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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

सोनी सोरी को उत्पीडित करने वाले पुलिस अधिकारी को वीरता पदक प्रदान करने के विरोध में राष्ट्रपति से नागरिक अपील का एक प्रारूप.


महामहिम राष्ट्रपति जी,

''अमर रहे गणतंत्र हमारा ''

दुःखभरे  ह्रदय से आप को यह पत्र लिखते हुए हमें ध्यान है कि देश और दुनिया के अनेक चिंतित नागरिक समूहों, स्त्री अधिकार संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने  दंतेवाडा के पुलिस सुपरिटेन्डेंट अंकित गर्ग को वीरता पदक दिए जाने के फैसले से जुडी हुयी चिंताओं की ओर आप का ध्यान आकर्षित किया  है . हमें यकीन है कि आप इन चिंताओं पर गहराई से विचार करने की प्रक्रिया में हैं . हमें विश्वास है कि इस प्रसंग में आप के द्वारा लिया गया निर्णय राष्ट्र के गौरव  , नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और उन की मानवीय गरिमा को मज़बूत बनाने वाला सिद्ध होगा.

इस प्रसंग में राष्ट्र  के जिम्मेदार और सरोकार -सजग नागरिकों के बतौर हम खास तौर पर जिन विन्दुओं को आप के ध्यान में लाना चाहते हैं , वे इस प्रकार हैं -

१- आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी  ने सर्वोच्च न्यायालय को लिखे अनेक पत्रों में यह बात दुहराई है कि दंतेवाडा पुलिस स्टेशन में ०८ अक्टूबर २०११ को अंकित गर्ग की उपस्थिति में  उन की  आज्ञा से उन्हे  शारीरिक यातनाये दी गयीं .इन यातनाओं में अमानवीय यौन हिंसा भी शामिल थी. सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर कलकता के एन  आर एस सरकारी अस्पताल द्वारा की गयी मेडिकल जांच में इन आरोंपों को सही पाया गया है . अस्पताल द्वारा जारी जांच- रपट में पीडिता के गोपन अंगों  में पत्थर के टुकड़ों की मौजूदगी को दर्ज किया गया है . इस रपट का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पीडिता को दंतेवाडा पुलिस की अभिरक्षा में सुरक्षित न मान कर उन्हे रायपुर केन्द्रीय कारागार में स्थानांतरित करने के आदेश जारी किये हैं . इस से स्पस्ट है कि  आरोपित किन्तु पुरस्कृत एस पी के खिलाफ मानवाधिकारों , संवैधानिक दायित्वों , राष्ट्रीय गरिमा और सरकारी सेवा नियमों के गंभीर उल्लंघन का मामला ठोस प्रमाणों पर आधारित है .इस प्रसंग में यह तथ्य भी आप के ध्यान में होगा कि मीडिया द्वारा  एक स्थानीय पुलिस अधिकारी का वह टेप भी जारी किया गया  है , जिस में उस ने   स्वीकार किया है  कि शिक्षिका के खिलाफ  सक्रिय माओवादी कार्यकर्ता होने के  आरोप  निराधार और मनगढंत हैं . शिक्षिका और उस का परिवार अतीत में स्वयं माओवादी हिंसा का शिकार रहा है.लेकिन इस सिलसिले में सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी महिला के साथ  किसी भी परिस्थिति में इस तरह का दुर्व्यवहार हमारे  सांस्कृतिक मूल्यों और संवैधानिक आदर्शों का घनघोर अवमूल्यन है.

२- ऐसी परिस्थिति में आरोपित पुलिस सुपरिटेन्डेंट को राजकीय सम्मान देने का निर्णय राष्ट्र की गरिमा और सुरक्षा दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत हानिकारक है , क्योंकि इस घटना के निहितार्थीं  को निम्नलिखित रूपों में पढ़ा जा सकता है --

क) भारतीय राज्य एक आदिवासी नागरिक की मानवीय गरिमा , उस के संवैधानिक अधिकारों और न्याय की उस की आकांक्षा के अवमूल्यन को वह महत्व देने के लिए राजी नहीं है , जिस की अपेक्षा किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक  राज्य से की जाती है . यह एक ऐसा अवांछित सन्देश है , जो  भारतीय राज्य - राष्ट्र  और उस के वंचित नागरिकों के बीच  एक शत्रुतापूर्ण रिश्ते का संकेत देता है.

ख) भारतीय राज्य राजकीय निकायों से सम्बंधित  दमन , उत्पीडन , असंविधानिक आचरण और भ्रष्ट व्यवहार के आरोपों पर आवश्यक गंभीरता के साथ ध्यान देने के लिए राजी नहीं है .

ग )भारतीय राज्य  सरकारी अफसरों द्वारा एक स्त्री के स्त्रीत्व को क्रूरतापूर्वक अपमानित करने के खालिस पितृसत्ताक आचरण के विषय में सम्यक रूप से चिंतित नहीं है .

घ) इस देश के श्रेष्ठतम सांस्कृतिक मूल्यों  और अंतर्राष्ट्रीय नागरिक मान्यताओं की हिफाजत की अपनी  जिम्मेदारी के प्रति  भारतीय राज्य की गंभीरता  संदेह के परे नहीं है.

३- ऐसी स्थिति हमें जालियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश हाउस आव लॉर्ड्स द्वारा जनरल डायर को सम्मानित करने की उस घटना की याद दिलाती है , जिस की स्मृति  भारतीय जन साधारण के लिए  उस ह्त्या कांड से भी  कहीं अधिक  दुखदायी रही है .  उसे एक औपनिवेशि सत्ता द्वारा एक जीवित राष्ट्र की आत्मिक ह्त्या के रूप में देखा गया , जिस का उद्देश्य निकृष्टतम नस्ली वर्चस्व को स्थापित करना था. राष्ट्रीय अपमान की इसे चेतना ने हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को वह क्रांतिकारी आवेग प्रदान किया , जिस ने हमें आज़ादी की मंजिल तक पहुंचाया. आज़ाद भारत में एक स्त्री नागरिकके  अपमान   और यौन उत्पीडन के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे पुलिस अफसर को  व्यापक जनविरोध के बावजूद राजकीय सम्मान देना हमारी आज़ादी और हमारी लोकतांत्रिक संस्कृति -दोनों के विषय में गंभीर चिंताएं और बेचैनियाँ उत्पन्न करता है .

अतएव हमारी प्रार्थना है कि आप एस पी अंकित गर्ग को वीरता पदक प्रदान करेने के निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए इसे निरस्त करने की कृपा करें .


आपके सुझाव आमंत्रित हैं...


  • साथी वैभव सिंह की फेसबुक वाल से साभार...

सोमवार, 7 मार्च 2011

अरब जागृति का सऊदी अरब में क्या स्वरुप होगा?


यह लेख भाई शमशाद इलाही अंसारी के फेसबुक पेज से

Anti-riot police stand-off with protesters in the Gulf coast town of Awwamiya March 3, 2011. Saudi Shi'ites staged protests in the country's oil-producing eastern province on Thursday, demanding the release of prisoners they say are being held without trial, witnesses said. REUTERS/Zaki Ghawas

इस पृथ्वी पर सबसे पुरानी प्रतिक्रियावादी राजनैतिक व्यवस्था का प्रतीक सऊदी अरब की राजशाही और उसके राजा अब्दुल्लाह के विरुद्ध इन दिनों देश के पूर्वी हिस्सों से आवाज़े उठनी शुरु हो गयी है..पिछले 11 दिनों में छोटे छोटे कई प्रदर्शन कई शहरों के म्यूनिसिपल आफ़िस, श्रम मंत्रालय के दफ़्तरों के समक्ष मुज़ायहरे हुये हैं, कई गिरफ़्तारियां भी हुई, जिसे देखते हुए राजा ने प्रदर्शनों पर न केवल प्रतिबंध लगाया है वरन उन्हे इस्लाम विरोधी की संज्ञा दे डाली है. कुल मिला कर पूरे देश से असंतोष की आवाज़े सुनी जा सकती हैं जिसका मुखर नेतृत्व शियाओं के हाथ में है खासकर पूर्वी प्रदेशों में..अन्य हिस्सों मे लिबरल मुसलमानों ने देश में राजनैतिक सुधारों और मानवाधिकारों की मांग उठायी है.

