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बुधवार, 25 सितंबर 2013

बहिष्कार भी समर्थन की तरह एक राजनीतिक हथियार है : सन्दर्भ हंस का सम्पादकीय

यह लेख भोपाल की एक पत्रिका के कहने पर लिखा गया था. छपा या नहीं छपा यह पता नहीं, क्योंकि कोई सूचना नहीं आई. अब इस महीने का हंस का सम्पादकीय पढने के बाद इसे यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.
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हंस और विवादों का रिश्ता नया नहीं है. पत्रिका में लिखे को लेकर तो कभी पत्रिका के बाहर राजेन्द्र जी और उनकी मंडली के कारनामों पर विवाद होते ही रहे हैं. इस बार यह विवाद प्रेमचंद जयंती पर हंस के वार्षिक आयोजन को लेकर है. इस आयोजन में गोविन्दाचार्य, अशोक वाजपेयी, अरुंधती राय और वरवरराव के आने तथा ‘अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता’ विषयक व्याख्यानमाला में उनकी हिस्सेदारी की सूचना थी. लेकिन कार्यक्रम में अरुंधती नहीं आईं और वरवर राव ने दिल्ली आने के बाद भी कार्यक्रम में हिस्सेदारी से इंकार कर दिया. उनके बहिष्कार को लेकर सवाल उठने शुरू हुए तो उन्होंने इंटरनेट पर एक पत्र ज़ारी किया और फिर हिंदी के साहित्यिक विवादों के ‘प्रसंस्करण केंद्र’ जनसत्ता में इसे लेकर उनकी लानत-मलामत करता हुआ एक सम्पादकीय और अपूर्वानंद की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई, जिसके उत्तर में उन्होंने एक और पत्र ज़ारी किया. संभव है आगे और वाद-प्रतिवाद आयें. फेसबुक और सोशल मीडिया पर अशोक वाजपेयी कैम्प के तमाम स्वनामधन्य साहित्यकार और जनसत्ता सम्पादक ओम थानवी तो लगातार तलवारें भांज ही रहे हैं.

देखना होगा कि वरवरराव या अरुंधति के हंस के इस सालाना उत्सव में न आने के क्या मानी हो सकते हैं? यहाँ यह याद दिला देना भी बेहतर होगा कि इसके पहले छत्तीसगढ़ के तत्कालीन पुलिस प्रमुख विश्वरंजन और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय की उपस्थिति के कारण अरुंधती ने पहले भी हंस के ही एक आयोजन का बहिष्कार किया था. उसकी वजूहात क्या थीं? ज़ाहिर है कि छत्तीसगढ़ में जिस तरह सलवा जुडूम के नाम पर राज्य दमन ज़ारी था (जो अब भी एक भिन्न रूप में रुका तो नहीं ही है) उसकी अगुवाई कर रहे व्यक्ति के साथ मंच शेयर करना आदिवासियों के दमन के खिलाफ लगातार लिख रही अरुंधती ने उचित नहीं समझा था. मुझे नहीं याद कि उसे लेकर तब किसी तरह का कोई विवाद मचा था. आज लोकतंत्र और आवाजाही के सिद्धांत पेश कर रहे लोग तब शायद इसलिए भी चुप थे कि अशोक वाजपेयी खुद विश्वरंजन और विभूति नारायण राय के बहिष्कार (छिनाल प्रकरण के बाद) में शामिल थे. मजेदार बात यह है कि तब वर्धा विश्विद्यालय और छतीसगढ़ के प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान (जिसके सर्वे सर्वा विश्वरंजन थे) के  बहिष्कार को सही बताने वाले और उसमें शामिल होने वाले लोग आज बहिष्कार की पूरी अवधारणा पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं और इसे ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ के ख़िलाफ़ बता रहे हैं. ओम थानवी सवाल उठाते हैं कि ‘अगर ‘लोकतंत्र में सभी मंच एकतान हो गए तो जिस वैचारिक और सांस्कृतिक बहुलता को हम अपने लोकतंत्र का असली आधार मानते हैं, वह समाप्त हो जायेगी’ तो अपूर्वानंद कहते हैं ‘भारत में, जो अब भी एक-दूसरे से बिलकुल असंगत विचारधाराओं और विचारों के तनावपूर्ण सहअस्तित्व वाला देश है , किसी विचार को चाह कर भी सार्वजनिक दायरे से अपवर्जित करना संभव नहीं है.’ सवाल वही है कि यह लोकतंत्र ‘वर्धा’ या ‘प्रमोद स्मृति संस्थान’ में लागू क्यों नहीं होता है? क्यों यह थानवी साहब के अखबार में अपने विरोधियों के प्रतिवाद को स्थान देने के क्रम में लागू नहीं होता? (सी आई ए को लेकर लम्बे चले विवाद में थानवी ने वीरेन्द्र यादव, मेरे या गिरिराज किराडू के प्रतिवाद छापने से शब्द सीमा निर्धारण के नाम पर इंकार कर दिया था) 

सवाल यहाँ यह भी है कि वाकई हंस कोई ऐसा आयोजन कर रहा था जिसमें किसी बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश थी? ज़ाहिर है कि यह कोई पैनल डिस्कशन या परिचर्चा नहीं, व्याख्यानमाला थी. इस व्याख्यानमाला में सबको अपने-अपने भाषण देने थे और किसी तरह की बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी. ऐसे में यह तर्क कि वहां वैचारिक विरोधियों से बहस की जानी चाहिए थी, बिना नींव का है. साम्प्रदायिकता के धुर विरोधी अशोक वाजपेयी ने वहाँ कट्टर साम्प्रदायिक गोविन्दाचार्य से क्या बहस की? फिर यह हंस का आयोजन था जिसे आमतौर पर एक वामपंथी मैगजीन की तरह जाना जाता रहा है. उसके उत्सव में एक धुर वामपंथ विरोधी बुर्जुआ और एक कट्टर साम्प्रदायिक को मंच पर क्यों होना चाहिए था? और अगर उत्सव में वे शामिल थे तो फिर वहां एक घोषित नक्सलवादी वामपंथी वरवरराव और आदिवासी अधिकारों की प्रवक्ता तथा कार्पोरेट विरोधी अरुंधती राय को क्यों होना चाहिए था? संसद में सबके साथ बैठने का उदाहरण देने वाले बताएँगे कि कौन सी पार्टी अपने घरेलू समारोहों में विपरीत विचारधारा के लोगों को बुलाती है? कब ऐसा होता है कि कांग्रेस के किसी समारोह में मुख्य वक्ता भाजपा या कम्युनिस्ट पार्टी का होता है? समारोह के मंच के भागीदार आपके वैचारिक हमसफ़रों की घोषणा होते हैं. ज़ाहिर है हंस अपने मंच पर इन लोगों को बुलाकर कुछ और साबित करना चाहता था तो फिर किसी वरवर राव को उससे खुद को अलग करने का हक क्यों न हो? क्या भारत और विश्व के साहित्यिक परिदृश्य में बहिष्कार पहले नहीं हुए हैं? क्या सार्त्र ने नोबेल का बहिष्कार नहीं किया था? क्या एक समय में अज्ञेय ने भारत भवन का बहिष्कार नहीं किया था? क्या अरुंधती ने साहित्य अकादमी नहीं ठुकराया? क्या फोर्ड फाउंडेशन जैसे स्रोतों का लम्बे समय तक (और अब भी) तमाम जनपक्षधर साहित्यकारों और कलाकारों ने बहिष्कार नहीं किया? क्या अमेरिका ने चार्ली चैपलिन जैसे कलाकार को देशनिकाला नहीं दिया? क्या ब्रेख्त को अमेरिकी साम्राज्यवाद और हिटलर के फासीवाद के विरोह की क़ीमतें तमाम देशों से दर-ब-दर होकर नहीं चुकानी पड़ीं? और क्या आज लोकतंत्र की दुहाई दे रहे वाजपेयी कैम्प ने अपने किसी आयोजन में वरवर राव या ग़दर जैसे कलाकारों को बुलाया? क्या यह एक तरह का अघोषित बहिष्कार नहीं था/ है? फिर वरवर राव अगर साम्प्रदायिक गोविन्दाचार्य और वाम विरोधी अशोक वाजपेयी के साथ एक समारोह में मंच शेयर नहीं करना चाहते तो इतनी चिल्ल-पों क्यों? बहिष्कार भी समर्थन की तरह एक राजनीतिक हथियार है और एक लेखक को इसके प्रयोग का पूरा अधिकार है. 

