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रविवार, 10 जुलाई 2011

‘बीबीसी हिन्दी सेवा -प्रस्तावित बन्दी से उपजे सवाल’




  • रामजी तिवारी



गत 24 जनवरी कोबी.बी.सी प्रबन्धन की इस घोषणा पर उसका श्रोता समुदाय सन्न रह गया कि वह अपने बजट में 20 प्रतिशत की कटौती करने जा रही है, जिसके कारण विश्व सेवा के साथ-साथ अन्य भाषाओं के प्रसारणों में या तो कटौती की जायेगी या फिर इन्हें बन्द कर दिया जायेगा। इस प्रस्तावित बन्दी की सूची में हिन्दी सेवा भी शामिल थी, जिसकी वर्तमान प्रसारण अवधि 2) घण्टे की थी और जिसे 4 सभाओं में विभाजित किया गया था। बी.बी.सी प्रबन्धन का यह निर्णय ब्रिटिश सरकार के समग्र बजट कटौती प्रस्ताओं की नीति के अनुरूप था। ध्यान रहे कि बी0बी0सी0 के प्रसारण का व्यय ब्रिटेन की सरकार उठाती है, जो विश्वव्यापी मंदी के दौर से निकलने का प्रयास कर रही है। इन्हीं प्रयासों में बजट कटौती का समग्र प्रस्ताव भी शामिल है। 

इस प्रस्तावित बन्दी की घोषणा का विभिन्न हलकों में विरोध हुआ, जिसमें हिन्दी सेवा का श्रोता समुदाय भी शामिल था। यह विरोध इतना मुखर था और जिसे कुछ बुद्धिजीवी हलकों में समर्थन भी मिला कि बी.बी.सी प्रबन्धन ने हिन्दी सेवा की एक सभा (शाम 7.30 बजे से 8.30 बजे तक) को अगले एक वर्ष तक जारी रखने का फैसला सुनाया। इस फैसले के मुताबिक यदि मार्च 2012 तक व्यावसायिक फंडिंग की व्यवस्था नहीं हो पायेगी तो इस सेवा को भी अलविदा कह दिया जाएगा। मेसीडोनियाइ, अल्बानियाई,सर्वियाई, मंडारिन, अरबी, वियतनामी, यूक्रेनी, स्पेनिश सहित अन्य भाषाओं के प्रसारणों में कटौती या बन्दी के बरक्स हिन्दी सेवा के एक सभा की बहाली का भारतीय श्रोता समुदाय मंे स्वागत किया।

इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवालों को जन्म दिया है, जिनमें बी.बी.सी हिन्दी सेवा की शुरूआत की पड़ताल भी शामिल है। आखिर इसका उद्देश्य क्या था ? इसने किन आधारों पर अपनी विश्वसनीयता कायम की ? भारतीय श्रोता समुदाय इससे क्यों जुड़ा ? ब्रिटिश करदाता इसके लिए क्यों कर चुकाता रहा? और अन्ततः किस दबाव या मजबूरी में इसे आज बन्दी का दरवाजा दिखाया जा़ रहा है? जाहिर है इसे समग्रता में देखे बिना नहीं समझा जा सकता है? 

बी.बी.सी हिन्दी सेवा (तब इसका नाम हिन्दुस्तानी सेवा था) का आरम्भ 11 मई 1940 को दोपहर 2.20 मिनट पर हुआ। इस प्रसारण की अवधि 10 मिनट की थी। युद्धकालीन परिस्थितियों के बीच इस सेवा का आरम्भ उन भारतीय सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया, जो ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे और अपने देश से बाहर रह रहे थे। इ सका उद्देश्य इन सैनिकों के परिवारों तक युद्ध के ब्रिटिश पक्ष को पहुँचाना भी था। साथ ही साथ जर्मन रेडियो के उन प्रसारणों का जवाब देना भी  जिसमें सुभाष चन्द्र बोस का सम्बोधन प्रसारित होता था। जर्मन रेडियो का का यह प्रसारण भारतीयों से पूछता था कि वे किसलिए ब्रिेटेन का साथ दे रहे हैं ? उसी ब्रिटेन का, जो विश्व युद्ध तो लोकतंत्र के नाम पर लड़़ रहा है, लेकिन भारत को आजादी देने के सवाल पर लगातार कन्नी काट रहा है? जाहिर है जर्मन रेडियो के उन सवालों का जवाब आल इंडिया रेडियो के पास नहीं था क्योंकि ब्रिटिश अधीनता के कारण आम सामान्य जनमानस में उसकी विश्वसनीयता नहीं रह गयी थी। 

