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गुरुवार, 23 अगस्त 2018

कुलदीप नैयर - एक क़द का उठ जाना

तस्वीर द हिन्दू से साभार 

ओम थानवी

कुलदीप नैयर का जाना पत्रकारिता में सन्नाटे की ख़बर है। छापे की दुनिया में वे सदा मुखर आवाज़ रहे। इमरजेंसी में उन्हें इंदिरा गांधी ने बिना मुक़दमे के ही धर लिया था। श्रीमती गांधी के कार्यालय में अधिकारी रहे बिशन टंडन ने अपनी डायरी में लिखा है उन दिनों किसी के लिए यह साहस जुटा पाना मुश्किल था कि वह कुलदीप नैयर के साथ चाय बैठकर चाय पी आए!

कहना न होगा कि वे सरकार की नींद उड़ाने वाले पत्रकार थे। आज ऐसे पत्रकार उँगलियों पर गिने जा सकते हैं, जिनसे सत्ताधारी इस क़दर छड़क खाते हों। इसलिए उनका जाना सन्नाटे के और पसरने की ख़बर है।

कुलदीपजी का जन्म उसी सियालकोट में हुआ था, जहाँ के फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ थे। बँटवारे के बाद कुलदीप नैयर पहले अमृतसर, फिर सदा के लिए दिल्ली आ बसे। मिर्ज़ा ग़ालिब के मोहल्ले बल्लीमारान में उन्होंने शाम को निकलने वाले उर्दू अख़बार 'अंजाम' (अंत) से अपनी पत्रकारिता शुरू की। वे कहते थे: "मेरा आग़ाज़ (आरम्भ) ही अंजाम (अंत) से हुआ है!"

बाद में महान शायर हसरत मोहानी की सलाह पर -- कि उर्दू का भारत में कोई भविष्य नहीं -- वे अंगरेज़ी पत्रकारिता की ओर मुड़ गए। पढ़ने अमेरिका गए। फ़ीस जोड़ने के लिए वहाँ घास भी काटी, भोजन परोसने का काम किया। पत्रकारिता की डिग्री लेकर लौटे तो पहले पीआइबी में काम मिला। गृहमंत्री गोविंदवल्लभ पंत और फिर प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के सूचना अधिकारी हुए।

आगे यूएनआइ, स्टेट्समैन, इंडियन एक्सप्रेस आदि में अपने काम से नामवर होते चले गए। एक्सप्रेस में उनका स्तम्भ 'बिटवीन द लाइंस' सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला स्तम्भ था। बाद में उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता की, जो आख़िरी घड़ी तक चली। वे शायद अकेले पत्रकार थे, जिनका सिंडिकेटेड स्तम्भ देश-विदेश के अस्सी अख़बारों में छपता था।

अनेक राजनेताओं और सरकार के बड़े बाबुओं से उनके निजी संबंध रहे। वही उनकी "स्कूप" ख़बरों के प्रामाणिक स्रोत थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य नियुक्त किया था। 

नैयर साहब मेरा काफ़ी मिलना-जुलना रहा। जब उन्होंने अपनी जमा पूँजी से कुलदीप नैयर पुरस्कार की स्थापना की, मुझे उसके निर्णायक मंडल में रखा। हालाँकि पुरस्कार अपने नाम से रखना मुझे सुहाया न था। पहले योग्य पत्रकार हमें (और उन्हें भी) रवीश कुमार लगे। पुरस्कार समारोह में नैयर साहब उत्साह से शामिल हुए, अंत तक बैठे रहे। 

उनसे मेरी पहली मुलाक़ात राजस्थान पत्रिका के संस्थापक-सम्पादक कर्पूरचंद कुलिश ने केसरगढ़ में करवाई थी। सम्भवतः १९८५ में, जब मुझे सम्पादकीय पृष्ठ की रूपरेखा बदलने का ज़िम्मा सौंपा गया था। कुलदीपजी का स्तम्भ अनुवाद होकर पत्रिका में छपता था। मैंने जब उन्हें कहा कि उनका बड़ा लोकप्रिय स्तम्भ है, उन्होंने बालसुलभ भाव से कुलिशजी की ओर देखकर कहा था -- सुन रहे हैं न?

मैंने उनसे पूछा कि आपको नायर लिखा जाय या नैयर? हम नायर लिखते थे। उन्होंने कहा कोई हर्ज नहीं। बाद में मुझे लगा कि नायर लिखने से दक्षिण का  बोध होता है, पंजाब में नैयर (ओपी नैयर) उपनाम तो पहले से चलन में था!

जब मैं एडिटर्स गिल्ड का महासचिव हुआ, तब उनसे मेलजोल और बढ़ गया। घर आना-जाना हुआ। गिल्ड की गतिविधियों में, ख़ासकर चुनाव के वक़्त, वे बहुत दिलचस्पी लेते थे। एमजे अकबर उन्हीं के प्रयासों से गिल्ड के अध्यक्ष हुए। जब गिल्ड द्वारा आयोजित जनरल मुशर्रफ़ की बातचीत के बुलावों में अकबर ने मनमानी की, मैंने (आयोजन के बाद) इस्तीफ़ा दे दिया था।

तब पहली बार गिल्ड की आपत्कालीन बैठक (ईजीएम) बुलाई गई। सम्पादकों की व्यापक बिरादरी ने -- विशेष रूप से बीजी वर्गीज़, अजीत भट्टाचार्जी, हिरणमय कार्लेकर, विनोद मेहता आदि -- ने मेरा ही समर्थन किया। पर नैयर साहब चाहते थे मैं इस्तीफ़ा वापस ले लूँ। हालाँकि बाद में अकबर ने ईजीएम में खेद प्रकट किया और बात ख़त्म हुई।

भारत-पाक दोस्ती के नैयर साहब अलमबरदार थे। उन्होंने ही सरहद पर मोमबत्तियों की रोशनी में भाईचारे के पैग़ाम की पहल की। इस दफ़ा वे अटारी-वाघा नहीं जा सके। पर उन्होंने अमृतसर के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से चली बस को रवाना किया। अमृतसर और सरहद के आयोजन में मुझे भी शामिल होने का मौक़ा मिला। मुझे दिली ख़ुशी हुई जब लोगों को हर कहीं नैयर साहब के जज़्बे और कोशिशों की याद जगाते देखा।

कुलदीप नैयर क़द्दावर शख़्स थे और क़द्दावर पत्रकार भी। बौनी हो रही पत्रकारिता में उनका न रहना और सालता है।
XX

(ओम थानवी जी की फेसबुक वॉल से साभार)

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

दूधनाथ सिंह : एक प्रतिबद्ध स्वर


कुलदीप कुमार ने यह लेख आज द हिन्दू के अपने कॉलम "हिन्दी बेल्ट" लिए लिखा था...किसे पता था कि यह श्रद्धांजलि लेख में बदल जाएगा। जनपक्ष की ओर से हिन्दी के प्रतिबद्ध कहानीकार और आलोचक दूधनाथ सिंह जी को सादर श्रद्धांजलि। 

A committed voice
  • Kuldeep Kumar

News from Allahabad is very depressing as it tells us that top Hindi writer Doodhnath Singh, 81, is lying at home in a critical condition due to serious kidney failure. I have fond memories of a chance meeting with him in early February last year at Allahabad’s famous Indian Coffee House in Civil Lines. In the early 1970s, when I was acquiring familiarity with contemporary Hindi literature, Doodhnath Singh was one of the writers whom I read with great interest. A line from his early poems still resonates in my ears: “Lift ke andhere mein brain haimrej ho rahe hain” (Brain haemorrhages are taking place in the darkness of the elevator). Later, I came to know him as a friend although he was much older than me.  

Doodhnath Singh is a committed Left-wing writer and happens to be the national president of the pro-CPI (M) Janwadi Lekhak Sangh. When he exploded on the Hindi literary scene with his collection of short stories Sapaat Chehrewala Aadmi (Man with a Plain Face), published by Rajendra Yadav’s Akshar Prakashan in 1967, the new talent was viewed with awe and nearly all the short stories, be it Reechh (Bear), Raktapaat (Bloodletting), Duhswapna (Nightmare) or Iceberg, acquired near-iconic status. He also made his mark as a significant poet of his generation as well as a novelist, playwright and critic.

His book on great Hindi poet Suryakant Tripathi Nirala, published by Lokbharati Prakashan in 1972, was tantalisingly titled Nirala: Aatmahanta Aastha (Nirala: A Self-destructive Belief) and Doodhnath Singh had to explain in the introductory note that he did not mean that Nirala was suicidal. What he actually meant was that once a writer had devoted himself completely to his art, he had to go through the process of continuous self-annihilation, savouring the taste of his own blood on the tip of his tongue. One could discern in this formulation an unmistakable influence of T. S. Eliot but the book was in fact an intimate conversation between two poets. It was a collection of observations made on the margin of Nirala’s books as well as scattered entries in Singh’s diaries but they somehow formed an integrated whole and offered a palpably new interpretation of the great poet and his work.
In 1975, when the country’s politics was experiencing a paradigm shift, Doodhnath Singh brought out a literary journal of uncertain periodicity and appropriately christened it Pakshdhar (Partisan). Although it did not have a long life, the journal proved to be an effective political-literary intervention and confirmed Singh’s status as an important writer with a social conscience.
Most of his books have been published by Lokbharati Prakashan, Radhakrishna Prakashan and Rajkamal Prakashan and they include his novels Aakhiri Kalaam (Last Discourse), Nishkasan (Expulsion) and Namo Andhakaram (Salute to Darkness), collections of short stories Mai ka Shokgeet (The Sad Song of Mother), Sukhant (Happy Ending) and Katha Samagra (Collected Stories), play Yamgatha (The Story of Yama), poetry collections such as Tumhare Liye (For You) and Laut Aa O Dhaar (Return! O, Stream), and books of literary criticism like Muktibodh Sahitya Mein Nayee Pravrittiyan (New trends in Muktibodh’s writings). He has also edited great Hindi woman poet Mahadevi’s writings with his critical comments. And, this is by no means an exhaustive list of his works.

