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शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

यह चुप्पी इरोम की नहीं, लोकतंत्र की हार है!


इरोम शर्मिला के अनशन के बारह साल पूरे होने पर (२.११.२०००- २.११.२०१२)




·         


मणिपुर में सरकारी अस्पताल में जबरन नलियों के सहारे दिए जा रहे भोजन के भरोसे चलती साँसों, क्षीण काया और अपनी अदम्य जीजिविषा की प्रतीक मुस्कराहट ओढ़े इरोम शर्मिला की तस्वीर भारत के महान लोकतंत्र और जगमगाती अर्थव्यवस्था के चहरे पर एक गहरे प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह दिखाई देती है. बारह वर्षों से अपनी ज़िद और मणिपुर की जनता के प्रति अपने अगाध स्नेह तथा भारतीय सेना के सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून (AFSPA)  के तहत ज़ारी अमानवीय दमन के खिलाफ़ वह अनशन पर हैं. लेकिन दिल्ली के रामलीला मैदानों पर ज़ारी अनशनों से पिघल जाने वाली सरकारें हों या उबल जाने वाली मीडिया या फिर मचल जाने वाला हमारा ‘ग्रेट इन्डियन मिडल क्लास’, इस एक दशक के व्रत के दौरान उसने अक्सर चुप रहकर नज़रअंदाज करने का विकल्प ही चुना है. उत्तरपूर्व हो की कश्मीर या अन्य उत्पीड़ित राष्ट्रीयताएँ, भारतीय मुख्यधारा की रूचि बस ‘अविभाज्य अंग’ होने तक ही सीमित है और सारी सक्रियता इस अविभाज्यता को एन-केन प्रकारेण बचाए रखने तक. उन अभिशप्त हिस्सों के नागरिकों के दुःख-दर्द, उनकी मानवीय इच्छायें तथा लोकतांत्रिक आकांक्षायें और उनकी आवाज़ भारतीय शासक वर्ग की चिंताओं का हिस्सा कभी नहीं बन पाते.

डेढ़ सौ सालों के लम्बे औपनिवेशिक शासन में अंग्रेजी हुकूमत से इस महाद्वीप की उत्पीड़ित जनता के हर हिस्से ने तीखी लड़ाई लड़ी थी. सूदूर उत्तर-पूर्व में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ़ लंबा और फैसलाकुन संघर्ष चला था. अंग्रेजी शासन के पहले स्वतंत्र रहे इन राज्यों ने आज़ादी के बाद एक लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण, सेकुलर और समतामूलक समाज के निर्माण के स्वप्न के साथ भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा बनना स्वीकार किया था. आज़ादी उनके लिए उन स्वप्नों को साकार होता देख पाने के अवसर के रूप में आई थी. कश्मीर में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाले नेशनल कांफ्रेंस ने कश्मीर के तात्कालिक डोगरा शासक हरि सिंह के स्वतंत्र राज्य बनाये रखने के और मीर वायज के बरक्स एक लोकतांत्रिक और सेकुलर स्टेट बनाने के पक्ष में आन्दोलन चलाया और इसी आकांक्षा के साथ भारतीय राज्य को पाकिस्तान के सामंती राज्य की जगह चुना. यहाँ यह बता देना उचित ही होगा की ठीक इसी समय मुस्लिम और हिन्दू कट्टरपंथी राजा के साथ सहयोग कर रहे थे. यह किस्सा कई अलग-अलग पूर्व रियासतों में दुहराया गया, लेकिन जनता की ताकतों ने अपना पक्ष बेहतरी के लिए चुना और उसके लिए बलिदान भी दिए.

