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शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

स्वयं प्रकाश जी के जन्मदिन पर हिमांशु पंड्या का एक आलेख



आज प्रख्यात कथाकार स्वयं प्रकाश जी का जन्मदिन है. उन्हें इस अवसर पर हमारा सलाम और ढेरों शुभकामनाएँ. कुछ दिन पहले हमने उनकी कहानी 'नेताजी का चश्मा' छापी थी. आज उसी पर लिखा हिमांशु पड्या का एक आलेख.





निसार मैं तिरी गलियों पे ए वतन

          “आये दिन अखबारों के सम्पादकीय,रेडियो,टी.वी.के चैट शो यहाँ तक कि एम टी.वी. पर ऐसे लोग-लेखक,पेंटर,पत्रकार-जिनकी सहज वृत्ति पर भरोसा किया जा सकता था,पाला बदले हुए नज़र आ रहे थे.मेरी हड्डियां काँप उठाती हैं क्योंकि रोजमर्रा की ज़िंदगी से मिले सबक से पीड़ादायक तरीके से यह स्पष्ट होता जाता है कि आपने इतिहास की किताब में जो पढ़ा है वह सही है. फासीवाद का संबंध जितना सरकार से है उतना ही लोगों से है. यह कि इसकी शुरुआत घर से ही होती है.बैठकखानों में. शयनकक्षों में . बिस्तरों पर. परमाणु परिक्षण के बाद के दिनों में अखबारों के शीर्षक थे- ‘आत्मसन्मान का विस्फोट’, ‘पुनरुत्थान का पथ’,’ ‘गौरव की घड़ी’. शिवसेना के बाळ ठाकरे ने कहा,हमने साबित कर दिया है कि अब हम हिंजड़े नहीं रहे. (यह किसने कहा था कि हम थे ? यह सही है कि हममें से काफी महिलायें हैं ,लेकिन जहां तक मुझे जानकारी है, वे वही नहीं होती.) अखबारों को पढकर यह भेद करना मुश्किल हो गया था कि लोग कब वियाग्रा और कब बम की बात कर रहे हैं-हमारे पास अधिक शक्ति और पौरुष है. ( यह हमारे रक्षामंत्री का पाकिस्तान के परीक्षणों के बाद का बयान था.)
   हमें बार बार बताया गया,ये मात्र परमाणु परीक्षण नहीं राष्ट्रवाद के भी परीक्षण हैं.
                                                                                 अरुंधती रॉय
                                                   ‘कल्पनाशीलता का अंत’, ‘न्याय का गणित’, पृष्ठ २१

     ....और इस पुन्सत्त्वयुक्त राष्ट्रवाद के सामने दुबला-पतला , मरियल सा, अपाहिज और ( पानवाले के शब्दों में )पागल कैप्टन खडा है. वह मोर्चे पर नहीं गया, पडौसी मुल्क को गालियाँ बककर उसने अपनी देशभक्ति का इजहार नहीं किया, न अपने नगर की बिगडती दशा से खीझकर सैनिक शासन की वकालत की, दूसरे मजहब ( या जाती या भाषा या लिंग ) के लोगों की राष्ट्रभक्ति को संदेह के घेरे में खडाकर अपनी राष्ट्रभक्ति को पुष्ट भी नहीं किया.( सच तो यह है कि हमें यह भी नहीं पता कि कैप्टन उस धर्म का है या नहीं जिनकी राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की निगाह में असंदिग्ध है.) उसने किया तो बस यह कि अपने लिए एक छोटी सी भूमिका चुन ली और उसे किसी प्रतिदान की अपेक्षा के बिना निभाता रहा. क्या कहेंगे ऐसे व्यक्ति को आप ? देशभक्त ? पुन्सत्त्वयुक्त राष्ट्रवाद के लिए देशभक्ति के पैमाने कुछ अलग हैं. कैप्टन जैसे लोग उसके लिए गौण, फिर अप्रासंगिक और शनैः शनैः अस्वीकार्य हो जाते हैं.

क्या मैं परिस्थितियों को बढ़ाचढ़ाकर पेश कर रहा हूँ ? मैंने इतिहास की किताबों में पढा है कि हिटलर के यातना शिविरों में यहूदियों के बाद आधे यहूदियों,बूढों,बीमारों,अपाहिजों और कमजोरों का नंबर आया था.तेंतीस से उनतालीस के वक्फे में वे क्रमशः गौण,अप्रासंगिक और फिर अस्वीकार्य होते चले गए. यह सब मैंने पढ़ा है देखा नहीं ...पर ..मैंने टी.वी. पर अमीर लोगों को कारों से उतरकर जल रही दुकानों से सामान लूटते देखा है. मैंने हुंकार सुनी है, भारतवर्ष में रहना है तो..., मैंने उस एस.एम.एस. के बारे में सुना है-‘सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते पर सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं.’. मैंने अखबारों की सुर्ख़ियों में पाया है कि इस समय देश के सामने सबसे बड़ी समस्या किसानों की आत्महत्या या विनिवेश के चलते बढ़ रही बेकार नहीं बल्कि अफजल की फांसी है.

    ‘नेताजी का चश्मा’हमारे दैनंदिन जीवन की कहानी है.यह साधारण लोगों की कहानी है जो मिलकर इस राष्ट्र का निर्माण करते हैं.पुन्सत्त्वयुक्त राष्ट्रवाद की वृहत छवि में इन आम लोगों की साधारणता धुंधला जाती है.अट्ठारह सौ सत्तावन की डेढ़ सौवीं सालगिरह बीते ज्यादा अरसा नहीं हुआ. सत्तावन के संग्राम की विशिष्टता यही थी उसमें ‘साधारण’ लोगों ने हिस्सा लिया था.उत्तर औपनिवेशिक इतिहासकारों ने यह क्रूर सच्चाई दिखाई है कि पुनर्जागरण काळ के दौर में धीरे धीरे आमजन के सवाल किनारे होते चले गए और राष्ट्रवाद का एक ऐसा वृहद आख्यान तैयार हुआ जिसमें आमजन की हिस्सेदारी तो थी पर उसके सवालों की नहीं.भगतसिंह और उनके साथी जब ऐसी आज़ादी को अधूरी बता रहे थे जिसमें मेहनतकश जनता के हितों की रखवाली न हो तो वे इन्हीं सवालों को उठा रहे थे.स्वयं प्रकाश की कहानी हौले से इस आम आदमी हमारे सामने ला खडा करती है.कहानी में हमारे नायक का ‘कैप्टन’ नाम पड़ जाना बताता है कि चाहे उपहास में ही सही पर उसे इस नाम से पुकारा जाना इस बात का रेखांकन है कि लोक स्मृति कर्ता को उसका श्रेय अवश्य देती है.

    पुन्सत्त्वयुक्त राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद की इकहरी व्याख्या है. इसमें देश में बांधों से उजाडने वाले या उदारीकरण से बेरोजगार और भूमिहीन बनने वालों की कोई चिंता नहीं है. वहाँ सिर्फ राष्ट्रीय ‘प्रगति’ के शानदार ( खौफनाक ! ) आंकड़े हैं. ये आंकड़े किन राष्ट्र नागरिकों के हकों को रौंदते हुए हासिल किये गए हैं और ये ‘शाइनिंग इंडिया’किस वर्ग का ‘शाइनिंग’है , इस बारीकी में जाने की निगाह इस पुन्सत्त्वयुक्त राष्ट्रवाद के पास नहीं है.इस वर्ग के लिए राष्ट्र की पहचान सिर्फ उसकी सीमा है.शायद ऐसे ही लोगों को ध्यान में रखकर आचार्य शुक्ल ने लिखा था, यदि किसी को अपने देश से प्रेम है तो उसे अपने देश के मनुष्य,पशु,पक्षी,लाता,गुल्म,पेड,पत्ते,वन,पर्वत,नदी,निर्झर सबसे प्रेम होगा, सबको वह चाह भरी दृष्टि से देखेगा, सबकी सुध करके वह विदेश में आंसू बहायेगा. जो यह भी नहीं जानते कि कोयल किस चिड़िया का नाम है, जो यह भी नहीं जानते कि चातक कहाँ चिल्लाता है, जो आँख भर यह भी नहीं देखते के आम प्रणय सौराभपूर्ण मंजरियों से कैसे लड़े हुए हैं, जो यह भी नहीं झांकते कि किसानों के झोंपड़ों के भीतर क्या हो रहा है, वे यदि दस बने ठने मित्रों के बीच प्रत्येक भारतवासी की औसत आमदनी का परता बताकर देशप्रेम का दावा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि, भाइयों ! बिना परिचय का यह प्रेम कैसा ? जिनके सुख-दुःख के तुम कभी साथी न हुए उन्हें तुम सुखी देखना चाहते हो, यह समझते नहीं बनता ! ( चिंतामणि )

   (आचार्य शुक्ल का यह निबंध उस समय का है जब जी.डीपी./जी.एन.पी./औसत आमदनी के नाम पर होने वाले आंकड़ों के छल छद्म को कल्याणकारी अर्थशास्त्र नामक धारा ने आकर बेनकाब नहीं किया था,पर आचार्य शुक्ल ने यह लिखा क्योंकि राष्ट्रवाद के अमूर्तन को उन्हें बेनकाब करना था.)

  कैप्टन चश्मे वाले के योगदान पर सिर्फ हालदार साहब का ही ध्यान गया होगा ऐसा नहीं. और लोग भी उसे देखते और प्रेरणा पाते थे. किसी अनजान शख्स ने सरकंडे का चश्मा बनाकर नेताजी को पहना दिया. चकित कर देने वाला अंत हालदार साहब और पाठकों को भरोसा दिलाता है कि मोतीलाल मास्टर और कैप्टन चश्मेवाले की विरासत चलती रहेगी.
    
यह अनजान नायक कौन है? कहानी संकेत करती है कि वह कोई बच्चा है. इस बच्चे की उपस्थिति पूरी कहानी पर छा जाती है और देर तक हमारे साथ रहती है. मानो यह बच्चा श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ से निकला और चहलकदमी करता हुआ स्वयं प्रकाश की कहानी में आकर आगे बढ़ गया. यह ना तो बड़ों की तरह साहसिक कारनामे करने वाला वीर बालक है जिसके उल्लेख से हमारी ‘बाल’ कहानियां भरी होती हैं. (और जो बच्चों के मन में बचपन के फीकेपन का अहसास पैदा करती हैं) और न ही ऐसा असहाय बच्चा है जिसे कदम कदम पर अहसास कराया जाता है कि अभी वह ‘सच्चा लेकिन कच्चा’ है और उसे जल्दी बड़े होकर भारतमाता की सेवा करनी है. उसने अपनी भूमिका चुन ली है जो बेशक किसी से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है.

