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शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

बिटिया के सहारे राजनीति मत चमकाइये दयाशंकर जी


  • अंजुले की यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश में इन दिनों चल रही उस राजनीति का पर्दाफ़ाश करती है, जो वोटों की फ़सल उगाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है.







नसीम अंकल, मुझे बताएं कहाँ आना है , आपके पास पेश होने के लिए....?

सुनो सिस्टर....

तुम्हारा ये सवाल मासूम और जायज होते हुए भी बेहद पॉलटिकल है. क्योंकि ये एक व्यक्ति-विशेष को निशाने पर रखकर दिया गया है. जिसने ये शब्द बोले भी नहीं हैं. तुम्हारे बोलने के लिए ये सवाल जिन अंकल ने लिख कर दिया है ना, वही और उन जैसी मानसिकता के लोग ही जिम्मेदार हैं मायावती जी को कभी ‘वैश्या’ कहने के लिए, तो कभी तुम्हें ‘पेश' होने का आदेश देने के लिए. मैंने भी टीवी देखा तमाम न्यूज पेपर पढ़े, लेकिन कहीं भी तुम्हारे इन नसीम अंकल को ये नारे लगाते नहीं देखा सिस्टर. इसलिए मैं कह रहा हूं कि, ‘तुम्हारा ये सवाल मासूम और जायज होते हुए भी बेहद पॉलटिकल है’.

ये सवाल करने वाली उस 12 साल की बीजेपी नेता दयाशंकर की बिटिया से मुझे कहना है. मैं यहां अपनी क्रूर से क्रूरतम आलोचना और अपशब्द सुनने का ख़तरा उठाकर कहता हूं कि, ‘दयाशंकर जी अपनी बेटी-पत्नी का इस्तेमाल अब राजनीतिक ब्रांड बीजेपी नेता दयाशंकर की छीज गई इमेज को मरहम लगाने के लिए कर रहे हैं’.

राजनीति में परिवार और महिलाओं का घर के पुरुषों को बचाने के लिए दिया गया ये कोई पहली बाईट नहीं है. इंडिया से लेकर अमेरिका तक में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं. ये सिर्फ अपने खिलाफ लगे नारे का प्रतिकार भर नहीं है बल्किं इसमें पिता के हिस्से सहानुभूति बटोरने की कवायद भी है. दयाशंकर जी की हेट स्पीच के विरोध में बसपा के जिन कार्यकर्ताओं ने हेट नारे लगाए, उनकी मैं बिना किंतु-परंतु के आलोचना करता हूं. लेकिन मैं उन मां-बाप और परिवार वालों की भी आलोचना करता हूं, जो एक 12 साल की लड़की के कंधे पर सवार होकर खो गई अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं. उसे एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

