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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

आप का उभार और वाम दल

दिल्ली के चुनावों में अप्रत्याशित सफलता और चुनाव के बाद के समीकरणों के सहारे सत्ता तक पहुँचने के बाद आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविन्द केजरीवाल को लेकर चर्चाएँ  स्वाभाविक रूप से ज़ारी हैं. भ्रष्टाचार के विरोध तथा जन लोकपाल के समर्थन में शुरु हुए आन्दोलन से लेकर राजनीतिक दल के रूप में मुख्यधारा की पार्टियों के एक विकल्प के रूप में उनके उभार ने आगामी लोकसभा चुनावों के समीकरणों को बुरी तरह से प्रभावित किया है. एक ओर दस साल से सत्ताशीन कांग्रेस पार्टी की उम्मीदों को हालिया विधानसभा चुनावों ने बड़ा धक्का लगाया है तो दूसरी तरफ लकड़ी के लाल किले से असली वाले तक के सफ़र के लिए बेक़रार नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भी इस नए उभार के असर को पूरी तरह से समझ नहीं पा रही और कभी कांग्रेस के खिलाफ़ लगने वाले इस आन्दोलन का सहयोग और समर्थन करने वाला संघ गिरोह अब इसे कभी एन जी ओ वादी से लेकर माओवादी बता रहा है तो कभी कांग्रेस से अंदरखाने के गठबंधन का आरोप लगा रहा है. क्षेत्रीय छत्रप अभी भी विभ्रम की सी स्थिति में हैं. यह संकट वाम दलों के भीतर भी है. एक तरफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात इसे गैर बीजेपी-गैर कांग्रेस दलों का हिस्सा बताते हुए तीसरे मोर्चे के लिए ज़रूरी बता रहे हैं तो दूसरी तरफ वाम बुद्धिजीवियों का एक बड़ा हिस्सा इनकी जबरदस्त आलोचना में लगा है. इसके अलावा खासतौर पर वाम दलों के हमदर्द लोगों का एक बड़ा हिस्सा इस उभार को इस रूप में सकारात्मक मान रहा है कि इन्कलाब तो जब होगा तब होगा, अभी कम से कम साम्प्रदायिक भाजपा और भ्रष्ट कांग्रेस का एक विकल्प तो मिला जो अपने आउटलुक में जनपक्षधर और आम आदमी जैसा दिखता है.यही नहीं तमाम लोगों को ऐसा लग रहा है कि केजरीवाल मोदी के उस रथ को रोकने में सक्षम हो सकते हैं जो कर पाना अभी अनुपस्थित तीसरे मोर्चे या कांग्रेस के लिए मुश्किल लग रहा था.

देखा जाय तो जिस दौर में जन लोकपाल का आन्दोलन अन्ना के नेतृत्व में शुरू हुआ था, उस समय कमोबेश सभी संसदीय  वाम दलों ने इस आन्दोलन का समर्थन किया था और माले तथा इसकी छात्र इकाई आइसा ने तो इसमें सक्रिय हिस्सेदारी भी की थी और इस पूरे आन्दोलन में हुए इकलौते लाठीचार्ज को इसी संगठन के साथियों ने झेला था. जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने उस दौर में लिखे अपने एक लेख में (जो तीन क़िस्तों में मृत्युबोध नामक ब्लॉग और जसम की पत्रिका समकालीन जनमतमें प्रकाशित हुआ) लिखा था– “अमेरिका से बेहतर कोई नही जानता कि यह आन्दोलन महज़ लोकतंत्र के किसी बाहरी आवरण तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें एक साम्राज्यवाद विरोधी संभावना है...आईडेंटिटी पालिटिक्स के दूसरे भी कई अलंबरदार इस आन्दोलन को ख़ास जाति समूहों का आन्दोलन बता रहे हैं. पहले अनशन के समय रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबी कुछ पत्रकार इसे वाणी दे रहे थे. अभी कल हमारे मित्र चंद्रभान प्रसाद इसे सवर्ण आन्दोलन बता रहे थे एक चैनल पर. यह वही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने आज की बसपाई राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग यानी ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत करते हुए काफी पहले ही यह प्रतिपादित किया था कि पिछड़ा वर्ग आक्रामक है, लिहाजा रक्षात्मक हो रहे सवर्णों के साथ दलितों की एकता स्वाभाविक है.  यह यही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने गुजरात जनसंहार में पिछड़ों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताते हुए इन्हें हूणों का वंशज बताया था. अब सवर्णों के साथ दलित एकता के इस 'महान' प्रवर्तक को यह आन्दोलन कैसे नकारात्मक अर्थों में महज सवर्ण दिख रहा हैवफ़ा सरकार और कांग्रेस के प्रति जरूर निभाएं चंद्रभान, लेकिन इस विडम्बना का क्या करेंगें कि मायावती ने अन्ना का समर्थन कर डाला है.”  आश्चर्यजनक तौर पर बाद के दौर में जब किरण बेदी, जेनरल वी के सिंह और रामदेव जैसे लोग अरविन्द केजरीवाल से दूर हो गए और उन्होंने राजनीतिक दल बनाने के बाद न केवल कांग्रेस और भाजपा दोनों पर सामान रूप से हमला बोला बल्कि अपने घोषणापत्र में आरक्षण के समर्थन में स्पष्ट घोषणा की तो धीरे धीरे माले न इस मुद्दे पर एक चुप्पी सी बना ली. जबकि  सबसे स्वाभाविक तो यह होता कि अपनी नीति को ज़ारी रखते हुए ये दल आप के सक्रीय सहभागी की तरह सामने आते और चुनाव में भी गठबंधन करते. खैर, इसकी वज़ह क्या रही यह बता पाना मुश्किल है.

आप के उभार को एक तरफ़ यह साफ़ हो गया है कि जनता तथाकथित मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का विकल्प चाहती है तो दूसरी तरफ यह भी कि नब्बे के दशक के बाद लागू नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणाम अब जब सामने आने लगे हैं तो विकास के बड़े बड़े दावों के बीच जनता की असली ज़रूरतें अब भी वही हैं. साफ़ पानी, सस्ती बिज़ली, रहने को घर और सस्ता अनाज जैसी चीजें मुहैया कराने में असफल रहा विकास जनता नकार रही है यह कहना तो अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है इनके बिना वह किसी विकास माडल को स्वीकार करने को तैयार नहीं. आप जैसी पार्टी ने एक ओर तो बड़ी पार्टियों के दम्भ और हर चुनाव में दुहराए जाने वाले बासी वायदों के समक्ष आम आदमी वाली छवि सामने रखी तो दूसरी तरफ सबको प्रभावित करने वाले भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को सामने रख जनता को ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का जो वादा किया वह जनता के लिए अधिक विश्वसनीय और आश्वस्तिकारक था. हालाँकि विचारधाराहीनता की जो नीति उन्होंने अपनाई है उसको तुरत तो जनता ने तवज्जो नहीं दिया है लेकिन सस्ती बिज़ली जैसी नीतियाँ लागू करते समय कार्पोरेट्स के हितों से जो स्पष्ट टकराव होगा उस समय ‘आप’ के लिए तटस्थता की यह नीति अपना पाना मुमकिन न होगा और देखना होगा कि वह अपना पक्ष कैसे चुनती है.


यहाँ यह सवाल भी बार बार उठाया जा रहा है कि वाम दल, जिनकी जनपक्षधरता असंदिग्ध है और जो जनता के पक्ष में कारपोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ़ लगातार संघर्ष करते रहे हैं, वे जनता के समक्ष खुद को विकल्प के रूप में प्रस्तुत क्यों नहीं कर पाए? आज तमाम लोग न केवल यह सवाल कर रहे हैं बल्कि आप के उदाहरण से भारत के संसदीय वाम की आलोचना भी कर रहे हैं.  

तात्कालिकता से प्रभावित हो कोई अंतिम सत्य कहने के भ्रम पालने से बेहतर होगा कि इस पर थोड़ी देर रुक कर सोचा जाए. क्या आप जैसी कार्यवाही वाम दल कर सकते थे और वैसी ही सफलता हासिल कर सकते थे? क्या आप वाम दलों जैसा ही दल है? क्या आप की यह सफलता हर हाल में दीर्घजीवी है?

उदाहरण के लिए आप के आन्दोलन की मीडिया कवरेज़ को लिया जा सकता है. अखबारों और चैनलों की दुनिया से परिचित लोग जानते हैं कि वाम दलों से जुड़ी ख़बरों को बाक़ायदा ब्लैक आउट करने के निर्देश वाले चैनलों और अखबारों ने किस तरह पहले दिन से इस आन्दोलन को बढ़ा चढ़ा के कवर किया था. कारण स्पष्ट है. जहाँ वाम दल उन नीतियों का ही विरोध करते हैं जो कार्पोरेट्स की लूट को संवैधानिक स्वीकृति देते हैं, अन्ना का आन्दोलन या फिर अब केजरीवाल की पार्टी संविधान द्वारा स्वीकृत नीतियों को ही पूरी ईमानदारी से लागू कराने की बात करते हैं. इनमें किसी आमूलचूल परिवर्तन की कोई बात होने की जगह इसी व्यवस्था को थोड़ा और सहनीय बनाने की कोशिश है जो अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में जनता को ही नहीं कार्पोरेट्स के एक बड़े हिस्से को भी बेहतर लगती हैं. ईमानदार सरकारी तंत्र और कारपोरेट सहयोगी सरकारी नीतियों का जोड़ा लूट के तंत्र को बनाए रखने का सबसे सहज तरीक़ा है जिसके तहत बाक़ायदा सरकारी पुलिस हड़ताली मज़दूरों को गिरफ्तार करती है और मालिकान को सुरक्षा देती है तथा न्यायालय हड़ताल को ग़ैरकानूनी घोषित करते हैं. ज़ाहिर है उन्हीं मज़दूरों को नेतृत्व देने वाले दल न मालिकान की पसंद हो सकते हैं न ही उनके अखबारों या चैनलों के तो जो इमेज बिल्डिंग का पूरा तंत्र है वह उन्हें कभी वह जगह नहीं दे सकता है जो आप या ऐसे किसी अन्य दल को.

