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गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

क़िस्सा आधी माँ और आधी बेवाओं का


यह क़िस्सा एक दोस्त के आदेश पर क़िस्सागोई के लिए लिखा गया था. किन्हीं वज़ूहात से वह मुमकिन नहीं हुआ तो सोचा यहीं आप सबको पढ़वा दूँ. कोई मित्र किसी रूप में उपयोग करना चाहे तो एकदम कर सकता है. बस मुझे सूचना दे देंगे तो अच्छा लगेगा - अशोक कुमार पाण्डेय 




पैंतीस की उम्र है मेरी. शोपियाँ में जन्मी. शोपियाँ नहीं जानते आप? वादी  ए कश्मीर का छोटा सा ताल्लुका. श्रीनगर  से  आयेंगे तो पुलवामा होकर आना  होगा. और इस्लामाबाद से ...अरे  आप तो अनंतनाग कहते हैं न उसे. वहाँ से आये तो ज़ैनापुरा होकर आना होगा. हाँ, सही पहचाना वही ज़ैनापुरा जिसे बड शाह ने बसाया था. कश्मीर का हीरा बादशाह. ज़ैनुलआब्दीन. सोचिये बुतशिक़न सिकन्दर का बेटा ज़ैनुलआब्दीन जिसने अपने बाप के सारे क़ायदे बदल दिए. उसके  डर  से  भाग गए पंडितों को फिर से बसाया और हिन्दू मुसलमान का भेड़ किए बिना कश्मीर को जन्नत में बदल दिया. उन्हीं के वक़्त में थे नुन्द ऋषि. शेख नुरूद्दीन.  आप कहेंगे ये मुसलमान ऋषि कैसे हो गया? है न गड़बड़झाला? यही कश्मीर है मेरा ...इत्ती आसानी से समझ नहीं आता. अच्छा अगर बताऊं कि जब नुन्द पैदा हुए तो अपनी माँ का दूध ही नहीं पी रहे थे और जोगिन लल द्यद ने जब अपना सीना उनके मुंह में देकर कहा कि दुनिया में आने से नहीं शर्माए तो इसके सुख लेने से क्यों शर्मा रहे हो तो उस बूढ़ी जोगिन के सीने में दूध उतर आया. हिन्दू जोगिन का पहला दूध पीकर यह बच्चा मुसलमानों का सबसे बड़ा पीर बना कश्मीर में, तो? सन्न रह जाओगे न? ऐसा ही है हमारा कश्मीर. न हिन्दुस्तान समझा न पाकिस्तान. सबको अपने रंग में रंगने की पड़ी है...खैर चली थी अपना क़िस्सा सुनाने और कहाँ के किस्से ले बैठी मैं. क्या करें यहाँ किसी के किस्से सिर्फ़ उसके कहाँ होते हैं? एक माज़ी है सर पे सवार, और एक वर्तमान है रगों में खून सा तैरता. खैर मैं शोपियाँ के बारे बता रही थी आपको. आने के लिए पहाड़ी रस्ते. बसें चलती हैं धीरे धीरे. बीच-बीच में रुकती है कहीं तो लोग भाग के कहवा पीने जाते हैं. और जब रोक दी जाती है तो क़तार बना के खड़े हो जातें हैं तलाशी के लिए.
 
