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मंगलवार, 28 सितंबर 2010

गुलाम स्त्रियों की मुक्ति का पहला गीत

(एन्तीपैत्रोस यूनान के सिसरो के काल के प्राचीनतम कवियों में से एक हैं. ये गीत उन्होंने अनाज पीसने की पनचक्की के आविष्कार पर लिखा था क्योंकि इस यंत्र के बन जाने के बाद औरतों को हाथ चक्की के श्रम से छुटकारा मिला था. 

यह कविता श्रम-विभाजन से सम्बंधित प्राचीन काल के लोगों और आधुनिक काल के लोगों के विचारों के परस्पर विरोधी स्वरूप को भी स्पष्ट करती है. कार्ल मार्क्स ने अपनी प्रसिद्ध कृति "पूँजी" के पहले खंड पर इस कविता का उल्लेख किया है.)

आटा पीसने वाली लड़कियों,
अब उस हाथ को विश्राम करने दो,
जिससे तुम चक्की पीसती हो,
और धीरे से सो जाओ !

मुर्गा बांग देकर सूरज निकलने का ऐलान करे
तो भी मत उठो !

देवी ने अप्सराओं को लड़कियों का काम करने का आदेश दिया है,
और अब वे पहियों पर हलके-हलके उछल रही हैं
जिससे उनके धुरे आरों समेत घुम रहे हैं
और चक्की के भारी पत्थरों को घुमा रहे हैं.
आओ अब हम भी पूर्वजों का-सा जीवन बिताएँ
काम बंद करके आराम करें
और देवी की शक्ति से लाभ उठाएँ.

(कविता "स्त्री: मुक्ति का सपनापुस्तक से साभार. कविता का प्रस्तुतीकरण और टिप्पणी: रश्मि चौधरी)

शुक्रवार, 25 जून 2010

प्राचीन भारत में स्त्रियों की स्थिति के सम्बन्ध में नारीवादी दृष्टिकोण

(प्रस्तुत लेख मेरे शोध-कार्य "मनुस्मृति एवं याज्ञवल्क्यस्मृति के नारी-संबंधी प्रावधानों का नारी-सशक्तीकरण पर प्रभाव" का अंश है. इसलिए अधूरा भी लग सकता है और हो सकता है कि कहीं और भी पढ़ा जा चुका है. वैसे सन्दर्भ-ग्रंथों के नाम भी दे दिए गए हैं)

