विशिष्ट कलाबोध के प्रतिबद्ध कवि शमशेर
(एक)
पता नहीं यह सिद्धांत प्रतिपादन किसने किया (या किसी ने किया भी कि नहीं) लेकिन कम से कम हिन्दी में प्रतिबद्धता और कला संपन्नता को कविता का दो छोर मान लिया जाता है। या यूं कहें कि कलाबोध और कलावाद को समानार्थी। इसका परिणाम यह हुआ कि एक तरफ़ तो प्रतिबद्धता की होड़ में ऐसी-ऐसी कलाहीन और फूहड़ रचनायें साहित्य के बस्ते में भरी पड़ी हैं (और लगातार भरती जा रही हैं) जो साहित्य और प्रतिबद्ध राजनीति, दोनों को कंगाल बना रही हैं तो दूसरी तरफ़ तमाम जेनुइन कवि अपनी सहज संवेदनशीलता तथा कलासंपन्नता के कारण कलावादी क़रार कर दिये गये। इससे नक़ली प्रतिबद्धता, नक़ली कविता का प्रतिष्ठापन तो हुआ ही साथ ही असली कलावादियों की पहचान भी धुंधली हुई। कविता की अंतर्वस्तु की जगह उसके बाह्य रूप पर ज़्यादा ध्यान देने, कला के एक औज़ार के रूप में सामाजिक परिवर्तन तथा सौंदर्य बोध के परिष्कार में कविता की भूमिका को सांगोपांग रूप में देखने की जगह उससे संघर्ष के दूसरे हथियारों की तरह प्रत्यक्ष भूमिका निभाने की अपेक्षा तथा उसके प्रतिबद्धता को विचार से अधिक कुछ संगठनों से जोड़कर देखा गया। बम्बईया फिल्मों का साहित्य पर कितना प्रभाव पड़ा यह कहना तो मुश्किल है लेकिन यह ज़रूर है कि उन्हीं की तरह साहित्य में भी ‘ब्रांडिंग’ का काम ख़ूब हुआ। जो एक बार ‘हीरो’ बन गया वह बस ‘हीरो’ ही रहा और जिसे एक बार ‘विलेन’ बना दिया गया उसे हमेशा के लिये ‘विलेन’ ही रहना होगा। हिंदी की पूरी आलोचना का बड़ा हिस्सा इसी ‘ब्रांडिग’ और फतवेबाजी के भरोसे अपना काम चलाता रहा। कवियों को अलग-अलग कारणों से अलग-अलग खांचों में बिठा दिया गया और फिर उन्हीं खांचों के इर्द-गिर्द उनकी कविता को फिट करने की कोशिशें हुईं। इस प्रवृत्ति ने ज्यादातर कवियों को उनके पूरे आदमकद रूप में देखे जाने और सफ़ेद-स्याह के बीच का उनका असली धूसर रंग पहचाने जाने को लगातार और अधिक मुश्किल बना दिया। ‘कवियों के कवि’ कहे गये शमशेर भी इसी का शिकार हुए।
शमशेर मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल और बाबा नागार्जुन के साथ स्वातत्रयोंत्तर हिन्दी कविता की जनपक्षधर धारा को कम्पलीट करते हैं। इन चारों का नाम साथ लेने की वज़ह स्पष्ट है। इनमें जो चीज़ कामन है वह है इनकी सहज ‘जनपक्षधरता’ लेकिन इस एक समान प्रत्यय के साथ इनकी रचनाशीलता में जो अपार विविधता है वह हिन्दी के कविता संसार को वह समृद्ध आधार देती है जिसके ऊपर इसका बहुरंगी और बहुआयामी विकास हो सकता था और एक हद तक हुआ भी। मुक्तिबोध जहां अपने समय के वैचारिक संघर्ष में अपनी फैंटेसी के माध्यम से हस्तक्षेप करते हैं, नागार्जुन और केदार जी अपनी