उस दिन बर्फ़ गिरी थी वादी में. ऐसी ठण्ड की हड्डियाँ जम जाएँ. फिरन के भीतर कांगर के गर्म कोयले भी जैसे बर्फ़ बन गए थे. शाहीन तो बिस्तर से उठने का नाम न ले. स्कूल बंद थे तो यासीन भी घर में दुबका रहा. ऐसे तो पाँव नहीं पड़ते घर में. जब देखो क्रिकेट क्रिकेट. बल्ला उठाया और निकल लिए मैदान में. लेकिन उस दिन सारी गलियाँ कुहरे में डूबी थीं और मस्ज़िद से आती अस्र की नमाज़ की आवाज़ें जैसे उन्हीं कुहरों में डूबती जा रही थीं. सूरज था ही नहीं कहीं आसमान में पर नमाज़ बता रही थी कि जहाँ कहीं था वह अब डूबने वाला था. शाहिद अब तक नहीं लौटे थे. अब तक तो लौट आना था पुलवामा से. हर हफ्ते जुमे के रोज़ सुबह की बस से जाकर वहाँ से किराने का सामान ले आते. हमारी छोटी सी दुकान थी न किराने की. शक्कर, चाय पत्ती, टॉफी, चिप्स, चावल सब मिलता था. दिन में शाहिद बैठते दोपहर बाद मैं और शाम को शाहिद के साथ यासीन भी. थोड़े से खेत थे, चंद पेड़ सेब के और मजे से चल रहा था घर. यासीन को पढ़ा रहे थे शाह ए हमादान स्कूल में. शाह ए हमादान को तो जानते हैं न आप? अरे! इतनी नावाक़फियत हमसे! आख़िर आप ही कहते हैं कि हम हिन्दुस्तानी हैं. यहाँ तो बच्चा बच्चा जानता है बुद्ध को, राम को, महाभारत को और आप...खैर. हमादान से आये थे सैयद अली हमदानी. बड़े पहुँचे सूफ़ी पीर थे. कहते हैं नौ बरस के थे तो जबानी याद कर ली थी क़ुरान शरीफ़. तैमूर के वक़्त में जब उसने ख़ुद के लिए ख़िलाफ़त मांगी तो इंकार कर दिया सूफ़ियों ने. वह बेहद नाराज़. उसके क़हर से बचने के लिए छोड़ दिया अपना शहर. दुनिया भर में दीन का प्रचार करने निकल पड़े. कई बार हज़ किये. पीर-मौलवी थे आख़िर हम जैसे अभागे तो थे नहीं कि चरार-ए-शरीफ़ तक जाने को तरस जाएँ. घूमते घूमते कश्मीर आये तो इन ख़ूबसूरत वादियों ने रोक लिया उन्हें. सुल्तान क़ुतुबुद्दीन का राज था उन दिनों. मलंग सुल्तान. मस्ज़िद जाता तो मंदिर भी. हिन्दुओं से कपडे पहनता. गाने सुनता. शाह ए हमादान को पूरी इज्ज़त दी. खानकाह की ज़मीन दी और बदले में शाह उसे असली मुसलमान बनाने पर लग गए. दीन और शरिया ऐसा सिखाया कि उसने अपनी दो बेगमों में से एक को तलाक़ दे दिया. सगी बहनें थीं न वे और शरिया इसकी इज़ाज़त नहीं देता. और औरत बेग़म हो बादशाह की या फिर ग़रीब की. उसकी औकात ही क्या? बोल दिया तीन बार तलाक़ दे दिए मेहर के टुकड़े और क़िस्सा ख़त्म. जिए या मरे क्या फ़र्क पड़ता है. दीन के अलम की रौशनी तो औरत की आहों से ही बढ़ती है न. खैर..देखिये न मैं फिर बहक गई. तो उस रोज़ शाम से रात होने को आई...नमाज़ ए मगरिब की आवाज़ कानों में पड़ी तो दिल बैठने लगा. इतनी देर तो कभी नहीं हुई और फिर जब नमाज़ ए इशा पढ़ने बैठी तो अगल बगल बैठे बच्चों के साथ फूट फूट कर रो पड़ी. कहीं से कोई ख़बर नहीं आई थी. चौक तक हो आई कई बार. बस वालों से पूछा. कहीं कोई ख़बर नहीं. दूसरे मोहल्ले में शाहिद के चचाजात भाई रहते थे मोहसिन भाई. उनकी भी दुकान थी किराने की ही. अक्सर दोनों साथ ही आते जाते थे. कुछ न सूझा तो भाग के उनके पास गई. गलियों में घुप अँधेरा. थोड़ी थोड़ी दूर पर आर्मी वाले दीखते. मैंने अपना आई कार्ड गले में लटका लिया था. किसी ने न रोका. वहाँ पहुँची तो उदासी का कुहरा दरवाज़े तक पसरा था. भीतर जख्मी मोहसिन भाई बिस्तर पर पड़े थे. मुझे देखते फूट पड़े. “चेकिंग हुई थी बस की. बहुत मारा. सबको मारा. शाहिद को भी मारा. वह ठहरा गुस्से वाला. बहस करने लगा तो उठा ले गए उसे अपने साथ. मैं आने वाला था बताने लेकिन हाथ-पाँव सब सुन्न हैं.” सुन्न होने की बारी तो अब मेरी थी. वहीँ ढेर हो गई ज़मीन पर. उठा ले गए! कहाँ? जाने पुलवामा के थाने में रखा होगा कि इस्लामाबाद ले गए होंगे. कहीं श्रीनगर तो नहीं. आँखों के सामने अँधेरा छा रहा था...   