While Doodhnath Singh’s early work expressed the angst felt by the youth of the 1960s due to an all-pervasive collapse of social, moral, economic and political values, his later work voiced a powerful protest against the evolving realities. His short story “Mai ka Shokgeet” is a hair-raising document of domestic violence against women while “Aakhiri Kalaam” is a post-Babri masjid polemics involving our past as well as present. In fact most of his post-1990 writings are imbued with a sense of deep frustration, anguish, anger and protest against the formation of a political culture that is destructive by its very nature. Singh tries to marshal multi-layered history, myths, fables and cultural interpretations to express his deeply felt revulsion against an ideology that tears asunder the intricately woven fabric of our composite culture. And, being a creative writer, he accomplishes this feat without resorting to sloganeering or explicit portrayals. Little wonder that veteran theatre critic Romesh Chandra had this to say about Singh’s play “Yamgatha” in his review published in The Hindu on February18, 2005: “In the past we have seen quite a few plays that have tried to draw a parallel between mythology and the current socio-political scene with varying degrees of success but "Yama Gatha" brings the message home without being propagandist.”

His book on Muktibodh, published in 2013 by Rajkamal Prakshan, proved that the critical acumen that he displayed in his study of Nirala had become even sharper over the decades as he offered radically different interpretation of the iconic poet’s work and brought out several new facets of his poetry.

Doodhnath Singh’s writings have been translated into English, German, Marathi, Bengali, Gujarati, Punjabi and Malayalam. He is a recipient many literary awards including Bharat Bharati Samman, Bharatendu Samman, Sharad Joshi Samman and Kathakram Samman.

(द हिन्दू से साभार) 


बुधवार, 30 सितंबर 2015

एक अपराजेय का जाना : मंगलेश डबराल


अस्सी के दशक के बेहद महत्त्वपूर्ण कवि वीरेंद्र डंगवाल का जाना हिन्दी साहित्य ही नहीं हिन्दी समाज की भी एक बड़ी क्षति है। कैंसर जैसी मुश्किल बीमारी से संघर्ष करते हुए भी उनकी सक्रियता उस जीजिविषा का पता देती है जो उन्हें उजले दिनों के आने को लेकर इस कदर आश्वस्त भी करती थी और बेचैन भी। उनकी स्मृति में लिखा वरिष्ठ कवि और उनके अभिन्न मित्र मंगलेश डबराल जी का अमर उजाला में छपा लेख साभार। 



अब ऐसे लोगों का होना बहुत कम हो गया है, जिनसे, बकौल शमशेर बहादुर सिंह, ‘जिंदगी में मानी पैदा होते हों।’ वीरेन डंगवाल ऐसा ही इंसान था, जिससे मिलना जीवन को अर्थ दे जाता था। वीरेन पहली भेंट में अपनी नेकदिली की छाप मिलने वाले के दिल में छोड़ देता था। वह प्रसन्नता की प्रतिमूर्ति था-दोस्तों की संवेदना को सहलाता हुआ, उन्हें धीरज बंधाता हुआ। यह उसकी जीवनोन्मुखता ही थी कि तीन साल तक वह कैंसर से बहादुरी के साथ लड़ता रहा। बीमारी के दिनों में उसे देख हेमिंग्वे के उपन्यास द ओल्ड मैन ऐंड द सी का यह वाक्य याद आता था कि ‘मनुष्य को नष्ट किया जा सकता है, पर उसे पराजित नहीं किया जा सकता।’ वीरेन चला गया, पर यह जाना एक अपराजेय व्यक्ति का जाना है।


वीरेन के जीवन पर यह बात पूरी तरह लागू होती थी कि एक अच्छा कवि पहले एक अच्छा मनुष्य होता है। कविता वीरेन की पहली प्राथमिकता भी नहीं थी, बल्कि उसकी संवेदनशीलता और इंसानियत के भविष्य के प्रति अटूट आस्था का ही एक विस्तार, एक आयाम थी, उसकी अच्छाई की महज एक अभिव्यक्ति और एक पगचिह्न थी। तीन संग्रहों में प्रकाशित उसकी कविताएं अनोखी विषयवस्तु और शिल्प के प्रयोगों के कारण महत्वपूर्ण हैं, जिनमें से कई जन आंदोलनों का हिस्सा बनीं। उनकी रचना एक ऐसे कवि ने की है, जो कवि-कर्म के प्रति बहुत संजीदा नहीं रहा। यह कविता मामूली कही जाने वाली चीजों और लोगों को प्रतिष्ठित करती है, और इसी के जरिये जनपक्षधर राजनीति भी निर्मित करती है।


वीरेन की कविता एक अजन्मे बच्चे को भी मां की कोख में फुदकते रंगीन गुब्बारे की तरह फूलते-पिचकते, कोई शरारत भरा करतब सोचते हुए महसूस करती है, दोस्तों की गेंद जैसी बेटियों को अच्छे भविष्य का भरोसा दिलाती है और उसका यह प्रेम मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, वनस्पतियों, फेरीवालों, नींबू, इमली, चूने, पाइप के पानी, पोदीने, पोस्टकार्ड, चप्पल और भात तक को समेट लेता है। वीरेन की संवेदना के एक सिरे पर शमशेर जैसे क्लासिकी ‘सौंदर्य के कवि’ हैं, तो दूसरा सिरा नागार्जुन की देशज, यथार्थपरक कविता से जुड़ता है। दोनों के बीच निराला हैं, जिनसे वीरेन अंधेरे से लड़ने की ताकत हासिल करता रहा। उसकी कविता पूरे संसार को ढोनेवाली/नगण्यता की विनम्र गर्वीली ताकत की पहचान करती हुई कविता है, जिसके विषय वीरेन से पहले हिंदी में नहीं आए। वह हमारी पीढ़ी का सबसे चहेता कवि था, जिसके भीतर पी टी उषा के लिए जितना लगाव था, उतना ही स्याही की दावात में गिरी हुई मक्खी और बारिश में नहाए सूअर के बच्चे के लिए था। एक पेड़ पर पीले-हरे चमकते हुए पत्तों को देखकर वह कहता है, पेड़ों के पास यही एक तरीका है/यह बताने का कि वे भी दुनिया से प्यार करते हैं। मीर तकी मीर ने एक रुबाई में ऐसे व्यक्ति से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की है, जो ‘सचमुच मनुष्य हो, जिसे अपने हुनर का अहंकार न हो, जो कुछ बोले, तो पूरी दुनिया सुनने को इकट्ठा हो जाए और जब वह खामोश हो, तो लगे कि दुनिया खामोश हो गई है।’ वीरेन की शख्सियत कुछ ऐसी ही थी, जिसके खामोश होने से जैसे एक दुनिया खामोश हो गई है।
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(अमर उजाला से साभार)

रविवार, 29 मार्च 2015

श्रद्धांजलि : विजय मोहन सिंह - ‘तुझे हम वली समझते....’


कुलदीप कुमार



अगस्त 1973 में मैंने इतिहास में एम ए करने के लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। सबसे पहले जिनसे भेंट और मित्रता हुई वे थे पंकज सिंह, विजयशंकर चौधरी, त्रिनेत्र जोशी, देवीप्रसाद त्रिपाठी, अनिल राय और आनंद कुमार। पंकज सिंह अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में शोध कर रहे थे और विजयशंकर चौधरी क्षेत्रीय विकास अध्ययन केंद्र में एम ए (द्वितीय वर्ष) कर रहे थे। शुरुआती दो-ढाई वर्षों के दौरान हम तीनों का अधिकांश समय एक साथ ही गुजरता था। पंकज सिंह ने जिन अनेक लोगों से मेरा परिचय कराया उनमें विजयमोहन सिंह, मंगलेश डबराल और गिरधर राठी भी शामिल थे। उन दिनों विजयमोहन सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में हिन्दी साहित्य पढ़ाते थे और पास ही आनंद निकेतन में रहते थे। मंगलेश और राठीजी प्रतिपक्ष साप्ताहिक के संपादक मंडल में थे। इसके प्रधान संपादक जॉर्ज फर्नांडीस और संपादक कमलेश थे।

पंकज सिंह विजयमोहन जी को तब से जानते थे जब वे आरा में पढ़ाया करते थे। उनके साथ मैं विजयमोहन जी के घर कई बार गया और मुझ पर भी उनका स्नेह हो गया। सितंबर या अक्तूबर की  बात होगी। विजयमोहन जी जेएनयू आए थे। हम लोग चाय पीकर क्लब बिल्डिंग से बाहर निकल रहे थे कि उन्होंने अचानक मेरी ओर मुड़ कर पूछा: आज प्रतिपक्ष में जिस कुलदीप कुमार की समीक्षा छपी है, वह क्या तुम ही हो?” मेरे हाँ कहने पर उन्होंने एक और सवाल किया: “तुम्हारी उम्र कितनी है?” मेरे यह बताने पर कि अठारह साल है, वे मुझे गौर से देखते हुए बोले, “तब तो तुम्हारा भविष्य बहुत उज्ज्वल है।” तब क्या पता था कि मैं 1980 के दशक के अंत तक आते-आते साहित्य से लगभग विरत होकर पत्रकारिता में ही डूब जाऊंगा। दरअसल मैंने गंगाप्रसाद विमल और विश्वेश्वर के दो छोटे उपन्यासों की समीक्षा लिखी थी। मंगलेश डबराल, गिरधर राठी और पंकज बिष्ट (उन दिनों वे आजकल के सह-संपादक थे) में एक विशेष गुण यह था कि वे युवाओं को बहुत प्रोत्साहित करते थे। मैं नया-नया दिल्ली आया था। एकदम अज्ञात कुलशील। फिर भी ये मुझ पर भरोसा करके समीक्षा के लिए किताबें दे देते थे। विजयमोहन जी ने मुझे जो शाबासी दी, उसका मुझ पर क्या असर हुआ, आज यह बताना असंभव है। मुझे लगा कि मैं तो सातवें आसमान पर हूँ।

