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शनिवार, 21 अगस्त 2010

कला, प्रतिबद्धता और शमशेर

विशिष्ट कलाबोध के प्रतिबद्ध कवि शमशेर

(एक)

पता नहीं यह सिद्धांत प्रतिपादन किसने किया (या किसी ने किया भी कि नहीं) लेकिन कम से कम हिन्दी में प्रतिबद्धता और कला संपन्नता को कविता का दो छोर मान लिया जाता है। या यूं कहें कि कलाबोध और कलावाद को समानार्थी। इसका परिणाम यह हुआ कि एक तरफ़ तो प्रतिबद्धता की होड़ में ऐसी-ऐसी कलाहीन और फूहड़ रचनायें साहित्य के बस्ते में भरी पड़ी हैं (और लगातार भरती जा रही हैं) जो साहित्य और प्रतिबद्ध राजनीति, दोनों को कंगाल बना रही हैं तो दूसरी तरफ़ तमाम जेनुइन कवि अपनी सहज संवेदनशीलता तथा कलासंपन्नता के कारण कलावादी क़रार कर दिये गये। इससे नक़ली प्रतिबद्धता, नक़ली कविता का प्रतिष्ठापन तो हुआ ही साथ ही असली कलावादियों की पहचान भी धुंधली हुई। कविता की अंतर्वस्तु की जगह उसके बाह्य रूप पर ज़्यादा ध्यान देने, कला के एक औज़ार के रूप में सामाजिक परिवर्तन तथा सौंदर्य बोध के परिष्कार में कविता की भूमिका को सांगोपांग रूप में देखने की जगह उससे संघर्ष के दूसरे हथियारों की तरह प्रत्यक्ष भूमिका निभाने की अपेक्षा तथा उसके प्रतिबद्धता को विचार से अधिक कुछ संगठनों से जोड़कर देखा गया। बम्बईया फिल्मों का साहित्य पर कितना प्रभाव पड़ा यह कहना तो मुश्किल है लेकिन यह ज़रूर है कि उन्हीं की तरह साहित्य में भी ब्रांडिंग का काम ख़ूब हुआ। जो एक बार हीरो बन गया वह बस हीरो ही रहा और जिसे एक बार विलेन बना दिया गया उसे हमेशा के लिये विलेन ही रहना होगा। हिंदी की पूरी आलोचना का बड़ा हिस्सा इसी ब्रांडिग और फतवेबाजी के भरोसे अपना काम चलाता रहा। कवियों को अलग-अलग कारणों से अलग-अलग खांचों में बिठा दिया गया और फिर उन्हीं खांचों के इर्द-गिर्द उनकी कविता को फिट करने की कोशिशें हुईं। इस प्रवृत्ति ने ज्यादातर कवियों को उनके पूरे आदमकद रूप में देखे जाने और सफ़ेद-स्याह के बीच का उनका असली धूसर रंग पहचाने जाने को लगातार और अधिक मुश्किल बना दिया। कवियों के कवि कहे गये शमशेर भी इसी का शिकार हुए।

शमशेर मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल और बाबा नागार्जुन के साथ स्वातत्रयोंत्तर हिन्दी कविता की जनपक्षधर धारा को कम्पलीट करते हैं। इन चारों का नाम साथ लेने की वज़ह स्पष्ट है। इनमें जो चीज़ कामन है वह है इनकी सहज जनपक्षधरता लेकिन इस एक समान प्रत्यय के साथ इनकी रचनाशीलता में जो अपार विविधता है वह हिन्दी के कविता संसार को वह समृद्ध आधार देती है जिसके ऊपर इसका बहुरंगी और बहुआयामी विकास हो सकता था और एक हद तक हुआ भी। मुक्तिबोध जहां अपने समय के वैचारिक संघर्ष में अपनी फैंटेसी के माध्यम से हस्तक्षेप करते हैं, नागार्जुन और केदार जी अपनी पूरी ताक़त से अभिधा में सीधे-सीधे टकराते हुए कविता और ज़रूरी नारे रचते हैं शमशेर अपने विशिष्ट कलाबोध से मनुष्यता के पक्ष में एक बेहतर प्रतिसंसार रचते हैं। वह कला और संगीत के उपकरणों से सिंफनियां रचते हैं और इस प्रकार उस राजनैतिक लड़ाई के सांस्कृतिक पक्ष में अपना अवदान देते हैं। उनका लेखन कला के लिये कला नहीं है। वह कला का उन्नयन है, कला का परिष्कार है, कला का शोधन है। अपने आरंभिक काल से लेकर अंत तक उनकी कविता में मनुष्य तथा उसके संघर्षों का प्रवेश कभी बाधित नहीं होता। हां वह मूलतः वैसी राजनैतिक कविताओं के ही कवि नहीं है जैसे कि केदार जी, बाबा नागार्जुन या मुक्तिबोध हैं।

(दो)

हक़ीक़त को लाये तखैयुल से बाहर
मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाये

शमशेर का यह शेर मुझे बेहद अर्थपूर्ण लगता है और उनके कवि व्यक्तित्व के तलाश का एक ज़रूरी सूत्र भी। शमशेर ने तमाम ग़ज़लें कही हैं। लेकिन तुक और लय के कविता से निष्काषन का ही यह प्रभाव रहा हो शायद कि उन पर बात करते हुए अक्सर इन ग़ज़लों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है। ख़ैर, इस शेर में हक़ीक़त को कल्पना से बाहर लाने की उनकी जो मुश्किल थी वही आजीवन उनके कवि को व्यग्र और समृद्ध करती रही। यह पूरी प्रक्रिया दो स्तरों पर चली- एक में उनका शोधस्थल समाज रहा तो दूसरे में मनुष्य,प्रेम और प्रकृति। ज़ाहिर है उनके लिये ये दोनों विरोधाभासी नहीं थे अपितु नये समाज, नये मनुष्य और नये सौंदर्यबोध की तलाश के अनिवार्य हिस्से थे, और इस अर्थ में एक-दूसरे के पूरक। इनमें से किसी एक को उठाकर उन्हें किसी पूर्वनिर्धारित सांचे में बिठा देना बौद्धिक बेईमानी के अलावा कुछ नहीं। शमशेर का मूल्यांकन न तो केवल वाम-वाम दिशा, समय साम्यवादी जैसी कविताओं के आधार पर किया जा सकता है न ही एक पीली शाम, पतझर का ज़रा सा अटका हुआ पत्ता, शांत जैसी कविताओं के आधार पर। असली शमशेर इन दोनों से मिलकर बनते हैं वैसे ही जैसे वह उर्दू और हिन्दी से मिलकर बनते थे। शमशेर के मूल्यांकन की समस्या वह नहीं हैं, समस्या है हमारी शुद्धतावादी एकांगी दृष्टि।

शमशेर की एक कविता है बाढ़ 1948 जिसमें उन्होंने डायरी की तरह अपने समय को दर्ज़ करते हुए अपने कई समकालीनों पर लिखा है। इसी कविता में नेमिचन्द्र जैन के बारे में लिखते हुए वह कहते हैं

नेमि
रेखा
इप्टा
नाटक…
जीवन लेखा
आज का उपहास्य
भूख का आलोच्य
आर्ट
तुम कल्पना के पुतले
नहीं हो
तुम कम्युनिस्ट पार्टी की मशीन
नहीं हो
(लोग ग़लत कहते हैं)
तुम कला का मौन
शांत
विवाह
संघर्ष के साथ-हो;
तुम कम्युनिस्ट हो,
यानी कलाकार
का कर्म
यानी भविष्य का
मर्मभाव
आज के नाटक के अंत में!

इसके बाद वह जोड़ते हैं इस नाटक का अंत मैं हूं/मैं शमशेर/एक निरीह/फ़तह…! यह कविता शमशेर की कला और राजनीति के प्रति दृष्टि को बिल्कुल साफ़ करती है। प्रतिबद्ध होने का अर्थ कम्युनिस्ट पार्टी का मशीन होना नहीं है उनके लिये न ही कलाहीन शोर-गुल। उनके लिये प्रतिबद्धता का अर्थ है कला का मौन शांत विवाह संघर्ष के साथ और उनका काव्यजीवन इसी मौन शांत विवाह का गरिमामय निर्वाह है। यह अकारण ही नहीं है कि मौन उनकी कविताओं में बार-बार आता है और देर तक आपके भीतर रहता है।

(तीन)

जो लोग शमशेर को कलावादी या फिर हृदय से कलावादी लेकिन चेतना के स्तर पर वामपंथ के साथ जैसी उपमाओं से नवाजते हैं वे दरअसल उनके इसी गरिमामयी मौन का फायदा उठा रहे होते हैं। एक वाम-वाम-वाम दिशा, समय साम्यवादी को छोड़ दें तो उनके काव्य में गर्जन-तर्जन नहीं है। उनका विरोध भी एक ख़ास तरह की काव्य गरिमा के साथ सामने आता है। उन्हें हर कविता में अपने वामपंथी होने या फिर कविता से केवल प्रत्यक्ष प्रतिरोध के हथियार का काम लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जब वह प्रेम पर लिख रहे होते हैं तो एक सहृदय और सहयात्री प्रेमी होते हैं, प्रकृति पर लिखते हुए वह प्रकृति के चितेरे हैं कला में डूबते हुए वह रंगो की दुनिया के वासी हैं जहां शब्द ऐसे बरते जाते हैं मानों मद्धिम रंग और यह सब करते हुए उनका मुक्तिकामी और प्रगतिशील कवि लगातार अपने समय के साथ लगातार संघर्षरत भी है। जिन कविताओं में वह मुखर तौर पर इन विसंगतियों पर बात करते हैं वे भी अपनी पूरी कलात्मकता के साथ आती हैं। यह आलोचकों का पूर्वाग्रह ही है कि अक्सर वे इन कविताओं को अपेक्षाकृत कमज़ोर कहकर ख़ारिज़ करते हैं- मानो प्रेमगीत और रणभेरी में तुलना की जा सके, मानों पेंटिंग और पोस्टर में तुलना की जा सके, मानो इनमे से किसी एक को दूसरे से निरपेक्ष तौर पर बेहतर बताया जा सके!

