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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

आप का उभार और वाम दल

दिल्ली के चुनावों में अप्रत्याशित सफलता और चुनाव के बाद के समीकरणों के सहारे सत्ता तक पहुँचने के बाद आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविन्द केजरीवाल को लेकर चर्चाएँ  स्वाभाविक रूप से ज़ारी हैं. भ्रष्टाचार के विरोध तथा जन लोकपाल के समर्थन में शुरु हुए आन्दोलन से लेकर राजनीतिक दल के रूप में मुख्यधारा की पार्टियों के एक विकल्प के रूप में उनके उभार ने आगामी लोकसभा चुनावों के समीकरणों को बुरी तरह से प्रभावित किया है. एक ओर दस साल से सत्ताशीन कांग्रेस पार्टी की उम्मीदों को हालिया विधानसभा चुनावों ने बड़ा धक्का लगाया है तो दूसरी तरफ लकड़ी के लाल किले से असली वाले तक के सफ़र के लिए बेक़रार नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भी इस नए उभार के असर को पूरी तरह से समझ नहीं पा रही और कभी कांग्रेस के खिलाफ़ लगने वाले इस आन्दोलन का सहयोग और समर्थन करने वाला संघ गिरोह अब इसे कभी एन जी ओ वादी से लेकर माओवादी बता रहा है तो कभी कांग्रेस से अंदरखाने के गठबंधन का आरोप लगा रहा है. क्षेत्रीय छत्रप अभी भी विभ्रम की सी स्थिति में हैं. यह संकट वाम दलों के भीतर भी है. एक तरफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात इसे गैर बीजेपी-गैर कांग्रेस दलों का हिस्सा बताते हुए तीसरे मोर्चे के लिए ज़रूरी बता रहे हैं तो दूसरी तरफ वाम बुद्धिजीवियों का एक बड़ा हिस्सा इनकी जबरदस्त आलोचना में लगा है. इसके अलावा खासतौर पर वाम दलों के हमदर्द लोगों का एक बड़ा हिस्सा इस उभार को इस रूप में सकारात्मक मान रहा है कि ‘इन्कलाब तो जब होगा तब होगा, अभी कम से कम साम्प्रदायिक भाजपा और भ्रष्ट कांग्रेस का एक विकल्प तो मिला जो अपने आउटलुक में जनपक्षधर और आम आदमी जैसा दिखता है.’ यही नहीं तमाम लोगों को ऐसा लग रहा है कि केजरीवाल मोदी के उस रथ को रोकने में सक्षम हो सकते हैं जो कर पाना अभी अनुपस्थित तीसरे मोर्चे या कांग्रेस के लिए मुश्किल लग रहा था.