प्राचीन भारत में स्त्रियों की दशा के विषय में इतिहासकारों के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं. स्थूल रूप में इन ऐतिहासिक दृष्टिकोणों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -
- राष्ट्रवादी दृष्टिकोण
- वामपंथी दृष्टिकोण
- नारीवादी दृष्टिकोण
- दलित लेखकों का दृष्टिकोण
जहाँ राष्ट्रवादी विचारक यह मानते हैं कि वैदिक-युग में भारत में नारी को उच्च-स्थिति प्राप्त थी. नारी की स्थिति में विभिन्न बाह्य कारणों से ह्रास हुआ. परिवर्तित परिस्थितियों के कारण ही नारी पर विभिन्न बन्धन लगा दिये गये जो कि उस युग में अपरिहार्य थे. इसी प्रकार वर्ण-व्यवस्था को भी कर्म पर आधारित और बाद के काल की अपेक्षा लचीला बताते हुये ये विचारक उसका बचाव करते हैं. वामपंथी विचारक राष्ट्रवादी विद्वानों के इन विचारों से सर्वथा असहमत हैं. उनके अनुसार स्त्रियों तथा शूद्रों की अधीन स्थिति तत्कालीन उच्च-वर्ग का षड्यंत्र है, जिससे वे वर्ग-संघर्ष को दबा सकें. उच्च-वर्ग अर्थात्मुख्यतः ब्राह्मण (क्योंकि समाज के लिये नियम बनाने का कार्य ब्राह्मणों का ही था) शूद्रों को अस्पृश्यता के नाम पर तथा नारियों को परिवारवाद के नाम पर संगठित नहीं होने देना चाहते थे.
नारीवादी विचारक भी राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का विरोध करते हैं. उनके अनुसार तत्कालीन सामाजिक ढाँचा पितृसत्तात्मक था और धर्मगुरुओं ने जानबूझकर नारी की अधीनता की स्थिति को बनाये रखा. ये विचारक यह भी नहीं मानते कि वैदिक युग में स्त्रियों की बहुत अच्छी थी, हाँ स्मृतिकाल से अच्छी थी, इस बात पर सहमत हैं. दलित विचारक स्मृतियों और विषेशत मनुस्मृति के कटु आलोचक हैं. वे यह मानते हैं कि शूद्रों की युगों-युगों की दासता इन्हीं स्मृतियों के विविध प्रावधानों का परिणाम है. वे मनुस्मृति के प्रथम अध्याय के ३१वें[i] और ९१वें[ii] श्लोक का मुख्यतः विरोध करते हैं जिनमें क्रमशः शूद्रों की ब्रह्मा की जंघा से उत्पत्ति तथा सभी वर्णों की सेवा शूद्रों का कर्त्तव्य बताया गया है.
प्राचीन भारत में नारी की स्थिति के विषय में सबसे अधिक विस्तार से वर्णन राष्ट्रवादी विचारक ए.एस. अल्टेकर ने अपनी पुस्तक में किया है. उन्होंने नारी की शिक्षा, विेवाह तथा विवाह-विच्छेद, गृहस्थ जीवन, विधवा की स्थिति, नारी का सार्वजनिक जीवन, धार्मिक जीवन, सम्पत्ति के अधिकार, नारी का पहनावा और रहन-सहन, नारी के प्रति सामान्य दृष्टिकोण आदि पर प्रकाश डाला है. अल्टेकर के अनुसार प्राचीन भारत में वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति समाज और परिवार में उच्च थी, परन्तु पश्चातवर्ती काल में कई कारणों से उसकी स्थिति में ह्रास होता गया. परिवार के भीतर नारी की स्थिति में अवनति का प्रमुख कारण अल्टेकर अनार्य स्त्रियों का प्रवेश मानते हैं. वे नारी को संपत्ति का अधिकार देने, नारी को शासन के पदों से दूर रखने, आर्यों द्वारा पुत्रोत्पत्ति की कामना करने आदि के पीछे के कारणों को जानने का प्रयास करते हैं तथा उन्होंने कई बातों का स्पष्टीकरण भी दिया है. उदाहरण के लिये उनके अनुसार महिलाओं को सम्पत्ति का अधिकार देने का कारण यह है कि उनमें लड़ाकू क्षमता का अभाव होता है, जो कि सम्पत्ति की रक्षा के लिये आवश्यक होता है. इस प्रकार अल्टेकर ने उन अनेक बातों में भारतीय संस्कृति का पक्ष लिया है, जिसके लिये हमारी संस्कृति की आलोचना की जाती है. उन्होंने अपनी पुस्तक के प्रथम संस्करण की भूमिका में स्वयं यह स्वीकार किया है कि निष्पक्ष रहने के प्रयासों के पश्चात्भी वे कहीं-कहीं प्राचीन संस्कृति के पक्ष में हो गये हैं.* प्रसिद्ध राष्ट्रवादी इतिहासकार आर. सी. दत्त ने भी अल्तेकर के दृष्टिकोण का समर्थन किया है उनके अनुसार, "महिलाओं को पूरी तरह अलग-अलग रखना और उन पर पाबन्दियाँ लगाना हिन्दू परम्परा नहीं थी. मुसलमानों के आने तक यह बातें बिल्कुल अजनबी थीं... . महिलाओं को ऐसी श्रेष्ठ स्थिति हिन्दुओं के अलावा और किसी प्राचीन राष्ट्र में नहीं दी गयी थी."[iii] शकुन्तला राव शास्त्री ने अपनी पुस्तकवूमेन इन सेक्रेड लॉज़में इसी प्रकार के निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं.
आधुनिक काल के प्रमुख नारीवादी इतिहासकारों तथा विचारकों ने अल्टेकर और शास्त्री के उपर्युक्त स्पष्टीकरणों की आलोचना की है. आर.सी. दत्त के विरोध में प्रसिद्ध नारीवादी विचारक डा. उमा चक्रवर्ती कहती हैं, "... ... मनु तथा अन्य कानून-निर्माताओं ने लड़कियों की कम उम्र में ही शादी की हिमायत की थी. सातवीं सदी में हर्षवर्धन के प्राम्भिक काल से संबंधित विवरणों में सती-प्रथा उच्च जति की महिलाओं के साथ साफ़ जुड़ी देखी जा सकती है. महिलाओं का अधीनीकरण सुनिश्चित करने वाली संस्थाओं का ढाँचा अपने मूलरूप में मुस्लिम धर्म के उदय से भी काफ़ी पहले अस्तित्व में चुका था. इस्लाम के अनुयायियों का आना तो इन तमाम उत्पीड़क कुरीतियों को वैधता देने के लिये एक आसान बहाना भर है."[iv]
नारीवादी विचारकों ने यह माना है कि प्राचीन भारत में नारी की स्थिति में ह्रास का कारण हिन्दू समाज की पितृसत्तात्मक संरचना थी कि कोई बाहरी कारण. इसके लिये नारीवादी विचारक प्रमुख दोष स्मृतियों के नारी-सम्बन्धी नकारात्मक प्रावधानों को देते हैं, क्योंकि तत्कालीन समाज में स्मृतिग्रन्थ सामाजिक आचारसंहिता के रूप में मान्य थे और उनमें लिखी बातों का जनजीवन पर व्यापक प्रभाव था. प्रमुख स्मृतियों में नारी-शिक्षा पर रोक, उनका कम उम्र में विवाह करने सम्बन्धी प्रावधान, उनको सम्पत्ति में समान अधिकार देना आदि प्रावधानों के कारण समाज में स्त्रियों की स्थिति में अवनति होती गयी. नारीवादी विचारकों के अनुसार हमें अपनी कमियों का स्पष्टीकरण देने के स्थान पर उनको स्वीकार करना चाहिये ताकि वर्तमान में नारी की दशा में सुधार लाने के उपाय ढूँढे़ जा सकें.


