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बुधवार, 11 मई 2016

जल-संकट(लातूर-शहर)-1: यह हमारी सभ्यता के अंत की शुरुआत है




साथी देवेश और कुछ अन्य मित्र लातूर में थे कल तक...उन्होंने यह रिपोर्ट भेजी है 




याद कीजिये 2016 के बीत गए महीनों को. हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या से शुरू हुआ साल बढ़ता हुआ पहुंचा जेएनयू और फिर देशद्रोह से लेकर राष्ट्रवाद की बहसों ने देश के दिलों-दिमाग पर कब्ज़ा जमा लिया. इस बीच इसी देश का एक हिस्सा सूखते-सूखते इतना सूख गया कि देश की नज़र में ही नहीं आया. यह कहना मुश्किल है कि उसे बारिश की कमी ने इतना सुखाया या हमारी उपेक्षा ने. इस उपेक्षा को मैं हमारी उपेक्षा ही कहूँगा, बाक़ी सरकारों की बात क्या ही करना. सरकारों की नीयत पर भरोसा हो,हमें इतना सीधा नहीं होना चाहिए.

आप शीर्षक देखकर सोच रहे होंगे कि मैंने शुरुआत ही अंत के साथ कर दी है पर यकीन मानिए मैं मजबूर हूँ यह लिखने के लिए. मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि आपको मालूम होगा मराठवाड़ा क्षेत्र के सूखे के बारे में. आपको यह भी मालूम होगा कि लातूर में पूरे अप्रैल महीने में जल-स्रोतों के आस-पास धारा 144 लागू थी और यह भी कि लगभग 24 लाख की आबादी वाले लातूर से 1.5 लाख लोग अब तक जल-संकट की वजह से विस्थापित हो चुके हैं. लातूर ‘शहर’ में जब जल-संकट के कारण कर्फ्यू की स्थिति पैदा हुई तो राष्ट्रीय मीडिया ने लातूर पर खूब बहसें चलाई, अच्छा लगा. असर भी हुआ इसका और सरकार ने लातूर को बाहर से पानी उपलब्ध कराना शुरू किया. पानी से लदी ट्रेनें भेजी गईं और लातूर शहर नगर-निगम के कर्मचारियों के अनुसार अब तक 4 करोड़ लीटर पानी ट्रेनों के माध्यम से लातूर शहर के लिए भेजा जा चुका है. फिर एक दिन बारिश की ख़बर चली और सबने ख़ुशी मनाई लातूर के लिए, मनानी भी चाहिए थी. पर ज़मीनी हक़ीक़त हमेशा की तरह कुछ और ही है जिसे जानने के प्रति हमारी रुचि शायद होती नहीं है.

       


लातूर शहर का जो पहला व्यक्ति टकराया(गजानन निलामे, गायत्री नगर निवासी), उसने बताया कि जो पानी ट्रेनों के माध्यम लातूर के लिए भेजा जा रहा है वह केवल लातूर शहर के लिए है, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए नहीं. शहर की स्थिति के बारे में पूछने पर गजानन बताते हैं कि शहर में नगर निगम के टैंकर हर वार्ड में पानी पहुंचाते हैं. औसतन 8-9 दिनों के अंतराल पर आने वाले इन टैंकरों के माध्यम से एक परिवार को 200 लीटर पानी की आपूर्ति की जाती है. अब सोचिये कि 200 लीटर पानी में एक परिवार कैसे 8-9 दिन काटता होगा? पीने के अलावा बाकी काम के लिए भी इसी पानी का इस्तेमाल करना होता है. पानी की  क्वालिटी के बारे में जानना चाहते हैं तो इतने से काम चलाइए कि 6 मई को एक राष्ट्रीय चैनल ने ख़बर चलाई थी जिसके अनुसार लातूर शहर के शिवाजी चौक के पास स्थित ‘आइकॉन अस्पताल’ में 5-6 मरीज भर्ती किये गए हैं जिनकी किडनी पर ख़राब पानी की वजह से असर पड़ा है. गजानन ने ही बताया कि क्षेत्र में पानी के दलाल पैर जमाये हुए हैं. इलाके में ‘सनराइज’ बोतल-बंद पानी की सबसे बड़ी कंपनी है जो पानी की दलाली भी करती है. इसके अलावा कई छोटी-बड़ी कंपनियाँ हैं जो बोतल-बंद पानी तो बेंचती ही हैं, अलग से भी पानी बेंच रही हैं. पूरे लातूर में औसतन 350-400 रूपये में 1000 लीटर और 1100-1200 रूपये में 5000-6000 लीटर का रेट चल रहा है.

