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बुधवार, 18 जुलाई 2012

एक नरसंहार के खिलाफ़ जनता की आवाज़



छत्तीसगढ़  में निरीह आदिवासियों की बेरहम हत्या के खिलाफ़ दिल्ली में साथियों ने पहलकदमी ली. आदित्य प्रकाश की रपट  


निर्दोष आदिवासियों की हत्या बंद करो

सामाजिक संदर्भो और मानवाधिकारों से जुडी संस्था NCHRO और मिशन भारतीयम के तत्वावधान में खुली चर्चा  ‘’निर्दोष आदिवासियों की हत्या बंद करो‘’ विषय पर आयोजित की गयी, जिसमे आदिवासी मुद्दों से जुड़े कुछ प्रमुख समाजसेवियों स्वामी अग्निवेश जी, प्रो. जॉन दयाल जी, श्रीमती नंदिनी सुन्दर, विमल भाई, आशुतोष कुमार, हिमांशु कुमार जी, डॉ मरिनुस कुजुर, एडवोकेट मुबीन अख्तर, अनीसुस जमान शामिल हुए.

कार्यक्रम की शुरुआत नंदिनी सुन्दर द्वारा हाल ही में घटित छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सारकेगुडा में आदिवासी नरसंहार की घटना पर केंद्रित रही, जिसे सरकारी महकमे की माओवाद के खिलाफ सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया. इस जघन्य हत्या कांड पर प्रकाश डालते हुए नंदिनी सुन्दर जी ने, जो विगत कई वर्षों से आदिवासी मुद्दों से जुडी हुयी हैं, अपनी बात कही. उनके अनुसार मारे गए तथाकथित माओवादी जो लगभग अट्ठारह की संख्या में थे वो आदिवासी थे उनमे कुछ बच्चे और महिलाए भी थी. वो सभी खेती से पहले होने वाली पारंपरिक बीज पंदुम के उत्सव हेतु एकत्रित हुए थे जिन्हें सीआरपीएफ के जवानों ने बिना किसी चेतावनी के मार गिराया. उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया की यदि केन्द्रीय रिजर्व पुलिस की टुकड़ी घटना स्थल से सिर्फ तीन किलोमीटर की दूरी पर हैं तो क्या ये संभव हैं की माओवादी वहां पर कोई कार्यक्रम करेंगे. उन्होंने ये भी बताया कि जिन सत्रह लोगो कि हत्या कि गयी, उनमे से छह दस-बारह वर्ष के बच्चे भी थे. एक व्यक्ति कि हत्या सुबह के वक्त कि गयी. रात में तो अँधेरे कि बात कही जा सकती हैं पर यह तो दिनदहाड़े कि गयी हत्या हैं. घटना कि सच्चाई सामने आने के बाद, राज्य और केन्द्र सरकारों द्वारा विभिन्न तरह की बयानबाजी की जाने लगी, जो कि शुरू से ही संदेहास्पद हैं. उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह द्वारा दिए गए बयान जिसमे कि उन्होंने बच्चो और ग्रामीणों कि हत्या को नक्सलियों द्वारा मानव रक्षक के तौर पर इस्तेमाल किया गया, कि भी निंदा की. 


छत्तीसगढ़ आदिवासी समस्या से जुड़े स्वामी अग्निवेश ने अपनी बात रखते हुए, सरकार द्वारा प्रस्तावित मध्यस्थता पर भी सवाल उठाये. स्वामी जी ने राष्ट्रपति पद के दावेदार श्री संगमा जी की भी निंदा की और कहा की वो आदिवासी समाज से जुड़े होने का सिर्फ ढोंग कर रहे हैं, इस मुद्दे पर उनकी तरफ से कोई संवेदना नहीं व्यक्त की गयी. स्वामी अग्निवेश ने आदिवासी मामलो पर सुप्रीम कोर्ट  की भूमिका पर भी चिंता व्यक्त की.  

झारखण्ड से जुड़े आदिवासी कार्यकर्ता डॉ मरिनुस कुजुर ने माना कि इतनी विभत्स घटनाओं के बावजूद भी कोई आदिवासी प्रबल विरोध के लिए सामने नहीं आ रहा है. उन्होंने ग्रीन हंट पर हुई जनसुनवाई के तथ्यों को उजागर किया तथा जमीन कि समस्या, मानव संसाधनों कि समस्या पर अपने विचार रखे. उन्होंने बिरसा मुंडा और कानू जैसे आदिवासी विद्रोहियों से प्रेरणा को भी एक विकल्प रूप में रखा . 