देखा जाय तो जिस दौर में जन लोकपाल का आन्दोलन अन्ना के नेतृत्व में शुरू हुआ था, उस समय कमोबेश सभी संसदीय  वाम दलों ने इस आन्दोलन का समर्थन किया था और माले तथा इसकी छात्र इकाई आइसा ने तो इसमें सक्रिय हिस्सेदारी भी की थी और इस पूरे आन्दोलन में हुए इकलौते लाठीचार्ज को इसी संगठन के साथियों ने झेला था. जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने उस दौर में लिखे अपने एक लेख में (जो तीन क़िस्तों में मृत्युबोध नामक ब्लॉग और जसम की पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ में प्रकाशित हुआ) लिखा था– “अमेरिका से बेहतर कोई नही जानता कि यह आन्दोलन महज़ लोकतंत्र के किसी बाहरी आवरण तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें एक साम्राज्यवाद विरोधी संभावना है...आईडेंटिटी पालिटिक्स के दूसरे भी कई अलंबरदार इस आन्दोलन को ख़ास जाति समूहों का आन्दोलन बता रहे हैं. पहले अनशन के समय रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबी कुछ पत्रकार इसे वाणी दे रहे थे. अभी कल हमारे मित्र चंद्रभान प्रसाद इसे सवर्ण आन्दोलन बता रहे थे एक चैनल पर. यह वही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने आज की बसपाई राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग यानी ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत करते हुए काफी पहले ही यह प्रतिपादित किया था कि पिछड़ा वर्ग आक्रामक है, लिहाजा रक्षात्मक हो रहे सवर्णों के साथ दलितों की एकता स्वाभाविक है.  यह यही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने गुजरात जनसंहार में पिछड़ों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताते हुए इन्हें हूणों का वंशज बताया था. अब सवर्णों के साथ दलित एकता के इस 'महान' प्रवर्तक को यह आन्दोलन कैसे नकारात्मक अर्थों में महज सवर्ण दिख रहा है?  वफ़ा सरकार और कांग्रेस के प्रति जरूर निभाएं चंद्रभान, लेकिन इस विडम्बना का क्या करेंगें कि मायावती ने अन्ना का समर्थन कर डाला है.”  आश्चर्यजनक तौर पर बाद के दौर में जब किरण बेदी, जेनरल वी के सिंह और रामदेव जैसे लोग अरविन्द केजरीवाल से दूर हो गए और उन्होंने राजनीतिक दल बनाने के बाद न केवल कांग्रेस और भाजपा दोनों पर सामान रूप से हमला बोला बल्कि अपने घोषणापत्र में आरक्षण के समर्थन में स्पष्ट घोषणा की तो धीरे धीरे माले न इस मुद्दे पर एक चुप्पी सी बना ली. जबकि  सबसे स्वाभाविक तो यह होता कि अपनी नीति को ज़ारी रखते हुए ये दल आप के सक्रीय सहभागी की तरह सामने आते और चुनाव में भी गठबंधन करते. खैर, इसकी वज़ह क्या रही यह बता पाना मुश्किल है.

आप के उभार को एक तरफ़ यह साफ़ हो गया है कि जनता तथाकथित मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का विकल्प चाहती है तो दूसरी तरफ यह भी कि नब्बे के दशक के बाद लागू नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणाम अब जब सामने आने लगे हैं तो विकास के बड़े बड़े दावों के बीच जनता की असली ज़रूरतें अब भी वही हैं. साफ़ पानी, सस्ती बिज़ली, रहने को घर और सस्ता अनाज जैसी चीजें मुहैया कराने में असफल रहा विकास जनता नकार रही है यह कहना तो अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है इनके बिना वह किसी विकास माडल को स्वीकार करने को तैयार नहीं. आप जैसी पार्टी ने एक ओर तो बड़ी पार्टियों के दम्भ और हर चुनाव में दुहराए जाने वाले बासी वायदों के समक्ष आम आदमी वाली छवि सामने रखी तो दूसरी तरफ सबको प्रभावित करने वाले भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को सामने रख जनता को ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का जो वादा किया वह जनता के लिए अधिक विश्वसनीय और आश्वस्तिकारक था. हालाँकि विचारधाराहीनता की जो नीति उन्होंने अपनाई है उसको तुरत तो जनता ने तवज्जो नहीं दिया है लेकिन सस्ती बिज़ली जैसी नीतियाँ लागू करते समय कार्पोरेट्स के हितों से जो स्पष्ट टकराव होगा उस समय ‘आप’ के लिए तटस्थता की यह नीति अपना पाना मुमकिन न होगा और देखना होगा कि वह अपना पक्ष कैसे चुनती है.


यहाँ यह सवाल भी बार बार उठाया जा रहा है कि वाम दल, जिनकी जनपक्षधरता असंदिग्ध है और जो जनता के पक्ष में कारपोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ़ लगातार संघर्ष करते रहे हैं, वे जनता के समक्ष खुद को विकल्प के रूप में प्रस्तुत क्यों नहीं कर पाए? आज तमाम लोग न केवल यह सवाल कर रहे हैं बल्कि आप के उदाहरण से भारत के संसदीय वाम की आलोचना भी कर रहे हैं.  