रात क्या थी क़यामत की रात थी वह. सोचती हूँ उस रात क्या गुज़री होगी हसन-हुसैन के  बीबी बच्चों पर. मर्द शहीद हो जाता है औरतें बेवा रह जाती हैं बस और बच्चे यतीम. किसी किस्से में उनके आँसुओं की नमी नहीं होती शामिल. उनकी ज़िन्दगी की तो तमाम रातें क़यामत की रातें हो जाती हैं न. उस्मान को ले गए थे आर्मी वाले. आज छः महीने हुए कहीं कुछ पता नहीं. पगली सी सोफ़िया घूमती रहती है इस थाने से उस थाने. इस चौकी से उस चौकी. बच्चे का स्कूल छूट गया. दस बरस का बच्चा मज़दूरी करता है. बूढ़ा बाप कलप कलप के मर गया. एक घर और दो बेवा औरतें. एक पूरी और एक आधी. मेरे अल्लाह रहम कर. रहम कर मौला. इन मासूम बच्चों पर रहम कर. सीधा सादा मर्द मेरा. पाँच वक़्त का नमाज़ी. कभी तेरी शान में कोई गुस्ताखी नहीं की. किसी ग़ैर औरत को नज़र उठा के न देखा. उसे क्या करना बंदूकों से? उसे क्या करना ज़िहादियों से? उसके तो सारे सपने इन दो बच्चों के लिए हैं. कहता है अलीगढ़ भेजूँगा यासीन को. इंजीनियर बनाऊंगा. शेख़ साहब की तरह बड़ा आदमी बनके लौटेगा. और लौट के क्या मिला था शेख साहब को? डोगरा राजा के दरबार में कोई ढंग की नौकरी नहीं थी किसी मुसलमान के लिए. मुदर्रिस हुए स्कूल में. वो तो तीस का गुस्सा था जिसके नेता बन के उभरे वह और फिर बाबा ए कश्मीर बन गए वरना चली जाती ज़िन्दगी बच्चों को पढ़ाते हुए. इतना कहती हूँ कोई काम धंधा सिखाओ इसे. बन भी गया इंजिनियर तो कहाँ रखी है नौकरी इस सूबे में? बड़े घर का होता तो इंग्लैण्ड अमरीका चला जाता. हम कहाँ से भेजेंगे इसे? ऐसे सपने न देखो कि कल को उसकी किरचें आँखों में चुभे. पर दीवाना है वह तो. किसी की नहीं सुनता. मजलिस से लड़ के चला आता है. एक एक पैसा बचाता है इन बच्चों के लिए. मौला उस पर ये ज़ुल्म क्यों?