राजा ने इस असंतोष को देखते हुये ३७ बिलियन डालर की भीख जनता को दी है, इसी दान दक्षिणा के चलते राजा अब तक शासन चलाने में सक्षम था, लेकिन ट्यूनिशिया, मिश्र में अरब जागरुकता और लीबिया में गद्दाफ़ी विरोधियों का सशस्त्र विद्रोह देख रही जनता, राजा की भीख स्वीकार करेगी? कितने समय तक करेगी..यह देखना अभी शेष है.

सऊदी समाज का १५-२९ प्रतिशत हिस्सा बेरोज़गार है. देश की कुल आबादी कोई २.५ करोड है जिसमें कोई ९० लाख लोग प्रवासी कामगार हैं, शिया मुसलमानों की संख्या कोई १० प्रतिशत के करीब है, सऊदी शियाओं के साथ आमतौर पर सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर बहुत इम्तयाज़ बरता जाता है, यह एक कटु सत्य है. राजा सुन्नी है और इरान से उसकी खुन्नस, शिया अकीदे और इलाकाई नेतागिरी के मसले पर सर्वविदित है.

जनतांत्रिक ताकतें सऊदी में बेहद कमजोर हैं, इस्लाम के ही किसी दूसरे नमूने का आकार लेकर वहां राजा का विरोध स्वर और स्वरुप लेगा. अभी तक कोई ३८० फ़िरके इस्लाम में हैं और सभी एक को दूसरे से बेहतर साबित करने की फ़िराक में हत्या से लेकर युद्ध तक कर सकते हैं, जो सबसे लीड लेने वाला फ़िरका है और जिसकी ताकत इस जागरुक आंदोलन में, इस क्षेत्र में ज्यादा है, वह शिया संप्रदाय है, यमन अगर टूट गया तो उसके एक हिस्से पर उसका शासन हो सकता है, बहरीन का राजा अगर भगा दिया गया तो शिया मुसलमान वहां सरकार बना सकते हैं, कुवैत और सऊदी में यह समुदाय व्यापक मानवाधिकारों और राजनैतिक सुधारों की मांग कर रहा है, इन सफ़लताओं का फ़ायदा इसे लेबनान में अगले चुनावों में जीत के बतौर मिल सकता है. अभी यह वक्त है कि इस अगुवा ताकत से पूछा जाये कि आप अगर सत्ता में आये, तब आपका कौन सा निज़ाम होगा? आर्थिक नीतियां कौन सी होगी, बैंकों पर कौन राज करेगा? पडौसियों से क्या स्लूक होगा? बहुपार्टी जनतंत्र होगा या इरान के नक्शे कदम पर सरकार बनेगी जिसमें विरोधियों को हर हाल में कुचला जायेगा? शिक्षा नीति क्या होगी? धर्म का कौन सा रुप होगा..किसकी फ़िकह लागू होगी? अल्पसंख्यकों का क्या हश्र होगा?

बारहाल, आने वाले कल में क्या होगा, इसका बस खाका ही खींचा जा सकता है..कुछ कयासे, कुछ ख्यालसाज़ी कुछ इमकानात ही सजाये जा सकते हैं. यह भी हो सकता है कि राजा अब्दुल्लाह इसे आवामी जन विद्रोह को शिया विद्रोह- इरानी षडयन्त्र के नाम पर क्रूरतापूर्वक दमन कर दे. सभी जानते हैं कि सऊदी हवाई सेना के जहाजों ने द्क्षिणी यमन में शिया विद्रोहियों पर राष्ट्रपति सालह की मदद करने के लिये हवाई हमले किये थे. कुल मिला कर हालत राजाओं के लिये साजगार नहीं हैं, मैं यह भी सोचता हूँ कि अगर इन्हें सऊदी जनता ने देश छोडने के लिये मजबूर कर दिया, तो ये कहां पनाह लेंगे? पाकिस्तान या बांग्लादेश..देखना बाकी है. सत्ता के सबसे प्राचीन, दमनकारी व्यस्था को अब तक के सबसे विकट संकट का सामना है..राजा भी हर तरह से तैय्यार है, जनता इस बदलाव की लडाई को किस स्तर तक ले जाती है और कौन सा निज़ाम लाती है, यह देखना बाकी है.




रविवार, 6 मार्च 2011

रामदेव दूध के धुले नहीं हैं!


( यह लेख चौथी दुनिया से लिया गया है। डा मनीष कुमार के इस लेख में योग गुरु रामदेव के इतिहास और वर्तमान को खंगालते हुए तमाम छिपे-अनछिपे पहलूओं को उजागर किया गया है। विदेश में रखे काला धन के मुद्दे को दिन रात उछालकर एक राष्ट्रवादी उन्माद पैदा करने में लगे रामदेव और उनके संगी-साथी देश के भीतर के काले धन पर जानबूझकर एक मौन बनाये रखते हैं। यह लेख उसके कारणों की पड़ताल करता है)             