उनकी एक कविता है घिर गया है समय का रथ … यहां समय भी है और उसका अद्भुत कलात्मक चित्रण भी। कविता का आरंभ रात के चित्रण से होता है। लेकिन वह काली रात मौन संध्या का दिये टीका आती है चमकते तारे लजाते हैं और फिर

भेद ऊषा ने दिए सब खोल
हृदय के कुल भाव
रात्रि के अनमोल
दुख कढ़ता सजल, झलमल
आंख मलता पूर्व स्रोत

पुनः जगती जो।
आप देखें तो इस कविता का एक असावधान या अंतिम खण्ड को छोड़कर किया गया पाठ आपको कला की मौन एकांतिक साधना सा कुछ लग सकता है। प्रकृति का कूचियों से किया चित्रण। लेकिन कविता जब आगे बढ़ती है और कहती है कि

घिर गया है समय का रथ कहीं
लालिमा से मढ़ गया है राग
भावना की तुंग लहरें
पंथ अपना, अंत अपना जान
रोलती हैं मुक्ति के उद्गार

तो यह एंटीक्लाईमेक्स नहीं कविता का सहज पाथेय है। कविता वहीं पहुंचती है जहां उसे पहुंचना था लेकिन अपनी शमशेरियत के साथ, उस गरिमापूर्ण मौन के साथ जिससे संयुक्त एक गंभीर शब्द हज़ार-हज़ार नारों और भयावह गर्जन-तर्जन से अधिक प्रभावी है। जो निर्वात में एकालाप की तरह नहीं बल्कि जुलूस में साथी की तरह आपके पास आता है, किसी कुमार गंधर्व की नाद की तरह आपके भीतर उतरता है और अपनी स्थाई जगह बना लेता है। ऐसे ही ग्वालियर में मज़दूरों की नृशंष हत्या के क्षोभ से उपजी उनकी कविता शाम है ऐसी विषम परिस्थिति में न तो आपा खोकर विलाप करती है न ही असंतुलित क्रोध का प्रदर्शन। वह उस पूरे क्षोभ, उस पूरे क्रोध को एक परिपक्व कविता की शक़्ल में दर्ज़ करती है अपने परिवर्तनकामी सौंदर्यबोध के साथ-

शाम है
कि आसमान खेत है पके हुए अनाज़ का
लपक पड़ी लहू-भरी दरांतियां
कि आग है
धुआं-धुआं सुलग रहा
ग्वालियर के मज़ूर का हृदय-

क्या एक कलाकार अपने प्रतिरोध को रंगो और गंध के साथ दर्ज़ नहीं कर सकता!

और शमशेर की ऐसी कवितायें ढूंढ़ने के लिये उनके जीवनकाल में प्रकाशित किसी भी कविता संकलन में विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता- हां उनके बाद प्रकाशित संकलनों में आपको मुश्किल हो सकती है। उदाहरण के लिये रंजना अरगड़े द्वारा संपादित संकलन कहीं दूर से सुन रहा हूं ( राधाकृष्ण प्रकाशन, 1995) में 1938-39 से 1992 की उनकी अंतिम कविता लिखे जाने के लंबे या लगभग संपूर्ण रचनाकाल से संकलित उनकी कविताओं में न काल तुझसे होड़ मेरी है है, न लेनिनग्राद, न अफ्रीका और न बात बोलेगी पूर्वोद्धृत कविताओं को तो जाने ही दें। यही नहीं, शमशेर ने अपने तमाम समकालीनों पर जो कवितायें लिखीं हैं उनमें से भी सिर्फ़ एक का चयन किया गया है- अज्ञेय का! वह भी अज्ञेय से नहीं जहां वह मौज़ में कहते हैं- जो नहीं है/जैसे कि सुरुचि/उसका ग़म क्या? वह नहीं है अपितु वहां है- सादर अज्ञेय के जन्मदिवस पर समर्पित कविता है! गजानन माधव मुक्तिबोध, त्रिलोचन के लिये लिखी सारनाथ की एक शाम, नागार्जुन के लिये लिखी कवितायें न देकर सिर्फ़ अज्ञेय को सम्मान देने की यह कहानी उस शमशेर से उसकी शमशेरियत छीन लेने का प्रयास है जो कहता है कि
क्रांतियां, कम्यून
कम्यूनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं

और काल तुझसे होड़ है मेरी कविता का यह अंश उनके युवपन के वामपंथी ज्वर का असर नहीं है- यह कविता अस्सी के दशक में लिखी गयी थी, उनके जीवन के उत्तरार्ध में। इकहत्तर साल की उम्र में वह कह रहे थे- ''राह तो एक थी हम दोनों की:आप किधर से आए-गए!- हम जो लुट गए पिट गए, आप जो, राजभवन में पाए गए!'' और यह भी कि इसी दौर में वह प्रेम और सौंदर्य की अप्रतिम कवितायें भी रच रहे थे। कोई संकलन जिससे एक ठोस बदन अष्टधातु का जैसी उनकी सारी प्रेम कवितायें बहिष्कृत कर दी जायें वह भी उतना ही एकांगी और बेईमान होगा।