स्वयं प्रकाश की एक और कहानी ‘चौथा हादसा’ से प्रेरणा लें तो बेशक वह देश हमारा ही नहीं उसका भी है.
                                                                     

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

'सब राजा के होते हैं और राजा किसी का नहीं होता।'

राशिद अली के विचारोत्तेजक लेख 'इतिहास का ढलान' का पहला भाग 'दरअसल ग़ल्ती इतिहास की नहीं' और दूसरा भाग 'हिंसा इतिहास की दाई है' आप पढ़ चुके हैं। प्रस्तुत है उसका तीसरा भाग और अंतिम भाग।



इसी कड़ी मे वैभव सिंह की पुस्तक इतिहास और राष्ट्रवाद को ले लीजिए. हिंदी नवजागरण के संदर्भ में लिखे इतिहास के इस पूरक पाठ से यह तो पता चलता है कि लेखक ने कितनी मेहनत की है. पर पढ़ने के बाद ऐसा लगता है मानों लेखक ने अभी सिर्फ सामग्रियां जुटाई हैं. इतिहास का पूरक पाठ कहीं पीछे छूट गया है. आम हिंदी लेखकों के साथ यही दिक्कत हैं. वे अक्सर विद्वानों की आदरता के वैभव में खो जाते हैं. पर ऐसे समय में जब शब्द ही नहीं बच पा रहे तो वैभव का काम काफी सराहनीय दिखता है. उन्होंने भारत के इतिहास को लेकर ढ़ेर सारी प्रवृत्तियों का एकजा किया हैण. पुस्तक की शुरुआत होती है-- ओमप्रकाश केजरीवाल की उस विवादास्पद पंक्ति से कि अट्ठारवीं सदी में भारत के पास केवल उसका अतीत था, इतिहास नहीं. आम इतिहासकारों की तरह लेखक भी इसका खंडन करते हैं और ले देकर कल्हण के 'पौराणिक द्वार' पर खड़े हो जाते हैं। आगे वे राजतरंगिनी के बारे में इतिहासकार सतीश चंद्र को उद्धरित करते हैं 'भारत में जिन्हें कभी कभी इतिहास पुराण कहा जाता है, वे इतिहास लेखन की देशी परंपराओं के सूचक हैं। इस परंपरा में न केवल राजाओं की वंश विषयक सारणियां और स्पष्ट ऐतिहासिक आंकड़े थे, बल्कि उनमें एक खास इतिहास दर्शन भी मौजूद था। कल्हण द्वारा बारहवीं सदी में संस्कृत मे लिखा गया कश्मीर का इतिहास राजतरंगिनी ऐतिहासिक विश्लेषण में स्पष्टता और परिपक्वता का प्रदर्शन करता है और भारत में इतिहास लेखन की लंबी परंपरा के ही विकास का संकेत देता है। यहां वैभव बिना किसी आलोचना के ही सतीश चंद्र की ऐतिहासिक दृष्टि को पचा गए। बात रही राजतरंगिनी की तो यह आरंभ ही होती है ब्रहमांडोत्पत्ति के वैदिक सिद्धांत से, ''तब सत्य और असत्य कुछ भी नहीं था। वायुमंडल भी नहीं था और न ही आकाशण। इतना अथाह गहरा जल क्या था? जब विरित्रासुर ने पानी और सूर्य पर कब्जा कर लिया था तो इंद्र ने उसे अपने वज्र से मारा था और अन्य असुरों का भी चुन चुनकर संहार किया था।'' कश्मीर के राजाओं की वंशावलियों में लिपटी राजतरंगिनी इतिहास को लाखों साल पीछे ढ़केल देती है और आज हम इसे साम्राज्यवादी इतिहासकारों को जवाब देने के लिए ऐतिहासिक स्रोत के रूप में आगे करते हैं। मुझे कल्हण की राजतरंगिनी और फिरदौसी के शाहनामा में इसके अलावा और कोई फर्क नजर नहीं आता कि एक को महाकाव्य का दर्जा मिला और दूसरे को 'प्रामाणिक इतिहास' का। दोनों का लेखन काल भी लगभग एक ही समय का है। इतिहास की एक और विडंबना देखिए कि जिस महमूद गजनवी को इतिहासकार ''सोमनाथ के लुटेरे'' के रूप में देखते हैं, उसी के आदेश पर फिरदौसी ने ईरान के बादशाहों का 'इतिहास' लिखा,

बसी रंज बुरदम दर ईं साले सी
अजम जिंदा करदम बेदुन पारसी

(इन तीस सालों में मैने लाखों तकलीफें सहीं लेकिन फारसी के माध्यम से मैने पूरब के इतिहास को जिंदा कर दिया)

महमूद गजनवी और फिरदौसी दोनों ही मुसलमान थे और ईरान के जिन बादशाहों का 'इतिहास' फिरदौसी ने लिखा वे सब के सब पारसी धर्म के मानने वाले थे। यह एक अजब संयोग है कि ''एक ही परंपरा वाले आर्य प्रजाति के राजाओं और बादशाहों का इतिहास एक ही परिवार की अलग अलग भाषाओं में लगभग एक ही काल में लिखा गया'' अगर मान लिया जाए कि राजतरंगिनी भारत के इतिहास लेखन की लंबी परंपरा का ही दस्तावेज है तो हम इसमे से वस्तुनिष्ठ इतिहास की कसौटी पर किन किन चीजों को लेंगे और कौन कौन सी चीजें छांटेंगे। राजतरंगिनी में तो यह भी लिखा है कि 'कश्मीर को केवल अध्यात्म से ही जीता जा सकता है, सैन्य बल से नहीं'। आज अगर हम कश्मीर की मौजूदा हालत पर नजर डालें तो यह कितना क्रूर मजाक लगता है। वहां का इतिहास तो जिंदा है, पर वहां के रहने वाले लोग गायब हो चुके हैं। सिर्फ लापता लोगों का कब्रिस्तान बचा है। क्या उत्तरआधुनिकतावाद में यकीन रखने वाले लोग 'टेक्स्ट' से निकलकर और वहां के कब्रिस्तान में जाकर 'अनुपस्थित की उपस्थिति' को इस अर्थ में भी इस्तेमाल करेंगे?

यहां वैभव खुद इतिहास निर्माण में अतीत के पुराने मिथकों का सहारा ले रहे हैं हालांकि जब वे मैक्समुलर के इतिहास दृष्टि की चर्चा करते हैं, तो बजाप्ता इसका खंडन करते हुए कहते हैं 'इतिहास के बारे में काव्यात्मक अतिश्योक्तियां इतिहास की कठोर तथ्यपरकता व वस्तुनिष्ठता का निषेध करती हैं।' एक तरफ वैभव सिंह हैं तो दूसरी ओर रामधारी सिंह महाकवि महोदय कहते हैं कि 'यह महल साहित्य और दर्शन का है। इतिहास की हैसियत यहां किराएदार की है। इतिहासकार का सत्य नए अनुसंधानों से खंडित हो जाता हैए लेकिन कल्पना से प्रस्तुत चित्र कभी खंडित नहीं होते।' अब समस्या यह है कि दोनों ही लेखक पेशेवर इतिहासकार नहीं हैं, लेकिन इतिहास को लेकर उनके ठीक अलग विचार हैं। संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने भारत की 'गौरवशाली परंपरा' का ऐसा महिमामंडन किया है कि अगर इतिहास की कम जानकारी रखने वाला कोई व्यक्ति इसे पढ़ ले तो उसे परंपरा का लकवा मार जाए। समस्या न काव्यात्मक अतिश्योक्ति की हैए न ही इतिहास की तथ्यपरकता की। समस्या कुछ और ही है। अगर तुलसी और कबीर के काव्यों का सहारा लें तो ऐतिहासिक निरंतरता की गांठ खुलने लगेगी और यह तय हो जाएगा कि इतिहास का भविष्य क्या है और भविष्य का इतिहास कैसे लिखा जाना चाहिए। कबीर ने कहा था 'दसरथ के घर ब्रहमा न जन्मे, ई छलम माया कीन्हां।' कहां थी कबीर की कोई इतिहास दृष्टि? वे तो महज अपने समकालीन समाज की उथल पुथल का जायजा ले रहे थे। उस समय यह कह देना कि राम दशरथ के पुत्र नहीं थे, बहुत बड़ी बात थी। अगर इतिहासकार इस कविता को इतिहास में जगह दे देते, तो आज राम के जन्म की बात ही नहीं होती और बाबरी मस्जिद गिरने से बच जाती। काश कि इतिहास इस तरह के 'कंजेक्चर्स' पर भी चलता। पर ऐसा नहीं हुआ। इसके बदले तुलसी का रामचरित मानस जनमानस की भावनाओं मे अंकुरित होने लगा। पिछले चार सौ सालों से तुलसी की चारपाईयां इतिहास को मृत्युशैय्या पर लिटाकर उसका मातम मना रही हैं, 'मंगल भवन अमंगल हारी.द्रवहूं सो दसरथ अजिर बिहारी।' तुलसीदास यह तो बताते हैं कि राम दशरथ के घर ही पैदा हुए, पर यह कहीं नहीं कहते कि दशरथ का घर ही बाबरी मस्जिद थी। वह तो भला हो हमारे इतिहासकारों का कि आज कबीर के दोहे प्रेमचंद के फटे जूते की तरह अभिजात वर्ग को आह्लादित करने की सामग्री भर बनकर रह गए हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे मंडल के समय वामपंथियों का एक बड़ा तबका रातों रात वर्ग संघर्ष की बेड़ियां तोड़ मनुस्मृति के प्रातःगान की स्तुति करने लगा। फुकूयामा को इतिहास का अंत लिखने की जरुरत नहीं थी। अंत तो तभी हो जाता है, जब इंसान सोचना छोड़ देता है। मार्क्स ने यह भी लिखा था कि जानवरों मे भी चेतना होती है, लेकिन इसे लेकर वे आश्वस्त नहीं हो पाते। तो क्या हमारा पूरा का पूरा समाज ही 'एनिमल फार्म' है?