यह कार्टून यहाँ से


राजनीति काजल की काली कोठरी है. ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं, जो इस काली कोठरी में घुस जाएं और बेदाग़ निकल जाएं. बाबा रामदेव राजनीति की इस काली कोठरी में घुसे नहीं कि उनके दामन पर दाग़ लगने लगे हैं. पहले कांग्रेस पार्टी के दिग्विजय सिंह ने बाबा को मिलने वाले काले धन की जांच की मांग की. अब बाबा रामदेव संत समाज के निशाने पर आ गए हैं. हिंदुस्तान का इतिहास गवाह है कि जब-जब राजनीति का सामना संतों से हुआ, राजनीति हारी है, संत हमेशा जीते हैं. दिग्विजय सिंह के बयान के बाद बाबा रामदेव ने हुंकार भरी और यह बोल गए कि वह आज हज़ारों करोड़ के ब्रांड बन चुके हैं. क्या संत ब्रांड बन सकते हैं? क्या धर्म का धंधा किया जा सकता है? क्या योग की मार्केटिंग हिंदू धर्म की परंपरा के मुताबिक़ है? देश और धर्म से जुड़े इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए हमने अखिल भारतीय संत समिति के उत्तर भारत के अध्यक्ष एवं श्री कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम से बात की. बातचीत के दौरान आचार्य प्रमोद कृष्णम ने बाबा रामदेव के  बारे में कई ऐसी बातें बताईं, जिन पर भरोसा करने में डर लगता है.
पहले कांग्रेस पार्टी के दिग्विजय सिंह ने बाबा को मिलने वाले काले धन की जांच की मांग की. अब बाबा रामदेव संत समाज के निशाने पर आ गए हैं. हिंदुस्तान का इतिहास गवाह है कि जब-जब राजनीति का सामना संतों से हुआ, राजनीति हारी है, संत हमेशा जीते हैं. दिग्विजय सिंह के बयान के बाद बाबा रामदेव ने हुंकार भरी और यह बोल गए कि वह आज हज़ारों करोड़ के ब्रांड बन चुके हैं. क्या संत ब्रांड बन सकते हैं? क्या धर्म का धंधा किया जा सकता है? क्या योग की मार्केटिंग हिंदू धर्म की परंपरा के मुताबिक़ है?
बाबा रामदेव ने हरिद्वार के एक आश्रम में योग की शिक्षा ली. यह आश्रम गुरु शंकरदेव का था. कहा जाता है कि बाबा रामदेव और गुरु शंकरदेव एक ही कमरे में रहते थे. वह जाने-माने संत थे. भारत के शीर्षस्थ संतों के संपर्क में थे. अच्छे साधक थे. एक दिन वह अचानक ग़ायब हो गए. गुरु शंकरदेव कहां गए, यह किसी को पता नहीं है. न तो उनकी लाश मिली और न ही यह पता चल पाया है कि उनके साथ आ़खिर क्या हुआ. बाबा रामदेव ने गुरु शंकरदेव को खोजने का कोई प्रयत्न नहीं किया. आचार्य प्रमोद कृष्णम ने सीधा-सीधा आरोप लगाया है कि पूरे देश का संत समाज यह मानता है कि शंकरदेव की हत्या बाबा रामदेव ने की, ताकि वह ज़मीन उन्हें मिल जाए और जो उन्हें मिली. एक उच्चस्तरीय जांच का गठन होना चाहिए. इतने बड़े ॠषि शंकरदेव ग़ायब हो गए, लेकिन उनके साथ रहने वाले बाबा रामदेव से किसी ने पूछताछ नहीं की. आचार्य का कहना है कि यह बाबा रामदेव का प्रभाव है कि आज तक इस मामले में कोई तहक़ीक़ात नहीं हुई. अब सवाल यह है कि शंकरदेव कहां गए, उनकी लाश कहां है, उनकी मौत कैसे हुई? अगर वह ज़िंदा हैं तो उनको सामने क्यों नहीं लाया जाता. उनका अचानक ग़ायब हो जाना एक गंभीर विषय है. अखिल भारतीय संत समिति इसकी उच्चस्तरीय जांच की मांग करती है. आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि उन्हें यह आशंका है कि गुरु शंकरदेव कहीं किसी साज़िश का शिकार तो नहीं हो गए.
बाबा रामदेव के इतिहास को जानने लिए हमने वैष्णव संप्रदाय के सर्वोच्च जगतगुरु से बात की. जगतगुरु ने खुलकर सारी बातें बताईं, लेकिन अपना नाम सार्वजनिक करने से मना कर दिया. जगतगुरु के कहने पर हम उनका नाम नहीं लिख रहे हैं. इस बातचीत से यह पता चला कि बाबा रामदेव से संत समाज न स़िर्फ निराश है, बल्कि डरता भी है. कई संत ऐसे हैं, जो बाबा रामदेव के क्रियाकलापों को धर्म के विरुद्ध बताते हैं, लेकिन देश के सामने आकर बाबा के खिला़फ बोलने का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता है. वैष्णव संप्रदाय के सर्वोच्च जगतगुरु की शंकरदेव से भी निकटता थी. जगतगुरु ने फोन पर बताया कि बाबा रामदेव 1994 में मेरे आश्रम में बैठा रहता था, एक्यूप्रेशर वगैरह करता था. टूटे से स्कूटर से आता था, तबसे मैं उसे जानता हूं. साधु भी बनने को मैंने ही उसे कहा था. गुरुकुल कांगड़ी में छटे हुए लड़कों में गिना जाता था. एक प्रॉपर्टी है दिव्य योग मंदिर. उसे धोखे से लिखवाया गया था स्वामी शंकरदेव जी से, जिनका आज कोई अता-पता नहीं है. हत्या भी कराई होगी तो उसी ने कराई होगी न. वह तो बहुत दुखी थे. इसने लिखवा लिया तो बहुत रोते थे हमारे पास आकर. हमें पता तब लगा था, जब इसने लिखवा लिया. हम पूछना चाहते हैं कि वसीयत है तो दिखाए हमें. उसने बहुत बड़ा झूठ बोला कि आश्रम की ज़मीन कब वह उसके नाम कर गए, पता ही नहीं. लेकिन वह तो डिग्री है, कोर्ट से सूचना के अधिकार से तो मिल सकती है. कोई भी आदमी ग़ायब हो जाए तो खबर तो करता है, मर गया तो श्राद्ध तो करता है. यह आदमी तो पैदा ही बेईमान हुआ था. मैंने इसे एक दिन उठाया और दो-चार थप्पड़ लगाए, फिर पूछा कि यह बता भाई, महात्मा से तूने जो लिखापढ़ी कराई, कैसे कराई. फिर वह मेरे पैर पकड़ कर बैठ गया. स्वामी अमलानंद जी के आश्रम में. कहने लगा कि मुझे क्षमा कर दो, अब मैं आपके ही अनुसार चलूंगा, सारा जीवन अब मैं अच्छे काम करूंगा. शंकरदेव के मामले में बिल्कुल सीबीआई जांच होनी चाहिए. एक आदमी लापता है तो खोजो और मर गया तो सरकार इसकी घोषणा करे. कुछ तो करे. इस आदमी ने सरकार को भी नहीं लिखा कि उनकी खोज हो. जगतगुरु ने दु:ख के साथ कहा कि इसने न जाने कितने लोगों को मरवा दिया. यह लोगों को मरवा देता है. मैंने तो देखा है न, इसकी भाषा को. अगर कोई भी विरोधी है तो कहता है कि खत्म कर दो काम.
उत्तर भारत के संतों, आश्रमों और मठों में खलबली मची है. हर कोई बाबा रामदेव के बारे में बात कर रहा है. मीडिया में छाए रहने और प्रसिद्धि की दृष्टि से तो यह अच्छा माना जा सकता है, लेकिन बाबा रामदेव के लिए यह परीक्षा की घड़ी है. विडंबना यह है कि पितातुल्य संत, धर्माचार्य, गुरु एवं साथी, जिनके साथ बाबा रामदेव ने बचपन बिताया, जिनकी छड़ी खाकर और डांट सुनकर बड़े हुए, वही लोग आज बाबा रामदेव के खिला़फ खड़े हैं. बाबा रामदेव पर हत्या जैसा एक और आरोप है. अखिल भारतीय संत समिति के अध्यक्ष का मानना है कि अपने योग की साख बचाने के लिए रामदेव ने देश के एक होनहार विद्वान राजीव दीक्षित की बलि चढ़ा दी. राजीव दीक्षित जब जीवित थे तो वह हमेशा बाबा रामदेव के साथ नज़र आते थे. उनके शिविरों में वह भाषण देते थे. बाबा रामदेव के योग से हर तरह के रोग के इलाज के दावों का तर्क देते थे. उनकी उम्र चालीस साल की थी. माना जाता है कि राजीव दीक्षित की मौत हार्ट अटैक की वजह से हुई. बाबा रामदेव पूरी दुनिया के हृदय रोगियों का इलाज करते हैं तो क्या बाबा रामदेव को यह पता नहीं था कि उनके साथी को ही हार्ट की बीमारी है. अगर पता था तो उनका इलाज क्यों नहीं किया गया और अगर रामदेव अपने साथी का ही इलाज नहीं कर सकते तो दुनिया के सामने यह कैसे दावा करते हैं कि उनके योग से हार्ट की बीमारी ठीक हो जाती है.
आचार्य ने कहा कि सूत्र बताते हैं कि राजीव दीक्षित और उनके रिश्तेदार मेडिकल ट्रीटमेंट चाहते थे, लेकिन बाबा रामदेव ने परिवारवालों को फोन करके या बात करके यह कहा कि तुम अगर अंग्रेजी दवाइयों का सेवन करोगे तो इस देश में खराब मैसेज जाएगा. आचार्य का कहना है कि बाबा रामदेव के लिए मैसेज देने का मामला था, लेकिन राजीव दीक्षित की जान चली गई. सोचने वाली बात यह है कि राजीव दीक्षित का अंतिम संस्कार जल्दबाजी में क्यों किया गया. उनका पोस्टमार्टम क्यों नहीं किया गया. आचार्य बताते हैं कि जिन लोगों ने राजीव दीक्षित की शवयात्रा में हिस्सा लिया, वे कहते हैं कि उनके होंठ नीले पड़ चुके थे. अब संत यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या हार्ट अटैक से मरने वाले व्यक्ति की होंठ नीले पड़ते हैं? यह इतना ज्वलंत प्रश्न है, जिससे यह शंका पैदा होती है कि राजीव दीक्षित और शंकरदेव को रास्ते से हटाने वाले बाबा रामदेव और उनके इर्द-गिर्द वे लोग हैं, जिनकी जांच होना बहुत आवश्यक है.