ऐसे में आप या उसकी कार्यविधि से वाम दलों की तुलना उचित नहीं होगी. लेकिन सारा ठीकरा कार्पोरेट्स के सर फोड़कर निकल लेना जनता की चेतना के ऊपर अविश्वास तो है ही साथ ही अपनी कमियों को नज़रअन्दाज़ करना भी है. आख़िर जिन कार्पोरेट्स के खिलाफ़ वाम दल आवाज़ उठाते रहे हैं, उनसे सहयोग की उम्मीद भी कैसे और क्यों की जानी चाहिए? उन्हें तो अपना रास्ता ख़ुद बनाना होगा और यदि नहीं बना पा रहे तो यह सही समय है जब अपनी नीतियों और तरीकों पर गंभीर पुनर्विचार करना होगा. वाम दल गिमिक्स के भरोसे सत्ता में नहीं आ सकते. उनका इकलौता सहारा वह जनता है जिसकी रहनुमाई का वे दावा कर सकते हैं. यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि उस जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता लगातार कम हुई है और उपस्थिति भी. जिन इंडस्ट्रीज़ से ट्रेड यूनियनें आती थी अर्थव्यवस्था के भीतर उनका प्रभाव कम होने के साथ साथ वे ट्रेड यूनियनें, जो पहले ही अर्थवाद में फंस कर अपनी वैचारिक धार खो चुकी थीं, अब लगभग निष्क्रिय और निष्प्रभावी हो चुकीं हैं. नब्बे के बाद प्रभावी हुए उद्योगों में यूनियने बनाना बेहद मुश्किल हुआ है और वहाँ वाम दलों की यूनियनें लगभग अनुपस्थित हैं. छात्र मोर्चे पर भी एस ऍफ़ आई और ए आई एस ऍफ़ जैसे संगठन ज़्यादातर जगहों पर अनुपस्थित हैं तो आइसा की उपस्थिति भी सीमित ही है. यहाँ भी जिन नए तरह के शैक्षणिक संस्थानों (प्रबंधन, इंजीनियरिंग आदि) में बहुतायत छात्र जा रहे हैं, वहाँ छात्र राजनीति की कार्यवाहियाँ नामुमकिन हैं. शोषण के सबसे प्रमुख केंद्र बन चुके गाँवों में वाम दलों के संगठन दिखाई नहीं देते तो कम से कम उत्तर भारत के कस्बों और छोटे शहरों में भी उनकी उपस्थिति हद से हद नाममात्र की है. ऐसे में उनकी किसी आमूलचूल परिवर्तनकारी भूमिका में उभरने की संभावना कहाँ दिखाई देती है? आप जैसा मध्यवर्गीय तथा ‘विचारधाराहीन’ दल अपने लोक लुभावन नारों के साथ दिल्ली में उभर कर देश भर में चर्चित हो सकता है. वह ‘ऊपर से नीचे’ की यात्रा कर सकता है. लेकिन मज़दूरों, ग़रीबों, गावों और परिवर्तन की बात करने वाले वाम दलों के लिए यह संभव नहीं, उन्हें हर हाल में नीचे से ऊपर की यात्रा करनी होगी. जो कहीं अधिक मुश्किल भी है और कहीं अधिक काँटों से भरी भी. वह धारा के विपरीत तैरने जैसा है, लेकिन उसका कोई विकल्प भी नहीं. जनता किसी के पास उसका मैनिफेस्टो पढ़कर नहीं आती, उस वटवृक्ष को हिलाने की ताक़त परिवर्तनकामी शक्तियों को खुद जुटानी होती है और आमूलचूल परिवर्तनों का कोई शार्टकट नहीं होता.

इसीलिए ‘आप’ के उभार को लेकर उसके अति-उत्साहपूर्ण स्वागत या फिर उतनी ही तीव्रता से आलोचना की जगह वाम ताक़तों को अब पूरी गंभीरता से विकल्पहीनता की इस स्थिति में, जहाँ पर आप जैसे भ्रम भी जनता को बहुत दिनों तक बहला नहीं पायेंगे या फिर जनता के पक्ष में खड़े हुए तो शनैः शनैः वाम के करीब आएँगे, उन्हें नीचे से ऊपर की तरफ उठते हुए मज़लूम जनता को गोलबंद कर लम्बी और फैसलाकुन लड़ाई में उतरना चाहिए. शार्टकट तो इसका नहीं होगा लेकिन जनता उस दीर्घ काल तक भी प्रतीक्षा नहीं करेगी जिसके बारे में स्मिथ ने कहा था कि ‘दीर्घ काल में हम सब मर जाते हैं.’  


  


शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

सोनी सोरी का कसूर क्या है?


सोनी सोरी प्रकरण – लोकतंत्र का बदनुमा चेहरा

                चित्र यहाँ से 
सोनी सोरी की कहानी अब कोई नई कहानी नहीं रही. न यह उस दिन शुरू हुई थी जब उन्हें पुलिस के दबाव में दंतेवाड़ा छोड़कर भागना पड़ा था, न उनके किसी अंजाम पर खत्म हो जायेगी. लोकतंत्र के आवरण तले चलने वाली दमन और उत्पीडन की यह कहानी अलग-अलग रूप में लगातार दुहराई गयी है और आज भी यह बदस्तूर जारी है. महानगरों के आरामदेह कमरों में बैठकर हम विकास को आंकड़ो की भाषा से पकडने की कोशिशें करते हुए नए-नए माल्स और उपभोक्ता वस्तुओं की चमक से चुंधियाई आँखों से सत्ताओं के बदलने और आभासी आन्दोलनों के घटाटोप के इतने आदी होते जा रहे हैं कि देश के एक बड़े हिस्से के लगातार यातना-गृह में तबदील होते जाने को देख ही नहीं पाते. विदर्भ और बुंदेलखंड सहित देश के तमाम हिस्सों में लगातार खुदकुशी करते किसान, फैक्ट्रियों में बिना किसी सामाजिक या आर्थिक सुरक्षा के सोलह-सोलह घंटे खटते मजदूर, निजी कंपनियों के जुए तले पिसते तथाकथित प्रोफेशनल्स, उत्तर-पूर्व में अमानवीय कानूनों का बोझ ढोते लोग और छत्तीसगढ़ के नक्सल-प्रभावित इलाकों में दोहरी-तिहरी मार झेलते आदिवासी हमारी इस समकालीन विकास की बहस से बाहर की चीज़ बनते चले जा रहे हैं. न टीवी चैनल्स के लिए इनके पास कोई ‘एक्सक्लूसिव बाईट’ है न ही अखबारों के तीसरे पेज़ के लिए खबरें या पहले पेज़ के लिए विज्ञापन. वरना यूँ न होता कि इस देश में किसी जगह एक महिला के साथ कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद वह अमानवीय उत्पीडन होता जो सोनी सोरी के साथ हुआ और इसके ज़िम्मेदार पुलिस वाले को सज़ा की जगह महामहिम पुरस्कार न देतीं, वरना कोई चुनी हुई सरकार किसी गाँधीवादी के आश्रम को यूँ ज़मीदोज न कर देती, वरना इतना सब हो जाने के बाद भी इस देश में इतनी चुप्पी न होती.   

सोनी सोरी कोई विशिष्ट महिला नहीं. दंतेवाड़ा के एक खाते-पीते आदिवासी परिवार में जन्मी एक मामूली औरत है जिसने शिक्षा हासिल की और इसके ज़रिये अपना और अपने लोगों का जीवन बेहतर बनाने का सपना देखा. उसका दोष शायद बस इतना है कि जिस दौर में वह यह सब करना चाहती थी, वह एक ऐसा दौर था जब दो विरोधी शक्तियों के बीच विभाजन रेखा कुछ इस कदर खिंची थी कि चयन के लिए इन दोनों के अलावा कोई और विकल्प नहीं था और वह इन दोनों से अलग कुछ करने के लिए मुतमइन थी. नतीजा यह कि उसने दोनों की दुश्मनी मोल ली. इस पूरी प्रक्रिया को समझने से पहले आइये उस पूरे घटनाक्रम पर एक नज़र डाल लेते हैं.

सोनी सोरी का नाम सबसे पहले तब मीडिया में आया जब पिछले साल ९ सितम्बर को पालनार बाज़ार में उसके भतीजे लिंगा को कथित रूप से एस्सार ग्रुप से जुड़े लाला से पैसे लेते हुए गिरफ्तार किया गया. इस केस में सोनी को भगोड़ा घोषित किया गया. पुलिस द्वारा कहा गया कि एस्सार ग्रुप ने अपनी पाइपलाइन बिछाने में व्यवधान न उत्पन्न करने के लिए नक्सलियों को पैसे दिए और लिंगा एक नक्सली प्रतिनिधि के रूप में उनसे पैसे ले रहा था तथा सोनी उसकी मददगार थी. इसके बाद से सोनी वहाँ से जान बचाकर निकल आई और किसी तरह बचते-बचाते दिल्ली पहुँची. दिल्ली पहुंचकर उन्होंने तहलका के दफ्तर में अपनी पूरी आपबीती सुनाई जिससे पुलिस का सुनाया पूरा किस्सा ही सिर के बल खड़ा हो गया.

सोनी के मुताबिक़ इस घटना के एक दिन पहले किरंदुल पुलिस स्टेशन में पदस्थ मांकड़ नाम का का एक कांस्टेबल उसके घर आया और उसने उससे लिंगा को पुलिस का सहयोगी बनने के लिए मनाने का आग्रह किया. उसका प्रस्ताव था कि लिंगा माओवादी बनकर जाए और लाला से लिए पैसे पुलिस को सौंप दे. मांकड़ ने उसे ऐसा करने पर तमाम फर्जी केसों से मुक्त कराने का आश्वासन भी दिलाया. सोनी के मुताबिक़ उसने ऐसा करने से मना कर दिया. इस पर मांकड़ ने उससे फोन लेकर खुद ही लाला को फोन लगाकर स्वयं को स्थानीय माओवादी बताते हुए पैसों की मांग की. उसके अगले ही दिन एक कार में सादे कपड़ों में कुछ लोग आये और उसके पिता के घर से लिंगा को उठा ले गए. सोनी ने तमाम लोगों से जानकारी हासिल करनी चाही लेकिन उसे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. किरंदुल पुलिस स्टेशन के प्रभारी ने भी इस बारे में अनभिज्ञता प्रकट कर दी (जबकि उसी दिन उन्होंने लाला और लिंगा के खिलाफ एफ आई आर दर्ज की थी). अगले दिन अखबारों में उसने लिंगा की एस्सार मामले में गिरफ्तारी हो गयी है और उन्हें फरार घोषित कर दिया गया है. वह समझ गयीं कि उन्हें किसी भी पल गिरफ्तार किया जा सकता है और वह वहाँ से दिल्ली आ गयीं. यह सफर इस पंक्ति के लिखे जाने जितना आसान नहीं था.

और सोनी ने अपनी सच्चाई साबित भी की. उसने दिल्ली से ही तहलका कार्यालय से मांकड़ को फोन लगाया और उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यूँ किया? क्या यह सच नहीं कि लिंगा को फंसाया गया है? आश्चर्य यह कि मांकड़ ने फोन पर इन सारी बातों को स्वीकार कर लिया जिसके टेप तहलका के पास हैं. उसने साफ़-साफ़ बताया कि पैसे लाला के घर से बरामद किये गए थे. उसने यह भी कहा कि पुलिस के पास सबूतों के नाम पर कुछ नहीं है और वह जल्दी ही छूट जायेगी, साथ ही उन्हें दिल्ली में ही रहने की सलाह दी.

