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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

नामवर का लोप ही अज्ञेय का भी लोप है

जाने-माने वामपंथी विचारक अरुण माहेश्वरी का यह आलेख अज्ञेय पर चल रही बहसों की कड़ी में है. जिस तरह उन्हें "बूढा गिद्ध" कहने वालों से लेकर वामपंथी कहाए जाने वाले शीर्ष आलोचकों तक ने इस साल शीर्षासन किया है वह साहित्यिक वाम के वैचारिक खोखलेपन और अवसरवादी पतन का अद्भुत नमूना है. अरुण जी उसके स्रोतों की तलाश करने  तथा निहितार्थों को साफ़ करने का प्रयास करते हैं और इस क्रम में हिन्दी के वर्तमान माहौल की एक ज़रूरी पड़ताल भी. प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं.

 

अज्ञेय शताब्दी समारोहों के बहाने

सात मार्च 1911 को जन्मे अज्ञेय जी का शताब्दी वर्ष पूरा होगया। हिंदी जगत में उनके लिये श्रद्धा-सुमनों की कोई कमी नहीं रही। अलग-अलग शहरों में कई आयोजन हुए। अखबारों, पत्रिकाओं में कुछ छोटी-मोटी टिप्पणियां आयीं। उनके निकट के मित्रों, संबंधियों ने एक-दो किताबें भी निकाली। कुछ स्वघोषित ‘सांस्कृतिक दूतों’ के शहर-शहर फेरे लगे। लेकिन गौर करने की बात यह है कि कुल मिला कर यह पूरा वर्ष बिना किसी वैचारिक उत्तेजना और सामाजिक-सांस्कृतिक व्यग्रता के एक स्निग्ध और शान्त, तनाव-रहित वातावरण में बीत गया। 

रवीन्द्रनाथ, प्रेमचंद, और मुक्तिबोध तो जाने दीजिये, यहां तक कि तुलसी जयंती भी आज तक सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों पर कुछ वैचारिक उत्तेजना पैदा करती है। लेकिन हाल के वर्षों तक हिन्दी में सबसे विवादास्पद समझे जाने वाले अज्ञेय की शताब्दी कोई मामूली वैचारिक आलोड़न भी पैदा नहीं कर पाये, यह स्थिति किस बात का संकेत है?

क्या यह अज्ञेय पर या आज के समय पर या दोनों पर ही कोई विशेष टिप्पणी है?

जिन नामवरजी की अज्ञेय के साथ एक मंच पर उपस्थिति से “वैचारिक रक्तपात” का कयास लगाया जाता था, उन्होंने भी इस शताब्दी वर्ष में दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थनाएं भर करके अपना काम चला लिया। और जो ‘अज्ञेयपंथ’ का झोला लिये घूमते रहे हैं, उनके पास पहले भी कहने के लिये सिर्फ श्रद्धा और भक्ति ही थी, शताब्दी वर्ष के समारोहों में भी उसीका प्रदर्शन किया गया। वैसे भी, आज के ‘समाजवाद-विहीन’ वैश्वीकरण के युग में अज्ञेय के विचारों के दो प्रमुख फलक, कम्युनिस्ट-विरोध और पूरब-पश्चिम द्वैत वाली पंडिताई के खरीदार कहां बचे हैं! कुल मिला कर इस पूरे साल ‘अज्ञेयपंथ’ और ‘नामवरपंथ’ की खूब छनी। सब कुछ भले-भले निपट गया।

इस ‘भले-भले’ ने ही आज हमारे लिये यह प्रश्न छोड़ दिया है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? किसी जमाने में हिंदी में प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के बरक्स अज्ञेय का प्रयोगवाद (परिमल) विचारधारा के एक दूसरे धुर का मंच हुआ करता था। पचास के दशक के शीत युद्ध के जमाने में एक ओर जहां सोवियत-प्रेरित समाजवाद, जनतंत्र और शांति का आंदोलन था तो दूसरी ओर अमेरिका के तत्वावधान में ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ का ‘समाजवादी निरंकुशता’ के खिलाफ ‘विचारधारा की समाप्ति’ के नारे के आधार पर तैयार किया गया पश्चिमी बुद्धिजीवियों का विरोधी मंच था। अज्ञेय जी ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ के मंच से जुड़े हुए थे, इसके अनेक साक्ष्य हिंदी में चर्चित हो चुके हैं। किसी भी वजह से प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के साथ निर्वाह करने में असमर्थ लेखकों के लिये परिमल एक अलग मोर्चे की भूमिका अदा कर रहा था। इसीलिये स्वाभाविक तौर पर हिंदी में उस काल की सारी साहित्यिक-वैचारिक बहसों के केंद्र में अज्ञेय हुआ करते थे। लेकिन आज वह सारा विवाद कहां रफ्फू-चक्कर होगया?

यही एक प्रश्न किसी को भी आज की साहित्यिक दुनिया के सच पर गहराई से नजर डालने के लिये प्रेरित कर सकता है।

आजादी के पहले की और शीत युद्ध के पूरे जमाने की बात छोड़ दीजिये। तब वास्तव में दुनिया दो शिविरों में बंटी हुई थी- साम्राज्यवादी और समाजवादी। 80 के दशक तक समाजवादी शिविर की अनेक बुनियादी कमजोरियों और बिखराव के उजागर होने पर भी धरती पर सोवियत संघ की मौजूदगी मात्र से विचारों की दुनिया में शीतयुद्ध का तनाव बना हुआ था। इसीलिये, तब तक भी भारत सहित बहुत से नवस्वाधीन विकासशील देशों में साम्राज्यवाद-विरोधी गुट-निरपेक्षता, गैर-पूंजीवादी विकास की संभावनाओं के आधार पर जनतंत्र और उसके विस्तार की लड़ाई की एक खास ‘समाजवादी’ दिशा थी। चीन का ‘नया जनवाद’ ढेरों नयी वैचारिक उद्भावनाओं का स्रोत था। हिंदी में तभी प्रेमचंद शताब्दी के दौरान प्रेमचंद को केंद्र में रख कर चंद्रबली सिंह ने ‘आलोचनात्मक’ और ‘समाजवादी’ यथार्थवाद के साथ ही यथार्थ की एक और, तीसरी श्रेणी ‘जनवादी क्रांतिकारी यथार्थवाद’ की अवधारणा रखी। प्रगतिशील लेखक संघ वस्तुतः बिखर गया गया लेकिन हिंदी-उर्दू के लेखकों के एक नये संगठन, जनवादी लेखक संघ (1982) का उदय हुआ। जनतंत्र का सवाल केंद्रीय सवाल बना और भारत की जनता की जनतंत्र की लड़ाई के मोर्चे की जो इंद्रधनुषी तस्वीर पेश की गयी उसमें डा. रामविलास शर्मा से लेकर अज्ञेय तक, सबके लिये समान स्थान का आश्वासन था। यह एक अलग विचार का प्रश्न है कि व्यवहार में ऐसा मोर्चा कभी भी संभव हुआ या नहीं हुआ? जाहिर है कि इस पूरे घटनाचक्र की पृष्ठभूमि में 1975 का आंतरिक आपातकाल और 1977 में जनता पार्टी तथा तीन राज्यों में वामपंथियों की भारी जीतों के अनुभव की भी बड़ी भूमिका थी।

आंतरिक आपातकाल के पहले और बाद के इस दौर में अज्ञेय जीवित ही नहीं, खासे सक्रिय थे। 1965 में वे बर्कले के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लौट कर तीन सालों तक टाइम्स आफ इंडिया के हिंदी साप्ताहिक ‘दिनमान’ के संस्थापक संपादक की भूमिका निभाने के बाद 1973-74 के दौरान जयप्रकाश नारायण के साप्ताहिक ‘एवरीमैन्स वीकली’ के संपादक (1973-74) रहे और 1977-80 तक नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक का काम संभाला। वह पूरा दौर भारत में जनतंत्र की रक्षा के लिये सबसे तीव्र संघर्ष का दौर था और जयप्रकाश के साथ जुड़ कर अपने अखबारों के जरिये अज्ञेय ने उस पूरी लड़ाई में अपनी एक भूमिका अदा की थी।  

फिर भी आज तक कोई यह प्रश्न क्यों नहीं उठाता है कि जनवादी लेखक संघ के वैचारिक परिप्रेक्ष्य के इंद्रधनुषी दायरे में अज्ञेय को उनके जीवित काल में कभी क्यों नहीं शामिल किया जा सका?

इस एक सवाल के जवाब से जहां प्रलेस-जलेस की विचारधारात्मक प्रतिश्रुतियों और निष्ठाओं की सचाई की परख हो सकती है, वहीं अज्ञेय की भी ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ की वास्तविकता को समझा जा सकता है। कहना न होगा कि आज जहां जलेस-प्रलेस प्रकार के संगठन पार्टी की जकड़नों से बेदम होकर अस्तित्वीय संकट के गह्वर में हांफ रहे हैं, और लेखक क्रमशः जयपुर उत्सव की तरह की साहित्य-मंडियों में अपनी कीमत लगवाने को व्याकुल हो रहे हैं, वहीं अज्ञेय की ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ का भी आज कोई दो-कौड़ी का दाम लगाने के लिये तैयार नहीं है। अज्ञेय शताब्दी वर्ष के आयोजनों की रपटों से तो कम से कम यही जाहिर होता है।

सचमुच यह एक अनोखी विडंबना है। नामवर का लोप ही अज्ञेय का भी लोप है। ऐसे ही ‘विचारधारा का अंत’ विचार मात्र के अंत का भी सबब बनता है।

गुरुवार, 9 जून 2011

अज्ञेय पर मंगलेश डबराल

(अज्ञेय जन्मशती पर उन्हें तथा उनकी काव्य परम्परा को लेकर हिन्दी जगत में चल रही बहस (इस बहस में हमारे हस्तक्षेप यहाँ देखे जा सकते हैं) में हमारे समय के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि मंगलेश डबराल का यह समीक्षात्मक आलेख एक ज़रूरी हस्तक्षेप करता है. समयांतर के ताज़ा पुस्तक केंद्रित अंक में नामवर सिंह द्वारा संपादित तथा नॅशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित अज्ञेय की १५३ कविताओं के संकलन की समीक्षा के बहाने मंगलेश जी इस आलेख में अज्ञेय के काव्य व्यक्तित्व के स्रोतों और उनकी पक्षधरताओं की तलाश करते हैं. मजेदार बात यह है कि इस लेख को पढते हुए अज्ञेय के कविता संकलन 'कितनी नावों में कितनी बार' तथा सुमित्रा नंदन पन्त जी के खंडकाव्य 'पुरुषोत्तम राम' की समीक्षा में लिखे एक आलेख 'बूढा गिद्ध क्यूँ पंख फैलाए' की याद आती है. अब जबकि अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह दोनों ही यू टर्न लेकर अगल-बगल खड़े हैं तो वह लेख तथा अज्ञेय पर नामवर सिंह की पुरानी अवस्थिति हमारे लिए एक महत्वपूर्ण 'पुरातात्विक सामग्री' की तरह काम आयेंगे, जिनकी रौशनी में हम नवनिर्मित अज्ञेय भक्ति के स्मारकों का बेहतर विवेचन कर पायेंगे. खैर वे लेख जल्दी ही यहाँ पेश किये जायेंगे (फेसबुक मित्र यहाँ पढ सकते हैं)...पहले मंगलेश जी का महत्वपूर्ण आलेख.)