एक कंपनी थी आस्था ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड, जो अब वैदिक ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड बन चुकी है. यह कंपनी आस्था नामक धार्मिक टेलीविजन चैनल चलाती थी. इस चैनल पर बाबा रामदेव के योग कार्यक्रमों का प्रसारण होता था. आस्था ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड के हेड किरीट सी मेहता हुआ करते थे. रामदेव तीन साल से इस चैनल पर कार्यक्रम कर रहे थे, जिसका पैसा आस्था चैनल को दिया जाना था. जब यह राशि बढ़कर बहुत ज़्यादा हो गई तो रामदेव और उनके लोगों ने किरीट सी मेहता का अपहरण किया और बंधक बना लिया. आचार्य प्रमोद कृष्णम का आरोप है कि किरीट सी मेहता को बंधक बनाने वालों में एक नाम है तीजारेवाला, दूसरे खुद स्वामी रामदेव हैं और तीसरे एक उद्योगपति हैं, जिनका उन्होंने नाम नहीं बताया. किरीट सी मेहता को बंधक बनाकर उनसे एक एग्रीमेंट साइन कराया गया. इसी के ज़रिए आस्था ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड को वैदिक ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड में बदल दिया गया. किरीट सी मेहता से एक सादे काग़ज़ पर हस्ताक्षर कराकर उन्हें छोड़ दिया गया. आचार्य प्रमोद ने खुलासा किया कि इसके बाद किरीट सी मेहता और उनके परिवार को यह धमकी दी गई कि अगर वे हिंदुस्तान में रहे तो उनकी हत्या करा दी जाएगी. आचार्य प्रमोद कृष्णम का दावा है कि ये बातें खुद किरीट सी मेहता ने उनसे कही हैं. वह बताते हैं कि गणेश चतुर्थी के दौरान दिशा नामक एक धार्मिक चैनल पर वह लाइव कार्यक्रम में शामिल थे. आचार्य प्रमोद इस चैनल के स्टूडियो में थे. देश भर से लोग आचार्य से सवाल पूछ रहे थे. उसी कार्यक्रम में किरीट सी मेहता ने लंदन से फोन किया और बताया कि वह सारी दुनिया को एक संत के कारनामों के बारे में बताना चाहते हैं. आचार्य कहते हैं कि इस कार्यक्रम का लाइव प्रसारण चल रहा था, जिसे पूरी दुनिया ने सुना. इस कार्यक्रम के एंकर थे माधवकांत मिश्र, जो इस वक्त दिशा टीवी चैनल के हेड हैं. आचार्य कहते हैं कि बाबा रामदेव की धमकी से डरकर किरीट सी मेहता आज तक भारत वापस नहीं लौटे. कभी दुबई तो कभी लंदन में छुपते फिर रहे हैं. मुंबई में उनके घर पर ताला लगा हुआ है. आचार्य प्रमोद कृष्णम बताते हैं कि उस लाइव कार्यक्रम में उन्होंने जब भारत वापस आने को कहा तो किरीट सी मेहता ने कहा कि उन्हें इस बात का डर है कि अगर वह भारत लौटे तो उनकी हत्या कर दी जाएगी. बाबा रामदेव पर यह आरोप हैरान करने वाला है. आस्था चैनल ने बाबा रामदेव को ख्याति दिलाने में, पूरे देश में पापुलर करने में बड़ा योगदान किया है. मीडिया के कुछ लोग बताते हैं कि किरीट सी मेहता की वजह से ही रामदेव आज योग गुरु बाबा रामदेव बने हैं. अ़फसोस इस बात का है कि जिस शख्स ने बाबा की इतनी मदद की, वह आज दर-दर की ठोकरें खा रहा है. आचार्य से जब हमने इन आरोपों का सबूत मांगा तो उन्होंने दिशा चैनल के एंकर माधवकांत मिश्र को फोन किया और फोन के स्पीकर से हमें पूरी बातचीत सुनाई. फोन पर हुई बातचीत के  दौरान माधवकांत मिश्र ने इस पूरी घटना की पुष्टि की और कहा कि वे सारे टेप चैनल के  पास आज भी मौजूद हैं.
संतों ने बाबा रामदेव पर स़िर्फ हत्या, अपहरण और धमकी देने का ही आरोप नहीं लगाया, बल्कि यह भी कहा कि बाबा रामदेव संत समाज में भ्रष्टाचार फैला रहे हैं. आचार्य प्रमोद कृष्णम कहते हैं कि बुरे से बुरा आदमी भी संतों को छोड़ देता है. अत्याचारी और दुराचारी भी संतों को नहीं लूटते, लेकिन बाबा रामदेव आस्था चैनल के ज़रिए संत समाज को लूट रहे हैं. अब आस्था चैनल बाबा रामदेव की देखरेख में चल रहा है. आचार्य ने बताया कि आस्था चैनल पर जितने भी प्रवचन दिखाए जा रहे हैं, किसी से पांच लाख तो किसी से सात लाख रुपया महीना लिया जा रहा है. यह पैसा संतों से ओबी वैन के नाम से लिया जा रहा है. एक दिन का ओबी वैन का खर्च 2 लाख बताकर पैसा लिया जाता है. समझने वाली बात यह है कि जो संत पांच लाख रुपये चैनल को देगा तो वह खुद 15 लाख कमाने की क्यों नहीं सोचेगा. कोई संत अगर पांच लाख रुपये आस्था चैनल को देता है तो वह पैसा कहां से आएगा. ज़ाहिर है, यह पैसा उद्योगपतियों और काले धन के ज़रिए ही इकट्ठा किया जाता है. आचार्य कहते हैं कि क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है, जो व्यक्ति संतों को लूट रहा है, वह देश की लूट के विषय में कैसे बात कर सकता है. बाबा रामदेव को वह चुनौती देते हैं कि उन्होंने जो तीन हज़ार एकड़ ज़मीन में बना यूरोप में एक टापू खरीदा है, उन्हें उसका खुलासा करना चाहिए.
देश के बड़े-बड़े धर्माचार्य और जगतगुरु बाबा रामदेव से निराश हैं. उनका आरोप है कि रामदेव ने धर्म को धंधा बना दिया. कुछ संतों ने कहा कि यह संत का कैसा रूप है, जो गौमूत्र बेचकर मुना़फा कमाता है. एक संत ने बताया कि महर्षि पतंजलि ने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा होगा कि उनके नाम की ब्रांडिंग हो जाएगी और कलयुग में योग भारत की धरती पर साधना से हटकर व्यापार बन जाएगा. बाबा रामदेव कोई भी शिविर लगाते हैं तो वह 31 लाख रुपये लेते हैं. जबसे उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की है, तबसे वह मुफ्त में शिविर लगाने लगे हैं. आचार्य प्रमोद कृष्णम का यह आरोप है कि बाबा रामदेव ने संत परंपरा को प्राइवेट लिमिटेड बना डाला. पतंजलि फूड प्राइवेट लिमिटेड को सरकार से पैसे मिले, जिसका इस्तेमाल वह बिजनेस में कर रहे हैं. देश के संत सवाल कर रहे हैं कि क्या यही देशभक्ति है? क्या यही भ्रष्टाचार से लड़ने का सही रास्ता है?
जहां तक बात उनकी राजनीति की है तो संत समाज को इससे कोई आपत्ति नहीं है. अखिल भारतीय संत समिति का कहना है कि उनकी राजनीति से किसी को भी कोई मतभेद नहीं है. बाबा रामदेव ने देश के हज़ारों लोगों का अपने योग से इलाज किया. देश भर में घूम-घूमकर शिविर लगाए. योग को फिर से जीवित किया और इसका पूरी दुनिया में प्रचार-प्रसार किया. अपने शिविरों में कपालभांति और प्राणायाम के दौरान राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी दिया. वह देशभक्ति, स्वदेशी और ईमानदारी की बातें करते थे. लोगों को अच्छा लगता था. पूरे देश में इसके लिए बाबा रामदेव की जय-जयकार हुई. फिर बाबा रामदेव ने राजनीति में सक्रिय होने का ऐलान कर दिया. उन्होंने घोषणा भी कर दी कि अगले लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी 543 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. राजनीति और धर्म में अंतर होता है. संत की जवाबदेही धर्म से होती है. राजनेताओं को जनता को जवाब देना पड़ता है. क़ानून और न्यायालय किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं मानता, जब तक उसे सज़ा न मिल जाए. बाबा रामदेव पर लगे आरोप स़िर्फ आरोप ही हैं. सच्चाई क्या है, इसका फैसला अदालत करेगी. बाबा रामदेव को याद रखना चाहिए कि क़ानून की निगाहों में ए राजा आज भी निर्दोष हैं, लेकिन जनता की अदालत ने उन्हें दोषी मान लिया है. संत और राजनेता में यह भी एक अंतर है, संत मौन धारण कर सकते हैं, यह छूट नेताओं को नहीं है. रामदेव संत से राजनेता बन चुके हैं. उन्हें अब सारे सवालों और आरोपों का जवाब देश की जनता को देना होगा.