तो इन परिस्थितियों में बी.बी.सी हिन्दुस्तानी सेवा का शुरूआत हुयी। वैसे बी.बी.सी का अपना अस्तित्व 1922 में ही आ चुका था, जिसे 1927 आते-आते कम्पनी से कारपोरेशन के रूप में बदल दिया गया था। 1930 के दशक में नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली के उभार ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिलाना आरम्भ कर दिया था। ब्रिटेन इनके साथ लगातार तुष्टिकरण की नीतियाँ अपनाता रहा और ये दोनों शक्तियाँ विश्व विजेता के रूप में उभरने के लिए प्रेरित होती रही। नाजी जर्मनी की रेडियो के प्रसारण आक्रामक और लगातार हमले करने वाले होते थे। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने इनका जवाब देने के लिए 1938 में बी.बी.सी की सेवाओं मंे विस्तार का फैसला लिया और पहली बार विदेशी भाषा की अरबी सेवा का प्रसारण आरम्भ हुआ। लेकिन चेम्बरलेन की क्षमताएँ सीमित थी और उन्हें युद्ध के मध्य ही इस्तीफा देना पड़ा। विन्सटन चर्चिल ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का कार्यभार ग्रहण किया और यह संयोग ही था कि अगले दिन अर्थात 11 मई 1940 को बी.बी.सी हिन्दुस्तानी सेवा अस्तित्व में आयी।

इस हिन्दुस्तानी सेवा को आरम्भ करने का श्रेय जुल्फिकार अली बुखारी को जाता है। वे पहले आल इण्डिया रेडियो के बम्बई कार्यालय में केन्द्र निदेशक थे। उन्होंने भारतीय परिस्थितियों का विधिवत अध्ययन किया था। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह था कि बी.बी.सीकी हिन्दुस्तानी सेवा को खुले प्रचार से बचना चाहिए, जिससे भारत में संदेह ना उठे कि हिन्दुस्तानी सेवा के प्रसारणों का इस्तेमाल ब्रिटेन और भारत के सवैधानिक सम्बन्धों के सन्दर्भ में और किसी नीति विशेष के पक्ष मे प्रचार माध्यम के रूप में किया जा रहा है। यह संदेह हिन्दुस्तानी सेवा के युद्ध कालीन महत्व को नष्ट करने वाला हो सकता था।

यही नीति आगे चलकर बी.बी.सी हिन्दुस्तानी सेवा का मार्गदर्शक सूत्र  बन गयी। अपनी बात को इस तरह से कहना कि वह सच के नजदीक प्रतीत हो, जिससे यह सुविधा बनी रहे कि अपने पक्ष का प्रचार भी सच ही प्रतीत हो। जाहिर है यह काम आसान तो कतई नहीं था इसमें सच को काफी महत्वपूर्ण दर्जा दिया जाना था, जिसके पीछे या बीच में अपनी बात छिपाई जा सकती थी। एक पुराने और क्लासिकल उपनिवेशवादी देश ब्रिटेन ने यह अनुभव अपने लम्बे उपनिवेशवादी शासन से अर्जित किया था। यह वही ब्रिटेन था, जो अपने उपनिवेशों को सभ्य बनाने की जम्मेदारी के रूप में देखता था और मानता था कि भारत सहित उसके विभिन्न उपनिवेशों में यह सलाहियत मौजूद नहीं कि वे अपना शासन स्वयं चला सके। सभ्य बनाने और संस्कृति के विकास की ओर ले चलने की ओढ़ी हुयी जिम्मेदारी ब्रिटेन को इन उपनिवेशों पर शासन करने का नैतिक आधार प्रदान करती थी। यह दीगर बात है कि इस सभ्य बनाने के कारण एक पूरी दुनिया आज तक घिसट रही है।