माटू जनसंघठन तथा नर्मदा बचाओ अभियान से जुड़े विमल भाई ने सरकार द्वारा प्रायोजित हिंसा को सबसे जघन्य बताया साथ ही साथ उन्होंने ये भी कहा की विकास के इस प्रसार में सरकारें अपने लोगो की हत्या करवा रही हैं और भूमि संसाधनों का अनियमित दोहन कर रही हैं. उन्होंने विस्थापन के मुद्दे और आदिवासी अस्मिता पर भी कुछ प्रमुख सवाल उठाये, उन्होंने महात्मा गाँधी की कही बात को भी सबके सामने प्रस्तुत किया, ‘’अहिंसा बहादुरों का अस्त्र हैं कायरो का नहीं‘’. दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े आशुतोष कुमार जी ने अपनी अंडमान यात्रा के दौरान जारवा समुदायों से जुडी बात को भी सामने रखा की कैसे वो एक एक रुपये या रोटी के टुकड़े के लिए निर्वस्त्र होकर पर्यटकों के सामने नाचते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें संरक्षित श्रेणी में रखा हैं. उन्होंने आदिवासियों को बाह्य शक्तियों से संघर्ष करने वाला बताया. इस लिहाज से वो असभ्य नहीं बल्कि प्राकृतिक संरक्षण के लिए संघर्षशील जीवन व्यतीत कर रहे हैं. उन्होंने इन तमाम तरह की विभत्स घटनाओं को भारतीय राज्यों द्वारा किया जा रहा सुनियोजित युद्ध माना तथा शासन से किसी भी तरह के सुधार की सम्भावना को ख़ारिज किया. उनका कहना है की जनता द्वारा चुनी गयी सरकार उन्हें हथियार उठाने पर मजबूर कर रही है और फिर उसी आरोप में उनकी हत्या कर रही है. 

विगत अट्ठारह वर्षों से आदिवासियों के साथ रहकर काम कर रहे भाई हिमांशु जी ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा की आदिवासी ये कभी मान ही नहीं सकता की ये पहाड या नदी किसी के हो सकते हैं, साथ साथ ही कोई भी प्राकृतिक संसाधन निजी कैसे हो सकता है, टाटा या एस्सार इनके मालिक कैसे हो सकते हैं? ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ खनन के नाम पर उनकी निजता पर वार करती हैं और सरकार बन्दूक के दम पर इन्हें हटाना चाहती है, इनकी जमीन पर बड़े औद्योगिक केंद्र बनाना चाहती है, उन्होंने ये भी बताया की भारत का राष्ट्रपति आदिवासी समूहों का संरक्षक होता हैं और इस हिसाब से उनकी ये सीधी सीधी जिम्मेदारी बनती है. आदिवासी महिला सोनी सोरी से जुड़े मामले पर भी उन्होंने प्रकाश डाला और कुछ पंक्तियों से अपनी बात रखी की ‘’ मेरी मदद करो, मुझसे यह सब ले लो ‘’ . 

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता मुबीन अख्तर का मानना है कि मुद्दा महज आदिवासियों का नहीं, अल्पसंख्यकों का भी है उन्हें अलग-अलग नही बल्कि एक साथ सामने रखा जाना चाहिए. इनका यह भी मानना है कि पूंजीपति ही ऐसी स्थिति बनाते हैं और विद्रोह करने पर विवश करते हैं. वो यह भी कहते हैं कि जानबूझकर अभाव दिखाकर हिंसा को आमंत्रित किया जाता है. वो आपसी बातचीत को शांति का माध्यम कहते हैं. वरिष्ठ पत्रकार जॉन दयाल ने चर्चा की अध्यक्षता करते हुए अंत में इन तमाम घटनाओं को राजनीतिक गलियारों से जोड़ा और कहा कि ऐसे मुद्दों पर राजनीतिक एकता संभव नहीं है. उन्होंने राष्ट्रवादी पार्टियों की स्थिति पर असंतोष भी जाहिर किया. इस पूरी चर्चा में सरकारी हस्तछेप कि संदेहास्पद भूमिका आदिवासियों के विरुद्ध दिखती है. बेगुनाह लोगों की निर्मम हत्या के बावजूद देश कि संसद और विपछ की चुप्पी भी खल रही है. हमारी सरकारे उनको एक तरफ संरक्षण भी दे रही हैं और माओवादी बता कर उनकी हत्या भी कर रही है. ऐसे में आदिवासी समाज से लोगों का सामने न आना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है.




4 टिप्‍पणियां:

  1. एक सार्थक पहल और उसकी संतुलित रिपोर्ट भी ....

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  2. कल 19/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. पूंजीवादी लोग जहाँ सत्ता के साथ मिल कर स्थानीय लोगों के प्राकृतिक संसाधनों पर अपना हक़ जताए और इस स्तर तक कि स्थानीय व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों से भी वंचित कर दे, ऐसे में विद्रोह स्वाभाविक है। कभी स्थानीय निवासियों के हक़ हकूकों को हड़पने के लिए तो कभी विद्रोह की आड़ में पूंजीवादियों के इशारे पर नाचने वाली सरकारें इनका दमन करती आयी है। पूंजीवादी लोग गरीबों का शोषण करते आ रहे हैं।
    इस पर यह सार्थक बहस अच्छी लगी। आभार !

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  4. राज्य-प्रशासन की नियत पर शक तो जाता ही है राज्य के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन बच्चों की हत्या!इसकी जवाबदेही तो बनती ही है.

    संवेदनहीनता और संवादहीनता कहीं आदिवासियों को मुख्यधारा और आधुनिकता के होने वाले लाभों से विचलित ना के दे..

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