धर्माचार्यों का बाबा रामदेव पर आरोप

  • गुरु शंकर देव की हत्या का आरोप
  • राजीव दीक्षित, भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के सचिव, की मौत के ज़िम्मेवार
  • आस्था चैनल को ज़ोर-ज़बरदस्ती और धोखाधड़ी से हथियाने का आरोप
  • आस्था चैनल के हेड किरीट सी मेहता के अपहरण और जान से मारने की धमकी देने का आरोप
  • संत समाज को भ्रष्टाचार की आग में झोंकने का आरोप
  • धर्म को धंधा बनाने का आरोप

छोटी-छोटी सफाइयां चाहिए…

आचार्य बालकृष्ण भारत के नागरिक नहीं हैं
बाबा रामदेव के दाहिने हाथ माने जाने वाले आचार्य बालकृष्ण भारत के नागरिक नहीं हैं. देश के संतों का आरोप है कि वह नेपाल के नागरिक हैं. उनका जन्म नेपाल में हुआ. उनका पूरा परिवार नेपाल का नागरिक है, लेकिन उनके पासपोर्ट पर यह लिखा है कि वह जन्म से भारतीय हैं. आचार्य बालकृष्ण पहले बाबा रामदेव के शिविरों और उनके कार्यक्रमों का ध्यान रखते थे. जबसे बाबा रामदेव दवाइयां बेचने लगे और बिज़नेस करने लगे तो आचार्य बालकृष्ण ने बाबा का पूरा साम्राज्य संभाल लिया. बाबा रामदेव ने जबसे राजनीति में आने का फैसला किया है, तबसे बाबा के राजनीतिक मोर्चे की कमान आचार्य बालकृष्ण ने संभाल ली है. अब जबकि बाबा रामदेव ने राजनीतिक दल बनाने की घोषणा कर दी है तो आचार्य बालकृष्ण की नागरिकता पर सवाल उठना लाज़िमी है. बाबा रामदेव को आज नहीं तो कल, इस सवाल का जवाब देना ही होगा.
बाबा रामदेव के नाम ज़मीन नहीं तो क्या उनके भाई और रिश्तेदारों के नाम पर तो है
बाबा रामदेव पर यह आरोप लगा कि वह देश और विदेश में सैकड़ों एकड़ ज़मीन के मालिक हैं. बाबा रामदेव मीडिया के सामने आए. उन्होंने सा़फ-सा़फ कहा कि उनके नाम एक भी इंच ज़मीन नहीं है. साधु-संतों को ज़मीन की क्या ज़रूरत है. बाबा रामदेव का खंडन सराहनीय है. लेकिन संत समाज के लोग इसे बाबा रामदेव की एक चाल बता रहे हैं. उनका सवाल है कि बाबा रामदेव के नाम से ज़मीन नहीं है तो क्या हुआ, उनके सगे भाई और रिश्तेदारों के नाम से तो करोड़ों की संपत्ति है, सैकड़ों एकड़ ज़मीन है. उनकी मांग है कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि वर्ष 2000 से पहले बाबा रामदेव के सगे भाई और उनके  रिश्तेदारों के पास कितनी ज़मीन थी और कितनी संपत्ति थी और अब 2011 में उनके पास क्या है. इस जांच से दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा.
बाबा रामदेव और मीडिया
संतों ने यह स़फाई मांगी है कि बाबा रामदेव का देश के एक बड़े मीडिया घराने और उसके मुख्य कार्यकर्ता से क्या रिश्ता है? और इस कार्यकर्ता ने बाबा रामदेव की अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग में इतना बड़ा रोल क्यों निभाया?
नोट : यह पूरी रिपोर्ट धर्माचार्यों और जगतगुरुओं से हुए इंटरव्यू पर आधारित है. इसके बावजूद हमने बाबा रामदेव पर लगे आरोपों के बारे में उनसे बात करने की कोशिश की. उनके सहायकों को फोन किया तो उन्होंने अजय आर्य का नंबर दे दिया. कई बार डायल करने के बाद भी उन्होंने फोन नहीं उठाया. फिर जब उन्होंने फोन उठाया तो कहा कि बाबा रामदेव ने अपनी तऱफ से सारी बातें 23 तारी़ख को कह दी हैं. हमने जब यह कहा कि बाबा रामदेव पर नए आरोप लग रहे हैं तो उन्होंने कहा कि आप बाबा रामदेव के मीडिया प्रभारी एस के तीजारेवाला से बात कीजिए. तीजारेवाला के नंबर पर हम फोन करते रहे, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. हम बाबा रामदेव की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में हैं.

बुधवार, 24 नवंबर 2010

जन्मदिन पर अरुंधती को सलाम!


यह पोस्ट कबाड़खाने से सीधे उधार…भाई अशोक पाण्डे की टीप सहित



सबसे पहली बात यह पोस्ट इसलिए एक्सक्लूसिव है कि इसे कबाड़ी शिवप्रसाद जोशी ने आज के वास्ते कबाड़ख़ाने के लिए लिखा है. उनके लेखन की सबसे बड़ी ख़ूबी है उनका  टू-द-पॉइन्ट, सचेत-सधा हुआ और गहरा अनुशासित गद्य जिसकी सतह खुरचने पर आपको जाने कौन कौन से लेखकों, अनुभवों से पाया गया ठोस यक़ीन नज़र आएगा.

हिन्दी का कौन कवि-लेखक गया बस्तर-छत्तीसगढ़?  किस महान युवा हिन्दी कवि ने कोशिश भी की कश्मीर को समझने  की? और किस ... ख़ैर छोड़िये, गाली निकल जाएगी हिन्दी के महान युवाओं के लिए. अरुंधती ने यह सब करने के अलावा बाकायदा इन व्हिच एनी गिव्ज़  इट दोज़ वन्स जैसी शानदार फ़िल्म का स्क्रीनप्ले लिखा. अरुंधती अब भी युवा हैं और महान भी. मेरी उनसे मुलाकात मैसी साहब की शूटिंग के दौरान एक बार हुई थी कोई बीसेक साल पहले. उस फ़िल्म में उन्होंने एक आदिवासी युवती का रोल किया था. मुझे वे एक बेमिसाल व्यक्तित्व लगीं जैसी वे थीं ही. आज उनका जन्मदिन है. वे उनचास साल पूरे कर रही हैं. कबाड़खाना उन्हें बधाई देता है और भाई शिवप्रसाद जोशी को थैंक्यू कहता है - अशोक पाण्डे

आज अरूंधति रॉय का जन्मदिन है 

शिवप्रसाद जोशी

अरूंधति रॉय ने कई साल पहले कह दिया था कि वो विश्व नागरिक हैं. वो एक ऐसे वक़्त में अपनी अटूट ज़िद के साथ सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में अपनी भूमिका निभा रही हैं जब पूरी दुनिया में विभिन्न किस्मों का कोलाहल जारी है, एक अश्लील और बर्बर मुक्त बाज़ार है और एक चमचमाता तंबू तना हुआ है जिसके नीचे अंतरराष्ट्रीय ताक़तें दुनिया को अपनी मुट्ठी में लेने की नई चालाकियों पर काम कर रही हैं.