इन सूत्र वाक्यों ने हिन्दुस्तानी सेवा को खड़ा और विकसित किया। धार्मिक स्वतंत्रता, ब्रिटेन के अच्छे व्यवहार के किस्से, ब्रिटेन में स्वतंत्रता, उसकी विधिव्यवस्था और संस्कृति, भारतीयों की प्रशंसा जिसमें टैगोर और ताजमहल प्रमुख थे और भारतीयों की प्रगति के किस्से इन प्रसारणों में भरे रहते थे। इन सबको सोचने और क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी जिस एक और शख्स ने निभायी थी, वे थे- जार्ज आरवेल। हाँलाकि वे एक साहित्यकार थे लेकिन भारत में जन्म लेने और लम्बे समय तक रहने के कारण उन्हें इस देश की गम्भीर समझ थी। उन्होंने साहित्यिक कार्यक्रम तो बनाये ही साथ ही साथ युद्ध कालीन समीक्षा का साप्ताहिक कार्यक्रम भी तैयार किया। इसके केन्द्र में वही श्रोता समुदाय होता था, जो बर्लिन से प्रसारित रेडियो आजाद हिन्द पर सुभाष को सुनता था। आरवेल का मानना था कि ब्रितानी साम्राज्यवाद  बुरा तो है लेकिन फासीवादी व्यवस्थाओं से अच्छा है। वे भारत की आजादी के पक्षधर तो थे, लेकिन दबी जुबान से ही। 1942 में उन्होंने ‘वायस’ नामक श्रंृखला आरम्भ की, जिसमें इलियट, फास्टर, एम्पसन, मुल्कराज आनन्द आदि का कविता पाठ और चर्चा का आयोजन होता था। तो कुल मिलाकर इसकी शुरूआत के आधारों ने इसे गम्भीर और समझदार सेवा के रूप में प्रचारित किया, हाँलाकि इन घोषित उद्देश्यों के पीछे ब्रिटिश नीतियों का प्रचार और इनके प्रति भारतीयों के मन में समर्थन जुटाने की कोशिश का प्रयास ही प्रमुख था।

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति और भारत की ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह सवाल उठा कि अब इन प्रसारणों को जारी रखने का क्या औचित्य है? 1951 में उठे इस सवालों का उत्तर यह दिया गया कि ‘प्रश्न कुछ पाउण्ड बचाने का नहीं है, वरन चुनाव का है। ये सेवायें विदेशों में ब्रिटेन के सबसे महत्वपूर्ण राजदूत की भूमिका निभाती है। ऐसी सम्पदा को कुछ पैसे बचाने के लिए यूं ही नहीं फेंका जा सकता है।’ इस बीच 1949 में हिन्दुस्तानी सेवा को हिन्दी सेवा और पाकिस्तानी सेवा में विभाजित कर दिया गया था। शीत युद्ध का दौर जब आरम्भ हुआ तब इन सेवाओं की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गयी। ब्रिटिश सरकार की रूचि और हितों को प्रस्तुत करने का इससे बढ़िया माध्यम और क्या हो सकता था।

अरसे तक ब्रिटेन इनके माध्यम से अपने पुराने उपनिवेशों में अपनी उपयोगिता खोजता रहा। बी0बी0सी0 की ये सेवाएँ अपनी स्थापित स्वायतता और निष्पक्षता के बीच ब्रिटिश सरकार की नीतियों के लिए जगह उपलब्ध कराती रही। जब भी ऐसा अवसर आया, इन सेवाओं ने ब्रिटिश हितों का ध्यान रखा। शीत युद्ध का दौर हो, फाकलैण्ड का युद्ध हो, ईराक पर आक्रमण हो, सोवियत संघ का विघटन हो, पूर्वी यूरोप में साम्यवादी सरकारों का पतन हो या फिर आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक युद्ध का मसला हो,बी.बी.सी ने सरकार द्वारा दी गयी धनराशि का कर्ज सूद समेत और चुपचाप अदा किया। उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष छवि हमेशा ही ऐसा करने में सहायक रही। उसने इन निष्पक्षताओं के मध्य ब्रिटिश नीतियों का पक्ष इस प्रकार शामिल किया कि आम-सामान्य श्रोता समुदाय उसे भी सच ही मानता रहा।

लेकिन यह सवाल तो हमेशा बना रहा कि ब्रिटिश करदाता को क्या पड़ी है कि वह इन सेवाओं को चलाने के लिए कर अदा करें ? इसके जवाब को क्लासिकल उपनिवेशवादी तरीके से दिया गया। कहा गया कि ‘इसके लिए अपने पूर्वजों को दोषी माना जाना चाहिए, जिन्होंने जंगलों और गुफाओं से निकलकर इन्सानी बस्तियां बसायीं। अब जब हम सब एक ही ग्रह पर रहते हैं और आगे बढ़ रहे हैं तो इस प्रयास में एक दूसरे की मदद करना तो हमारी जिम्मेदारी होती है।बी.बी.सी  के प्रसारण इसी जिम्मेदारी को निभाने का प्रयास हैं। इन तर्कों को देंखकर आप यह आसानी से समझ सकते हैं कि लम्बे समय तक दुनिया पर राज करने वाला यह साम्राज्यवादी देश किस चालाकी और दूरदर्शिता के साथ इन सेवाओं का प्रसारण कर रहा था।

जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि दुनिया पर शासन करने के औचित्य को ब्रिटेन अपनी जिम्मेदारी के रूप में बताता आया था। साम्राज्य के ढहने और एक महाशक्ति के रूप में बिखर जाने के बावजूद उसकी महत्वाकांक्षाएँ कम नहीं हुयी थी। यह अलग बात है कि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच से उभरने की सारी कोशिशें धूल फाँकती रही।
तो हिन्दी सेवा ने अपनी पहचान, इस दौर में भी, स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रसारण संस्था की ही बनाये रखी। उसने कला, संस्कृति, साहित्य और समाज से जुड़े गम्भीर विषयों को अपने कार्यक्रमों में हमेशा जगह दी, जिसके कारण आम भारतीय श्रोता उसे गम्भीर प्रसारण संस्था मानता रहा। सभी महत्वपूर्ण भारतीय हस्तियाँ, जिन्होंने ब्रिटेन का दौरा किया, को बी.बी.सी  हिन्दी सेवा ने अपने कार्यालय में आमान्त्रित किया और उन पर विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वह नेहरू हो, इन्दिरा गाँधी हों, राधाकृष्णन, शास्त्री, कृपलानी, नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, बी0 पी0 सिंह या फिर कला, संस्कृति और साहित्य जगत की हस्तियाँ हो, सबने बी0बी0सी0 हिन्दी सेवा को समय देना और उसके माध्यम से भारतीय जन मानस में अपनी छवि बनाने के महत्व को समझा।

एक नाम जिसने अपने काम से बीबीसी हिन्दी सेवा को नई उँचाई दी, वह मार्क टली का था। 1965 में अपने प्रवेश से लेकर अगले 30 सालों तक मार्क टली बीबीसी हिन्दी सेवा के पर्याय बने रहें। आपात काल के दौर में, जब भारतीय प्रेस को गम्भीर सेन्सरशिप झेलनी पड़ी थी, बीबीसी हिन्दी सेवा का श्रोता समुदाय 5 करोड़ के आसपास पहुँच गया । ध्यान रहे कि वायस आफ अमेरिका, रेडियो डायजोवेली, रेडियो मास्को, रेडियो चाइना और अन्य देशों के द्वारा भी हिन्दी सेवा के प्रसारण किये जाते रहे, लेकिन इन देशों की सेवाओं का पर्दाफाश बहुत आसानी से हो जाता था, जिन्हें एकपक्षीय और संकीर्ण मानकर आसानी से खारिज किया जाता रहा। 


फिर यह दौर आया, जब ब्रिटेन की वह पीढी प्रभावशाली भूमिका में आयी, जिसने अपने उपनिवेशवादी गौरव को सिर्फ किताबों में पढ़ा था। इस पीढ़ी ने अमेरीका की पूंछ पकड़कर अटलांटिक महासागर को पार किया था। वह मैनहटन की तरफ ललचायी नजरों से देखने वाली पीढ़ी थी, जिसमे प्रत्येक अमेरीकी तौर-तरीकों को नकल करने की ललक थी। इसी बीच विश्वव्यापी मन्दी ने दुनिया के आर्थिक बुलबुले की हवा निकला दी। ब्रिटिश अर्थ व्यवस्था भी लड़खड़ा गयी। इस मन्दी ने इस पीढ़ी के सामने आर्थिक कटौती के विकल्प को एकमात्र रास्ते के रूप में रखा और फिर अन्य सामाजिक सेवाओं के तर्ज पर बी0बी0सी0 के बजट मे भी कटौती करने की मंजूरी दे दी गयी।