प्रियंवद भारत विभाजन को ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में तब से देखते हैं, जब मुगल साम्राज्य ढ़लान पर लुढ़क रहा था यानी औरंगजेब की मृत्यु हो चुकी थी और औरंगजेब ने मुगल साम्राज्य अपने तीन पुत्रों में बांट दिया था। इस बात को लेकर प्रियंवद ने यह निष्कर्ष निकाला कि 'देश के विभाजन का यह पहला अभिलेखीय प्रमाण व सोचा समझा प्रयास है।' पहला अभिलेखीय प्रमाण तो ठीक है पर मुगल साम्राज्य देश तो नहीं था। किसका देश? क्या हम उसे आज के हिंदुस्तान के रूप में देखें? इतिहासकार यही भूल तो करते हैं। राष्ट्र की अवधारणा को आधुनिक मानते हुए भी प्राचीन और मध्य काल को उसी चश्मे से देखने लगते हैं। तब तो ऐतिहासिक निरंतरता में आस्था रखने वाले वे लोग भी गलत नहीं होंगे जो पुराण में इतिहास ढ़ूंढ़ते हैं,

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेष्चैव दक्षिणम
वर्शं तदभारतं नाम भारती यत्र संततिः!!
(वायु पुराण)

इस बात को पहले के इतिहासकार भी लिख चुके हैं कि जिस तरह औरंगजेब ने 'भारत विभाजन' की कामना की थी, ठीक वैसे ही पाकिस्तान की भी कल्पना पहले पहल अल्लामा इकबाल के भाषण में प्रकट हुई, जब वे मुस्लिम लीग के सभापति हुए थे। अगर विभाजन की कड़ी ढ़ूंढ़नी ही है तो इतिहास मुगल काल से भी पीछे चला जाएगा, जब राजाओं ने अपने अपने पुत्रों में अपने राज्य की सीमाएं बांटी थीं। अभिलेखीय प्रमाण से क्या होता है। सारा का सारा महाभारत काल ऐसे प्रसंगों से भरा है।

इसके बाद प्रियंवद मुहम्मदशाह रंगीले के संदर्भ में कहते हैं, 'मुहम्मदशाह एक तमाशा बनकर रह गया। देश वस्तुतः कुछ सरदार या फिर किस्सागो, रम्माल, रंडियां और हिजड़े चला रहे थे।' यह बात सौ फीसदी सही है लेकिन जिसे वे चला रहे थे वह मुगल साम्राज्य था। नादिरशाह ने भी जब मुगल साम्राज्य पर हमला किया था, तो एक राजा की हैसियत से। उस समय तक संप्रभू राष्ट्र नहीं होते थे। अगर नादिरशाह को आक्रमणकारी और मुहम्मदशाह को इस 'देश' का नागरिक मान लें तो यह बस इतिहास के प्रति अन्याय होगा। लेखक के अनुसार, 'अगर मुहम्मदशाह ने नादिरशाह के प्रति रूखा रवैया नहीं अपनाया होता तो वह अफगानिस्तान के बाहर से ही लौट जाता। उसका यह व्यवहार वैसा ही था जैसा कि राणा सांगा ने बाबर के साथ किया था' आखिर राणा सांगा ने किया क्या था? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। इतिहास का यही वह 'प्रस्थान बिंदु' है जहां से इतिहासकारों की श्रेणियां बंट जाती हैं। राणा सांगा की सलाह पर बाबर ने लोदी वंश पर हमला किया और उससे भी बड़ा हमला किया राणा सांगा की खाम.ख्याली पर। राणा यही सोचते थे कि लोदी को हराकर और थोड़ा.बहुत लूटपाट कर बाबर वापस लौट जाएगा। पर ऐसा नहीं हुआ। नतीजतन अगले साल ही खानवा की लड़ाई हुई और राणा सांगा को मुंह की खानी पड़ी। बाबर का यूं दिल्ली पर बैठ जाना इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में एक है। इसने भावी इतिहास की दिशा भी तय कर दी। बाबर के विदेश नीति की तुलना मैकियावेली के शासन पद्धति से करते हुए ई एम फोसर्टर ने एक बड़ी ही दिलचस्प बात लिखी है, 'जब मैकियावेली अपने प्रिंस के लिए सामग्रियां जुटा रहे थे, तो एक लुटेरा बालक मध्य एशिया में अपनी फतह का झंडा लहराता चला जा रहा था।' बाबर को लुटेरा घोषित करने के बाद फोसर्टर कहते हैं, 'शायद जीवन का त्याग करने के अलावा बाबर की जिंदगी में भारतीयता का और कोई अंश नहीं था।' यह बात उन्होंने हुमायुं के बीमार पड़ जाने के बाद बाबर के खुदा से दुआ करने के संदर्भ में लिखी है। ठीक यही बात मैक्समुलर ने भी कही थी, 'मुस्लिम शासन के आतंक और डर के विवरणों को पढ़ने के बाद मुझे इस बात से हैरत होती है कि कैसे हिंदुओं में गुण और सत्यवादिता बची रह सकती है।' इन लेखकों को उद्धरित करने के पीछे मेरा सिर्फ इतना मकसद है कि ये अन्य यूरोपीय लोगों की तरह नहीं थे। भारत को 'संपेरों का देश' नहीं कहते थे। तभी भी इतिहास दृष्टि में कोई फर्क नहीं था। एशिया और अफ्रीका उनके साहित्य के लिए बस 'सृजनात्मक प्रक्रिया' का काम करते थे।

मजे की बात यह है कि फोसर्टर जब भ्रमण को आए थे तो अपने अनुभवों को उन्होंने उपन्यास की शक्ल दे दी..ए पैसेज टू इंडिया। यह टाइटल उन्होंने वाल्ट विटमैन की कविता 'पैसेज टू इंडिया' से लिया था जिसमें कहा गया था कि 'इस बेजान सी धरती पर एक दिन सबकुछ ठीक हो जाएगा। ईश्वर की सच्ची संतान इसे ठीक कर देगी।' यहां ईश्वर की सच्ची संतान कौन है? शायद रुडयार्ड किपलिंग!!! उनकी कविता व्हाइटमैन्स बर्डन में गोरों का काम ही यही था।

ए पैसेज टू इंडिया का नायक एक मुसलमान है। ए पैसेज टू इंग्लैंड के लेखक नीरद सी चौधरी को इस बात से बहुत ही आपत्ति थी। उनके विचार में इस उपन्यास का नायक किसी हिंदू को होना चाहिए था। लेकिन किस हिंदू को? उस हिंदू को जिसे वे ग्रीक माइथोलॉजी का हवाला देकर 'सूअर' जैसे शब्दों से नवाजते हैं या उस वैदिक हिंदू को जिसका वे महिमामंडन करते हैं। उनके लिए तो पूरा भारत बस कांटीनेंट ऑफ सिर्स ही तो था।

भारतीय इतिहास लेखन की मूल कमजोरी यह भी है कि यह इतिहास के कुछ पात्रों को देवता बना देता है और कुछ को असुर। अशोक, खुसरो, अकबर, विवेकानंद, महात्मा गांधी देवताओं की श्रेणी में आते हैं, जबकि जयचंद, औरंगजेब, गोरी, गजनवी इत्यादि विलेन बने हुए हैं। इतना पारदर्शी तो शीशा भी नहीं होता, जितना यहां का इतिहास है। पर सवाल यह है कि क्या अमीर खुसरो की कृतियों मे सांप्रदायिकता की बू नहीं आती? क्या औरंगजेब मस्जिदें नहीं तुड़वाता था? शिवप्रसाद सितारेहिंद के इतिहासलेखन का हवाला देते हुए वैभव लिखते हैं कि 'अकबर जैसे सहिष्णु और उदार व्यक्ति की प्रशंसा से समन्वयवादी दृष्टि नहीं, बल्कि इतिहास की सांप्रदायिक दृष्टि ही मजबूत होती है।'

दूसरी बात यह कि इतिहास लिखने के क्रम में धर्म को उसकी पूरी समग्रता में देखा गया है जबकि एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के साथ सारे धर्मों का विकास ruptures मे में हुआ है। यह कोई हिंदू और मुस्लिम संस्कृति के समन्वय की बात नहीं है। धर्म चाहे हिंदू हो या इस्लाम, आज के विस्तार से बहुत पहले एक खास भौगोलिक और सामाजिक परिवेश में पैदा हुए, कई बार नष्ट हुए और फिर से पैदा हो गए। राजा किसी धर्म का प्रचार नहीं करते थे, बल्कि अपने राज्य का विस्तार करने के लिए धर्म का इस्तेमाल करते थे। बाबर ने भी यही किया था। ये साहब खुद शराब पीते थे और जब किसी जंग में इनके सिपाहियों के पैर उखड़ते थे तो खुद भी शराब से तौबा कर लेते थे और मजहब का नाम लेकर अपने सिपाहियों में एक नया जुनून पैदा कर देते थे। अब सिपाही तो सिपाही ठहरे। बादशाह के हुक्म के आगे उनकी बिसात कहां। वैसे भी हमारी ही तरह इन सिपाहियों के भी घर.परिवार होंगे, जिनसे बिछड़ने का दुख उन्हें हमेशा सालता होगा। अपने परिवार से मिलने की हड़बड़ी में अपने दुश्मनों पर टूट पड़ते होंगे। इन लोगों का धर्म कितना कमजोर था और आज के इतिहासकार उन्हें 'इस्लामी आताताई' कहते हैं। ठीक वैसे ही बाबर और इब्राहीम लोदी के धर्म में कितनी समानता थी? अब हुमायूं को लीजिए। शेरशाह ने जब इन्हें जिलावतन किया तो ईरान जाकर शिया बन गए। इतिहास में कितने ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि बाप का संप्रदाय कुछ और, बेटे का कुछ और और पोते का कुछ और! वैसे ही निजामुद्दीन औलिया और गियासुद्दीन तुगलक ही धर्म के मामले में कितने करीब थे? दोनों के ही धर्मों की 'दिल्ली' बहुत दूर थी। बेचारा गियासुद्दीन पहला मुस्लिम शासक होगा जो किसी 'हिंदु ऋषि' के नहीं, बल्कि एक मुसलमान सूफी के श्राप का शिकार हुआ होगा। 'हनूज दिल्ली दूर अस्त' . फारसी भाषा में निजामुद्दीन द्वारा दिया गया यह श्राप आज मुहावरे में बदल चुका है, और इसका इस्तेमाल लखनऊ के रहने वाले लोग भी उसी शिद्दत से करते हैं, जितना लाहौर के। तो क्या भाषा में 'केंद्र' सचमुच विस्थापित हो जाता है जैसा कि देरीदा कहते हैं। समय कितना उलट फेर कर सकता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चंगेज खान के वंशज कालांतर में बौद्ध, इस्लाम और इसाई तीनों ही धर्मों के अनुयायी बन गए अर्थात्.

''हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए
एक ही जुल्फ के असीर हुए''

इतिहासकार मानते हैं कि औरंगजेब की हिंदू नीतियों की वजह से ही देश में विभाजन का फूट पड़ा. हैरत की बात है कि यह वही राजा था जिसकी उंगलियां फुरसत के वक्त वीणा पर थिरकने लगती थीं और जब वह मर रहा था तो यही उंगलियां तस्बीह के दानों पर थीं। तब कैसे एक 'कट्टर सुन्नी मुसलमान' की खुदा के यहां होगी, जिस मजहब में संगीत हराम है। तब तो शेख अहमद सरहिंदी की रूह जरुर कुलबुला रही होगी क्योंकि अक्सर इतिहासकार औरंगजेब को उन्हीं का वंशज बताते हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि अगर दारा शिकोह सत्ता पर काबिज होता तो आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता! मान लीजिए कि 'भारत' में अगर मुसलमान ही न आए होते तो क्या होता? कैसा होता भारत का इतिहास? प्राच्यविद् भारत की अनुशंसा कैसे करते? यह एक ऐसा होमवर्क है जिसे हम सब को पूरा करना चाहिए। कम से कम दिलचस्पी की वजह से बच्चे क्लास में बोर नहीं होंगे। मेरे ख्याल से अगर मुसलमान न आए होते तब भी पाकिस्तान (किसी और नाम से) जरुर बनता। हो सकता है कश्मीर (जैसे तिब्बत) के बौद्ध धर्मावलंबी एक अलग कश्मीर की मांग कर रहे होते। हो सकता है जर्मनी से फिलिस्तीन भागने के बजाए वहां के यहूदी भारत आ गए होते और गुजरात में मुसलमानों के बदले पारसियों का कत्ले आम हुआ होता। कुछ भी हो सकता है क्योंकि ज्यादातर इतिहास तो इन्हीं conjectures पर ही लिखा गया है।

इतिहासकारों का यह भी मानना है कि सांप्रदायिकता एक विचारधारा के रूप में ब्रिटिश काल में प्रस्फुटित हुई। इसके लिए वे अंग्रेजी नीतियों को जिम्मेवार ठहराते हैं और इसे साम्राज्यवादी षडयंत्र मानते हैं। पर इतिहासकार ब्रिटिश काल के पहले के कलह को किस रूप में देखते हैं? अगर यह कलह न होती तो मध्यकाल में नानक पंथ कभी नहीं उपजता और गुरु गोविंद सिंह के समय तक सिक्ख धर्म में परिवर्तित नहीं होता। सीधी सी बात है जब दो संस्कृतियां आपस में मिलती हैं, तो समंवय के साथ साथ टकराव की स्थिति भी उत्पन्न होती है। राष्ट्रवादी इतिहासकार इसे 'हिंदू सभ्यता पर अतिक्रमण' के रूप में देखते हैं, वहीं प्रगतिशील इतिहासकार इस बात पर कन्नी काटने लगते हैं। इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि कुछ मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं पर जजिया लगाया था और उन पर ढ़ेर सारी पाबंदियां आयद कर दी थीं, मसलन हिंदू खुलेआम बुतपरस्ती नहीं कर सकते थे, मुसलमानों के कब्रिस्तान के पास दाह.संस्कार नहीं कर सकते थे, मुसलमानों का पहनावा नहीं अपना सकते थे, अपने किसी मृतक के लिए ऊंची आवाज में शोक प्रकट नहीं कर सकते थे। ये सारी बातें सिलसिलेवार ढ़ंग से शेख हमदानी ने अपनी किताब जखीरतुल मुल्क में लिख दी हैं। हैरत की बात है कि ये सारी पाबंदियां वैसी ही थीं जो ब्राहम्णों ने शूद्रों के लिए जारी की थी। जैसा कि रेमंड विलियम्स ने लिखा है कि 'इतिहास की कोई एक धारा नहीं होती।, उसी तर्ज पर एक तरफ तो मुस्लिम शासक हिंदुओं पर जुल्म ढ़ा रहे थे, वहीं 'निम्न जाति' के लोग ब्राहम्णों से तंग आकर इस्लाम अपना रहे थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि मुसलमानों के अंदर तारीखनवीसी का जो भाव था वह हिंदू इतिहासकारों की तरह ही जेम्स मिल के उपयोगितावादी दर्शन से प्रेरित थाण् दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह शुद्ध रूप से anachoronism।नी कालदोष था। कहां जियाउद्दीन बर्नी और कहां जेम्स मिल! बादशाहों की खैरात पर लिखे गए इतिहास में बादशाह के धर्म का महिमामंडन आखिर क्यों न होगा। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह कि उस समय के कट्टर मुस्लिम उलेमा सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ नहीं थे बल्कि शिया और सूफी मत के लोगों को भी उसी कहर भरी नजर से देखते थे। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद 'अनल हक' की आवाज सूली पर नहीं चढ़ी होती और आज पाकिस्तान में शियाओं की (बाबरी) मस्जिदों पर फिदायीन हमले नहीं होते। चौथी बात यह कि मुसलमानों के अंदर गुलाम रखने का एक बड़ा ही संगीन रिवाज था। इन गुलामों का हाल रोमन साम्राज्य के गुलामों जैसा तो नहीं था लेकिन गुलाम तो गुलाम ठहरे। इतिहास का एक और बड़ा उलट.फेर देखिए कि सल्तनत काल में गुलाम वंश का आधिपत्य हो गया और गुलामी से अपने करियर की शुरुआत करने वाले कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश और बलबन 'कुलीनता' के चेहरे पर कालिख मलते हुए बादशाह बन बैठे। पर ऐसा नहीं था कि गुलामों के राजा बन जाने से उस समय का 'समाजवाद' आ गया हो। जैसा कि रमाशंकर विद्रोही कहते है कि 'सब राजा के होते हैं और राजा किसी का नहीं होता।' ठीक ऐसा ही हुआ।

इतिहास की 'प्रयोगशाला' में मैं इन बातों का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मध्यकाल कोई आदर्श काल नहीं था और न ही प्राचीनकाल। सिर्फ ब्रिटिश काल पर ही दोष मढ़ देने से कुछ नहीं होगा। सांप्रदायिकता विचारधारा के तौर पर न सही, पर मध्यकाल में थी तो जरुर। चलिए सहूलियत के लिए हम इसे संप्रदायवाद कह लेते हैं। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें राजा और रियाया में फर्क करना होगा।

कितना अदभुत संयोग है कि एक तरफ मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को मारकर उससे सत्ता छीन ली वहीं दूसरी तरफ लगभग साठ सालों बाद हलाकू ने बगदाद पर चढ़ाई कर अब्बासी खलीफा अल मुसतकीम का कत्ल कर दिया। अब कातिल कौन और मकतूल कौन? डी डी कोशांबी ने कितना सच कहा था कि 'इतिहास का स्वर्णकाल अतीत में नहीं, बल्कि भविष्य में होता है।'

विभाजन की कड़ी को तलाशते हुए जब प्रियंवद 1857 में घुसते हैं तो उनकी यह घुसपैठ सचमुच 'इतिहासतिमिरनाशक' बन जाती है। वे 1857 के विद्रोह को उसी नजरिए से नहीं देखते जैसा आम इतिहासकार करते हैं। उन्होंने सावरकर और शाह वलीउल्लाह को एक ही कटघड़े में खड़ा कर दिया हैए 'वलीउल्लाह व मुसलमानों के लिए स्वधर्म या स्वराज की एकरुपता और उद्देश्य वही थे जो सावरकर के लिए थे। अगर 1857 में अंग्रेज हार गए होते तो किसका स्वधर्म जीतता? हिंदू का या मुसलमान का?' यह प्रश्न अपने आप में काफी है इस बात को स्थापित करने के लिए कि उस समय के समाज में हिंदू.मुस्लिम के बीच गहरी खाई थी। ऐसा नहीं था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद हुकूमत के सीधे मल्का.ए.विक्टोरिया के हाथों में चले जाने के बाद अंग्रेजों को अक्ल आई हो कि भारत में अंग्रेजी राज की निरंतरता बनाए रखने के लिए हिंदू.मुसलमान की विभाजन रेखा खींचनी शुरु कर देनी चाहिए। जैसा कि लेखक का नजरिया है कि इतिहास के इसी पड़ाव पर सांप्रदायिक दरार पड़नी शुरु हो गई थी। अगर ऐसा था तो अतीत के कलह का कोई मतलब नहीं था। वैसे भी अगर विद्रोह के तात्कालिक कारण पर नजर डालें तो यह 'सुअर और गाय की चर्बी' वाला मामला था। दोनों समुदाय अंग्रेजों से अपना धर्म बचा रहे थे, न कि किसी सांप्रदायिक सौहार्द की वजह से साथ आए थे। लेखक ने आगे उन इतिहासकारों की विवेचनाओं का खंडन किया है, जो इस विद्रोह को जनक्रांति का दर्जा देते हैं। सावरकर की जितनी लीपा.पोती हो सकती थी उन्होंने की है, प्रसिद्ध 'मार्क्सवादी' इतिहासकार रामविलास शर्मा के नजरिए को भी नहीं बख्शा है। रामविलास शर्मा पता नहीं कहां से इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि यह विद्रोह सामंतवाद विरोधी था और इसमें फ्रांस, रूस और चीन की तरह ही जनता की दमित इच्छाएं हिलोड़े मार रही थीं। लेखक ने सही सवाल उठाया है कि जिस विद्रोह का नेतृत्व सामंत कर रहे थे, वह सामंतवाद विरोधी कैसे हो गया। क्या सम्राट अशोक की तरह ही इन रजवाड़ों के अंदर कोई वैचारिक हृदय परिवर्तन हो गया था? ऐसा तो मार्क्स ने भी नहीं कहा था। पर लेखक ने मार्क्स के बारे में जो बात कही है वह थोड़ी भ्रामक है। माना कि मार्क्स ने अंग्रेजों को हिंदुस्तानियों से श्रेष्ठ बताया था पर उनका संदर्भ पूरी तरह से आर्थिक था न कि सभ्यताई। पूंजीवाद उनके विश्लेषण में एक प्रगतिशील व्यवस्था की भूमिका के रूप में थी, साथ ही पूंजीवाद की आलोचना भी। दिक्कत बाद के मार्क्सवादी आलोचकों के साथ है। पता नहीं वे कब आर्थिक विश्लेषण करने लगते हैं और कब सभ्यताई (यहां संदर्भ रामविलास शर्मा जी के आर्यों को भारत का ही घोषित करने से है)। ऐसे इतिहासकार तो अल्लामा इकबाल को भी प्रगतिशील कवि घोषित कर सकते हैं, क्योंकि उनके कुछ शेरो से क्रांतिकारिता झलकती है..