(चार)

अंत में बस इतना कि जन्म शताब्दी और मृत्यु का अठारहवां साल किसी कवि के बारे में एक तार्किक, समेकित और ईमानदार दृष्टि बना लेने के लिये काफी होने चाहिये थे। ख़ासतौर पर वह कवि जो अपने जीवनकाल में ही इन सांचों से आजिज आ चुका हो-

लेखक (और लेखक ही क्यों)
- एक सांचा है,
उस सांचे में आप फिट हो जाइये
- हर एक के पास एक सांचा है। राजनीतिज्ञ,
प्रकाशक,…शिक्षा संस्थानों के
गुरु लोगों के पास्। …यह लाबी,वो लाबी।
रूस के पीछे-पीछे। नहीं अमरीका के।
नहीं चीन के। अजी नहीं,अपने घर के
बाबाजी के।इस झंडे के,उस झंडे के

(डायरी,1978)
इन अठारह सालों में शमशेर को उन सांचो से मुक्त कर उनके पूरे कवि को उसके विशिष्ट सौंदर्यबोध तथा समझौताहीन प्रतिबद्धता के साथ देख पाने लायक नज़र विकसित करने भर का बालिग तो हिन्दी आलोचना को हो ही जाना चाहिये था। लेकिन अपने-अपने पक्ष में उन्हें खींचने की ज़िद में हिन्दी साहित्य के दोनों खेमों की हास्यास्पद कोशिशों ने उन्हें त्रिशंकु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उम्मीद की जानी चाहिये कि इस साल हो रहे तमाम आयोजनों की मज़बूरी में किये जा रहे उनके पुनर्ध्ययनों के दौरान हमारे आलोचक बंधुओं को पूरा शमशेर दिखाई दे और वे हक़ीक़त को तखैयुल से बाहर लाने का मुश्किल लेकिन ज़रूरी काम कर सकें।

( रचना समय के कवि बोधिसत्व द्वारा संपादित 'शमशेर अंक' में प्रकाशित आलेख)

बुधवार, 14 जुलाई 2010

जन्मशती वर्ष में शमशेर पर पहला विशेषांक आ चुका है…

हिन्दी कविता के लिये यह उत्सव का वर्ष है और साथ ही अपनी प्रगतिशील परंपरा की स्मृति ताज़ा कर अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप के लिये शक्ति जुटाने का। शमशेर, नागार्जुन,केदार नाथ अग्रवाल और फैज अहमद फैज की जन्मशताब्दियों के इस वर्ष में होने वाले तमाम आयोजन बस उत्सव बनकर न रह जायें, इसके लिये ज़रूरी है कि उन सरोकारों और उन स्वप्नों तक पहुंचने के प्रयास किये जायें जिनसे उन्हें अपनी कविता के लिये प्राणशक्ति मिलती थी।

इस साल कवि शमशेरकी जन्मशती पर उन पर केन्द्रित पहला अंक आ गया हैभोपाल से हरि भटनागर के संपादन में निकलने वाली पत्रिका रचना समय के इस अंक का सम्पादन किया है बोधिसत्व ने।

अंक पूरी तरह कविताओं पर केन्द्रित है… अंक की ख़ासियत है कि यहां शमशेर के समकालीनों, अज्ञेय,रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, मलयज से लेकर कुंअर नारायण, विष्णु खरे,अशोक बाजपेयी, प्रभात त्रिपाठी, उदय प्रकाश,राजेश जोशी,मंगलेश डबराल,अरुण कमल,देवी प्रसाद मिश्र,एकांत श्रीवास्तव से होते हुए सुंदर चंद ठाकुर ,शिरीश मौर्य, विशाल श्रीवास्तव, अशोक कुमार पाण्डेय ,रविकांत तक की बिलकुल युवा पीढ़ी तक के कवियों ने 'अपने' कवि शमशेर को समझने-बूझने तथा उनकी कविताई से जूझने का प्रयास किया है। यहां तीन या चार पीढ़ी के कवि एक साथ उपस्थित हैं और शमशेर की कविता पर कवियों का लिखा निश्चित तौर पर आलोचना को समृद्ध करेगा।

इसके अलवा शमशेर की मलयज, नेमिचन्द्र जैन, तथा विनोद दास से बातचीत है, उनकी डायरियों के अंश …और भी बहुत कुछ।

100 रु मूल्य की इस पत्रिका को हरि भटनागर 197, सेक्टर-बी,सर्वधर्म कॉलोनी, कोलार रोड, भोपाल(म.प्र.)-42 से मंगाया जा सकता है। उनका फोन नंबर है -9424419567 और मेल आई डी है - haribhatnagar@gmail.com

रविवार, 9 मई 2010

जन्मशती पर शमशेर स्मरण

अतृप्ति का विवेक : शमशेर
  • अरुण माहेश्वरी
(अरुण जी नियमित तौर पर अपने आलेख जनपक्ष पर उपलब्ध करा रहे हैं। हम उनके इस सहयोग के लिये आभारी हैं)