वरवर राव अशोक वाजपेयी को कारपोरेट कल्चर का समर्थक कहते हैं और इस रूप में अपना वैचारिक विरोधी कहते हैं. इसे लेकर बहुत शोरगुल मचाया गया और अशोक वाजपेयी के सेकुलर होने का उदाहरण पेश किया गया. सवाल यह है कि कौन उनके सेकुलर होने पर सवाल खड़ा कर रहा है? लेकिन बुर्जुआ वर्ग सेकुलर होता ही है, इससे उसका कारपोरेट विरोधी हो जाना तो सिद्ध नहीं होता? आखिर कांग्रेस, सपा, बसपा जैसी सभी पार्टियां ही नहीं हमारी फिल्म इंडस्ट्री के तमाम कलाकार और कारपोरेट भी धर्मनिरपेक्षता का दावा करते हैं और उनमें से काफी हैं भी. एक दौर में राजनीति में कारपोरेट कल्चर के सबसे बड़े प्रतिनिधि के रूप में उभरे अमर सिंह तो उस नरेंद्र मोदी के बेहद कटु आलोचक रहे जिसके खिलाफ लेखकों को इकट्ठा करने के वाजपेयी जी के प्रयास को रेखांकित कर उनके आलोचकों पर सवाल उठाये जा रहे हैं. साफ है कि साम्प्रदायिकता का विरोध और कारपोरेट का विरोध दो अलग-अलग चीजें हैं. अशोक वाजपेयी का पूरा लेखन और जीवन सबके सामने है और अगर उसमें कारपोरेट कल्चर या पूंजीवाद का विरोध नहीं है तो वरवर राव को उसे रेखांकित करने और उसके आधार पर उन्हें अपना वैचारिक शत्रु घोषित करने का हक है. लगातार शासन और निजी तंत्र के गठजोड़ के हाथों उत्पीडन और दमन झेल रहे लोगों के साथ सक्रिय वरवर राव का नज़रिया आई आई सी और हैबिटाट में बैठकर साहित्यिक षड्यंत्र रचने और पद-पुरस्कार-फेलोशिप-यात्रा की जुगाड़ में लगे लोगों से अलग तो होना ही है.
इस देश के लोकतंत्र और फिर उसमें  ‘बिलकुल असंगत विचारधाराओं और विचारों के तनावपूर्ण सहअस्तित्व’ की बात करने वाले लोग वरवर राव की विचारधारा के साथ सत्ता और उसके प्रतिनिधि साहित्यकारों के सुलूक को किस आसानी से भुला देते हैं. क्या सच में तनावपूर्ण ही सही, उस विचारधारा को किसी तरह का सह अस्तित्व मयस्सर होता है इस लोकतंत्र में? क्या उनके प्रति किसी तरह की कोई सहानूभूति या समानुभूति सत्ता और उसके प्रतिनिधि लेखकों-संपादकों के यहाँ दिखती है? अगर नहीं तो उनसे यह उम्मीद क्यों? और क्या यह सच नहीं है कि क्रांतिकारी वामपंथ के अलावा इस ‘बहुलता वादी’ देश के सभी वैचारिक समूह कारपोरेट लूट के मसले पर नव आर्थिक उदारवाद की विचारधारा के साथ ‘एकतान’ हो चुके हैं और यह सेकुलर और साम्प्रदायिक दोनों विचारों की प्रतिनिधि राजनीतिक संरचनाओं की सामान आर्थिक नीतियों के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है.

दरअसल लोकतंत्र की यह दुहाई अक्सर अपने दमनकारी विचारों और अवसरवाद को लोक मानस में स्वीकार्यता दिलाने के लिए दी जाती है. इसका एक उदाहरण हंस से ही. जब हंस ने उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री की एक कहानी हंस में छापी तब ऐसे ही एक सालाना आयोजन में एक युवा पाठक के सवाल उठाने पर राजेन्द्र जी लोकतंत्र की ही दुहाई देते हुए कहानी के छपने का औचित्य साबित किया. खैर..मुख्यमंत्री महोदय ने मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कोई ऐसी कहानी नहीं लिखी शायद जिसे अपने भरपूर लोकतंत्र के बावजूद राजेन्द्र जी हंस में छाप पाते!   


गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

क्या हमने कश्मीर के अवाम के बारे में कभी सही ढंग से सोचा है ?


26 अक्टूबर को श्रीनगर में दिए गए एक भाषण में लेखिका और समाजसेवी अरुंधति राय ने कहा था कि ‘कश्मीर भारत का कभी अभिन्न अंग नहीं था और वर्ष 1947 में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का स्थान भारतीय उपनिवेशवाद ने ले लिया।‘ बाद में उन्होंने सफाई दी कि - मैंने वही कहा है जो मैं और दूसरे बुद्धिजीवी कई सालों से कहते आ रहे हैं. कोई भी इंसान जो मेरे भाषण की लिखित कॉपी पढ़ने का कष्ट करेगा समझ जाएगा कि मेरी बातें मूल रूप से न्याय के पक्ष में एक गुहार है. मैंने कश्मीरियों के लिए न्याय के बारे में बात की है जो दुनिया के सबसे क्रूर सैन्य आधिपत्य में रहने के लिए मजबूर हैं. मैंने उन कश्मीरी पंडितो के लिए न्याय की बात की है जो अपनी जमीन से बेदखल किए जाने की त्रासदी भुगत रहे हैं. मैंने उन दलित सिपाहियों के लिए न्याय बात की है जो कश्मीर में मारे गए हैं और कूड़े के ढेर पर बनी जिनकी कब्रों को मैंने देखा है. मैंने भारत के उन गरीबों की बात की है जो इसकी कीमत चुका रहे हैं और अब एक पुलिस राज्य के आंतक तले जीवित रहने का अभ्यास कर रहे हैं. (?)'