बीबीसी के पुराने पुरोधा छटपटा रहे हैं कि यह कटौती देश पर महँगी पडेंगी और ब्रिटेन अपने हितों की रक्षा नहीं कर पाएगा लेकिन नयी पीढ़ी सुनने को तैयार नहीं। ब्रिटिश संसद की बहस को देखकर यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि पुराने लोगों की व्यथा कितनी अधिक है। उसकी संसदीय समिति की रिपोर्ट कहती है कि विदेशी भाषाओं के प्रसारणों से ब्रिटिश हितों को दुनिया भर में पहुँचाना बेहद सुगम रहता है। इसके अनुसार विश्वसेवा के ‘साफ्ट पावर’ का फायदा ब्रिटेन को भविष्य में भी मिल सकता है। उत्तरी अफ्रीका और मध्यपूर्व की घटनाएँ इसकी उपयोगिता को रेखांकित करती है। उनका तो यहाँ तक तर्क है कि देशों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में कटौती करके भी बीबीसी को चलाया जाना चाहिए। यह समिति हिन्दी, मंडारिन और अरबी सेवा पर विशेष जोर देती है। लेकिन ब्रिटिश विदेश मंत्री विलियम हेग का बयान नयी पीढ़ी की मंशा को साफ कर देता है। उनका कहना है कि यद्यपि इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन हमारे पास कटौती प्रस्तावों के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। 

विलियम हेग कहते हैं कि लोगों की यही इच्छा है और हमें उसका सम्मान करना है। हम आन लाईन और मोबाईल सेवाओं के माध्यम से लोगों तक पहुँचने का प्रयास करते रहेंगे। बी.बी.सी के पूर्व महाप्रबन्धक ‘जान टुसा’ झुझलाते हुए नयी पीढ़ी को कोसते हैं, जो ब्रिटिश विदेश नीति के संचालन में बी.बी.सी की भूमिका को नहीं समझा पा रही है। लेकिन आज का ब्रिटिश करदाता अब सुनने को तैयार नहीं दिखता। तो क्या दुनिया को सभ्य बनाने की जिम्मेदारी समाप्त हो गयी है? हाँ ! वह कहता है कि ‘आर्थिक उदारीकरण के बाद इन सेवाओं की क्या उपयोगिता ? इमने तो दुनिया पर बाजार के साथ-साथ मानसिक विजय भी हाँसिल कर ली है फिर यह सब किसलिए ? उसके लिए रेडियो का श्रोता महत्वहीन हो चुका है क्योंकि उसकी बाजारी दखल बेहद सीमित है। उसका निशाना तो इंटरनेट और मोबाईल का श्रोता है, जो उसके उत्पाद और बाजार का बड़ा उपभोक्ता है। अब शायद उसे ही सभ्य बनाया जाएगा।
अब सवाल यह उठाता है कि भारतीय श्रोता क्या करे ? क्या वह ब्रिटिश करदाता से अपील करे कि वह भविष्य में भी हिन्दी सेवा के लिए धन उपलब्ध कराता रहे? वह आन्दोलन करे या प्रदर्शन कि अभी उसे सभ्य बनाने का काम छूट गया है ? वह बेहद ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जिस बीबीसी को वह पलकों पर बिठाये घूमता था, वह ऐसा कैसे कर सकती है ? ‘ये बीबीसी लन्दन है’ .............. और वह बता सकता था कि यह आवाज आंेकार नाथ श्रीवास्तव की है या अचला शर्मा की, शिवकांत की है या परवेज आलम की। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर सकता। सचमुच वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। 
वह तो ये भी नहीं जानता कि ब्रिटिश संसद में इसे लेकर क्या बहस चल रही है? ऐसी बहस, जिसमें वह सिरे से गायब है, जबकि वह तो अपने-आपको केन्द्र में समझ रहा था। अच्छा हुआ कि उसने संसद की बहस नही देखी, पुरोधाओं के विचार नहीं सुने। यदि वह इन बहसों को देख ले, सुन ले तो उसका दुनिया पर से ही विश्वास उठ जाए। उसका यह भ्रम बना रहेगा कि पैसे की कमी से ही बी.बी.सी की हिन्दी सेवा बंद कर दी गयी। इसका दूसरा कोई और कारण नहीं था। और यह भी कि बी.बी.सी ने यह कदम बहुत भारी मन से उठाया। उसे अपने अनुपयोगी होने और नयी प्राथमिकताओं में फिट नही बैठ पाने की हवा तक नहीं लग पायेगी। क्या बात है? ऐसी शातिर चालों पर कौन ना मर जाए-ऐ खुदा।
इन तमाम बातों के होते हुए भी यह समय बी.बी.सी की मर्सिया पढ़ने का नहीं है। यह समय है यह सोचने का कि प्रसारण संस्था के एक बड़े शून्य को किस प्रकार भरा जाए। निजी टीवी चैनलों का वर्तमान स्वरूप बहुत आशावादी नहीं है। वहाँ बैकल्पिक मीडिया का बेहद अभाव है। सार्वजनिक प्रसारक के रूप में प्रसारभारती की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। आज आकाशवाणी की पहुँच देश के कोने-कोने तक है। यदि उसे वह स्वायतता और स्वतंत्रता प्रदान की जाए तो कोई कारण नहीं कि वह इस शून्य को ना भर सके। आखिर यहीं के लोगों ने ब्रिटेन जाकर हिन्दी सेवा को इतना लोकप्रिय बनाया था। प्रिन्ट की वैकल्पिक मीडिया आज इस कार्य को बखूबी निभा रही है, जो स्वायत भी है, स्वतंत्र भी है और निष्पक्ष भी फिर आकाशवााणी यह कार्य क्यों नही कर सकती ? वायस आफ अमेरिका और बी.बी.सी दोनों के उदाहरण हमारे सामने है। पहला अपनी बात कहने के प्रयास मंे अप्रसांगिक हो जाता है और दूसरा सबकी बातों को कहने के मध्य में अपने हितों को भी पूरा कर लेता है।
यदि यह शून्य नहीं भरा तो कुछ दिनों के बाद लोग वही राग अलापने लगेंगे, जो वे अंग्रेजों के लिए अलापते हैं। आजादी के बाद भारतीय नेताओं और उनकी राजनीति से व्यथित होकर लोग-बाग यह कहते हुए मिल जाते हैं कि इनसे अच्छा तो अंग्रेजों का ही शासन था। बी.बी.सी हिन्दी सेवा की विदाई हमें इसके प्रति सावधान करती है, साथ ही हमारी जिम्मेदारी को भी बढ़ाती दिखती है। 



