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बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

सदाचार की गठरी : हिमांशु पांड्या

हिन्दी की युवा कहानीकार ज्योति कुमारी द्वारा दर्ज यौन दुर्व्यवहार की शिकायत के बाद उठे विवाद में ताज़ा कड़ी में हमारी भाषा के एक समर्थ लेखक अनिल कुमार यादव का लेख एक साथ दो ब्लोग्स पर शाया हुआ है.इन दोनों में से कम से कम एक ब्लॉग इससे पहले खुलकर ज्योति कुमारी के समर्थन में आया था और इसके मॉडरेटर ने ज्योति की बहादुरी को सलाम किया था. अनिल यादव का लेख घोषित रूप से हिन्दी पट्टी में सेक्सुअलिटी को लेकर छाई घनघोर चुप्पी पर सवाल उठाता है , इसी चुप्पी को महिलाओं के साथ होने वाले यौन दुर्व्यवहारों के लिए उत्तरदायी मानता है और इसे मिटा देने का आव्हान करता है. अनिल जी हिसाब से इसका सबसे मुफीद तरीका ये है कि ‘स्त्री विमर्श’ के पुरोधा राजेन्द्र यादव से उनके जीवन में सेक्स और सृजनात्मकता के अंतर्संबंधों पर बात की जाए , उनके जीवन में आयी ‘महिला लेखिकाओं और सेक्स और क्रियेटिविटी’ पर बात की जाए. हालांकि अनिल जी की इच्छा ‘पुरानी लेखिकाओं’ पर बात करने की थी पर बात ज्योति कुमारी पर केन्द्रित हो जाती है और फिर बड़ी चतुराई से राजेन्द्र यादव को कठघरे में खडा करने का ऊपरी दिखावा करते हुए यह बातचीत एक युवा लेखिका के शाब्दिक गरिमा हनन में जुट जाती है. वह सारा हिस्सा आपइन लिंक्स पर जाकर पढ़ सकते हैं , मेरी उद्धृत करने की कोइ इच्छा नहीं है , मैं इस लगभग पोर्नोग्राफिक पूर्वार्ध पर नहीं उत्तरार्ध पर बात करूंगा जो ज्योति कुमारी के ‘हमदर्द’ अनिल कुमार यादव द्वारा उन्हें सलाह के रूप में लिखा गया है.
वे लिखते हैं ,"अस्मिता बचाने के साहसिक अभियान पर निकली ज्योति कुमारी सबको बता रही हैं कि राजेंद्र यादव उन्हें बेटी की तरह मानते थे. और इसके अलावा कोई रिश्ता नहीं था. वह ऐसा करके एक कल्पित नायिका स्टेटस और शुचिता की उछाल पाने के लिए एक संबंध और अपने जीवन को ही मैन्यूपुलेट कर रही हैं. " ठीक , मान लिया. तो क्या अनिल ये कह रहे हैं कि ज्योति को अपने संबंधों का ऐलानिया स्वीकार बेहिचक करके अपने साहस का परिचय देना चाहिए था . ( इसमें ये तो आ ही गया कि राजेन्द्र यादव का दावा - हो सकता है , हो सकता है कि वह एक वृद्ध की कुंठा का प्रदर्शन हो कि'देखो मैं शारीरिक रूप से अक्षम हूँ तो क्या आज भी शिकार कर सकता हूँ !' /  हो सकता है कि यह दावा एक तरह की खीझ से उपजा हो उस लेखक के प्रति जो एक अस्सी  साला लेखक से स्त्री विमर्श के नाम पर 'सेक्स और सर्जनात्मकता के रिश्तों' पर ही बात करना चाहता था -जो भी हो पर - उनका ही दावा सही है, ज्योति का 'पिता समान' वाला दावा खोखला है. ) लेकिन ऐसा होता तो वे ये क्यों लिखते , "यह अस्वाभाविक नहीं है कि लोग मानते हैं कि एक कहानीकार के तौर खुद को धूमधड़ाके से प्रचारित करने के लिए उन्होंने ऐसा ही एक और मैन्यूपुलेशन किया होगा." यह सबसे अच्छा तरीका होता है , अपनी राय को ‘लोग मानते हैं’ की गिरह में लपेटकर पेश करदो ,और चूंकि ‘यह अस्वाभाविक नहीं है’ अतः आप अपनी नहीं जनमत की राय व्यक्त कर रहे हैं. इसे कहते हैं एक तीर से दो शिकार ! यानी वे - यदि स्पष्ट कहूं तो इन दो व्यक्तियों के संबधों को 'मैनिपुलेशन' कह रहे हैं , इसे एक सीढ़ी बता रहे हैं जिसे ज्योति ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ती के लिए इस्तेमाल किया.
 ध्यान से देखिये , एक ओर वे भारतीय समाज की सेक्सुअलिटी पर चुप्पी के खिलाफ प्रगतिशील बयान दे रहे हैं . यौन अपराध का बदला यौन हिंसा नहीं होती - जैसी मार्के की बात कह रहे हैं और दूसरी ओर वे राजेन्द्र यादव की उन 'चेलियों' (ध्यान दीजिये, चेलों नहीं सिर्फ चेलियों ) को गरिया रहे हैं जिन्हें उन्होंने "साहित्य के बाजार में उत्पात मचाने के लिए छोड़ दिया जो खुद उन्हें भी अपने करतबों से चकित कर रही हैं. "  ज्यादा दिन नहीं हुए जब विभूतिनारायण राय ने एक ख़ास शब्द का प्रयोग किया था तब उसके प्रतिरोध में सारा हिन्दी समाज उठ खडा हुआ था . वह एक शब्द विशेष से लड़ाई थी या एक विचार से ? वह एक स्त्री के सम्मान का मसला था या सारी स्त्री जाति के ? अब कृपया इस पूरे वाक्य को एक बार ध्यान से पढ़िए और बताइये कि इसमें उन सारी स्त्रियों को कठघरे में नहीं खडा कर दिया गया है जो 'हंस' में छपीं, छपती रहीं और जिन्होंने अपनी रचनात्मकता के लिए इस पत्रिका को चुना ? -
"लेकिन उनका कसूर यह है अपनी ठरक को सेक्सुअल प्लेज़र तक पहुंचाने की लालसा में उन्होंने आलोचकों (जिसमें नामवर सिंह भी शामिल हैं), प्रकाशकों, समीक्षकों की मंडली बनाकर ढेरों अनुपस्थित प्रतिभाओं के अनुसंधान का नाटक किया, चेलियां बनाईं और साहित्य के बाजार में उत्पात मचाने के लिए छोड़ दिया जो खुद उन्हें भी अपने करतबों से चकित कर रही हैं."
क्या चेले नहीं होते संपादकों के और क्या वे साहित्येतर कारणों से नहीं छपते ? पर नहीं , स्त्री हमेशा साहित्येतर कारणों से ही छपती है और वह साहित्येतर कारण ‘सिर्फ एक’ होता है. ( आप चाहें तो ये जोड़ सकते हैं कि ऑफिस ,स्कूल,कॉलेज,अस्पताल आदि आदि जगहों पर भी उसे तरक्की ‘अन्य ही’ कारणों से मिलती है और आप चाहें तो किसी ऑफिस के मरदाना पेशाबघर में इसकी दृश्यात्मक व्याख्या भी देख सकते हैं.)