अरुंधति राय की बात से सहमत असहमत हुआ जा सकता है. उनके बडबोलेपन को समझा जा सकता है और उनकी प्रतिबद्धताओं का उत्स भी जांचा परखा व ढूँढा जा सकता है, लेकिन उससे पहले कश्मीर का इतिहास देखना जरूरी है. हम जानते हैं कि राष्ट्र - राज्य की परिकल्पना एक आधुनिक घटना है. स्वतंत्रता पूर्व भारत उस तरह का राष्ट्र नहीं था जैसा कि आज है. कश्मीर और भारत का संबंध भी सदैव परिवर्तनशील रहा है. आज कश्मीर भारत का राज्य अवश्य है लेकिन भिन्न स्टेटस के साथ.


•1587 से 1739 ई. तक कश्मीर मुग़ल साम्राज्य का अभिन्न अंग बना रहा। जहाँगीर और शाहजहाँ के समय के अनेक स्मारक आज भी कश्मीर के सर्वोत्कृष्ट स्मारक माने जाते हैं। इनमें निशात बाग़, शालीमार उद्यान आदि प्रमुख हैं।

•1739 से 1819 ई. तक क़ाबुल के राजाओं ने कश्मीर पर राज्य किया।


•1819 ई. में पंजाब केसरी रणजीत सिंह ने कश्मीर को क़ाबुल के अमीर दोस्त मुहम्मद से छीन लिया किन्तु शीघ्र ही पंजाब कश्मीर के सहित अंग्रेज़ों के हाथ में हाथ में आ गया।

•सिखों की अंग्रेजों से पराजय 1846 में हुई जिसका परिणाम था लाहौर संधि। 1846 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कश्मीर को डोगरा सरदार गुलाब सिंह के हाथों बेच दिया। इस वंश का 1947 तक वहाँ शासन रहा।

•गिलगित एजेन्सी, अंग्रेज राजनैतिक एजेन्टों के अधीन क्षेत्र रहा। कश्मीर क्षेत्र से गिलगित क्षेत्र को बाहर माना जाता था। अंग्रेजों द्वारा जम्मू और कश्मीर में पुन: एजेन्ट की नियुक्ति हुई।

•महाराजा गुलाब सिंह के सबसे बड़े पौत्र महाराजा हरि सिंह 1925 ई. में गद्दी पर बैठे, जिन्होंने 1947 ई. तक शासन किया।

ब्रिटिश इंडिया का विभाजन

•1947 में 560 अर्ध स्वतंत्र शाही राज्य अंग्रेज साम्राज्य द्वारा प्रभुता के सि्द्धांत के अंतर्गत संरक्षित किए गये।

•केबिनेट मिशन ज्ञापन के तहत, भारत स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 द्वारा इन राज्यों की प्रभुता की समाप्ति घोषित हुई, राज्यों के सभी अधिकार वापस लिए गए, व राज्यों का भारतीय संघ में प्रवेश किया गया। ब्रिटिश भारत के सरकारी उत्तराधिकारियों के साथ विशेष राजनैतिक प्रबंध किए गए।

•कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तान और भारत के साथ तटस्थ समझौता किया। पाकिस्तान के साथ समझौता पर हस्ताक्षर हुए।

•भारत के साथ समझौते पर हस्ताक्षर से पहले, पाकिस्तान ने कश्मीर की आवश्यक आपूर्ति को काट दिया जो तटस्थता समझौते का उल्लंघन था। उसने अधिमिलन हेतु दबाव का तरीका अपनाना आरंभ किया, जो भारत व कश्मीर, दोनों को ही स्वीकार्य नहीं था।

•जब यह दबाव का तरीका विफल रहा, तो पठान जातियों के कश्मीर पर आक्रमण को पाकिस्तान ने उकसाया, भड़काया और समर्थन दिया। तब तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद का आग्रह किया। यह 24 अक्तूबर, 1947 की बात है।

•नेशनल कांफ्रेंस ने, जो कश्मीर सबसे बड़ा लोकप्रिय संगठन था, व अध्यक्ष शेख अब्दुल्ला थे; भी भारत से रक्षा की अपील की।

•हरि सिंह ने गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन को कश्मीर में संकट के बारे में लिखा, व साथ ही भारत से अधिमिलन की इच्छा प्रकट की। इस इच्छा को माउंटबेटन द्वारा 27 अक्तूबर, 1947 को स्वीकार किया गया।

•भारत सरकार अधिनियम, 1935 और भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत यदि एक भारतीय राज्य प्रभुत्व को स्वींकारने के लिए तैयार है, व यदि भारत का गर्वनर जनरल इसके शासक द्वारा विलयन के कार्य के निष्पादन की सार्थकता को स्वीकार करे, तो उसका भारतीय संघ में अधिमिलन संभव था।

•पाकिस्तान द्वारा हरि सिंह के विलयन समझौते में प्रवेश की अधिकारिता पर कोई प्रश्न नहीं किया गया। कश्मीर का भारत में विलयन विधि सम्मत माना गया। व इसके बाद पठान हमलावरों को खदेड़ने के लिए 27 अक्तूबर, 1947 को भारत ने सेना भेजी, व कश्मीर को भारत में अधिमिलन कर यहां का अभिन्न अंग बनाया।

•भारत कश्मीर मुद्दे को 1 जनवरी, 1948 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले गया। परिषद ने भारत और पाकिस्तान को बुलाया, व स्थिति में सुधार के लिए उपाय खॊजने की सलाह दी। तब तक किसी भी वस्तु परिवर्तन के बारे में सूचित करने को कहा। यह 17 जनवरी, 1948 की बात है।

•भारत और पाकिस्तान के लिए एक तीन सदस्यी संयुक्त राष्ट्र आयोग (यूएनसीआईपी) 20 जनवरी, 1948 को गठित किया गया, जो कि विवादों को देखे। 21 अप्रैल, 1948 को इसकी सदस्यता का प्रश्न उठाया गया।

•तब तक कश्मीर में आपातकालीन प्रशासन बैठाया गया, जिसमें, 5 मार्च, 1948 को शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में अंतरिम सरकार द्वारा स्थान लिया गया।

•13 अगस्त, 1948 को यूएनसीआईपी ने संकल्प पारित किया जिसमें युध्द विराम घोषित हुआ, पाकिस्तानी सेना और सभी बाहरी लोगों की वापसी के अनुसरण में भारतीय बलों की कमी करने को कहा गया।

•जम्मू और कश्मीर की भावी स्थिति का फैसला 'लोगों की इच्छा' के अनुसार करना तय हुआ।

•संपूर्ण जम्मू और कश्मीर से पाकिस्तान सेना की वापसी, व जनमत की शर्त के प्रस्ताव को माना गया, जो- कभी नहीं हुआ।

•संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान के अंतर्गत युध्द-विराम की घोषणा की गई। यूएनसीआईपी संकल्प - 5 जनवरी, 1949। फिर 13 अगस्त, 1948 को संकल्प की पुनरावृति की गई। महासचिव द्वारा जनमत प्रशासक की नियुक्ति की जानी तय हुई।

•ऑल जम्मू और कश्मीर नेशनल कान्फ्रेंस ने अक्तूबर,1950 को एक संकल्प किया। एक संविधान सभा बुलाकर वयस्क मताधिकार किया जाए। अपने भावी आकार और संबध्दता जिसमें इसका भारत से अधिमिलन सम्मिलित है का निर्णय लिया जाये, व एक संविधान तैयार किया जाए।

•चुनावों के बाद संविधान सभा का गठन सितम्बर, 1951 को किया गया ।

•ऐतिहासिक 'दिल्ली समझौता - कश्मीरी नेताओं और भारत सरकार द्वारा- जम्मू और कश्मीर राज्य तथा भारतीय संघ के बीच सक्रिय प्रकृति का संवैधानिक समझौता किया गया, जिसमें भारत में इसके विलय की पुन: पुष्टि की गई।

•जम्मू और कश्मीर का संविधान, संविधान सभा द्वारा नवम्बर, 1956 को अंगीकृत किया गया। यह 26 जनवरी, 1957 से प्रभाव में आया।

•राज्य में पहले आम चुनाव अयोजित गए, जिनके बाद मार्च, 1957 को शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कांफ्रेंस द्वारा चुनी हुई सरकार बनाई गई ।

•राज्य विधान सभा में १९५९ में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया, जिसमें राज्य में भारतीय चुनाव आयोग और भारत के उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार के विस्तार के लिए राज्य संविधान का संशोधन पारित हुआ।

•राज्य में दूसरे आम चुनाव १९६२ में हुए जिनमें शेख अब्दुल्ला की सत्ता में पुन: वापसी हुई।

ऐसे में अरुंधति राय की यह बात कि ‘कश्मीर भारत का कभी अभिन्न अंग नहीं था और वर्ष 1947 में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का स्थान भारतीय उपनिवेशवाद ने ले लिया‘ सनसनीखेज तो हो सकती है लेकिन इसके पीछे विडम्बना यह है कि क्या हमने कभी कश्मीर के अवाम के बारे में सही ढंग से सोचा है ? उनके दुख, तकलीफ और भावनाओं को ठीक से समझने की कोशिश की है या सिर्फ़ अधिकार जताने को लालायित रहे हैं ? देखना यह भी होगा की हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति कितनी दृढ, पारदर्शी और विवेकपूर्ण रही है. तभी हम कश्मीर के बारे में कोई सही निर्णय ले पाने की स्थिति में पहुँच सकेंगे.

-शैलेन्द्र चौहान
पता : 34/242, प्रतापनगर, सेक्टर-3, जयपुर, (राजस्थान) 303033

बुधवार, 24 नवंबर 2010

जन्मदिन पर अरुंधती को सलाम!


यह पोस्ट कबाड़खाने से सीधे उधार…भाई अशोक पाण्डे की टीप सहित



सबसे पहली बात यह पोस्ट इसलिए एक्सक्लूसिव है कि इसे कबाड़ी शिवप्रसाद जोशी ने आज के वास्ते कबाड़ख़ाने के लिए लिखा है. उनके लेखन की सबसे बड़ी ख़ूबी है उनका  टू-द-पॉइन्ट, सचेत-सधा हुआ और गहरा अनुशासित गद्य जिसकी सतह खुरचने पर आपको जाने कौन कौन से लेखकों, अनुभवों से पाया गया ठोस यक़ीन नज़र आएगा.

हिन्दी का कौन कवि-लेखक गया बस्तर-छत्तीसगढ़?  किस महान युवा हिन्दी कवि ने कोशिश भी की कश्मीर को समझने  की? और किस ... ख़ैर छोड़िये, गाली निकल जाएगी हिन्दी के महान युवाओं के लिए. अरुंधती ने यह सब करने के अलावा बाकायदा इन व्हिच एनी गिव्ज़  इट दोज़ वन्स जैसी शानदार फ़िल्म का स्क्रीनप्ले लिखा. अरुंधती अब भी युवा हैं और महान भी. मेरी उनसे मुलाकात मैसी साहब की शूटिंग के दौरान एक बार हुई थी कोई बीसेक साल पहले. उस फ़िल्म में उन्होंने एक आदिवासी युवती का रोल किया था. मुझे वे एक बेमिसाल व्यक्तित्व लगीं जैसी वे थीं ही. आज उनका जन्मदिन है. वे उनचास साल पूरे कर रही हैं. कबाड़खाना उन्हें बधाई देता है और भाई शिवप्रसाद जोशी को थैंक्यू कहता है - अशोक पाण्डे

आज अरूंधति रॉय का जन्मदिन है 

शिवप्रसाद जोशी

अरूंधति रॉय ने कई साल पहले कह दिया था कि वो विश्व नागरिक हैं. वो एक ऐसे वक़्त में अपनी अटूट ज़िद के साथ सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में अपनी भूमिका निभा रही हैं जब पूरी दुनिया में विभिन्न किस्मों का कोलाहल जारी है, एक अश्लील और बर्बर मुक्त बाज़ार है और एक चमचमाता तंबू तना हुआ है जिसके नीचे अंतरराष्ट्रीय ताक़तें दुनिया को अपनी मुट्ठी में लेने की नई चालाकियों पर काम कर रही हैं.

24 नवंबर अरूंधति रॉय का जन्मदिन है.

वो हेरॉल्ड पिंटर, हॉवर्ड ज़िन, खोसे सारामागो, एडुवार्डो गेलियानो, नॉम चोमस्की जैसे चिंतकों एक्टिविस्टों की जमात से हैं जो अर्थ, समाज, राजनीति और कूटनीति की वैश्विक अराजकता के बीच मनुष्य और मनुष्यता को बचाए रखने की लड़ाई में अग्रणी रहे हैं.

अरूंधति रॉय जब बुकर पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थी तो वो बीबीसी के दिल्ली दफ़्तर में आई थीं. शालिनी उस समय हिंदी सेवा में थीं. शालिनी का अनुभव कुछ यूं था कि उसका ज़िक्र हम लोग कई बार आपस में करते रहे हैं, आज अरूंधति के जन्मदिन पर उनकी उस छवि को आप लोगों से शेयर करते हैं. वो एक छोटी सी सकुचाई हुई, तीखे नाक नक्श वाली, आंखों में एक विराट गहराई और एक न जाने कौन से सिनेमा की न जाने कौन सी अज्ञात फ़िल्म की न जाने से कौन सी नायिका. कुछ ऐसे कि बस वो थीं. अरूंधति ने जींस और टॉप पहना था और शालिनी के मुताबिक उन्हें देखकर नहीं लगता था कि उनमें कोई मैदान मार लेने वाला जैसा गदगद भाव रहा होगा.