तात्कालिकता से प्रभावित हो कोई अंतिम सत्य कहने के भ्रम पालने से बेहतर होगा कि इस पर थोड़ी देर रुक कर सोचा जाए. क्या आप जैसी कार्यवाही वाम दल कर सकते थे और वैसी ही सफलता हासिल कर सकते थे? क्या आप वाम दलों जैसा ही दल है? क्या आप की यह सफलता हर हाल में दीर्घजीवी है?

उदाहरण के लिए आप के आन्दोलन की मीडिया कवरेज़ को लिया जा सकता है. अखबारों और चैनलों की दुनिया से परिचित लोग जानते हैं कि वाम दलों से जुड़ी ख़बरों को बाक़ायदा ब्लैक आउट करने के निर्देश वाले चैनलों और अखबारों ने किस तरह पहले दिन से इस आन्दोलन को बढ़ा चढ़ा के कवर किया था. कारण स्पष्ट है. जहाँ वाम दल उन नीतियों का ही विरोध करते हैं जो कार्पोरेट्स की लूट को संवैधानिक स्वीकृति देते हैं, अन्ना का आन्दोलन या फिर अब केजरीवाल की पार्टी संविधान द्वारा स्वीकृत नीतियों को ही पूरी ईमानदारी से लागू कराने की बात करते हैं. इनमें किसी आमूलचूल परिवर्तन की कोई बात होने की जगह इसी व्यवस्था को थोड़ा और सहनीय बनाने की कोशिश है जो अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में जनता को ही नहीं कार्पोरेट्स के एक बड़े हिस्से को भी बेहतर लगती हैं. ईमानदार सरकारी तंत्र और कारपोरेट सहयोगी सरकारी नीतियों का जोड़ा लूट के तंत्र को बनाए रखने का सबसे सहज तरीक़ा है जिसके तहत बाक़ायदा सरकारी पुलिस हड़ताली मज़दूरों को गिरफ्तार करती है और मालिकान को सुरक्षा देती है तथा न्यायालय हड़ताल को ग़ैरकानूनी घोषित करते हैं. ज़ाहिर है उन्हीं मज़दूरों को नेतृत्व देने वाले दल न मालिकान की पसंद हो सकते हैं न ही उनके अखबारों या चैनलों के तो जो इमेज बिल्डिंग का पूरा तंत्र है वह उन्हें कभी वह जगह नहीं दे सकता है जो आप या ऐसे किसी अन्य दल को.