सुबह हुई तो जैसे सूरज की रौशनी में धब्बे पड़ गए थे. बच्चों को जल्दी से नाश्ता कराया और मोहसिन भाई के घर छोड़ दिया. पहली बस पकड़ के पुलवामा पहुँची
. इतनी उम्र हुई न कभी थाने गई न कचहरी. हाथ-पाँव फूल रहे थे. मैं ग़रीब ज़ाहिल कैसे बात करुँगी हाकिमों से. क्या कहूँगी, क्या सुनूँगी. किसी को साथ लाना चाहिए था शायद. खैर, ख़ुदा ख़ुदा करके पहुँच गई थाने में. भला आदमी था बिचारा संतरी सीधे थानेदार के पास ले गया. पर वहाँ कोई सुनवाई नहीं थी, बोले, “आर्मी वाले ले गए होंगे. उनके आगे हमारी क्या चलती है? तुम आर्मी कैम्प जाओ. वहाँ से कुछ पता चले शायद.”  आर्मी कैम्प! नाम ही सुना था. रूह कंपाने वाले किस्से. मुहल्ले के जुनूबी कोने पर रहने वाले सादिक़ मास्टर का बेटा गिरफ़्तार हुआ था गर्मियों में. श्रीनगर में पढता था. कैसा सुन्दर बांका नौजवान था. कितनी शीरीं आवाज़. लेकिन जबसे श्रीनगर गया था चुप चुप रहने लगा था. जाने कहाँ भटकता रहता दिन भर. अपनी ही दुनिया में गुम. और उस रात जब आर्मी ने रेड डाली तब पता चला सबको कि जेहादी हो गया था वह. फिरन के अन्दर बन्दूक छिपा के रखता था. मास्टर के जूते घिस गए आर्मी कैम्पों के चक्कर लगाते पर आज तक कोई ख़बर न मिली. कहते हैं पापा टू में रखा है उसे! पापा टू! श्रीनगर की सबसे खौफ़नाक जेल. बच के निकल भी आये कोई वहाँ से तो बाक़ी उम्र किसी काम का नहीं रहता. आख़िर क्यों लगी है ऐसा आग. इतने मासूम बच्चे क्यों उठा लेते हैं बन्दूक. आग लगे इस सियासत को. आर्मी के किस्से सुनाते सुनाते सादिक़ मास्टर जुल्चू की कहानी सुनाने  लगते. खूँखार तुर्क लुटेरा. आया तो श्रीनगर वीरान हो गया. राजा भाग गया. मर्दों की जान गई औरतों की आबरू. बेवा शहर की जिस गली में उसके सैनिक घुस जाते, वीरान हो जाती. माल-असबाब लूटकर मर्दों की हत्या कर देते और औरतें...उनके लिए तो सबके पास एक ही भूख है एक ही प्यास. कहते हैं जब वह गया तो कोई घर साबुत न बचा था, किसी कोठली में अनाज न था. रिंचन आया तब आगे. मदद की सबकी. श्रीनगर को फिर से बसाया. बौद्ध था वह हिन्दू बनना चाहता था. पंडितों ने मना कर दिया तो बुलबुल शाह के पास गया और मुसलमान बन गया. कश्मीर का पहला मुस्लिम बादशाह. और उसकी बीबी. कोटा रानी! उसके बाप की हत्या कर तो बना था रिंचन बादशाह. फिर वह मरा तो नन्ही सी जान छोड़ गया. बुला के पुराने राजा के भाई को सबने गद्दी पर बिठाया. उसने भी कोटा से शादी की. न करती तो क्या करती? हर ओर साजिशों के बीच कहीं मर खप गई होती वह. राजा के मरने के बाद क्या हुआ? जब उसने ख़ुद राज चलाना चाहा तो वज़ीर शाहमीर ने कहाँ बर्दाश्त किया? गिरफ़्तार किया. शादी की. और एक रात गुज़ारने के बाद ख़त्म कर दिया उसे बच्चे सहित. इसीलिए तो दिद्दा ने नहीं किया था भरोसा किसी पर. दिद्दा! जानते हैं न आप? नहीं जानते...खैर बताती हूँ. नौवीं सदी में क्षेमेन्द्र नाम के राजा की रानी थी. राजा दिन रात औरतों के साथ रंगरलियाँ मनाता. शराब और औरत. बस यही ज़िन्दगी थी उसकी. निकलना पड़ा दिद्दा को परदे से बाहर और राज संभाल लिया उसने. सारे दांवपेंच सीखे. अपनी अय्याशी के चलते कम उम्र में मर गया राजा और कमसिन बेटे को गद्दी पर बिठा के दिद्दा राज करने लगी. सत्ता के भूखे सियासतदानों के सामने उसने अपनी सुन्दर देह को हथियार बना लिया. कपडे की तरह बदले आशिक़. जिससे काम निकल गया उसे बेरहमी से क़त्ल करा दिया. और सत्ता का लालच जानते हैं न आप? एक दिन अपने नन्हें पोतों को भी मरवा दिया उसने. सब उसे बुरा कहते हैं. क़ातिल-अय्याश-आवारा. पर सोचिये ज़रा न करती ये सब तो आज कोई नाम भी जानता उसका? फेंक दिया गया होता राजा की चिता पर उसे और इतिहास की धूल-गर्द में दब गई होती कहीं. मर्दों के खेल में किसी और नियम से कैसे खेल सकती है कोई औरत भी? फिर बहका दिया आपने मुझे, ऐसे कैसे सुनाऊंगी अपनी कहानी मैं!