कविता का सपाट चेहरा
-मंगलेश डबराल
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की जन्मशती की धूमधाम के बीच कई तरह से यह कहा जा रहा है कि उनका पाठ फिर से किया जाना चाहिए क्योंकि उनमें अपने देश-काल के गंभीर साक्ष्य हैं। ऐसे स्वर भी सुनाई दिये हैं कि हिंदी में अज्ञेय का वही महत्व है जो बांग्ला में रवींद्रनाथ ठाकुर का है। विभिन्न अनुष्ठानों, रजत, स्वर्ण और प्लेटिनम जयंतियों या अमृत महोत्सवों के समय लोगों को उदात्त और अतिशय शब्दावली में याद करना हम भारतीयों की चिरपरिचित प्रवृत्ति है। वास्तविकता यह है कि रवींद्रनाथ का प्रभाव बांग्ला समाज और परवर्ती साहित्य पर इतना गहरा है कि कई रचनाकारों ने बहुत प्रयत्न करके उनसे मुक्ति पाने की कोशिश की । सुकांत भट्टाचार्य से लेकर सुनील गंगोपाध्याय तक अनेक लेखकों-कवियों ने उनकी परंपरा से खुलमखुल्ला विद्रोह किया लेकिन अंततः यह पाया कि रवींद्रनाथ की उपस्थिति, उनकी जड़ें बांग्ला संस्कृति में इतनी व्यापक और बुनियादी हैं कि उनसे पीछा छुड़ाना मुमकिन नहीं। कविता, कहानी, गीत-संगीत, उपन्यास, नाटक, नृत्य, निबंध, चित्रकला, रंगकर्म, अभिनय, हर विधा में वे इस कदर बैठे हुए हैं। प्रसिद्ध बांग्ला फिल्मकार ऋत्विक घटक कभी-कभी अपनी मुंहफट शैली में कहते थे: "हम जहां भी जायें, हर रास्ते पर वह बूढ़ा दाढ़ी हिलाता हुआ दिखाई दे जाता है।'
रवींद्रनाथ की इस उपस्थिति के संदर्भ में अज्ञेय को देखा जाये तो वह लगभग नगण्य दिखती है और कुछ आश्चर्य होता है कि कवियों की परवर्ती पीढ़ियों पर अज्ञेय की संवेदना और उनके विवेक का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सरीखे प्रमुख कवि, जो कि अज्ञेय से अपनी निकटता के दौर में भी सामाजिक रूप से जागरूक कविता लिख रहे थे, जल्दी ही अज्ञेय के प्रभामंडल से बाहर आ गये। अक्सर देखा गया है कि एक पीढ़ी की संवेदना अगली पीढ़ी तक भले ही न जाती हो, लेकिन उसका विवेक जरूर हस्तांतरित होता रहता है। अज्ञेय की विडंबना यह है कि उनका काव्यात्मक विवेक उन्हीं तक सीमित रहा और परवर्ती कविता के काम का नहीं साबित हुआ। यहां तक कि अज्ञेय की तुलना में काफी कम कविता लिखने वाले विजयदेव नारायण साही की कविता से नयी पीढ़ी ने कहीं अधिक संवाद कायम किया। इसी तरह बच्चन जैसे लोकप्रियतावाद की ओर झुके हुए कवि की भाषा ने शमशेर बहादुर सिंह और रघुवीर सहाय तक को प्रभावित किया। इसमें संदेह नहीं कि तीन सप्तकों के संपादन के माध्यम से अज्ञेय ने नयी कविता की एक बड़ी पीढ़ी को रेखांकित करने का ऐतिहासिक काम किया था और तीनों सप्तकों में शामिल 21 कवियों में से करीब दस कवि अपनी रचना की सार्थकता को अंत तक सिद्ध करते रहे। लेकिन बाद में कविता के नये परिदृश्य और नये प्रस्थापना बिंदुओं से अज्ञेय का कितना संबंध रह गया था, इसका एक स्थूल प्रमाण उनके द्वारा संपादित "चौथा सप्तक' में दिखाई देता है जिसमें शामिल सातों कवि कोई अर्थवान कविता नहीं लिख सके।
आखिर अज्ञेय की विपुल मात्रा में लिखी कविता किसी काम की क्यों नहीं बन पायी? जीवन के अंतिम वर्षों में उनकी "नाच', "घर', "चीनी चाय पीते हुए', "मेरे देश की आंखें' जैसी कुछ कविताओं में सत्तर और अस्सी के दशक की कविता का रचाव प्रभाव दिखाई देता है, लेकिन इसके बावजूद उनकी यह नयी प्रयोगधर्मिता स्थायी महत्व की साबित नहीं हो पाती। इसके कारण शायद अज्ञेय की कविता में ही निहित हैं। उन्होंने कविता की प्रक्रिया, भाषा, व्यंजना और बात के संदर्भ में भी कई कविताएं लिखीं हैं। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि छायावाद से बाहर जाने, "मैले हो चुके उपमानों' और "कूच कर गये प्रतीकों के देवताओं' से मुक्ति पाने और प्रेमिका को "ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका' की बजाय "हवा में लहलहाती बाजरे की छरहरी कलगी' जैसा नया संबोधन देने की कोशिश में अज्ञेय के लिए अपनी कविता का घोषणापत्र लिखना जरूरी था। लेकिन यह प्रयोगधर्मिता शुरू से ही अपनी सीमाओं के साथ प्रकट हुई थी। सन्‌ 1949 की एक कविता में वे कहते हैं: "एक मौन ही है जो अब भी नयी कहानी कह सकता है/ इसी एक घट में नवयुग की गंगा का जल रह सकता है।' दरअसल अज्ञेय का यह मौन वर्षों पहले ही उनकी काव्य संवेदना की प्रस्थापना बन चुका था और वह "असाध्य वीणा' को पार करता हुआ आखिरी दौर की "छंद' जैसी कविता तक चला आता है जिसमें वे कहते हैं: "शब्द में मेरी समाई नहीं होगी/मैं सन्नाटे का छंद हूं।' अज्ञेय का यह मौन और सन्नाटा हिंदी के अकादमिक जगत और रूपवादी कहे जाने वाले कवियों के बीच प्रबल आकर्षण और चर्चा का विषय रहा हैऔर इसे कविता की प्रक्रिया का एक पर्याय मान लिया गया है। यह और बात है कि हिंदी विभागों से बाहर कवियों की विशाल बिरादरी में इस मौन की कोई अनगूंज नहीं सुनी गयी और शब्द की सीमाएं बतलाने के अज्ञेय के प्रयासों को उनके काव्य की सीमा के रूप में ही देखा गया। आखिरकार, कवि शब्दों के ही कारीगर होते हैं और उनके अनुभवों की सारी समाई शब्दों में ही होनी चाहिए। अज्ञेय की कविता इस बात का उदाहरण है कि एक उत्कट प्रयोगधर्मिता और नयी राहों की खोज अगर किसी उतनी ही उत्कट अंतर्वस्तु और अनुभवों से संपन्न न हो तो वह किस तरह मौन और मूकता के घट में गंगाजल की तरह रखी हुई रह जाती है।
अज्ञेय नाम की त्रासदी की एक तस्वीर डॉ. नामवर सिंह द्वारा संपादित और जन्मशती के उपलक्ष्य में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित "अज्ञेय: संकलित कविताएं' से उभर कर आती है। इसकी कुल 153 कविताओं में अज्ञेय के काव्य का भरसक प्रतिनिधित्व करने की कोशिश की गयी है हालांकि भूमिका में कहा गया है कि "अन्य संकलनों की तरह यह संकलन भी संपादक की अपनी रुचि और विवेक का फल है।' बेमन से लिखी हुई साढ़े तीन पृष्ठों की इस सामान्य-सी भूमिका में डॉ. नामवर सिंह गहरे पानी में न जाकर अज्ञेय की कविता की कुछ स्थूल और बाहरी विशेषताओं, उनके कुछ काव्य गुणों का उल्लेख करते हैं। मसलन यह कि "नाटकीयता अज्ञेय की कविता का उल्लेखनीय पहलू है। वह सटीक शब्दों के चयन में जितने सर्तक हैं उतने ही कुशल हैं नये शब्दों को गढ़ने में और ऐसे शब्दों की एक लंबी सूची बनायी जा सकती है जो उन्होंने हिंदी को दिये हैं।' या यह कि "वह अपनी कविता में भी कम-सुखन हैं। क्या मजाल कि उनकी कविता में भूल से भी कोई फालतू शब्द आ जाये।' नामवर जी यह बताना भी नहीं भूलते कि "अज्ञेय मीठे व्यंग्य और विनोद का भी शौक रखते हैं।' लेकिन इस भूमिका में डॉ. नामवर सिंह की दो धारणाएं खास तौर से गौर करने लायक हैं। एक तो यह कि "ध्यान से देखें तो अज्ञेय हिंदी में प्रकृति के शीर्षस्थ चित्रकार हैं। उनकी कविता की चित्रशाला में कोमल रूप-छवियों के साथ "अंधड़' के लिए भी यथोचित जगह है', और दूसरी यह कि "अज्ञेय की सच्ची तस्वीर उनकी "नाच' शीर्षक कविता के उस नट की है जो दो खंभों में बंधी हुई तनी रस्सी पर नाचता है।'
हिंदी में प्रकृति के शीर्षस्थ कवि का दर्जा अभी तक सुमित्रानंदन पंत को ही मिला हुआ है। वे पेड़ों, पत्तों, चिड़ियों, बादलों, हिमशिखरों, तारों-नक्षत्रों, सुबह की किरणों और चांद से भरी हुई रातों के आदिकवि हैं। "प्रकृति का भूधराकार शरीर' उन्हीं के पास है और उसका "मौन निमंत्रण' भी। उनकी बहुत सी कविताओं में निसर्ग अपने मौन के माध्यम से निमंत्रण देता रहता है। इसी कारण बदलते हुए काव्य यथार्थ के संदर्भ में पंत की कविता जल्दी ही अप्रासांगिक भी करार दी गयी। लेकिन जब नामवर सिंह सरीखे विद्वान प्रकृति का यह मुकुट अज्ञेय के सर पर पहनाते हैं तो आश्चर्य होता है कि वे अपनी ही बहुचर्चित पुस्तक "छायावाद' को भूल रहे हैं और एक ऐसे कवि को शीर्षस्थ बता रहे हैं जो पंत की कविता से छूटी हुई प्रकृति के चित्र उकेरता है। प्रकृति के रौद्र-उद्दाम चित्रकल्प भी अज्ञेय के "अंधड़' की तुलना में पंत की कविता में अधिक दिखेंगे। अपनी एक कविता में वे बादल को पृथ्वी की तरह उड़ते हुए चित्रित करते हैं। दरअसल, प्रकृति ही नहीं, अज्ञेय की संवेदना, शब्द-योजना और चित्रात्मकता पर सबसे अधिक प्रभाव पंत की कविता का ही है। फर्क शायद यह है कि पंत प्रकृति को एक स्वायत्त, मनुष्य से कहीं बड़ी सत्ता की तरह व्याप्त देखते हैं और "द्रुमों की मृदु छाया' को छोड़कर किसी "बाले के बाल-जाल' में अपने "लोचन' नहीं उलझाना चाहतेजबकि अज्ञेय "नीड़ों में उमंगों सी चढ़ती डगर', "दर्द की रेखा जैसी नदी' और "मौन नीड़ों में विहग-शिशु' को सिर्फ "आंख भर' देखते हैं।
सामाजिक संदर्भों पर लिखी हुई कविताओं को छोड़ दें तो अज्ञेय जब भी प्रकृति की ओर जाते हैं, उनकी संवेदना में पंत हमेशा दस्तक देते रहते हैं: "सामने था आर्द्र तारा नील', "बुझ गया आलोक जग में/ धधकते हैं प्राण मेरे', "रात के सहमे चिहुंकते बाल-खग अब निडर हो चुप हो गये हैं', "यह पथ अगम अंधेरा हो/ अनुभव का कटु फल मेरा हो', "कब कैसे किस आलोक-स्फुरण में इन्हें/ मिला दूं/दोनों हैं जो बंधु सखा चिर सहचर मेरे', "नीचे तरु-रेखा से मिलती हरियाली पर बिखरे रेवड़ को दुलार से टेरती हुई सी गड़रिये की बांसुरी की तान' इसके कुछ उदाहरण हैं। यह शब्दावली कुल मिलाकर नव-छायावादी है, उसकी संरचना भी "देवि-सहचरी-प्राण' जैसी पंक्ति लिखने वाले पंत की रचनाओं से मिलती है और वह प्रयोगधर्मिता, जो "कलगी बाजरे की' सरीखी कविताओं में आज भी पाठक को आकृष्ट करती है, फिर से छायावाद की शरण में चली जाती है। वह प्रकृति को मनुष्य के लिए किन्हीं नये अर्थों में अन्वेषित नहीं करती, जैसा हमें शमशेर और केदारनाथ अग्रवाल के अत्यंत मर्मस्पर्शी प्रकृति-काव्य में दिखता है। यही नहीं, शायद हरिवंश राय बच्चन प्रकृति के पर्यवेक्षण में अज्ञेय से अधिक आधुनिक कहे जायेंगे।
अज्ञेय को आधुनिक कविता से एक शिकायत यह रही कि वह बोलती बहुत है, जबकि "कविता को बोलना नहीं चाहिए।' सच यह है कि हिंदी कविता में मौन की उपस्थिति ज्यादा नहीं है और निराला, प्रसाद, महादेवी के छायावाद से शमशेर-नागार्जुन-मुक्तिबोध की त्रयी और फिर बाद के अधिकतर कवियों की रचनाएं अपने देशकाल को मौन के भीतर रूपायित करने की बजाय उसमें हमेशा एक मुखर हस्तक्षेप करती हैं इसलिए इनमें से कोई कवि अज्ञेय का निकटवर्ती नहीं लगता। हिंदी आलोचना इस पर एकमत है कि अज्ञेय की "असाध्य वीणा' उनके मौन की सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति है और उनके काव्य-चिंतन का सार भी है। डॉ. नामवर सिंह भी इस संकलन में कहते हैं कि "कवि की दृष्टि में मौन ही श्रेष्ठ अभिव्यक्ति हो सकता है।' मूलतः एक चीनी लोककथा पर आधारित यह कविता अपने पूरे शिल्प-लाघव के साथ उस वीणा से संगीत के अवतरण को संभव करती है जिसे कोई नहीं बजा सका था और यह तभी संभव होता है जब स्वयं महामौन एक साधक के रूप में उपस्थित होकर वीणा को गोद में लेता है और वीणा स्वयं इस तरह गा उठती है कि उसका स्वर सबके भीतर गूंजने लगे। किसी श्रोता को उसके स्वर में "तिजोरी में सोने की खनक' सुनाई देती है, किसी को "अन्न की सोंधी खुशबू', किसी को "मंदिर की ताल-युक्त घंटा ध्वनि' और किसी को "लोहे पर सधे हथौड़े की चोटें।' यानी हर व्यक्ति उसमें अपना प्रिय राग सुन लेता है। ज़ाहिर है कि यह यथास्थिति, आत्म को पहचानने, आत्म-सिद्धि का राग है, उसमें कोई परिवर्तन उपस्थित करने का नहीं। यह वीणा जिस पेड़ की लकड़ी से निर्मित हुई है, जिस प्रकृति, बादल, वर्षा, कुहरे, जीव-जंतुओं, गड़रियों की बांसुरी और पर्वतीय गांव के उत्सवों ने उस पेड़ को "अभिमंत्रित' किया है, उस सबका अवतरण और अभ्यर्थना करती हुई यह कविता एक मिथकीय प्रभामंडल की सृष्टि करती है, लेकिन अंततः इतने बड़े प्रयत्न का विसर्जन सिर्फ एक महामौन में होता है और उसके साथ कवि की "वाणी भी मौन' हो जाती है। विडंबना यह है कि यह वह मौन नहीं है जिसमें हिंदी समाज-बल्कि हिंदुस्तानी समाज- और उसका मन जीता है, बल्कि यह एक अवधारणात्मक, अर्ध-दार्शनिक-सा मौन है जो अपनी कोई अनुगूंज नहीं छोड़ता, अपना अध्यात्म प्रकट नहीं करता और एक निरावेग-निरात्म शून्य में तिरोहित हो जाता है।
अज्ञेय की एक और कविता "नाच' पर इन दिनों खास तौर से गौर किया जा रहा है और उसे रचनाकार के अंतर्जगत के साक्ष्य के तौर पर पढ़ा जा रहा है। डॉ. नामवर सिंह ने एकाधिक जगह उसकी चर्चा की है और मार्क्सवादी युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने उस पर एक कुतूहल-भरी टिप्पणी भी लिखी है। बेशक, "नाच' अज्ञेय की जानी-पहचानी तत्सम शब्दावली से मुक्त, एक चुस्त शिल्प में ढली हुई कविता है जिसमें रस्सी पर चलकर दर्शकों को रोमांचित करने वाले नट की यह विडंबना दर्ज हुई है कि लोग उसकी रस्सी, खंभों, रोशनी और तनाव को नहीं, बल्कि सिर्फ उसके नाच को देखते हैं अर्थात अंतर्क्रिया की पीड़ा को नहीं, उसकी परिणति से ही सरोकार रखते हैं। इस कविता की अंर्तवस्तु निश्चय ही मार्मिक है और नटों के करुण कठोर जीवन से जरा भी परिचित लोग जानते हैं कि उनके अबोध बच्चे तक रोजी-रोटी के लिए किस तरह इस कला में माहिर बना दिये जाते हैं। पूरे देश में फैले हुए नटों की यह परंपरा गरीब तबकों से लेकर सर्कस के कलाकारों तक मौजूद हैऔर सामंती दौर में उत्तराखंड जैसी जगहों में राजा के आदेश पर नटों को ढोलक बजाते हुए रस्सियों पर चलना और उनसे नीचे उतरना पड़ता था और इस खेल में कई बार उन्हें प्राण गंवाने पड़ते थे। लेकिन अज्ञेय का यह नट अपनी सामाजिक और वर्गीय चेतना से विच्छिन्न, एक हद तक नट का एकांतिक और आद्‌य-रूप है: जीता-जागता नट नहीं, बल्कि उसका एक प्रतीक, जो देशकाल-विहीन अपने निस्संग अकेलेपन में एक रस्सी पर चलता है और जिसे देखकर एक तकलीफदेह कला पर गुजारा करने वालों की याद नहीं आती।
"नाच'' अगर पाठक को विचलित नहीं करती और सिर्फ कुतूहल पैदा करके रह जाती है तो इसकी वजह यह है कि उसमें उस वस्तुगत सह-संबंध (ऑबजेक्टिव कोरिलेटिव) का अभाव है जिसे तमाम आधुनिकतावादियों के आदर्श टीएस एलियट कविता के लिए लगभग अनिवार्य मानते थे और जिससे कथ्य के अंतर्संबंधों की विश्वसनीय पहचान संभव होती है। कविता यह बताने से चूक जाती है कि नट आखिर क्यों गांठ को खोलकर रस्सी के तनाव में ढील देना चाहता है (वैसे भी यह तथ्य का निषेध है क्योंकि कोई नट ऐसा नहीं चाहता) और दर्शक क्यों रस्सी, गांठ, तनाव, रोशनी और खंभे की अनदेखी करते हैं। यथार्थ में नटों के कतरब देखने वाले दर्शक ऐसा नहीं करते। "वस्तुगत सह-संबंध' के अभाव में इस कविता का नट बेशक गिरता नहीं है लेकिन कविता जरूर गिर पड़ती है। इस सह-संबंध के कई उदाहरण खोजे जा सकते हैं। मसलन, धूमिल जब "मोचीराम' में जब यह कहते हैं कि "सच कहूं बाबूजी/मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है/जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है' या रघुवीर सहाय "रामदास' कविता में बताते हैं कि "रामदास उस दिन उदास था/अंत समय आ गया पास था/उसे बता यह दिया गया था/उस दिन उसकी हत्या होगी' तो हमें उनकी विश्वसनीयता यानी वस्तुपरक सह-संबंध के लिए कविता से बाहर नहीं जाना पड़ता।
इस संचयन में अज्ञेेय सौ वर्ष बाद एक ऐसे कवि के रूप में उभरते हैं जिनका भूगोल ऊंचाइयों-गहराइयों से नहीं, बल्कि समतल-सपाट रेखाओं से निर्मित हुआ है। इसमें अज्ञेय की कुछ चर्चित कविताएं भी छूट गयी हैं। मसलन, "घृणा का गान', "पराजय है याद', "हरी घास पर क्षण भर', "कांगड़े की छोरियां', "जितना तुम्हारा सच है', "सम्राज्ञी का नैवेद्य-दान', "बांगर और खादर', "भार' और "औपन्यासिक' जैसी कविताएं इस लिहाज से उल्लेखनीय अनुपस्थिति हैं। भारत विभाजन के समय हुए दंगों पर लिखी गयी "शरणार्थी' श्रृंखला की कविताएं भी यहां नहीं हैं जिन पर जाने-माने मार्क्सवादी आलोचक डॉ. मेनेजर पांडे और कवि राजेश जोशी ने पिछले दिनों काफी सकारात्मक टिप्पणियां करते हुए अज्ञेय के सामाजिक सरोकारों को याद करने की कोशिश की है। लेकिन ये सब कविताएं अगर इस संचयन में शामिल होतीं तब भी इसमें संदेह है कि अज्ञेय अपनी समतल कविता से और हिंदी के अकादमिक सरोकारों से ऊपर उठ पाते।