ऐसे में आप या उसकी कार्यविधि से वाम दलों की तुलना उचित नहीं होगी. लेकिन सारा ठीकरा कार्पोरेट्स के सर फोड़कर निकल लेना जनता की चेतना के ऊपर अविश्वास तो है ही साथ ही अपनी कमियों को नज़रअन्दाज़ करना भी है. आख़िर जिन कार्पोरेट्स के खिलाफ़ वाम दल आवाज़ उठाते रहे हैं, उनसे सहयोग की उम्मीद भी कैसे और क्यों की जानी चाहिए? उन्हें तो अपना रास्ता ख़ुद बनाना होगा और यदि नहीं बना पा रहे तो यह सही समय है जब अपनी नीतियों और तरीकों पर गंभीर पुनर्विचार करना होगा. वाम दल गिमिक्स के भरोसे सत्ता में नहीं आ सकते. उनका इकलौता सहारा वह जनता है जिसकी रहनुमाई का वे दावा कर सकते हैं. यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि उस जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता लगातार कम हुई है और उपस्थिति भी. जिन इंडस्ट्रीज़ से ट्रेड यूनियनें आती थी अर्थव्यवस्था के भीतर उनका प्रभाव कम होने के साथ साथ वे ट्रेड यूनियनें, जो पहले ही अर्थवाद में फंस कर अपनी वैचारिक धार खो चुकी थीं, अब लगभग निष्क्रिय और निष्प्रभावी हो चुकीं हैं. नब्बे के बाद प्रभावी हुए उद्योगों में यूनियने बनाना बेहद मुश्किल हुआ है और वहाँ वाम दलों की यूनियनें लगभग अनुपस्थित हैं. छात्र मोर्चे पर भी एस ऍफ़ आई और ए आई एस ऍफ़ जैसे संगठन ज़्यादातर जगहों पर अनुपस्थित हैं तो आइसा की उपस्थिति भी सीमित ही है. यहाँ भी जिन नए तरह के शैक्षणिक संस्थानों (प्रबंधन, इंजीनियरिंग आदि) में बहुतायत छात्र जा रहे हैं, वहाँ छात्र राजनीति की कार्यवाहियाँ नामुमकिन हैं. शोषण के सबसे प्रमुख केंद्र बन चुके गाँवों में वाम दलों के संगठन दिखाई नहीं देते तो कम से कम उत्तर भारत के कस्बों और छोटे शहरों में भी उनकी उपस्थिति हद से हद नाममात्र की है. ऐसे में उनकी किसी आमूलचूल परिवर्तनकारी भूमिका में उभरने की संभावना कहाँ दिखाई देती है? आप जैसा मध्यवर्गीय तथा ‘विचारधाराहीन’ दल अपने लोक लुभावन नारों के साथ दिल्ली में उभर कर देश भर में चर्चित हो सकता है. वह ‘ऊपर से नीचे’ की यात्रा कर सकता है. लेकिन मज़दूरों, ग़रीबों, गावों और परिवर्तन की बात करने वाले वाम दलों के लिए यह संभव नहीं, उन्हें हर हाल में नीचे से ऊपर की यात्रा करनी होगी. जो कहीं अधिक मुश्किल भी है और कहीं अधिक काँटों से भरी भी. वह धारा के विपरीत तैरने जैसा है, लेकिन उसका कोई विकल्प भी नहीं. जनता किसी के पास उसका मैनिफेस्टो पढ़कर नहीं आती, उस वटवृक्ष को हिलाने की ताक़त परिवर्तनकामी शक्तियों को खुद जुटानी होती है और आमूलचूल परिवर्तनों का कोई शार्टकट नहीं होता.

इसीलिए ‘आप’ के उभार को लेकर उसके अति-उत्साहपूर्ण स्वागत या फिर उतनी ही तीव्रता से आलोचना की जगह वाम ताक़तों को अब पूरी गंभीरता से विकल्पहीनता की इस स्थिति में, जहाँ पर आप जैसे भ्रम भी जनता को बहुत दिनों तक बहला नहीं पायेंगे या फिर जनता के पक्ष में खड़े हुए तो शनैः शनैः वाम के करीब आएँगे, उन्हें नीचे से ऊपर की तरफ उठते हुए मज़लूम जनता को गोलबंद कर लम्बी और फैसलाकुन लड़ाई में उतरना चाहिए. शार्टकट तो इसका नहीं होगा लेकिन जनता उस दीर्घ काल तक भी प्रतीक्षा नहीं करेगी जिसके बारे में स्मिथ ने कहा था कि ‘दीर्घ काल में हम सब मर जाते हैं.’  


  


सोमवार, 12 नवंबर 2012

विकल्प के सवाल पर बहस - १

पिछले दिनों मैंने फेसबुक पर यह लिखा था कि हम पूँजीवाद की आलोचना तो बहुत अच्छी प्रस्तुत करते हैं लेकिन विकल्प के सवाल पर अक्सर बात नहीं होती. उसी बहस को लेकर हमें कुछ मित्रों के लेख मिले हैं. उस कड़ी में पहला लेख साथी मयंक तिवारी का. हालांकि इस आलेख में भी आप देखेंगे कि जोर इस पूंजीवादी सिस्टम की आलोचना पर ही अधिक है. समाधान वाले पक्ष को सैद्धांतिक बातों और घोषणाओं से ही निबटा दिया गया है. असली सवाल उस वैकल्पिक व्यवस्था का एक स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करने का है. फिर भी बहस शुरू तो होती है..आगे इसे चलाना और किसी गंभीर मुकाम तक पहुंचाना आप सबकी जिम्मेवारी है. 