यहाँ रुककर एक मिनट यह सोचना होगा कि किसी बम्बईया फिल्म के दृश्य सा यह घटनाक्रम आज़ाद हिन्दुस्तान के एक हिस्से में संविधान की शपथ खाने वाली विधायिका और कार्यपालिका के देख-रेख में हुआ. इस साजिश को उस थाने में अंजाम दिया गया जहाँ अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी की तस्वीर लगी रहती है. यह उस पुलिस का चेहरा है जिससे सहयोग करने का फ़र्ज़ हर जिम्मेदार नागरिक को घुट्टी की तरह पिलाया जाता है. और ज़ाहिर तौर पर न यह पहली बार हुआ न अंतिम बार. लिंगा के साथ तो इसी थाने में वह हुआ था जिसकी एक सभ्य समाज में कल्पना तक नहीं की जा सकती. उसे चालीस दिनों तक बिना किसी आरोप या सज़ा के थाने के शौचालय में गिरफ्तार रखा गया क्योंकि उसने सलवा जुडूम का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था. बाद में सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार और सोनी तथा दूसरे घरवालों के प्रयास और कोर्ट के हस्तक्षेप से ही उसे आज़ाद कराया जा सका. उसे एक कांग्रेसी ठेकेदार के घर हुए नक्सली हमले का आरोपी तब बनाया गया जब वह दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था. बाद में जब शोर मचा तो तत्कालीन पुलिस प्रमुख और खगेन्द्र ठाकुर सहित हिन्दी के कुछ “जनपक्षधर” साहित्यकारों के प्रिय विश्वरंजन जी ने ‘बयान की चूक’ स्वीकारते हुए उसका नाम हटाया. इस हमले में सोनी और उसके पति को भी आरोपी बनाया गया. सोनी का पति तो इसी मामले में डेढ़ साल से हिरासत में है. इस मामले में जो “सबूत” दिए गए हैं उन्हें पढकर छत्तीसगढ़ पुलिस की न्यायप्रियता का कोई भी कायल हो सकता है. (विस्तार के लिए देखें तहलका
   

खैर, दिल्ली में छुपती-छुपाती सोनी को अंततः छत्तीसगढ़ पुलिस ने दिल्ली पुलिस की सहायता से गिरफ्तार किया और उन्हें साकेत कोर्ट में पेश किया गया. सोनी ने वहाँ खुद को छत्तीसगढ़ पुलिस को न सौंपने की अपील की. दिल्ली हाईकोर्ट में भी एक याचिका लगाकर उनके खिलाफ दिल्ली में ही केस चलाने की मांग की गयी और कहा गया कि अब तक जिस तरह यह साफ़ है कि उन्हें फर्जी मुकदमों में फंसाया गया है, इस बात की पूरी संभावना है कि छत्तीसगढ़ में उन्हें न्याय न मिले. लेकिन कोर्ट ने उन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया. दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को बस एक निर्देश दे दिया कि पुलिस एक सप्ताह बाद उसकी स्थिती के बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करे. लेकिन संविधान से बंधी, न्यायालय का सम्मान करने वाली छत्तीसगढ़ पुलिस ने सोनी के साथ जो किया उसे लिखते भी हाथ कांपते हैं. उसी दिन रात को उन्हें बिजली के झटके दिए गए, नग्न कर के उत्पीडन किया गया और दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए उनके गुप्तांगों में पत्थर के टुकड़े डाल दिए. उसी हालत में उन्हें कोर्ट में पेश किया  गया, जेल भेज दिया गया. हालत खराब होने पर कोलकाता में इलाज के लिए ले जाया गया. वहाँ मेडिकल जाँच में इस आरोप की पुष्टि हुई. उनकी योनि और गुदा से पत्थरों के टुकड़े मिले. उस अमानवीय अत्याचार के सफे रात के अंधेरों की तरह अखबारों में बिखर गए. उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम लिखी उनकी चिट्ठियों में  यह सवाल एक फांस की तरह चुभ रहा है कि इस न्याय व्यवस्था, इस संविधान आधारित लोकतंत्र में एक आदिवासी महिला के साथ हो रहा व्यवहार इस देश की जनता और इसके जागरूक तबके के लिए एक मुसलसल बेचैनी का सबब क्यूँ नहीं है? क्यूँ इसके खिलाफ कोई बड़ी आवाज़ नहीं उठती? क्यूँ हर सूं एक शमशानी चुप्पी है? वह कौन सा मंजर है जिसमें नक्सलियों द्वारा स्कूल में पन्द्रह अगस्त को लाल झंडा फहराए जाने का विरोध कर तिरंगा फहराने वाली वह और लिंगा इस हाल में है, उसका पति डेढ़ साल से जेल में है, उसके पिता को इन्फार्मर होने के शक में नक्सलियों द्वारा पैरों में गोली की मार झेलकर अस्पताल में लाचार पड़ा रहना पड़ रहा है, घर-बार लूट लिया गया है, तीन बच्चे यहाँ-वहाँ पड़े हैं! आखिर दोष क्या है इनका?

शायद यही कि इन्होने नक्सलियों या पुलिस के हाथों का खिलौना बनने से इंकार किया. शायद यही कि इन्होने अपनी पढ़ाई-लिखाई को अपने तथा अपने लोगों की बेहतरी में इस्तेमाल करने का गुनाह किया. शायद यह कि वे आदिवासी होते हुए इस या उस पक्ष के मूक समर्थक बने. शायद यह कि उन्होंने अंधेरों के बीच रौशनी की किरणे खोजने का अजीम गुनाह किया. एस्सार के पूरे किस्से ने वह हकीक़त सामने ला दी है कि कैसे पुलिस और नक्सलियों के बीच जो खेल चल रहा है उसमें पैसे की भूमिका बढती चली गयी है और आदिवासियों को दोनों ही पक्ष शेर के शिकार में बकरे की तरह उपयोग कर रहे हैं. सोनी और लिंगा का दोष शायद यही था कि उन्होंने बकरे की भूमिका निभाने से इंकार कर दिया.

खैर मामला न्यायालय में है. कौन जाने की कभी न्याय मिल ही जाए. लेकिन तब तक दुनिया-जहान में अन्याय की मुखालफत का दावा करने वाले हम लोग क्या करेंगे? सिर्फ इंतज़ार?        


  

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

भारतीय लोकतंत्र पर एक टिप्पणी - मदन कश्यप


भारतीय लोकतंत्र एक सामन्ती लोकतंत्र है 
·  मदन कश्यप 

दखल के लिए यह कोलाज भाई महेश वर्मा ने बना कर भेजा था..


ग्राम्शी ने कहा था कि एक बुर्जुआ लोकतंत्र में पूँजी जनता के सामूहिक विवेक को नियंत्रित करती है. आज भारत सहित सारी दुनिया में यह देखा जा सकता है. इन लोकतंत्रों में सारे निर्णयों और सारी गतिविधियों के केन्द्र में लोक नहीं पूंजीपति हैं. बड़े स्पष्ट तरीके से नीतियाँ इस प्रकार बनाई जा रही हैं कि वे पूंजीपतियों के वर्ग-हितों के अनुरूप हों. इस प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से समाज का बड़ा हिस्सा वंचना का शिकार होकर हासिये पर जा रहा है. किसान, मजदूर और आदिवासी अब सत्ता विमर्श के केन्द्र पर नहीं हैं. एक ऐसा विकास-विमर्श प्रचलित किया जा रहा है जिसमें पूंजीपतियों की समृद्धि को ही विकास का पर्याय बना दिया गया है. यह केन्द्र लगातार संकुचित हो रहा है और हाशिया बढ़ता जा रहा है.




इसके स्रोत सत्ता की बदली हुई शब्दावली में भी देखे जा सकते हैं. संविधान में कहीं केन्द्रशब्द का प्रयोग नहीं है. वहाँ संघीय शासनकी बात की गयी थी. लेकिन आप देखेंगे कि मीडिया से लेकर सत्ता तक की भाषा में केन्द्र सरकारका प्रचलन है. यह सिर्फ भाषा का खिलवाड नहीं. यह उस बदले हुए वैचारिक परिदृश्य को भी दिखाता है जिसमें सभी का प्रतिनिधित्व करने वाली और विभिन्न राष्ट्रीयताओं तथा समाजों के एक संघ की प्रतिनिधि सरकार एक सर्वाधिकारी केन्द्रीय सत्ता में तब्दील हो गयी है. यह सत्ता स्वाभाविक रूप से उन बड़े तथा प्रभावी समुदायों की सत्ता है जिनकी बहुसंख्या इस संख्या आधारित चुनाव प्रणाली को प्रभावित करती है. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे प्रदेशों का संघीय राजनीति में जिस तरह से दबदबा है वह इसी कारण से है. और ठीक यही कारण है जिसकी वज़ह से उत्तर पूर्व जैसे हिस्से लगातार उपेक्षा झेल रहे हैं. दिल्ली में होने वाले अन्ना के आंदोलन को तो राष्ट्रीय आंदोलन का दर्ज़ा मिल जाता है लेकिन इरोम शर्मिला का आंदोलन हासिये का आंदोलन बन कर रह जाता है. हालाँकि मैं यहाँ यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि अन्ना के आंदोलन की इतनी भूमिका मैं स्वीकार करता ही हूँ कि उसने लंबे समय बाद मध्य वर्ग के एक हिस्से को आंदोलित किया और उन्हें सड़क पर ले आया. इससे आगे का काम परिवर्तनकारी शक्तियों का है. यही नहीं इन राज्यों और समुदायों के भीतर के तमाम अल्पसंख्यक समाज भी लगातार हासिये पर बने रहते हैं. चूंकि वे संख्या में इतने बड़े नहीं होते कि किसी चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकें तो उनकी आवाज़ को भी कोई महत्व नहीं दिया जाता. यह लोकतंत्र की एक बड़ी सीमा है और इसके सबका राज्यहोने के मिथक पर एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है.

साथ ही मैं भारतीय लोकतंत्र को एक सामंती लोकतंत्रभी कहना चाहूँगा. इसमें जाति, धर्म और क्षेत्रीयता जैसी संरंचनाएँ बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. पश्चिमी देशों में जहाँ लोकतंत्र बुर्जुआ प्रकृति का है, वहाँ अपनी सीमाओं के बावजूद मनुष्य की अस्मिता तथा जीवन का सम्मान है. उदाहरण के लिए वहाँ दवा या खाने-पीने के चीजों में मिलावट संभव नहीं. इसके लिए बेहद कड़ी सज़ाएँ हैं, लेकिन भारत में ये अपराध आम हैं. यहाँ का लोकतंत्र अभी मनुष्य की अस्मिता के सम्मान का प्राथमिक गुण भी नहीं सीख पाया है. औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के बाद जिस तरह किसी बड़े और व्यापक आमूलचूल परिवर्तन की जगह सामंती वर्ग ही सत्ता वर्ग में तबदील हुआ, उसमें यह स्वाभाविक था. ऊँची जातियों के पूर्व सामंतों का समाज के भीतर दबदबा रहा. जाति और धर्म की उत्पीडक संरंचनाओं को तोड़ने के कोई गंभीर प्रयास नहीं किये गए. बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया को जाति/क्षेत्र/धर्म के आधार पर तय किया गया. लोकसभा से लेकर ग्रामसभा तक जातियाँ चुनावी नतीजों और नीतियों के केन्द्र में रहीं और जातिमुक्त समाज का स्वप्न हासिये पर. आरक्षण ने एक धीमी प्रक्रिया के तहत वंचित जातियों से एक हिस्से को मुख्यधारा में लाने में निश्चित रूप से सकारात्मक भूमिका निभाई है लेकिन जाति और धर्म के भारतीय लोकतंत्र से अविभाज्य रिश्ते को वह भी प्रभावित नहीं कर पाया है. ज़ाहिर है कि इस सामंती लोकतंत्रमें केन्द्र और हासिये का विभाजन प्रभावशाली तथा वंचित जातियों, बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक धर्मों और संपन्न तथा उपेक्षित क्षेत्रों में होता ही है.

इस केन्द्र और हासिये के विभाजन का असर भी शुरू से ही साफ़ दिखाई देने लगा था. कश्मीर, पूर्वोत्तर ही नहीं देश के तमाम हिस्सों सहित लगभग हर राज्य में इस द्वंद्व का प्रतिफलन हिंसक/अहिंसक संघर्षों में हुआ है. सुविधाप्राप्त तथा वंचितों के बीच बढ़ती खाई ने भारत ही नहीं दुनिया भर में एक ऎसी स्थिति बनाई है जिसमें लोगों का गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा है. अरब देशों से लगाए यूरोप और अमेरिका तक में जारी जनता के विरोध प्रदर्शन पूंजीवादी लोकतंत्र की इसी विफलता के स्वाभाविक परिणाम हैं. यहाँ बड़ी भूमिका निभाने में क्रांतिकारी शक्तियों की अक्षमता ही पूंजीवाद को अब तक ज़िंदा रखे है. ऐसा क्यों है, इस पर गंभीर विचार की ज़रूरत है.  