पूरी ताक़त से अभिधा में सीधे-सीधे टकराते हुए कविता और ज़रूरी नारे रचते हैं शमशेर अपने विशिष्ट कलाबोध से मनुष्यता के पक्ष में एक बेहतर प्रतिसंसार रचते हैं। वह कला और संगीत के उपकरणों से सिंफनियां रचते हैं और इस प्रकार उस राजनैतिक लड़ाई के सांस्कृतिक पक्ष में अपना अवदान देते हैं। उनका लेखन कला के लिये कला नहीं है। वह कला का उन्नयन है, कला का परिष्कार है, कला का शोधन है। अपने आरंभिक काल से लेकर अंत तक उनकी कविता में मनुष्य तथा उसके संघर्षों का प्रवेश कभी बाधित नहीं होता। हां वह मूलतः वैसी राजनैतिक कविताओं के ही कवि नहीं है जैसे कि केदार जी, बाबा नागार्जुन या मुक्तिबोध हैं।
(दो)
हक़ीक़त को लाये तखैयुल से बाहर
मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाये
शमशेर का यह शेर मुझे बेहद अर्थपूर्ण लगता है और उनके कवि व्यक्तित्व के तलाश का एक ज़रूरी सूत्र भी। शमशेर ने तमाम ग़ज़लें कही हैं। लेकिन तुक और लय के कविता से निष्काषन का ही यह प्रभाव रहा हो शायद कि उन पर बात करते हुए अक्सर इन ग़ज़लों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है। ख़ैर, इस शेर में ‘हक़ीक़त’ को कल्पना से बाहर लाने की उनकी जो मुश्किल थी वही आजीवन उनके कवि को व्यग्र और समृद्ध करती रही। यह पूरी प्रक्रिया दो स्तरों पर चली- एक में उनका शोधस्थल समाज रहा तो दूसरे में मनुष्य,प्रेम और प्रकृति। ज़ाहिर है उनके लिये ये दोनों विरोधाभासी नहीं थे अपितु नये समाज, नये मनुष्य और नये सौंदर्यबोध की तलाश के अनिवार्य हिस्से थे, और इस अर्थ में एक-दूसरे के पूरक। इनमें से किसी एक को उठाकर उन्हें किसी पूर्वनिर्धारित सांचे में बिठा देना बौद्धिक बेईमानी के अलावा कुछ नहीं। शमशेर का मूल्यांकन न तो केवल ‘वाम-वाम दिशा, समय साम्यवादी’ जैसी कविताओं के आधार पर किया जा सकता है न ही ‘एक पीली शाम, पतझर का ज़रा सा अटका हुआ पत्ता, शांत’ जैसी कविताओं के आधार पर। असली शमशेर इन दोनों से मिलकर बनते हैं वैसे ही जैसे वह ‘उर्दू और हिन्दी’ से मिलकर बनते थे। शमशेर के मूल्यांकन की समस्या वह नहीं हैं, समस्या है हमारी ‘शुद्धतावादी’ एकांगी दृष्टि।
शमशेर की एक कविता है ‘बाढ़ 1948’ जिसमें उन्होंने डायरी की तरह अपने समय को दर्ज़ करते हुए अपने कई समकालीनों पर लिखा है। इसी कविता में नेमिचन्द्र जैन के बारे में लिखते हुए वह कहते हैं
नेमि
रेखा
‘इप्टा’
नाटक…
जीवन लेखा
आज का उपहास्य
भूख का आलोच्य
आर्ट
तुम कल्पना के पुतले
नहीं हो
तुम कम्युनिस्ट पार्टी की ‘मशीन’
नहीं हो
(लोग ग़लत कहते हैं)
तुम कला का मौन
शांत
विवाह
संघर्ष के साथ-हो;
तुम कम्युनिस्ट हो,
यानी कलाकार
का कर्म
यानी भविष्य का
मर्मभाव
आज के नाटक के अंत में!