सन्दर्भ :
* द पोजीशन ऑफ वूमेन इन हिन्दू सिविलाइजेशन, ए.एस. अल्तेकर, प्रकाशक-मोतीलाल बनारसी दास.
[i]लोकानां तु विवृद्धि अर्थं मुख- बाहु- ऊरु- पादतः
ब्राह्मणं क्षत्रिय वैश्यं शूद्रं निरवर्तयत्‌“ /३१ मनुस्मृति.
[ii]एकम्एव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्
एतेषाम्एव वर्णानां शुश्रूषाम्अनुसूयया/९१ मनुस्मृति.
[iii] पृष्ठ संख्या २३, द सिविलाइजेशन ऑफ इण्डिया, आर.सी. दत्त, प्रकाशक-रूपा कंपनी, नई दिल्ली, २००२.
[iv] पृष्ठ संख्या १२९, अल्टेकेरियन अवधारणा के परे : प्रारंभिक भारतीय इतिहास में जेंडर संबंधों का नई समझ, उमा चक्रवर्ती, नारीवादी राजनीति, संघर्ष एवं मुद्दे, साधना आर्य, निवेदिता मेनन, जिनी लोकनीता, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, २००१.

शनिवार, 27 मार्च 2010

किस युग में रह रहे हैं हम

समाज में ऐसे विचारों के लिए जगह क्यों है ?

  • अंजलि सिन्हा


खाप पंचायतें लोगों के निजी जीवन को निर्देशित करने के लिए पंचायत और महापंचायत करती हैं और सार्वजनिक रूप से कत्ल का फरमान सुनाती हैं। सोचने का मुद्दा यह है कि ऐसा कर पाने में वे सफल क्यों हो रही हैं ? इन ताकतों और विचारों पर प्रश्न खड़ा करने का वातावरण तैयार करने के बजाय स्थानीय लोग इसे मजबूती प्रदान करने में क्यों लगे हैं ? देखने में आया है कि हजारों की संख्या में एकत्रा होकर दिनभर और कई दिन की मीटिंग करते हैं और फिर फैसला लेेते हैं कि अन्तरजातीय या सगोत्रा विवाह करने पर जान गंवानी पड़ेगी। इतनाही नहीं वे अब अपने फरमानों को लागू करवाने के लिए कानूनी वैधता हासिल करने का भी प्रयास कर रहे हैं। पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आयोजित एक ऐसे ही महापंचायत में घोषणा की गयी है कि वे हाईकोर्ट में अपील दायर करेंगे कि ‘‘हिन्दू विवाह अधिनियम 1956’’ में संशोधन करके सगोत्रा विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया जाए। इन पंचायतों को अपने निरंकुश आदेश को लागू करवाने में किसी कानूनी अड़चन का सामना न करना पड़े इसके लिए वे खाप पंचायतों को कानूनी वैधता के लिए प्रयास कर रहे हैं।

