जो परम्परावादी उलेमाओं के नाम से बेहतर जानी जाती थीं, अपने समुदाय के पूर्वाग्रहों और अवरोधों को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए सामने आये और तात्कालिक साम्प्रदायिक लाभ से आगे बढकर भारत के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का हिस्सा बने जिसके लिए वे इतिहास में एक बाहक पहचान की बिलाशक मांग कर सकते हैं.
दारुल उलेमा ने भारतीय मुसलामानों के धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक जीवन में जो भूमिका निभाई है वह उन उद्देश्यों और लक्ष्यों के सन्दर्भ में वैधानिक रूप से व्याख्यायित किया जा सकता है जो इनके संस्थापकों ने विद्रोह के दिनों में तय किये थे.[10]
वस्तुतः शामली और देवबंद एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं. अंतर सिर्फ हथियारों में है. अब तलवार और भाले की जगह कलम और जबान ने ले ली. जहाँ शामली में राजनीतिक स्वतंत्रता और धर्म तथा संस्कृति की आजादी के लिए हिंसा को माध्यम बनाया गया वहीं देवबंद में इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शांतिपूर्ण तरीकों से सहारे एक शुरुआत की गयी. हालांकि रास्ता एक दूसरे से अलग जाता हुआ दिखता है लेकिन ले एक ही मंजिल की तरफ जाता है. यह बिलाशक एक महान उपलब्धि थी और उन मुसलमानों की जीवन्तता और उनका उत्साह काबिल-ए-गौर था, जो 1857 के दुर्भाग्यशाली दिनों के थोड़े दिनों के बाद और अत्यंत हतोत्साहकारी परिस्थितियों में भी आधिकारिक ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था द्वारा खतरे में डाल दिए गए अपने धर्म तथा अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए नए रास्ते तलाशने की नए सिरे से फिर से कोशिशें कर रहे थे.[11]
दारुल उलेमा देवबंद के संस्थापक फराजिया आंदोलन के दिनों के क्षुब्ध मुसलामानों की विद्रोही चेतना का प्रतिनिधित्व करते थे. वे 1857 की अपनी विफलता के बाद के उत्पीडन के आगे न झुकने के के लिए कटिबद्ध थे और विनाशकारी निष्क्रियता से डरते थे.
दारुल उलेमा देवबंद के संस्थापकों ने विद्रोह में सक्रिय हिस्सेदारी की, दिल्ली के बाहर की जनता को संगठित किया और कुछ समय के लिए जिस क्षेत्र में वे कार्य कर रहे थे वहाँ से अंग्रेजों को बाहर करने में कामयाब भी रहे. उनकी गतिविधियों का केन्द्र वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले के पास का एक छोटा सा कस्बा शामली था जो दिल्ली से नजदीक ही था. हाजी इमादुल्लाह (1817-99), जो विद्रोह के असफल होने के बाद मक्का चले गए, शामली में जेहाद के इमाम थे और मौलाना मोहम्मद कासिम (1832-80) और राशिद अहमद गंगोबी (1828-1905) ने फौजों के सेनाध्यक्ष की भूमिका निभाई. कादी मौलाना मदनी ने नक़्श-ए-हयात के खंड दो में विद्रोह के दौर के उनके बहादुर कारनामों की एक रोचक और प्रामाणिक रिपोर्ट दी है और वह विद्रोह के दमन के बाद के अंग्रेजों के बेरहम प्रतिशोध के पंजों से उनके भाग्यशाली तरीके से बच निकलने के किस्से का बयान करते हैं.[12]
वे इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि ब्रिटिश शासन, जो अब पहले से अधिक शक्तिशाली था, उनके अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विरासतों के आदर्शों के मुताबिक़ रहने के प्रयासों में कोई सहायता नहीं करने जा रहा था. न ही वे समझौतों और तुष्टीकरण की नीति में भरोसा करते थे, फिर भी उन्हें आगे बढ़ना था और वे सारे सरकारी हस्तक्षेपों को खारिज करते हुए और ईश्वरीय सहायता तथा अपने साथियों की निष्कपट धार्मिकता के भरोसे स्वतन्त्र रूप से आगे बढे, और खुद को अर्ध एकेश्वरवादी और आधे मध्यकालीन गोपनीय मुस्लिम समितियों की तरह संगठित किया. यह दारुल उलूम के शिक्षकों और छात्रों तथा शिक्षित भूस्वामी कुलीन वर्ग का एक भूमिगत संगठन था. दारुल उलूम के शैक्षणिक प्रयासों पर धार्मिक प्रतिबंधों के उसके राजनैतिक उद्देश्यों के साथ अंतर्विरोध पैदा हुए. लेकिन धार्मिक समितियों के ब्रिटिश विरोधी चरित्र ने, जिसने 1857-58 के विद्रोह की परम्पराओं को बचा कर रखा, धार्मिक एकांगीपने से उभरने और मुक्ति आंदोलन में विभिन्न जातियों और धर्मों के लोगों के प्रयासों को एकताबद्ध करने की वस्तुनिष्ठ ज़मीन प्रदान की. देवबंद केन्द्र कांग्रेस की ओर झुका और पहले विश्वयुद्ध के वक़्त भारतीय राष्ट्रीय बुर्जुआजी के रेडिकल हिस्से के साथ था.[13] 