  वे लिखते हैं , " ऐसा क्यों हुआ कि विवेक के फिल्टर से जो कुछ जीवन भर निथारा उसे अनियंत्रित सीत्कार और कराहों के साथ मुंह से स्खलित हवा में उड़ जाने दिया. अगर वे मूल्य इतने ही हल्के थे तो राजेंद्र यादव को 'हंस' निकालने की क्या जरूरत थी? " अब समझना बहुत मुश्किल है कि अनिल किन मूल्यों की बात कर रहे हैं ? सबसे पहली बात तो ये कि उनके इस इंटरव्यू से राजेन्द्र यादव का कोई ऐसा पक्ष नहीं उभर रहा है जो उनकी कसौटी - "अगर सेक्सुअलिटी की अभियक्ति हमारे जीवन का हिस्सा होती तो शायद किसी महिला या पुरूष के साथ जोर जबर्दस्ती की स्थितियां ही नहीं बनतीं." इस कसौटी पर राजेन्द्र यादव को अपराधी बना रहा हो. मूल मुद्दा ये था ही नहीं कि ज्योति कुमारी और राजेन्द्र यादव की बीच उनकी सहमति से किसी कमरे में क्या घटा , और उसे उन दोनों ने अपनी अपनी सामाजिक प्रस्थिति के हिसाब से कैसे प्रस्तुत किया, दरअसल इस पर टिप्पणी का किसी तीसरे को अधिकार है ही नहीं . मूल मुद्दा एक स्त्री की ब्लैकमेलिंग , उस पर एक व्यक्ति की आपराधिक चुप्पी का था , पर वह तो न जाने कहाँ बिला गया .यही असली राजनीति है, एक स्त्री द्वारा अपनी गरिमा पर हमले , यौन दुर्व्यवहार की शिकायत करने पर उसके ‘चरित्र’ को ही संदेह में ला दो  , जिसका पहले से ही कुछ ‘लफडा’ है उसके साथ तो थोड़ा बहुत दुर्व्यवहार हो भी गया तो क्या ! अनिल यादव को मथुरा नामक लडकी के साथ पुलिस लौकअप में हुए बलात्कार के सन्दर्भ में आये फैसले और उसके बाद भारत के स्त्री आन्दोलन में आ गए जलजले के बारे में जरूर पढ़ना चाहिए. जो नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं , उनके भी नागरिक के रूप में वही अधिकार होते हैं जो आपके हमारे, इस बात को उनसे बेहतर कौन जानता होगा.