अरूंधति ने गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स शायद लिखा ही इसलिए था कि वो आने वाले दिनों के लिए अपनी भूमिका तै कर चुकी थीं. उस उपन्यास में जैसी चोटें, वेदनाएं, प्रताड़नाएं, प्रेम विह्वलताएं, द्वंद्व, लड़ाइयां और सरोकार थे, अरूंधति ने अपने आगे के जीवन के लिए जैसे उन्हीं शब्दों की सामर्थ्य से खुद को लैस कर लिया था.

वो उपन्यास 21वीं सदी की शुरुआत से चंद साल पहले सम्मानित हुआ था. मस्जिद नब्बे के दशक की शुरुआत में गिरा दी गई थी. भूमंडलीकरण का टेंट भारत की जर्जरता के ऊपर ताना जा रहा था. और आतंकित कर देने वाली नव-अमीरी बड़े शहरों में अपने चक्कर काट कर छोटे शहरों और क़स्बों का रुख़ कर चुकी थीं. घात वाले ऐसे उस दौर में अरूंधति ने बुकर लिया, उपन्यास लिखना स्थगित किया और एक ऐसी लड़ाई में उतर आईं जो न दिखती थीं और जिसमें हारजीत के नतीजे भी धुंधले से दिखाई देने वाले थे.

अरूंधति ने इस लडा़ई में हार का पक्ष लिया. वो उस तबके उस आम हिंदुस्तानी उस आम विश्व नागरिक की शाश्वत और अवश्यंभावी घोषित कर दी गई हार के साथ जा खड़ी हुई और वहां से उन्होंने रचना और नाफ़रमानी का एक नया रास्ता खोल दिया.

इस रास्ते पर जाने का साहस बहुत कम लोग कर पाते हैं. इस रास्ते पर जाने का विवेक बड़े जोखिम की मांग करता है. इसमें दर्द और टीस है. ये कुछ वैसा ही है जैसा अरूंधति के प्रिय लेखक अर्जेटीना के एडुआर्डो गेलियानो की किताब ओपन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमेरिका में दर्ज लोगों की ज़ख़्मी नसों की उछाड़ पछाड़ है.

हमारे समय की समस्त बैचेनियां हमारे समय की कविता कहानी या उपन्यास में न आती हों तो न सही, अरुंधति, गेलियानो, चॉमस्की और उन जैसों की ज़िंदगियों, विचारों और उधेड़बुनों के ज़रिए तो आ ही रही हैं. एक किताब से बड़ा आखिरकार एक जीवन ही है. मामूली ही सही पर 24 नवंबर के मौके पर अरूंधति रॉय के हवाले से ये बात और पुख़्ता होती है

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

अरुंधती कश्मीर क्यूं नहीं जातीं?

(अरुंधती का ताज़ा बयान विवादों के घेरे में है…इस बहाने तमाम लोग मार्क्सवाद को गरिया रहे हैं…अरुंधती को ज़ेल भेजने की बात कर रहे हैं और फेसबुक आदि पर अपनी 'देशभक्ति' का जांबाज प्रदर्शन कर रहे हैं…यहां हम स्तंभकार अंशुमाली रस्तोगी का बयान इस वीर-बालक मुद्रा के प्रतिनिधि के रूप में दे रहे हैं…यह बयान पढ़कर आप इस वीरता प्रदर्शन के स्रोत जान सकते हैं…मज़ेदार बात यह है कि अंशुमाली अरुंधती को कश्मीर जाने की सलाह दे रहे हैं…मानों ये सब वीर सीधे ग्राउण्ड ज़ीरो से कमेन्ट्री कर रहे हैं…जबकि उन्हें यह भी नहीं पता कि अरुंधती ने वहां से लौटने के बाद भी एक बयान दिया है…हम अरुंधती का बयान और उनके दिल्ली में दिये गये बयान पर वरवर राव के बयान का एक हिस्सा हाशिया से साभार लगा रहे हैं…आप सब इस बहस में आमंत्रित हैं। )


अरुंधति रॉय की घोषित प्रगतिशीलता के मायने
अंशुमाली रस्तोगी

मार्क्सवादी अरुंधति रॉय की बहुत तारीफ करते हैं। उन्हें अपने भगवान का सा दर्जा देते हैं। उनकी निगाह में अरुंधति बेहद तरक्की-पसंद लेखिका हैं। अरुंधति जो लिख व कह देती हैं उनके लिए वो 'पत्थर की लकीर' सा हो जाता है। मेरे विचार में अभी हाल अरुंधति ने भारत-विरोधी जो बयान दिया है उसे भी मार्क्सवादी प्रगतिशीलों ने 'पत्थर की लकीर' ही माना होगा!जिस कश्मीर के लिए इतने लंबे समय से संघर्ष चल रहा है, जिस संघर्ष के बीच न जाने कितने लोग शहीद हो चुके हैं, न जाने कितने बेघर उनके संघर्ष और शाहादत को अरुंधति ने एक पल में अपने बयान से 'ध्वस्त' करके रख दिया। बड़े ही प्रगतिशील अंदाज में उन्होंने कह दिया कि कश्मीर भारत का अंग है ही नहीं। कश्मीर के बहाने भारत को देखने की उनकी निगाह को अगर 'राष्ट्र-विरोधी' नहीं माना जाए तो क्या माना जाए!

यह सही बात है कि अपने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा बहुत बड़ा है लेकिन इतना भी बड़ा नहीं है कि आप उस दायरे को ही तोड़ने लग जाएं। जब कश्मीर के प्रति अरुंधति का यह रूख है तो ऐसा ही कुछ कभी वो भारत की स्वतंत्रता के खिलाफ भी कह-लिख सकती हैं। हम देख चुके हैं कि पिछले दिनों वे माओवादियों के संघर्ष को जायज ठहरा ही चुकी हैं। और माओवादियों के प्रति अपने दिल में 'खास हमदर्दी' भी रखती हैं। उन्हें शायद उस पीड़ा का एहसास है ही नहीं जो शहीदों के परिवारों को माओवादियों के अत्याचारों से मिला है। माओवादी देश के भीतर एक नए तरह के आतंकवाद को रचने की तैयारियों में संलग्न हैं, जिसे अरुंधति अपना नैतिक व वैचारिक समर्थन देती हैं। वाह! अपने ही देश में रहकर उसके खिलाफ कुछ भी बोल देना क्या अरुंधति की महान प्रगतिशीलता ने उन्हें यही सिखाया है?