यह लेख युवा संवाद के ताजा अंक में भी छपा है 
खैर, बात मणिपुर की हो रही थी और मणिपुर का कई दूसरे उत्तर-पूर्वी राज्यों की ही तरह थोड़ा अलग किस्सा है. मणिपुर अपने इतिहास में कभी भी भारतीय केन्द्रीय शासन व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहा. चाहे वह मुगलों का राज्य हो, या उसके पहले सम्राट अशोक या चन्द्रगुप्त का समय, यह क्षेत्र हमेशा एक स्वतन्त्र राज्य रहा. 1891 में अंग्रजी प्रभुत्व में आने के बाद यह औपनिवेशिक भारत का हिस्सा बना. १९४२ में द्वितीय विश्वयुद्ध में यहाँ के तत्कालीन राजा बोधचंद्र ने युद्ध में अंग्रेजों का साथ देने का आह्वान किया और फरवरी १९४२ में नेताजी सुभास चन्द्र बोस की आजाद हिंद फ़ौज ने इम्फाल पर भयावह बमबारी के बाद कब्जा कर लिया. इस बमबारी में राज्य के लगभग सभी प्रमुख प्रशासक तथा व्यापारी मारे गए और पूरा इम्फाल वीरान हो गया. भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में पहली बार जनरल मलिक ने यहाँ आज़ाद हिंद फ़ौज का झंडा फहराया. युद्ध के बाद राजा और दूसरे लोग लौटे तो लेकिन यहाँ लोकतंत्र की मांग शुरू हो चुकी थी. राजा ने नया संविधान बनवाया और अपने एक भाई को प्रधानमन्त्री नियुक्त किया. भारत की आजादी के बाद उन्होंने यहाँ चुनाव की घोषणा की और उस चुनाव में अन्य पार्टियों के अलावा कांग्रेस पार्टी ने भी हिस्सा लिया. प्रजा शान्ति और कृषक सभा की सरकार चुनी गयी तथा राजा के भाई का मुख्यमंत्री बनना तय हुआ. लेकिन इसी बीच राजा को शिलांग बुलाया गया और अगर उनकी माने तो बन्दूक की नोंक पर उनसे भारतीय राज्य में विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिए गए. एक साल के भीतर ही जब इस नयी सरकार को सत्ता सौंपने की तैयारी चल रही थी तो इसे भंग कर दिया गया और रावल अमर सिंह मणिपुर के पहले भारतीय चीफ कमिश्नर बनाए गए. १९५६ में इसे एक केंद्र शासित प्रदेश का दर्ज़ा दिया गया और बाद में १९७२ में पूर्ण राज्य का. मणिपुर में अलगाववादी आन्दोलनों का इतिहास भारतीय राज्य में उसके विलय जितना ही पुराना है.

इस अलगाववादी आन्दोलन के बावजूद १९७८ तक इसका राज्य में कोई बड़ा आधार नहीं था. लेकिन भारतीय राज्य में विलय के साथ ही १९५८ में बने ‘सशस्त्र सेना विशेषाधिकार नियम’ के तहत मणिपुर में सेना की तैनाती और राज्य की आकांक्षाओं के अनुरूप विकास कार्यों को संपन्न करा सकने की अक्षमता ने इस राज्य में अलगाववादी आन्दोलन के लिए खाद-पानी का काम किया. भारतीय राज्य में जबरन विलय को लेकर जो असंतोष था वह अकूत अधिकार प्राप्त सेना के दमन के चलते और तेज़ी से फैला तथा स्वतन्त्र मणिपुर राज्य की मांग को लेकर अलग-अलग तरह के तमाम आन्दोलन मणिपुर में फ़ैल गए. चार मार्च, २०१२ में ज़ारी अपनी एक रिपोर्ट में ह्यूमन राईट वाच संस्था का स्पष्ट मानना है की मणिपुर में फैले आतंकवाद के पीछे सेना का दमन है. जैसे-जैसे अलगाववादी आन्दोलन जड़ पकड़ते गए यह दमन बढ़ता ही गया और बच्चे, बूढ़े, औरतें सब इसकी जद में आते चले गए.