गायत्री नगर में ही रहने वाले,पेशे से मजदूर रामभाऊ ने बताया कि लातूर में पिछले तीन महीने से किसी भी तरह का निर्माण-कार्य बंद है जिसकी वजह से मजदूरों के लिए कोई काम नहीं रह गया है. रामभाऊ बताते हैं कि दिक्कत तो सालों से है लातूर में पर पिछले 5 सालों से खेती बिलकुल ख़त्म हो गई और जब यहां सबकुछ ख़त्म होने के कगार पर है तब जाकर हमारी बात हो रही है. मैट्रिक तक पढ़े और साहित्य के गंभीर पाठक रामभाऊ कहते हैं कि ‘मैं आज तक अपना घर नहीं खड़ा कर पाया, अब शायद कर भी नहीं पाउँगा.अगले दो-तीन सालों में सबकुछ ख़त्म हो जायेगा. लातूर में एक आदमी भी नहीं दिखेगा.’ रामभाऊ लातूर के गांवों के लिए चिंता जताते हुए कहते हैं कि ‘शहर में तो फिर भी किसी तरह इतना पानी अभी आ रहा है जिससे जी ले रहे हैं लोग पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए तो कुछ भी नहीं है. यहां तक कि लातूर शहर के मुख्यालय से बमुश्किल 4-5 किमी दूर के क्षेत्रों से ही हाहाकार की स्थिति शुरू हो जाती है. प्रकृति से मात खाए इन लोगों के लिए न तो सरकार है, नगर निगम भी नहीं है. इनके लिए ट्रेन से पहुँच रहा पानी भी नहीं है.’रामभाऊ की बातों को सुनकर लगा कि जुमलेबाजों और उनके जुमलों के बीच रहते-रहते हमारी आदत हो गई है खरी आवाज़ों को अनसुना कर देने की. कलपुर्जों-सा जीवन जीते-जीते आज हम मनुष्यता से कितनी दूर जा खड़े हुए हैं, हम ख़ुद भी नहीं जानते. ज़मीन से 700-800 फीट नीचे भी अगर पानी नहीं मिल पा रहा तो इसका साफ़ मतलब है कि भयंकर उपेक्षा हुई है इस क्षेत्र की. पानी किसी ज़माने में 100-150 फीट पर ही मिल जाता था तो जलस्तर गिरने पर एक ही बार में इतना नीचे जा ही नहीं सकता कि पानी के ठिकानों की बाकायदा खोज शुरू करनी पड़ जाए. खैर आगे बढ़ते हैं....
                                                                         
                
लातूर शहर में 4 ‘वाटर फिलिंग पॉइंट’( बड़ी टंकियाँ) हैं जहाँ से सारे सरकारी टैंकर भरे जाते हैं. इनकी जगहें हैं ‘सरस्वती कॉलोनी’, ‘गाँधी चौक’, ‘नांदेड़ नाका’, नया रेणापुर नाका’.जब हम सरस्वती कॉलोनी फिलिंग पॉइंट पर पहुंचे तो पानी भरने वालों की लम्बी-लम्बी कतारें दिखाई दी.बहुत से लोग ऑटो में, सायकिल पर ढेर सारे घड़ों में पानी भर कर ले जाते हुए दिखे. इनसे बात करने पर पता चला कि लोग 2-3-4-5 किमी दूर से पानी भरने आये थे. लातूर के कलेक्टर ने लोगों को फिलिंग पॉइंट्स से पानी ले जाने की अनुमति दे दी है.जानकारी के लिए, ट्रेनों से आ रहा पानी इन फिलिंग पॉइंट्स में भर दिया जाता है. पानी भर रहे लोगों ने बताया कि यहां से पानी भरने में पूरा दिन निकल जाता है.लम्बी कतारें होती हैं, नंबर लगे होते हैं. ज़रा-सा ढीले पड़े कि नंबर गया. सुबह जल्दी पहुँच जाने पर नंबर 2-3 घंटे में आ जाता है पर लेट हो जाने पर और भीड़ बढ़ते ही नंबर 8/10/12 घंटे पर ही आ पाता है.अनुमति मिलती है 15-18 घड़ों में पानी भरने की और लोगों को पानी भरने के लिए हर तीसरे दिन फिलिंग पॉइंट्स पर आना पड़ता है.चूँकि इस पूरी प्रक्रिया में पूरा दिन निकल जाता है, इसलिए मौके पर पूरा परिवार मौजूद होता है. पानी भरने वाले दिन आदमी काम पर नहीं जाता, बच्चे स्कूल नहीं जाते और घर की औरतों के साथ मिलकर पानी भरते हैं. काम से बंक मारने की भरपाई काम मिलने वाले दिनों में 17-18 घंटे काम करके पूरी की जाती है.हर तरह का निर्माण कार्य बंद होने के कारण काम मिलने की दशा में मजदूरों की मजबूरी का फायदा उठाया जाता है और 200-250 रूपये की दिहाड़ी पर ही काम करा लिया जाता है. जबकि न्यूनतम दिहाड़ी 450 रूपये है. फिलिंग पॉइंट्स पर आपको उन इलाकों के लोग ज्यादा मिलते हैं जो शहर में आते हैं फिर भी वहां अभी तक कोई टैंकर नहीं पहुंचा है.

