दिल्ली के चुनावों में अप्रत्याशित सफलता और
चुनाव के बाद के समीकरणों के सहारे सत्ता तक पहुँचने के बाद आम आदमी पार्टी और
उसके नेता अरविन्द केजरीवाल को लेकर चर्चाएँ
स्वाभाविक रूप से ज़ारी हैं. भ्रष्टाचार के विरोध तथा जन लोकपाल के समर्थन
में शुरु हुए आन्दोलन से लेकर राजनीतिक दल के रूप में मुख्यधारा की पार्टियों के
एक विकल्प के रूप में उनके उभार ने आगामी लोकसभा चुनावों के समीकरणों को बुरी तरह
से प्रभावित किया है. एक ओर दस साल से सत्ताशीन कांग्रेस पार्टी की उम्मीदों को
हालिया विधानसभा चुनावों ने बड़ा धक्का लगाया है तो दूसरी तरफ लकड़ी के लाल किले से
असली वाले तक के सफ़र के लिए बेक़रार नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भी इस नए उभार के
असर को पूरी तरह से समझ नहीं पा रही और कभी कांग्रेस के खिलाफ़ लगने वाले इस
आन्दोलन का सहयोग और समर्थन करने वाला संघ गिरोह अब इसे कभी एन जी ओ वादी से लेकर
माओवादी बता रहा है तो कभी कांग्रेस से अंदरखाने के गठबंधन का आरोप लगा रहा है.
क्षेत्रीय छत्रप अभी भी विभ्रम की सी स्थिति में हैं. यह संकट वाम दलों के भीतर भी
है. एक तरफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात इसे गैर
बीजेपी-गैर कांग्रेस दलों का हिस्सा बताते हुए तीसरे मोर्चे के लिए ज़रूरी बता रहे
हैं तो दूसरी तरफ वाम बुद्धिजीवियों का एक बड़ा हिस्सा इनकी जबरदस्त आलोचना में लगा
है. इसके अलावा खासतौर पर वाम दलों के हमदर्द लोगों का एक बड़ा हिस्सा इस उभार को
इस रूप में सकारात्मक मान रहा है कि ‘इन्कलाब तो जब होगा तब होगा, अभी
कम से कम साम्प्रदायिक भाजपा और भ्रष्ट कांग्रेस का एक विकल्प तो मिला जो अपने
आउटलुक में जनपक्षधर और आम आदमी जैसा दिखता है.’
यही नहीं तमाम लोगों को ऐसा
लग रहा है कि केजरीवाल मोदी के उस रथ को रोकने में सक्षम हो सकते हैं जो कर पाना
अभी अनुपस्थित तीसरे मोर्चे या कांग्रेस के लिए मुश्किल लग रहा था.
देखा जाय तो जिस दौर में जन लोकपाल का आन्दोलन
अन्ना के नेतृत्व में शुरू हुआ था,
उस समय कमोबेश सभी
संसदीय वाम दलों ने इस आन्दोलन का समर्थन
किया था और माले तथा इसकी छात्र इकाई आइसा ने तो इसमें सक्रिय हिस्सेदारी भी की थी
और इस पूरे आन्दोलन में हुए इकलौते लाठीचार्ज को इसी संगठन के साथियों ने झेला था.
जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने उस दौर में लिखे अपने एक लेख में (जो तीन क़िस्तों में मृत्युबोध
नामक ब्लॉग और जसम की पत्रिका ‘समकालीन जनमत’
में प्रकाशित हुआ) लिखा था– “अमेरिका
से बेहतर कोई नही जानता कि यह आन्दोलन महज़ लोकतंत्र के किसी बाहरी आवरण तक सीमित
नहीं, बल्कि इसमें एक साम्राज्यवाद विरोधी संभावना
है...आईडेंटिटी पालिटिक्स के दूसरे भी कई अलंबरदार इस आन्दोलन को ख़ास जाति समूहों
का आन्दोलन बता रहे हैं. पहले अनशन के समय रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबी कुछ
पत्रकार इसे वाणी दे रहे थे. अभी कल हमारे मित्र चंद्रभान प्रसाद इसे सवर्ण
आन्दोलन बता रहे थे एक चैनल पर. यह वही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने आज की बसपाई
राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग यानी ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का सैद्धांतिक आधार
प्रस्तुत करते हुए काफी पहले ही यह प्रतिपादित किया था कि पिछड़ा वर्ग आक्रामक है, लिहाजा
रक्षात्मक हो रहे सवर्णों के साथ दलितों की एकता स्वाभाविक है. यह यही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने गुजरात
जनसंहार में पिछड़ों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताते हुए इन्हें हूणों का वंशज
बताया था. अब सवर्णों के साथ दलित एकता के इस 'महान' प्रवर्तक
को यह आन्दोलन कैसे नकारात्मक अर्थों में महज सवर्ण दिख रहा है? वफ़ा सरकार और कांग्रेस के प्रति जरूर निभाएं
चंद्रभान, लेकिन इस विडम्बना का क्या करेंगें कि मायावती
ने अन्ना का समर्थन कर डाला है.” आश्चर्यजनक तौर पर बाद के दौर में जब किरण
बेदी, जेनरल वी के सिंह और रामदेव जैसे लोग अरविन्द केजरीवाल से दूर हो गए और
उन्होंने राजनीतिक दल बनाने के बाद न केवल कांग्रेस और भाजपा दोनों पर सामान रूप
से हमला बोला बल्कि अपने घोषणापत्र में आरक्षण के समर्थन में स्पष्ट घोषणा की तो
धीरे धीरे माले न इस मुद्दे पर एक चुप्पी सी बना ली. जबकि सबसे स्वाभाविक तो यह होता कि अपनी नीति को ज़ारी
रखते हुए ये दल आप के सक्रीय सहभागी की तरह सामने आते और चुनाव में भी गठबंधन
करते. खैर, इसकी वज़ह क्या रही यह बता पाना मुश्किल है.