दखल विचार मंच के कार्यक्रम में दिए गए व्याख्यान के आधार पर 
प्रस्तुति - फिरोज खान

सोमवार, 19 जुलाई 2010

बिहार : सुशासन की हवा-मिठाई - राजू रंजन प्रसाद


यह अजीब-सी बात है कि बिहार में आये बदलाव को प्रदेश के बाहर के लोगों ने कुछ पहले जाना-समझा। इस बदलाव की धमक अमेरिका पहले पहुची, बाद को वहीं से रिडायरेक्ट होकर दुनिया के भिन्न-भिन्न कोनों में फैली। निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि बदलाव हुए हैं। बिहारवासी 'जंगल-राज' से चलकर सुशासन 'में दाखिल हो रहे हैं। ये दोनों ही 'फर्जी' नाम पत्रकारों-बुद्धिजीवियों की एक खास 'प्रजाति' के द्वारा गढ़े गये हैं। आश्चर्य होता है कि सुशासन की डुगडुगी बजाने में वही बुद्धिजीवी-पत्रकार शामिल हैं, जो 'जंगल-राज' के दिनों में 'लालू-राबड़ी ' की जीवनी तैयार करने हेतु लेखक ढूंढ रहे थे।

जंगल-राज और सुशासन में एक तात्विक अंतर है, जिसे मैं एक तटस्थ बिहारवासी होने के नाते महसूस कर सकता हूं। जंगल-राज के दिनों में सरकार उदारीकरण एवं बाजारवाद जैसी चीजों पर सखतीपूर्ण रवैया अपनाती थी। धनिकों का विरोध एवं गरीबों की भलाई स्थायी घोषणा थी उसकी। ये और बात है कि शब्द और कर्म में कभी मेल नहीं बिठाया जा सका। सुशासनी सरकार ने शब्द और कर्म की एकता दर्शायी है। यह सरकार वैश्विक पूंजी की गोद में बैठकर न केवल बातें करती है बल्कि उसके अनुपालन के लिए हर संभव प्रयास भी करती है। सूत्र रूप में कहें कि वर्तमान सरकार पूंजीपति वर्ग द्वारा तैयार उपभोक्ता माल की बिक्री की गारंटी देती है।

यह सब करने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार की जरूरत पड ती है। अखबार इस जरूरत को आसानी से पूरा कर सकता है। इसलिए 'सरकारी' पत्रकारों की एक फौज जमा की गई। ऐसे पत्रकार अब सामयिक ज्वलंत मुद्‌दों पर न लिखकर 'कानों-कान' सुनते हैं और 'भूले-बिसरे' मुद्‌दों पर लिखते हैं। सामयिक घटनाओं पर लिखने के अपने 'खतरे' हैं। सामयिक चिंतन का 'मूड' तभी बनता है जब सरकार के नेता से असंतुष्ट विधायकों/लोगों को 'अपने पुराने घर' में वापिस लाने का इन्हें 'सरकारी फरमान' प्राप्त होता है। अखबार के मालिकों के लिए अलग से पैकेज की व्यवस्था की गई है। उनको सरकार की तरफ से मिलनेवाले विज्ञापनों में तीन-चार गुने की अप्रत्याशित वृद्वि की जा चुकी है। नतीजतन, अखबार के मालिक से लेकर नौकर-चाकर तक-सभी जनता को सुशासन की 'हवा मिठाई' बांट रहे हैं। बालिका सायकिल योजना के पक्ष में भी अखबारों/पत्रकारों ने सकारात्मक माहौल बनाने का जी-तोड़ प्रयास किया था। हमें बार-बार बताया गया कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह एक क्रांतिकारी प्रयास है। इसमें कई लोगों को कई तरह से कमाई का अवसर मिला। सरकार से लेकर विद्यालय के प्रधानाध्यापक तक को। सायकिल निर्माता कंपनियों को जब सिर्फ लडकियों को ही सायकिल बेचकर संतोष न हुआ तो सरकार को अपनी योजना में संशोधन लाना पड़ा जाहिर है, अब बालकों को भी सायकिल दी जा रही है। महिला सशक्तिकरण की बात कहां रही तब।

सायकिल का ही गोतिया मोटरसायकिल है। मोटरसायकिल बेचने का जरिया बेचारी पुलिस को बनना पडा। ध्यान रहे कि यह कोई आम या किफायती मोटरसायकिल नहीं है, बल्कि अपाचे टीवीएस १६० है। निश्चित रूप से इसकी खपत खुले बाजार में संभव नहीं क्योंकि इसकी कीमत अन्य आम मोटरसायकिल की तुलना में डेढ गुनी अधिक है। वर्तमान में इसकी कीमत ६१,००० रुपये है। यह सब जनता की 'सुरक्षा' और 'सुव्यवस्था' बहाल करने हेतु किया गया। हां, इससे इतना तो अवश्य हुआ कि पटना की सडकों पर पुलिस अब नजर आने लगी है! लोकतंत्र में पुलिस की 'सक्रियता' बढ जाए तो सुव्यवस्था का अंदाजा आप लगा ही सकते हैं। विधायकों को बड़ी गाडी दी गई। जनता के लिए रात-दिन एक वही तो करते हैं

शिक्षा का क्षेत्र अभी सबसे बड़ा बाजार है। इस क्षेत्र में विदेशी बड़ी कंपनियों को अवसर प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार भी कई गलत-सही तरीके से प्रयत्नशील है। इसलिए हमारी राज्य सरकार के पास एक 'नैतिक आधार' (वैसे अब इसकी फिक्र ही किसे है ) भी है। लगभग प्रत्येक उच्च माध्यमिक विद्यालय को पचास लाख रुपये की राशि प्रदान की गई है। इसमें कसरत-व्यायाम (जिम) के सामान से लेकर पुस्तकालय के लिए किताबों की खरीद तक शामिल है। जिम के सामान पर प्रत्येक विद्यालय को लगभग चार लाख की राशि खर्च करनी है। 'कुपोषण ' के शिकार नव नियोजित शिक्षक (उनका नियत वेतन मात्र छः हजार रुपये है। अगर सरकार की वर्तमान घोषणा को आधार बनाया जाये तो यह आठ हजार ठहरता है।) एवं अनीमिया से ग्रस्त बच्चे-बच्चियां जिमखाने से लाभ उठा सकेंगे-इसकी कल्पना मात्र क्या हास्यास्पद नहीं है ? सरकार ने यह आदेश भी पारित किया है कि प्लस टू के बच्चों को पढ़ाने के लिए पास-पड़ोस के एम. ए. पास युवकों को धरा-पकड़ा जाये और डेढ सौ रुपये की दैनिक मजदूरी देकर उन्हें उपकृत किया जाये। बिहार में लगता है, मानव संसाधन के उपयोग एवं विकास का यह 'सुशासनी नुस्खा' अपने आप मे एकदम ही 'मौलिक' विचार है। जहां तक पुस्तकालय के लिए किताबों की खरीद की बात है, वहां भी व्यापक गड़बड़ी देखी गई। एक तो सरकारी निर्देश के आलोक में टेक्स्ट बुक्स ही खरीदी गईं, और ठीक दूसरे वर्ष कक्षा नौ का पाठ्‌यक्रम बदल दिया गया। एकबारगी पुस्तकालय कूड़ाघर में तब्दील हो गया। ऐसी खरीद का आप क्या मतलब निकाल सकते हैं। दूसरी तरफ प्राथमिक विद्यालयों में सात पेजी चित्र-पुस्तकें ४०-५० रुपये में खरीदी गईं। यह सब सुशासनी सरकार के सख़्त निर्देशन में हुआ। यहां तक कि खरीद के लिए दुकान भी तय थी।इतना ही नहीं, प्रत्येक विद्यालय को कंप्यूटर देने की हमारी सरकार की अत्यंत 'महत्वाकांक्षी' योजना है। इस योजना को जमीन पर उतारने की दिशा में कुछ आवश्यक पहल भी हुई है। आप समझ सकते हैं कि जहां विद्यालयों में तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां कंप्यूटर देने के पीछे ''सुशासन की क्या हो सकती है। गौरतलब यह भी है कि प्रत्येक बच्चे को लैपटॉप से युक्त बनाने की अद्यतन योजना पर विमर्श जारी है। क्या मजाक है कि शिक्षक वर्ग में बगैर जूते (उनकी तनखवाह एक जोड़ी जूते के बराबर है) उपस्थित हों और बच्चे लैपटॉप पर 'चैटिंग' करते। यह सब सुशासन ही में संभव है।

इसलिए, सुशासन के पैरोकार बुद्धिजीवियों से मेरी गुजारिश है कि वे मेरी इन बातों की तथ्यात्मक भूलों/गलतियों को बताएं, केवल सुशासन की हवा-मिठाई ही न बेचें।

मंगलवार, 8 जून 2010

जाति गणना और सामाजिक न्याय का सवाल

जाति की गणना एक समतापूर्ण समाज के निर्माण में सहायक हो सकती है
  • अरुण माहेश्वरी


भारत में वर्ण-व्यवस्था की प्राचीनता अब बहस का विशय नहीं है। वर्ण-व्यवस्था सनातन धर्म का मूलाधार रही है। इतिहासकारों ने इस विशय पर भी काफी गंभीर काम किये हैं कि वर्ण-व्यवस्था के ढांचे के अंदर ही जातियों के लगातार विभाजन और पुनर्विभाजन के जरिये कैसे यहां एक प्रकार की सामाजिक गतिशीलता बनी रही है। इस बारे में खास तौर पर डा. डी.डी.कोसांबी और आर.एस.शर्मा के कामों को याद किया जा सकता है। 

इसी सिलसिले में हमारे लिये बहस और विचार का एक विषय यह भी है कि अभी हमारे समाज में जिस प्रकार का जातिवाद दिखाई दे रहा है, उसका कितना संबंध उस प्राचीनकालीन वर्ण-व्यवस्था से है और कितना कुछ अन्य नयी चीजों से है जिन्होंने पिछले 100 वर्शों में हमारे समाज में प्रवेश किया है। 