साथ ही इस मामले में यह देखना भी बेहद दिलचस्प है कि अरुंधति के ऐसे बेतुके बयान पर प्रगतिशील मार्क्सवादी अपनी जुबानें खामोश रखे हुए हैं। मतलब साफ है कि अरुंधति को उनका मन ही मन मौन समर्थन हासिल है। अरुंधति के माओवादी-प्रेम पर भी प्रगतिशील उनके पक्ष में उतर आए थे। अरुंधति को 'प्रगतिशीलता की देवी' बनाने के लिए उन्होंने क्या नहीं कहा-लिखा था। यह मान लेने में कोई शक नहीं कि प्रगतिशील अपनी छद्म प्रगतिशीलता को स्थापित रखने के लिए किसी भी हद से गुजर सकते हैं। फिर चाहे वो कश्मीर को भारत से अलग कर दें या गुजरात को। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

इतनी भोली अरुंधति भी न होंगी कि उन्हें मालूम ही न हो कि कश्मीर की रंगत को बिगाड़ने में किन अलगाववादियों और किस देश का हाथ रहा है। क्या उन्हें कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और उनकी तकलीफों का एहसास है? कश्मीर की अवाम किस तरह से हर पल खतरों के साये में अपनी जिंदगी गुजर बसर कर रही है, क्या अरुंधति इस सच को जानती हैं? माओवादियों के बीच रहकर उनकी वाह वाही का समर्थन हासिल करने वाली अरुंधति प्रयास करें कुछ दिनों कश्मीर में रहने का भी वहां के जो संगीन हालात हैं, उसकी हकीकत उन्हें मालूम चल जाएगी। ठीक है कि आप बहुत उम्दा प्रगतिशील लेखिका हैं, तो अपनी प्रगतिशीलता अपने गुट और अपने हितैषियों के मध्य रखिए न, उसे आप पूरे देश पर क्यों थोपना चाहती हैं?

दरअसल, अरुंधति रॉय जैसे प्रगतिशील जिस वर्ग से आते हैं, उसमें न संवेदना होती है न ही कुछ सोचने-समझने की ताकत। बस,एक जिद्द बनी रहती है कि कैसे भी हमें अपनी प्रगतिशीलता को दूसरे पर थोपना है। अगर सामने वाला उनकी प्रगतिशीलता को सहृय स्वीकार लेता है, तो वो उनकी निगाह में महान है और जो उनसे जरा भी नाइत्तेफाकी रखे वो उनका 'सबसे बड़ा दुश्मन'। यह हम मकबूल फिदा हुसैन के मामले में बेहतर देख व जान चुके हैं।

बहरहाल, अरुंधति के बयान पर हाय-तौबा जारी है। इसके अभी कुछ और दिन जारी रहने की संभावना भी है। मामला पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। इस पर अलग-अलग तरह के बयानों व कथनों की रोटियां सिकना भी शुरू हो चुकी हैं। पर,बड़ी बात यह है कि देश के प्रति हमारे जो सरोकार व संवेदनाएं होनी चाहिए वो समाप्त हो गई हैं। क्योंकि हम मुद्दों को अपने-अपने फायदे व नुकसान के हिसाब से उठाते हैं और वैसे ही खत्म भी कर देते हैं। शायद अरुंधति के इस बयान का मकसद भी यही रहा हो!
अब देखना यह है कि इस मामले में अरुंधति रॉय की 'घोषित प्रगतिशीलता' की जीत होती है या 'सरकार की सख्ती' की


अरुंधति रॉय का बयान

मैं यह श्रीनगर, कश्मीर से लिख रही हूँ. आज सुबह के अख़बारों ने लिखा है कि मैं कश्मीर पर आयोजित एक आमसभा में कही गयी अपनी बातों के लिए देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हो सकती हूँ. मैंने वह कहा जो यहाँ दसियों लाख लोग रोज कह रहे हैं. मैंने वही कहा जो दूसरे लेखक सालों से लिखते और कहते आये हैं. मेरे भाषणों को पढने की ज़हमत उठानेवाले यह देखेंगे कि मैंने बुनियादी तौर पर इंसाफ की मांग की है. मैंने कश्मीरी लोगों के लिए इंसाफ के बारे में कहा है जो दुनिया के सबसे क्रूर फौजी कब्ज़े में रह रहे हैं, उन कश्मीरी पंडितों के लिए, जो आपने घरों से उजाड़ दिए जाने की त्रासदी में जी रहे हैं, उन दलित सैनिकों के लिए, कूड़े के ढेर पर बनी कब्रों को मैंने कुड्डालोर में उनके गांवों में देखा, भारत के उन गरीबों के लिए जो इस कब्ज़े की कीमत चुकाते हैं और एक बनते जा रहे पुलिस राज के आतंक में जीना सीख रहे हैं.

कल मैं शोपियां गयी थी- दक्षिणी कश्मीर के सेबों के उस शहर में जो पिछले साल 47 दिनों तक आसिया और नीलोफर के बर्बर बलात्कार और हत्या के विरोध में बंद रहा था. इन दोनों युवतियों की लाशें उनके घरों के पास की एक पतली सी धारा में पाई गयी थी और उनके हत्यारे अब भी क़ानून से बहार हैं. मैं नीलोफर के पति और आसिया के भाई शकील से मिली. मैं वेदना और गुस्से से पागल उन लोगों के साथ एक घेरे में बैठी जो भारत से इंसाफ पाने की उम्मीद को खो चुके हैं, और अब यकीन रखते हैं कि आज़ादी उनकी अकेली उम्मीद है. मैं पत्थर फेंकनेवाले उन नौजवानों से मिली जिनकी आँखों में गोली मारी गयी थी. मैंने एक नौजवान के साथ सफ़र किया, जिसने मुझे बताया कि अनंतनाग जिले के उसके तीन किशोर दोस्त हिरासत में लिए गए और पत्थर फेंकने की सजा के तौर पर उनके नाखून उखाड़ लिए गए.

अख़बारों में कुछ लोगों ने मुझ पर नफ़रत फ़ैलाने और भारत को तोड़ने का आरोप लगाया है. इसके उलट, मैंने जो कहा है उसके पीछे प्यार और गर्व की भावना है. इसके पीछे यह इच्छा है कि लोग मारे न जाएँ, उनका बलात्कार न हो, उन्हें कैद न किया जाये और उन्हें खुद को भारतीय कहने पर मज़बूर करने के लिए उनके नाखून न उखाड़े जाएँ. यह एक ऐसे समाज में रहने की चाहत से पैदा हुआ है जो इंसाफ के लिए जद्दोजहद कर रहा हो. तरस आता है उस देश पर जो लेखकों की आत्मा की आवाज़ को खामोश करता है. तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है जबकि सांप्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कार्पोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी और गरीबों के शिकारी खुले घूम रहे हैं.


वरवर राव का बयान

आत्मनिर्णय के अधिकारों का पक्ष लेते हुए राय ने इस पर जोर दिया कि अकेले आज़ादी हर चीज़ नहीं दे सकती: उन्होंने जानना चाहा कि कश्मीरी लोगों को जब आज़ादी मिल जाएगी तो कश्मीरियों को कैसा इंसाफ मिलेगा. उन्होंने कश्मीर के एक दौरे के दौरान सुने गए नारे का हवाला दिया: 'भूखा नंगा हिंदुस्तान, जान से प्यारा पाकिस्तान' और इस नज़रिए पर गंभीर आपत्ति जताई थी. राय ने कहा कश्मीरियों के संघर्ष का समर्थन ठीक इन्हीं (भूखे-नंगे) वर्गों से आ रहा है- बुद्धिजीवियों के एक छोटे से हिस्से के अलावा देश के दूसरे हिस्सों के गरीब और उत्पीड़ित लोग कश्मीरी लोगों कि आज़ादी के संघर्ष को समर्थन दे रहे हैं. उनके संघर्ष का विरोध भारतीय राज्य कर रहा है.