अक्सर लगता है कि कई वर्ष पहले शमशेर बहादुर सिंह ने अज्ञेय के बारे में अपनी जो संक्षिप्त राय दी थी उसमें शायद अज्ञेय का समग्र आकलन था। शमशेर सराहना करने के मामले में अत्यंत उदार थे और उन्होंने शायद ही कभी किसी कवि की कठोर आलोचना की होगी। लेकिन नेमिचंद्र जैन और मलयज से अपनी लंबी बातचीत में उन्होंने अज्ञेय के बारे में दो टूक ढंग से एक महत्वपूर्ण बात कही थी: " मुझे उनकी अनुभूतियाँ भी सीमित व्यक्तित्व की और उनकी कविताएँ हैं जो ढली हुई भाषा की हैं. लेकिन वह भाषा जो है वह कड़े चतुर शिल्पी की गढी हुई भाषा है. उसमें वह गरमी जो एक ज़िंदा भाषा में होनी चाहिए उसकी कुछ कमी मुझे लगती है. बहुत ही मेहनत से, क्लेवरली ...ही इज द फाइनेस्ट क्राफ्ट्‌समैन, बट इट इज नाट द लैंग्वेज ,इट इज नॉट अवर लैंग्वेज...ही इज ए क्राफ्ट्समैन। अपनी जन्मशती पर अज्ञेय अंततः एक चतुर शिल्पी ही बन कर रह जाते हैं, भले ही उनके प्रति कभी भक्तों जैसे विश्वास और कभी वकीलों जैसे तर्क पेश किये जाते रहें.
कहना न होगा कि अज्ञेय के बारे में अंतिम सत्य काफी पहले कहा जा चुका था।



गुरुवार, 19 मई 2011

अज्ञेय प्रसंग - भाग २


(समयांतर मंगाने के लिए ९८७१४०३८४३ पर संपर्क करें. वार्षिक चन्दा - १५० रु, छात्रों के लिए  १०० रु.)