तो आर्मी कैम्प पहुँच गई मैं. जाने कहाँ से आ गई थी इतनी हिम्मत. पर भीतर कौन जाने दे? बाहर के दो संतरियों में से एक तो कुछ सुनने को ही तैयार नहीं पर दूसरा भला मानस था. कितना मासूम चेहरा. चेहरे पर एक उदासी की चादर सी थी. जाने क्या गुनाह है इन बन्दों का भी कि घर-परिवार से दूर यहाँ अनजान बस्ती में मौत का सामान पकड़ा के भेज दिया गया है. दिन रात संगीनों के साए में. मौत का खेल खेलते. इनकी माओं के भी कलेजे फटते होंगे. जाने कब कौन सी ख़बर आ जाए. अल्लाह रहम कर. हर ग़रीब पर रहम कर. बंद करवा ये ख़ूनी खेल. लेकिन भीतर जो अफसर मिला उसकी बातों में मासूमियत का कोई क़तरा नहीं था. एक बात न सुनी कमबख्त ने. नाम-फोटो सब लेकर रख लिया और बोला, ख़बर मिली तो बता देंगे. मैं रोने लगी तो झिड़क कर बोला “तब रोना था बीबी जब मियाँ तुम्हारा जेहादियों का ख़बरी बन रहा था. हर जुमे जाता था पुलवामा ख़बर पहुँचाने.” मैं रोती रही, मिन्नतें करती रही. वह तो सौदा लाने जाता था साहब. किराने की दुकान है हमारी. सामान लाने जाता था वह. ख़बरी नहीं है वह हुज़ूर. कुछ लेना देना नहीं उसका जिहादियों से. पर कौन सुनता. वहां से चले जाने का हुक्म हुआ बस. और फिर शुरू हुआ भटकने का मुसलसल सफ़र. पुलवामा-इस्लामाबाद-श्रीनगर-थाना-जेल-कैम्प. जिस औरत ने शोपियाँ के बाहर की दुनिया न देखी पैंतीस वर्षों में उसने जाने कौन कौन सी गलियाँ देख लीं. कभी बुलाया जाता लाशों की पहचान करने को तो कलेजा पत्थर करके जाती. कभी घर आ जाते आर्मी के जवान तो रूह काँप जाती. कैसी नज़रों से घूरते थे घर को. जहाँ चाहते बेधड़क घुस जाते. शाहिद का एक एक सामान उलट पुलट डाला. दुकान का एक एक कोना छान मारा. हम तीनों एक कोने में दुबके रहते. यासीन अपने बाप पर ही गया था. गुस्से से पागल हो जाता लेकिन मैं उसे थामे रहती. पढ़ाई छूट गई उसकी. दुकान बर्बाद हो गई. खेतों में किसी तरह हो जाता चावल और मक्का इतना कि भूखे न रहना पड़े. पर बाक़ी ख़र्चे चलाना मुश्किल. ऊपर से ये दौड़ भाग.  अल्लाह रहम कर... 