उस समय हिन्दी जगत में विजयमोहन जी की धूम मची हुई थी। एक कहानीकार के रूप में तो वे प्रसिद्ध थे ही, नामवर सिंह द्वारा संपादित आलोचना में प्रकाशित उनकी कुछ समीक्षाओं ने उन्हें प्रखर आलोचकों की पहली पंक्ति में ला खड़ा किया था। उनसे मिलने-जुलने का सिलसिला जारी रहा और मुझ पर उनका स्नेह बढ़ता गया। 1975 में वे हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पढ़ाने शिमला चले गए जहां डॉ बच्चन सिंह हिन्दी विभागाध्यक्ष और डीन थे। इमरजेंसी लग चुकी थी। अगले साल कुछ ऐसी स्थितियाँ बनीं कि मुझे जेएनयू छोडना पड़ा। अब सवाल यह था कि जाऊँ तो जाऊँ कहाँ। मुझे विजयमोहन जी की याद आई और मैं अचानक शिमला जा धमका। प्रवेश की तारीख निकल चुकी थी। लेकिन उन्होंने बच्चन सिंह जी पर जोर डाल कर मेरा दाखिला करवा दिया। हॉस्टल भर चुके थे। डेढ़ माह मैं उनके घर पर रहा और उनके प्रयासों के कारण ही मुझे हॉस्टल में जगह मिली। जब भी मैं इस दौर के बारे में सोचता हूँ तो मेरा मन विजयमोहन जी के प्रति अपार आदर से भर उठता है। कितने लोगों का हृदय इतना विशाल है जो थोड़े से परिचय के आधार पर एक लड़के को अपने घर डेढ़ महीने तक रखें, एकदम परिवार के सदस्य की तरह?

1975 में मैंने दाढ़ी रख ली थी। विजयमोहन जी भी दाढ़ी रखते थे। शिमला में बहुत-से लोग मुझे उनका छोटा भाई समझते थे। अगर किसी ने उनके सामने कहा तो उन्होंने कभी इसका प्रतिवाद नहीं किया। वे घर पर हों या न हों, मेरे लिए उनके घर के दरवाजे हमेशा खुले थे। शिमला में उनके पास एक रिकॉर्ड प्लेयर था और बहुत से एल पी और ई पी थे। मैं अक्सर वहाँ विलायत खां के खमाज का ईपी और अदा फिल्म के गाने सुनता था। टी एस एलियट का निबंध संग्रह द सेक्रेड वुड और मार्टिन टर्नेल की पुस्तक नॉवेल इन फ्रांस मैंने शिमला में उनके घर पर ही पढ़ी थीं।

हिन्दी फिल्मों और उनके संगीत के बारे में उनका ज्ञान बहुत विशद था। उनकी संगत में ही मैंने इस संगीत को गंभीरता से सुनना शुरू किया। वे गानों और उनके संगीत की बारीकियों को बहुत अच्छे ढंग से समझाते थे। जब वे और विष्णु खरे एक साथ होते थे, तो यह तय करना मुश्किल हो जाता था कि फिल्म संगीत के बारे में किसका ज्ञान अधिक है। काशी विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए उन्होंने संगीत सीखा था और उन दिनों वे वायलिन बजाया करते थे। बागेश्री उनका प्रिय राग था। वहाँ बी वी कारन्त उनके सहपाठी थे और दोनों में प्रगाढ़ मित्रता थी। मुझे कारन्त जी से उन्होंने ही मिलवाया था।  शिमला में वे सबसे अधिक लोकप्रिय अध्यापकों में गिने जाते थे। जो लोग केवल उनके धीर-गंभीर रूप से ही परिचित हैं, उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि शायद ही कोई दिन जाता हो जब उनकी क्लास में हम सब लड़के-लड़कियां खिलखिलाकर न हँसते हों। वे बोलने में भी भाषा का रचनात्मक इस्तेमाल करते थे और अद्भुत हास्य-व्यंग्य पैदा करते थे। गोदान पढ़ाते समय वे लगभग अभिनय करके बताते थे कि मिस्टर मेहता कैसे मालती को नाला पार करा रहे हैं। उस समय भी वे गोदान को असफल उपन्यास मानते थे।

वे जितने सच्चे और खरे इंसान थे, उतने ही सच्चे और खरे आलोचक भी। लिखते समय वे भूल जाते थे कि किस पर लिख रहे हैं। साहित्य को देखने-परखने की उनकी दृष्टि विलक्षण थी। उनके सादगी भरे जीवन को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि वे कितने सम्पन्न परिवार से थे। उन्होंने दिल्ली में दो बार फ्रीलांसिंग की और संघर्ष के कई साल गुजारे। बहुत-से लोग आभिजात्य ओढ़े रहते हैं, लेकिन विजयमोहन जी के व्यक्तित्व में वह खुशबू की तरह रचा-बसा था। वे सामंती सोच के घोर विरोधी थे, लेकिन उनके व्यक्तित्व में एक सामंती ठसक थी जो स्वाभिमान के रूप में प्रकट होती थी। अपने और दूसरों के स्वाभिमान की रक्षा करना उनका स्वभाव था। मुझ पर उनके इतने अहसान थे, लेकिन कभी उन्होंने एक क्षण के लिए भी मुझे इसका अहसास नहीं कराया। प्रेमपूर्वक खातिरदारी करना उनके स्वभाव की एक और विशेषता थी।


उनसे आखिरी मुलाक़ात पिछले साल नवंबर में हुई थी जब मैं उनके घर अपनी बेटी की शादी का निमंत्रणपत्र देने गया था। उनका पेट बहुत खराब चल रहा था। शादी के दिन उनका फोन आया कि तबीयत ऐसी नहीं कि आ सकें। फिर दिसंबर में फोन आया कि किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाना है। मैंने होली फेमिली में उनके लिए  एपाइंटमेंट लिया लेकिन फिर उन्होंने अपने बेटे वर्तुल के पास जाने का मन बना लिया। इस बीच कई बार वे आईसीयू आए-गए। तीन सप्ताह पहले आशा जी (विजयमोहन जी की पत्नी) ने फोन पर उनसे बात कराने की कोशिश की लेकिन वे बोल नहीं पाये। आखिरी बार जब मैंने फोन किया तो वर्तुल ने कहा कि पापा बस अब अंतिम सांस ले रहे हैं। पंद्रह-बीस मिनट बाद ही पता चला कि वे नहीं रहे। मुझ पर तो वज्रपात-सा हुआ। दुनिया के लिए वे एक लब्धप्रतिष्ठ कथालेखक और आलोचक थे लेकिन मेरे लिए सिर्फ विजयमोहन जी थे। मेरे मित्र, मेरे शिक्षक, मेरे बड़े भाई।
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(जनसत्ता से साभार)

मंगलवार, 4 मार्च 2014

पूरनचंद जोशी होने के निहितार्थ - वीरेन्द्र यादव.

पूरण चन्द्र जोशी 



लम्बी बीमारी के बाद अभी विगत २ मार्च को प्रख्यात समाजशास्त्री पूरनचंद जोशी का हमारे बीच न रहना साहित्य और समाजशास्त्रीय अनुशासन के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी का टूट  जाना है .आज से लगभग ढाई दशक पूर्व जब  पूरनचंद जोशी की पुस्तक ‘परिवर्तन और विकास के सांस्कृतिक आयाम’ प्रकाशित हुई थी तो हिन्दी बौद्धिकों के बीच यह एक नयी परिघटना इसलिए थी कि श्यामाचरण दुबे के बाद संभवतः यह पहली बार था कि गैर साहित्यिक अनुशासन  से इतर किसी बुद्धिजीवी ने साहित्य और समाजशास्त्र के अंतर्संबंधों पर हिन्दी साहित्य के साक्ष्य द्वारा अपना विमर्श रचा हो . भारतीय सन्दर्भों में प्रेमचंद के ग्राम केन्द्रित लेखन का विश्लेषण करते हुए उन्होंने भारतीय सामाजिक संरचना को समझने की एक नयी दृष्टि की तलाश का उपक्रम किया था .  स्वाधीनता आन्दोलन के दौर में गांधी और प्रेमचंद के बीच अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल और व्याख्या करते हुए उन्होंने ग्रामीण भारत को इस समूचे देश की चेतना का स्रोत बताया था . दरअसल  जिस ‘लखनऊ स्कूल आफ सोशियालोजी’  में जोशी जी की बौद्धिक निर्मिति हुयी थी वह पश्चिमी दृष्टि को प्रश्नांकित करते हुए आधुनिकता की देशज पहचान की कायल अधिक थी .

        उल्लेखनीय तथ्य यह है कि पूरनचंद  जोशी  वैचारिक रूप से एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी बुद्धिजीवी थे .लेकिन वे मार्क्सवाद को मानव नियति और  सामाजिक रूपांतरण की एक खुली सैधान्तिकी और परिघटना के रूप में देखने समझने के कायल थे . जहाँ वे सोवियत क्रांति को मानव इतिहास में श्रम शक्ति की  केन्द्रीयता  की ऐतिहासिक उपलब्द्धि मानते थे वहीं बाद के दौर में उन्होंने   इसकी  उस रूढिगत  सैधान्तिक परिणति को प्रश्नांकित भी किया जो ‘विवेकवाद’ और ‘बुद्धिवाद’ की कसौटी पर कही कमतर रह जाती थी . अपनी वैचारिकी में जोशी जी  मार्क्सवाद की स्तालिनवादी परिणति को मार्क्सवाद का पर्याय नहीं मानते थे .उनका स्पष्ट कहना था कि  स्टालिन मार्क्सवाद की उस बौद्धिक परम्परा से होकर नहीं गुजरे थे जो तर्क, विवेक और बुद्धिवाद में  रची बसी थी .सोवियत यूंनियन को साम्राज्यवादी दुष्चक्र से बचाने  और क्रांति की उपलब्धियों को संजोये रखने के लिए स्टालिन ने विवेक की जगह जिस आस्था का सहारा लिया उसने  सोवियत माडल को ‘आयरन कर्टेन’ की जिन परिणतियों तक पहुँचाया वही इसके पतन का कारण बना . स्टालिन के बारे में उनका  कहना था कि  स्टालिन ने ईसाई पादरी से कम्युनिस्ट पादरी में व्यक्तित्वांतरण की जो छलांग लगाई वही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी सीमा थी . लेकिन इसे स्वीकार करते हुए जोशी जी  उन  कम्युनिस्ट विरोधियों  से घोर असहमत थे जो स्टालिनवाद को मार्क्सवाद का पर्याय मानकर समूची मार्क्सवादी सोच को ही ख़ारिज करते थे .