(समयांतर में छपे पंकज बिष्ट के लेख अज्ञेय की विधवाएं और उनका क्रंदन का पहला भाग आप यहाँ पढ चुके हैं...ब्लॉग के आंकड़े बताते हैं कि इसे पढ़ा लगभग पांचेक सौ सुधि जनों ने लेकिन शायद कुछ कहना उचित नहीं समझा. वैसे फेसबुक पर मनीषा कुलश्रेष्ठ, विमल कुमार और हिमांशु पांड्या ने लेख को तो अच्छा बताया लेकिन शीर्षक पर आपत्ति की. हिमांशु ने लिखा 'लेख तो अच्छा है पर शीर्षक काफी असंवेदनशील है विधवाओं की समाज में स्थिति के प्रतिबहरहाल इससे लेख का महत्त्व कम नहीं हो जाता .जब भले लोग आई.सी.एस.एस.आर. की राजनीति से मुहं चुराना चाहते हैं और प्रत्येक आलोचना को 'कीचड उछाल ' की शब्दावली में बाँध रहे हैं और जब एक अखबार अपनी तमाम वस्तुनिष्ठता छोड़कर संपादक के व्यक्तिगत आस्थाओं का भोंपू बन गया है और जब तमाम वाम विरोधी अपनी तमाम नयी पुराणी कुंठाओं का वमन एक साथ कर रहे हों , ऐसे लेख का महत्त्व असंदिग्ध है. पंकज बिष्ट इसी साहस के लिए जाने जाते हैं.' लेख का दूसरा हिस्सा पेश है. अगली कड़ी में अज्ञेय का इंटरव्यू भी)


जहां तक कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम का सवाल है यह सदा से ही स्पष्ट था कि यह कम्युनिस्ट विरोधी विचारधारा से प्रचालित है। उसे सीआईए का पैसा मिलता था, यह दीगर बात है। इसका खुलासा 1967 में अमेरिकी पत्रिका रैंपार्ट ने किया था जिसके बाद दुनिया भर में बवाल मच गया। सवाल यह नहीं है कि उससे जुड़े सारे लोगों को पैसा मिलता था, पर यह निश्चित है कि उससे जुड़े चुनिंदा लोगों को अवश्य पैसा मिलता था। इसका एक उदाहरण लंदन से निकलनेवाली पत्रिका एनकाउंटर है, जिसका उन दिनों बौद्धिक जगत में जबर्दस्त बोलबाला था और उसके संपादक प्रसिद्ध ब्रितानवी कवि स्टिफे न स्पैंडर थे। जैसे ही यह खुलासा हुआ कि एनकाउंटर सीआईए पोषित पत्रिका है, स्पैंडर ने इस्तीफा दे दिया और वह मुंह छिपाने आस्ट्रेलिया भाग गए। साफ है कि सीआईए डीएमके या अण्णा डीएमके की तरह हर किसी को नोट नहीं बांटता था, न बांटता है। वह अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करता है अपने विश्वस्त एजेंटों के माध्यम से, इसमें कला और संस्कृति की संस्थाओं के अलावा, विश्वविद्यालय और फोर्ड फाउंडेशन जैसी स्वयंसेवी संस्थाओं का भी इस्तेमाल होता है। एनकाउंटर के अलावा पार्टीजन रिव्यू, कामेंट्री, सिवान रिव्यू  को भी सीआईए का पैसा मिलता था। बदले में ये पत्रिकाएं लेखकों से अच्छा पारिश्रमिक देकर मनचाहे लेख लिखवातीं थीं।

यह कैसे होता था, इस बारे में एडवर्ड सईद ने बतलाया है: ''... दूसरे विश्वयुद्ध के शुरुआती सालों में कुछ मुखिया होते थे जिनके हाथ में सूत्र होते थे, वे बुद्धिजीवियों को काम में लगाते थे, पैसा बांटते थे या सम्मेलनों और यात्राओं की व्यवस्था करते थे...सेंडर्स ने लिखा है कि दूसरे विश्वयुद्ध के कई जासूसों, जैसे कि मैकाले, आर्थर श्लींजर, कॉस कैन फील्ड, मैल्कम मैगरिज, विक्टर रॉथ्सचाइल्ड आदि का जमावड़ा मिल-जुल कर काम किया करता था। ...सेंडर्स का अनुमान है कि अमेरिका का समर्थन करने के लिए बुद्धिजीवियों को जहां तक संभव हुआ खरीदने, अमेरिका और उसकी नीतियों की आलोचना करनेवाले स्वरों को हल्का करने, इस देश के मूल्यों को फैलाने और साथ ही साथ सोवियत संघ को बदनाम करने में बीस करोड़ डालर खर्च किए गए।'' (विस्तृत जानकारी के लिए देखें समयांतर, जनवरी, 2000)

स्पैंडर को आलीशान तनख्वाह और अन्य सुविधाएं दी जाती थीं। इसी तरह औरों को भी दी जातीं थीं, अच्छा पारिश्रमिक, पार्टियों और यात्राओं के तौर पर। इसलिए मात्र इस बात से कि कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम से, ''जयप्रकाश नारायण, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, जैनेंद्र कुमार, सुमित्रानंदन पंत, जी. शंकर कुरुप्प, के.एम मुंशी, रायकृष्ण दास, रामवृक्ष बेनीपुरी'' आदि  कई जाने-माने नाम जुड़े थे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि इस संगठन को सीआइए का पैसा नहीं मिलता था और यह उसे आगे बांटने का काम नहीं करता था। निश्चय ही इनमें से कई लोग इस संगठन से इसलिए जुड़े होंगे कि वे परंपरावादी, रूढि़वादी, धार्मिक और गांधीवादी थे और मार्क्सवाद उन्हें रास नहीं आता था। पर रैंपार्ट के खुलासे के बाद बड़े पैमाने पर लोगों ने कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम से नाता तोड़ लिया था। इसके बाद भी जो उससे जुड़े रहे उन्हें क्या कहा जाएगा? एक सवाल और है, इस दौरान अमेरिका की यात्राओं और वहां विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने के लिए हजारी प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, जैनेंद्र कुमार, सुमित्रानंदन पंत, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि में से कौन-कौन गया था?

जहां तक दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले सप्ताहिक थॉट का सवाल है उसके बारे में लगातार शंकाएं रही हैं। अज्ञेय उसके साहित्य संपादक थे। यही नहीं वह इस पत्रिका के मालिक संपादक राम सिंह द्वारा दिल्ली से निकाले जानेवाले अंग्रेजी दैनिक के सहायक भी होनेवाले थे पर वह योजना पूरी नहीं हो पाई। पहले क्वेस्ट और फिर न्यू क्वेस्ट से अज्ञेय संपादक के तौर पर नहीं बल्कि लेखक और ए.बी शाह के सहयोगी के तौर पर जुड़े थे। जहां तक क्वेस्ट और न्यू क्वेस्ट का सवाल है ये पत्रिकाएं एनकाउंटर की 'ट्रू कॉपीÓ थीं, अपनी विषय वस्तु में ही नहीं साज-सज्जा में भी।

इधर वरिष्ठ लेखक मुद्राराक्षस ने अपने साप्ताहिक स्तंभ में अज्ञेय विवाद पर टिप्पणी की है जो अज्ञेय के कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के संबंधों की पुष्टि के साथ उनकी रामभक्ति पर भी प्रकाश डालती है। मुद्राराक्षस के अनुसार, ''... अज्ञेय जितने के हकदार हैं उससे ज्यादा ही उन्हें मिला है और पश्चिम के वामपंथ विरोधी संगठन कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के में शरीक हो जाने के बाद सुखों का तो जिक्र ही क्या। एक बार खुद डा. लोहिया (राममनोहर) ने मेरे अज्ञेय विरोध पर सवाल किया था - 'क्या तुम अज्ञेय को विदेशी यानी अमेरिकी एजेंट मानते हो?' मैंने कहा- 'अज्ञेय जब कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के लिए काम करते हैं तो और क्या हो सकते हैं?''

यह संदर्भ 1960 से 1967 के बीच का होना चाहिए।

मुद्राराक्षस ने उनकी रामभक्ति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, ''डाक्टर लोहिया के घर साप्ताहिक जन गोष्ठी (जन लोहिया संपादित मासिक पत्रिका थी - सं.) में अज्ञेय कभी नहीं बुलाए गए थे। लेकिन अज्ञेय की देवपूजा करनेवाला हिंदी समाज रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के साथ ही जानकी यात्रा करता है, इसको सामने क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? उनकी कविताओं और उपन्यासों के साथ इस बात की चर्चा भी क्यों नहीं होनी चाहिए कि जानकी यात्रा पर संपादित उनकी पुस्तक में उन्होंने  जो लिखा है वह कितने बड़े अंधविश्वास को ठीक विहिप की भाषा में दुहराता है? एकाध उदाहरण ही सिद्ध करने के लिए काफी होंगे - 'जिसके अंत में विष्णु स्वरूप राम एक प्रभादीप्त तेजोमंडल में आत्मस्थ हो जाते हैं। ... इसी के साथ सब देव-देवता, यक्ष-नाग, ॠषि, सिद्ध और मानुष मात्र हैं जो ऐसे अवसरों पर अगत्या उपस्थित होते हैं और सम्मोहित से ताकते रह जाते हैं। ... राम और सीता ऐसे ही अवतारी सनातन चरित्र हैं जिनका जीवन नियति का निर्धारण करने वाले क्षणों की सतत परंपरा है।'' (राष्ट्रीय सहारा, 24 अप्रैल) 