सरस्वती कॉलोनी में मौके पर नगर निगम के दो कर्मचारी मिल गए जिन्होंने नाम न बताने की शर्त पर कुछ बातें हमसे शाया कीं. मसलन, पहली बात तो यह कि जल-संकट को लेकर किसी से भी बात नहीं करनी है. उन्होंने बताया कि लोगों को देने के लिए महीने-डेढ़ महीने भर का पानी ही उपलब्ध है. उसके बाद कैसे काम चलेगा पूछने पर वे हंसने लगे और बोले कि इसके लिए तो कोई योजना या कोई मॉडल तो अभी तक नहीं तैयार है, सब भगवान के ऊपर है अब.कर्मचारियों के अनुसार ट्रेनों से पहुंच रहे पानी(25 लाख लीटर प्रति ट्रेन)  में से 12% पानी कहाँ गायब हो जाता है कोई नहीं जानता. पानी के दलाल पूरे इलाके में फैले हुए हैं जिन्हें राजनीतिक पार्टियों/संगठनों का सहयोग प्राप्त है. जिन्हें सरकारों से उम्मीद रहती है उनके लिए बताता चलूँ कि सूखे से निपटने के लिए जनवरी माह में एक मीटिंग जिला मुख्यालय में की गई थी. यह बात अलग है कि प्रस्तावित एजेंडों पर आज तक कुछ किया नहीं गया. हाँ, मई के पहले हफ़्ते में पानी को लेकर हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया है. यह हेल्पलाइन नंबर काम कितना कर रहा है इसकी कोई जानकारी अभी तक नहीं है. नाना पाटेकर की‘नाम फाउंडेशन’ पूरे इलाके में काम कर रही अकेली संस्था मिलेगी आपको. इन इलाकों में सक्रीय राजनीतिक पार्टियाँ/संगठन किसी गैर सरकारी संगठन/संस्था को भी काम नहीं करने देती. ‘नाम फाउंडेशन’ यहां तक कर रही है कि जो लोग विस्थापित होने के इच्छुक हैं उन्हें पुणे के खुले मैदानों में बसाने का प्रस्ताव रख रही है. 
                                                                                     
पानी की कमी से त्रस्त इन इलाकों में आपको सबकुछ सूखा, गर्म, खौलता-सा ही मिलेगा. पर सबसे भयावह होता है लोगों का मुस्कुराते हुए स्थितियाँ बयान करना और हँसते हुए कहना कि 2-3 साल बाद यहां कोई नहीं दिखेगा. लगातार पियराते चेहरों में धंसी आँखें जो दुनिया दिखाती हैं वहाँ भविष्य के उजले सपने नहीं होते, अँधेरी गलियाँ होती हैं बस, अंधे कुंए में उतरती सीढियां होती हैं केवल. आप इस दुनिया को देखते हैं और अपनी आँखें भी बंद नहीं कर पाते. धरती पर आज तक पता नहीं कितनी सभ्यताएँ पैदा हुईं फिर नष्ट हो गईं. शायद अब हमारी बारी है.