ऐसी ही एक घटना में बस स्टाप पर प्रतीक्षा कर रहे दस लोगों की ह्त्या के विरोध में उस वक़्त एक मानवाधिकार समूह ‘ह्यूमन राइट्स एलर्ट’ में काम कर रही तथा कवियत्री इरोम ने अपना अनशन शुरू किया था. उस घटना के बाद एक कागज़ पर उन्होंने लिखा – शांति का स्रोत क्या है और इसका अंत क्या है? अगले दिन अपनी माँ के हाथों पकाया भोजन खाने के बाद वह अनशन पर बैठ गयीं. यह इस दमन के प्रतिरोध का गांधीवादी तरीका था. उनकी मांग स्पष्ट थी – सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून को वापस लिया जाय. ज़िद ऐसी की उन्होंने दांत साफ़ करने के लिए भी रूई का सहारा लिया ताकि पानी की एक बूँद भी शरीर में न जाए. लेकिन उसकी इस ज़िद का सम्मान करने तथा उनसे बात करने की जगह  अनशन शुरू करने के अगले ही दिन, तीन नवम्बर २००० को मणिपुर पुलिस ने उन्हें आत्महत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और तब से अब तक इसी क़ानून के तहत बिना किसी पेशी या मुक़दमे के उन्हें गिरफ्तारी में रखा गया है. ज्ञातव्य है की इस आरोप में किसी को भी एक साल से अधिक गिरफ्तार नहीं रखा जा सकता.

आज उनके अनशन के बारह साल पूरा हो जाने पर भी कहीं कोई हलचल दिखाई नहीं देती. इसे क्या कहा जाय? सरकार की बेरुखी या गांधीवादी तरीके की असफलता? सबसे ज़्यादा खलने वाली बात है मीडिया और बौद्धिक वर्ग की चुप्पी. यह चुप्पी इरोम की नहीं, दरअसल हमारे लोकतंत्र की हार है.     

गुरुवार, 23 जून 2011

इरोम शर्मिला के नाम एक कविता






















अपर्णा मनोज की यह कविता इरोम शर्मिला के लिए... उनके संघर्ष के समर्थन में

मुक्ति

अपनी मुक्ति के लिए
मुझे नहीं देखना था आकाश का विस्तार
नहीं गिनने थे तारे
नहीं देखनी थी अबाध नदी की धाराएं
या पर्वत की ऊंची होती चोटी.
न ही देखना था सागर का ज्वार .

मुझे देखनी थी सदियों पुरानी बोझिल दीवार
जिसके सूराखों को भेद सकते थे मेरे पंख एकमात्र .
मुझे तो बस यही देखना था
हवाओं के विरुद्ध जख्मों की गहरी उड़ान .

अपनी मुक्ति के लिए चाहती थी लिखना स्वतंत्र भाषा में
कि लिखूं घास और फैले वह अपनी तरह
लिखूं पेड़ तो छायाएं गिरें अपनी तरह
एक बच्चा भूरी मिट्टी , अपने जैसा
एक आदमी परती, खुरदरा खुद -सा

कविता ख़त्म होने से पहले लिखूं इस बार इन्कलाब और एक सबसे अलग नई औरत
जो लड़ सके भाषा में रहकर
फैसला करे नए शीर्षक का
और नए व्याकरण में जन्म ले सबसे खुला शब्द "आज़ादी "और "औरत "


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

मणिपुर एक तिरछी गड़ी वर्णमाला है राष्ट्र के कलेजे में


(इरोम शर्मिला के नाम यह कविता युवा कवि मृत्युंजय  ने लिखी है...कला की क्रूर ऐयाशियों के बीच मृत्युंजय अपनी सीधी आंदोलनात्मक कविताओं से सशक्त हस्तक्षेप करते हैं..यह कविता इरोम के पक्ष में चल रहे अभियानों / आंदोलनों के हाथ में एक और हथियार उपलब्ध कराती है . इरोम के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें.यह कविता हमें इरोम के समर्थन में बनाये गए फेसबुक ग्रुप पर आशुतोष जी के माध्यम से मिली है  )





संसद चलती रही दस साल
दस साल चलती रही विधानसभा
कंपनियों ने नए किस्म के पिज्जे तैयार किये
पेप्सी और कोक ने मरोड़ दी गर्दन
आये नए सुवाद भरे चमकीले
केंटुकी चिकन और बेहूदा बर्गर
स्वाद सब बंद हुए पाउच में.