जिस खेत से दहकां को मयस्सर न हो रोटी
उस खेत के हर खोशाए गंदुम को जला दो।

भारत का विभाजन हो और इकबाल का जिक्र न होए यह कैसे हो सकता है. नीत्शे के सुपरमैन का प्रभाव उनपर भी उतना ही था जितना आजकल के बच्चों पर वर्चुअल सुपरमैन का. मिल्लत और कौम उनके लिए एक ही चीज बन गई थी। उनके पहले के अवतार को इतिहासकार राष्ट्रवाद के आईने में देखते हैं और बाद के अवतार को सांप्रदायिकता की चाशनी में। पर हिंदुस्तान हो या पाकिस्तान, राष्ट्रवाद तो एक ही चीज है। धर्म इसमें अशोक स्तम्भ की तरह गड़ा होता है। प्रियंवद ने लिखा है कि 'लाजपत राय ने इकबाल से 6 साल पहले वही बात कही जिसे कहने पर इकबाल को पाकिस्तान का वैचारिक जन्मदाता कहा जाता है।' एक रोचक तथ्य यह भी कि पाकिस्तान के कथित 'वैचारिक जनक' यानी इकबाल और 'भौतिक जनक' यानी जिन्ना दोनों ही दो पीढ़ी पहले हिंदू थे। क्या घालमेल है इतिहास का। वही जिन्ना यह कहते थे कि 'किसी मुसलमान के लिए, चाहे वह किसी देश का हो, यह संभव नहीं है कि दूसरे मुसलमान के विरुद्ध खड़ा हो सके।' जिन्ना या उनके 'भूत' यह क्यों भूल जाते हैं कि मुसलमान कोई homogenous ने समुदाय नहीं है। बंगाल, केरल और तमिलनाडु के मुसलमानों की सोच वैसे ही बदलती है जैसे भाषा। उत्तर भारत के मुसलमानों के लिए उर्दू का पिछड़ापन एक मुद्दा हो सकता थाए लेकिन केरल या बंगाल के मुसलमानों के लिए यह वैसा ही मामला था जैसे यूरोप में बारिश का होना। पर इन सबके बाद भी विभाजन हुआ। अगर जिन्ना को अविभाजित भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाता तो जिन्ना कितने कौमपरस्त होते?

मुझे समस्या पाकिस्तान के बनने से नहीं है। पाकिस्तान और हिंदुस्तान तो रोज बनते हैं। सरहद तो दूर, इंसान और इंसान के बीच का विभाजन। काल का विभाजन। एक विभाजन खुदा और अल्लाह का भी। अल्लाह के मानने वाले खुदा से सिर्फ इसलिए दूर होते जा रहे हैं, क्योंकि खुदा फारसी का शब्द है। क्या कसूर था वली दक्कनी का जो औरंगजेब के समय में पैदा हुए और मरे 2003 को गुजरात के जनसंहार में। कितने आराम से सोए थे वो कि अचानक उनकी कब्र पर सड़क बन गई। 1744 से 2003 . काफी लंबी है तारकोल की यह सड़क।

लिया है जब सूं मोहन ने तरीका खुदनुमाई का
चढ़ा है आरसी पर तब से रंग हैरत फिजाई का
(वली दक्कनी)

और क्या कसूर था उनका जो 14.15 अगस्त 1947 को पैदा भी हुए और फौरन धार्मिक ढ़ंग से मार दिए गए। इसका जिम्मेदार कौन था? मेरे ख्याल से नेहरु, जिन्ना, इकबाल या पटेल कतई नहीं थे। इस महात्रासदी का सारा श्रेय जाता है, इतिहास की निरंतरता को। अगर यह निरंतरता बनी रही तो किंग लियर भी कम नहीं होंगे। सर्व धर्म वर्जयते..यही हमारा नारा होना चाहिए ताकि भावी इतिहास में इतिहास के किसी पात्र को शर्मिंदा न होने पड़े और कोई धर्मों के समन्वय की बात न कर सके।

हिंदुत्व और बौद्ध धर्म के एकीकरण की वकालत करने वाले विवेकानंद को आशा भी नहीं थी कि कालांतर में अंबेडकर मनुस्मृति का ही दाह.संस्कार कर देंगे और उनकी एक आवाज पर लाखों दलित बौद्ध धर्म की शरण में चले जाएंगे। अगर हम दिनकर की रश्मिरथी को हेगेल की ऐतिहासिक दृष्टि पर तौलें तो सचमुच 'इतिहास कितना अदृश्य हो चलता है।' विडंबना देखिए कि अंबेडकर ने जिस वैदिक भाषा में लिखी मनुस्मृति को जलायाए आज उसी भाषा (संस्कृत) में बुद्धं शरणं गच्छामि लाखों करोड़ों उत्पीड़ितों की आवाज बनती जा रही है। 'धर्म संस्थापना' का गीता.दर्शन ऐतिहासिक कारणों से धर्मांतरण में बदल रहा है। विवेकानंद के शब्दों को हथियार बनाकर हम इसे लाख चाहे 'राइस क्रिश्चियन' कह लें, पर सिर्फ चावल के बदले में ही लोग अन्य धर्मों को ही नहीं अपना रहे हैं। विभाजन रेखा खिंची हुई है जिसके ठोस राजनैतिक और आर्थिक कारण हैं और इसका नमूना अक्सर कंधमाल में देखने को मिल जाता है। एक 'लोकतांत्रिक' देश में बड़े ही 'लोकतांत्रिक' ढ़ंग से धर्मोन्माद का 'भीड़.तंत्र' खड़ा किया जाता है और बड़े ही धार्मिक ढ़ंग से उन लोगों का भक्षण किया जाता है जो या तो गिनती में कम होते हैं या जिन्हें अल्पसंख्यक होने का संवैधानिक आधार मिला हुआ है। यह भीड़तंत्र वर्ग की मार्क्सवादी अवधारणा से भी परे है। इसमे लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुने हुए नेता भी शामिल हैं और निम्न वर्ग के लोग भी हैं जो किसी इसाई महिला के अस्तित्व पर तथाकथित पांच हजार साल के सभ्यता की दुहाई देकर कालिख पोत देते हैं। मध्यवर्ग जो अक्सर निम्न वर्ग और नेताओं को हेय दृश्टि से देखता है और राजनीति के प्रति उदासीन रवैया रखता है, वह भी इस 'बहती गंगा' में हाथ साफ कर देता है। यहां सभी लोग भूखे आदमी हैं। धर्म से लेकर 'चावल' तक की भूख। पर विवेकानंद की इस बात का ही क्या किया जाय..'भूखे आदमी को तत्वमीमांसा का उपदेश देना उसका अपमान करना है।' तब हमें नजीर का कोई नज़ीर नहीं मिलता

यां आदमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी पे तेग को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
जो सुन के दौड़ता है सो वह भी है आदमी

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

हिंसा इतिहास की दाई है

राशिद अली के लेख 'इतिहास की ढलान' का पहला हिस्सा जनपक्ष पर कुछ दिन पहले दिया गया था। प्रस्तुत है इसका दूसरा हिस्सा। इसमे राशिद प्रियंवद की किताब 'भारत विभाजन की अंतःकथा' के बहाने विभाजन के त्रासद यथार्थ, भारतीय राष्ट्रवाद तथा आज के मार्क्सवाद पर कुछ ज़रूरी टिप्पणियाँ करते हैं। 


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   एक ऐसे समय में जब ‘विचारधारा और इतिहास के अंत’ से लेकर ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ का मुक्त आकाशीय रंगमंच तैयार खड़ा है तब आज भी हमें नेपथ्य में कुछ कोलाहल सा सुनाई पड़ता है। कुछ लोग खड़े होते हैं ‘इतिहास के अंत’ का सिरा पकड़े हुएए ‘अंत’ को आरंभ की ओर ढ़केलते हुए और तथाकथित सभ्यताओं का जोसेफ कॉनरैड की ही भाषा में तिरस्कार करते हुए। हार्ट ऑफ डार्कनेस यानी अंधेरे के दिल का सीना चीरते हुए जब ये पात्र हमारे सामने आते हैं तो मरे हुए इतिहास में भी जान आ जाती है।  प्रियंवद एक ऐसे ही पात्र हैं जो इतिहास को कभी भी इति का हास्य नहीं बनने देतेण् नोम चोमस्की की भाषा में कहें तो वे इतिहास को कभी भी ‘भविष्य के गड्ढे’ में नहीं ढ़केलते। इतिहास को उसी प्रतिबद्धता के साथ लिखते हैं जैसा कभी नागार्जुन ने कहा था..आबद्ध हूंए संबद्ध हूंए प्रतिबद्ध हूंए अनुगामी समाज के लिए। सही भी है। भारत विभाजन कोई ‘मिडनाइट चिल्ड्रेन’ जैसा कोई दस्तावेज तो नहीं, जहां जलियांवाला बाग मे जनरल डायर की पाशविक बर्बरता के बाद भी सलमान रश्दी के पात्र आदम अजीज के नाक में खुजली हो रही हो। विभाजन एक ऐसी घटना थी जो ष’आउशवित्ज’ के कॉसेंट्रेशन कैम्प से कम भयावह नहीं थी।

ऐतिहासिक भूल

भारत विभाजन की अंतःकथा . प्रियंवद अपनी इस पुस्तक की शुरुआत करते हैं सम्राट अशोक के एक प्रसिद्ध शिलालेख से, जिसमें राजा की सदिच्छा है कि लोग परस्पर मेलजोल से रहें, दूसरे संप्रदाय की निंदा न करें और एक दूसरे के धर्म को ध्यान देकर सुनेण। पता नहीं कि प्रियंवद की सदिच्छा है या प्रियदर्शी अशोक की? अगर ऐसा होता तो फ्रैंज़ फैनो यह कभी नहीं कहते कि हिंसा इतिहास की दाई है। खुद सम्राट अशोक बौद्ध धर्म अपनाने से पहले काफी हिंसक रहे थे। कलिंग के जनसंहार के बाद उनका मन द्रवित हो गया। अब तक के ज्ञात इतिहास में ऐसा ही लिखा है, यानी अशोक ईरान के नौशेरवां और यमन के हातिम की तरह हो गए। लेखक यहां मानों कबीर के प्रेम.पीड़ा की अनुभूति मे खो गया लगता है।

प्रेम न बारी ऊपजै प्रेम न हाट बिकाय
राजा.परजा जेहि रूचै सीस देइ ले जाय!!