पिछले 13 सितम्बर को शामली में उत्तर भारत के कई राज्यों के विभिन्न खापों के प्रमुखों ने एकत्रा होकर महापंचायत की। इसमें दो अलग अलग खापों के मुखिया हरिकिशन सिंह तथा महेन्द्र सिंह टिकैत ने सुर मिलातेे हुए सगोत्र विवाह करने वाले युगलों के लिए कत्ल का फरमान जारी किया। क्या ऐसे सार्वजनिक बयानों पर हत्या के लिए उकसानेवाली धारायें लगा कर कानूनी कार्रवाई नहीं किया जाना चाहिए ? विभिन्न न्यायालयों ने इन जनविरोधी कार्रवाइयों के खिलाफ फैसला भी दिया है जैसे कि जिन्द जिले के वेदपाल मोर को पंजाब एवम हरियाणा हाईकोर्ट ने सोनिया के साथ उसके विवाह को वैध ठहराते हुए अपनी पत्नी को गांव से लाने का आदेश दिया था। लेकिन कोर्ट के निर्णय को ठेंगा दिखाते हुए गांववालों ने वेदपाल को पीट पीट कर मार डाला जब वह पुलिस को साथ लेकर वहां पहुंचा। जिन युगलों या परिवारों को ये पंचायतें गांव से निकाल देती हैं और कोर्ट उन्हें वापस गांव जाने का हक देता है तथा पंचायतों के व्यवहार के खिलाफ उन पर कार्रवाई के भी आदेश देता है लेकिन गांव में पुरूषप्रधान तथा दबंगई के वातावरण में सबकुछ निष्प्रभावी हो जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि न्याय के पक्षधर तथा जनतांत्रिक आवाजें गांव के अन्दर एकजुट नहीं हो पायी हैं। 8 जुलाई 2006 को भी एक मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ‘‘अक्सर अपनी मर्जी से अन्तरजातीय या अन्तरधर्मीय शादी करनेवालों को मार डालने की ख़बरंे आती हैं। दरअसल यह क्रूर और सामन्ती दिमाग के लोगों द्वारा किया गया ऐसा जघन्य कृत्य है जिसके लिए कठोर दण्ड मिलना चाहिए। ’’ गृहमंत्राी पी चिदम्बरम ने भी अपनी टिप्पणी में कहा कि बिरादरी के नाम पर की जानेवाली हत्याओं को भारतीय कानून में अलग से परिभाषित नहीं किया गया है इसीलिए क्राइम रेकार्ड ब्युरो के आंकड़ों में भी इन हत्याओं को अलग से पहचाना नहीं जाता है और इन्हें पारिवारिक मामला बता कर दबा दिया जाता है।’’ कोर्ट और सरकार की ये प्रतिक्रियाएं सुन कर ऐसा प्रतीत होता है कि इतना बड़ा तंत्र जिसने अपने नागरिकों को न्याय दिलाने तथा सुरक्षा मुहैया कराने की कसमें खायी हैं वह निरीह हो गया है। वह पड़ोसी देशों को अपने हद में रहने के लिए दहाड़ें मारता है और आतंकवादी मंसूबों को धूल में मिला देने का हौसला और ताकत रखने की बात करता है, फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम देने में भी वह सोचता नहीं है तथा अपने हकों के लिए आन्दोलन करनेवालों के खिलाफ अपनी ताकत और संसाधन झोंक देने में भी संकोच नहीं करता है।

इतनी सारी ताकत रखने के बावजूद आखिर क्या वजह है कि वह खाप पंचायतों की जनविरोधी भूमिका तथा अमानवीय क्रूर गतिविधियों पर अंकुश लगाने में असमर्थ दिखता है ! वह यह संकेत नहीं दे पा रहा है कि इस लोकतांत्रिक देश को तालिबानी रंग में नहीं रंग सकते हैं। उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करनी होगी।

मेरे खयाल से जिस तरह हमारे समाज के एक मुखर हिस्से में ऐसी ताकतों या उनकी हरकतों की स्वीकार्यता है, जो उन्हें शेष समाज पर भी अपना दबदबा कायम रखने में सहूलियत प्रदान करती है उसी तरह यह भी देखा जा सकता है कि इन सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों के लिए भी इन खाप पंचायतों के जरिये अपना आधार या दबदबा बनाये रखना आसान जान पड़ता है। हरियाणा में इन दिनों सत्तासीन कांग्रेस पार्टी की चुनावी जीत में खाप पंचायतों की भूमिका को विश्लेषकों ने रेखांकित किया था, जिन दिनों जिन्द या झज्जर में खाप पंचायतों की निरंकुश कार्रवाइयों को लेकर विरोध तीव्र हो रहा था, उन दिनों कांग्रेस के युवा सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने इन्हें ‘सामाजिक परिघटना या सामाजिक परम्परा का हिस्सा’ कह कर मामले को हल्का करने की कोशिश की थी।