अनिल यादव को राजेन्द्र यादव से यह 'उम्मीद नहीं थी कि वह किसी लड़की को दाबने-भींचने के लिए जीवन भर की अर्जित विश्वसनीयता, संबंधों और पत्रिका की सर्कुलेशन पॉवर को सेक्सुअल प्लेज़र के चारे की तरह इस्तेमाल करने ' लगेंगे , पर उन ढेरों संपादकों का क्या जो चापलूसों, टुकड़खोरों,  रैकेटियरों, अफवाहबाजों, सत्ताधारियों, आला अफसरों, विज्ञापनदाताओं  आदि आदि आदि को अपनी पत्रिकाओं के जरिये साधते रहते हैं. ‘चरित्र’ की दुधारी तलवार उन्हें नहीं हलाल करती ना. ‘सदाचार’ का ताल्लुक सिर्फ ‘यौन शुचिता’ से है . ‘राष्ट्रभक्ति’ की गिलोटीन पर मुस्लिम हलाल होंगे और ‘सदाचार’ की गिलोटीन पर स्त्रियाँ .   और इस तरह अंत तक आते आते अनिल निष्कर्ष सुना ही देते हैं, "ज्योति कुमारी का महत्वाकांक्षी होना अपराध नहीं था लेकिन उन्होंने इसे उसकी कमजोरी की तरह देखा, उसे साहित्य का सितारा बनाने के प्रलोभन दिए और उसका इस्तेमाल किया. "  
    
  इस तरह निष्कर्ष क्या निकला : स्त्रियों के लिए मर्यादा,सीमा तय है जिसे पह्चानना उनके लिए जरूरी है . हिदी साहित्य की दुनिया में आना और धूमकेतु की तरह छा जाना कम से कम एक स्त्री के लिए तो अक्षम्य है , उसका सार्वजनिक आखेट किया ही जाना चाहिए. पुरुषों की तिकड़में जाहिर होना उनके लिए ईर्ष्या भाव पैदा करता है और स्त्री की तिकड़में जाहिर होना उसके लिए दयनीयता की स्थिति लाता है. कम से कम आज अनेक प्रगतिशील साथियों द्वारा इस पर लिखी स्टेटस पढ़कर तो यही लगा .