आज के जातिवाद को हजारों वर्षों के भारतीय समाज के इतिहास से जोड़ना समस्या की जड़ों तक जाने की दिशा में एक सही कदम होने के बावजूद, मुझे लगता है कि इस मामले में कुछ आधुनिक विचारधाराओं के प्रभाव को भी निश्चित तौर पर नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है नस्लवाद (Racism) की विचारधारा, जो एक प्रकार का जातिवाद ही है। यह एक ऐसा विचार है जो यह मानता है कि आदमी की कुछ खास विशेषताएं और उसकी योग्यताएं उसकी नस्ल से निर्धारित होती है। 19वीं सदी से ही ‘वैज्ञानिक नस्लवाद’  की तरह की विचारधारा चल पड़ी थी जिसमें आदमी की नस्ल को ही उसकी बुद्धि, उसके स्वास्थ्य और यहां तक कि उसमें अपराध की प्रवृत्ति से भी जोड़ कर देखा जाता था। फ्रांसीसी विचारक जोसेफ आर्थर कोम्टे द गोबिनो की प्रसिद्ध भारी-भरकम कृति ‘मानव नस्लों की असमानता पर एक निबंध’(1853-1855) के शीर्षक से प्रकाशित हो गयी थी जिसमें आर्यों को शासक जाति बताने के नस्लवादी सिद्धांत को स्थापित किया गया था। इसी जातीय श्रेष्ठता के तत्व को हिटलर के नाजीवाद ने उसके चरम और वीभत्स रूप तक पहुंचाया और जर्मन राष्ट्र की सर्व-श्रेष्ठता के सिद्धांत के बल पर दुनिया के अन्य सभी राष्ट्रों को कीड़े-मकोड़ों की तरह रौंद डालने को जर्मन राश्ट्र का जन्मसिद्ध अधिकार घोषित किया। भारत में आरएसएस की आधारशिला भी इसी प्रकार के भ्रामक, ब्राह्मणों को आर्य और शासक नस्ल का मानते हुए जातीय श्रेष्ठता के सिद्धांत पर रखी गयी थी।    

बहरहाल, देखने की चीज यह है कि पष्चिम के इस नस्लवाद के सिद्धांत ने भारत की प्राचीन काल से चली आ रही वर्ण-व्यवस्था के साथ मिल कर समग्रतः हमारे समाज पर कैसा प्रभाव डाला और यहां की जाति-व्यवस्था को कौन सा नया रूप दिया। जब हम जातियों के आधार पर जनगणना के औचित्य-अनौचित्य के मुद्दे पर विचार करते हैं, तब हमें अपने इधर के इतिहास के इन पक्षों का भी थोड़ा अध्ययन जरूर करना चाहिए। 

जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं, पश्चिम के प्राचीन समाज में भले ही वर्ण  व्यवस्था की तरह की कोई चिरंतर व्यवस्था न रही हो, लेकिन 19वीं सदी के आधुनिक काल में पश्चिम का शासक वर्ग एक खास प्रकार के जातिवाद (नस्लवाद) के सिद्धांत पर प्रयोग कर रहा था। विभिन्न समुदाय के लोगों की चमड़ी और आंख की पुतली के रंग, उनके ललाट और मस्तक के माप आदि के कथित वैज्ञानिक तौर तरीकों से इस सिद्धांत का ईजाद किया था और उसी के जरिये समाज तथा शासन के क्रम-विन्यास में विधि ने किसके लिये कौन सी जगह तय की है, इसे अनंत काल के लिये स्थिर कर देने का उन्होंने बीड़ा उठाया था। वे नस्ल (जाति) को इतिहास की कुंजी मानते थे।1 

कहना न होगा कि हमारे देश में भी ब्रिटिश शासन के पैर जमाने के साथ ही अंग्रेजों की इसी ‘वैज्ञानिक’ खुराफात के प्रयोग ने इस समाज पर कम रंग नहीं दिखाया। भारत में 1901 की जनगणना का आयुक्त राबर्ट रिस्ले कहता है, “ जाति भावना ... इस सचाई पर आधारित है कि उसे वैज्ञानिक विधि से परखा जा सकता है; कि उससे किसी भी जाति को संचालित करने वाले सिद्धांत की आपूर्ति होती है; कि यह शासन के सर्वाधिक आधुनिक विकास को आकार देने के लिये गल्प अथवा परंपरा के रूप में कायम रहती है; और अंत में उसका प्रभाव उसके द्वारा समर्थित खास स्थिति को तुलनात्मक शुद्धता के साथ संरक्षित रखता है। 

जाहिर है कि अंग्रेजों ने भारत की वर्ण व्यवस्था को यहां नस्ली शुद्धता को चिरंतर बनाये रखने के पहले से बने-बनाये एक मुकम्मल ढांचे के रूप में देखा और यहां अपनी शासन व्यवस्था के विकास लिये इसका भरपूर प्रयोग करने का निर्णय लिया। उनकी इसी दृष्टि ने भारत में 1871 का जरायमपेशा जातियों का कानून बना कर कुछ तबको को हमेशा के लिये दागी घोषित कर दिया। और यही वह नजरिया था जिसके चलते 1891 की पहली मर्दुम शुमारी में सिर्फ जातियों की गणना नहीं बल्कि उनकी परिभाषा और व्याख्या को भी शामिल किया गया। इतिहास में वे सारी कहानियां दर्ज है कि जातियों की इन उद्देश्यपूर्ण पहचान की कोशिशों ने भारतीय समाज में ऐसा गुल खिलाया कि यहां के विभिन्न जातीय समुदायों में जनगणना के खातों में अपनी जाति को अपने खास ढंग से परिभाषित-व्याख्यायित कराने की होड़ सी लग गयी। जो लोग अंग्रेजों के मंसूबों को समझ रहे थे, ऐसे ‘समझदारों’ को यह जानते देर नहीं लगी कि इसीसे यह तय होना है कि आने वाले दिनों में अग्रेजी शासन की पूरी व्यवस्था में कौन सा समुदाय किस पायदान पर खड़ा होगा; शासन की रेवड़ियों के बंटवारे में किसके हाथ कितना लगेगा। और इसप्रकार, भारतीय वर्ण-व्यवस्था इस नये पश्चिमी नस्लवादी सिद्धांत से जुड़ कर एक अलग प्रकार की जाति-चेतना के उद्भव का कारण बनी। यही वजह है कि आज हम जिस जातिवाद से अपने को जकड़ा हुआ पाते हैं, उसके बहुत कुछ को भारत में अंग्रेजी शासन की देन कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। 19वीं सदी के पहले के इतिहास में जो ब्राह्मण विरले ही कहीं बलशाली, वैभवशाली दिखाई देते हैं; सदा राज-कृपा के मुखापेक्षी और उसीके बल पर यदा-कदा भौतिक दुनिया में भी किंचित महत्व पाते रहे हैं, वे अंग्रेजांे की ‘जाति-गणना’ में संगठित रूप में दखल देकर ब्राह्मणों को आर्य और ‘शासक जाति’ घोषित कराके हमारे समाज के भौतिक और आत्मिक, दोनों जगत के परंपरागत रूप में पूर्ण अधिकारी बन गये। और, इसप्रकार नई शासन व्यवस्था से उनका अपना एक खास रिश्ता बना, वे भी अंग्रेजों के ‘कानून के शासन’ के एक प्रमुख स्तंभ बन गये। 

आज जब जनगणना में जातियों की गणना के प्रश्न पर इतनी बहस चल रही है, उस समय हमारे लिये इतिहास के इन थोड़े से पृष्ठों को पलट कर देखना नुकसानदेह नहीं होगा। फिर किसी जाति को जरायमपेशा अथवा शासक जाति घोशित करवाने अथवा किसी जाति को पूरी शासन व्यवस्था में किसी नि्श्चित पायदान पर स्थायी तौर पर रखवा देने, अथवा सरकारी कृपा की एकमात्र अधिकारी घोषित करवाने आदि की तरह की गैर-जनतांत्रिक होड़ और तनाव में हमारा समाज न जकड़ जाए, इसके प्रति सावधान रहने की जरूरत है। अन्यथा सामाजिक न्याय के लक्ष्य को पूरी तरह से हासिल करने के लिये, कमजोरों को सहारा देकर ऊंचा उठाने के लिये किसी भी प्रकार की गणना आदि से किसी भी न्यायप्रिय व्यक्ति को कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। हमारा यह मानना है कि सतर्क ढंग से प्रयोग करने पर इस प्रकार की गणना एक समतापूर्ण और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिये काफी उपयोगी साबित हो सकती है। 

रविवार, 23 मई 2010

जिस जीत ने दुनिया को बचाया

चतुर्दिक
हम हर बार जीतेंगे!

फासीवाद पर विजय के 65 वर्ष
  • अरुण माहेश्वरी

''मैंने द्वितीय विश्वयुद्ध में लड़ाई नहीं की थी। मैं महान देशभक्ति का युद्ध लड़ा था। सारी दुनिया जिंदा है सोवियत संघ की बदौलत''ये शब्द थे उस बूढ़े रूसी कर्नल के जो 9 मई 1995 के दिन लेनिन मुसोलियम के पिछवाड़े में स्तालिन की मूर्ति के आधार पर फूल चढ़ाने आये अनगिनत लोगों में एक था। गार्जियन पत्रिका में जोनाथन स्टील ने अपने एक लेख सोवियत संघ के लुप्त गौरव का स्मरण करते हुए रूस के वयोवृद्ध लोगमें इसका उल्लेख किया था।

गोर्बाचोव के पेरोस्त्राइका और येलत्सिन के सुधार के बारे में इसी कर्नल की राय थी कि ''साम्राज्यवादी 1941 में सोवियत संघ को खत्म करना चाहते थे। वे नहीं कर सके। बाद में उन्होंने हमारे नेताओं से ही वह काम करा लेने का रास्ता पा लिया।''

65 साल पहले फासीवाद की पराजय सचमुच सभ्यता की एक भारी जीत थी; बर्बरता के अब तक के सबसे जघन्य हमले के खिलाफ मनुष्यता की जीत थी। सामूहिक हिंसा के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध और नागरिक अधिकारों, व्यक्ति के अधिकारों तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के खिलाफ सभ्य समाज, व्यक्ति की अस्मिता और स्वातंत्र्य की भी जीत थी। यह शुद्ध स्वार्थों पर टिके पूंजीवाद, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवादी विस्तारवाद के खिलाफ समता पर आधारित समाजवाद और राष्ट्रों की आजादी, जनतंत्र और सार्वभौमिकता की जीत थी।

8 मई 1945 की आधी रात को 1418 दिनों तक चले अब तक के इतिहास के इस सबसे विध्वंसक और जनसंहारक युद्ध के अपराधों के बाद जब पराजित नाजी फौज के प्रतिनिधियों ने बर्लिन शहर के निकटवर्ती कस्बे करिहस्र्ट में सोवियत सेना और ब्रिटेन, अमेरिका तथा फ्रांस की मित्र शक्तियों के प्रतिनिधियों के सामने बिनाशर्त पूर्ण आत्मसमर्पण किया, तब तक इस युद्ध में 5 करोड़ के करीब लोगों की जानें जा चुकी थी। अकेले सोवियत संघ के 2 करोड़ 70 लोग मारे गये थे जो उसकी आबादी का 13.5 प्रतिशत हिस्सा था। दुनिया के 1700 शहरों और कस्बों को नाजी सेना ने धूल में मिला दिया था। कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों का नामोनिशान मिट चुका था।

युद्ध के इस इतिहास से जुड़े और भी कुछ ऐसे निंदनीय पहलू है जिन पर आज भी ध्यान दिया जाना चाहिए। ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय के गुप्त कागजातों को आम लोगों के लिये उपलब्ध कराये जाने की कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करते हुए 1 जनवरी 1970 का गार्जियनलिखता है, आज सुबह ही 1939 के जिन कैबिनेट पेपर्स को प्रकाशित किया गया उनसे पता चलता है कि द्वितीय विश्व युद्ध जिस साल शुरू हुआ, उस साल शुरू ही न होता यदि ब्रिटेन की चैंबरलीन सरकार ने रूस की सलाह को मान लिया होता या उसे समझा होता कि ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ के बीच संधि युद्ध को रोक देगी, क्योंकि हिटलर इन ताकतों के खिलाफ दो मोर्चों पर टकराने का जोखिम नहीं उठायेगा