सगोत्र विवाह करनेवालों के खिलाफ मौत का फरमान जारी करनेवाले टिकैत जो किसानों के हकों के लिए सरकारो ंसे लड़ते रहते हैं वे नहीं चाहते कि बेटियों को अपनी पिता की सम्पत्ति में बराबर का हक मिले या युवा पीढ़ी अपनी मर्जी से अपने जीवनसाथी का चुनाव करे।

जरूरत है कि ऐसी ताकतों और फरमानों के खिलाफ कानूनी सख्ती के साथ साथ आम स्थानीय लोग भी कमर कसें तथा देश भर की न्यायप्रिय तथा प्रगतिशील ताकतें भी इसमें मदद के लिए आगे आएं।


(अंजलि सिन्हा, ‘स्त्री अधिकार संगठन’ से सम्बद्ध हैं एवम दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती काॅलेज (सांन्ध्य) में कौन्सिलर के पद पर कार्यरत हैं , यह आलेख युवा दख़ल के ताज़े अंक में प्रकाशित)

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

क्या आप भी अपने पार्टनर पर शक़ करते हैं?

अभी बात लिव इन की हो रही थी और वर्षा मिर्ज़ा ने बताया कि जयपुर में एक आदमी ने अपनी बीबी को बस इसलिये मार डाला कि उसके मेंहदी के बीच मे R लिखा था और पति को शक़ था कि यह उसके प्रेमी के नाम का पहला अक्षर था…इधर टीवी पर एक शो 'इमोशनल अत्याचार' बाक़ायदा लायल्टी टेस्ट करा रहा है…बाज़ार है तो फिर कुछ भी बाज़ारु बनाया जा सकता है…प्यार, शक़, विश्वास…पढ़िये डेली न्यूज़ की इसी आशय की रिपोर्ट



आराम से पढ़ने के लिये क्लिक करें…

गुरुवार, 25 मार्च 2010

ये क़ाजी इतना क्यूं उछलता है भाई?


बड़ी पुरानी कहावत है कि ' मिया बीबी राज़ी तो क्या करेगा क़ाज़ी'

आज सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा उसमें यही अन्तर्निहित था। सीधी सी बात है कि जिस समाज में बालिग होने के बाद आपको अपनी सरकार चुनने का हक़ मिल जाता है वहां इसी उम्र में आपको अपने साथी और उसके साथ रहने की शर्तें चुनने का हक़ क्यूं नहीं मिलना चाहिये? सवाल बस इतना सा है। लेकिन जो लोग महिला आरक्षण पर त्योरियां चढ़ा रहे हैं वे ज़ाहिर तौर पर इस पर भी नाराज़ होंगे ही। अब जिन्हें पार्क में बतियाते लड़के-लड़कियों से दिक़्कत है वे लिव इन पर कैसे चुप रहेंगे?

पर ये दिक्कत है क्यों? पहली बात तो ये कि कम से कम हिन्दू समाज में प्रेम विवाह या ऐसे रिश्ते जाति व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हैं जो धर्म के ठेकेदारों को मंज़ूर नहीं। दूसरा जिन्हें औरत बस बच्चे पैदा करने की मशीन लगती है उन्हें उसके निर्णय लेने के किसी भी अधिकार पर एतराज़ होना ही है। यह निर्णय लेने वाली बात सीधे पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर आघात करती है।

जो लोग इसके दूसरे पहलुओं पर बात करते हैं उनकी चिंता औरत की यौन शुचिता को लेकर अतिशय चिंता से उभरती है। पितृसत्तात्मक समाज जिस यौन शुचिता को लेकर इतना संवेदनशील है उसकी क़ीमत औरत को ही चुकानी होती है, इसीलिये बलात्कार जैसे अपराध में भी विक्टिम को ही सामाजिक बहिष्कार का शिकार बनना पड़ता है। इस सवाल पर भी बात सिर्फ़ इतनी है कि एक आधुनिक समाज में स्त्री को अपनी यौनिकता और सेक्सुअल प्रिफ़रेंस पर फैसले का हक़ क्यूं नहीं होना चाहिये? जिस क्रिया के बाद पुरुष अपवित्र नहीं होता स्त्री को अपवित्र क़रार देने वाले आप कौन होते हैं?