बात बोलेगी… हम नहीं!
जन्म शताब्दी के मौके पर शमशेर बहादुर सिंह का स्मरण आदमी की अंतहीन दबी हुई इच्छाओं के एक पावन खजाने के स्मरण जैसा है। चुका भी हूं मैं नहीं, कहां किया मैंने प्रेम अभीकी अतृप्ति का रचनाकार, ‘आज निरीह कल फतहयाब निश्चितके आत्मविश्वास से परिपूर्ण मानवता के भविष्य पर अटूट आस्था वाला सच्चा साम्यवादी, ‘बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात हीकहने वाला यथार्थवादी, और सर्वोपरि जनजन का हितैषी, एक निश्छल और सहज इंसान शमशेर की कविताएं इसका यथेष्ट साक्ष्य है।

शमशेर अपनी सादगी के कारण ही प्रपंचों भरी इस दुनिया में सारी जिंदगी अनेक लोगों के लिये एक अबूझ पहेली बने रहे। उनमें घोषित मार्क्सवादी तक शामिल रहे हैं, उत्कट आत्मवादी और सुरुचिसंधानीआभिजात्यों की तो बात ही क्या! प्रकृति और मानव के अंतहीन रहस्यों तथा अनगिनत रंगों को विस्मय की फंटी आंखों से देखने की शमशेर की मानवसुलभ जिज्ञासाओं ने बहुत सारे लोगों को भरमाया है, उन पर रहस्यसाधना’ (डा. रामविलास शर्मा की शब्दावली) के प्रेतों की छाया से आशंकित किया है, जनमन के कवि को कवियों का कविघोषित करने के लिये उत्साहित किया है। दरअसल खंडित मनुष्यता के आज के समय में शमशेर की तरह का एक पूर्ण इंसान, जिसके लिये मार्क्‍स के शब्दों में, मानवोचित किसी भी वस्तु से कोई परहेज नहीं था, स्वयं में किसी महारहस्य का रूप न ले, तो यही आश्चर्य की बात होती। न अपने जीवन में और न अपनी कविता में ही उन्होंने इस पूर्णता की, स्वप्न और यथार्थ की द्वंद्वात्मक एकता की अवहेलना की, इसीलिये जितना उन्होंने अपने से बाहर के यथार्थ को व्यक्त किया, मन के भीतर की अथाह गहराइयों, वस्तु के अतियथार्थवादी बिंबों को भी उन्होंने सदा उतना ही महत्व प्रदान किया। प्रेम के दुर्लभ क्षणों की अतिवायवीय और अति मांसल अनभूतियों से लेकर जनजीवन की कठिनतम चुनौतियों और क्रांति की गहरी समस्याओं तक उनके व्यक्तित्व, उनकी कविता और उनकी चिंताओं का सहज विस्तार था और यही सहजता तथा उनके व्यक्तित्व की दुर्लभ निश्छलता ही उनकी रचनाओं के सौंदर्य का राज थी, दबी हुई इच्छाओं और अतृप्ति की पावनता का स्रोत थी। जो कभी बुरा नहीं सोच सकता, जो अपने अवचेतन की अंतिम तहों तक में शिव और सुंदर की ही कामना करता है और जो सुप्त नहीं, पूरी तरह जागृत मानव है, उसकी रचना कभी बुरी नहीं हो सकती शमशेर एक ऐसे ही कवि थे।

शमशेर की कविताएं यथार्थ और स्वप्नों के अनेक रंगों वाले निकटस्थ और दूरस्थ परस्पर विलीन होते बिंबों का, मौन और मुखर भावों का एक ऐसा निजी संसार है, रिक्तताओं की ऐसी आकर्षक घाटियां हैं जो पाठक को किसी सम्मोहक इन्द्रजाल की भांति अपनी ओर खींचती तथा गहरे उतारती जाती है। कोरा प्रलाप और अनापशनाप की गहरी खाइयों में महीन चेतना की जो रोशनी शमशेर की कविताओं में दिखाई देती है, उसमें कवि नहीं, उसका पाठक भी स्नात हो अनूठी अनुभूतियों की खुमारी में खो जाता है। जैसे पाठ की रिक्तताओं से बोलते अर्थ पात्र की सामर्थ्‍य के अनुरूप खुलते खुलते ही खुलते हैं शमशेर का विलयनशील, मौन बिंबों का महीन और चेतन काव्य भी पाठक से उसकी पात्रता का प्रमाणपत्र जरूर मांगता है।

देहरादून के एक संपन्न और शिक्षित जाट परिवार में जन्मे शमशेर का जीवन शुरू से नाना कारणों से बड़े उद्देश्यों का एकाकी जीवन रहा। 9 वर्ष की उम्र में ही मां चल बसना, पढ़ाई के समय होस्टल का जीवन, 24 वर्ष की उम्र में सिर्फ़ 6 वर्ष साथ निभा कर पत्नी का गुजर जाना और उसके चार वर्ष बाद ही पिता का न रहना। साथ रह गया किताबों का, पत्रिकाओं और कविताओं का। युवा वय में ही माडर्न रिव्यू’,‘रूपाभ’, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘नया साहित्यतथा रवीन्द्रनाथ, सरोजिनी नायडू, एजरा पाउंड और निराला की कविताओं के रोमांच को वे उम्र की अंतिम घड़ी तक भुला नहीं पाये थे। इसके अलावा पार्टी, उसका कम्यून, साहित्यकारों की संगत, मजलिसें और मार्क्‍सवाद।