और फिर तांता लगा अजीब अजीब लोगों का. कंधे पर कैमरे लटकाए चले आते. रिकॉर्डर ऑन करते और शुरू हो जाते. आपका नाम? अरे नाम तो मैंने बताया ही नहीं आपको! वैसे भी क्या नाम होता है औरत का? किसी की बेटी फिर किसी की बीबी और फिर किसी की माँ. न हुआ होता यह हादसा तो किसको रूचि थी मेरे नाम में? खैर नाम तो है ही मेरा एक. राबिया. राबिया जानते हैं आप? तुर्की में पैदा हुई थीं. ग़रीब माँ-बाप की औलाद. सात साल की थीं जब सड़क से उठाकर बेच दिया था किसी ने. क़िस्मत ने गुलामी लिखनी चाही उनके माथे पर, लेकिन उनका दिल तो ख़ुदा में बसता था. सूफ़ी हो गईं. छोड़ दी दुनिया. जंगल में रहती थीं जानवरों के बीच. जानवर ख़रीद फ़रोख्त नहीं करते न. बलात्कार भी नहीं करते. गोलियाँ भी नहीं चलाते. सिरहाने ईंट का तकिया, तन पर एक फटा पुराना लिबास और पानी के लिए टूटी मटकी. बस यही ज़ायदाद थी उनकी. बड़े बड़े पीर फकीर आते उनके पास. सूफ़ियों की दुनिया में बड़ा मान है उनका. लल द्यद को भी नाम दिया था उनके दीवानों ने – राबिया सानी. उनका भी क्या था. गरीब ब्राह्मण की बेटी. आठ साल की उम्र में ब्याह हुआ. सास खाने को देती तो थाल में पत्थर रख देती और उसके ऊपर चावल. भूखी प्यासी दिन भर खटती. जंगल में जातीं पानी लाने तो बैठ जातीं ध्यान लगाकर. जब कहीं से न मिले मुहब्बत तो ऊपरवाले के अलावा सहारा क्या है? एक दिन छोड़ दिया सबकुछ और जोगन हो गईं. न तन पे लिबास न मन में कोई सपना. गली गली घूमतीं और वाख रचतीं. आज तक कश्मीर में कहे जाते हैं उनके वाख. मीराबाई को भी घर छोड़ना पड़ा था न? औरत या तो घर के चूल्हे में ख़ाक हो जाए या फिर छोड़ दे और उम्र भर के लिए बेघर हो जाए. पर वो सब तो महान औरतें थीं. हिम्मतवाली. मैं तो एक आम औरत. बचपन से सपना एक घर का जहाँ एक शौहर हो, दो बच्चे हों, अनाज हो घर में, दरवाज़े पर फूलों की क्यारी हो. और मिला भी था यह सब. जाने किसकी नज़र लगी सब छिन गया उस मनहूस रात. जो पूछता उसे वही क़िस्सा दुहरा देती. जो दरवाज़ा दीखता उस पर गुहार लगाती. जो जहाँ कहता चली जाती. मिन्नतें करती, हाथ जोड़ती. कोई सुन लेता कोई सुनता भी नहीं. और ये लोग...किसी को अखबार में कहानी बनानी थी, कोई किताब लिख रहा था, किसी को फ़िल्म बनानी थी..किसी को कुछ तो किसी को कुछ. शुरू शुरू में बड़े उत्साह से बताती. लगता दुनिया को ख़बर मिलेगी तो मदद करेंगे सब. पर धीरे धीरे समझ आया कि हम बस एक क़िस्सा हैं सबके लिए. शोपियाँ से श्रीनगर श्रीनगर से दिल्ली दिल्ली से अमेरिका. सबके लिए एक क़िस्सा हैं हम...एक उदास क़िस्सा जिसे सुनकर उनकी रूह में थोड़ी देर हरक़त तो होती है लेकिन थोड़ी देर बाद सब सामान्य हो जाता है और वे पन्ने पलट कर नए किस्से ढूँढने लगते हैं. किस्सागो को ईनाम मिल जाता है, सुनने वाले को सुकून और हम वैसे के वैसे.