इक्कीसवीं शताब्दी का भारत : समस्याएँ और समाधान


प्रत्येक व्यक्ति अपने अतीत की त्रुटियों से शिक्षा ग्रहण करके वर्तमान को बेहतर बनाने के प्रयास करता है और उन्हीं प्रयासों के आधार पर उज्जवल भविष्य की रचना का स्वप्न देखता है। इस तथ्य पर यदि किसी राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में विचार करें, तो व्यक्तियों का समूह होने के कारण उस पर भी यह बात अक्षरशः लागू होती है। भारत गौरवशाली परम्पराओं का देश है, जिसने वर्षों से विदेशी आततायियों के आक्रमणों को झेलने के बाद यदि अपने अस्तित्व को कायम रखा है, तो निःसन्देह इसकी सभ्यता और संस्कृति सराहनीय है। लगभग दो सौ वर्षों की लम्बी और नारकीय ब्रिटिश गुलामी झेलने के बाद और लाखों बलिदानियों का रक्त-स्नान करने के बाद भारत अपनी खोयी हुई सम्प्रभुता को पुनः प्राप्त करने में सफल रहा। किन्तु ज्वलन्त प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी खोई हुई सम्प्रभुता और अखण्डता को कायम रख सकेगा? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिये हमें अपनी वर्तमान दशा और दिशा पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना होगा। 

भारत लगभग एक अरब आबादी वाला राष्ट्र है। जिसकी 40 प्रतिशत से भी अधिक जनता गरीबी-रेखा के नीचे जीवन यापन करती है अर्थात अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्णतः अक्षम है। भारत में लोकतन्त्र की स्थापना के बाद से ही उत्पादन के साधनों पर मुट्ठी भर थैलीशाहों के कब्जे की व्यवस्था लागू की गयी। आज भी 80 प्रतिशत भूमि पर 20 प्रतिशत भूस्वामी काबिज़ है और 80 प्रतिशत किसान 20 प्रतिशत भूमि जोत रहे हैं। इस आर्थिक असमानता को बदस्तूर बनाये रखते हुए सभी सरकारों ने लोकतन्त्र के नाम पर चुनाव का धोखा-धड़ी पर टिका घिनौना खेल खेला, जिसका शिकार भारत का गरीब तबका हुआ।

आज जब हम इक्कीसवीं शताब्दी से मात्र 13 महीनों की दूरी पर खड़े हैं, भारत की दुर्दशा के लिये यदि कोई सर्वाधिक दोषी है, तो वह है यहाँ की राजनीति। हमारा लोकतन्त्र वस्तुतः धनतन्त्र है और नीति केवल वोट की राजनीति बन चुकी है। नेता जी के दर्शन केवल चुनाव के मौसम में ही होते हैं। इधर चुनाव समाप्त, उधर नेता जी दीन-दुनिया से बेखबर अपनी धन-पिपासा मिटाने और अपनी अगली कई पीढ़ियों के लिये सम्पत्ति संचित करने के एक-सूत्री कार्यक्रम के क्रियान्वयन में लीन हो जाते हैं। आज तक सभी सरकारों ने देश को भरपूर लूटा और देश की जनता की खून-पसीने की कमाई राजनेताओं के स्विस बैंकों के गुप्त खातों में जमा होती रही। भारत अन्दर से खोखला होता रहा और बाहर से ऐसी चमक-दमक प्रदर्शित की गयी कि आम आदमी चकाचैंध हो गया। क्या कारण है कि इतने विशाल प्राकृतिक संसाधनों के भण्डार के बावजूद और साथ ही साथ तमाम देशी-विदेशी कर्ज़ों और अनुदानों के बाद भी भारत विकसित नहीं हो सका? क्या इसका एक मात्र कारण बढ़ती जनसंख्या है? नहीं, कत्तई नहीं। क्योंकि देश की सम्पत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा असमान वितरण के कारण चन्द औद्योगिक घरानों के शिकन्जों में कैद है। यदि सम्पत्ति का समान वितरण किया जाय, तो देश में प्रति व्यक्ति आय कई गुना बढ़ सकती है। हमारी पंचवर्षीय योजनाएँ पाँच तो क्या दस वर्षों में भी पूरी नहीं होती। हाँ, कागज़ी खानापूर्ति ज़रूर कर दी जाती है। इन सब की दोषी यहाँ की भ्रष्ट नौकरशाही है।