      दरअसल पूरनचंद जोशी मार्क्स  के आर्थिक चिंतन और नए समाज के निर्माण के दर्शन को गांधी, नेहरु ,टैगोर की भारतीय नजर से भी गुजर कर समझने के पक्षधर थे .इसीलिये जहाँ उन्होंने टैगोर और नेहरू के रूसी यात्रा वृतांत के  साक्ष्य   से  नए बनते  सोवियत समाज  की शक्ति और सामर्थ्य को पहचाना वहीं प्रो. ध्रुजती प्रसाद मुख़र्जी और का. आशाराम सरीखों के बयानों के माध्यम से उस समाज की सीमा को भी पह्चानने से कोई गुरेज नहीं किया . उनकी पुस्तक  ‘यादों से रची यात्रा’ एक उदारवादी  कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी का ऐसा आत्मवलोकन है जो उस विगत की बेबाक पड़ताल करता है जो एक साथ ‘दिवास्वप्न’ और ‘दुःस्वप्न’ दोनों ही था . वैचारिक संकट की घड़ी में क्या होता है एक प्रतिबद्ध परिवर्तनकामी बुद्धिजीवी होने का अर्थ पूरनचंद जोशी  इस जद्दोजहद से शिद्दत से मुठभेड़ करने में सक्षम थे . वे उन  बुद्धिजीवियों में थे जो न तो सिद्धांत को कवच के रूप में धारण करने के कायल थे और न ही असुविधाजनक  स्थिति में इसे उतार फेंकने के . आज जब नवउदारवाद  का कवच कुंडल धारण करके पूंजीवाद की वैचारिकी से समूचे मार्क्सवाद का आखेट किया जा रहा है तो ऐसे समय में पूरनचंद जोशी का न होना समूचे प्रगतिशील हिन्दी समाज की निश्चित रूप से एक अपूरणीय क्षति है . वे आज के समय में एक नैतिक बौद्धिक उपस्थिति थे . इस हार्दिक स्मरण के साथ  उन्हें अंतिम विदाई .  



                                                

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

राजेन्द्र यादव : बड़े सम्पादक और लेखक ही नहीं बड़े मनुष्य भी - पल्लव

हमारे युग के नायक राजेन्द्र यादव
पल्लव
हिन्दी कहानियों के सबसे शानदार संकलन ‘एक दुनिया समानांतर’ की भूमिका में राजेन्द्र  यादव ने एक सवाल उठाया है कि विश्वामित्र नायक हैं या खलनायक? आज जबसे खबर मिली है कि यादव जी नहीं रहे यही सवाल उनके बारे में पूछ्ने का मन हो रहा है - राजेन्द्र यादव हमारे साहित्य समय के नायक हैं या खलनायक? शुरुआत उन्होंने भी बड़ी भव्य की थी – सारा आकाश जैसे उपन्यास और कई उम्दा कहानियों के साथ । हंस के सम्पादन से उनका सितारा बुलन्दी पर पहुंचा, यह वह समय था जब बड़े समूहों की पत्रिकाएं डूब रही थीं और उधर सोवियत संघ का भी पराभव होने को था । हंस ने हिन्दी संसार में कायदे की बहसों को फ़िर जीवन दिया और एक के बाद एक बढिया कहानियां उस्में आने लगी। फ़िर मौसम में बद्लाव दिखाई देने लगा और राजनीति के साथ साहित्य में भी दलित आहट हुई। ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहन्दास नैमिशराय,सूरजपाल चौहान और श्योराज सिंह बेचैन जैसे लेखक परिदृश्य पर उभर रहे थे, कहना न होगा कि हंस ने इस दलित विमर्श को ज़मीन प्रदान की । इसके साथ साथ स्त्री विमर्श का सिलसिला भी शुरू हुआ और हंस ने लवलीन, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका, सुधा अरोड़ा के साथ अनेक नयी लेखिकाओं के लिये मंच तैयार कर दिया । क्या राजेन्द्र यादव को ऐसा नहीं करना चाहिये था? क्या उन्हें खलनायक माने जाने चाहिये क्योंकि उन्होंने हाशिये के लोगों को साहित्य के सभागार में आदरपूर्वक बैठने की जगह दी और इससे मार्क्सवाद की शाश्वत लड़ाई को धक्का लगा। ये वे विमर्श थे जो उत्तर आधुनिक मुहावरे में अपनी जगह मांगते थे बल्कि कहना चाहिए कि अपनी जगह इन्होंने खुद आगे बढकर ले ली । राजेन्द्र यादव इस ऐतिहासिक क्षण में दलितों और स्त्रियों के लिए हंस में स्वागत कर रहे थे और उनके पक्ष में जिरह कर रहे थे, पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद से लड़ाई लड़ रहे थे। अपने समय का नायक वह होता है जो अपने समय के असली संघर्षों को पहचाने और उन्हें सही दिशा दे, राजेन्द्र यादव ने दलित और स्त्री विमर्श के लिये यह भूमिका निभाई। लड़ाई उनके स्वभाव का स्थाई भाव था। हिन्दी कहानी का इतिहास जानने वाले पाठकों को मालूम है कि नयी कहानी के हक़ में उन्होंने कितनी लड़ाइयां मोल ली थीं और कितने दुश्मन बनाए थे। हंस के माध्यम से यह काम आगे भी वे जीवन भर करते रहे। काशीनाथ सिंह के कथा रिपोर्ताज़ छापे तो गालियों के कारण कोहराम मचा-राजेन्द्र यादव फ़िर लेखक और लेखन के पक्ष में थे, तसलीमा का मामला हो या हिन्दी पट्टी की जड़ता के कारण –हंस अपने समय का वैचारिक दीपक बनने की कामयाब कोशिश करता रहा। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिये कोई भी जोखिम उठाने की तत्परता उन्हें सचमुच बड़ा बनाती है। बड़ा सम्पादक और लेखक ही नहीं बड़ा मनुष्य भी ।
विचारों की स्वतन्त्रता के कारण ही उनका अपना वैवाहिक जीवन समाप्तप्राय: हो गया लेकिन वे अडिग थे तब भी जब सारे ज़माने ने उन्हें इसके लिये कोसा और ‘लम्पट’ तक कहा। मैं सोचता हूं कि क्या हम एक आदमी भी ऐसा नहीं बना सकते जो अपनी शर्तों पर जिन्दगी जीने की हिम्मत रखता हो। उनका अपना लेखन भी तमाम इसी तरह की चुनौतियों को स्वीकार करता हुआ लेखन है। भारतीय समाज के छ्द्म और पाखंड से वही लेखक लड़ सकता है जो स्वयं अपने जीवन में इनसे लड़ने का साहस रखता हो । राजेन्द्र यादव को इस कसौटी पर हमेशा कसा गया और वे हरदम कसे जाने के लिए तैयार रहे । हम नहीं जानते कि हिन्दी साहित्य के पाठक भविष्य में भी बने रहेंगे लेकिन यह तय है कि हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के सबसे चमकदार नामों की सूची में राजेन्द्र यादव का नाम बहुत ऊपर होगा।

लगभग एक दर्जन मूल किताबों और दो दर्जन सम्पादित किताबों के धनी राजेन्द्र जी ने प्रकाशन की हिम्मत भी की थी और ‘अक्षर प्रकाशन’ उनका ऐसा सपना था जो सहकारी ढंग से लेखकों की किताबें छापे और समुचित रायल्टी भी दे, यह कोशिश बहुत लम्बी नहीं चल सकी लेकिन अपनी सुरुचि और गुणवत्तापूर्ण किताबों के लिये ‘अक्षर प्रकाशन’ को याद किया जाता रहेगा।

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

हम सब दाभोलकर ! सुभाष गाताडे


अंधश्रद्धा के खिलाफ संघर्षरत एक संग्रामी की शहादत




‘‘जिन्दगी जीने के दो ही तरीके मुमकिन हैं। पहला यही कि कोई भी चमत्कार नहीं। दूसरा, सबकुछ चमत्कार ही है’’
- अलबर्ट आइनस्टाइन

लब्जों की यह खासियत समझी जाती है कि वे पूरी चिकित्सकीय निर्लिप्तता के साथ ग्राही/ग्रहणकर्ता के पास पहुंचते हैं। यह ग्राही पर निर्भर करता है कि वह उनके मायने ढंूढने की कोशिश करे। बीस अगस्त की अलसुबह पुणे की सड़क पर अंधश्रद्धा विरोधी आन्दोलन के अग्रणी कार्यकर्ता डा नरेन्द्र दाभोलकर की हुई सुनियोजित हत्या की ख़बर से उपजे दुख एवं सदमे से उबरना उन तमाम लोगों के लिए अभीभी मुश्किल जान पड़ रहा है, जो अपने अपने स्तर पर प्रगति एवं न्याय के संघर्ष में मुब्तिला हैं।

पुणे के निवासियों के एक बड़े हिस्से के लिए मुला मुठा नदी के किनारे बना आंेकारेश्वर मंदिर वह जगह हुआ करती रही है जहां लोग अपने अन्तिम संस्कार के लिए ले लाए जाते रहे हैं। इसे विचित्रा संयोग कहा जाएगा कि उसी मन्दिर के ऊपर बने पूल से अल सुबह गुजरते हुए डा नरेन्द्र दाभोलकर ने अपनी झंझावाती जिन्दगी की चन्द आखरी सांसें लीं। एक जुम्बिश ठहर गयी, एक जुस्तजू अधबीच थम गयी। मोटरसाइकिल पर सवार हत्यारे नौजवानों द्वारा दागी गयी चार गोलियों में से दो उनके सिर के पिछले हिस्से में लगी थी और वह वहीं खून से लथपथ गिर गए थे।