अज्ञेय पर बड़ी पूंजी मेहरबान रही इसका उदाहरण मात्र ज्ञानपीठ नहीं है बल्कि दिनमान, नवभारत टाइम्स और एवरीमैन्स भी है। पर असली मसला उनके वत्सल निधि की स्थापना करने से जुड़ा है। जहां तक ज्ञानपीठ की राशि का अपनी जेब में नहीं रखने का सवाल है हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वत्सल निधि वास्तव में अज्ञेय जी के अपने ही नाम पर बनाई गई संस्था थी।  वत्सल उन्हीं का बचपन का नाम है। दूसरे शब्दों में यह निधि स्वयं को उसी तरह अमर करने के लिए बनाई गई थी जिस तरह से हिंदुस्तान टाइम्स के मालिक ने अपने जीते जी अपने नाम पर केके बिड़ला फाउंडेशन बनाया। अज्ञेय ने ज्ञानपीठ पुरस्कार का पैसा किसी दूसरी सामाजिक संस्था या जरूरतमंद लोगों को नहीं दिया था। और हां, पैसा कहां से आया इसका एक मजेदार जवाब अज्ञेय ने अपने साक्षात्कार में दिया है जो मुद्राराक्षस की बात की ही पुष्टि करता है।

रघुवीर सहाय ने उनकी यात्राओं विशेष कर 'जानकी-यात्राÓ के बारे में प्रश्न किया था। इस लंबे जवाब के अंत में उन्होंने कहा है, '' ... पहली यात्रा जानकी जीवन से जोड़ी गई इसलिए भी मैंने सोचा कि बाहर से सहयोग इस यात्रा को अपेक्षया अधिक मिल सकेगा और यह विश्वास सही साबित हुआ। बहुत उत्साह से लोगों ने इस यात्रा में तरह-तरह की सहायता की।'' यानी अपनी योजनाओं और महत्वाकांक्षाओं के कार्यान्वयन केलिए संसाधन जुटाने के लिए धार्मिक भावनाओं को भुनाने में भी उन्हें कोई उज्र नहीं था। अगर अजय सिंह ने इस यात्रा को लेकर प्रश्न किया है कि   ''इस यात्रा का मकसद क्या था, यह क्यों निकाली गई, और इसके लिए धन कहां से और कैसे जुटा?'' तो गलत क्या है?

यहां यह बतलाना भी गलत नहीं होगा कि साहित्य को लेकर वह कितने महत्वाकांक्षी थे। खुशवंत सिंह ने आठवें दशक में दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार में, संभवत: स्टेट्समैन , साहित्य के नोबेल पुरस्कारों के संदर्भ में अज्ञेय से संबंधित एक प्रसंग लिखा है। सन 1966 में इजराइली लेखक सेमुअल एगनान को साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई। एगनान नाम से परिचित न होने के कारण किसी उत्साही उपसंपादक के कारण एक अंग्रेजी अखबार ने यह छाप दिया कि हिंदी कवि अज्ञेय को इस बार का पुरस्कार दिया गया है। इससे हल्ला मच गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद किसी भारतीय को मिलनेवाला साहित्य का यह दूसरा नोबेल पुरस्कार होता। खुशवंत सिंह का कहना था कि अज्ञेय ने जानबूझ कर इसका खंडन नहीं किया और गलत-फहमी को बनाए रखा। अगले दिन जाकर मामला साफ हुआ। इसलिए यह कहना भी कठिन है कि वास्तव में कभी अज्ञेय का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए गया था। पर इससे यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि नोबेल अनिवार्य रूप से उत्कृष्टतम रचनाओं के लिए ही मिलता है। इसी तरह उन दिनों एक और अफवाह भी उड़ा करती थी कि साहित्य अकादमी के अंग्रेजी के एक संकलन या पत्रिका के लिए अज्ञेय पर एस.एच. वात्स्यायन ने लेख लिखा था।  

अंत में, मेरे विचार में किसी व्यक्ति, विशेषकर लेखक, का मूल्यांकन अंतत: इस बात से नहीं हो सकता कि उसने शुरू में क्या किया? किस विचारधारा को समर्पित रहा और क्या लिखा, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उसने अपनी गलतियों से क्या सीखा? माना यशपाल ने औपनिवेशिक सरकार के लिए जासूसी का काम किया था, माना फैज फासीवाद का विरोध करने के लिए अंग्रेजी सेना में शामिल हुए पर सवाल यह है कि उन्होंने उस गलती को किस तरह सुधारा और उनका बाद का उनका लेखन किस तरह से जनता का पक्ष लेता है?

इसके एक पैमाने के तौर पर भारत विभाजन को लिया जा सकता है। अज्ञेय, यशपाल और फैज तीनों ही इसके गवाह थे और तीनों ही उस पंजाब क्षेत्र से थे जिसने विभाजन की विभीषिका देखी। तीनों का ही लेखकीय व्यक्तित्व आजादी के बाद निखरा। अज्ञेय के लेखन में भारत विभाजन हाशिये पर है। न ही उनका उस जनता के प्रति कोई सरोकार नजर आता है जो दो सौ वर्षों से अंग्रेजी औपपनिवेशिक शोषण से ध्वस्त हो चुकी थी। यशपाल ने भारत विभाजन और सांप्रदायिकता पर हिंदी का सबसे बड़ा उपन्यास झूठा सच लिखा है। उनका पूरा लेखन कुल मिला कर समाजोन्मुख है। फैज का लेखन भी सामाजिक बदलाव, तानाशाही और सांप्रदायिकता विरोधी है। जब कि अज्ञेय के लेखन में व्यक्ति महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा भी है, ''स्वाधीन समाज और कम स्वाधीन समाज में अंतर यही है कि एक में व्यक्तित्व के समग्र विकास की गुंजाइश होती है और दूसरे में नहीं होती। ÓÓ साफ है कि यह पूंजीवादी विचारधारा हैऔर आजादी के बहाने शोषण को सही ठहराती है। यह समझ यह नहीं देखती कि समाज में गहरी असमानता हैऔर इस असमानता को खत्म किए बगैर स्वतंत्रता जैसी कोई चीज नहीं आ सकती। क्योंकि समता के बिना समाज के एक बड़े हिस्से का न तो आर्थिव व सामाजिक विकास हो पाता है और न ही व्यक्तित्व का। हर समाज में आदमी अपनी प्रतिभा में 19-20 के अंतर का ही होता है। एक आदमी जो डाक्टर है वह पढऩे का अवसर न मिलने पर चपरासी या मजदूर हो सकता है और एक मजदूर अवसर मिलने पर डाक्टर या इंजीनियर या अध्यापक हो सकता है। यहां तक कि कोई लोक गायक अवसर मिलने पर किसी बड़े कवि या लेखक में बदल सकता है। असल में व्यक्तित्व का विकास एक छद्म धारणा है जो समाज के एक बड़े हिस्से को बेहतर जीवन की संभावना से बाहर कर देती है। कुछ लोगों के हाथ में पूंजी के केंद्रीयकरण को ही सही नहीं ठहराती है बल्कि शोषण और गरीबी को जस्टिफाई करती है। क्या यह अजीब नहीं है कि जो व्यक्ति योरोप के फासीवाद से उद्वेलित हो अंग्रेजी सेना में सेवा के लिए स्वयं को प्रस्तुत कर देता हो वह विभाजन की विभीषिका से न के बराबर प्रभावित हो। तब उसकी मानवता कहां गई? उनके उपन्यास चाहे शेखर एक जीवनी हो, अपने अपने अजनबी हो या नदी के द्वीप उन में तात्कालिक समय की उथल-पुथल क्यों नजर नहीं आती है। हां, व्यक्ति की निजी पीड़ा की ये रचनाएं इलैक्ट्रोग्राफ जरूर हैं

इसलिए समयांतर के लेखक और हमारे मित्र अजय सिंह के इस प्रश्न से हमारी पूरी सहमति है कि आखिर अज्ञेय की जन्मशती को वामपंथी क्यों मनाएं? न तो वामपंथी संगठन सरकारी हैं और न ही वामपंथी सरकारी कर्मचारी कि हर तरह के लेखक की जन्मशती मनाने की रस्मअदायगी करना उनकी मजबूरी हो। विवेक का इस्तेमाल करना फासिवाद नहीं है विवेक को दरकिनार करना जरूर अवसरवाद है। 
जिन्हें मनाना चाहिए वे मना ही रहे हैं।

इस विवाद का सबसे ज्यादा जुगुप्सा पैदा करनेवाला प्रसंग है लक्ष्मीधर मालवीय नाम के सज्जन का लेख। मात्र इसलिए नहीं कि उन्होंने हमारी मखौल उड़ाने की कोशिश की है बल्कि वृहत्तर संदर्भ में यह बुद्धिजीवीय बेईमानी का भी निकृष्टतम उदाहरण है। उन्होंने लिखा है, ''समयांतर पता नहीं क्या चीज है, जबकि मैं इस शब्द का अर्थ ही नहीं बूझ पाता।'' लगता है मालवीय जी सिर्फ उन्हीं शब्दों के अर्थ बूझ पाते हैं जिनसे उन्हें कुछ सधता नजर आता है। उनका भी दोष नहीं है। बेचारे जिस उम्र में हैं स्मृति लोप से पीडि़त हो जाना बहुत संभव है। पर उनकी यह स्मृति लोप की बीमारी अवसरानुकूल है, जिसे अंग्रेजीवाले कहते हैं 'सलैक्टिव एमनेशिया',पर है पुरानी यानी 'क्रॉनिक'। जो व्यक्ति अपना परिवार ही भूल जाए अगर वह समयांतर भूल गया हो तो क्षम्य है। समयांतर में उनके लेखों को छपे हुए हो भी तो दशक  गया है। कहीं उनके 'एमनेशिया' का कारण यह तो नहीं है कि बाद में समयांतर ने उन के प्रलापों को छापने लायक नहीं पाया। अपने को लेखक कहनेवाले इस आदमी की अमानवीयता का सबसे खराब उदाहरण यह है कि यह ऐसे समय जापान में है जब वह देश अपने इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी झेल रहा है और यह लालबुझक्कड़ ढींग मार रहा है कि मैंने अज्ञेय को जापान बुलाया था? क्या उन्होंने अपनी जब से टिकट दिया था? इस झूठी आत्म प्रशंसा और बड़बोलेपन से क्या यह बेहतर नहीं होता कि वह उस देश की पीड़ा पर हिंदी अखबारों के लिए दो शब्द ही लिख कर अपना ॠण चुकाने की कोशिश करते, जिसकी (घी चुपड़ी) रोटी इन्होंने आजीवन खाई है और जिसके बारे में वह लिखते हैं कि उस देश में इन्होंने सड़क पर पड़ी किसी लाश को नहीं देखा। पर महोदय आज तो पूरा जापान 20 हजार लाशों से पट गया है। अब तो लिख सकते थे। भारत को तो चलो वह 45 साल पहले ही छोड़ गए थे।

शनिवार, 14 मई 2011

अज्ञेय, यशपाल वाया ओम थानवी....वगैरह-वगैरह

प्रतियों के लिए संपर्क करें 09871403843, सदस्यता (वार्षिक) - रु 150, छात्रों के लिए रु 100


पंकज बिष्ट का यह आलेख समयांतर के ताज़ा अंक में छापा है. अज्ञेय कों लेकर जिस तरह जनसत्ता में व्यक्तिपूजा के जोश में कुतर्कों और अर्धसत्यों के सहारे एक 'बहस' चलाई गयी, उसके बरक्स यह लेख अज्ञेय की साम्राज्यवादी तथा साम्प्रदायिक भूमिका की पडताल करता है. हम इस बहस में सभी पक्षों के सार्थक हस्तक्षेप का सवागत करते हैं. अज्ञेय पर कुछ और आलेख यहाँ देखे जा सकते हैं .इस लेख में अज्ञेय के रघुवीर सहाय द्वारा लिए गए जिस साक्षात्कार का ज़िक्र किया गया है, उसे अगली किश्तों के क्रम में ही प्रकाशित किया जाएगा.