दस साल का वक्त आजकल बहुत वक्त होता है
किसी ग्लोबल गाँव में !

प्यारी इरोम
तुमने कुछ खाया नहीं
तुम्हारी जीभ को जंग लग गया होगा
सिर्फ नारे लगा-लगा थक चुकी होगी जुबान
सो गयी होंगीं आंत
शांत मत रहो ऐसे 
मेरी प्यारी
ज़रा हंसो, मुस्कुराओ तो सही

मणिपुर एक तिरछी गड़ी वर्णमाला है राष्ट्र के कलेजे में
तिर्यक आखेटकों के भेजे में
फंसी हुई हूक
नेजे की तरह चुभती.
मैं अपनी पलकें
तुम्हारी सपनीली आँखों के रास्ते में बिछा कर
थोड़ा रोना चाहता था
तुम्हें मंज़ूर है ये ?

तुम्हारे घर में कौन-कौन है?
भाई? बहन? अम्मी? अब्बू?
चाय के झुरमुटों बीच सीधी रेखाओं में निहाँ कोरस?
तुम्हारे पड़ोस में कौन रहता है?
कितने हत्यारे हैं तुम्हारे मोहल्ले में
जिन्हें आजकल 'ज़वान' कहते हैं लोग.
उनकी गश्त का वक्त क्या है?
कितने बजे नहीं रहते वे?
हम कब मिल सकते हैं?

सौ सालों बाद तुम हो कि वही हो
सौ जनम बाद, शायद सौ शताब्दियों बाद
तुम हो बिना नली लगाए
अपनी उस नाक के साथ
जिसका सुघरापन मुझे बेहद पसंद है.

इरोम
तुम्हारे घर के चारो तरफ लाशें बिखरी पड़ी हैं आईनों की तरह
तुम्हारी सखी मनोरमा सात पुरुषों के नीचे से चीख रही है इरोम
इरोम
दिल्ली बहरे कातिलों और पागल हत्यारों और दोगले कवियों और नीच बाबाओं और गोरे बलात्कारियों से भरी हुई है
तुम किससे जिरह कर रही हो!

हज़ार फुट की गहराई वाले वाले अपने घर से निकल
लाख फुट निचाई वाले इस रौरव नरक में
तुम आई क्यों?
तुम पागल
बेवकूफ तुम

दस साल में कोई दस दिन ऐसे नहीं थे
कि दुनिया का कुछ बिगड़ पाता, बन पाता
आमरण अनशन की दो पंचवर्षीय योजनायें
बाबा साहेब को हाज़िर-नाज़िर जानकर
पंडित नेहरू को श्रद्धांजलि स्वरुप

शैतानी कानूनों की इजाज़त बख्शते इस
संविधान का क्या करूं मैं?
अब इन संवलाए खेतों में कोई धान नहीं है जिसे इसके वरक पर सुनहरे अक्षरों की जगह चिपका सकूं मैं
इरोम, कहाँ गयीं तुम?

सात जन आये
सात ए के सैंतालीस से लैस
शासन में बैठे सत्तर फीसदी
सैंतालीस के नुमाइंदे
सो जाओ संभ्रांत बुज़ुर्ग संतों-कवियों
सत्य की कब्र में
ज़ब्र का हाथ थाम
सात जन आये
लांग बूट, फेल्ट कैप
लोहे का छल्लेदार नोकदार ट्रैप था पंजों में
होठों से नीचे सीधे चीरते चले गए
सात नौज़वान स्त्रियों की लाश है मणिपुर
चीथी गयी रौंदी गयी
भूखी
सूखी हड्डियों वाली
सीधे बालों और नन्हें मज़बूत हाथों वाली लाश
जिनके दफ़न के लिए एक गज ज़मीन पूरे हिन्दुस्तान में नहीं बची है.