आप के उभार को एक तरफ़ यह साफ़ हो
गया है कि जनता तथाकथित मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का विकल्प चाहती है तो दूसरी
तरफ यह भी कि नब्बे के दशक के बाद लागू नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणाम अब जब
सामने आने लगे हैं तो विकास के बड़े बड़े दावों के बीच जनता की असली ज़रूरतें अब भी वही
हैं. साफ़ पानी, सस्ती बिज़ली, रहने को घर और सस्ता अनाज जैसी चीजें मुहैया कराने
में असफल रहा विकास जनता नकार रही है यह कहना तो अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन यह तो
कहा ही जा सकता है इनके बिना वह किसी विकास माडल को स्वीकार करने को तैयार नहीं.
आप जैसी पार्टी ने एक ओर तो बड़ी पार्टियों के दम्भ और हर चुनाव में दुहराए जाने
वाले बासी वायदों के समक्ष आम आदमी वाली छवि सामने रखी तो दूसरी तरफ सबको प्रभावित
करने वाले भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को सामने रख जनता को ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध
कराने का जो वादा किया वह जनता के लिए अधिक विश्वसनीय और आश्वस्तिकारक था. हालाँकि
विचारधाराहीनता की जो नीति उन्होंने अपनाई है उसको तुरत तो जनता ने तवज्जो नहीं
दिया है लेकिन सस्ती बिज़ली जैसी नीतियाँ लागू करते समय कार्पोरेट्स के हितों से जो
स्पष्ट टकराव होगा उस समय ‘आप’ के लिए तटस्थता की यह नीति अपना पाना मुमकिन न होगा
और देखना होगा कि वह अपना पक्ष कैसे चुनती है.
यहाँ यह सवाल भी बार बार उठाया जा रहा है कि
वाम दल, जिनकी जनपक्षधरता असंदिग्ध है और जो जनता के पक्ष में कारपोरेटपरस्त
नीतियों के खिलाफ़ लगातार संघर्ष करते रहे हैं, वे जनता के समक्ष खुद को विकल्प के
रूप में प्रस्तुत क्यों नहीं कर पाए? आज तमाम लोग न केवल यह सवाल कर रहे हैं बल्कि
आप के उदाहरण से भारत के संसदीय वाम की आलोचना भी कर रहे हैं.
तात्कालिकता से प्रभावित हो कोई अंतिम सत्य
कहने के भ्रम पालने से बेहतर होगा कि इस पर थोड़ी देर रुक कर सोचा जाए. क्या आप
जैसी कार्यवाही वाम दल कर सकते थे और वैसी ही सफलता हासिल कर सकते थे? क्या आप वाम
दलों जैसा ही दल है? क्या आप की यह सफलता हर हाल में दीर्घजीवी है?
उदाहरण के लिए आप के आन्दोलन की मीडिया कवरेज़
को लिया जा सकता है. अखबारों और चैनलों की दुनिया से परिचित लोग जानते हैं कि वाम
दलों से जुड़ी ख़बरों को बाक़ायदा ब्लैक आउट करने के निर्देश वाले चैनलों और अखबारों
ने किस तरह पहले दिन से इस आन्दोलन को बढ़ा चढ़ा के कवर किया था. कारण स्पष्ट है.
जहाँ वाम दल उन नीतियों का ही विरोध करते हैं जो कार्पोरेट्स की लूट को संवैधानिक
स्वीकृति देते हैं, अन्ना का आन्दोलन या फिर अब केजरीवाल की पार्टी संविधान द्वारा
स्वीकृत नीतियों को ही पूरी ईमानदारी से लागू कराने की बात करते हैं. इनमें किसी
आमूलचूल परिवर्तन की कोई बात होने की जगह इसी व्यवस्था को थोड़ा और सहनीय बनाने की
कोशिश है जो अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में जनता को ही नहीं कार्पोरेट्स के एक
बड़े हिस्से को भी बेहतर लगती हैं. ईमानदार सरकारी तंत्र और कारपोरेट सहयोगी सरकारी
नीतियों का जोड़ा लूट के तंत्र को बनाए रखने का सबसे सहज तरीक़ा है जिसके तहत
बाक़ायदा सरकारी पुलिस हड़ताली मज़दूरों को गिरफ्तार करती है और मालिकान को सुरक्षा देती है तथा न्यायालय हड़ताल को ग़ैरकानूनी घोषित करते हैं. ज़ाहिर है उन्हीं मज़दूरों को
नेतृत्व देने वाले दल न मालिकान की पसंद हो सकते हैं न ही उनके अखबारों या चैनलों
के तो जो इमेज बिल्डिंग का पूरा तंत्र है वह उन्हें कभी वह जगह नहीं दे सकता है जो
आप या ऐसे किसी अन्य दल को.