अपनी मृत्यु के एक दिन पहले शाम के वक्त मराठी भाषा के सहयाद्री टीवी चैनल पर उपस्थित होकर वह जातिपंचायतों की भूमिका पर अपनी राय प्रगट कर रहे थे। उस वक्त किसे यह गुमान हो सकता था कि उन्हें सजीवअर्थात लाइव सुनने का यह आखरी अवसर होनेवाला है। यह पैनल चर्चा नासिक जिले की एक विचलित करनेवाली घटना की पृष्ठभूमि में आयोजित की गयी थी, जहां किसी कुम्हारकर नामक व्यक्ति द्वारा अपनी जाति पंचायत के आदेश पर अपनी बेटी का गला घोंटने की घटना सामने आयी थी। वजह थी उसका अपनी जाति से बाहर जाकर किसी युवक से प्रेमविवाह। चर्चा में हिस्सेदारी करते हुए डा दाभोलकर बता रहे थे कि किस तरह उन्होंने हाल के दिनों में अन्तरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए सम्मेलन का आयोजन किया था और इसी मसले पर घोषणापत्र भी तैयार किया था।

एक बहुआयामी व्यक्ति - प्रशिक्षण से डाक्टरी चिकित्सक, अपनी रूचि के हिसाब से देखें तो लेखक-सम्पादक एवं वक्ता और एक आवश्यकता की वजह से एक आन्दोलनकारी, यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पूरे मुल्क के तर्कशील आन्दोलन के लिए वह एक अद्भुत मिसाल थे और अपने संगठन एवं उसकी 200 से अधिक शाखाओं के जरिए सूबा महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं गोवा में जनजागृति के काम में लगे थे। बहुत कम लोग जानते थे कि अपने स्कूल-कालेज के दिनों में वह जानेमाने कब्बडी के खिलाड़ी थे, जिन्होंने भारतीय टीम के लिए मेडल भी जीते थे। हालांकि उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरूआत डाक्टरी प्रैक्टिस से की थी, मगर जल्द ही वह डा बाबा आढाव द्वारा संचालित एक गांव, एक जलाशय (पाणवठा)नामक मुहिम से जुड़ गए थे। विगत दो दशक से अधिक समय से वह अंधश्रद्धा के खिलाफ मुहिम में मुब्तिला थे।

डा दाभोलकर की प्रचण्ड लोकप्रियता का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके मौत की ख़बर सुनते ही महाराष्ट्र के तमाम हिस्सों में स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन हुएऔर उनके गृहनगर सातारा में तो जुलूस में शामिल हजारों की तादाद ने जिन्दगी के सत्तरवें बसन्त की तरफ बढ़ रहे अपने नगर के इस प्रिय एवं सम्मानित व्यक्ति को अपनी आदरांजलि दे दी। 21 अगस्त को पुणे शहर में सभी पार्टियों के संयुक्त आवाहन पर बन्द का आयोजन किया गया।

राजनेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक सभी ने डाॅक्टर दाभोलकर को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। उन्हें किस हद तक विरोध का सामना करना पड़ता था इस बात का अन्दाज़ा इस तरह लगाया जा सकता है कि विगत अठारह साल से महाराष्ट्र विधानसभा के सामने एक बिल लम्बित पड़ा रहा है जिसका फोकस जादूटोना करनेवाले या काला जादू करनेवाली ताकतों पर रोक लगाना है। रूढिवादी हिस्से के विरोध को देखते हुए इस बिल में आस्था क्या है या अंधआस्था किसे कहेंगे इसको परिभाषित करने से बचा गया था और सूबे में व्यापक पैमाने पर व्यवहार में रहनेवाली अंधश्रद्धाओं को निशाने पर रखा गया था। ऐसी गतिविधियां संज्ञेय एवं गैरजमानती अपराध के तौर पर दर्ज हों, ऐसे अपराधों की जांच के लिए या उन पर निगरानी रखने के लिए जांच अधिकारी नियुक्त करने की बात भी इसमें की गयी थी।

महाराष्ट्र प्रीवेन्शन एण्ड इरेडिकेशन आफ हयूमन सैक्रिफाइस एण्ड अदर इनहयूमन इविल प्रैक्टिसेस एण्ड ब्लैक मैजिकशीर्षक इस बिल का हिन्दु अतिवादी संगठनों ने लगातार विरोध किया है, पिछले दो साल से वारकरी समुदाय के लोगों ने भी विरोध के सुर में सुर मिलाया है। और इन्हीं का हवाला देते हुए इस अन्तराल में सूबे में सत्तासीन सरकारों ने इस बिल को पारित नहीं होने दिया है। आप इसे डा दाभोलकर की हत्या से उपजे जनाक्रोश का नतीजा कह सकते हैं या सरकार द्वारा अपनी झेंप मिटाने के लिए की गयी कार्रवाई कह सकते हैं कि कि इस दुखद घटना के महज एक दिन बाद महाराष्ट्र सरकार के कैबिनेट में इस बिल को लेकर एक अध्यादेश लाने का निर्णय लिया गया है।

निःस्सन्देह उनकी हत्या के पीछे एक सुनियोजित साजिश की बू आती है। आखिर किसने ऐसे शख्स की हत्या की होगी जिसने महाराष्ट्र की समाजसुधारकों की - ज्योतिबा फुले, महादेव गोविन्द रानडे या गोपाल हरि आगरकर - विस्मृत हो चली परम्परा को नवजीवन देने की कोशिश की थी ?

कई सारी सम्भावनाएं हैं। यह सही है कि उनके कोई निजी दुश्मन नहीं थे मगर अंधश्रद्धा के खिलाफ उनके अनवरत संघर्ष ने ऐसे तमाम लोगों को उनके खिलाफ खड़ा किया था, जिनको उन्होंने बेपर्द किया था। तयशुदा बात है कि ऐसे लोग कारस्तानियों में लगे होंगे। राजनीति में सक्रिय यथास्थितिवादी शक्तियों के लिए भी उनके काम से परेशानी थी। पुलिस ने कहा कि वह इन आरोपों की भी पड़ताल करेगी कि इसके पीछे सनातन संस्था और हिन्दू जनजागृति समिति जैसी अतिवादी संस्थाओं का हाथ तो नहीं है, जिसके सदस्य महाराष्ट्र एवं गोवा में आतंकी घटनाओं में शामिल पाए गए हैं। इस बात को रेखांकित करना ही होगा कि कई भाषाओं में प्रकाशित अपने अख़बार सनातन प्रभातके जरिए इन संस्थाओं ने डा दाभोलकर के खिलाफ जबरदस्त मुहिम चला रखी थी, इतनाही नहीं उन्होंने दाभोलकर के ऐसे फोटो भी प्रकाशित किए थे, जिसे लाल रंग से क्रास किया गया था, जिसमें उनकी सांकेतिक समाप्ति की तरफ इशारा था।

डा दाभोलकर को दी अपनी श्रद्धांजलि में लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक आनन्द तेलतुम्बडे लिखते हैं कि ((http://www.countercurrents.org/teltumbde230813.htm)
 ‘..दाभोलकर की हत्या के बाद भी सनातन संस्था ने उनके प्रति अपनी घृणा के भाव को छिपाया नहीं बल्कि अगले ही दिन जबकि पूरा राज्य दुख एवं सदमे में था, उन्होंने अपने मुखपत्रा में लिखा कि यह ईश्वर की कृपा थी कि दाभोलकर की मृत्यु ऐसे हुई। गीता को उदधृत करते हुए लिखा गया कि जो जनमा है, उसकी मृत्यु निश्चित है, जन्म एवं मृत्यु हरेक की नियति के हिसाब से होते हैं। हरेक को अपने कर्म का फल मिलता है। बिस्तर पर पड़े पड़े बीमारी से मरने के बजाय, डा दाभोलकर की जो मृत्यु हुई वह ईश्वर की ही कृपा थी।’..इतनाही नहीं इस हत्या से अपने सम्बन्ध से इन्कार करने के लिए बुलायी गयी प्रेस कान्फेरेन्स में उन्हें यह कहने में भी संकोच नहीं हुआ कि वह दाभोलकर की लाल रंग से क्राॅस की गयी तस्वीर की तरह कई अन्यों की तस्वीरें भी प्रकाशित करेंगे। कहने का तात्पर्य कि जो दाभोलकर की राह चलेगा उन्हें वह नष्ट करेंगे।

ऐसा नहीं था कि डा दाभोलकर को इस बात का अन्दाजा नहीं था कि ऐसी ताकतें किस हद तक जा सकती हैं। उनके परिवार के सदस्यों के मुताबिक उन्हें अक्सर धमकियां मिलती थीं, लेकिन उन्होंने पुलिस सुरक्षा लेने से हमेशा इन्कार किया। उनके बेटे हामिद ने कहा कि ‘‘वे कहते थे कि उनका संघर्ष अज्ञान की समाप्ति के लिए है और उससे लड़ने के लिए उन्हें हथियारों की जरूरत नहीं है।’’ उनके भाई ने अश्रुपूरित नयनों से बताया कि जब हम लोग उनसे पुलिस सुरक्षा लेने का आग्रह करते थे, तो वह कहते थे कि अगर मैंने सुरक्षा ली तो वे लोग मेरे साथियों पर हमला करेंगे। और यह मैं कभी बरदाश्त नहंीं कर सकता। जो होना है मेरे साथ हो।’’