दुनिया 1990 में प्रारम्भ हुई आर्थिक मन्दी की चपेट में है। दक्षिण कोरिया और इण्डोनेशिया इसके ताज़ा-तरीन शिकार हैं। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की त्रुटिपूर्ण आर्थिक नीतियों का ही कमाल है, जो भारत पर विकसित पूँजीवादी राष्ट्रों का शिकंजा कसता जा रहा है और यहाँ की अर्थ-व्यवस्था तेजी़ से ऋण-जाल में फँसती जा रही है। भारत प्रति वर्ष जितना कर्ज़ लेता है, उससे कहीं ज़्यादा पुराने कर्ज़ों का ब्याज चुकता करता है। परिणाम सामने है। आज देश पर 1 लाख 61 हजार 427 करोड़ रुपये का विदेशी कर्ज़ तथा 7 लाख 18 हजार 299 करोड़ रुपये का घरेलू कर्ज़ है और विदेशी कर्ज़ पर ब्याज 4150 करोड़ रुपये तथा घरेलू कर्ज़ पर ब्याज 61550 करोड़ रुपये का अदा किया जा रहा है। यह बयान 1 दिसम्बर 98 को राज्य सभा में वित्तमन्त्री यशवन्त सिनहा ने दिया।

सत्तर के दशक में विकसित राष्ट्रों की ओर पूँजी का जो बहाव 5 बिलियन डालर प्रति वर्ष था, वह वर्तमान समय में 36 गुना बढ़ कर 175 बिलियन डालर प्रति वर्ष हो गया। भारत की उदारीकरण नीति तेजी से भारत को आर्थिक गुलामी की ओर ढकेल रही है। निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण वास्तव में पूँजीवाद और साम्राज्यवाद की ज़बरदस्त साजिश है, जिससे वह विश्व को नयी बेड़ियों में बाँध लेना चाहता है। एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी की जगह अनेकानेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और शेयर-मार्केट द्वारा त्वरित विदेशी मुद्रा के हमले के लिये देश के दरवाजे़ खोल दिये हैं। इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली में अन्तराष्ट्रीय मुद्रा-कोष तथा विश्व-बैंक के अधिकारियों के लिये बन रही कोठियाँ एक दिन रेजीडेन्सी का काम करेंगी। नयी आर्थिक नीतियों में निजीकरण की प्रक्रिया अत्यन्त खतरनाक है, किन्तु वैश्वीकरण इससे कहीं ज़्यादा खतरनाक है। क्योंकि प्रत्येक विदेशी कम्पनी कम से कम 10.15 देशी कम्पनियों का भक्षण अवश्य करेगी, जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य के प्रारम्भिक दिनों में हुआ था। वास्तव में पूँजी का बढ़ता कसाव और केन्द्रीकरण ही गरीबी का सबसे बड़ा कारण है। अपनी इन्हीं आर्थिक नीतियों का कुपरिणाम दक्षिण कोरिया और इण्डोनेशिया जैसे देश भुगत रहे है। निःसन्देह अब बारी भारत की है।