बुधवार, 18 जुलाई 2012

एक नरसंहार के खिलाफ़ जनता की आवाज़



छत्तीसगढ़  में निरीह आदिवासियों की बेरहम हत्या के खिलाफ़ दिल्ली में साथियों ने पहलकदमी ली. आदित्य प्रकाश की रपट  


निर्दोष आदिवासियों की हत्या बंद करो

सामाजिक संदर्भो और मानवाधिकारों से जुडी संस्था NCHRO और मिशन भारतीयम के तत्वावधान में खुली चर्चा  ‘’निर्दोष आदिवासियों की हत्या बंद करो‘’ विषय पर आयोजित की गयी, जिसमे आदिवासी मुद्दों से जुड़े कुछ प्रमुख समाजसेवियों स्वामी अग्निवेश जी, प्रो. जॉन दयाल जी, श्रीमती नंदिनी सुन्दर, विमल भाई, आशुतोष कुमार, हिमांशु कुमार जी, डॉ मरिनुस कुजुर, एडवोकेट मुबीन अख्तर, अनीसुस जमान शामिल हुए.

कार्यक्रम की शुरुआत नंदिनी सुन्दर द्वारा हाल ही में घटित छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सारकेगुडा में आदिवासी नरसंहार की घटना पर केंद्रित रही, जिसे सरकारी महकमे की माओवाद के खिलाफ सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया. इस जघन्य हत्या कांड पर प्रकाश डालते हुए नंदिनी सुन्दर जी ने, जो विगत कई वर्षों से आदिवासी मुद्दों से जुडी हुयी हैं, अपनी बात कही. उनके अनुसार मारे गए तथाकथित माओवादी जो लगभग अट्ठारह की संख्या में थे वो आदिवासी थे उनमे कुछ बच्चे और महिलाए भी थी. वो सभी खेती से पहले होने वाली पारंपरिक बीज पंदुम के उत्सव हेतु एकत्रित हुए थे जिन्हें सीआरपीएफ के जवानों ने बिना किसी चेतावनी के मार गिराया. उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया की यदि केन्द्रीय रिजर्व पुलिस की टुकड़ी घटना स्थल से सिर्फ तीन किलोमीटर की दूरी पर हैं तो क्या ये संभव हैं की माओवादी वहां पर कोई कार्यक्रम करेंगे. उन्होंने ये भी बताया कि जिन सत्रह लोगो कि हत्या कि गयी, उनमे से छह दस-बारह वर्ष के बच्चे भी थे. एक व्यक्ति कि हत्या सुबह के वक्त कि गयी. रात में तो अँधेरे कि बात कही जा सकती हैं पर यह तो दिनदहाड़े कि गयी हत्या हैं. घटना कि सच्चाई सामने आने के बाद, राज्य और केन्द्र सरकारों द्वारा विभिन्न तरह की बयानबाजी की जाने लगी, जो कि शुरू से ही संदेहास्पद हैं. उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह द्वारा दिए गए बयान जिसमे कि उन्होंने बच्चो और ग्रामीणों कि हत्या को नक्सलियों द्वारा मानव रक्षक के तौर पर इस्तेमाल किया गया, कि भी निंदा की. 


छत्तीसगढ़ आदिवासी समस्या से जुड़े स्वामी अग्निवेश ने अपनी बात रखते हुए, सरकार द्वारा प्रस्तावित मध्यस्थता पर भी सवाल उठाये. स्वामी जी ने राष्ट्रपति पद के दावेदार श्री संगमा जी की भी निंदा की और कहा की वो आदिवासी समाज से जुड़े होने का सिर्फ ढोंग कर रहे हैं, इस मुद्दे पर उनकी तरफ से कोई संवेदना नहीं व्यक्त की गयी. स्वामी अग्निवेश ने आदिवासी मामलो पर सुप्रीम कोर्ट  की भूमिका पर भी चिंता व्यक्त की.  

झारखण्ड से जुड़े आदिवासी कार्यकर्ता डॉ मरिनुस कुजुर ने माना कि इतनी विभत्स घटनाओं के बावजूद भी कोई आदिवासी प्रबल विरोध के लिए सामने नहीं आ रहा है. उन्होंने ग्रीन हंट पर हुई जनसुनवाई के तथ्यों को उजागर किया तथा जमीन कि समस्या, मानव संसाधनों कि समस्या पर अपने विचार रखे. उन्होंने बिरसा मुंडा और कानू जैसे आदिवासी विद्रोहियों से प्रेरणा को भी एक विकल्प रूप में रखा . 