हाँ ...मैं नहीं हम. अकेली नहीं हूँ मैं. श्रीनगर गई तो पता चला मुझ जैसी अभागनों की लम्बी फेहरिश्त है कश्मीर में. 89 में जब आग लगी कश्मीर में और हमारे सैकड़ों बरस के पड़ोसी पंडित घाटी छोड़ के जाने को मज़बूर हुए तबसे लेकर अब तक हज़ारों ऐसे लोग  ग़ायब हुए कि आज तक नहीं लौटे. सच कहूँ तो कौन बेघर नहीं है कश्मीर में अमीर-उमराओं के अलावा. पंडित बेचारे पुरखों का घर छोड़कर जाने कहाँ कहाँ भटक रहे हैं, जिन्होंने बन्दूक थाम ली उनका तो कोई ठिकाना ही नहीं, कौन सी गोली पर नाम लिखा हो उनका कौन जाने, ये जो आर्मी वाले यहाँ अपने घर बार छोड़ के भटक रहे हैं उनकी भी क्या ज़िन्दगी है. मारते हैं मरते हैं जाने किसके लिए. और हम जैसे आम लोग. किस पल हो जायेंगे बेघर कोई नहीं जानता. आधी बेवा कहा जाता है हम जैसों को. न सुहागन न बेवा. माएं हैं आधी जिनके बेटों की कोई ख़बर नहीं. रैलियाँ निकालते हैं, दुनिया भर में ख़त लिखते हैं लेकिन आगा साहब कहते हैं न – यह बिना डाकघर का मुल्क है. कहीं से कोई जवाब नहीं आता. हब्बा खातूने हैं हम भटकती हुई अपने-अपने युसुफ के लिए. जानते हैं न हब्बा ख़ातून और युसुफ चक का क़िस्सा? फ़िल्म तो देखी होगी. युसुफ चक खानदान का चिराग़. शायर मिजाज़. मौसिकी का दीवाना. लंबा क़द, ख़ूबसूरत काठी, बांका जवान. तलवारबाज़ी ही नहीं संगीत भी सीखा था उसने. ऊबता जब सियासत से तो वादियों में निकल जाता अपने काले अरबी घोड़े पर बैठकर. भटकता रहता यहाँ वहाँ. झेलम के किनारे बैठ ऐसे ही एक दिन खोया था वादी की ख़ूबसूरती में कि एक आवाज़ सुनाई दी. दर्द से भरी मासूम आवाज़. पीछा करते पहुँचा तो हब्बा ख़ातून चिनार से सर टिकाये आँखें मूंदे गा रही थी. बड़ी बड़ी आँखे, सुतवां ज़िस्म और आवाज़ ऐसी कि रूह को छू ले. दीवाना हो गया युसुफ. ब्याह लाया उसे. कितने खुश थे दोनों. सियासत की पेचीदगियों से जूझकर  लौटता जब तो हब्बा की बाहों में डूब जाता. जंग के मैदान से लौटता तो उसके जख्मों को चूम लेती वह और जख्म फूल से महकने लगते. दोनों निकल जाते वादियों में. हँसते-गाते-शेर कहते. दिन हवा की तरह निकल रहे थे पर हाय रे सियासत. देखते देखते कश्मीर शहंशाह ए हिन्द जलालुद्दीन मोहम्मद अक़बर के परचम तले आ गया. युसुफ को पटना भेज दिया गया
. हब्बा अकेली रह गई. न कोई घर न सहारा. भटकती रहती अपने युसुफ को याद करती, उसके लिए नज़्में कहती, कहीं बैठकर गाने लगती तो आँखों से अपने आप आँसू झरने लगते. युसुफ कभी नहीं लौट पाए पटना से.  हब्बा उम्र भर यों ही तड़पती रही. क़िस्सा बन गई. पहली आधी बेवा थी वह कश्मीर की. उसे कुछ नहीं चाहिए था. न महल न सेना न राजपाट न सोना...बस अपना युसुफ चाहिए था. देखिये न उसकी तड़प...