इसके बाद वह जोड़ते हैं ‘ इस नाटक का अंत मैं हूं/मैं शमशेर/एक निरीह/फ़तह…! यह कविता शमशेर की कला और राजनीति के प्रति दृष्टि को बिल्कुल साफ़ करती है। प्रतिबद्ध होने का अर्थ कम्युनिस्ट पार्टी का ‘मशीन’ होना नहीं है उनके लिये न ही कलाहीन शोर-गुल। उनके लिये प्रतिबद्धता का अर्थ है – ‘कला का मौन शांत विवाह संघर्ष के साथ’ और उनका काव्यजीवन इसी ‘मौन शांत विवाह’ का गरिमामय निर्वाह है। यह अकारण ही नहीं है कि ‘मौन’ उनकी कविताओं में बार-बार आता है और देर तक आपके भीतर रहता है।
(तीन)
जो लोग शमशेर को कलावादी या फिर ‘हृदय से कलावादी लेकिन चेतना के स्तर पर वामपंथ के साथ’ जैसी उपमाओं से नवाजते हैं वे दरअसल उनके इसी गरिमामयी मौन का फायदा उठा रहे होते हैं। एक ‘वाम-वाम-वाम दिशा, समय साम्यवादी’ को छोड़ दें तो उनके काव्य में गर्जन-तर्जन नहीं है। उनका विरोध भी एक ख़ास तरह की काव्य गरिमा के साथ सामने आता है। उन्हें हर कविता में अपने ‘वामपंथी’ होने या फिर कविता से केवल ‘प्रत्यक्ष प्रतिरोध के हथियार’ का काम लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जब वह प्रेम पर लिख रहे होते हैं तो एक सहृदय और सहयात्री प्रेमी होते हैं, प्रकृति पर लिखते हुए वह प्रकृति के चितेरे हैं कला में डूबते हुए वह रंगो की दुनिया के वासी हैं जहां शब्द ऐसे बरते जाते हैं मानों मद्धिम रंग और यह सब करते हुए उनका मुक्तिकामी और प्रगतिशील कवि लगातार अपने समय के साथ लगातार संघर्षरत भी है। जिन कविताओं में वह मुखर तौर पर इन विसंगतियों पर बात करते हैं वे भी अपनी पूरी कलात्मकता के साथ आती हैं। यह आलोचकों का पूर्वाग्रह ही है कि अक्सर वे इन कविताओं को ‘अपेक्षाकृत कमज़ोर’ कहकर ख़ारिज़ करते हैं- मानो प्रेमगीत और रणभेरी में तुलना की जा सके, मानों पेंटिंग और पोस्टर में तुलना की जा सके, मानो इनमे से किसी एक को दूसरे से निरपेक्ष तौर पर बेहतर बताया जा सके!
उनकी एक कविता है ‘घिर गया है समय का रथ’ … यहां समय भी है और उसका अद्भुत कलात्मक चित्रण भी। कविता का आरंभ रात के चित्रण से होता है। लेकिन वह काली रात ‘मौन संध्या का दिये टीका’ आती है ‘चमकते तारे लजाते हैं’ और फिर
भेद ऊषा ने दिए सब खोल
हृदय के कुल भाव
रात्रि के अनमोल
दुख कढ़ता सजल, झलमल
आंख मलता पूर्व स्रोत
पुनः जगती जो।
आप देखें तो इस कविता का एक असावधान या अंतिम खण्ड को छोड़कर किया गया पाठ आपको ‘कला की मौन एकांतिक साधना सा कुछ’ लग सकता है। प्रकृति का कूचियों से किया चित्रण। लेकिन कविता जब आगे बढ़ती है और कहती है कि
घिर गया है समय का रथ कहीं
लालिमा से मढ़ गया है राग
भावना की तुंग लहरें
पंथ अपना, अंत अपना जान
रोलती हैं मुक्ति के उद्गार
तो यह एंटीक्लाईमेक्स नहीं कविता का सहज पाथेय है। कविता वहीं पहुंचती है जहां उसे पहुंचना था लेकिन अपनी ‘शमशेरियत’ के साथ, उस गरिमापूर्ण मौन के साथ जिससे संयुक्त एक गंभीर शब्द हज़ार-हज़ार नारों और भयावह गर्जन-तर्जन से अधिक प्रभावी है। जो ‘निर्वात में एकालाप’ की तरह नहीं बल्कि जुलूस में साथी की तरह आपके पास आता है, किसी कुमार गंधर्व की नाद की तरह आपके भीतर उतरता है और अपनी स्थाई जगह बना लेता है। ऐसे ही ग्वालियर में मज़दूरों की नृशंष हत्या के क्षोभ से उपजी उनकी कविता ‘ य’ शाम है’ ऐसी विषम परिस्थिति में न तो आपा खोकर विलाप करती है न ही असंतुलित क्रोध का प्रदर्शन। वह उस पूरे क्षोभ, उस पूरे क्रोध को एक परिपक्व कविता की शक़्ल में दर्ज़ करती है अपने परिवर्तनकामी सौंदर्यबोध के साथ-
‘ य’ शाम है
कि आसमान खेत है पके हुए अनाज़ का
लपक पड़ी लहू-भरी दरांतियां
कि आग है
धुआं-धुआं सुलग रहा
ग्वालियर के मज़ूर का हृदय’-
क्या एक कलाकार अपने प्रतिरोध को रंगो और गंध के साथ दर्ज़ नहीं कर सकता!