उर्दू के शहरी और महीन मिजाज को संस्कारों और साधना, दोनों से ही उन्होंने काफी हद तक जज्ब कर लिया था। उर्दू को वे गंगाजमुना के दोआब वाले उस क्षेत्र की खड़ी बोली का सबसे स्वाभाविक विकास मानते थे और उधर के जनमानस की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम। उनका कहना था, उर्दू हमारे भावों को जन के साथ अधिक निकटता से प्रकट करती है। (कवियों का कवि शमशेर, रंजना अरगड़े, पृ.210)। यही वजह है कि अपने क्षेत्र के परिवेश को, वहां की जनसंस्कृति को, जनता का कवि बनने की अपनी आस को पूरा करने के लिये ही सारी उम्र वे उर्दू को साधते रहे, लेकिन कवि बने हिंदी के ही। मैं उर्दू और हिंदी का दोआब हूं उनकी कई आंतरिक इच्छाओं की तरह की एक इच्छा ही रह गयी, सचाई यह है कि उर्दू में तो वे कविता का ककहरा पढ़ते रहे, हिंदी में सचमुच नयी जमीन तोड़ डाली।

शमशेर ने दिल्ली जाकर पेंटिंग की बाकायदा शिक्षा ली थी। उनके चित्रांकन में सफाई थी, रेखाओं में गति और अर्थ भी थे लेकिन वे चित्रकार नहीं बने। हालांकि, पेंटिंग के प्रशिक्षण ने रंगों के उनके बोध को इतना जागृत कर दिया कि बाद में उनका कोई भी काव्य बिंब रंगविहीन नहीं रहा हमेशा उनके पसंदीदा रंगों की छाया बिंबों के अनुरूप विलयित रंगों में उनके समूचे सृजन का अभिन्न अंग बनी रही।

बनारस में त्रिलोचन का साथ, इलाहाबाद में इप्टा के लोगों से संपर्क, गालिब, निराला, फैज के अलावा ांस के सुरियलिज्म के आंदोलन, ब्रेतां और उसकी लोक घोषणा, अमेरिकी कवियत्री मैरियम मूर और एडिथ सिट्वेल आदि के प्रभावों से बन रहे शमशेर सन् 45 में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनें और मुंबई के पार्टी कम्यून के निवासी। उन्हीं दिनों की कविता है– ‘‘वाम वाम वाम दिशा/समय साम्यवादी/हीन भाव, हीन भाव/मध्यवर्ग का समाज, दीन/किंतु उधर/पथ प्रदर्शिका मशाल/कमकर की मुट्ठी मेंकिंतु उधरआगेआगे जलती चलती है/लाल लाल.../वामपक्षवादी है.../समय साम्यवादी।‘‘

12 जुलाई 1944 के दिन रोटियां टंगे लाल झंडों को लिये ग्वालियर के मजदूरों पर रियासती सरकार ने गोलियां चलाई, इधर शमशेर की कविता आई, – ‘‘ये शाम है।‘‘ ‘‘ये शाम है कि/आसमान खेत है पके हुए अनाज का/लपक उठी लहू भरी दर्रातियांकि आग है:/धुंआधुंआ/ सुलग रहा/ग्वालियर के मजदूर का हृदय।.../गरीब के हृदय/टंगे हुए/ कि रोटियां लिये हुए निशान/लाललाल/जा रहे /कि चल रहा/लहू भरे ग्वालियर के बाजार में जुलूस/जल रहा/धुआंधुआं/ग्वालियर के मजदूर का हृदय।‘‘

‘‘बात बोलेगी‘‘ इसी दौर की कविता है। कम्युनिस्टों के अभिवादन पर उनके एक मुक्तक की पंक्तियां हैं:
‘‘यह सलामी दोस्तों को है, मगर मुट्ठियां तनती है दुश्मन के लिए।‘‘

शमशेर सन् 1948 तक ‘‘माया‘‘ के सम्पादक रहे। 1951 के दूसरे सप्तकमें प्रयोगवादी समझे जाने वाले कवियों भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंत माथुर, हरिनारायण व्यास, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती के साथ ही शमशेर की बीस रचनाएं प्रकाशित हुई थी। इन रचनाओं के साथ दिये गये अपने वक्तव्य में शमशेर ने लिखा – ‘‘उसको (यानी कि अपने चारों तरफ की जिंदगी को) ठीकठाक यानी वैज्ञानिक आधार पर (मेरे नजदीक वह वैज्ञानिक आधार मार्क्सवाद है) समझना और अनुभूति और अपने अनुभव को इसी समझ और जानकारी से सुलझा कर, स्पष्ट करके, पुष्ट करके अपनी कलाभावना को जगाना। यह आधार इस युग के हर सच्चे और ईमानदार कलाकार के लिये जरूरी है।‘‘