ऐसे में आप या उसकी कार्यविधि से वाम दलों की
तुलना उचित नहीं होगी. लेकिन सारा ठीकरा कार्पोरेट्स के सर फोड़कर निकल लेना जनता
की चेतना के ऊपर अविश्वास तो है ही साथ ही अपनी कमियों को नज़रअन्दाज़ करना भी है.
आख़िर जिन कार्पोरेट्स के खिलाफ़ वाम दल आवाज़ उठाते रहे हैं, उनसे सहयोग की उम्मीद
भी कैसे और क्यों की जानी चाहिए? उन्हें तो अपना रास्ता ख़ुद बनाना होगा और यदि
नहीं बना पा रहे तो यह सही समय है जब अपनी नीतियों और तरीकों पर गंभीर पुनर्विचार
करना होगा. वाम दल गिमिक्स के भरोसे सत्ता में नहीं आ सकते. उनका इकलौता सहारा वह
जनता है जिसकी रहनुमाई का वे दावा कर सकते हैं. यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि उस
जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता लगातार कम हुई है और उपस्थिति भी. जिन इंडस्ट्रीज़ से
ट्रेड यूनियनें आती थी अर्थव्यवस्था के भीतर उनका प्रभाव कम होने के साथ साथ वे
ट्रेड यूनियनें, जो पहले ही अर्थवाद में फंस कर अपनी वैचारिक धार खो चुकी थीं, अब
लगभग निष्क्रिय और निष्प्रभावी हो चुकीं हैं. नब्बे के बाद प्रभावी हुए उद्योगों
में यूनियने बनाना बेहद मुश्किल हुआ है और वहाँ वाम दलों की यूनियनें लगभग
अनुपस्थित हैं. छात्र मोर्चे पर भी एस ऍफ़ आई और ए आई एस ऍफ़ जैसे संगठन ज़्यादातर
जगहों पर अनुपस्थित हैं तो आइसा की उपस्थिति भी सीमित ही है. यहाँ भी जिन नए तरह
के शैक्षणिक संस्थानों (प्रबंधन, इंजीनियरिंग आदि) में बहुतायत छात्र जा रहे हैं,
वहाँ छात्र राजनीति की कार्यवाहियाँ नामुमकिन हैं. शोषण के सबसे प्रमुख केंद्र बन
चुके गाँवों में वाम दलों के संगठन दिखाई नहीं देते तो कम से कम उत्तर भारत के
कस्बों और छोटे शहरों में भी उनकी उपस्थिति हद से हद नाममात्र की है. ऐसे में उनकी
किसी आमूलचूल परिवर्तनकारी भूमिका में उभरने की संभावना कहाँ दिखाई देती है? आप
जैसा मध्यवर्गीय तथा ‘विचारधाराहीन’ दल अपने लोक लुभावन नारों के साथ दिल्ली में
उभर कर देश भर में चर्चित हो सकता है. वह ‘ऊपर से नीचे’ की यात्रा कर सकता है.
लेकिन मज़दूरों, ग़रीबों, गावों और परिवर्तन की बात करने वाले वाम दलों के लिए यह
संभव नहीं, उन्हें हर हाल में नीचे से ऊपर की यात्रा करनी होगी. जो कहीं अधिक
मुश्किल भी है और कहीं अधिक काँटों से भरी भी. वह धारा के विपरीत तैरने जैसा है,
लेकिन उसका कोई विकल्प भी नहीं. जनता किसी के पास उसका मैनिफेस्टो पढ़कर नहीं आती,
उस वटवृक्ष को हिलाने की ताक़त परिवर्तनकामी शक्तियों को खुद जुटानी होती है और आमूलचूल
परिवर्तनों का कोई शार्टकट नहीं होता.
इसीलिए ‘आप’ के उभार को लेकर उसके अति-उत्साहपूर्ण
स्वागत या फिर उतनी ही तीव्रता से आलोचना की जगह वाम ताक़तों को अब पूरी गंभीरता से
विकल्पहीनता की इस स्थिति में, जहाँ पर आप जैसे भ्रम भी जनता को बहुत दिनों तक
बहला नहीं पायेंगे या फिर जनता के पक्ष में खड़े हुए तो शनैः शनैः वाम के करीब
आएँगे, उन्हें नीचे से ऊपर की तरफ उठते हुए मज़लूम जनता को गोलबंद कर लम्बी और
फैसलाकुन लड़ाई में उतरना चाहिए. शार्टकट तो इसका नहीं होगा लेकिन जनता उस दीर्घ
काल तक भी प्रतीक्षा नहीं करेगी जिसके बारे में स्मिथ ने कहा था कि ‘दीर्घ काल में
हम सब मर जाते हैं.’