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

अरुंधती ने भेजा जवाब, नहीं जाएँगी हंस के सालाना जलसे में

(यह महत्वपूर्ण पोस्ट जनज्वार  से आभार)


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प्रिय भाइयों, 

हंस ने जो अगले सालाना आयोजन कि रूप रेखा प्रचारित की थी उसमें सब को यह आभास दिया था कि इस बार वे पुलिस अधिकारी विश्व रंजन और अरुंधती राय को एक ही मंच पर लायेंगे.लोगों में इस पर बड़ा आक्रोश था. मैंने दो-तीन दिन पहले हंस कार्यालय में राजेंद्र जी से पूछा तो उन्हों भी तस्दीक की. लेकिन जब मैं ने अरुंधती से पूछा तो उन्हों ने साफ़ कहा कि वे ऐसे कार्यक्रम में नहीं जा रहीं हैं. उनका जवाब संलग्न है

नीलाभ 

अरुंधती का जवाब- 

Dear Neelabh 

Thanks for alerting me about a meeting I had no idea about! Rajendra Yadav did call a few weeks ago and ask whether I could come to a Hans event in July. I was travelling at the time and said I'd speak to him later. And now you tell me that without my ever having agreed, it's being billed as a debate between me and the notorious policeman Mr Vishwaranjan! I had no idea about all this. I have no intention of being there. Not after my recent experience with PTI and the rubbish that is being put out by the Chhattisgarh police and headlined in the Indian Express. You say a bunch of youngsters are putting together a petition asking me not to go...please tell them that I don't need a petition to persuade me! I never agreed to go in the first place. And now it's beginning to look like a set up . You can circulate this to anyone who is worried that I might walk into this trap. (translate it if it will help?) I think there are better ways of having debates in which co-opted media people controlled by the police cannot misquote you.

All the best
Arundhati

शनिवार, 10 जुलाई 2010

हत्यारों की गवाहियां अभी बाकी हैं राजेंद्र बाबू?


देश के मध्य हिस्से में माओवादियों और सरकार के बीच चल रहे संघर्ष का शीर्षक रखने में,राजेंद्र बाबू उतना भी साहस नहीं दिखा पाये जितना कि शरीर के मध्य हिस्से के छिद्रान्वेषण पर वे लगातार दिखाते रहे हैं।


तमाशे के फ़िराक में राजेंद्र बाबू
इसे सनसनी माने या सच,मगर कार्यक्रम तय है कि इस बार साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’के सालाना जलसे में लेखिका अरुंधति राय और सलवा जुडूम अभियान के मुखिया छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन आमने-सामने होंगे। यह जानकारी सबसे पहले हिंदी समाज के जनपक्षधर लोगों में पढ़ी जाने वाली मासिक पत्रिका ‘समयांतर’के माध्यम से जनज्वार तक पहुंची, जिसकी पुष्टि अब ‘हंस‘ भी कर चुका है। ‘हंस’से मिली जानकारी के मुताबिक इन दो मुख्य वक्ताओं के अलावा अन्य वक्ता भी होंगे।
हर वर्ष 31जुलाई को होने वाले इस कार्यक्रम का महत्व इस बार इसलिए भी अधिक है कि ‘हंस’ अपने प्रकाशन के पच्चीसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। ऐसे में पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव की कोशिश होगी कि धमाकेदार ढंग से पत्रिका की सिल्वर-जुबली का मजा लिया जाये। मजा लेने के शगल में पक्के अपने राजेंद्र बाबू ने माओवाद के मसले पर बहस का विषय रखा है, ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति।’

‘हंस’ ऐसे किसी ज्वलंत मसले को लेकर ऐसा संस्कृतनिष्ठ और घुमावदार शीर्षक रखेगा, हतप्रभ करने वाला है। खासकर तब जबकि पत्रिका के तौर पर ‘हंस’और संपादक के बतौर राजेंद्र यादव खुल्लमखुल्ला, खुलेआमी के हमेशा अंधपक्षधर रहे हों। वैसे में देश के मध्य हिस्से में चल रहे माओवादियों और सरकार के बीच संघर्ष का शीर्षक रखने में राजेंद्र बाबू उतना भी साहस नहीं दिखा पाये हैं,जितना कि शरीर के मध्य हिस्से के छिद्रान्वेषण पर वे लगातार दिखाते रहे हैं।

हिंदी में प्रतिष्ठित कही जाने वाली इस पत्रिका के संपादक का यह शीर्षक चिंता का विषय है और अनुभव का भी। अनुभव का इसलिए कि एक कार्यक्रम के दौरान एक दूसरे राजनीतिक मसले पर श्रोता उनके इस रूप से रू-ब-रू हुए थे। संसद हमले मामले पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दोषी करार दिये जाने के बाद फांसी की सजा पाये अफजल गुरु को लेकर ‘जनहस्तक्षेप’दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक कार्यक्रम किया था जिसमें अन्य वक्ताओं के साथ राजेंद्र यादव भी आमंत्रित थे।

बोलने की बारी आने पर संचालक ने जब इनका नाम उदघोषित किया तो अपने राजेंद्र बाबू ने मामले को कानूनी बताते हुए वकील कमलेश जैन को बोलने के लिए कहा। कमलेश जैन ने अफजल गुरु को लेकर वही बातें कहीं जो कि सरकार का पक्ष है। कमलेश सरकारी पक्ष को इस तरह पेश करने लगीं कि मजबूरन श्रोताओं ने हूटिंग की और आयोजकों को शर्मशार होना पड़ा। जबकि हम सब जानते हैं कि अफजल का केस लड़ रहे वकील,सामाजिक कार्यकर्ता और जन पक्षधर बुद्धिजीवी इस मामले में फेयर ट्रायल की मांग करते रहे हैं। कारण कि सर्वोच्च न्यायालय ने अफजल को फांसी की सजा ‘कंसेंट आफ नेशन’ के आधार पर मुकर्रर की थी।

अफजल से ही जुड़ा एक दूसरा मसला ‘हंस’ में लेख प्रकाशित करने को लेकर हुआ। जाने माने पत्रकार और कश्मीर मामलों के जानकार एवं ‘हंस’ के सहयोगी गौतम नौलखा ने कहा कि, ‘अफजल मामले की सच्चाई हिंदी के प्रबुद्ध पाठकों तक पहुंचे इसके लिए जरूरी है कि ‘हंस’ में इस मसले पर लेख छपे।’ गौतम के इस सुझाव पर राजेंद्र यादव ने लेख आमंत्रित किया। लेख उन तक पहुंचा। उन्होंने तत्काल पढ़ा और लेख के बहुत अच्छा होने का वास्ता देकर अगले अंक में छापने की बात कही। मगर बात आयी-गयी और वह लेख नहीं छपा।