विभिन्न बाबाओं के खिलाफ एवं साध्वियों के खिलाफ भी उन्होंने महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समितिके बैनरतले आन्दोलन चलाया था। एक किशोरी के साथ कथित बलात्कार के आरोपों के चलते इन दिनों सूर्खियां बटोर रहे आसाराम बापू ने पिछले दिनों होली के मौके पर नागपुर में अपने शिष्यों के साथ होली के कार्यक्रम का आयोजन किया था। काफी समय से सूखा झेल रहे महाराष्ट्र में इस कार्यक्रम के लिए लाखों लीटर पीने के पानी के टैंकरों का इन्तजाम किया गया था। समिति के बैनरतले डा दाभोलकर ने इस कार्यक्रम को चुनौती दी और अन्ततः यह कार्यक्रम नहीं हो सका। चर्चित निर्मल बाबा के खिलाफ भी डा दाभोलकर ने पिछले दिनों अपना मोर्चा खोला था। यू टयूब पर आप चाहें तो डा दाभोलकर के भाषण को सुन सकते हैं निर्मल बाबा: शोध आणि बोध। यह वही निर्मल बाबा हैं जिनका कार्यक्रम एक साथ 40 विभिन्न चैनलों पर चलता है जहां लोगों को उनकी समस्याओं के समाधान के नाम पर ईश्वरीय कृपा की सौगात दी जाती है। उनकी समागम बैठकों में 2000 रूपए के टिकट भी लगते हैं।

वर्ष 2008 में डा दाभोलकर एवं अभिनेता एवं समाजकर्मी डा श्रीराम लागू ने ज्योतिषियों के लिए एक प्रश्नमालिका तैयार की और कहा कि अगर उन्होंने तर्कशीलता की परीक्षा पास की तो उन्हें पुरस्कार मिल सकता है। अभी तक इस पर दांवा ठोकने के लिए कोई आगे नहीं आया। वर्ष 2000 में अपने संगठन की पहल पर उन्होंने राज्य के सैकड़ो महिलाओं की रैली अहमदनगर जिले के शनि शिंगणापुर मन्दिर तक निकाली जिसमें महिलाओं के लिए प्रवेश वर्जित था। न केवल रूढिवादी तत्वों ने बल्कि शिवसेना एवं भाजपा के कार्यकर्ताओं ने परम्परा एवं आस्था की दुहाई देते हुए महिलाओं के प्रवेश को रोकना चाहा, उनकी गिरफ्तारियां भी हुईं और फिर मामला मुंबई की उच्च अदालत पहुंचा और सुनने में आया है कि मामला पूरा होने के करीब है।


अपने एक आलेख रैशनेलिटी मिशन फार सक्सेस इन लाइफमें जिसमें उनका मकसद आवश्यक बदलाव के लिए लोगों को प्रेरित करना हैउन्होंने लिखा था:

'परम्पराओं, रस्मोरिवाज और मन को विस्मित कर देनेवाली प्रक्रियाओं से बनी युगों पुरानी अंधश्रद्धाओं की पूर्ति के लिए पैसा, श्रम और व्यक्ति एवं समाज का समय भी लगता है। आधुनिक समाज ऐसे मूल्यवान संसाधनों को बरबाद नहीं कर सकता। दरअसल अंधश्रद्धाएं इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि गरीब एवं वंचित लोग अपने हालात में यथावत बने रहें और उन्हें अपने विपन्न करनेवाले हालात से बाहर आने का मौका तक न मिले। आइए हम प्रतिज्ञा लें कि हम ऐसी किसी अंधश्रद्धा को स्थान नहीं देगें और अपने बहुमूल्य संसाधनों को बरबाद नहीं करेंगे। उत्सवों पर करदाताओं का पैसा बरबाद करनेवाली, कुम्भमेला से लेकर मंदिरों/मस्जिदों/गिरजाघरों के रखरखाव के लिए पैसा व्यय करनेवाली सरकारों का हम विरोध करेंगे और यह मांग करेंगे कि पानी, उर्जा, कम्युनिकेशन, यातायात, स्वास्थ्यसेवा, प्रायमरी शिक्षा और अन्य कल्याणकारी एवं विकाससम्बन्धी गतिविधियों के लिए वह इस फण्ड का आवण्टन करें।'

उनके जीवन की एक अन्य कम उल्लेखित उपलब्धि रही है, विगत अठारह साल से उन्होंने किया साधनानामक साप्ताहिक का सम्पादन, जिसने अपनी स्थापना के 65 साल हाल ही में पूरे किए। जानकार बताते हैं कि जब उन्होंने सम्पादक का जिम्म सम्भाला तो सानेगुरूजी जैसे स्वतंत्राता सेनानी एवं समाजसुधारक द्वारा स्थापित यह पत्रिका काफी कठिन दौर से गुजर रही थी, मगर उनके सम्पादन ने इस परिदृश्य को बदल दिया और आज भी यह पत्रिका तमाम परिवर्तनकामी ताकतों के विचारों के लिए मंच प्रदान करती है।

ठीक ही कहा गया है कि डा दाभोलकर की असामयिक मौत देश के तर्कवादी आन्दोलन के लिए गहरा झटका है। देश में दक्षिणपंथी ताकतों के उभार के चलते पहले से ही तमाम चुनौतियों का सामना कर रहे इस आन्दोलन ने अपने एक सेनानी को खोया है। मगर अतिवादी ताकतों के हाथ उनकी मौत दरअसल उन सभी के लिए एक झटका कही जा सकती है जो देश में एक प्रगतिशील बदलाव लाने की उम्मीद रखते हैं। अब यह देखना होगा कि उनकी मृत्यु से उपजे प्रचण्ड दुख एवं गुस्से को ऐसी तमाम ताकतें मिल कर किस तरह एक नयी संकल्पशक्ति में तब्दील कर पाती हैं ताकि अज्ञान, अतार्किकता एवं प्रतिक्रिया की जिन ताकतों के खिलाफ लड़ने में डा दाभोलकर ने मृत्यु का वरण किया, वह मशाल आगे भी जलती रहे।

प्रतिक्रियावादी तत्व भले ही डा दाभोलकर को मारने में सफल हुए हों, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह से उनकी हत्या हुई है उसने तमाम नए लोगों को भी दिमागी गुलामी के खिलाफ जारी इस व्यापक मुहिम से जोड़ा भी है। यह अकारण नहीं कि महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों पर हुई रैलियों में तमाम बैनरों, पोस्टरों में एक छोटेसे पोस्टर ने तमाम लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था जिस पर लिखा था आम्ही सगले दाभोलकर’ (हम सब दाभोलकर)।

  • जादू टोना विरोधी विधेयक में यह माना जाएगा अपराध
  • भूत भगाने के नाम पर किसी को मारना या पीटना, पर किसी तरह का मंत्र पढ़ने पर पाबन्दी नहीं होगी।
  • चमत्कार के नाम पर दूसरों को धोखा देना या पैसा लेना
  • किसी की जिन्दगी को खतरे में डाल कर अघोरी तरीके का इस्तेमाल करना
  • भानामती, करणी, जारणमरण, गुप्तधन के नाम से अमानवीय काम करना या नरबलि देना
  • दैवी शक्ति का दावा होने के नाम पर डर फैलाना
  • पिछले जन्म में पत्नी, प्रेमिका या प्रेमी होने का दावा कर या बच्चा होने का आश्वासन देकर संबंध बनाना
  • उंगली से आपरेशन का दावा करना
  • गर्भवती महिलाओं के लिंग परिवर्तन का दावा करना
  • भूत पिशाच का आवाहन करते हुए डर फैलाना
  • कुत्ता, बिच्छू, सांप काटने पर दवा देने से मना करके मंत्रा द्वारा ठीक करने का दावा करना
  • मतिमंद व्यक्ति में अलौकिक शक्ति का दावा कर उस व्यक्ति का इस्तेमाल धंधे या व्यवसाय के लिए करना

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सुभाष गाताडे 

जाने माने लेखक और प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता , अंग्रेजी में दो किताबें और हिन्दी में एक किताब प्रकाशित. कुछ अनुवाद भी. हिंदी, अंग्रेजी के अलावा मराठी में भी लेखन. 'न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव' से सम्बद्ध. 

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समयांतर के सितम्बर-२०१३ अंक से साभार 





मंगलवार, 14 मई 2013

अलविदा असग़र साहब!


कारवां दुनिया और इंसानियत के वजूद, पहचान और बेहतरी के वास्ते जब तलक चलता रहेगा, तब तक मौत का कोई फरिश्ता उन्हें छू भी नहीं सकता!

  • पलाश विश्वास


प्रख्यात मुस्लिम विद्वान, प्रतिशील चिंतक, लेखक और दाऊदी बोहरा समुदाय के सुधारवादी नेता असगर अली इंजीनियर का लम्बी बीमारी के बाद यहां मंगलवार को निधन हो गया!

मुंबई के सांताक्रुज रेलवे स्टेशन के एकदम नजदीक न्यू सिल्वर स्टार के छठीं मंजिल पर स्थित सेंटर आफ स्टडी आफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के दफ्तर में अब उनके बेटे इरफान इंजीनियर और तमाम साथियों के लिए सबकुछ कितना सूना सूना लग रहा होगा, यह कोई कल्पना करने की बात नहीं है, वहीं सूनापन, वहीं सन्नाटा हम सबके, इस देश के सभी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक नागरिकों के दिलोदिमाग में छोड़ कर यकायक चल बसे हमारे सहयोद्धा, हमारे सिपाहसालार असगर अली इंजीनियर!