माटू जनसंघठन तथा नर्मदा बचाओ अभियान से जुड़े विमल भाई ने सरकार द्वारा प्रायोजित हिंसा को सबसे जघन्य बताया साथ ही साथ उन्होंने ये भी कहा की विकास के इस प्रसार में सरकारें अपने लोगो की हत्या करवा रही हैं और भूमि संसाधनों का अनियमित दोहन कर रही हैं. उन्होंने विस्थापन के मुद्दे और आदिवासी अस्मिता पर भी कुछ प्रमुख सवाल उठाये, उन्होंने महात्मा गाँधी की कही बात को भी सबके सामने प्रस्तुत किया, ‘’अहिंसा बहादुरों का अस्त्र हैं कायरो का नहीं‘’. दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े आशुतोष कुमार जी ने अपनी अंडमान यात्रा के दौरान जारवा समुदायों से जुडी बात को भी सामने रखा की कैसे वो एक एक रुपये या रोटी के टुकड़े के लिए निर्वस्त्र होकर पर्यटकों के सामने नाचते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें संरक्षित श्रेणी में रखा हैं. उन्होंने आदिवासियों को बाह्य शक्तियों से संघर्ष करने वाला बताया. इस लिहाज से वो असभ्य नहीं बल्कि प्राकृतिक संरक्षण के लिए संघर्षशील जीवन व्यतीत कर रहे हैं. उन्होंने इन तमाम तरह की विभत्स घटनाओं को भारतीय राज्यों द्वारा किया जा रहा सुनियोजित युद्ध माना तथा शासन से किसी भी तरह के सुधार की सम्भावना को ख़ारिज किया. उनका कहना है की जनता द्वारा चुनी गयी सरकार उन्हें हथियार उठाने पर मजबूर कर रही है और फिर उसी आरोप में उनकी हत्या कर रही है. 

विगत अट्ठारह वर्षों से आदिवासियों के साथ रहकर काम कर रहे भाई हिमांशु जी ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा की आदिवासी ये कभी मान ही नहीं सकता की ये पहाड या नदी किसी के हो सकते हैं, साथ साथ ही कोई भी प्राकृतिक संसाधन निजी कैसे हो सकता है, टाटा या एस्सार इनके मालिक कैसे हो सकते हैं? ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ खनन के नाम पर उनकी निजता पर वार करती हैं और सरकार बन्दूक के दम पर इन्हें हटाना चाहती है, इनकी जमीन पर बड़े औद्योगिक केंद्र बनाना चाहती है, उन्होंने ये भी बताया की भारत का राष्ट्रपति आदिवासी समूहों का संरक्षक होता हैं और इस हिसाब से उनकी ये सीधी सीधी जिम्मेदारी बनती है. आदिवासी महिला सोनी सोरी से जुड़े मामले पर भी उन्होंने प्रकाश डाला और कुछ पंक्तियों से अपनी बात रखी की ‘’ मेरी मदद करो, मुझसे यह सब ले लो ‘’ . 

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता मुबीन अख्तर का मानना है कि मुद्दा महज आदिवासियों का नहीं, अल्पसंख्यकों का भी है उन्हें अलग-अलग नही बल्कि एक साथ सामने रखा जाना चाहिए. इनका यह भी मानना है कि पूंजीपति ही ऐसी स्थिति बनाते हैं और विद्रोह करने पर विवश करते हैं. वो यह भी कहते हैं कि जानबूझकर अभाव दिखाकर हिंसा को आमंत्रित किया जाता है. वो आपसी बातचीत को शांति का माध्यम कहते हैं. वरिष्ठ पत्रकार जॉन दयाल ने चर्चा की अध्यक्षता करते हुए अंत में इन तमाम घटनाओं को राजनीतिक गलियारों से जोड़ा और कहा कि ऐसे मुद्दों पर राजनीतिक एकता संभव नहीं है. उन्होंने राष्ट्रवादी पार्टियों की स्थिति पर असंतोष भी जाहिर किया. इस पूरी चर्चा में सरकारी हस्तछेप कि संदेहास्पद भूमिका आदिवासियों के विरुद्ध दिखती है. बेगुनाह लोगों की निर्मम हत्या के बावजूद देश कि संसद और विपछ की चुप्पी भी खल रही है. हमारी सरकारे उनको एक तरफ संरक्षण भी दे रही हैं और माओवादी बता कर उनकी हत्या भी कर रही है. ऐसे में आदिवासी समाज से लोगों का सामने न आना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है.




शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

लगता है कि झंझोड़ कर उठाये जाने के लिए तैयार हो जाना होगा.







मैं थक चुका हूँ.


पिछले तीन दिन मैंने अध्यापकों, रेल कर्मचारियों, ट्रक ड्राइवरों, नर्सों आदि के साथ एक नाकेबंदी से दूसरे नाकेबंदी पर घूमते हुए बिताये हैं. अब तक हमारे सेक्टर में हमने अर्नेजेस आयल डिपो को शुक्रवार सुबह चार बजे से अब तक पूर्णतः बंद रखने का कारनामा जारी रखा है. इसके परिणामस्वरूप, सत्तर किलोमीटर के घेरे में सभी पेट्रोल पम्प बंद हैं, उनके पास बिल्कुल भी ईन्धन नहीं है. मैं शुक्रवार की रात चार घंटे सोया, शनिवार को छः घंटे, सोमवार को दो घंटे...आज हमारे प्रयासों से अध्यापकों की प्रमुख यूनियन ने सभी हड़ताली अध्यापकों से आगे आकर बचे हुए ईंधन डिपो अवरुद्ध करने का आवाहन किया.

पुलिस हस्तक्षेप नहीं कर सकती, क्योंकि ट्रक ड्राइवरों ने आयल डिपो तक जाने वाले सभी प्रमुख रास्तों पर अवरोध लगा दिए हैं.


बिल्कुल भी ईंधन नहीं बचा और लोग अपने अपने घरों में अटके हुए हैं इस सच्चाई के बावजूद अविश्वसनीय तौर पर (आज हुए ओपिनियन पोल के अनुसार) 71 प्रतिशत जनता हड़ताल का समर्थन करती है.


यह आन्दोलन कम-अज़-कम एक हफ्ता और चलने की संभावना है. मैंने रविवार की पूरी रात ट्रांसपोर्ट (रेलवे और ट्रक) कामगारों के साथ ताश खेलते हुए और बियर पीते हुए बिताई. सुबह चार बजे के पास अच्छी-खासी ठण्ड (दो डिग्री सेल्सियस) थी, मगर रेल कामगार लकड़ी के डिब्बों के कई ट्रक भरकर ले आये और हमने एक बड़ा सा अलाव जलाया. पड़ोसी रेनोल्ट फैक्टरी के हड़ताली मजदूर पटाखे लेकर आये और हमने अलस्सुबह पटाखे चलाये.


आखिरी दम तक लड़ने के लिए मजदूर कृतसंकल्प हैं. जिन मजदूरों ने काम नहीं रोका उन्हें अपनी तनख्वाह का एक हिस्सा अत्यधिक 'महत्वपूर्ण' क्षेत्रों के मजदूरों को देने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. व्यक्तिगत तौर पर यह हड़ताल का मेरा छठा दिन है. कभी ख़त्म होने वाली हड़ताल बेहद प्रभावी तरीका शायद हो, इसलिए अब आम सहमति यह है कि 'रिवॉल्विंग' हड़तालों से हम लम्बे समय तक टिके रह पायेंगे.


'जनसामान्य' का सहयोग चौंकाने वाला है. जब हम हाइवे पर अवरोध लगाते हैं, तो ड्राइवर अक्सर हॉर्न बजाकर हमारा समर्थन करते हैं, हमें पैसे देते हैं, हमें अखबार थमाते हैं, बावजूद इसके कि हम उन्हीं का रास्ता रोक रहे हैं. अगले तीन दिनों तक हड़ताल पर रहने का मैंने फैसला किया है पर इसलिए क्योंकि मैं अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहता हूँ और यूनियन भी इस बात का समर्थन कर रही है. कुछ साथियों को घर गए चार दिन हो चुके हैं और यूनियन चिंतित है कि इससे उनके पति-पत्नियों को समस्या हो सकती है जिन्हें बच्चों की देखभाल करनी पड़ रही है और ऐसा होने पर हमारा संकल्प कमज़ोर ही होगा.


फ्रांस की सभी बारह रिफाइनरियाँ अगले शुक्रवार तक हड़ताल पर हैं. कई डिपो ब्लॉक कर दिए हैं. फ़्रांस की आधी रेलगाड़ियाँ ब्लॉक कर दी गई हैं (इसमें प्रमुख रेलवे जंक्शन शामिल हैं). प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों को जाने वाले रास्ते ट्रक ड्राइवरों ने रोक दिए हैं, और फैक्टरियां चल नहीं सकतीं क्योंकि उनके पास कच्चा माल नहीं है (माल का स्टॉक उन्होंने नहीं रखा क्योंकि उन्हें लगता है भंडारण महंगा पड़ता है).