पर राजा तो राजा होता है। वह राजा इसीलिए होता है क्योंकि राज करने के लिए प्रजा होती है। राजा और प्रजा का मेल कैसा? रूसो के ‘जेनेरल विल’ के महान रहस्योद्घाटन से पहले प्रजा राजा के साथ एक अलिखित आचार मे बंधी होती थी और राजा हमेशा चाणक्य नीति से बंधा होता था। पता नहीं अशोक का मन कितना द्रवित हुआ, पर कलिंग के जनसंहार के बाद जब माफी मांगने की बारी आई तो उन्होंने कंधार में एक शिलालेख बनवा दिया। कहां कलिंग और कहां कंधार! भौगोलिक दूरी समय की दूरी में बदल गई और आज हम सम्राट अशोक को एक महान प्रजापालक राजा के रूप में जानते हैं। चलिए माना कि बौद्ध धर्म में कुछ ऐसा है कि सम्राट अशोक का दिल पिघल गया होगा। पर आज श्रीलंका में तो बौद्ध धर्म की ही छाया है, फिर तमिल हिंदुओं का जनसंहार क्यों? अक्सर इतिहासकार यही गलती करते हैं। लेकिन यहां प्रियंवद का संदर्भ दूसरा है। अशोक के शिलालेख के बाद वे किंग लियर को उद्धरित करते हैं जो विभाजन के उत्तरदायी लोगों का एक जबरदस्त चरित्र चित्रण है और जो बस इतिहास की विडंबनाओं को ही चिंहित करता है। किंग लियर ने कहा था. ‘मै ऐसे काम करुंगा जो मै अभी तक नहीं जानता क्या हैं, लेकिन वे धरती का आतंक होंगे।‘ अरस्तू के कैथारसिस से ओत.प्रोत शेक्सपियर के इस दुखांत से दर्शकों को कितना रस मिलता होगा पर शेक्सपियर ने यह भी कहा था कि दुनिया एक स्टेज है और हम सब इसके पात्र। जरा सोचिए रक्तबीज रूपी न जाने कितने किंग लियर इस धरती पर पैदा हुए हैं।

विभाजन को लेकर खुद प्रियंवद भी यही कहते हैं ‘विभाजन समस्त नाट्य तत्वों से भरपूर एक विराट त्रासद नाट्यकृति है। त्रासद इसलिए कि आश्चर्यजनक रूप से, इस विभाजन का कारण न तो कोई बाहरी आक्रमण था, न गृहयुद्ध, न उत्पादन या पूंजी या बाजार की आर्थिक विवशताएं और न ही कोई प्राकृतिक प्रकोप। प्रत्यक्ष रूप  से यह करोड़ों मनुष्यों का, संवैधानिक रूप से अपना प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं के माध्यम से स्वेच्छा से चुना हुआ ‘काल को खंडित करने वाला निर्णय’ था। यहां लेखक पहले से ही चीजों को लेकर काफी आश्वस्त नजर आता है। यहां दो बहुत ही महत्वपूर्ण बातें हैं जिसकी लेखक ने आगे विस्तार से चर्चा की है। पहली यह कि विभाजन संवैधानिक रूप से अपना प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं के माध्यम से स्वेच्छा से चुना हुआ निर्णय था। अगर विभाजन के समय के नेताओं की उम्र देखें तो लगभग तमाम नेताओं की उम्र साठ पार कर गई थी। इस उम्र मे जल्दबाजी लाजमी थी क्योंकि वे ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ते लड़ते थक चुके थे और उन्हें नए देश की हुकूमत में हिस्सा चाहिए था। पर इसमे पिसी अविभाजित देश की जनता जो अपनी जड़ता, निरीहता और असहायता में ‘हैमलिन के बांसुरी वादक के पीछे चलने वाले मंत्रमुग्ध चूहों’ की तरह अपने नेताओं का अंधानुगमन करती रही। दूसरी बात है काल को खंडित करने वाले निर्णय के बारे में। पर किस काल को खंडित करने वाला निर्णय था यह? कुछ मामलों में लेखक ने भी जल्दबाजी से काम लिया है। वे चर्चिल की भविष्यवाणी से अभिभूत नजर आते हैं कि ‘भारत आजाद होने के बाद टुकड़ों मे बंट जाएगा।‘ लेखक के अनुसार, इसी विघटन में निर्वासन का दर्द छुपा हुआ है चाहे वह विभाजन हो या बांग्लादेश या फिर कश्मीर के हिंदू। आगे लेखक यह भी कहता है कि ‘पाकिस्तान जब तक अपने जन्म के वैचारिक आधार इस्लाम की शरण लेता रहेगा, भारत के हिंदुवादी बनने का आत्मघाती मार्ग खुला रहेगा।‘ समस्या यहीं है। यह सही है कि पाकिस्तान की लड़ाई संपन्न धनी उच्चवर्गीय मुसलमान के हितों की लड़ाई थी, मेहनतकश गरीब मुसलमानों की नहीं। पर अगर यह लड़ाई मेहनतकश गरीब मुसलमानों की होती तो क्या पाकिस्तान बनने का औचित्य सही था? लेखक यहां खामोश है और मै यही सवाल उठाना चाहता हूं। यह तो अल्लामा इकबाल की तरह मुसलमानों को एक ही झुंड में हांकने वाली बात हो जाएगी।

एक ही सफ में खड़े हो गए महमूदो अयाज़
न कोई बंदा रहा और न बंदा नवाज़!!

सारा का सारा मामला ही राष्ट्र की अवधारणा से जुड़कर गड्मड हो गया है। राष्ट्र के सामने किसी और अस्मिता की बिसात कहां! पर यहां एक सवाल काबिले गौर है। अगर भारत एक राष्ट्र के रूप में अंग्रेजों के चंगुल में था तो क्या भारत का कोई चंगुल नहीं? ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह ही आज भारत की अनेक कंपनियां उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झाड़खंड समेत अफ्रीका के कई देशों में अपनी अंग्रेजियत का परिचय दे रही हैं। भारत के अंदर आज भी दबी कुचली अनेक राष्ट्रीयताएं हैं जो भारत जैसे ‘संपन्न’ राष्ट्र से लोहा ले रही हैं। ठीक इसी तरह पाकिस्तान के अंदर भी राष्ट्रीयताएं अंदर ही अंदर सुलग रही हैं। हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी उस समय बहुत खुश होगी जब पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हुआ होगा। पर विडंबना यही है कि पाकिस्तान से वह हमेशा ही अलग था भौगोलिक और सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टि से। वह बृहत भारत का भी हिस्सा नहीं था। सिर्फ पश्चिम बंगाल के करीब था। जो लोग विभाजन के लिए जिम्मेदार थे उन्होंने न सिर्फ इतिहास के साथ छल किया, बल्कि भूगोल को भी ठग लिया। इतिहास की ‘महाठगनी’ ने इतिहास के एक महा प्रपंच को एक भौगोलिक शक्ल दे दी। आज ऐसी ही स्थिति कश्मीर की भी है। विभाजन के समय जब पूरे भारत और पाकिस्तान में खून की नालियां बह रही थीं, वहीं कश्मीर दो टूटते हुए देशों की मूर्खता पर कहकहे लगा रहा था। कश्मीर के सौहार्द को विभाजन ने भी विचलित नहीं किया। पर आज वही कश्मीर दो विभाजित देशों की सामरिक शक्तियों का हलाहल पीने को बाध्य है।

यहां कश्मीर का जिक्र क्यों? यह इसलिए क्योंकि प्रियंवद ने खुद ही निर्वासन के दर्द में कश्मीरी हिंदुओं को जगह दी है। लेकिन यह बात आईने की तरह साफ है कि कश्मीरी हिंदुओं को मुसलमानों ने निर्वासित नहीं किया, बल्कि यह घोर रूप  से भारत की सांप्रदायिक नीति का हिस्सा थी। हां कुछ मामलों मे अपवाद जरुर रहे होंगे। वर्ना अपनी कश्मीरियत को बचाने वाले वहां के लोग मुसलमान ही कहां थे। तसव्वुफ और भक्ति की ब्यार में ये लोग हिंदू और मुसलमान की श्रेणी से बहुत आगे निकल गए थे। पर आदिगुरु शंकराचार्य की तरह जगमोहन वहां गए और पूरें के पूरे काल को ही खंडित कर आए।

लेखक ने जो सबसे विस्फोटक बात कही है वह है ‘पाकिस्तान जब तक अपने जन्म के वैचारिक आधार इस्लाम की शरण लेता रहेगा, भारत के हिंदुवादी बनने का आत्मघाती मार्ग खुला रहेगा।‘ यह एक खतरनाक संकेत है, जो कहीं से तर्कसंगत नहीं है, भारत के हिंदूवादी होने के लिए पाकिस्तान का इस्लामी होना जरुरी नहीं है। पाकिस्तान बनने से बहुत पहले एशिया और अफ्रीका मे कई सारे इस्लामी राष्ट्रों का निर्माण हो चुका था। उधर नेपाल भी अरसे से हिंदू राष्ट्र था। जबतक दुनिया मे अस्मिताएं रहेंगी, अस्मिताओं के आधार पर राष्ट्र बनते और बिगड़ते रहेंगे। खालिस्तान की मांग को तर्कहीन और बुरा कह देने और आम जनता पर सैन्य शक्ति का परिक्षण कर देने मात्र से ही समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए जो सबसे जरुरी है कि किसी भी राष्ट्र के इतिहास को उसकी निरंतरता से काटा जाए। इसी निरंतरता से सनातनी प्रवृत्तियों का उदय होता है, जो बाद में हिंसक संप्रदायवाद का शक्ल धारण कर लेती है। फिर यह प्रश्न भावी पीढ़ियों के लिए छोड़ दिया जाता है कि विभाजन क्यों हुआ।

मार्क्स ने कहा था कि दार्शनिकों ने संसार की व्याख्या कई तरह से की है पर सवाल आखिरकार इसे बदलने का है। पर बदलाव हो तो कैसे ह,ए जब बदलाव स्वयं ही दर्शनों की व्याख्याओं पर टिका हो? मार्क्स ने आदर्शवाद से उपजे तमाम दर्शनों को भौतिकवाद की कसौटी पर परखने की कोशिश की थी। आज मार्क्सवादियों ने भौतिकवाद को ही आदर्शवाद के खांचे में डाल दिया है। ‘आर्यसमाज’ के नंदी बैल की तरह ही ये लोग भी ‘वेद’ की ओर कूच करते जा रहे हैं। ऊपर से तुर्रा यह.