24 नवंबर अरूंधति रॉय का जन्मदिन है.

वो हेरॉल्ड पिंटर, हॉवर्ड ज़िन, खोसे सारामागो, एडुवार्डो गेलियानो, नॉम चोमस्की जैसे चिंतकों एक्टिविस्टों की जमात से हैं जो अर्थ, समाज, राजनीति और कूटनीति की वैश्विक अराजकता के बीच मनुष्य और मनुष्यता को बचाए रखने की लड़ाई में अग्रणी रहे हैं.

अरूंधति रॉय जब बुकर पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थी तो वो बीबीसी के दिल्ली दफ़्तर में आई थीं. शालिनी उस समय हिंदी सेवा में थीं. शालिनी का अनुभव कुछ यूं था कि उसका ज़िक्र हम लोग कई बार आपस में करते रहे हैं, आज अरूंधति के जन्मदिन पर उनकी उस छवि को आप लोगों से शेयर करते हैं. वो एक छोटी सी सकुचाई हुई, तीखे नाक नक्श वाली, आंखों में एक विराट गहराई और एक न जाने कौन से सिनेमा की न जाने कौन सी अज्ञात फ़िल्म की न जाने से कौन सी नायिका. कुछ ऐसे कि बस वो थीं. अरूंधति ने जींस और टॉप पहना था और शालिनी के मुताबिक उन्हें देखकर नहीं लगता था कि उनमें कोई मैदान मार लेने वाला जैसा गदगद भाव रहा होगा.

अरूंधति ने गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स शायद लिखा ही इसलिए था कि वो आने वाले दिनों के लिए अपनी भूमिका तै कर चुकी थीं. उस उपन्यास में जैसी चोटें, वेदनाएं, प्रताड़नाएं, प्रेम विह्वलताएं, द्वंद्व, लड़ाइयां और सरोकार थे, अरूंधति ने अपने आगे के जीवन के लिए जैसे उन्हीं शब्दों की सामर्थ्य से खुद को लैस कर लिया था.

वो उपन्यास 21वीं सदी की शुरुआत से चंद साल पहले सम्मानित हुआ था. मस्जिद नब्बे के दशक की शुरुआत में गिरा दी गई थी. भूमंडलीकरण का टेंट भारत की जर्जरता के ऊपर ताना जा रहा था. और आतंकित कर देने वाली नव-अमीरी बड़े शहरों में अपने चक्कर काट कर छोटे शहरों और क़स्बों का रुख़ कर चुकी थीं. घात वाले ऐसे उस दौर में अरूंधति ने बुकर लिया, उपन्यास लिखना स्थगित किया और एक ऐसी लड़ाई में उतर आईं जो न दिखती थीं और जिसमें हारजीत के नतीजे भी धुंधले से दिखाई देने वाले थे.

अरूंधति ने इस लडा़ई में हार का पक्ष लिया. वो उस तबके उस आम हिंदुस्तानी उस आम विश्व नागरिक की शाश्वत और अवश्यंभावी घोषित कर दी गई हार के साथ जा खड़ी हुई और वहां से उन्होंने रचना और नाफ़रमानी का एक नया रास्ता खोल दिया.

इस रास्ते पर जाने का साहस बहुत कम लोग कर पाते हैं. इस रास्ते पर जाने का विवेक बड़े जोखिम की मांग करता है. इसमें दर्द और टीस है. ये कुछ वैसा ही है जैसा अरूंधति के प्रिय लेखक अर्जेटीना के एडुआर्डो गेलियानो की किताब ओपन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमेरिका में दर्ज लोगों की ज़ख़्मी नसों की उछाड़ पछाड़ है.

हमारे समय की समस्त बैचेनियां हमारे समय की कविता कहानी या उपन्यास में न आती हों तो न सही, अरुंधति, गेलियानो, चॉमस्की और उन जैसों की ज़िंदगियों, विचारों और उधेड़बुनों के ज़रिए तो आ ही रही हैं. एक किताब से बड़ा आखिरकार एक जीवन ही है. मामूली ही सही पर 24 नवंबर के मौके पर अरूंधति रॉय के हवाले से ये बात और पुख़्ता होती है