आजीवन अपने विचारों और सक्रियता से वे दुनियाव्यापी एक विशाल कारवां पीछे छोड़ गये हैं, जिसमे हमारे जैसे तमाम लोग हैं और हमारे पास उसी कारवां के साथ चले चलने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं है। कल ही उनका अंतिम संस्कार हो जाना है, जैसा कि परिजनों ने बताया लेकिन उनके बनाये हुए कारवां में उनके साथ संवाद का सिलसिला शायद कभी खत्म नहीं होगा और यह कारवां दुनिया और इंसानियत के वजूद, पहचान और बेहतरी के वास्ते जब तलक चलता रहेगा, तब तक मौत का कोई फरिश्ता उन्हें छू भी नहीं सकता। यकीनन यह हम पर है कि हम उन्हें कब तक अपने बीच जिंदा और सक्रिय रख पाते हैं! यह देशभर के लोकतांत्रिक औऱ धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए चुनौती है और शायद उनके लिए भी जो अपने को गांधी का अनुयायी कहते हैं।जिस गांधीवाद का अभ्यास इंजीनियर साहब करते थे , वह सत्ता हासिल करने वाला गांधीवाद नहीं है, दुनिया को गांव देहात और आम आदमी की सहजता सरलता से देखने का गांधीवाद है। 

इंजीनियर साहब न मौलवी थे न कोई मुल्ला और न ही उलेमा। पर इस्लामी मामलों में अरब देशों में भी उनकी साख बनी हुई थी। उन्होने साम्य, सामाजिक यथार्थ और इंसानियत के जब्जे से लबालब एक वैश्विक मजहब, जिसका आधार ही भाईचारा और जम्हूरियत में है, कट्टरपंथ में नहीं, समझने और आजमाने की नयी दृष्टि, नया फिलसफा देकर हमें उनका मुरीद बना दिया।गांधी ने यह प्रयोग बेशक किया कि धर्म से देश जोड़ने का काम करते रहे वे तजिंदगी और उनके जीते जी धर्म के ही कारण देश टुकड़ों में बंट भी गया। लेकिन फिरभी उनके पक्के अनुयायी हमें बताते रहे कि मजहब को फिरकापरस्ती के खिलाफ मजबूत हथियार कैसे बनाया जा सकता है।

मुझे बहुत संतोष है कि मुंबई में असगर साहब और राम पुनियानी जी की छत्रछाया में मेरे बेटे एक्सकैलिबर स्टीवेंस को काम करने का मौका मिला। सेक्युलर प्रेसपेक्टिव दशकों से हम लोगों के पाठ्य में अनिवार्यता बनी हुई थी। इस बुलेटिन में जो जबर्दस्त युगलबंदी असगर साहब और पुनियानी जी की हो रही थी, उसकी झलक हमारे सोशल माडिया के ब्लागों में इधर चमकने ही लगी थी , बल्कि धूम मचाने लगी थी कि असगर साहब चले गये।पहले तो हम अंग्रेजी में ही उन्हे पढ़ पाते थे, लेकिन इन ब्लागों के जरिये हरदोनिया साहब के अनुवाद मार्फत हमें असगर साहब और पुनियानी जी दोनों को पढ़ने को मिलता रहा है। हाल में पुनियानी जी से इस लेखन के दक्षिण भारतीय भाषाओं में प्रसार पर भी बात हुई, ऐसा कुछ किया जाता कि असगर साहब चले गये।

इसी बीच संघ पिरवार के राम मंदिर आंदोलन फिर शुरु करने और बांग्लादेश में लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्षक्ष आंदोलन के सिलसिले में कई दफा इरफान साहब और पुनियानी जी से बातें हुई और उनके मार्फत हमने असगर साहब से एक अविराम अभियान भारत में धर्मनिरपेक्ष संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए छेड़ने का आग्रह करते रहे। पर आज जब असगर साहब के निधन की खबर मिली तो इराफान को तुरंत फोन मिलाया , वे घर में थे पर फोन पर बात करने की हालत में नहीं थे। परिवार की एक महिला ने बताया कि असगर साहब तो महीनों से बीमार चल रहे थे। इससे बड़े अफसोस की बात नहीं हो सकती। हम मार्च में ही मुंबई के दादर इलाके में हफ्तेभर थे और बहुत नजदीक सांताक्रुज में अपने घर में हमारे बेहद अजीज असगर साहब बीमार पडे थे। हम हाल पूछने भी न जा सकें।इससे ज्यादा अफसोस क्या हो सकता है?

पिछले दशकों में ऐसा ही होता रहा है। अपनी सेहत, परेशानियों और निजी जिंदगी को उन्होंने अपने सामाजिक जीवन में से बेरहमी से काटकर अलग फेंका हुआ था।वे पेशे से इंजीनियर थे और मुंबई महापालिका में काम करते थे।जहां से वे रिटायर हुए। जहां ऐसी भारी समस्याओं से रोजना वास्ता पड़ता था कि कोई मामूली शख्स होते तो उसी में मर खप गये होते हमारे इंजीनियर। पर वे अपने कार्यस्थल पर तमाम दिक्कतों से जूझते रहे और कभी अपने सामाजिक कार्यकलाप में उसकी छाया तक नहीं पड़ने दी। यह उनकी शख्सियत की सबसे बड़ी खूबी थी। अपने रचनाकर्म के प्रति तठस्थ किसी क्लासिक कलाकार की तरह।

छात्रजीवन से उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी से जुड़े होने के कारण सत्तर के दशक से लगातार अविच्छिन्न और अंतरंग संबंध रहा है असगर साहब केसाथ। हिमालय और पूर्वोत्तर भारत, आदिवासीबहुल मध्य भारत के प्रति नस्ली भेदभाव से वे वाकिफ थे। वे पक्के गांधीवादी थे और गांधीवादी तरीके से देश और दुनिया को देखते थे। गांधीवाद के रास्ते ही वे समस्याओं का समाधान सोचते थे। लेकिन सत्तर के दशक के ज्यादातर सामाजिक कार्यकर्ता जो उनसे आजतक जुड़े हुए हैं, ज्यादातर वामपंथी से लेकर माओवादी तक रहे हैं। वे उत्तराखंड आदोलन, झारखंड आंदोलन और छत्तीसगढ़ आंदोलन से हम सबकी तरह जुड़े हुए थे और पर्यावरण आंदोलन के संरक्षक भी थे। हिमालय से उनका आंतरिक लगाव था। पूर्वोत्तर में सशस्त्र सैन्य बल अधिनियम के खिलाफ निरंतर जारी संगर्ष के साथ भी थे वे। वे महज विचारक नहीं थे। विचार और सामाजिक यथार्थ के समन्वय के सच्चे इंजीनियर थे।

हमने सीमांत गाधी को नहीं देखा। पर हमने एक मुसलमान गांधी को अपने बीच देखा . यह हमारी खुशकिस्मत है। खास बात यह है कि गांधीवादी होने के बावजूद जो हिंदुत्व गांधीवादी विचारधारा का आधार है, उसके उग्रतम स्वरुप हिंदू राष्ट्र, हिंदू साम्राज्यवाद और हिंदुत्व राजनीति के खिलाफ उलके विचार सबसे प्रासंगिक हैं।

इस लिहाज से सांप्रदायिक कठघरे से गांधीवाद को मुक्ति दिलाने का काम भी वे कर रहे थे। लेकिन गांधीवादियों ने शायद अभी इसका कोई मूल्यांकन ही नहीं किया।शायद अब करें!

जिस गांधीवाद की राह पर असगर साहब और उनके साथी चलते रहे हैं, वह बहुसंख्य बहुजनों के बहिस्कार के विरुद्ध सामाजिक आंदोलन का यथार्थ है। 

गांधीवाद के घनघोर विरोधियों के भी असगर साहब के साथ चचलने में कभी कोई खास दिक्कत नहीं हुी होगी। हम जब पहली बार मेरठ में मलियाना नरसंहार के खिलाफ पदयात्रा के दौरान मुखातिब हुए, तब उनके साथ शंकर गुहा नियोगी और शमशेर सिंह से लेकर इंडियन पीपुल्स फ्रंट के तमाम नेता कार्यकर्ता, मशहूर फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी समेत तमाम लोग थे, जो गांधीवादी नहीं थे।

हमारा भी गांधीवाद से कोई वास्ता नहीं रहा है और न रहने की कोई संभावना है। असगर साहब यह भली भांति जानते थे। पर लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बनाने में वे किसी भी बिंदु पर कट्टर नहीं थे।

आज जो ढाका में शहबाग आंदोलन के सिलसिले में लोकतांत्रिक ताकतों को जो इंद्रधनुषी संयुक्त मोर्चा कट्टरपंथी जमायत और हिफाजत धर्मोन्मादियों के जिहाद से लोहा ले रहे हैं, उसे असगर साहब के विचारों का सही प्रतिफलन बताया जा सकता है।

हम नहीं जानते कि हम अपने यहां ऐसा नजारा कब देखेंगे जब यह देश धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के खिलाफ मोर्चाबद्ध होगा!

इस सिलसिले में पिछली दफा मराठा पत्रकार परिषद, मुंबई में पिछले ही साल राम पुनियानी जी की एक पुस्तक के लोकार्पण के सिलसिले में जब मुलाकात हुई तो वे सिलसिलेवार बता रहे थे कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की अनिवार्य शर्त इसकी धर्मनिरपेक्षता है, जिसकी हिफाजत हर कीमत पर करनी होगी।उनकी पुख्ता राय थी कि इसी लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष संयुक्त मोर्चा के जरिये ही समता और सामाजिक न्याय की मंजिल तक पहुंचने का रास्ता बन सकता है।

क्या हम उनके दिखाये रास्ते पर चलने को तैयार हैं?

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

सुनील गंगोपाध्याय की कविता में प्रेम वही स्वर्ग का बगीचा है - शंख घोष


सुनील गंगोपाध्याय की मृत्यु के बाद बांग्ला के सबसे वरिष्ठ कवि शंख घोष  का यह लेख आनंदबाजार पत्रिका के 26 अक्तूबर के अंक में प्रकाशित हुआ है। वरिष्ठ लेखक अरुण माहेश्वरी ने जनपक्ष के लिए इसका अनुवाद किया है.