अमेरिकी सिनेटर हैरी ट्रुमैन ने, जो बाद में अमेरिका के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति दोनों बनें, सोवियत संघ पर हिटलर के हमले के दूसरे दिन ही कहा यदि हम देखते हैं कि जर्मनी जीत रहा है तो हमें रूसियों की मदद करनी चाहिए और यदि रूस जीतता है तो हमें जर्मनों की सहायता करनी चाहिए और इस प्रकार वे एक दूसरे को जितना मार सके, मारने देना चाहिए। (द न्यूयार्क टाइम्स, 24 जून, 1941)

कहना न होगा कि दूसरे विश्वयुद्ध का इतिहास समाजवादी सोवियत संघ के खिलाफ कथित मित्र शक्तियों के षड़यंत्रों और विश्वासघात की ऐसी न जाने कितनी कथाओंअंतरकथाओं से अटा हुआ है। इस युद्ध की समाप्ति के 65 वर्ष बाद आज भी उसके इतिहास को विकृत करके सारी दुनिया को बचाने वाले पहले समाजवादी राज्य की अकल्पनीय कुर्बानियों के खिलाफ कुत्सा का उनका अभियान थमा नहीं है। इतिहास गवाह है कि सोवियत संध ने फासीवाद के उदय के काल से ही हर चरण में उसे मानवता का शत्रु माना और उसके खिलाफ दुनिया की सभी जनतंत्र और शांतिप्रिय ताकतों के संयुक्त प्रतिरोध को तैयार करने की पेशकश की थी। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के नेता ज्यार्जी दिमित्रोव 1935 में इस निष्कर्ष पर पहुंच गये थे कि फासीवाद सारी दुनिया में मजदूर वर्ग का प्रमुख शत्रु है और उसी समय उन्होंने फासीवादियोंनाजीवादियों से मुकाबले के लिये व्यापक आधार वाले संयुक्त मोर्चा की कार्यनीति को अपनाने का आान किया था। तभी से सोवियत संघ सहित सारी दुनिया का कम्युनिस्ट आंदोलन इसी घोषित नीति पर चल रहा था। लेकिन रूस में 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद, 1918 से 1920 तक जो फ्रांस और ब्रिटेन इस नवजात समाजवादी राष्ट्र को घेर कर सैनिक कार्रवाई के जरिये उसे मिटा देने पर तुले हुए थे, वे ही हिटलर के उदय को समाजवाद के खिलाफ अपने एक कारगर हथियार के रूप में देख रहे थे और सोवियत संघ के संयुक्त प्रतिरोध के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकारने के लिये तैयार नहीं थे। इतिहास में इस सचाई के सारे प्रमाण भरे हुए हैं।

इसके बावजूद, पश्चिम की यही पूंजीवादी ताकतें तमाम संदर्भों से काट कर 1939 में सोवियत संघ और जर्मनी के बीच की अनाक्रमण संधि के हवाले से इतिहास को विकृत करते हुए यह कहने से कभी नहीं चूकती कि सोवियत संघ ने इस युद्ध के प्रारंभ में हिटलर के सहयोगी की भूमिका अदा की थी। हिटलर ने सोवियत संघ को अपने हमले का निशाना बनाया इसके लिये भी वे यह कहते हुए सोवियत संघ को ही जिम्मेदार बताते हैं कि युद्ध के प्रारंभिक (1939–1941) वर्षों में उसकी निष्पक्षताकी भूमिका ने युरोपविजयी जर्मनी को रूस की ओर रुख करने के लिये प्रेरित किया था। विश्व युद्ध के अनेक इतिहासकारों ने पूंजीवादी शिविर के इस झूठे प्रचार का बारबार जवाब दिया है, लेकिन आज भी कम्युनिज्म के भूत से आक्रांत साम्राज्यवादियों के प्रचारक अपनी इस टेक को छोड़ने के लिये तैयार नहीं है।

बहरहाल, सचाई यह है कि सोवियत संघ ने शांति को कायम रखने का प्रयास किया, युरोप में सभी फासीवादविरोधी ताकतों को एकजुट करने की हर संभव कोशिश की और फासीवाद को रोकने की जरूरत को लेकर एकएक राष्ट्र का दरवाजा खटखटाया, लेकिन पूंजीवादी देशो के नेताओं के कानों पर जू तक नहीं रेंगी। फासीवाद के खिलाफ दुनिया की सभी ताकतों के संयुक्त मोर्चे के निर्माण की सोवियत संघ की पेशकश को ठुकराते हुए पश्चिम की ताकतों की हरचंद कोशिश इस बात की थी कि कैसे भी क्यों न हो, हिटलर के उत्कट कम्युनिज्मविरोध को और भड़काते हुए उसकी सेना को सोवियत संघ के खिलाफ उतार दिया जाए।

हिटलर ने युद्ध की शुरूआत पोलैंड पर हमले से की थी और ब्रिटेन, फ्रांस सभी इसी ताक में बैठे रहे कि कब और कैसे हिटलर के दरिंदे रूस पर टूट पड़ते हैं। पोलैंड के बाद नोर्वे, हालैंड बेल्जियम, फ्रांस, डेनमार्क एकएक कर हिटलर के हमलों के सामने किसी ताश के घर की तरह चंद दिनों में ही ढह गये। बिना किसी प्रतिरोध के इन पूंजीवादी देशों की सेनाओं ने हथियार डाल दिये, हिटलर के टैंकों की गड़गड़ाहट और लड़ाकू विमानों के शोर भर से इन देशों की सेनाओं के हौसले पस्त होते देखे गये। हिटलर ने पूरे युरोप को रौंद कर, उसके तमाम सैनिक और तकनीकी संसाधनों को हथिया कर 1941 के जून महीने में सोवियत संघ को मटियामेट करने का अभियान शुरू किया था। पश्चिम के पूंजीवादी देशों के सभी नेता यह मान कर बैठे हुए थे कि जैसे हिटलर ने पलक झपकते अपने रास्ते में पड़ने वाले बाकी राष्ट्रों को रौंद डाला, उसी प्रकार सोवियत संघ पर भी उसकी सेना के सिर्फ़ कूच भर करने की देरी है, समाजवादी रूस उसके चरणो पर लोटता नजर आयेगा। हिटलर के इस भयंकर विध्वंसक अभियान के प्रति अपने आतंक के बावजूद, उन्हें इस समूचे घटनाचक्र में समाजवाद को नेस्तनाबूद कर देने के अपने वर्षों के सपने के पूरे होने की उम्मीद भी दिखाई दे रही थी, और इसी बात से वे काफी खुश भी थे, जैसा कि अमेरिकी सिनेटर ट्रुमैन के उपरोक्त कथन से जाहिर है। लेकिन रूस में हिटलर के प्रवेश के थोड़े दिनों के अंदर ही यह बात साफ होगयी कि पूंजीवादी देशों की लुजपुंज सेनाओं से मुकाबले के आदी हिटलर का अब एक बिल्कुल अलग प्रकार के, सर्वहारा राज्य के समाजवादी आदर्शों से अनुप्राणित सैनिकों और आम मेहनतकशों से बनी सेना से मुकाबला ह
दुनिया में युद्धों के अब तक के इतिहास में ऐसी शायद ही दूसरी कोई नजीर मिलेगी, जिसमें लेनिनग्राद की तरह एक शहर को 900 दिनों तक घेरेबंदी में रखने, सर्दी, भूख और बमबाजी के लगातार प्रहारों बावजूद वहां के निवासियों ने हार नहीं मानी। नाजी सेना स्तालिनग्राद में घुस चुकी थी, उसके एक हिस्से पर कब्जा भी कर लिया था, इसके बावजूद सोवियत सेना ने न सिर्फ़ उसका डट कर मुकाबला ही किया, बल्कि इतिहास के इस सबसे बड़े युद्ध में उन्हें पराजित करके ठेठ बर्लिन तक धकेल दिया। स्तालिनग्राद के युद्ध के मैदान में पराजित होकर लौटते हुए नाजी सैनिकों ने वहां की दीवारों पर लिखा था कि हम बर्लिन लौट रहे हैं, तो इसके नीचे ही सोवियत सैनिकों ने लिखा, हम भी बर्लिन आ रहे हैं, और उन्होंने बर्लिन में जर्मनी के सत्ताकेंद्र राइखस्टाग पर लाल झंडा फहरा कर ही दम लिया

कुल मिला कर सोवियत संध की जनता के इस महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध ने सारी दुनिया के सामने समाजवादी व्यवस्था की शक्ति और श्रेष्ठता को जाहिर कर दिया। कल की तरह ही आज भी इस बात पर पूरा बल देने की जरूरत है कि द्वितीय विश्व युद्ध पूंजीवाद के संकट की एक परिणति था और फासीवाद का उदय इसी संकट का एक वर्गीय समाधान था। नाजी पार्टी के पीछे जर्मनी के बड़े औद्योगिक और वित्तीय घरानों का हाथ था, जिन्होंने जनता के जनतांत्रिक अधिकारों के हनन और कम्युनिस्टों तथा मजदूरों के संघर्षों के खात्मे के लिये इन ताकतों को हर प्रकार की सहायता दी थी।

फासीवाद पर विजय के 65 वर्ष बाद, आज जब दुनिया का नक्शा कुछ बदला हुआ नजर आता है, एक समाजवादी शिविर के उदय, उपनिवेशवाद के अंत और पूंजीवादी देशों में मेहनतकश जनता के लिये सामाजिक सुरक्षा की असंख्य उपलब्धियों के बावजूद अब उसी सोवियत संघ और पूर्वी युरोप के देशों में समाजवाद के पराभव तथा अमेरिका के एकध्रुवीय विश्व का दृश्य दिखाई देता है, ऐसे समय में इस टिप्पणी के शुरू में हमने जोनाथन स्टील के जिस लेख का उद्धरण दिया है, उसीमें उल्लेखित स्तालिन के मकबरे पर फूल चढ़ाने के लिये आये एक और व्यक्ति अलेक्संदर चुदाकोव, जो एक जानामाना वैज्ञानिक था, का यह सवाल याद आता है कि यह कुछ अजीब है, फिर भी यदि सैनिकों को यह पता होता कि 50 साल बाद उनके देश में क्या होने वाला है तो क्या वे उस बहादुरी से लड़ पाते?

इतिहास के इस व्यर्थताबोध को ही, जो किसी भी मायने में कम यथार्थ बोध नहीं है, कामू, काफ्का और सात्र्र के अस्तित्ववाद ने व्यक्त किया था और ग्रीक माइथोलोजी के चरित्र सिसिफस की कहानी को नयी अर्थवत्ता प्रदान की थी, जो पहाड़ की चोटी पर एक चान को बारबार लेजाने और बारबार उसे ऊपर से गिरते हुए देखने के लिये अभिशप्त है। जाहिर है कि जिंदगी का अर्थ विजय और व्यर्थता, दोनों ही है। जीत और हार की द्वंद्वात्मकता में ही जीवन की प्रगति का राज छिपा है।

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

दंतेवाड़ा -- कौन किसको मार रहा है?