[1] देखें, स्ट्राची के सेक्रेटरी आफ स्टेट को लिखे पत्र, डा एन एल गुप्ता की किताब नेहरू एंड कम्यूनलिज्म से उद्धृत, पेज-32 
[2] देखें,कैंटवाल स्मिथ, माडर्न इस्लाम इन इंडिया, पेज-190
[3] देखें, वही, पेज -192
[4] वही,पेज -192
[5] वही
[6] वही
[7] देखें, कूका आंदोलन, फंजा सिंह बाजवा, पेज-177,176   
[8] देखें, हिस्ट्री आफ फ्रीडम मूवमेंट, डा ताराचंद, खंड III, पेज-178, कैंटवाल स्मिथ, वही पेज-42,

[9]देखें, वही डा ताराचंद, वही, कैंटवाल स्मिथ, पेज-46-48
[10] देखें, देवबंदी और पाकिस्तान की माँग, डा फारुकी, पेज-50
[11]देखें, वही, डा ताराचंद, खंड III, पेज-256
[12] देखें, वही, डा फारूकी, पेज-22
[13] देखें, ए हिस्ट्री आफ पकिस्तान, वाई वी गैन्कोव्यसकी, एल आर गार्डन-पोलोंस्काया 

6 टिप्‍पणियां:

  1. पंकज चतुर्वेदी6 अगस्त 2012 को 1:00 pm

    अनुवाद बेहद प्रवाहमय और सहज है

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  2. दुष्यंत एन सेवक6 अगस्त 2012 को 1:01 pm

    लेख पढ़ लिया इसलिए एक बार पुनः बधाई... कृति कहीं से अनूदित लगती ही नहीं है..

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  3. संज्ञा उपाध्याय6 अगस्त 2012 को 1:45 pm

    अशोक, अनुवाद बहुत अच्छा है. किताब का जो हिस्सा तुमने यहाँ दिया है, महत्त्वपूर्ण है. पूरी किताब पढ़ने को प्रेरित करने वाला.

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  4. शानदार अनुवाद है ! पढने में मज़ा आया ! एक बात और ..मालाबार के मुसलामानों के आजादी के लिए चल रहे संघर्ष को भी रेखांकित किया गया होता , तो विषय में धार आ जाती ! केवल सहिष्णुता के एंगल लिए इतिहास का मूल्याङ्कन नहीं किया जाना चाहिए ! शांतिमय रे साहब का क्या कहना इस विषय पर अशोक जी !

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  5. अनुवाद के लिए आपने अत्यंत मह्त्वपूर्ण पुस्तक का चयन किया है ...अनुवाद प्रवाहमय ,पठनीय और सार्थक है ....बधाई -( गुलज़ार हुसैन )

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