यह सच है कि बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी में सरकार और समाज की कोई भागीदारी न होने और समाज के भीतर व्याप्त असुरक्षा के कारण सड़-गल जाने के बावज़ूद शादी एकमात्र विकल्प के रूप में सामने आती है। लेकिन कोई अगर इसके बाहर विकल्प ढूंढ़ना चाहे तो किसी के पेट में दर्द क्यूं हो भाई?

मंगलवार, 16 मार्च 2010

महिलाओं को आरक्षण क्यूं चाहिये?


मौलाना कल्वे ज़व्वाद, भूमण्डलीकरण समर्थक अमीर किसानों के अमीर नेता शरद जोशी और योगी आदित्यनाथ के बाद अब दिल्ली के मौलाना बुख़ारी भी महिला आरक्षण बिल के ख़िलाफ़ सामने आ गये हैं। उनका कहना है कि औरतों को राजनीति या कोई भी दूसरा पेशा पर्दानशीं होके ही अपनाना चाहिये। कल मुलायम सिंह भी कह चुके हैं कि औरतों को आरक्षण की कोई ज़रूरत नहीं है। लालू यादव तथा दूसरे समाजवादी आरक्षण के भीतर आरक्षण की बात कर रहे हैं…लेकिन यह भी संख्या बल कम होने की मज़बूरी ही लगती है क्योंकि पहले कभी भी इस मुद्दे पर वे गंभीर दिखाई नहीं दिये। आश्चर्य तो यह कि कल यहां ग्वालियर में एक आयोजन में कुछ आधुनिक महिलाओं ने भी कहा कि हमें भीख नहीं चाहिये।
 
आरक्षण को लेकर भीख, बैसाखी जैसी तमाम शब्दावलियां अक्सर ही उपयोग की जाती हैं। लेकिन यह सुविधाप्राप्त वर्ग द्वारा आविष्कृत एक भ्रष्ट शब्दावली है। आरक्षण न तो भीख है न वैसाखी यह सदियों से सामाजिक-आर्थिक संरचना में वंचित रहे समुदायों - जैसे दलित, पिछड़ों, आदिवासियों और महिलाओं का अधिकार है।
 
वैसे अगर इमानदारी से देखें तो समाज में आरक्षण हमेशा से रहा है। पुजारी का पद सवर्ण ब्राह्मण पुरुष, राजा का पद सवर्ण क्षत्रिय पुरुष, सेनापति का पद सवर्ण क्षत्रिय पुरुष, न्यायधीश का पद सवर्ण ब्राहमण पुरुष और चौकीदार जैसे तमाम हेय समझे जाने वाले पद दलित पुरुषों के लिये आरक्षित था। इस अमानवीय तथा ग़ैरबराबरी वाली व्यवस्था के कारण एक तरफ़ सवर्ण कहे जाने वाली जातियां हमेशा वर्चस्वशाली पदों पर काबिज़ रहीं तो दलित कहे जाने वाली जातियां हमेशा से ही सामाजार्थिक जीवन के निचले पायदान पर ही रहीं। अम्बेडकर ने इसी अपरिवर्तनीयता की तुलना बिना सीढ़ी वाली बहुमंजिली इमारत से की थी।
 
अब अगर देखें तो सभी जातियों की औरतों के लिये तो बस घर, हरम और वैश्यालय ही आरक्षित किये गये थे। सामाजिक-आर्थिक जीवन में तो उनका कोई स्थान था ही नहीं। उनमें से बहुतायत के लिये तो किसी भी तरह की शिक्षा भी वर्जित थी। ऐसे में उनसे हुए अन्याय की तो कोई सीमा ही नहीं। जितने घटिया विशेषण औरतों को दिये जाते हैं वे सब उन्हीं परिस्थितियों और पितृसत्तात्मक मानसिकता के चलते हैं।
 
ऐसे में सच तो यह है कि औरतों को न केवल संसद अपितु सभी प्रकार की नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण मिलना ही चाहिये। लेकिन उसी पितृसत्तात्मक मानसिकता के कारण धर्मगुरु और नेता इसका विरोध करेंगे ही। लेकिन ज़रूरी यह है कि प्रगतिशील जनवादी विचारों को मानने वाले सारे लोग पूर्वाग्रह छोड़ इसके साथ आयें।