सिस्टर, मैं मानता हूं कि इन नारों को टीवी पर सुनकर और देखकर तुम्हें सिर्फ धक्का ही नहीं, डर भी लगा होगा, बिल्कुल अकेला हो जाने जैसा. लेकिन तुम्हारे सवाल से सहमत होते हुए भी जिसे टार्गेट कर सवाल किए गए हैं उससे सहमत नहीं हूं. आपने नसीम अंकल यानी नसीमुद्दीन सिद्दकी से सवाल किया है तो मैं जानना चाहता हूं, “क्या आपने ये नारे लगाते हुए अपने नसीम अंकल को सुना-देखा है टीवी पर ही सही”? अगर नहीं सुना और जैसा मेरा अंदाजा है कि आपके घरवालों ने जो लिखकर सवाल दिया, उनसे पूछना ये सवाल... नसीम अंकल से सिर्फ क्यों? सवाल तो उन सभी मानसिक रोगियों से पूछे जाने चाहिए ना, जो एक लड़की और महिला को निशाने पर ले कर कभी ‘वेश्या’ तो कभी ये ‘पेश करो’ के नारे लगा रहे हैं? मुझे अच्छा लगता और मैं आपको सलाम कर रहा होता अगर आप अपने पापा जी की बाईट पर, ‘कुछ नहीं कहना है’ की जगह, ‘पापा जी आपने गलत बोला है’ कहा होता. हालांकि कई लोग मेरी बात की आलोचना करते हुए मुझसे आपकी कम उम्र का हवाला देते हुए कहेंगे कि आप ये नहीं कह सकती हैं. बिल्कुल मैं उनकी बात से सहमत होता अगर आप ने ये नहीं पूछा होता कि, ‘एक आदमी के एक गुनाह की कितनी बार सजा दी जाएगी. उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया, पद छिन लिए गए’? यानी वो जो उन्होंने कहा था वो गुनाह है आप मानती हो, लेकिन सीधे आलोचना की जगह आप अपने पिता को बख्श देती हो. मैं समझ सकता हूं ये हमारे-आपके परिवार का माहौल है जहां पैरेंटस की ऐसी आलोचना को बेअदबी माना जाता है. मानता हूं ये कोई अमेरिका तो नहीं है, लेकिन अमेरिका में ही कहां ये आलोचना पूरी तरह खरी उतर पाती है. आपकी मम्मा ने इस मामले में अपने कानूनी अधिकार का उपयोग करने का निर्णय लिया है ये जानकर मैं खुश हूं उन्हें इस मामले में निश्चित रुप से ये नारे लगाने वालों के खिलाफ मामला दर्ज कराया चाहिए और उससे भी पहले ये स्वत: यूपी पुलिस और सरकार को संज्ञान में लेकर मामला दर्ज कर कार्यवाही करनी चाहिए थी. मैं आपकी मम्मा के कदम से सहमत हूं सिस्टर बजाय आपके सवाल के. हां साथ ही मैं बीएसपी अध्यक्ष बहन मायावती जी की भी आलोचना करते हुए कहना चाहता हूं कि, ‘उन्हें खुद इन नारों की बात सामने आने पर आगे आकर आलोचना करनी चाहिए. हेट स्पीच के बदले हेट स्पीच, न्याय नहीं अन्याय ही है’. जो मायावती जी के लिए सही नहीं है वो दयाशंकर की बेटी या परिवार की किसी दूसरी महिला मेंबर के लिए भी सही नहीं हो सकती. और ये भी एक अपराधिक मामला ही है.

मेरा भी उसी पूर्वांचल की धरती से खून का रिश्ता है जहां से दयाशंकर आते हैं. वहां बेटे-बेटियों का राजनीतिक हितों के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाता है ये मैंने भी देखा है. इसलिए मैं अपनी तमाम आलोचनाओं के ख़तरे को दरकिनार करते हुए कहता हूं उस लड़की से जिसे बेवजह निशाना बनाकर ‘पेश करो-पेश करो’ के नारे लगाये. ‘सिस्टर, पैरेंटस को अपना राजनीतिक इस्तेमाल मत करने दो. उनसे कहो... “प्लीज़, मम्मा-पापा मुझे राजनीतिक हथियार ना बनाओ”. और पूछो भी उनसे कि, ‘मम्मा, पापा जी ने या पापा जी आपने ऐसा क्या कह दिया जो कि लोग आज आपकी आलोचना कर रहे हैं?

4 टिप्‍पणियां:

  1. Uski beti ko aapne kaha dekha? uski maa hi nazar aa rhi hai aur usne to mafi bhi mangi hai.

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  2. शाम को मैने मायावती जी का बयान सुना दया शंकर जी के माँ बहन और बेटी को गाली देने के मुद्दे को लेकर, असभ्य और बदजुबान कार्यकर्ताओं पे करवायी करके मिशाल कायम करने की बजाय वो इसे जवाबी करवायी कह के सही साबित कर रही हैं,इनकी नज़र में अपनी इज्जत इज्जत और बाकी की पानी हैं ,आज मायावती जी ने बयान वीरों और अभद्र भाषा का प्रौयौग करने वालों का बचाओ करके सही नही किआ,नारी हो कर मायावती जी ने नरीओन का अपमान करने वाले का बचाओ किआ,मायावती जी प्रदेश जी जनता अंधी,गूँगी,बहरी और ना समझ नही हैं,ये आपकी दलित और मुस्लिम की राजनीति खूब समझती हैं,अब प्रदेश की जनता 10 शाल पेहले वाली और 5शाल पेहले वाली गलती को दोहरायेगी नही. उत्तर प्रदेश को अब जात वाद और परिवार से मुक्ति चहिये अब उत्तर प्रदेश को विकास वाद चहिये अब और हम प्रदेश वासी रोजगार की तलाश में देल्ही,मुम्बई का मुँह नही देखेंगे अब हम विकास को चुनेंगे जो हमें जो हमे हमारे प्रदेश में रोजगार दें,हम जो विकास के दौड़ में पिछड़ रहे हैं हम उसे चुनेंगे जो हमें विकास के दौड़ में आगे लें जाये ,हम अब विकासवाद को चुनेंगे,
    जय हिन्द जय भारत

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