बुधवार, 17 नवंबर 2010

एक कहानी राजा-रानी की

भाई मनोज पटेल का यह अनुवाद आज सृजनगाथा से साभार

( इटली के मशहूर लेखक इतालो काल्विनो (1923-1985) अपनी विलक्षण किस्सागोई के लिए जाने जाते हैं. इन्होनें इनविजिबल सिटीज और इफ आन अ विंटर्स नाईट अ ट्रेवलर जैसे उपन्यास लिखे हैं. इटली की 200 लोककथाओं का इनके द्वारा किया गया संकलन 1956 में प्रकाशित हुआ था. - Padhte Padhte )
पैसा सबकुछ कर सकता है
एक बार एक बहुत रईस शहजादे ने राजा के महल के ठीक सामने उससे भी शानदार एक महल बनवाने का निश्चय किया. महल जब बनकर पूरा  हो गया तो उसने सामने की तरफ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवा दिया कि " पैसा सबकुछ कर सकता है." 
राजा ने बाहर आकर जब इसे देखा तो फ़ौरन शहजादे को बुला भेजा जो शहर में अभी नया ही था और अभी तक उसने दरबार में हाजिरी नहीं बजाई थी. 
"मुबारक हो," राजा ने कहा. "तुम्हारा महल तो सचमुच अजूबा है. उसके सामने मेरा गरीबखाना तो झोपड़ी जैसा लगता है. मुबारक ! लेकिन यह लिखाना क्या तुम्हें ही सूझा था कि : पैसा सबकुछ कर सकता है ?" 
शहजादे ने महसूस किया कि शायद वह हद पार कर गया था. 
"जी हाँ यह मेरा ही ख़याल था," उसने जवाब दिया, "लेकिन जहाँपनाह को यदि यह नागवार लग रहा हो तो मैं उसे मिटवा देता हूँ." 
"अरे नहीं, मुझे लगा कि यह तुम्हारा ख्याल नहीं रहा होगा. मैं बस तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता था कि इस बात से तुम्हारा क्या मतलब था. मिसाल के तौर पर क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि अपने पैसों से तुम मुझे क़त्ल भी करा सकते हो ?"    
शहजादे को लग गया कि वह कायदे से फंस चुका था.
"मुझे माफ़ कीजिए हुजूर. मैं फ़ौरन उन लफ़्ज़ों को मिटवा देता हूँ. और अगर आपको मेरा महल नापसंद हो तो बस हुक्म कीजिए, मैं उसे भी जमींदोज करवा दूंगा."
"नहीं, नहीं उसे वैसा ही बना रहने दो. लेकिन चूंकि तुम दावा करते हो कि एक पैसे वाला शख्स कुछ भी कर सकता है, मुझे यह साबित करके दिखाओ. अपनी बेटी से बात करने की कोशिश करने के लिए मैं तुम्हें तीन दिन का मौक़ा देता हूँ. अगर तुम उससे बात करने में कामयाब रहे तो ठीक है, तुम्हारी उससे शादी करवा दी जाएगी. अगर नहीं. तो मैं तुम्हारा सर कलम करवा दूंगा. समझ गए ?" 
शहजादा इतना परेशान हो उठा कि उसका खाना, पीना और सोना तक हराम हो गया. रात-दिन वह सोंचा करता कि वह कैसे अपनी गर्दन बचाए. दूसरे दिन तक तो उसे अपनी नाकामयाबी के प्रति इतना इत्मिनान हो चुका था कि वह अपनी वसीयत करने के बारे में सोचने लगा. उसके हालात भी नाउम्मीद करने वाले थे क्योंकि राजा की बेटी सौ पहरेदारों से घिरे किले में बंद रहती थी. किसी चिथड़े की तरह पीला और ढीला सा वह बिस्तर पर पड़े-पड़े अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा था जब उसकी बूढ़ी दाई उससे मिलने आई. इस जर्जर बूढ़ी दाई ने उसे बचपन में खिलाया था और अब भी उसके यहाँ काम कर रही थी. उसका मरियल सा चेहरा देखकर इस बूढ़ी औरत ने पूछा कि क्या गड़बड़ थी. हकलाते हुए शहजादे ने उसको पूरी कहानी कह सुनाई. 
"तो क्या हुआ ?" दाई ने कहा, "तुम इस तरह उम्मीद छोड़े बैठे हो ? तुम पर तो मुझे हँसी आ रही है. देखो मैं क्या कर सकती हूँ !"   
वह डगमगाते क़दमों से शहर के सबसे काबिल सुनार के पास पहुंची और उससे ठोस चांदी का एक हंस बनाने के लिए कहा जो अपनी चोंच खोले-बंद करे. हंस को आदमकद और अन्दर से खोखला होना था. "और हाँ यह कल तक तैयार हो जाना चाहिए," उसने जोड़ा.
"कल ? तुम होश में तो हो !" सुनार चिल्लाया.
"मैनें कहा न कल !" उस बूढ़ी औरत ने सोने की अशर्फियों से भरा एक बटुआ निकाला और बोलती गई "ज़रा सोचो. यह पेशगी रकम है. बाक़ी तुम्हें कल मिल जाएगी जब तुम हंस तैयार करके मेरे सुपुर्द कर दोगे."
सुनार हक्का-बक्का रह गया. "यही चीज तो है दुनिया में जिसकी बात ही और है," उसने कहा. "मैं कल तक हंस तैयार करने की भरसक कोशिश करूंगा."
अगले दिन तक हंस तैयार हो गया और बहुत खूब तैयार हुआ.
बूढ़ी औरत ने शहजादे से कहा, "अपनी वायलिन लेकर हंस के भीतर बैठ जाओ. जैसे ही हम सड़क पर पहुंचें तुम वायलिन बजाने लगना."
हंस के भीतर बैठा शहजादा वायलिन बजाता रहा और बूढ़ी दाई चांदी के उस हंस को एक फीते के सहारे खींचती हुई शहर का चक्कर लगाने लगी. उसे देखने के लिए सड़कों पर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी : शहर में ऐसा कोई भी न बचा जो उस खूबसूरत हंस को देखने के लिए दौड़ा न आया हो. यह बात उस किले तक भी पहुंची जहाँ राजा की बेटी बंद थी, उसने अपने अब्बा हुजूर से बाहर निकलकर यह अनोखा दृश्य देखने की अनुमति मांगी. 
राजा ने कहा, "उस शेखीबाज शहजादे को मिला मौक़ा कल ख़त्म हो जाने दो. तब तुम बाहर निकलना और हंस देख लेना." 
लेकिन राजा की बेटी ने सुन रखा था कि कल तक हंस वाली बूढ़ी औरत चली जाएगी. इसलिए राजा ने हंस को किले के अन्दर ले जाने दिया ताकि उसकी बेटी हंस को देख सके. बूढ़ी दाई को इसी बात की उम्मीद थी. जैसे ही शहजादी ने चांदी के उस हंस के साथ अकेले में उसकी चोंच से निकल रहे संगीत का आनंद लेना शुरू किया, अचानक हंस खुल पड़ा और उसमें से एक नौजवान ने बाहर कदम रखा.
"डरो मत," उस आदमी ने कहा, "मैं वही शहजादा हूँ जो अगर तुमसे बात न कर सका तो कल सुबह तुम्हारे अब्बा हुजूर मेरा सर कलम करवा देंगे. तुम उनसे यह बताकर मेरी जान बचा सकती हो कि तुम मुझसे बात कर चुकी हो."
अगले दिन राजा ने शहजादे को बुला भेजा. "हाँ, तो क्या मेरी बेटी से बात करने में तुम्हारा पैसा तुम्हारे कोई काम आया ?"
"जी हाँ जहाँपनाह," शहजादे ने जवाब दिया.
"क्या ! तुम्हारा मतलब तुमने उससे बात किया ?"
"उसी से पूछ लीजिए."
शहजादी आई और उसने बताया कि कैसे वह चांदी के हंस में छुपा हुआ था जिसे खुद राजा के हुक्म पर किले में घुसने दिया गया था.
इसपर राजा ने अपना मुकुट उतारकर शहजादे के माथे पर रख दिया. "इसका मतलब तुम्हारे पास सिर्फ पैसा ही नहीं बल्कि एक अच्छा दिमाग भी है. जाओ खुश रहो ! मैं अपनी बेटी का हाथ तुम्हारे हाथों में सौंपता हूँ."

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

बाटला इनकाउंटर का सच


बाटला हाउस में हुए कत्लों की सच्चाई?

यह रिपोर्ट देवाशीष प्रसून के ब्लाग से

बाटला हाउस में मुठभेड़ के नाम पर मारे गए लोगों की पोस्ट मोर्टम रिपोर्ट बड़ी शिद्दत के बाद सूचना के अधिकार के जरिए अफ़रोज़ आलम साहिल के हाथ लग पायी है।पोस्ट मार्टम रिपोर्ट इसे कत्ल बता रही है।जबकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने तो दिल्ली पुलिस के ही दलीलों पर हामी भरी थी। बिना घटनास्थल पर पहुँचे और आसपास व संबंधित लोगों से बातचीत किए बगैर ही इस मामले को सही में एक मुठभेड़ मानते हुए आयोग ने दिल्ली पुलिस को बेदाग़ घोषित कर दिया था। और तो और, सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस पूरे मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के रपट पर आँखें मूंद कर विश्वास करते हुए किसी तरह के भी न्यायिक जाँच से इसलिए मना कर दिया, क्योंकि उसे लगता है कि ऐसा करने से पुलिस का मनोबल कमज़ोर होगा। यह चिंता का गंभीर विषय है कि किसी भी लोकतंत्र में मानवीय जीवन की गरिमा के बरअक्स पुलिस के मनोबल को इतना तवज्जो दिया जा रहा है। बहरहाल, आतिफ़ अमीन और मो. साजिद के पोस्ट मोर्टम रिपोर्ट पर से पर्दा उठने के कारण नए सिरे से बाटला हाउस में पुलिस द्वारा किए गए नृशंस हत्याओं पर सवालिया निशान उठना शुरू हो गया है।

यह 13 सितंबर, 2008 के शाम की बात है, जब दिल्ली के कई महत्वपूर्ण इलाके बम धमाके से दहल गए थे। इसके बाद जो दिल्ली पुलिस के काम करने की अवैज्ञानिक कार्य-पद्धति दिखने को मिली, वह पूरी तरह से पूर्वाग्रह और मनगढ़ंत तर्कों पर आधारित है। बम धमाकों के तुरंत बाद ही पुलिस ने जामिया नगर के मुस्लिम बहुल बाटला हाउस इलाके के निवासियों को किसी पुख्ता सबूत के बगैर ही शक के घेरे में लेना और उनसे जबाव-तलब करना शुरू कर दिया था। अगले दिन ही, जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल राशीद अगवाँ और तीस साल के अदनान फ़हद को पुलिस के विशेष दस्ते के द्वारा पूछताछ के लिए उठा लिया गया और फिर बारह घंटे के ज़ोर-आज़माइश के बाद उन्हें छोड़ा गया। 18 तारीख़ को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एक शोध-छात्र मो. राशिद को भी पूछताछ के लिए ले जाया गया और उसे ज़बरन यह स्वीकारने के लिए बार-बार बाध्य किया गया कि उसके संबंध आतंकियों से हैं। इस दौरान पुलिस ने उसे नंगा करके कई बार पीटा और तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया। बाद में उसे 21 तारीख़ को छोड़ दिया गया।