किस सौतन ने कर दिया तुमको मुझ से दूर?
 
काहे किया पिया धोखा मुझसे काहे गए तुम दूर? 

मेरी बगिया में फूले हैं रंग बिरंगे फूल
काहे किया पिया धोखा मुझसे काहे गए तुम दूर? 
प्यारे मेरे तुम ही पीया हो सोचूँ तुम्हें दिन रात
काहे किया पिया धोखा मुझसे काहे गए तुम दूर?  

रात रात भर अपने दरवाज़े रखती हूँ मैं खोल 
आओ आके करो प्रवेश तुम हो गहना मेरे अनमोल
मेरे घर का रास्ता कैसे गए तुम भूल
काहे किया पिया धोखा मुझसे काहे गए तुम दूर? 

क़सम तुम्हारी कहीं नहीं अब आती-जाती हूँ मैं  
रुत बासंती में भी नहीं घर से कहीं मैं निकसी
आग में जलती देह मेरी क्यूं नहीं आग बुझाते हो तुम
काहे किया पिया धोखा मुझसे काहे गए तुम दूर? 

मुझे तो गीत लिखने भी नहीं आता. कैसे कहूँ मैं अपने दिल का दर्द. किससे कहूँ यह सब मेरे मौला. सब छीन लो मेरे मौला मुझसे...कुछ न मांगूंगी उम्र भर तुमसे. मर्दों का खेल है सियासत. हम औरतों की कौन सुनेगा? मैं ज़ाहिल -ग़रीब औरत तो बस सर झुकाती हूँ, हाथ जोडती हूँ, मिन्नतें करती हूँ, पाँव पड़ती हूँ ...माँ हूँ मैं, बीबी एक ग़रीब की. जो गुज़री मुझ पर किसी माँ पर न गुज़रे. कोई बड़ी बात नहीं है मेरे पास कहने को. बस राबिया, लल द्यद और हब्बा की तरह बेपनाह मुहब्बत है सबको बाँट देने के लिए. उसी का वास्ता देती हूँ...ए हिन्दुस्तान, ए पाकिस्तान, ए शहंशाह ए हिन्द, शहंशाह ए कश्मीर कुछ नहीं चाहिए मुझ ग़रीब को..सब ले लो ....बस मेरा शाहिद लौटा दो मुझे. न हो ज़िंदा तो उसकी लाश ही सही. कम से कम उस बदनसीब को कफ़न-दफ़न तो मिले. इस आधेपन में नहीं जीना चाहती एक दिन भी मैं. मुझे पूरा कर दो मौला...मुझे पूरा कर दो.
                                


3 टिप्‍पणियां:

  1. कश्मीर पर ऐसा संवेदनशील लेखन जरूरी है. आम भारतीयों को कश्मीरियों के दुःख-दर्द समझ नहीं आते और इसीलिए कश्मीरियों को कश्मीर का अभिन्न अंग होना समझ नहीं आता. अशोक भाई, आपको यह कश्मीर कथा जल्द पूरी करनी चाहिए कश्मीर पर हम सबकी एक स्पष्ट और खुली सोच बनाने के लिए.

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  2. मेरी जान ले लो, बस कहने का ये अंदाज मुझे दे दो। जो सियासतदां कश्मीर को लकड़ी समझ अपने घर के चूल्हे जलाते हैं, लानत है उन पर...

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  3. कहीं हव्वा खातून मिल जाएं तो कदमबोसी कर लूँ...

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