जो भी हो, माहौल बयां नहीं किया जा सकता. हर क्षेत्र के मजदूर एकजुट और कृतसंकल्प हैं, और पहली बार कई मजदूर दूसरे उद्योगों में काम करने वाले लोगों से बात कर पा रहे हैं यह जानकर कि उनकी मंजिल एक है.


एकमात्र समस्या यह है, कि काम पर वापिस जाना मुश्किल होगा, बेहद मुश्किल. मगर सरकार की कृपा से जनता अगले हफ्ते तक हड़ताल पर बने रहने को तैयार है. आगे सोचेंगे.


यह एक आम हड़ताल है और जिन अनेकों आम मजदूरों से मैंने बात की है तब तक काम शुरू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जब तक सेवानिवृत्ति की उम्र फिर से साठ साल नहीं कर दी जाती.


कुछ समस्याएं अब भी है, बावजूद इसके कि पिछले मंगलवार के बाद से बहुत कुछ पा लिया गया है.


1) हड़ताल अब अनिश्चितकालीन है.

2) यूनियन के सदस्य अब यूनियन के अधिकारियों से सहायता मांग रहे हैं और वे सहायता करने को मजबूर हैं.

3) आम राय ज़बरदस्त रूप से हड़ताल के पक्ष में है

4) अवरोध का आर्थिक प्रभाव मालिकों द्वारा बढ़ता महसूस किया जा रहा है, और वे समझ नहीं पा रहे हैं कि सरकार का अनुसरण करें या समझौते की मांग करें.

5) विभिन्न क्षेत्रों के कामगारों के बीच सच्चा साहचर्य हड़ताल से पैदा हुआ है, और ब्लू कॉलर और व्हाइट कॉलर मजदूरों के बीच की दूरी पाटी जा रही है.

6) तनख्वाह के नुकसान के बावजूद, कामगारों का इरादा अब भी बेहद मज़बूत है, क्योंकि वे वास्तव में देख रहे हैं कि अगर उन्हें पैसों का नुकसान हो रहा है तो उनके मालिकों को भी.

नकारात्मक बिंदु:


1) सरकार ने आपात स्थिति की घोषणा कर दी है 'जो देश को बर्बाद करना चाहते हैं' उन को कारावास की सजा देने की धमकी दे रही है. बेशक इन धमकियों को कोई गंभीरता से नहीं ले रहा, फिर भी....


2) भड़काने वाले तत्त्व सरकारी इमारतों को जला रहे है और उसका इल्जाम हड़तालियों पर लगा रहे हैं.

3) सरकार 'शान्ति बहाल करने वाली' दिखाई देने की कोशिश में है और यूनियनों पर 'अलोकतांत्रिक व्यवहार' का आरोप लगा रही है 'क्योंकि धरना देने वालों की कतारें उन लोगों को रोक रही हैं जो काम पर जाना चाहते हैं'

4) यूनियन कार्यकर्ताओं और यूनियन नेताओं के बीच तनाव बढ़ रहा है. अफवाह है कि नेतागण 'बिकवाली' के लिए तैयार हैं.

5) वामपंथी राजनीतिक पार्टियाँ लोगों से कह रही हैं कि हड़ताल पर जाना अच्छी बात है, मगर २०१२ के राष्ट्रपति चुनावों में 'समाजवादी' प्रत्याशी को वोट देना ही एकमात्र रास्ता है. हाँ! 'समाजवादी' सरकार, बिल्कुल यूनान देश की तरह.

अब तक मैंने अपना चौथा मासिक वेतन खोया है, अनजान लोगों ने मेरी कार का शीशा चकनाचूर कर दिया, मगर मैं बेहद ख़ुशी महसूस कर रहा हूँ जिस तरह आम जनता ने फैसला किया कि अब बहुत हो चुका.

लगता है कि झंझोड़ कर उठाये जाने के लिए तैयार हो जाना होगा.




(मार्क्सिज्म मेलिंग लिस्ट पर फ़्रांस से डैन के. की पोस्ट; अन्य तस्वीरें यहाँ देखी जा सकती है)