ज्यादा समय नहीं बीता जब एक बहादुर लड़की की लड़ाई को आगे बढाने के लिए इस मुल्क के लाखों नौजवान लड़के लडकियां सड़कों पर उतर आये थे. उस समय भी एक संरक्षणवादी पितृसत्तात्मक दृष्टि थी जो कह रही थी कि यदि स्त्रियाँ अपनी मर्यादा को समझें तो ऐसे अपराध कम होंगे , खुशी की बात है कि हमारे नौजवानों ने उस दृष्टि को पूरी तरह से नकारा और चिल्ला चिल्ला कर ,बेरिकेड्स तोड़कर, हर मंच पर अपनी बात रखकर इसे लड़कियों की आज़ादी की लड़ाई में बदल दिया. भारतीय स्त्री विमर्श आज बहुत दूर तक रास्ता तय कर चुका है , उसे ‘मर्यादा’ के छलावे में अब नहीं बहकाया जा सकता.
हिमांशु पंड्या


3 टिप्‍पणियां:

  1. हिमांशु ने अनिल यादव के टेक्स्ट के बहाने वोयेरिज्म, मेचोइज्म, और पोर्न-कल्पनाओं से बने 'समर्थ' लेखकों के मर्दवाद की जो परीक्षा की है वह इस समाज, जिसमें हिंदी का साहित्य समाज भी शामिल है, में स्त्री के प्रति हिंसा के सूक्ष्मतर रूपों को समझने के लिए ज़रूरी था.

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  2. " मूल मुद्दा ये था ही नहीं कि ज्योति कुमारी और राजेन्द्र यादव की बीच उनकी सहमति से किसी कमरे में क्या घटा , और उसे उन दोनों ने अपनी अपनी सामाजिक प्रस्थिति के हिसाब से कैसे प्रस्तुत किया, दरअसल इस पर टिप्पणी का किसी तीसरे को अधिकार है ही नहीं . मूल मुद्दा एक स्त्री की ब्लैकमेलिंग , उस पर एक व्यक्ति की आपराधिक चुप्पी का था , पर वह तो न जाने कहाँ बिला गया .यही असली राजनीति है..."

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  3. यह सिलसिला पुराना है .सब के अपने अपने लोग हैं .हम अपने लोगो के प्रसंग में नैतिकता की वैकल्पिक परिभाषाएं गढ़ने लगते हैं .जिस तरह छिनाल प्रसंग एक व्यक्ति का नहीं एक विचार के प्रतिरोध का विषय था , उसी तरह सत्ता ,साहित्यिक ,राजनीतिक या धार्मिक , का दुरूपयोग कर यौन दोहन करने का हर हाल में विरोध होना चाहिए .हमारी चुनी हुई चुप्पियाँ ऐसे प्रसंगों पर हमारे विरोध को कमजोर कर देती हैं .तब वह नैतिक ,न्यायिक ,सामाजिक लड़ाई न होकर व्यक्तिगत दोस्ती और दुश्मनी तक सीमित हो जाती है .अगर गाँधी के ऐसे अतियो का हमने विरोध किया होता तो यह नौबत नहीं आती .गाँधी को बचाने के लिए जिन रणनीतियों और शाब्दिक जुगालियो का प्रयोग हम करते हैं ,दुर्भाग्यवश वह राजेंद्र यादव को भी ,कुछ कम मात्रा में , मगर उपलब्ध हैं .इसलिए कोई इन बदनामियो की प्रतिक्रिया में नैतिक होने की कोशिश नहीं करता बल्कि गाँधी जैसा सत्ताशील और प्रतिमावान होने की चेष्टा करता है .समर्थ को प्रभु दोष न गुसाईं के तुलसीदासीय सूत्र पर चलते हुए .
    http://www.youthkiawaaz.com/2013/10/gandhi-used-power-position-exploit-young-women-way-react-matters-even-today/
    and
    http://genderbytes.wordpress.com/2013/09/04/gandhi-to-asaram-who-empowers-the-sex-crimes-of-gurus/



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