आज मन बहुत दुखी है। दंतेवाड़ा में 75 जवान नक्सल हमले के शिकार हो मारे गए। वे किसी न किसी माता-पिता के पुत्र, किसी पत्नी के पति और बच्चों के माता-पिता होंगे। क्या हुआ होगा जब यह खबर उन आश्रितों पर पहुँचेगी जिन का आश्रयदाता इस हमले में मारा गया। वे सभी शहीद कहलाएँगे। उन के कम से कम एक आश्रित को फिर से उसी सुरक्षा दल में नौकरी मिल जाएगी जो हो सकता है ट्रेनिंग के बाद फिर से उसी जंगल में नक्सलियों से मुकाबला करने के लिए भेज दिया जाए। पत्नियों और अवयस्क बच्चों को हो सकता है पेंशन मिलने लगे। हो सकता है कुछ ही दिनों में वे अपना दुख भुला कर जीवन जीने लगें। इस घटना की जानकारी मिलने के बाद मैं सोचने लगा कि आखिर उन की मौत का जिम्मेदार कौन है?

मारे राजनेता जो जनता से चुने जा कर संसद और विधानसभाओं में पहुँचते हैं, उन्हीं में से कुछ मंत्री बनते हैं और सरकार बनाते हैं। उन्हीं मंत्रियों ने नक्सलियों से लोहा लेने और उन्हें समाप्त कर डालने के लिए ऑपरेशन ग्रीन हंट का निर्णय लिया था। निश्चित रूप से यह निर्णय केवल हमारे मंत्रियों ने ही नहीं ले लिया होगा। उन्हों ने इस से पहले सुरक्षा बलों के मुखियाओं और विशेषज्ञों से भी राय की होगी। जब एक बार सुरक्षा बलों को यह जिम्मेदारी दे दी गई तो उन्होंने ऐसी योजना भी बनाई होगी जिस में सुरक्षा बलों के जवानों की कम से कम हानि हो और समस्या पर काबू पाया जाए। तब ऐसा कैसे हो गया कि ऑपरेशन के पहले ही कदम पर पहले प. बंगाल में और दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) में ये घटनाएँ हो गईं?

निश्चित रूप से सुरक्षा बलों के पास नक्सलियों की ताकत और रणनीति का आकलन उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि वे इस भ्रम में थे कि उन पर तो हमला हो ही नहीं सकता। हमला करेंगे तो वे ही करेंगे। वे शायद नक्सलियों, को यह समझ बैठे थे कि वे नगर देहात की निरीह जनता हैं। शायद वे सोच रहे थे कि वे खुद पूरे लवाजमे के साथ जा रहे हैं तो उन का तो कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है। हो सकता है कि उन्हें अपने दिशा निर्देशकों पर भरोसा रहा हो कि उन्हों ने जो निर्देश दिए हैं उन के अनुसार वे सुरक्षित हैं। लेकिन हुआ उस के विपरीत अभियान अपने आरंभिक चरण में ही था कि उन्हें अपना बलिदान देना पडा। निश्चित रूप से इस घटना को केवल यह कह कर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता कि नक्सली बहुत क्रूर औऱ खून के प्यासे हैं। इन जवानों की मौत के लिए उन के दिशानिर्देशक सुरक्षा बलों के अधिकारी, उन के नीति निर्देशकों को अपने ही जवानों के वध की इस जिम्मेदारी से बरी नहीं किया जा सकता। इस आँच से वे राजनेता भी नहीं बच सकते जिन्हों ने नक्सल समस्या से निपटने के लिए ऐसी रणनीति बनाई जिस से पहले ही चरण में उन्हें अपनी भारी हानि उठानी पड़ी है।

निश्चित रूप से यह समस्या केवल कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं है। जनता के सही प्रशासन की समस्या भी है। ग्रीन हंट ऑपरेशन की घोषणा के साथ ही जिन कारणों से नक्सलवाद को पनपने का अवसर मिलता है उन कारणों को समाप्त करने के लिए भी क्या कोई योजना बनाई गई है और क्या उस पर अमल किया गया है? क्या उस के कुछ नतीजे भी सामने आए हैं। ये सभी प्रश्न अनुत्तरित हैं। इन प्रश्नों को अब न केवल उन शहीद जवानों के परिवार जन हमारे राजनेताओं और सुरक्षा बलों के नेतृत्व से पूछेंगे अपितु जनता भी पूछेगी।

ज दिन में जब मैं अदालत में था तो मुझे इस घटना का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था। आज दो मुकदमों में बहस थी जिन में से एक गोपाल नारायण भाटी का मुकदमा भी एक था। वे देश के तीसरे नंबर के औद्योगिक घराने की एक फैक्ट्री में सीनियर इलेक्ट्रिकल सुपरवाइजर थे। उन से जुलाई 1983 में कहा गया कि वे नौकरी से त्यागपत्र दे दें। उन्हों ने नहीं दिया तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। उन्हों ने मुकदमा लड़ा और जुलाई 1992 में उन के मुकदमे का फैसला हो गया और उन्हें फिर से नौकरी पर लेने का आदेश मिला। लेकिन कंपनी ने फैसले की अपील कर दी। जुलाई 2002 में वे उच्चन्यायालय से भी जीत गए। आगे अपील नहीं हुई। उन्हें फिर भी नौकरी पर नहीं लिया गया। नवम्बर 2004 में वे साठ वर्ष के हो गए और सेवानिवृत्ति की उम्र हो गई। अब उन्हें न्यायालय के निर्णय. के अनुसार अपने वेतन आदि की राशि कंपनी से लेनी है जिस की संगणना का मुकदमा चल रहा है। इस मुकदमें में जनवरी 2007 में अंतिम बहस हो जानी चाहिए थी लेकिन किसी न किसी कारण से टलती रही है। हर बार जब किसी कारण से तारीख बदलने लगती है तो भाटी जी आपे से बाहर हो जाते हैं।

ज भी यही हुआ। जज अस्वस्थ थे, उन्होंने तारीख बदलने को कहा और भाटी जी आपे से बाहर हो गए। भाटी जी ने 1983 से ले कर 2010 तक के इस 27 साल के सफर में बहुत दिन देखे हैं। एक बेटा आत्महत्या कर चुका है। दूसरे को मकान गिरवी रख कर वित्तीय संस्था से ऋण लेकर एक छोटा व्यवसाय आरंभ कराया लेकिन बाजार की समझ न होने से उस में हानि उठानी पड़ी और अब वह कहीं नौकरी कर रहा है। मकान वित्तीय संस्था ने कुर्क कर रखा है। वे अदालत से कहते हैं कि वित्तीय संस्था को मुझ से तीन लाख ले ने हैं। मुझे कंपनी से बीस लाख लेने हैं। अदालत तीन लाख काट कर बाकी 17 लाख मुझे दिला दे। पर दोनों अदालतें अलग अलग हैं। एक उन से लेने को और न देने पर मकान बेचने को तैयार बैठी है। तो दूसरी दिला नहीं पा रही है।

भाटी जी संस्कारों से हिन्दू हैं और कांग्रेस व साम्यवाद के विरोधी। उन्हों ने अपने जीवन में या तो जनसंघ को वोट दिया या फिर भाजपा को और जब ये दोनों दल नहीं थे तो एकाध बार जनता पार्टी को। वे आज फिर अदालत में बोलने लगे तो कई बार कहा कि वे हिन्दू हैं इस लिए सहिष्णु हैं। बहुत कुछ कहा उन्हों ने। कंपनी, उद्योगपति, उन के वकील, सरकार, नेता, अदालत और जजों किसी को नहीं बक्शा। लेकिन अंत में यही कहा कि "कंपनी के मालिकों को हक मारने और धन बनाने से मतलब है, नेता और सरकारें उन की गुलाम हैं। न ये सुनते हैं और न अदालतें सुनती है तो कहाँ जाएँ वे, कहाँ जाएँ मजदूर और गरीब लोग? सभी बहरे हो चुके हैं.। इन्हें तो समाप्त ही करना होगा और उस के लिए नक्सल होना पड़ेगा।" यह कोटा है राजस्थान के दक्षिण पूर्व का एक जिला। जहाँ मीलों दूर तक नक्सल आंदोलन की आहट तक नहीं सुनाई देती। यहाँ का प्रशासन और सरकार कभी सोच भी नहीं सकती कि यहाँ कभी नक्सली अपनी जमीन बना पाएँगे। यहाँ वैसे जंगल और आदिवासी भी नहीं हैं, जिन में उन की पैठ बन सकती हो। लेकिन यदि जनता को न्याय समय पर नहीं मिला तो क्या उस की सोच क्या वैसी ही नहीं बनेगी जैसी भाटी जी की बनने लगी

दिनेश राय द्विवेदी जी के ब्लाग अनवरत से साभार…शीर्षक हमारा

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

चीन और अमेरिका की जुगलबंदी पर अरुण माहेश्वरी


अमेरिका–चीन संबंधों पर कुछ और



‘मंथली रिव्यू’ में प्रकाशित एरिक हाब्सवाम के साक्षात्कार में आज की दुनिया के प्रमुख रूझानों के संदर्भ में अमेरिका और चीन के बीच के संबंधों का जो जिक्र किया गया है, (जिसकी चर्चा इसी स्तंभ के अन्तर्गत हम पिछली बार कर आये हैं) उस पर यहां थोड़े और विस्तार से बात करना हर लिहाज से जरूरी और समीचीन जान पड़ता है।

सरसरी तौर पर यह साफ दिखाई देता है कि चीन और अमेरिका की अर्थ–व्यवस्थाएं आपस में पूरी तरह से गुथ गयी है। चीन का विकास उसके निर्यात पर निर्भर है और उसके निर्यात का काफी बड़ा हिस्सा अमेरिका जाता है। 2001 में चीन का निर्यात उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 20 प्रतिशत था, जो 2007 तक बढ़ कर 36 प्रतिशत होगया। देशों के समूह के तौर पर निश्चित तौर पर यूरोपियन यूनियन उसके मालों का सबसे बड़ा ग्राहक है, लेकिन अकेले एक ग्राहक के रूप में अमेरिका का ही स्थान अव्वल है। इसके अलावा, अमेरिका को आपूर्ति करने वाले देशों में कुछ अर्से पहले तक कनाडा सबसे आगे था, लेकिन अब उसका स्थान चीन ले चुका है। चीन ही आज अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों का सबसे बड़ा खरीदार और मालिक है। पहले यह स्थान जापान को प्राप्त था। 2008 के बाद से चीन अब उससे आगे चला गया है। हाल के अमेरिकी संकट में अगर किसी देश ने अमेरिका के लिये सबसे बड़े त्राणदाता की भूमिका अदा की तो वह चीन ही था। अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये चीन अमेरिका को ऋण देने वाला आज सबसे बड़ा देश बन चुका है।

चीन और अमेरिका के संबंधों को लेकर अभी जिसप्रकार का चित्र बनता है, उसमें लगता है जैसे अमेरिका चीन में बने सामानों को खरीद रहा है और चीन अमेरिका की सरकारी प्रतिभूतियों को। एक विकासशील देश चीन एक धनी देश अमेरिका को खर्च करने के लिये उधार दे रहा है। इसके एवज में अमेरिका चीन में बने सामानों को खरीद कर उधार में आए डालर को फिर से चीन को सौंप देता है और यही डालर फिर कर्ज के तौर पर अमेरिका के पास आ जाता है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश है और चीन सबसे बड़ा कर्जदाता। सवाल उठता है कि क्या ऐसी कोई चीज लंबे समय तक चल सकती है? साधारण बुद्धि से सोचने पर यह सारा मामला कुछ अजीब सा, उटपटांग जान पड़ता है। ओबामा के आर्थिक सलाहकार लारेंस समर्स ने किसी समय अमेरिका और उसके विदेशी कर्जदाताओं के संबंधों को ‘वित्तीय आतंक का संतुलन’ कह कर परिभाषित किया था। चीन का प्रमुख अंग्रेजी सरकारी दैनिक ‘पिपुल्स डेली’ लिखता है कि चीन के हाथ में भारी मात्रा में अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों के होने का अर्थ यह है कि वह कभी भी डालर की एक आरक्षित मुद्रा की हैसियत को खत्म कर सकता है। लेकिन साथ ही वह यह कहने से भी नहीं चूकता कि यह स्थिति ‘वस्तुत: निश्चित परस्पर विनाश पर आधारित शीत युद्धकालीन गतिरोध का विदेशी मुद्रा संस्करण है।‘ अर्थात, दोनों ही यह मान कर चल रहे हैं कि जो आज चल रहा है, उसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। दूसरा विकल्प सिर्फ परस्पर विनाश है।