शमशेर ने अपने समकालीनों को जैसे देखा, उसमें खुद उनको भी देखा जा सकता है। मुक्तिबोध उनके लिये निराला के बाद सबसे मीनिंगफुल पोइट थे। उनकी बीमारी के दिनों में वे उनकी सेवा कर रहे थे और हर दिन लौट कर एक शेर लिखा करते थे। एक ही मीटर में लिखे गये उन शेरों से अंत में जो पूरी गजल बनी, उस गजल का अंतिम शेर है
‘‘वो सरमस्तों की महफिल में मुक्तिबोध आया/सियासत जाहिदों की खन्दएदीवाना हो जाए

नार्गाजुन ठेठ जनता की ठाठ के अनमोल खजाने जैसे थे। ‘‘बाबा हमारे, अली बाबा/नार्गाजुन बाबा.../बहादुर कविता के जीतेजागते/कभी न हार मानने वाली जनता के/बहादुर तराने/और जिंदा फसाने.../ऐसे खजाने कविता की/झोली में बरसाते/हमारे बाबा अली बाबा/नार्गाजुन बाबा।‘‘

शमशेर की कविताओं में प्रकाशचंद गुप्त, सज्जाद जहीर, आर.डी.भारद्वाज, रजिया सज्जाद जहीर, भुवनेश्वर, प्रभाकर माचवे से लेकर मोहन राकेश, रघुवीर सहाय और अज्ञेय भी आए हैं। अज्ञेय उनके लिये एक महत्वपूर्ण हस्ती थे। उनके पहले संकलन, जगत शंखधर द्वारा संकलित ‘‘चुनी हुई कविताएं‘‘ की अंतिम कविता है– ‘अज्ञेय से। सम्पर्क में आये अन्योंं के प्रति एक आंतरिक स्वीकार का जो भाव शमशेर में अक्सर देखने को मिलता है, अज्ञेय के मामले में वे थोड़ा ठहर कर उनके आभिजात्य की वेदनाओं को सहला भर के रह जाते हैं। ‘‘जो नहीं है/जैसे कि सुरुचि/उसका गम क्या?/वह नहीं है।/किससे लड़ना?/रुचि तो है शांति,/स्थिरता,/कालक्षण में/एक सौंदर्य की/मौन अमरता।/अस्थिर क्यों होना/फिर?/जो है उसे ही क्यों न संजोना?/उसी के क्यों न होना?/जो कि है।‘‘

अज्ञेय जी के ड्राइंग रूम में वान गौग के चित्र को देखकर उन्होंने एक कविता लिखी थी। लेकिन दिलचस्प है मोहन राकेश और रघुवीर सहाय पर उनकी कविताएं। अन्य सभी शमशेर के हमसफर थे, लेकिन मोहन राकेश से उनका वैसा कोई संबंध नहीं था। रंजना अरगड़े को उन्होंने कहा भी था कि ‘‘असल में मोहन राकेश के साथ मेरा बहुत कम परिचय था। वैसे भी मैं संकोची हूं। मैं स्वभाव के कारण कभी उनके यहां गया नहीं।‘‘ फिर भी राकेश उनकी जिज्ञासाओं और आकर्षण के कारण जरूर बने थे। इसका पहला कारण था राकेश की संस्कृत की पृष्ठभूमि और दूसरा सबसे बड़ा कारण था सिफ‍र् कलम के बूते, बिना किसी नौकरी के सहारे के एक सम्मानित जीवन जीने का उनका माद्दा। राकेश ने अन्यथा उन्हें बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं किया था। राकेश के बारे में उथला होने तक की उनकी गंभीर आपत्ति थी। रंजना को कहा था : राकेश में सोशल कांसियसनेश ज्यादा नहीं थी, ‘‘और अनलेस यू आर इंटरेस्टेड इन द डीपर प्रोबलम्स आफ सोसायटी यू आर नॉट कंप्लीट, आपका ड्रांइग रूम लिटरेचर हो जायेगा।‘‘

राकेश की मौत पर शमशेर ने कविता लिखी : ‘‘मोहन राकेश के साथ एक तटस्थ बातचीत‘‘

ठहाके लगाने के लिये मशहूर राकेश इतनी जल्दी मौत की ओर क्यों चले गये, शमशेर कविता में इसी प्रश्न को मंथते हैं। कहते हैं, ‘मौत कोई सेंटीमेंट की चीज नहीं, कि राकेश उसमें बह गये। वह एक ठोस हस्ती है व्यक्ति के लिये, हर व्यक्ति के लिए।‘‘ और फिर गहरी शंका के साथ पूछ बैठते हैं, ‘‘तुम बहुत अधिक पी गये थे क्या/क्या अब भी जाम तुम्हारे हाथ में है।‘‘