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शबगज़ीदा सहर
था इंतज़ार जिसका ये वो सहर तो नहीं

यहां मै भौतिकवाद की चर्चा इसलिए कर रहा हूं क्योंकि यही वह दर्शन है जो अस्मिताओं के सवाल को बेहतर ढ़ंग से समझने मे सक्षम है। देरिदा के ‘डिकंस्ट्रशन’ से बहुत पहले ही द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ने बाकी दर्शनों का मर्सिया पढ़ डाला था। बचपन में उत्सुकता के चांद.तारों, पृथ्वी.आकाश और असंख्य जीवों की उत्पत्ति को समझने से पहले ही बच्चा अल्लाह या ईश्वर की शरण में चला जाता है। सबसे पहले इंसान की आजादी यहीं छिनती है और फिर दासता का फलक इतना बड़ा हो जाता है कि दार्शनिकों को भी सबसे हास्यप्रद दुखांत लिखना पड़ता है..नो एक्जिट! शायद रूसो भी ठीक कहते थे कि आदमी पैदा तो स्वतंत्र ही हुए थे पर दुनिया में आकर वह बेड़ियों मे जकड़ गया। इतिहास की उम्र भले ही काफी लंबी होती है, पर यह बिल्कुल हमारे जीवन जैसा है। कभी भिन्नाता हुआ तो कभी कुलबुलाता हुआ। कभी बिलबिलाता हुआ तो कभी छटपटाता हुआ। मुझे तो संघ परिवार पर कभी.कभी दया आती है कि ये लोग इतिहास के पुर्नलेखन को लेकर इतने उतावले क्यों हैं। इतिहास का पुर्नलेखन पहले ही इतना हो चुका है कि अब गुंजाइश ही नहीं बची। हम सिर्फ शब्दों से काम चला सकते हैं।

इतिहास लेखन की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही है कि यह अतीत मे इतिहास टटोलने की कोशिश करता है न कि भविष्य में। इसके केंद्र में, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, राष्ट्रवादी या गैर राष्ट्रवादी ढ़ंग से, एक गौरवशाली परंपरा है जबकि इतिहास में सबसे ज्यादा महत्व ‘गौरवशाली अनिश्चिंतता’ को दिया जाना चाहिए था।

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

दरअसल गलती इतिहास की नहीं।

(राशिद अली टीवी पत्रकार हैं और उन्हीं के शब्दों में पत्रकारिता की वर्तमान हालत देख अपने पत्रकार होने पर शर्मिंदा हैं। उनसे मुलाक़ात हुई फेसबुक पर और हमारे आग्रह पर उन्होंने यह लेख जनपक्ष के लिये उपलब्ध कराया। राष्ट्रवाद पर चल रही हमारी बहस को यह लेख और समृद्ध करता है। लेख लंबा है इसलिये दो भागों में)


इतिहास की ढ़लान

  • राशिद अली

जब कला थी इतिहास नहीं था
जब तक इतिहास लिखा गया
कला मर चुकी थी...

इतिहास आज एक यक्ष प्रश्न बन चुका है. आज अगर महाभारत के युधिष्ठिर जिंदा होते (गर कभी थे) तो या वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मे ढ़ल चुके होते या फिर मंटो के तौबा टेक सिंह की तरह नो मैंस लैंड में रघुवीर सहाय का 'फटा.सुथन्ना' पहनकर मारे मारे फिर रहे होते। अधिक उम्मीद यही थी कि वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ही चोला पहनते क्योंकि महाभारत और रामायण सीरियल के ज़्यादातर पात्र संघ का ही प्रचार कर रहे हैं। तौबा टेक सिंह की सुनता कौन? पागल जो ठहरे! दरअसल गलती इतिहास की नहीं। यह तो पहले से ही वेद.वाक्य या फ़रमाने इलाही बनकर हमारी चेतना मे घुसा हुआ है। स्कूल के दिनों मे 'विद्या' नाम के मास्टर हमें पढ़ाते थे। वे मुसलमानों से 'नफ़रत' तो नहीं करते थे, पर हां किसी मुसलमान बच्चे के बारे में यह जरुर मानते थे कि नया पाकिस्तान बनाने मे इस बच्चे के अंदर भी प्रबल संभावना है। बाद मे जब मै जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय आकर कम्यूनिस्ट बन गया तो पता चला कि 'विद्या' सर तो इप्टा से जुड़े हैं।

प्रकांड मार्क्सवादी आलोचकों को मेरे इस तरह लिखने से आपत्ति हो सकती है, क्योंकि मै जीनियॉलोजी का सहारा ले रहा हूंए न कि शुद्ध अकादमिक विमर्शों का। लेकिन सवाल यह है कि 'पर्सनल हिस्ट्री' बृहत इतिहास का हिस्सा क्यों नहीं हो सकती। सिर्फ वर्ग की समग्रता के चश्मे में ही तो सबकुछ पिरोया नहीं जा सकता। 'वाम दल' अगर 'मध्मय.वर्ग' की राजनीति करें तो ठीक, आप सिर्फ लेखन के मामले में ही 'उत्तरसंरचनावादी' बनने की छूट नहीं ले सकते! वाह! क्या फरमाने इलाही है! खैर मेरी इन विषयों को लेकर काफी सतही समझ है और शायद मै इसीलिए किसी भी बात को लेकर आश्वस्त नहीं होना चाहता। मेरी मां ने कभी भी सैयद आगा हसन अमानत द्वारा रचित नाटक इन्दर.सभा नहीं पढ़ा था या इस नाम से बनी फिल्म को नहीं देखा था। जैसा चार्ल्स डिकेंस के ग्रेट एक्सपेक्टेशंस के अनाथ किरदार पिप को अपने मरे हुए मां.बाप की कोई छवि इसलिए याद नहीं थी क्योंकि उस समय तक फोटोग्राफी का ईजाद नहीं हुआ था, ठीक ऐसी ही मेरी मां भी थी। पर उनके समय में खूब नाटक और फिल्में देखी जा रही थीं। बस करोड़ों हिंदुस्तानियों की तरह ही उनकी बूढ़ी आंखें भी कलात्मकता के इस जादू से वंचित थीं। रास.लीला पर आधारित 1853 मे लिखे गए इस नाटक में इंद्र उर्दू बोलते थे, न कि संस्कृतनिष्ठ हिंदी। जब बचपन मे मेरी मां 'अधुआ और सब्ज़परी' की कहानी सुनाती थी तो इसमे इंद्र भोजपुरी बोलते थे। इस कहानी मे 'विरित्रासुर' को हराने वाले इंद्रासन की हार होती थी। जब बचपन मे हम यह कहानी सुनते थे, उससे बहुत पहले ही हिंदुस्तान.पाकिस्तान का विभाजन हो चुका था। जाहिर है मेरी मां ने भी विभाजन की त्रासदी झेली होगी।

आज मेरी मां नहीं हैं जैसे करोड़ों लोग नहीं हैं। मै इमरजेंसी के दौर मे पैदा हुआ था जो विभाजन के बाद की सबसे बड़ी घटना थी। मुझे उस समय का कुछ भी याद नहीं। हां जब इन्दिरा गांधी का कत्ल हुआ था तो हम लोग उस औरत के यूं मर जाने से रोते थे और सरदारों को कोसते थे। जब तक होश संभाला, बाबरी मस्जिद गिर चुकी थी और जब कुछ लिखने पढ़ने का समय आया तो गुजरात कत्लगाह बन चुका था। आज जब मै यह लेख लिख रहा हूं तो हिंदुस्तान से टूटा हुआ पाकिस्तान और भी टूट रहा है और तालिबान जैसा शेषनाग फन उठाए पूरे पाकिस्तान को डसने को तैयार बैठा है। अगर सलमान रश्दी के शब्दों में कहें तो सचमुच इतिहास को लेकर हम कितने 'रेडियोऐक्टिव' हैं।

पर जैसा कि प्रेमचंद ने कहा है कि लेखन कर्म तपस्या जैसा है, लोग आज भी उसी शिद्दत से लिख रहे हैं. यहां तपस्या के दो संदर्भ हैं. एक तो ऋषि.मुनियों की जैसी तपस्या जो अक्सर इतिहासकार करते हैं. दूसरी सामाजिक सरोकार रखने वाले लोगों की तपस्या. पुराने इतिहासकार आज भी 'हज़ारों सालों' की तपस्या कर रहे हैं और मुक्तिबोध के शब्दों में 'मार्क्स का सिंह जैसा सिर' लिए दिल्ली की सड़कों पर मिमियाते फिर रहे हैं। वहीं लेखकों की युवा पीढ़ी भी है जो मूलतः इतिहासकार तो नहीं पर हां पुराने इतिहासकारों की समझ का भंडा फोड़ कर रही है। जब हम पुराने इतिहासकारों की बात करते हैं तो अक्सर उनके लेखन में प्रतिक्रियावाद और प्रगतिवाद के स्वर एक साथ गुंजायमान होते हैं। ऐसे इतिहासकार अक्सर दयानंद, विवेकानंद, गांधीए भगत सिंह, नेहरु, अंबेडकर और पटेल को एक ही कतार मे खड़ा कर देते हैं और जनरल डायर की तरह हुक्म देते हैं कि मानो! यही असली इतिहास है। यहीं से वे राष्ट्रीयता की एक पहचान विकसित करने की कोशिश करते हैं। कुल मिलाकर राष्ट्र ही धर्म बन जाता है और धर्म राष्ट्र। हत्ता यह कि सैंकड़ों सालों से हम 'सैमुअल बेकेट के गोडो' का इंतजार कर रहे हैं और 'ऐतिहासिक अक्रमन्यता' को 'ऐतिहासिक सूत्र' मे पिरोने की कोशिश कर रहे हैं। पर असली इतिहास है क्या?