और शमशेर की ऐसी कवितायें ढूंढ़ने के लिये उनके जीवनकाल में प्रकाशित किसी भी कविता संकलन में विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता- हां उनके बाद प्रकाशित संकलनों में आपको मुश्किल हो सकती है। उदाहरण के लिये रंजना अरगड़े द्वारा संपादित संकलन ‘कहीं दूर से सुन रहा हूं’ ( राधाकृष्ण प्रकाशन, 1995) में 1938-39 से 1992 की उनकी अंतिम कविता लिखे जाने के लंबे या लगभग संपूर्ण रचनाकाल से संकलित उनकी कविताओं में न ‘काल तुझसे होड़ मेरी है’ है, न ‘लेनिनग्राद’, न ‘अफ्रीका’ और न ‘बात बोलेगी’ – पूर्वोद्धृत कविताओं को तो जाने ही दें। यही नहीं, शमशेर ने अपने तमाम समकालीनों पर जो कवितायें लिखीं हैं उनमें से भी सिर्फ़ एक का चयन किया गया है- अज्ञेय का! वह भी ‘अज्ञेय से’ नहीं जहां वह मौज़ में कहते हैं- ‘जो नहीं है/जैसे कि सुरुचि/उसका ग़म क्या? वह नहीं है’ अपितु वहां है- ‘सादर अज्ञेय के जन्मदिवस पर समर्पित’ कविता है! ‘गजानन माधव मुक्तिबोध’, त्रिलोचन के लिये लिखी ‘सारनाथ की एक शाम’, नागार्जुन के लिये लिखी कवितायें न देकर सिर्फ़ अज्ञेय को सम्मान देने की यह कहानी उस शमशेर से उसकी शमशेरियत छीन लेने का प्रयास है जो कहता है कि
क्रांतियां, कम्यून
कम्यूनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं
और ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’ कविता का यह अंश उनके ‘युवपन के वामपंथी ज्वर’ का असर नहीं है- यह कविता अस्सी के दशक में लिखी गयी थी, उनके जीवन के उत्तरार्ध में। इकहत्तर साल की उम्र में वह कह रहे थे- ''राह तो एक थी हम दोनों की:आप किधर से आए-गए!- हम जो लुट गए पिट गए, आप जो, राजभवन में पाए गए!'' और यह भी कि इसी दौर में वह प्रेम और सौंदर्य की अप्रतिम कवितायें भी रच रहे थे। कोई संकलन जिससे ‘एक ठोस बदन अष्टधातु का’ जैसी उनकी सारी प्रेम कवितायें बहिष्कृत कर दी जायें वह भी उतना ही एकांगी और बेईमान होगा।
(चार)
अंत में बस इतना कि जन्म शताब्दी और मृत्यु का अठारहवां साल किसी कवि के बारे में एक तार्किक, समेकित और ईमानदार दृष्टि बना लेने के लिये काफी होने चाहिये थे। ख़ासतौर पर वह कवि जो अपने जीवनकाल में ही इन सांचों से आजिज आ चुका हो-
‘लेखक (और लेखक ही क्यों)
- एक सांचा है,
उस सांचे में आप फिट हो जाइये
- हर एक के पास एक सांचा है। राजनीतिज्ञ,
प्रकाशक,…शिक्षा संस्थानों के
गुरु लोगों के पास्। …यह लाबी,वो लाबी।
रूस के पीछे-पीछे। नहीं अमरीका के।
नहीं चीन के। अजी नहीं,अपने घर के
बाबाजी के।इस झंडे के,उस झंडे के
(डायरी,1978)
इन अठारह सालों में शमशेर को उन सांचो से मुक्त कर उनके पूरे कवि को उसके विशिष्ट सौंदर्यबोध तथा समझौताहीन प्रतिबद्धता के साथ देख पाने लायक नज़र विकसित करने भर का बालिग तो हिन्दी आलोचना को हो ही जाना चाहिये था। लेकिन अपने-अपने पक्ष में उन्हें खींचने की ज़िद में हिन्दी साहित्य के दोनों खेमों की हास्यास्पद कोशिशों ने उन्हें त्रिशंकु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उम्मीद की जानी चाहिये कि इस साल हो रहे तमाम आयोजनों की मज़बूरी में किये जा रहे उनके पुनर्ध्ययनों के दौरान हमारे आलोचक बंधुओं को पूरा शमशेर दिखाई दे और वे हक़ीक़त को तखैयुल से बाहर लाने का मुश्किल लेकिन ज़रूरी काम कर सकें।