चीन अमेरिका संबंधों के इस जटिल और अबूझ से रूप को देखकर ही अब कुछ ‘भविष्यद्रष्टा’ इन दोनों अर्थव्यवस्थाओं की परस्पर–निर्भरशीलता के बजाय इनकी अनिवार्य जुदाई की बात भी कहने लग गये हैं। हार्वर्ड के प्रसिद्ध इतिहासकार नियाल फगु‍र्सन एक समय में जिस चीज को चिमेरिका कह कर प्रचारित कर रहे थे, वे ही अब इसे एक ऐसा विवाह बंधन बताने लगे हैं जिसका अंत विछोह के अलावा और कुछ नहीं हो सकता।



इसी सिलसिले में चीन और अमेरिका के बीच चीनी मुद्रा युआन के विनिमय मूल्य को लेकर इधर जो थोड़ी नोक–झोंक चल रही है, उसकी तह में जाना काफी उपयोगी होगा। यह बात जग जाहिर है कि चीन और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन काफी अधिक बिगड़ा हुआ है। चीन के साथ अमेरिका के व्यापार घाटे में पिछले दिसंबर महीने में 18.14 बिलियन अमेरिकी डालर की वृद्धि हुई, जबकि इस जनवरी महीने में यह वृद्धि 18.3 बिलियन डालर हुई। अमेरिका इसके लिये अक्सर चीन को कोसता है कि उसने अपनी मुद्रा युआन की विनिमय दर को कृत्रिम ढंग से काफी कम कर रखा है, जिसकी वजह से अमेरिकी बाजार में चीनी सामानों को अनुचित लाभ मिल रहा है और अमेरिका का चीन के साथ व्यापारिक घाटा बढ़ता जा रहा है।

12 मार्च को राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी निर्यात–आयात बैंक के वार्षिक सम्मेलन में अमेरिका के बढ़ते हुए व्यापार घाटे के संदर्भ में जोर देकर कहा कि फिर से व्यापार संतुलन को कायम करने में चीनी मुद्रा युआन की विनिमय दर को बाजार पर आधारित किया जाना एक महत्वपूर्ण कदम होगा। ओबामा के इस वक्तव्य के दूसरे दिन ही चीन के केंद्रीय बैंक, पिपुल्स बैंक आफ चायना के उप–राज्यपाल सू निंग ने उन्हें तुर्की दर तुर्की जवाब देते हुए कहा कि युआन के मूल्य के प्रश्न का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। युआन की विनिमय दर को बढ़ाना चीन और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन की समस्या का समाधान नहीं है। सू निंग की दलील थी कि सन् 2005 के जून महीने में डालर के दामों को अस्थिर कर दिये जाने के बाद से युआन की दर 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ गयी है। 2002 से लेकर 2008 के बीच अमेरिकी डालर की कीमत सालाना तीन प्रतिशत की दर से कम हुई थी। लेकिन इसी दौरान अमेरिकी व्यापार घाटा 500 बिलियन डालर से बढ़ कर 900 बिलियन डालर होगया। अर्थात, डालर के कमजोर होने से अमेरिकी घाटे में कोई कमी नहीं आयी है।





इसी सिलसिले में निंग ने अमेरिका के इस व्यापार घाटे के दूसरे रहस्यों पर से पर्दा उठाते हुए जिन तथ्यों का उल्लेख किया, वे चीन और अमेरिका के बीच के व्यापार की वास्तविकता और इन दोनों अर्थ–व्यवस्थाओं के संबंधों को जानने की दृष्टि से महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि चीन के पक्ष में व्यापार संतुलन का अर्थ सिर्फ चीन की अर्थ–व्यवस्था को लाभ नहीं समझा जाना चाहिए। सचाई यह है कि चीन के अधिकांश निर्यातकों में विदेशी पूंजी लगी हुई है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष चीन के विदेश व्यापार में निवेश का 55.2 प्रतिशत विदेशी है और 56 प्रतिशत निर्यात चीन में स्थित विदेशी कंपनियों ने किया है। चीन को इस व्यापार से जो मामूली मुनाफा होता है उसका अधिकांश विनिर्माण की श्रंखला के अंतिम चरण से आता है। जबकि, अमेरिका खुद उत्पाद की डिजाइन और उसके वितरण से अच्छा खासा मुनाफा ले लेता है। इस बात को ठोस उदाहरण से समझने के लिये कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता की इस रिपोर्ट पर गौर किया जा सकता है, जिसके अनुसार एक 30 गिगाबाईट के विडियो आईपॉड पर 299 अमेरिकी डालर की लागत में से 163 डालर अमेरिकी कंपनियों और मजदूरों को मिलते हैं, तथा 132 डालर दूसरे एशियाई देशों के कलपुर्जे निर्माताओं को, जबकि चीन में, जहां उसे अंतिम रूप से तैयार किया जाता है, इसका सिर्फ 4 डालर भुगतान किया जाता है। चीन के मजदूरों द्वारा आईपॉड के निर्माण में सिर्फ एक प्रतिशत का योगदान किये जाने पर भी चीन से अमेरिका को होने वाले निर्यात में इसके चलते 150 डालर का योगदान होता है, अर्थात चीन–अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन में एक आईपॉड 150 डालर का योगदान करता है।

इसीलिये आज भी चीन और अमेरिका की अर्थ–व्यवस्था को बराबरी के दर्जे पर रखना एक बड़ा भ्रम है। बाजार विनिमय दरों के आधार पर चीन की अर्थ–व्यवस्था अभी भी अमेरिका से एक तिहाई है। उसका प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन अमेरिका के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन का चौदहवां हिस्सा भर है। अमेरिका का प्रतिरक्षा बजट चीन से छ: गुना है। जहां तक सरकारी प्रतिभूतियों का सवाल है, चीन के लिये यह संभव नहीं है कि वह उसे बाजार में छोड़ सके। डालर की कीमत के गिरने से सबसे अधिक नुकसान चीन को ही होगा। इसीलिये जो लोग आज दोनों को बराबर के वजन वाला बताकर जी 2 की बात करते हैं, वह सच से कोसों दूर, कुछ खास गरज से एक राजनीतिक भ्रम फैलाने की बात के अलावा और कुछ नहीं है। और यही वह बिंदु है जिसकी ओर इशारा करना यहां हमारा अभीष्ट है।



उपरोक्त विश्लेषण से एक बात साफ है कि चीन की अर्थ–व्यवस्था के लिये निर्यात में अभिवृद्धि महत्वपूर्ण होने पर भी उतनी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है जितनी आम तौर पर समझी जाती है। निर्यात की राशि में चीन के द्वारा जोड़े गये मूल्य का अंश उसके जीडीपी का बहुत छोटा सा हिस्सा है। अमेरिका में खपने वाले अधिकांश मालों का ज्यादातर हिस्सा अन्य स्थानों पर निर्मित होता है। युआन के विनिमय मूल्य पर नियंत्रण और डालर से अमेरिकी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये वह अपने निर्यातकों की मदद करता है। बदले में अमेरिका में ब्याज की दर नियंत्रित रहती है और अमेरिकी उपभोक्ता की खर्च की आदत बनी रहती है। लेकिन, मूल सचाई यह है कि चीन के विकास की असली चालक शक्ति वहां होने वाला निवेश ही है।

इस समूचे उपक्रम में जिस बात पर नजर रखने की जरूरत है वह है चीन और अमेरिका के बीच विकसित की जा रही एक प्रकार की रणनीतिक समझ और साझेदारी। चीन आज की दुनिया में पूंजीवाद के बरक्स सोवियत संघ की तरह कोई समाजवादी विकल्प नहीं पेश कर रहा है। दुनिया के गरीब और विकासशील देश उससे कोई विशेष उम्मीद नहीं रख पारहे हैं। चीनी विशिष्टता वाला समाजवाद अमेरिकी विशिष्टता वाला पूंजीवाद जैसा प्रतीत हो रहा है– इस बात को कहने वालों की कमी नहीं है। अमेरिकी सरकार की हरचंद कोशिश इस बात की है कि कैसे चीन को अपनी समग्र विश्व रणनीति का अंशीदार बनाया जाए। अमेरिकी पत्र–पत्रिकाओं में चीन की सारी लानत–मलामत के बाद भी पूरा जोर इस बात पर रहता है कि जलवायु परिवर्तन से लेकर आर्थिक पुनर्बहाली तक, सभी मामलों में दुनिया के इन दोनों देशों के बीच एक प्रकार का सामंजस्य कायम हों। चीन और अमेरिका की बराबरी की बात कहने वालों के बारे में अमेरिका के पूर्व ट्रेजरी अधिकारी अलबर्ट कीडेल कहते हैं कि दोनों अर्थ–व्यवस्थाओं में बराबरी करने का कोई तुक नहीं है, फिर भी ‘चीन को यह जताने के लिये कि वह हमारा भागीदार है और इसीलिये उसकी कुछ जिम्मेदारियां है, और हम जिस चीज को महत्वपूर्ण समझते हैं, उसे उस बात को सुनना चाहिए, इस बात में कुछ सार है।‘



ओबामा ने इसी बीच चीन के साथ हाथ मिलाने के लिये रणनीतिगत और आर्थिक संवाद का एक सालाना मंच बनाया है, जिसकी पहली बैठक वाशिंगटन में पिछले जुलाई महीने में हुई थी। इस मंच का मूल उद्देश्य यह है कि दोनों देशों के प्रमुख नीति निर्धारक आपस में मिले और उनके सामने जो समस्याएं है उनपर बात करें। ओबामा के शब्दों में, इसप्रकार के प्रयोग को निरर्थक नहीं समझा जाना चाहिए।

भ्रम को बनाये रखने के लिये अमेरिकी पत्रिकाएं यह जरूर कहती है कि चीन और अमेरिका हमबिस्तर होकर भी अलग–अलग सपने देखते हैं। शासन की किसकी प्रणाली ज्यादा सही और कारगर है, इसकी प्रतिद्वंद्विता में वे लगे हुए है। लगभग तीन दशक से भी ज्यादा समय पहले जब देंग ज्याओ पिंग ने चार आधुनिकीकरण के नारे के साथ चीन के तीव्र विकास की एक समग्र नीति अपनायी थी, तभी उन्होंने यह भी कहा था कि चीन को विकसित देश बनाने की प्रक्रिया में चीन समाजवादी रहेगा या पूंजीवादी, यह बात आने वाले पचास वर्षों बाद ही तय होगी। विश्व रणनीति की सही समझ को विकसित करने के लिये चीन और अमेरिका के बीच इस निरंतर विकासमान घटना–चक्र पर नजर रखने की जरूरत है।
  • अरुण माहेश्वरी