अज्ञेय की विधवाएं और उनका क्रंदन (भाग-१)

इस टिप्पणी को, जो वास्तव में जवाब है, जनसत्ता में भेजा जाना चाहिए था। पर चूंकि मैं नवें दशक के अंत में हुए रूपकुंवर सती कांड में जनसत्ता द्वारा सती प्रथा का समर्थन करने के विरोध में और तब तक, जब तक कि जनसत्ता इसके लिए माफी न मांगे, वहां न लिखने का फैसला करनेवाले सौ लेखकों में से एक था, पिछले दो दशकों से वहां लिखता नहीं हूं, इसलिए इसे समयांतर में छापने की मजबूरी है।

समयांतर के अधिसंख्य पाठकों को, जिन्होंने जनसत्ता नहीं देखा होगा, यह बतलाना जरूरी है कि अखबार के संपादक ओम थानवी ने 27 मार्च के संस्करण में 'अज्ञेय के दिलजले' शीर्षक से एक लंबा लेख लिखा था। यह लेख अजय सिंह के समयांतर के मार्च अंक में प्रकाशित लेख 'अज्ञेय जन्मशती: कुछ सवाल' के खिलाफ था। अगले ही रविवार को अखबार ने थानवी के पक्ष में और समयांतर व अजय सिंह की खिल्ली उड़ानेवाला लेख छापा, जो जापान से लक्ष्मीधर मालवीय का था। यह देखना मजेदार था कि जो जनसत्ता दिल्ली महानगर में ठीक से नहीं मिलता, वह जापान कैसे पहुंच गया? संभव है इधर उसका जापानी अंतरराष्ट्रीय संस्करण निकलने लगा हो! खैर, जहां तक अजय सिंह का सवाल है उन्होंने अपना जवाब दे दिया है और यह 17 अप्रैल के जनसत्ता में प्रकाशित हो चुका है। पर अभी भी कुछ ऐसी बातें हैं जिनका संबंध समयांतर और मुझ से तो है ही, साहित्य, साहित्यकारों की भूमिका और उनकी प्रतिबद्धता जैसे सवालों से भी है,रह गई हैं,इसलिए उनका स्पष्टीकरण जरूरी लगता है।

मुद्दे पर आने से पहले मैं इतना अच्छा चरित्र प्रमाण पत्र देने के लिए कि ''वे (पंकज बिष्ट) भले आदमी हैं...' जनसत्ता संपादक ओम थानवी का आभार प्रकट करना चाहूंगा। इसके बाद उनके मुझे ''...ठीक से कभी न समझ पाने'' और ''...पेचीदा संपादक।'' घोषित करने को ज्यादा तूल नहीं देना चाहता। ऐसे दौर में जब कि कोई आदमी हिंदी के महारथियों, संस्थानों और ओहदेदारों के बीच 'पर्सोना नॉन ग्राटा' बन चुका हो, उसके लिए तारीफ के तीन शब्द भी, वह भी इतने प्रतिष्ठित अखबार के संपादक द्वारा, क्या तीन ग्रंथों से कम माने जाएंगे? इसलिए यह तो स्वयं सिद्ध है कि ओम थानवी मुझ से ज्यादा भले सज्जन हैं।

पर असली मसला उन की आपत्तियों का है। इनमें पहली है कि मैं समयांतर में दो-तीन साल तक लगातार जनसत्ता की निंदा करते हुए यह ऐलान करता रहा कि अखबार बंद होने के कगार पर है।

निश्चय ही हम यह करते रहे, पर क्यों करते रहे यह बतलाया जाना भी जरूरी था, जो ओम थानवी ने नहीं किया। उस दौरान अखबार के दो संस्करण बंद हुए, एक मुंबई का और दूसरा चंडीगढ़ का। (गोकि इस बीच दो फ्रंचाइजी संस्करण और निकले हैं, पर उससे स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता ) इसके अलावा दिल्ली संस्करण के कई वरिष्ठ लोगों को निकाला गया। इस बात को भी दोहराने की जरूरत नहीं है कि अखबार के दिल्ली और कोलकाता संस्करण की स्थिति ऐसी बन गई कि अखबार कितना बिकता है यह अनुमान लगाने का मसला हो गया था। आज भी, कोलकाता की बात जाने दें, दिल्ली तक में यह अखबार आसानी से नहीं मिलता। न ही इसके प्रसार की कोई कोशिश नजर आती है। यानी इसे बस निकालने के लिए निकाला जाता है। हालत यह है कि मालिकों ने अखबार के दिल्ली कार्यालय को बहादुर शाह जफर मार्ग की बिल्डिंग से उठा कर नोएडा में पटक दिया है और एक्सप्रेस बिल्डिंग की उस जगह को नवभारत टाइम्स को किराए पर दिया हुआ है। साफ है कि मालिकों के लिए अखबार (हिंदी का?) नहीं बल्कि किराया ज्यादा अहमियत रखता हैऔर यह उनकी पुरानी आदत है। पर सत्य तो यह है कि आज भी स्वयं पूरे इंडियन एक्सप्रेस समूह को लेकर बाजार में रह-रह कर अफवाहें उड़ती रहती हैं कि संस्थान न जाने कब बिक जाए और किस को बिक जाए वगैरह-वगैरह।

और तब भी हमारी मंशा, वहां हो रही असामान्य उथल-पुथल को बताने के अलावा, यह कभी नहीं रही कि जनसत्ता बंद हो, बल्कि यह थी कि बंद न हो और इसका कोई भी कर्मचारी उस तरह न निकाला जाए जिस तरह उस दौरान 20-25 साल पुराने, जाने-माने पत्रकारों को निकाल कर सड़क पर खड़ा कर दिया गया। हमारी यह भी इच्छा रही है कि हिंदी के अखबार कम से कम भारतीय अंग्रेजी अखबारों की तुलना में तो कमतर न साबित हों और 'भारतीय रेल ल्हासा जाएगी' या 'पृथ्वी चंद्रमा के चारों ओर घूमती है' जैसी गलतियां न करें और करें भी तो कम से कम उसे सुधारने की शालीनता दिखाएं! हमारी घोषित नीति अच्छे अखबारों का ही समर्थन नहीं है बल्कि कर्मचारियों, विशेष कर पत्रकारों - जिसमें संपादक भी शामिल है - की नौकरी की सुरक्षा और काम करने की आजादी का भी समर्थन है, इसे पत्रिका के पुनप्र्रकाशन के पिछले 11 वर्ष के किसी भी अंक से देखा जा सकता है। इस दायरे में हम अखबारी संस्थानों की आलोचना और समर्थन, जरूरत के हिसाब से करते हैं। इस पर भी हम जनसत्ता का समर्थन विशेषकर दो कारणों से करते हैं। एक, इसका संपादक पेशेवर है यानी वह मालिकों के परिवार से नहीं है, उसके सर पर कोई ब्रांड मैनेजर नहीं है यानी वह स्वतंत्रता पूर्वक एक संपादक की तरह काम करता है। दूसरा, यह साहित्य, विशेषकर हिंदी और कलाओं को महत्व देता है।

उपरोक्त पैरे में ही थानवी ने लिखा है ''... मेरा ही इंटरव्यू प्रकाशित करेंगे (साथ में नोम चोम्स्की का!) और इज्जत बख्शेंगे।'' उनका इशारा समयांतर के फरवरी अंक की ओर है। मैं, पेचीदा ही सही, एक संपादक के रूप में कहना चाहता हूं कि जिस भी लेखक को हम, चाहे जिस भी रूप में हो, प्रकाशित करते हैं वह हमारे लिए सम्माननीय होता है। यानी इसमें अतिरिक्त सम्मान या अपमान जैसी कोई बात नहीं है। इसके अलावा पाठकों के प्रति अपने दायित्व को निभाते हुए मुझे समयांतर में किसी भी व्यक्ति को छापने में कभी कोई आपत्ति नहीं है। हमारी कोशिश रहती है कि उन लोगों को, जिनसे हम सहमत नहीं हैं या जो पत्रिका की घोषित नीति के खिलाफ हैं, जरूरत पड़ी तो छापने में कोताही न हो। यह उदारता नहीं कर्तव्य निर्वाह है। इसलिए मैं सविनय कहना चाहूंगा कि हमने ओम थानवी का साक्षात्कार यूं ही नहीं लिया - संबंध बनाने या बिगाडऩे के लिए - बल्कि एक योजना के तहत, मीडिया विशेषांक के लिए हिंदी के एक विशिष्ट अखबार का संपादक होने के नाते, लिया था। मैं यह भी रेखांकित करने की इजाजत चाहूंगा कि यह साक्षात्कार नोम चोम्स्की के बरक्स नहीं बल्कि श्रवण कुमार गर्ग और शीतला प्रसाद सिंह के साथ हिंदी की दैनिक पत्रकारिता के संदर्भ में था। यह महज इत्तफाक है कि उनका साक्षात्कार चोम्स्की और शीतला प्रसाद सिंह के बीच में छपा है।

यह सब कहने के बाद मेरे लिए यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि आखिर ओम थानवी ने अज्ञेय संबंधी विवाद में जनसत्ता को क्यों झोंक दिया? क्या अज्ञेय और जनसत्ता एक-दूसरे का पर्याय बन चुके हैं? समयांतर बनाम जनसत्ता विवाद में वह पहले ही स्वयं विस्तार से समयांतर में ही लिख चुके हैं। उनकी वकालत में हंस संपादक राजेन्द्र यादव भी उपस्थित थे। क्या ये दो अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं? क्या मात्र इसलिए कि अज्ञेय-भक्त ओम थानवी जनसत्ता के संपादक हैं इसलिए दोनों के अंतर को खत्म माना जाए? क्या किसी को अज्ञेय का, ओम थानवी की राय से अलग, मूल्यांकन करने का अधिकार नहीं है? आखिर ओम थानवी अज्ञेय को लेकर अपना आपा इस तरह क्यों खो बैठे कि दूसरों को 'कूढ़मगज' कहने तक पर उतर आए?

एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक के संपादक होने के नाते अगर वह समयांतर की बातों से सहमत नहीं थे तो, उनसे अपेक्षा थी कि वह अपने किसी रिपोर्टर को राष्ट्रीय अभिलेखागार भेजकर पता लगाते कि आखिर उस दौर के कागजात क्या कहते हैं? उनके पास संसाधनों की कमी नहीं है। पर दुर्भाग्य से उन्होंने अज्ञेय को लेकर जिस तरह की गैरजिम्मेदाराना मनोवृत्ति और भावुकता का प्रदर्शन किया वह गैरपेशेवराना तो है ही चकित करनेवाली भी है। थानवी लिखते हैं, ''उन्हें (यानी अज्ञेय को) जो लोग पढ़ते नहीं वे इला डालमिया को पढ़ बैठे हैं।'' खुद वह जो भी उद्धृत करते हैं वह आकाशवाणी के लिए रघुवीर सहाय और गोपाल दास द्वारा 1984 में किए गए लंबे साक्षात्कार से है। इस रेडियो जीवनी को प्रकाशन विभाग ने 1991-92 में छापा था। थानवी इस साक्षात्कार को परम सत्य मान कर चलते हैं। पर इला डालमिया ने 1998 में लिखे अपने लेख 'अज्ञेय की याद में' जो कहा है उसे लगभग यथावत अज्ञेय अपने बारे में पुस्तक में देखा जा सकता है। इस साक्षात्कार में अज्ञेय ने अपने बारे में कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं जो उनकी जीवनी, जिसके बारे में बहुत कम लिखा गया है, और मानसिकता को समझने के लिए महत्वपूर्ण साधन है।

पर स्वयं अज्ञेय इसमें कई बातें नहीं कहते या फिर अधूरी छोड़ देते हैं। यह सायास है या अनायास, कहा नहीं जा सकता। पर संदर्भ महत्वपूर्ण है। जैसे कि अज्ञेय यह नहीं बतलाते कि वह भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण जेल काटने के बाद सीधे आल इंडिया रेडियो में लगे थे तो कैसे लगे थे। यह बतलाती हैं इला डालमिया, '' जब वत्सल को जेल से छुट्टी मिली तो उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की चर्चा इतनी फैल गई थी कि कॉलेजवालों ने कॉलेज में दाखिला देने से इंकार कर दिया। पर जेल से छूटने पर उनको ऑल इंडिया रेडियो का एक पत्र मिला। वहां से काम का आमंत्रण था। पंजाब के इंटेलिजेंस ब्यूरो के मुखिया जेनकिंस की सिफारिश पर ऑल इंडिया (रेडियो) ने यह कदम उठाया था। जेनकिंस के मन में इस साहसी युवक की सच्चाई के चरित्र की छाप पड़ चुकी थी।...'' (देखें:'अज्ञेय की याद में' इला डालमिया, इला पृ. 122, राजकमल प्रकाशन )।

अज्ञेय इस गुप्तचर अधिकारी से कितना अभिभूत थे इसे इला डालमिया की इस बात से समझा जा सकता है, ''वत्सल (अज्ञेय) ने मुझसे कहा कि यही व्यक्ति, जेनकिंस हिंदुस्तानी होता तो क्या होता?''

अज्ञेय ने अपनी जीवनी नहीं लिखी। जीवनी के बारे में उनका यह कहना कम महत्वपूर्ण नहीं है कि ''...आत्मकथा लिखना कभी आसान नहीं होता, उपन्यास लिखना कम कठिन होता है।'' एक अन्य प्रश्र के जवाब में उन्होंने इसी पैरा में आगे कहा है, ''जिन लोगों ने मुझ से कहा उनमें ऐसे भी लोग थे जो कि ज्यादा लंबे समय तक इनके साथ रहे, जिनमें विमल प्रसाद भी एक हैं और दुर्गा भाभी यानी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी। उन्होंने कहलवाया था कि मैं क्यों नहीं लिखता हूं। तो मैंने उनसे पूछा कि 'आप क्यों नहीं लिखती हैं, आपका तो ज्ञान इसका मुझसे ज्यादा है, आपका अनुभव ज्यादा है। आप लिखें और तब कोई मुझसे पूछे तब मैं जो उत्तर दूंगा, उसकी स्थिति कुछ और होगी। और आप सब लोग चुप रहें और मैं लिखूं, तब तो उस पर विश्वास होने की संभावना कम होगी। इसलिए कि मैं ही सबसे ज्यादा वेध्य स्थिति में हूंगा इस मामले में।''

प्रश्न यह है कि आखिर अज्ञेय इन सारी बातों को लिखने से डरते क्यों थे? वह लेखक थे, न की दुर्गा भाभी। और लेखक भी कम प्रतिष्ठित नहीं थे। अगर लेखक का काम सच को सामने लाना नहीं है तो फिर क्या है? वह क्यों 'सेफ प्ले' करना चाहते थे क्या इसलिए कि जब दूसरे लिखें और कोई ऐसी बात हो जो उनके अनुकूल न हो तब ही वह बोलें अन्यथा चुप रहें? तथ्यों या कहना चाहिए सत्य के प्रति उनकी यह उदासीनता या अर्थ भरी चुप्पी, हैरान करनेवाली नहीं है? उपन्यास गल्प के माध्यम से सच का अनुसंधान है पर अगर कोई इसे सच को गल्प में बदलने के लिए इस्तेमाल करता है तो उसकी मंशा पर शंका करना नाजायज नहीं कहा जाएगा। आज कुल मिला कर स्थिति यह है कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी पर कोई भी आधिकारिक काम नहीं है। जिसकी मर्जी में जो आता है वह उस तरह से तथ्यों को व्याख्यायित करता है। इस संदर्भ में इस लेख के लेखक को भी अपवाद नहीं माना जा सकता।
'
'इला डालमिया के लेख से एक बात तो स्पष्ट है कि यह सारी जानकारी उन्हें अज्ञेय जी ने स्वयं दी होगी। क्या इससे साफ यह नहीं नजर आता कि जेनकिंस ने अज्ञेय को तोड़ लिया था अन्यथा रेडियो की ओर से उन्हें बुलाया जाना और फिर सीधे सेना में भर्ती करना, जहां वह तीन वर्ष रहे, अपने आप में अजूबा नहीं है? ये बातें मात्र अज्ञेय के संदर्भ में अकादमिक महत्व या रुचि की नहीं हैं बल्कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के बारे में और प्रकारांतर से स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी इतिहास को समझने के लिए भी लाभप्रद साबित होंगी। यह अपने आप में आश्चर्य की बात है कि अभी तक किसी भी शोधार्थी ने अज्ञेय के इस पक्ष की पड़ताल नहीं की है। मेरे विचार में कम से कम अब तो राष्ट्रीय अभिलेखागार में उस दौर के दस्तावेज अवलोकनार्थ उपलब्ध होंगे। उन्हें देख कर जेनकिंस की भूमिका और अज्ञेय के सेना में जाने के सारे संदर्भों को समझा जा सकता है। इसके अलावा यशपाल को लेकर जो शंकाएं हैं उन्हें भी स्पष्ट करने में मदद मिलेगी।'' (देखें: 'अज्ञेय छवि और प्रतिछवि', पंकज बिष्ट,समयांतर, जून, 2010)

अज्ञेय ने अपने सेना में जाने के प्रसंग को जिस तरह से 'कैमोफ्लाज' किया है उसका एक और उदाहरण। सेना में भर्ती होने के लिए उन्होंने स्वयं आवेदन किया था और यह आवेदन इस विश्वास पर किया था कि ''अगर भारत की सीमा पर संकट आता है या शत्रु के इसमें प्रवेश करने की संभावना होती है, तो मैं उसकी रक्षा के लिए लडऩा चाहूंगा...।'' सेना ने उनके आवेदन की जांच के लिए उस पत्र को सीआईडी को भेजा। ''...सीआईडी के जो तत्कालीन अधिकारी थे, जिन्होंने हमारे केस की भी पड़ताल की थी, उन्होंने उनको (सैनिक हाई कमांड को - सं.) यही जवाब दिया था - बाद में उन्होंने स्वयं मुझे बताया कि हमने यह जवाब दे दिया था - कि हमारी स्थिति (औपनिवेशिक सरकार की -सं.) बहुत बुरी है, लेकिन इतनी खराब नहीं है कि इस तरह का जोखिम मोल लिया जाए, ऐसे आदमी को सेना में बुलाने का।'' (अज्ञेय अपने बारे मे, पृ.130)

यह अधिकारी कौन था?

इला डालमिया ने अपने संस्मरण में इस प्रसंग को इस तरह लिखा है: ''कुछ बरस बाद वत्सल भारतीय सेना में शामिल होना चाहते थे, तो इन्हीं जेनकिंस ने वात्स्यायन के बारे में कहा था कि यह युवक चरित्रवान है विश्वसनीय है। पर साथ ही यह भी पूछा था कि क्या अंग्रेज सरकार की हालत इतनी बिगड़ गई है कि उसे अपने विद्रोहियों के सहयोग की जरूरत पड़ रही है। जेनकिंस ने यह बात वत्सल को भी बतला दी थी। इस बात के आधार पर उस समय भारतीय सेना में वत्सल को स्थान नहीं मिला था।''

इस पैरे से ठीक पहले पैरे में इला डालमिया ने लिखा है, ''... जेल से छूटने पर उनको ऑल इंडिया रेडियो का एक पत्र मिला। वहां से काम का आमंत्रण था। पंजाब के इंटेलिजेंस ब्यूरो के मुखिया जेनकिंस की सिफारिश पर ऑल इंडिया (रेडियो) ने यह कदम उठाया था।'' (देखें इला, पृष्ठ 122)

यह क्या कुछ असामान्य नहीं है कि अज्ञेय के साथ इस गुप्तचर अधिकारी के (''जिन्होंने हमारे केस की पड़ताल की थी'') संबंध लगातार बने रहे। वैसे जेल के दौरान मृत्युदंड की संभावना की तलवार का लगातार सर पर मंडराना एक बड़ा घटक नहीं रहा होगा जिसके चलते अज्ञेय ने आत्मकथात्मक उपन्यास शेखर एक जीवनी लिखना शुरू किया था? क्या यह कहना गलत होगा कि अज्ञेय अपनी चिंतन प्रणाली में यथा-स्थितिवादी पहले से थे ही इसलिए उन्हें बाद में भी बुर्जुआ चिंतन प्रणाली से तालमेल बैठाने में और उन मूल्यों के प्रति समर्पित होने में कठिनाई नहीं हुई।
इस साक्षात्कार से एक और बात भी उभरती है कि कई अंग्रेज अधिकारियों से अज्ञेय के इस दौरान संबंध थे जैसे कि कर्नल शौर्ट, जो सेना में जाने से पहले क्रिप्स (क्रिप्स मिशन वाले -सं.) का प्राइवेट सक्रेटरी था। (अंदाज लगाईये उसके महत्व का! उसे सीधे पीए से कर्नल बनाया गया।) यह संबंध कैसे बने इस बारे में इस साक्षात्कार में कुछ नहीं कहा गया है और न ही इला डालमिया ने कुछ लिखा है। अज्ञेय ने इस प्रसंग में जो कहा है वह कुछ इस प्रकार है। इस सीआईडी अधिकारी के मिलने के 15दिन बाद उन्हें एक फोन आया जो एक सैनिक अधिकारी का था। उसके अनुसार इस बार सेना में भर्ती करने के लिए अज्ञेय की सिफारिश एक नये ही अंग्रेज अधिकारी यानी शौर्ट ने की थी? क्या यह माना जा सकता है कि सैनिक हाई कमांड ने सीआईडी की रिपोर्ट को इतनी आसानी से दरकिनार कर दिया होगा? या फिर यह उसी गुप्तचर अधिकारी जेनकिंस का कमाल था जिसके लिए ''यह युवक चरित्रवान'' और ''विश्वसनीय'' था?