किस प्रकार जी रहे थे*
  • शंख घोष


वे कैसे जी रहे थे, नये समय के पाठक अब इसे सिर्फ उनकी कविता के जरिये जानेंगे।

नये दिनों की कविता कैसी हो सकती है, इसके बारे में नौजवान सुनील को एक बार ठीक पचास साल पहले उनके तभी बने मित्र ऐलेन गिन्सबर्ग ने कुछ बातें लिखी थी। तब अपनेहाउलसे पूरी दुनिया को मुग्ध करने वाले गिन्सबर्ग कोलकाता-वाराणसी के बीच घूमते रहते थे, ‘कृत्तिबास’ˡ के कवियों के साथ एकाकार हो गये थे। उन्हीं दिनों सुनील को उन्होंने लिखा, तुम जो अनुभव करते हो, उसे उसी प्रकार कहते जाना ही आज की कविता का काम है, जहां होगी तुम्हारी तमाम स्वीकारोक्तियां, सभी प्रकार के असंतोष, सभी प्रकार के आवेग।तुम्हारा क्या होना चाहिएकी बिना परवाह किए आज कविता यह जानना चाहती है कि तुम निखालिस क्या हो।

सुनील खुद से वैसी ही एक दिशा में बढ़ना चाहता था, फिर भी लगता है उस चीज ने उनकी बची हुई द्विधाओं को भी तोड़ देने में मदद की थी। तभीअकेला और हम कुछलोगका कवि एक झटके मेंमैं इस तरह जिंदा हूंके वृत्तांत के साथ सामने आया। और, यह वृत्तांत सिर्फ उसकी एक किताब के शीर्षक तक ही सीमित नहीं रहा, यही उसकी शुरू से अंत तक की सारी कविताओं का एक आम परिचय बन  गया। उसकी कविता उसके जीने का एक धारावाहिक बयान है। ऐसे ही, नये समय की भाषा में वे यह बयान करते चले जाते हैं जिसमें अनेक पाठक अपनी आत्म-छवि को देखते है, जिसे खुद से वे देख नहीं पायें थे या शायद देखना नहीं चाहते थे। इसप्रकार, आत्मस्वीकृतियों के जरिये सुनील एक बड़े पाठक समाज की स्वीकृति को तैयार कर पाये थे।

मैं कैसे जी रहा हूं, इसे देखने में आदमी सिर्फ मैं में ही अटक कर रह जाता है, ऐसा नहीं है। हमारे जीने के अंदर जहां हमारी खुद की रोजमर्रे की बातें हैं, वहीं हमारे चारों ओर के लोग, चारों ओर की धरती भी है। वह भी तो मेरा ही अनुभव है, मेरे जीने का ही। तभी भूमध्य सागर के ऊपर से उड़ रहे हवाई जहाज के अंदर अपनी भूख से उपजी चीख के साथ ही जाग उठते हैं सारी दुनिया के भूखें, तभीपीछे जलता हुआ यूरोप, आगे भस्मीभूत काली प्राच्यभूमिदेखे जा सकते हैं। तभी चे ग्वारा की मौत आकर अपराधी बना सकती है मुझे, तभी सड़क के किनारे पड़ी उपेक्षिता को देख कर किसी को अपनी दाई मां की याद सकती है, स्वभूमि के प्रति भाव-विल प्रेम में तभी कहा जा सकता हैयदि निर्वासित करो, मैं होठों पर अंगूरी लगाऊंगा/मैं जहर खाकर मर जाऊंगा’, क्योंकि विषादभरे प्रकाश की इस बांग्लादेश की भूमि को छोड़ मैं कहां जाऊंगा। जबकि सब मिला कर इस देश को, इस धरती को इतना प्यार करने वाला इंसान, अनेक बार खंडित या गलत ढंग से चिन्हित कर दिया जाता है एक निहायत व्यक्ति-केंद्रित रूप में, अतिकामुक इंसान के तौर पर, या निहायत रवीन्द्र-विद्वेषी कवि के रूप में।

अलग अलग कुछ पंक्तियां जरूर इस प्रकार की गलतफहमी का कारण बनती है। जैसे एक बार, भारी शोर मचा थातीन जोड़ा लातों की चोट से रवीन्द्ररचनावली पैर-पोंछने पर लोटने लगीकी तरह की बात को लेकर। तब बहुतों को लगा था, यह तोईश्वरद्रोहहै। खाट पर कुछ किताबें पड़ी थी, संयोग से रवीन्द्ररचनावली ही थी, सो रहे तीन दोस्तों के पैर से लग कर वे जमीन पर गिर गयी, बस इतनी सी बात थी। लेकिन इस घटना को कविता में लाने से क्या बिगड़ जाता? कुछ नहीं बिगड़ता, सिर्फ घटना का बयान नहीं होता, यह बिंब नहीं मिलता। अंदर ही अंदर रवीन्द्र-विद्वेष के बिना क्या कोई वह लाईन लिख सकता था? ऐसा सवाल करने पर उसे इसी इंसान के और एक कथन को बता देना चाहिए : ‘कई दिनों से मन भारी आनंद से भरा हुआ है। सिर्फ रवीन्द्रनाथ की कविता पढ़ रहा हूं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि यह कवि, या और कवि कविता की दुनिया में रवीन्द्रनाथ से काफी दूरी रखना नहीं चाहते थे। निश्चित तौर पर चाहते थे, कई प्रकार से इस दूरी को बनाये रखना चाहते थे। सुनील गंगोपाध्याय के लिये यह दूरीमैं कैसे जी रहा हूंके अहसास की तरह ही थी। रवीन्द्रनाथ ने एक प्रबंध में एकबारजैसे होना अच्छा हैसेजैसा होता आया हैकी ओर जाने की बात लिखी थी। रवीन्द्रनाथ की संपूर्ण जीवनानुभूतियां और साहित्यानुभूतियां इसी ढर्रे पर टिकी हुई थी। और, गिन्सबर्ग की सलाह कि ‘what should be’  leads one astray इसके ठीक विपरीत थी। यह विपरीत ही सुनील केमैं कैसे जी रहा हूंका तर्क था। इसीलिये रवीन्द्रनाथ की कविता को पढ़ कर कुछ दिन मन प्रसन्न रहने पर भी अपने सृजन के क्षण में उसे उस दुनिया से काफी दूर ही रहना पड़ता है।

सुदूर उस दुनिया में, छोटी मासी के वक्ष में मुंह छिपा कर रोते समय वय:संधि के उस काल के सबसे पहले यौन-आनंद की निहायत स्वाभाविक अनुभूति को व्यक्त करने पर इस कवि को एक दिन कितना नहीं धिक्कारा गया था। इसमें शक नहीं कि तीव्र कामुकता उसकी कविता का एक बड़ा संबल था। लेकिन वह वहीं अटके नहीं रह जाते, इसे पार करते हुए प्रेम की दुनिया के एक व्यापक क्षेत्र में अपनी कविता को ले जाते हैं, उसे हम बहुत बार भूल जाते हैं, भूल जाते हैं एक करुण प्रेमी के विल चेहरे को। जहां पहुंच कर कहा जा सकता है रे लड़की, स्वर्ग के बगीचे में भाग-दौड़ करें सुनील गंगोपाध्याय की कविता में प्रेम वही स्वर्ग का बगीचा है। नीरा के प्रेमी के रूप में वे जनप्रिय है, और उनका वह परिचय झूठा नहीं है। लेकिन सिर्फ नीरा नहीं, सिर्फ नारी नहीं, सुनील की कविता में प्रेम फैला हुआ है देश के प्रत्येक बिंदु के लिये, प्रत्येक आदमी के लिये। जैसे निजी जीवन में, उसी प्रकार कविता में, यह प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति, सबसे बड़ा परिचय है। किसी सीमित दायरे में बंधा हुआ प्रेम नहीं, सर्वात्म, सर्वत्र व्याप्त प्रेम।

और इस प्रेम की बात करने के लिये सुनील जिस भाषा, जिस शैली का प्रयोग करते हैं, उससे कविता और गद्य की दुनिया का फासला धीरे-धीरे कम होता जाता है। इस फासले को पूरी तरह से खत्म कर देना ही उनके कविजीवन का एक प्रमुख काम था। आज से लगभग पैतालीस साल पहले की एक निर्जन दोपहरी में किसी मित्र से उन्होंने नयी कविता के रास्ते की खोज की बात की थी। तब अमेरिका के आहेइयो शहर में साल भर के प्रवास के बाद वे लौटे थे, समकालीन विश्वकविता से गहरे परिचय के साथ। तब कहा था: लिरिक का रास्ता अब हमारा रास्ता नहीं है, आज कविता एक अलग गद्य-पथ पर चलेगी। तभी से कम से कम उनकी अपनी कविता उसी रास्ते पर, अति-रहस्य की माया को छोड़ कर, चलने की इच्छा रखती रही।

गद्य-पद्य सब एकाकार होगये, जीवन और सृजन एकाकार होगये, जगा रहता है सिर्फ एक सच, अपने स्वाभाविक रूप में। उनके जीवन-व्यवहार की स्वच्छंदता और आत्म-प्रेरणा उनकी कविता अथवा उनके गतिशील गद्य में अपनी छाप छोड़ जाती है। यह सब पाठक की आंखों के सामने किसी स्वच्छंद जलधारा की तरह बहते चले जाते हैं। किसी समय उस जल में पहाड़ से छलांग लगा कर गिरने की शक्ति थी, उसके बाद धीरे-धीरे वह एक मंथर मृदुल बहाव की ओर बढ़ता गया। तीक्ष्ण पीड़ा गहन वेदना हो गयी।

उसी वेदना के साथ चला गया आज सब-कुछ देखने-चाहने, सब-कुछ को छूने की इच्छा रखने वाला वह प्रेमी इंसान। प्रेम के हीरे के गहने के साथ जिसका जन्म हुआ था, उसका इसप्रकार अचानक चले जाना जैसे पक्षी की आंख में किरकिरी की अस्वाभाविकता को देखते देखते चले जाना है। अब यमुना का हाथ पकड़ कर स्वर्ग के बगीचे में भाग-दौड़ करने का समय है।


1 -‘कृत्तिबास’ - सुनील गंगोपाध्याय, आनंद बागची और दीपक मजुमदार के संपादन में 1953 में निकाली गयी विद्रोही तेवर की बांग्ला कविता की व्यवस्था-विरोधी त्रैमासिक पत्रिका, जिसने आधुनिक बांग्ला कविता को काफी गहराई से प्रभावित किया था।