शमशेर आगे राकेश की खूबियों, आधुनिक नाटक को उनके अवदान की चर्चा करते हैं। मृत्यु से, इस लोक से परे एक दूसरे रहस्य लोक से संवाद शमशेर का प्रिय विषय है। राकेश को भी वे इसका निमित्त बनाते हैं। एकएक करके कितने ही अपनों को गंवा चुके शमशेर के लिये मृत्यु के बाद का लोक डरावना कत्तई नहीं है, लेकिन राकेश से उनकी यही शिकायत रही, ‘‘ओह माडर्न आर्टिस्ट/काश तुम इतने मार्डन न होते/ताकि जिंदा रहते/जिंदा रहते/अभी कुछ और दिन जिंदा रहते।

मौत का अर्थ सीन से हट जाना भर है, यह शमशेर जानते थे। फिर भी यह बात राकेश पर लागू नहीं की जा सकती थी, इसलिये अफसोस करते है। गुमशुदगी तो शमशेर की चीज थी, राकेश भला क्यों उस ओर चला गया! शमशेर लिखते हैं : मैं/एक गुमशुदगी को प्यार/करता हूं/और तुम उसीकी तरफ चले गये हो/कैसे कहूं कि मुझे तुमसे/ईष्र्या नहीं‘‘
इसके साथ ही शमशेर अपनी गुमशुदगी का राज खोलते हैं और उसी सिलसिले में कुछ ऐसी पंक्तियां कह जाते हैं, जिनसे शमशेर के व्यक्तित्व का मौन जैसे पूरी ऊर्जा के साथ मुखर हो उठता है। जैसे मुक्तिबोध अपनी अंधेरे मेंकविता की डरावनी दुनिया से जुझते हुए यही सब कुछ नहीं है, ‘‘मुझको जिंदगीसरहद/सूर्यों के प्रांगण पर भी जाती सी दीखती।‘‘ कह कर अद्भूत दृप्त स्वरों में बोल उठते हैं:
‘‘कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूं
वर्तमान समाज चल नहीं सकता।
पूंजी से जुड़ा हुआ ह्यदय बदल नहीं सकता‘‘

बिल्कुल वैसे ही लहजे में अपनी गुमशुदगी के मृत्यु पार के उस लोक के बारे में शमशेर कहते हैं कि वह ऐसा लोक है :
‘‘जहां यह गंदगी /आज की सियासत की/आज की गंदी कला की/आज के झूठ की/आज के फरेब, आज के पैसे की/आज के वीभत्स शासक और शोषक की/नहीं है।

वही शमशेर का अपना लोक है जिसमें वे गुमशुदा रहते थे। अपनी सारी अतृप्तियों के साथ भटकते थे। कइयों ने इस कविता से ही शमशेर में गहन मृत्युबोध के तत्व की खोज कर उन्हें अस्तित्ववाद के दोजख में रशीद कर देना चाता था। लेकिन मृत्यु की यह कितन सुंदर जीवन की उत्कट कामना है, इसे अतृप्ति के विवेक तत्व से ही समझा जा सकता है। शमशेर जानते थेमृत्यु पार के ऐसे लोक में किसी माडर्निस्ट का मन नहीं बस सकता। इसीलिये विस्मित थे कि फिर राकेश वहां क्यों गये!

इसी सिलसिले में एक और जरूरी बात। रहस्यसंहार के उन्माद में आचार्य शुक्ल ने निगु‍र्णपंथी भक्ति साहित्य की पूरी लोक परंपरा की निंदा की, छायावाद को दुत्कारा और रवीन्द्रनाथ को भी अस्वीकारा। आचार्य से विरासत में मिले इसी फोबिया के चलते परवर्ती समय के प्रगतिशील दक्काकों ने शमशेर, मुक्तिबोध के सफाये की, उन्हें प्रगतिशील साहित्य की धारा से काटने की कम कोशिशें नहीं की। लेकिन इतिहास का न्याय यह है कि आज साहित्यिक गुटबाजियों से दूरकविता में की गयी शमशेर की यह प्रार्थना ज्यादा सटीक जान पड़ती है जिसमें वे कहते हैं :
देवताओं मेरे साहित्य के युगयुग के सुनो/साधनाओं की परमशक्तियों इतना वर दो–(अपने भक्तों की चरण धूलि जो समझो मुझको)/एक क्षण भी मेरा व्यय ऐसों की संगत में न हो।/एक वरदान यही दो जो हो दया मुझ पर/स्वप्न में भी न पड़े ऐसों की छाया मुझ पर।‘‘

शमशेर की शताब्दी के मौके पर उनके फिर से सम्यक मूल्यांकन का निवेदन करते हुए उनकी लिखी ‘‘एक प्रभात फेरी‘‘ के गीत के उद्धरण के साथ हम उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित करते हैं :

‘‘फिर वह एक हिल्लौर उठीगाओ।/वह मजदूर किसानों के स्वर कठिन हठी।/कवि हे, उनमें अपना दय मिलाओ।/उनके मिट्टी के तन में है अधिक आग/है अधिक ताप/उसमें, कवि हे/अपने विरह मिलन के ताप जलाओ।/काट बुर्जुआ भावों की गुमठी को–/गाओ।‘‘