दस थीं महिलाएं
और एक तुम थीं, ग्यारह
दिगंबर. बेख़ौफ़. करुणा से सीझी हुई.
जिस्म की सारी हरकतें सिमट आयीं
पगलाई गहरी उन आँखों में.
नंगे थे हुक्मरान फौजी क्रूर,
लम्पट पुंसत्व का गलीज ठाठ-बाट
घाट-घाट ह्त्या
मस्तक को छेदता भीषण अपमान

हत्यारे
सखि मनोरमा के घर पहुंचे थे
क्या था वध-उत्सव
सब कोई मारे गए
ज़िंदा धमनियों में नश्तर उतारे गए
संगीनों कतरी गयी
चाय की नन्ही सी छोटी
मासूम शाख
भाई जो भाग रहा, पीठ पर लगी गोली
भहराकर गिर गया

दस साल सलवा जुडूम
किरकेट की बूम-बूम
खून-खून दस साल
दस साल झील डल
लोहू से भल्ल- भल्ल
दस साल सोपिया
दस साल मनोरमा
दस साल लंबा हत्या-अभियान
सत्ता के दशानन का यह रण संधान
दस साल, अनशन के दस साल

दिल्ली के जंगल में कहाँ गयी मेरी प्रिय
सात बहनों में सबसे छोटी इरोम!
जिद्दी, बातूनी और हडबड़ सी पुतली
तुम्हारे पहाड़ तुम्हारे लिए चीख रहे हैं मस्तक झुकाकर
बांस के लम्बे दरख्त सर पटक रहे है एक-दूसरे के कन्धों पर

मैं तुमसे प्यार करता हूँ इरोम
जितना कर सकता हूँ मैं
तुम्हारे दोनों होठों को चूम लेना चाहता हूँ मैं
जब तुम अपनी अनंत भूख हड़ताल से उठो तो
पपडियाये होठों के नीचे दफ़्न मुस्कराहट
का सुकून

आ...मी...

बुधवार, 3 नवंबर 2010

इरोम शर्मिला- शर्मनाक चुप्पी के दस साल…

( उसके लिये दस साल से कुछ नहीं बदला है…यह पोस्ट तो अभी एक साल पुरानी ही है…कबाड़खाना से ली है…आज भी सब वैसे ही है…)



आज इरोम शर्मिला को अनशन करते हुए दस साल हो गए।


दस साल-- जिसमे दुधमुहा बच्चा तीसरी-चौथी में पहुंच जाता है... बच्चे जवान हो जाते हैं... एक हंसती खेलती लड़की उदास औरत में तब्दील हो जाती है...ज्यादातर धाराओं के बंदी छूटकर घर आ जाते हैं... लखपति नेता अरबपति बन जाता है और एक अनाम सा आदमी लाकर धर्मगुरु के रूप में स्थापित कर दिया जाता है। लेकिन जब ठहर जाते हैं ये बरस तो ?

उसके लिए तो ठहर ही गए ये बरस। हस्पताल की उस बेड पर नाक में नालियां डाले वह ठहरे हुए समय के साथ अपनी जिद के साथ ठहरी हुई है। खामोश प्रतिरोध का उसने वही तरीका अपनाया जो इतिहास की किताबों में आदर्श के रूप में सिखाया गया था -- गांधी का रास्ता। पर वह भूल गयी कि तीस्ता का पानी नहीं ठहरा रहा इतने बरस... वे अंग्रेज़ थे जो गांधी के उपवास से दहलते थे... फिर गांधी सत्ता और प्रभु वर्ग के करीब भी तो थे... और वह एक आम औरत ... वह भी एक ऐसे इलाके की जो देश के नक्शे भर से जुडा है।


कितनी असहायता लगती है ऐसे में। क्या करें…करने को किया एक आयोजन… पर इतने से क्या होगा?

पता नहीं कितने बरस और?

पता नहीं कितनी शर्मिलायें और??

तब तक पता नहीं कितनी हत्यायें और??

कितने बलात्कार और?

और पता नहीं कितनी मांओं के सडकों पर नग्न प्रदर्शन?

किसी को क्या फर्क पडता है भाई? यह किसी हिरोईन का जन्मदिवस थोडे है!