अब सवाल यह है कि पिछले छह वर्षों से सलवा जुडूम अभियान के तमाशबीन बने रहे राजेंद्र यादव कहीं इस तमाशायी उपक्रम के जरिये अपने होने का प्रमाण देने की तो कोशिश में नहीं लगे हैं। तमाशायी कार्यक्रम इसलिए कि लेखिका अरुंधति राय सलवा जुडूम अभियान, माओवादियों और सरकार के रवैये पर क्या सोचती हैं,उनके लेखन के जरिये हम सभी जान चुके हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के प्रिय डीजीपी विश्वरंजन ‘सलवा जुडूम’को एक जन अभियान मानते हैं,यह छुपी हुई बात नहीं है। याद होगा कि पिछले वर्ष दर्जनों जनपक्षधर बुद्धिजीवियों ने रायपुर में विश्वरंजन के इंतजाम से हो रहे ‘प्रमोद वर्मा स्मृति’कार्यक्रम में इसी आधार पर जाने से मना कर दिया था। इस बाबत विरोध में पहला पत्र विश्वरंजन के नाम कवि पंकज चतुर्वेदी ने लिखा था। विरोध का मजमून हिंदी पाक्षिक पत्रिका ‘द पब्लिक एजेंडा’में छपे विश्वरंजन के एक साक्षात्कार के आधार पर कवि ने लिखा था जिसमें डीजीपी ने सलवा जुडूम को जनता का अभियान बताया था।

ऐसे में फिर बाकी क्या है जिसके लिए राजेंद्र बाबू अरुंधति-विश्वरंजन मिलाप कराने को लेकर इतने उत्साहित हैं। क्या हजारों आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन से उजाड़े जाने, माओवादियों के सफाये के बहाने आदिवासियों को विस्थापित किये जाने की साजिशों से राजेंद्र बाबू वाकिफ नहीं हैं। राजेंद्र बाबू क्या आप माओवाद प्रभावित इलाकों में सैकड़ों हत्याएं,बलात्कार आदि मामलों से अनभिज्ञ हैं जो आपने विश्वरंजन को आत्मस्विकारोक्ति के लिए दिल्ली आने का बुलावा भेज दिया है। रही बात उन भले मानुषों की सोच का जो यह मानते हैं कि इस बहाने माओवाद के मसले पर बहस होगी और राष्ट्रीय मसला बनेगा फिर तो राजेंद्र बाबू आप ऐसे सेमीनारों की झड़ी लगा सकते हैं।

जैसे अभी विश्वरंजन को बुलाने की बजाय भोपाल गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी एंडरसन को बुलाइये जिससे राष्ट्र के सामने वह अपना पक्ष रख सके कि उसने त्रासदी बुलायी थी या आयी थी। इसी तरह सिख दंगों के मुख्य आरोपियों और गुजरात मसले पर गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को भी दंगे,हत्याओं और बलात्कारों की मजबूरियां गिनाने के लिए एक चांस आप ‘ऐवाने गालिब सभागार’में जरूर दीजिए। समय बचे तो निठारी हत्याकांड के सरगना पंधेर और कोली को बुलावा भिजवा दीजिए जिससे कि उसके साथ अन्याय न हो,कोई गलत राय न बनाये। राजेंद्र बाबू आप ऐसा नहीं करेंगे और मुझे अहमक कहेंगे क्योंकि इन सभी पर राज्य ने अपराधी होने या संदेह का ठप्पा लगा दिया है। तब हम पूछते हैं राजेंद्र बाबू आपसे कि जिसको जनता ने अपराधी मुकर्रर किया है,उसकी गवाहियों में मुंसिफ बनने की अनैतिकता आप कैसे कर सकते हैं?

राजेंद्र बाबू अगर आप कुछ बहस की मंशा रखते ही हैं तो गृहमंत्री पी.चिदंबरम को बुलवाने का जुगाड़ लगाइये। मगर शर्त यह रहेगी कि 5 मई को जेएनयू में जिस तरह की डेमोक्रेसी वहां के छात्रों को झेलनी पड़ी, जिसे वहां के छात्रों ने चिदंबरी डेमोक्रेसी कहा, इस बार उनके आगमन पर माहौल वैसा न हो। गर यह संभव नहीं है तो विश्वरंजन से क्या बहस करेंगे, वह कोई कानून बनाते हैं?

राजेंद्र बाबू आप बड़े साहित्यकार हैं। सुना है आपने दलितों-स्त्रियों को साहित्य में जगह दी है। इस भले काम के लिए मैं तहेदिल से आपको बधाई देता हूं। साथ ही सुझाव देता हूं कि साहित्य में पूरा जीवन लगा देने के बावजूद गर आप दण्डकारण्य को एक आदिवासी साहित्यकार नहीं दे सके तो,आदिवासियों के हत्यारों की जमात से आये प्रतिनिधियों को साहित्यकार बनाने का तो पाप मत ही कीजिए।

राजेंद्र बाबू आप भी जानते हैं कि साहित्यकारों की संवेदनशीलता और संघर्ष से इतिहास भरा पड़ा है। आज बाजार का रोगन चढ़ा है, मगर ऐसा भी नहीं है सब अपना पिछवाड़ा उघाड़े खडे़ हैं और फिर हमारे युवा मन का तो ख्याल कीजिए। हो सकता है उम्र के इस पड़ाव पर आप डीजीपी कवि की कविताओं को सुनने में ही सक्षम हों,मगर हमारी निगाहें तो उन खून से सने लथपथ हाथों को देखते ही ताड़ जायेंगी। एक बात कहें राजेंद्र बाबू, एक दिन आप अपने नाती-पोतों को वह हाथ दिखाइये, अच्छा ठीक है किस्सों में अहसास ही कराइये। यकीन मानिये आप बुद्धना, मंगरू, शुकू, सोमू, बुद्धिया को अपने घरों में पायेंगे जो पिछले छह वर्षों से दण्डकारण्य क्षेत्र में तबाह-बर्बाद हो रहे हैं। इन जैसे हजारों लोग जो आज मध्य भारत में युद्ध की चपेट में हैं, आपको एक झटके में पड़ोसी लगने लगेंगे और आप साहित्य के वितण्डावादी आयोजन की जगह एक सार्थक पहल को लेकर आगे बढ़ेंगे।

महोदय कवि हैं ?

उम्मीद है कि अर्जी पर आप गौर करेंगे। गौर नहीं करने की स्थिति में हमें मजबूरन अरुंधति राय से अपील करनी पड़ेगी। फिर वही बात होगी कि देखो हिंदी से बड़ी अंग्रेजी है और न चाहते हुए भी सारा क्रेडिट अरुंधति के हिस्से जायेगा। हिंदीवालों की पोल खुलेगी सो अलग। इसलिए राजेंद्र बाबू घर की इज्जत घर में ही रखते हैं। कोशिश करते हैं कि हमारी भाषा में जनपक्षधरता को गहराई मिले। कम-से-कम अपने किये पर समाज के सबसे कमजोर तबके (आदिवासियों)के सामने तो शर्मसार न होना पड़े। खासकर तब जबकि उस तबके ने हमारे समाज और सरकार से सिवाय अपनी आजादी के किसी और चीज की उम्मीद ही न की हो।

अजय प्रकाश