इसी बीच 19 तारीख़ को दिल्ली पुलिस के विशेष दस्ते ने आनन-फानन में बाटला हाउस इलाके के एल -18 बिल्डिंग को चारों तरफ़ से घेर लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक फ्लैट संख्या 108 के रहने वालों पर पुलिस ने गोलियाँ बरसायी गयीं। बाद में पुलिसिया सूत्रों से पता चला कि उक्त फ्लैट में इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकियों ने ठिकाना बनाया हुआ था, जिन्होंने पुलिस को आते ही उन पर गोलियां चलायी थी। जबाव में पुलिस के गोली से उन में से दो आतिफ़ अमीन और मो. साजिद की मौत हो गयी, दो लोग फरार हो गए और मो. सैफ़ को गिरफ़्तार कर लिया गया। पुलिस के अनुसार बाटला हाउस के एल-18 में रहने वाले सभी लोग दिल्ली बम धमाके के लिए कथित तौर पर जिम्मेवार इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़े हुए थे। इस कथित मुठभेड़ में घायल हुए इंस्पैक्टर मोहन चंद्र शर्मा को भी जान से हाथ धोना पड़ा।

लेकिन, गौरतलब है कि पूरे मामले में पुलिस, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायालयों के अपारदर्शी रवैये से यह मामला साफ़ तौर पर मुठभेड़ से इतर मासूम लोगों को घेर कर उनकी क्रूर हत्या करने का प्रतीत होता है। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों के इस शक को बाटला हाउस में मारे गए लोगों के पोस्ट मार्टम की रपट ने और पुख्ता किया है।

पोस्ट मोर्टम के रपट के मुताबिक आतिफ़ अमीन और मो. साजिद के शरीरों पर मौत से पहले किसी खुरदरी वस्तु या सतह से लगी गहरी चोट विद्यमान है। सवाल उठना लाजिमी है कि अगर दोनों ओर से गोलीबारी चल रही थी तो दोनों के शरीर पर मार-पीट के जैसे निशान कैसे आये? ध्यान देने वाली बात है कि दोनों ही मृतकों ने अगर पुलिस से मुठभेड़ में आमने-सामने की लड़ाई लड़ी होती, तो उनके शरीर के अगले हिस्से में गोली का एक न एक निशान तो होता, जो कि नहीं था। आतिफ़ और साजिद के अन्त्येष्टि के समय मौज़ूद लोगों के मुताबिक दोनों शवों के रंग में फर्क था, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि उन दोनों की मौत अलग-अलग समय पर हुई थी। प्रश्न है कि क्या उन्हें पहले से ही प्रताड़ित किया जा रहा था और बाद में उन पर गोलियाँ दागी गयी?

चार पन्नों के रपट में साफ़ तौर पर लिखा है कि आतिफ़ अमीन की मौत का कारण सदमा और कई चोटों की वजह से खून बहना है। चौबीस साल के आतिफ़ के शरीर में कुल मिलाकर इक्कीस ज़ख्म थे। उस के शरीर में हुए ज्यादातर ज़ख्म पीछे की तरफ़ से किए गए थे, वह भी कंधों के नीचे और पीठ पर। इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि, आतिफ़ पर पीछे की ओर से कई बार गोलियाँ चलायी गयीं।

सत्रह साल के मो. साजिद की लाश के पोस्ट मोर्टम से पता चलता है कि उसके सिर पर गोलियों के तीन ज़ख्मों में से दो उसके शरीर में ऊपर से नीच की ओर दागे गए हैं। ये भी प्रतीत होता है कि साजिद को जबरदस्ती बैठा कर ऊपर से उसके ललाट, पीठ और सिर में गोलियाँ दागी गयीं।

साजिद और आतिफ़ की हत्या को मुठभेड़ के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है। पूरे मामले में सीधे रूप से जुड़ा हुआ मो. सैफ़ अब तक पुलिस हिरासत में है। अगर पुलिस की मानें तो मो. सैफ़ को वहीं से गिरफ़्तार किया गया, जहाँ आतिफ़ और साजिद की मौत हुई थी। ऐसे में उसके बयान का महत्व बढ़ जाता है, जिसे को पुलिस ने अब तक बाहर नहीं आने दिया है। साथ ही, इस मामले पर दिल्ली पुलिस का ’मुठभेड़ कैसे हुआ’ के बारे में बार-बार बदलता स्टैंड भी यह स्वीकारने नहीं देता है कि मृतकों की मौत किसी मुठभेड़ में हुई है। अपितु लगता यह है कि मृतक निहत्थे थे और उन्हें घेर कर वहशियाना तरीके से मारा गया।


तालिका 1: आतिफ़ की लाश पर पाये गए ज़ख्मों का ब्यौरा

बंदूक की गोली का निशान संख्या (रपट के मुताबिक) ज़ख्म का आकार ज़ख्म कहाँ पर है

14 1 सेमी व्यास, गहरा गड्ढा पीठ पर बायीं ओर

9 2X1 सेमी, 1 सेमी घर्षण और गहरा गड्ढा पीठ पर बायीं ओर

13 9.2 सेमी घर्षण और 3x1 सेमी गहरा गड्ढा पीठ की मध्य रेखा, गर्दन के नीचे

8 1.5 x1 सेमी गहरा गड्ढा दायें कंधे पर की हड्डी का हिस्सा, मध्य रेखा से 10 सेमी दूर और दायें कंधे से 7 सेमी नीचे

15 0.5 सेमी व्यास, गहरा गड्ढा निचले पीठ की मध्य रेखा, गर्दन से 44 सेमी नीचे

6 1.5 X1 सेमी, आकार में अंडाकार बायीं जांघ का अंदरूनी हिस्सा (ऊपर की ओर), बाये चूतड़ों पर ज़ख्म संख्या 20 जहाँ से धातु का एक टुकड़ा मिला से जुड़ा हुआ। बंदूक की गोली का निशान संख्या 20 आश्चर्यजनक रूप बहुत बड़ा 5x2.2 सेमी का है।

10 1x0.5 सेमी दायें कंधे से 5 सेमी नीचे और बीच से 14 सेमी नीचे

11 1x0.5 सेमी कंधे के हड्डी के बीच, मध्य रेखा के 4 सेमी दायें

12 2x1.5 सेमी पीठ के दायीं ओर, मध्य रेखा से 15 सेमी, दायें कंधे से 29 सेमी नीचे

16 1 सेमी व्यास दायीं बांह की कलाई और पिछला बाहरी हिस्सा



तालिका 2: साजिद की लाश पर पाये गए ज़ख्मों का ब्यौरा

बंदूक की गोली का निशान संख्या 1 दायें तरफ़ माथे पर आगे के ओर(ललाट पर)

बंदूक की गोली का निशान संख्या 2 दायें तरफ़ ललाट पर

बंदूक की गोली का निशान संख्या 5 दायें कंधे की ऊपरी किनारा (नीचे की तरफ जा रहा)

बंदूक की गोली का निशान संख्या 8 बायीं छाती के पीछे( गर्दन से 12 सेमी )

बंदूक की गोली का निशान संख्या 10 सिर के पिछले हिस्से का बायां भाग



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देवाशीष प्रसून

संप्रति: स्वतंत्र पत्रकार और हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में शोधार्थी
संपर्क-सूत्र: रामायण, बैद ले आउट, सिविल लाइन्स, वर्धा-442001,
दूरभाष: 09555053370 (दिल्ली) 09028357466 (वर्धा)
ई-मेल: prasoonjee@gmail.com
ब्लॉग: http://jaanib.blogspot.com