इस सवाल का जवाब आसान नहीं क्योंकि इतिहास राजतरंगिनी या इंडिका या मुंतखबत तारीख नहीं है. या यूं कहें कि मध्यकालीन भारत और प्राचीनकालीन भारत भी इतिहास नहीं है तो बेजा न होगा। जब मध्यकाल और प्राचीनकाल मे भारत या हिंदुस्तान का वजूद था ही नहीं, तो स्टेनलेपूल के द्वारा किए गए इस काल निर्धारण को हम क्यों मान लें। हम आधुनिकता के सांचे मे ढ़ली राष्ट्र की परिकल्पना को मध्य या प्राचीन काल पर कैसे थोप सकते हैं। इसका अर्थ तो यही हुआ कि इतिहास संस्कृतियों या सभ्यताओं की निरंतरता पर टिका है। यहीं फूको इतिहास की इस निरंतरता का खंडन करते हैं और कहते हैं 'इतिहास तर्कमूलक आचारों का अनिरंतर सिलसिला है।' ये तर्कमूलक आचार क्या हैं? ये अलिखित और अनकहे नियम हैं, जिन्हें मानना सबके लिए बाध्य हो जाता है और जो नहीं मानते उनके लिए चुप्पी का नर्कद्वार खुल जाता है। मार्क्स ने भी तो इतिहास को विचारों के संघर्ष के रुप मे देखा था। जब इतिहास मे पहले ही इतना विरोधाभास है और सारी की सारी संस्कृतियां विडंबनाओं से लबरेज़ हैं तो ऐसे मे इतिहास को लेकर वस्तुपरक रवैया अपनाना एक खास किस्म की मानसिकता को ही उजागर करता है।

यहीं मार्क्स इतिहास को समाज से अलग करते हैं। वे अलग अलग दौर के सामाजिक उथल.पुथल को वर्ग संघर्ष के नज़रिए से अध्ययन करते हैं क्योंकि समाज अपने आप हमें किसी दौर के तथ्यों और परिवर्तनों से अवगत नहीं करा सकता। बात सही भी है। बचपन से जवानी तक हमारा जेहन 'ऐतिहासिक तथ्यों' के 'ग़ैर ऐतिहासिक' दृष्टि से अटा पड़ा रहता है। जेम्स मिल ने जिस संदर्भ मे यह कहा था कि भारतीयों में इतिहास दृष्टि नहीं है' मैं उस संदर्भ की वकालत तो नहीं कर रहा लेकिन हां इतना जरुर कहूंगा कि एक औसत भारतीय आज भी चंगेज खान को 'मुसलमान' समझता है। इतिहास की यह मौखिक परंपरा दरअसल संघ परिवार के प्रचार से बहुत पहले की है। इस परंपरा के 'गुणसूत्र' मुख्य धारा से लेकर हाशिए तक में लटके पड़े हैं। उदाहरण के तौर पर अमीर खुसरो मुसलमान होते हुए भी 'राष्ट्रवादी' थे, औरंगजेब तो औरंगजेब, महाराणा प्रताप की छवि के आगे अकबर भी एक घोर 'निरंकुश' राजा था। साहित्य मे तो ऐसा इतिहास 'उत्तरआधुनिक कूड़े' के समान पड़ा है। सवाल यह नहीं है कि जनमानस मे ऐसा इतिहास विकसित कहां से हुआ बल्कि यह है कि कौन सी ऐसी 'ऐतिहासिक भूल है जिसके एवज में अबतक लाखों कराड़ों लोग मार दिए गए हैं और भविष्य मे भी मारे जाएंगे। ऐसा क्यों है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान का विभाजन हिंदुओं और मुसलमानों की राष्ट्रीय अस्मिताओं के रुप मे देखा जाता है। तब बाकी संप्रदाय कहां गए - सिक्ख, इसाई, बौद्ध, जैन…यहां तक मुसलमानों के अंदर के फिरके। तब तो राष्ट्र सचमुच एंडरसन की एक 'इमैजिंड कम्यूनिटि' है।

जारी…………

बुधवार, 10 नवंबर 2010

पूरी तरह से उनका हिंदूकरण या फिर नस्ली सफाया!

(प्रो शम्सुल इस्लाम की किताब 'वी आर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड - ए क्रिटिक' का अगला हिस्सा)

नस्लवाद का बचाव

गोलवलकर की हिन्दू राष्ट्रीयता का सबसे महत्वपूर्ण अवयव जाति या जातीय भावना थी जिसे उन्होंने हमारे धर्म की संतान30 के रूप में परिभाषित किया। उनके दृष्टिकोण के अनुसार

हिन्दुस्थान में एक प्राचीन हिन्दू राष्ट्र है और इसे निश्चित तौर पर होना ही चाहिये, और कुछ और नहीं केवल एक हिन्दू राष्ट्र। वे सभी लोग जो राष्ट्रीय यानि कि हिन्दू जाति, धर्म, संस्कृति और भाषा को मानने वाले नहीं होते वे स्वाभाविक रूप से वास्तविक राष्ट्रीयजीवन के खांचे से बाहर छूट जाते हैं।

हम दुहराते हैं- हिन्दुओं की धरती हिन्दुस्थान में हिन्दू राष्ट्र रहता है और रहना ही चाहिये- जो आधुनिक विश्व की वैज्ञानिक पांच ज़रूरतों को पूरा करता है। फलतः केवल वही आंदोलन सच्चे अर्थों में राष्ट्रीयहैं जो हिन्दू राष्ट्र के पुनर्निर्माण, पुनरोद्भव तथा वर्तमान स्थिति से इसकी मुक्ति का उद्देश्य लेकर चलते हैं। केवल वही राष्ट्रीय देशभक्त हैं जो अपने हृदय में हिन्दू जाति व राष्ट्र के गौरवान्वीकरण की प्रेरणा के साथ कार्य को उद्धत होते हैं और उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये संघर्ष करते हैं। बाकी सभी या तो गद्दार हैं और राष्ट्रीय हित के शत्रु हैं या अगर दयापूर्ण दृष्टि अपनायें तो बौड़म हैं31

निस्सन्देह गोलवलकर की यह परिभाषा पूरी तरह से हिन्दू राष्ट्र के सावरकरीय माडल पर आधारित है और मुस्लिमों, इसाईयों, या अन्य अहिन्दू अल्पसंख्यकों के हिन्दू राष्ट्र का हिस्सा होने के दावे को पूरी तरह ख़ारिज़ करती है। हिन्दुत्व के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वालों को न केवल भारतीय राष्ट्रीयता से बहिष्कृत किया गया अपितु गद्दार’, ‘शत्रुऔर बौड़मकहकर अपमानित किया गया है। यह भारत में रहने वाले अहिन्दुओं का क्रूर अपमान था लेकिन ब्रिटिश शासकों ने इस किताब के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं की। * ऐसा इस तथ्य के बावज़ूद कि भारतीय दण्ड विधान की धारा 295 A ख़ासतौर पर किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को, उसके धर्म या धार्मिक विश्वासों को लिखित या मौखिक रूप से शब्दों के माध्यम से अपमानित करने या किसी दृश्य माध्यम से प्रदर्शित करने या किसी और तरीके से भड़काने कोग़ैरक़ानूनी साबित करता है।32

अपने दृष्टिकोण को और स्पष्ट करने के लिये वह निम्नलिखित प्रश्न उठाते हैं

अगर निर्विवाद रूप से हिन्दुस्थान हिन्दुओं की धरती थी और अगर केवल हिन्दुओं का ही फलना-फूलना निश्चित था तो इन सभी लोगों की क़िस्मत क्या होनी थी जो यहां रह रहे थे परंतु हिन्दू धर्म, जाति और संस्कृति से संबद्ध नहीं थे?33

और वह स्वयं ही उत्तर देते हैं कि जहां तक राष्ट्र का प्रश्न है

गुजरात-2002- नस्ली सफ़ाये के सिद्धांत का ज़मीनी प्रयोग?

पूरी तरह से उनका हिंदूकरण या फिर नस्ली सफाया, भारत में अल्पसंख्यकों की समस्या से निपटने के गोलवलकर ने यही मंत्र सुझाया था। 1925 में अपने निर्माण के बाद से ही आर एस एस ने कभी इसे अनदेखा नहीं किया। उनके अनुसार, पुराने राष्ट्रों ने अपनी अल्पसंख्यक समस्या को कभी भी उन्हें (अल्पसंख्यकों को) अपनी नीतिगत व्यवस्था में एक अलग पहचान की तरह स्वीकृति देकर हल नहीं किया। मुस्लिमों और इसाईयों को, जो कि बाहरी हैं, निश्चित तौर आबादी के प्रमुख जन, राष्ट्रीय नस्ल के साथ ख़ुद को पूरी तरह समाहित कर देना चाहिये। उन्हें निश्चित तौर पर राष्ट्रीय नस्ल की संस्कृति और भाषा को अपना लेना चाहिये और अपने विदेशी मूल को भूलकर अपने अलग अस्तित्व की संपूर्ण चेतना को त्याग देना चाहिये।

अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें राष्ट्र के रहमो-करम पर राष्ट्र की सभी संहिताओं और परंपराओं से बंधकर केवल एक बाहरी की तरह रहना होगा, जिनको किसी अधिकार या सुविधा की तो छोड़िये, किसी विशेष संरक्षण का भी हक़ नहीं होगा। विदेशी तत्वों के लिये बस दो ही रास्ते हैं , या तो वे राष्ट्रीय जाति में पूरी तरह समाहित हो जायें और यहां की संस्कृति को पूरी तरह अपना लें या फिर जब तक राष्ट्रीय जाति उन्हें अनुमति दे वे यहां उसकी दया पर रहें और राष्ट्रीय जाति की इच्छा पर यह देश छोड़कर चले जायें। अल्पसंख्यक समस्या पर यही एक पुख़्ता विचार है। यही इकलौता तार्किक और सही समाधान है। केवल यही राष्ट्रीय जीवन को स्वस्थ तथा अबाधित रखेगा। केवल यही राष्ट्र के भीतर राज्य के भीतर राज्य पनपने के कैंसर के ख़तरे से राष्ट्र को सुरक्षित रखेगा।35


उद्धरण-
[30] देखें,गोलवरकर की पूर्व उद्धृत किताब 'वी आर अवर नेशनहुड डिफ़ाइण्ड' का पेज़-22
[31] देखें, वही, पेज़-43f
* यहां यह भी देखा जाना चाहिये कि गोलवलकर का उक्त कथन अहिन्दू समुदायों के अतिरिक्त राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन भगत सिंह जैसे तमाम नायकों के प्रति भी अपमानजनक है जिनका लक्ष्य ऐसा कोई हिन्दू राष्ट्र नहीं अपितु एक सेकुलर-समाजवादी व्यवस्था का निर्माण था- अनुवादक
[32] विस्तार के लिये देखें आल इण्डिया मेज़र क्रिमिनल एक्ट्स प्रकाशक- सेन्ट्रल ला एजेन्सी, एलाहाबाद- 1991
[33] देखें, गोलवलकर की पूर्वोद्धृत किताब का पेज़ 45
[34] वही, पेज़-45f
[35] वही, पेज़-47