6 टिप्‍पणियां:

  1. सामायिक और बहुत जरुरी लेख

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  2. कृपया जनपक्ष की बैकग्राउंड को जैसा था वैसे ही कर दीजिए. पढ़ने में बहुत समस्या हो रही है. सफ़ेद पृष्ठभूमी ही ठीक होती है.

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  3. यूनिकोड में हम बी॰बी॰सी॰ लिख सकते हैं, मोटा भद्दा 0 लगाने की ज़रूरत नहीं है।

    Unicode Value: U+0970

    Devanagari - INSCRIPT में (Ctrl)+(Alt)+(,)

    Hindi Traditional में यह शामिल नहीं है।

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  4. shukriya sonu ji..sudhar kar diya hai. Santosh ji, ab pristhbhoomi ko sanyojit kiya gaya hai...shaayad ab dikkat na ho.

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  5. बी बी सी पर आपका आलेख मैं एक सांस में पढ़ गया. बेहतरीन प्रस्तुतीकरण के लिए मेरी बधाई
    स्वीकार करें. समस्या तभी आती है जब आप समय के साथ बदलना नहीं चाहते. तमाम किन्तु
    परन्तु के बावजूद यह मानने में शायद ही किसी को परहेज हो कि यह समय न तो १९३९ का है न ही
    १९८४ या फिर १९९१ का. जब बी बी सी के कई कार्यक्रम धीरे धीरे बंद होने लगे थे तभी इसकी आहट को महसूस किया जा सकता था.दुनिया को सभ्य बनाने का ठेका लेने वाले अब थक-हार कर बैठ गए हैं उनकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाये भी दूसरी शक्ल लेने लगी हैं. ऐसे में हमें खुद आगे आना होगा.प्रसार भारती को स्वायत्ता दे कर ये काम बखूबी किया जा सकता है.आखिर बी बी सी के ओंकार नाथ श्रीवास्तव,परवेज आलम.अचला शर्मा, ललित मोहन जोशी,विजय राना यही से जा कर ये मोहक कार्यक्रम पेश करते थे तो ये काम अपनी मिटटी अपनी हवा में क्यों नहीं हो
    सकता.

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  6. धन्यवाद. बी.बी.सी. का ब्रिटिश के प्रति स्वमिभाक्तिता शाही शादी के दौरान बहुत ही आसानी से देखा जा सकता था. राजकुमार विलियम और उनकी पत्नी कैट के बारे में छोटी से छोटी बातों को बड़े ही बड़बोलेपन से पेश किया गया.

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