प्रतिद्वन्द्वी सोवियत-संघ के खण्डित हो जाने के कारण अमेरिका एक ध्रुवीय विश्व बनाने के चक्कर में है। उसे रंच-मात्र विरोध भी असह्य है और किसी प्रकार का विरोध निकट भविष्य में पुंजीभूत होता नहीं दिखता है। यूरोपीय देश ‘यूरो’ मुद्रा चलाने के चक्कर में हैं। अभी तक विश्व पूँजीवाद की उत्पादन-पद्धति को आर्थिक मन्दी से मुक्ति दो बार हुए विश्व-युद्धों ने दिलायी है। भारत और पाकिस्तान सहित सभी राष्ट्र अन्धराष्ट्रवाद और बहुसंख्यक आबादी के युद्धोन्माद अर्थात् फासिज्म की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले 13 महीनों में फासिस्ट प्रवृत्तियों का नंगा नाच और बढ़ेगा। अभी तक मुसलमानों को अपना शत्रु नम्बर एक घोषित करने वाले संघ-परिवार ने अब ईसाइयों को विदेशी कह कर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया है। वे साम्प्रदायिकता की अपनी आँधी और बढ़ाते जायेंगे। आर्थिक मन्दी के चलते अमीरों के इस्तेमाल में आनेवाली उपभोक्ता सामग्रियों - कार, फ्रीज, एयरकण्डीशन, वाशिंग मशीन, टी0वी0, कम्प्यूटर आदि के दाम निरन्तर गिर रहे हैं. वहीं नब्बे प्रतिशत जनता की आबादी के लिये किसी तरह जीने-खाने के लिये आवश्यक सामग्रियों आलू, प्याज, नमक, तेल आदि के दाम जमाखोरी के कुचक्र के चलते अकस्मात ही आसमान चूमने लगे हैं। यह प्रवृत्ति भी आगामी शताब्दी में गरीबों की हड्डी निचोड़ लेने वाला वर्ग जारी रखेगा। निजीकरण के परिणाम-स्वरूप प्रख्यात अर्थशास्त्री कीन्स की कल्याणकारी राज्य के जन-संघर्षों के दबाव के परिणामस्वरूप जो भी अंशतः जन-हित में लागू किया जा रहा था, वह भी नेस्तनाबूद किया जा चुका है।

चिकित्सा तथा शिक्षा मध्यम वर्ग के नीचे की आम जनता के लिये अनुपलब्ध होती जा रही है। यह प्रवृत्ति आम जनता को कीड़े-मकोडे़ की तरह मरने और पशुओं की तरह निरक्षर जीवन जीने के लिये आने वाले वर्षों में भी बाध्य करती रहेगी। पुलिस-प्रशासन और न्याय-व्यवस्था के चक्के रिश्वत और सिफारिश पहुँचा सकने में सक्षम लोगों की स्वार्थ-सेवा में आज भी हिल रहे हैं, कल भी इनकी गति बदस्तूर न्याय की देवी की बार-बार हत्या करती रहेगी। आने वाला कल का भारत गुण्डो, स्मगलरों, जातिवादी नेताओं, कमीशनखोर अफसरों की राज-सत्ता अर्थात् मुनाफाखोरों के ताण्डव में झुलसने वाला भारत ही होगा। किसान कर्ज के फन्दे में जकड़ कर और बड़ी संख्या में आत्महत्याएँ करेंगे। नारी बार-बार अपमानित की जायेगी तथा कंगालों की टोलियाँ नमक-रोटी की तलाश में दर-दर भटकती रहेंगी।

भारत इस उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा भू-भाग है। कई राष्ट्रीयताएँ (कश्मीर और पूर्वोत्तर के सातों राज्य) मुक्ति के लिये संघर्षरत हैं। केन्द्र सरकार नेहरू-काल से ही राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के अधिकार का दमन ही करती आयी है। यह समस्या भी आतंकवाद के रूप में पड़ोसियों की कृपा से जटिलतर होती जा रही है। इसका समाधान भी वर्तमान सत्ता के अन्धराष्ट्रवादी दृष्टिकोण से असम्भव है। ऐटम बम ने भारत को सैनिक रूप से सक्षम किया है तो आर्थिक रूप से कमज़ोर। समस्या समाज की चेतना की क्षितिज के विस्तार की भी है। गत पचास वर्षों में धीरे-धीरे करके परम्परागत संयुक्त परिवार नष्ट हो चुका है। परिवार के मुखिया के स्थान का स्वामित्व अधिक कमाने वाले के हाथों में खिसक चुका है। संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर इस संक्रमण ने समाज की सामूहिकता की चेतना को क्षरित किया है। व्यक्ति अधिक स्वार्थी होता चला जा रहा है। ऐसे में सामाजिक संगठन, वर्गीय संगठन तथा परस्पर सरोकार के विनाश से व्यक्तिवाद पनप चुका है। जब तक व्यक्ति अपने दायित्व-बोध की अनुभूति के अनुरूप आचरण आरम्भ नहीं करेगा, मनोरथ मात्र कल्पना ही रहेंगी। सामूहिक हितों के लिये सक्रियता की भावना निकट भविष्य में भी क्षीण ही दिखायी देती है। संक्षेप में कहें, तो आज की सारी समस्याएँ और घनीभूत होकर आने वाले दशक में भारतीय समाज के ताने-बाने को और भी जर्जर करती चली जायेंगी। व्यक्ति अलगाव का शिकार होकर और भी असहाय महसूस करता जायेगा।

समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने वाली शक्तियाँ देश के कोने-कोने में विभिन्न नामों से सक्रिय तो हैं, किन्तु उनके बीच एकजुटता की प्रक्रिया अभी आरम्भ भी नहीं हो सकी है। क्रान्तिकारी नेतृत्व विचारधारात्मक प्रश्नों से लेकर गतिविधियों तक के धरातल पर दूर-दूर तक जन-सामान्य से एकरूप नहीं हो सका है। जिसके चलते भारतीय क्रान्ति की सम्भावना आगामी कई वर्षों तक घूमित ही दिखायी देती है। आने वाला कल सूर्योदय के पूर्व के सघन अन्धकार की तरह अत्यन्त विषाक्त होगा। इसके पश्चात ही इक्कीसवीं शताब्दी के लगभग तीसरे दशक तक आर्थिक मन्दी का संकट हल हो सकेगा। तब तक या तो तीसरा विश्वयुद्ध विश्व-क्रान्ति की श्रृंखला-अभिक्रिया को प्रारम्भ कर चुकेगा अथवा स्वतः-स्फूर्त विद्रोह संगठित होते-होते जन-विरोधी साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था का समाजवादी काया-कल्प कर डालेंगे। अन्धेरा घना होना अपने-आप में सूर्योदय की तैयारी है। प्रसव की वेदना नवीन शिशु की किलकारियों की पूर्वानुभूति है। समाज संक्रमण की छटपटाहट झेल रहा है। आसुरी शक्तियों का नंगा नाच अनन्त काल तक चलना असम्भव है।

इतिहास का अन्त नहीं होता। अगली पीढ़ी अपने से पिछली पीढ़ी की तुलना में अधिक प्रबल, सक्षम तथा मेधावी होती है। मनुष्य बर्बर कबीलाई समाज से सतत युद्धरत सामन्ती समाज की घृणित विलासिता और जंजीरों से जकड़े गुलाम से, बसाये गये भूदासों तक का सफर करता हुआ बीसवीं सदी के अन्त तक पूँजी और श्रम के महाभारत की तैयारी तक आ पहुँचा है।

डंकल का डंक कभी तो चूर-चूर किया ही जायेगा।
धरती फिर करवट बदलेगी, फिर इतिहास बढ़ेगा।
माटी का बेटा जल्दी ही, हक के लिए लड़ेगा।।
नहीं कहानी खत्म हो रही है डंकल के साथ।
पूँजी की देवी के सिर से भी उतरेगा ताज।।

महाबली मानव ने अपने इरादों के सहारे चाँद-सितारों को फ़तह किया है। जब तक अन्याय, अत्याचार, जुल्म व शोषण जारी रहेगा, जीवन के द्वन्द्व का दूसरा पक्ष - प्रतिरोध भी निरन्तर चलता रहेगा - कभी तेज, कभी मद्धिम। वर्ग-युद्ध तब तक जारी रहेगा, जब तक शोषणकारी शक्तियाँ नेस्तनाबूद नहीं कर दी जाती। अन्तिम विजय श्रम की, न्याय की, सामूहिकता की, संवेदना की, रचना की, विकास की होगी। प्रतिगामी पक्ष की पराजय इतिहास का बार-बार दुहराया गया तथ्य है। आने वाला कल भी इसका अपवाद नहीं होगा।

नूर की एक किरण जुल्म प’ भारी होगी।
रात उनकी ही सही सुबह हमारी होगी।।