यहां इस बात पर भी बात होनी ही चाहिए कि आखिर अज्ञेय ने, जो उससे कुछ पहले तक ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता को सशस्त्र क्रांति के माध्यम से उखाड़ फें कना चाहते थे, उस सत्ता को भारत का रक्षक कैसे मान लिया? वैसे भी उस दौरान राजनेताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा था, गांधी जिसका नेतृत्व कर रहे थे (यानी मुख्यधारा की राजनीति),जो मानता था कि अंग्रेजों को पहले भारत से निकल जाना चाहिए फिर वह फासीवाद के खतरे के बारे में सोचेंगे। क्या यह अकारण था? ब्रिटेन उस समय दुनिया की सबसे बड़ी औपनिवेशिक ताकत था और भारत के सर पर सवार था। जापान तो उसके सामने पिद्दी था। इसलिए कांग्रेस का यह तर्क था कि अंग्रेज उन्हें विश्वास में लिए बगैर युद्ध में कूदे हैं इसलिए वे जानें उनका काम जाने। वैसे भी पहले विश्वयुद्ध के दौरान ब्रितानवी औपनिवेशिक सत्ता का समर्थन करने का गांधी और देश का अनुभव कोई बहुत पुराना नहीं था। उधर सुभाष बोस भी जर्मन और जापान के साथ थे ही, जिनका सम्मान आज भी बरकरार है। इससे भी बड़ी बात यह है कि अंग्रेज लड़ाई में अपना देश और साम्राज्य बचाने की मंशा से कूदे थे न कि भारत को जापानी आक्रमण से बचाने के लिए।

जहां तक कम्युनिस्टों का सवाल है उन की वैश्विक मामलों की समझ और निर्णय की अज्ञेय के निर्णय से तुलना नहीं हो सकती। वह गलत हो सकती है, उससे असहमति भी हो सकती है, पर उनके अपने तर्क तो थे ही। पहला, यह किसी एक व्यक्ति का निर्णय न हो कर पार्टी का और विश्वव्यापी स्तर पर कम्युनिस्टों का निर्णय था। दूसरा, उनके लिए फासीवाद को हराना वैचारिक प्रतिबद्धता के अलावा वैश्विक साम्यवादी एकता को बचाने के लिए भी जरूरी था। दुनिया के पहले साम्यवादी देश पर हमला हुआ था और इससे पूरे कम्युनिस्ट आंदोलन का अस्तित्व दांव पर था। सबसे बड़ी बात यह निर्णय पूरी तरह अत्यंत तात्कालिक और रणनीतिगत था। दूसरा महायुद्ध समाप्त होते-होते पश्चिमी पूंजीवादी-साम्राज्यवादी देश व दुनिया भर के कम्युनिस्ट पहले की तरह ही एक-दूसरे के दुश्मन हो गए थे। अगले लगभग पांच दशक पूंजीवादी देशों ने सिर्फ साम्यवादी व्यवस्थाओं को उखाडऩे में लगाए थे, जो आज भी,उतनी प्रचंड न हो, पर जारी है। अज्ञेय भी कम्युनिस्टों के खिलाफ चली इस मुहिम में, जो आर्थिक,सांस्कृतिक और सामरिक हर मोर्चे पर चली और आज भी चल रही है, निज की स्वायत्तता, इयत्ता तथा स्वतंत्रता जैसे मसलों को आधार बना कर, अंतिम क्षण तक शामिल रहे।

गोकि यशपाल को लेकर जो बातें कही जाती हैं उन का उल्लेख यहां गैरजरूरी है, इसके अलावा उनके खिलाफ लगे आरोपों का खंडन करने का भी हमारा कोई इरादा नहीं है। पर रह-रह कर अज्ञेय के संदर्भ में यशपाल को इरादतन सामने लाया जाता है, उन लोगों का मुंह बंद करने के लिए, जो अपनी मार्क्सवादी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। जनसत्ता संपादक द्वारा जापान में बैठे लक्ष्मीधर मालवीय को अपना प्रकाशित लेख ही नहीं भेजना बल्कि समयांतर के मार्च अंक में छपा अजय सिंह का लेख भी भेजना, विशेष आग्रह कर के लेख मंगवाना ( ''प्रिय थानवी जी, मेरी आपसे प्रत्यक्ष भेंट न कभी हुई, और न भविष्य में होने की आशंका है, फिर आप क्यों मुझे लाल चादर दिखलाने की तरह कुछ न कुछ छपे हुए चिरकुट भेज दिया करते हैं।'' 'विष कहां पाया', लक्ष्मीधर मालवीय, जनसत्ता, 3 अप्रैल) और उसके साथ अपनी ओर से एक पुराने पत्र की प्रति छापना, जिसके अनुसार यशपाल ने मुखबरी की थी, इसका उदाहरण है। यहां ओम थानवी से पूछा जा सकता है कि अगर यशपाल औपनिवेशिक सत्ता की पुलिस के इतना नजदीक और उपयोगी थे तो फिर पुलिस वालों ने यशपाल को स्थापित करने में उस तरह की मदद क्यों नहीं की जिस तरह की उन्होंने अज्ञेय की की थी। (''जेल से छूटने पर उनको ऑल इंडिया रेडियो का एक पत्र मिला। वहां से काम का आमंत्रण था। '') कैसे उन्हें जेल से छूटते ही सीधे ब्रिटिश रेडियो में ले लिया गया? ऐसा तो आज भी नहीं होता। क्या भारत सरकार शौकत गुरू को जेल से छूटते ही सीधे आकाश वाणी श्रीनगर में कश्मीरी युनिट में लगा सकती है?

दो बातें इस तथाकथित पत्र के बारे में भी। यह पत्र, जहां तक पढऩे में आ रहा है, मार्च, 1947 का है। यानी तब का जब अंग्रेजों का बोरिया-बिस्तर लगभग बंध चुका था। चार महीने बाद अगस्त में तो वे चले ही गए। ऐसे में वह कौन अधिकारी रहा होगा जो एक ऐसे आंदोलन के मुखबिर को संभालने की बात कर रहा था, जो कब का खत्म हो चुका था? क्या ये पुलिस अधिकारी निपट मूर्ख थे या फिर आजाद भारत की सरकार को कम्युनिस्टों से बचाना चाहते थे या स्वयं भारत सरकार की सेवा करना चाहते थे?

अज्ञेय ने अपने साक्षात्कार में यशपाल प्रसंग पर कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। जैसे उन्होंने कहा है कि यशपाल को इसलिए हटा देने का फैसला लिया गया था क्योंकि वह पार्टी की उस लाइन से सहमत नहीं थे जिसके अंतर्गत भगत सिंह व उनके साथियों को जेल से झुड़वाने की कार्रवाही का प्रस्ताव था। इसी के चलते उनके साथ मतभेद बढ़े और उन पर कई तरह के शक किए जाने लगे। (देखें उद्धरण) पर चूंकि किसी साथी से यशपाल को पता चल गया की उन्हें 'लिक्विडेट' कर दिए जाने का आदेश है तो वह भाग निकले। खैर इस पर हुआ यह कि अंतत: उन्हें एक ऐसे राज्य सिंध का कमांडर इन चीफ बना दिया गया जहां पार्टी का कोई असर ही नहीं था। इस तरह उन्हें मुख्यधारा से अलग कर दिया गया और संगठन के लोगों से संबंध न रखने के आदेश दे दिए गए। सवाल है ऐसे में यशपाल पार्टी की केंद्रीय कमेटी में कैसे हो सकते हैं और उन्हें महत्वपूर्ण गतिविधियों की जानकारी कहां तक रही होगी? अगर नहीं रही होगी तो क्या उन्हें कोई और सूचित करता रहा होगा?

एक बात जरूर लगती है कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी का संगठन न तो कोई बहुत व्यापक था,न ही उसमें कोई बहुत समन्वय था। पूरा संगठन कुछ युवाओं के देश को जल्दी से जल्दी आजाद कराने की उत्कट इच्छाओं और गुलामी से मुक्त होने के आवेश से प्रेरित था। इसका कोई विचारधारात्मक मजबूत आधार भी नहीं था। यही कारण है कि आपसी असहमतियां और अहं के टकराव अक्सर ही पैदा होते रहे। स्वयं अज्ञेय एक छोटे गुट के साथ इस में शामिल हुए थे। यह बातें उनके साक्षात्कार से स्पष्ट हो जाती हैं। एक जगह उन्होंने कहा है, ''...अभी ऐसा लिखकर प्रकाशित करने का एक परिणाम यह भी होगा कि जो पाठक वर्ग है वह कहेगा कि जिन लोगों को हम आदर्श पुरुष मानते रहे, ये सब लोग ऐसे ही थे। आपस में भी इस तरह लड़ते थे, कोई किसी का सम्मान नहीं करता, किसी को किसी पर विश्वास नहीं और इस लपेटे में ऐसे लोग भी आ जाएंगे जिनकी अभी तक प्रतिष्ठा बनी हुई है,उदाहरण के लिए चंद्रशेखर आजाद या भगत सिंह वगैरह।''

पर अज्ञेय ने यशपाल पर निशाना साधने में कसर नहीं छोड़ी। वह यशपाल के लेखन पर तो छींटाकशी करते ही हैं, दिनमान के दौरान उन्होंने वैशंपायन और धर्मेंद्र गौड़ के इस आशय के लेख छापे थे पर जब यशपाल ने उन्हें कानूनी कार्रवाही की धमकी दी तो उन्हें यशपाल का पक्ष भी यथावत छाप कर विवाद को बंद करना पड़ा था। यही नहीं अपने साक्षात्कार में भी वह चंद्रशेखर के मारे जाने के प्रसंग में सुखदेव राज का नाम तो लेते हैं पर यशपाल का नाम लेने से बचते हैं इसलिए कि तब तक प्रकाशवती जीवित थीं और उन्हें डर था कि उन पर मुकदमा कर दिया जाएगा। वैसे प्रकाशवती भी दल में शामिल थीं और कई बातें जानती थीं। पर बेचारे सुखदेव राज से उन्हें कोई डर नहीं था। अंत में अज्ञेय ने यह भी जोड़ दिया है, ''...ये सब बातें उस समय भी ऐसी स्थिति में थीं कि कोई अंतिम रूप से प्रमाणित उन्हें नहीं किया जा सकता, संदेह के लिए गुंजाइश बनी रहती, अब भी वैसा ही है। ''

अज्ञेय यशपाल पर क्यों रह-रह कर निशाना साधते हैं, दूसरे के कंधे की बंदूक से, यह अपने आप में विचारणीय है। उनमें स्वयं इतनी हिम्मत नजर नहीं आती कि सच बात कहते। वह साफ तौर पर इस बात को लेकर सजग हैं कि अगर वह कोई ऐसी-वैसी बात कह देते हैं तो उन पर आक्रमण होंगे और जवाब देना भारी पड़ जाएगा। तो क्या यह मात्र उन दोनों - अज्ञेय और यशपाल - के बीच लेखक और उस पर उपन्यासकार होने की आपसी ईष्र्या और प्रतिद्वंद्विता के कारण था, या फिर स्वयं अज्ञेय पर दक्षिणपंथी होने के कम्युनिस्टों के आरोपों और आक्रमण के गुस्से के कारण?

जारी...................