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बुधवार, 1 मई 2013

कम्यूनिस्ट घोषणा पत्र – सर्वहारा की ऐतिहासिक उपलब्धि



मई दिवस के अवसर पर सभी साथियों का जनपक्ष की ओर से हार्दिक अभिनन्दन. यह दिन हम सर्वहाराओं की जीत और संकल्प का दिन है. वह दिन, जब हम एक बेहतर दुनिया के निर्माण की मुश्किल लड़ाई के लिए एक बार फिर संकल्पबद्ध होते हैं. आज इस अवसर पर जनपक्ष पर प्रस्तुत हैं सर्वहारा की मुक्ति के ऐतिहासिक दस्तावेज़ 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' पर एक टिप्पणी, जो दरअसल मेरी सद्य प्रकाश्य किताब , 'मार्क्स और उनकी दर्शन'  का हिस्सा है.

पूरा घोषणा पत्र यहाँ हिंदी में और यहाँ  अंग्रेज़ी में  पढ़ा जा सकता है.





“घोषणा पत्र” मार्क्स और की एक महान उपलब्धि थी जिसने उस समय के मजदूर आंदोलनों की मूल भावना को स्पष्टतः प्रकट किया. यह सारी दुनिया के सामने एक ऐसे राजनैतिक दृष्टिकोण का प्रमाण था जो अपने समय के भौतिक यथार्थ पर आधारित था तथा अक्सर सतह के नीचे दबे तनावों तथा अंतर्विरोधों की सटीक पहचान भी करता था. घोषणा पत्र की प्रसिद्ध आंरभिक पंक्ति में ही उन्होंने देख लिया था -  

“ यूरोप को एक भूत आतंकित कर रहा है... कम्यूनिज्म का भूत ! इस भूत को भगाने के लिए पोप और ज़ार, मेटरनिख और गीज़ो
, फ्रांसीसी उग्रवादी और जर्मन पुलिस के भेदिये...बूढ़े यूरोप के सारे सत्ताधारी एक हो गए है.”

यह कोई साधारण राजनीतिक पर्चा मात्र नहीं है, यह एक उत्कट घोषणापत्र तथा  एक नवीन दृष्टि है. इक्कीसवीं सदी के उन सभी प्रबुद्ध पाठकों के लिए जो पंक्तियों के बीच की इबारत को पढ़ना जानते है
, यह अविश्वसनीय रूप से सामयिक है. यह एक ऐसे विश्व की विवेचना करता है जिसे हम आज भी फौरन पहचान लेते हैं, जबकि जिस समय यह घोषणा पत्र लिखा  गया था, वह बस आकार ही ले रहा था. जिस औद्योगिक पूंजीवाद को मार्क्स  ने इतनी गहरी अंतर्दृष्टि से समझा और व्याख्यायित किया है, वह उस दौर में अपने क्रूर विकास की आरंभिक अवस्था में ही था. जब मार्क्स ओर एंगेल्स ने शोषण पर आधारित इस तंत्र तथा मुनाफ़ाखोरी की अंधी दौड़ से पैदा होने वाली अमानवीकरण की प्रवृत्ति पर से परदा हटाया था तो शायद उन्हें यह भान भी नहीं  था कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उनके शब्द कितने सही साबित होगें.

“उत्पादन उपकरणों में
, लगातार  क्रांति लाये बिना बुर्जुआ वर्ग जीवित नहीं रह सकता इसके विपरीत सभी पुराने औद्योगिक वर्गों के अस्तित्व की पहली शर्त पुरानी उत्पादन विधियों को ज्यों का त्यों बनाए रखना थी. उत्पादन प्रक्रिया का निरंतर क्रांतिकरण, सभी सामाजिक अवस्थाओं में लगातार उथल पुथल, चिरंतन अनिश्चितता और हलचल - ये चीजें बुर्जुआ युग को पहले के सभी युगों से अलग करती हैं सभी स्थिर और जड़ीभूत संबंध अपने सहगामी, प्राचीन व पवित्र पूर्वाग्रहों तथा मतों सहित ध्वस्त हो जाते हैं, सभी नवनिर्मित संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते है जो कुछ भी ठोस है, वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है, और अंततः मनुष्य को संजीदा दृष्टि से  जीवन की वास्तविक अवस्थाओं तथा पारस्परिक संबंधों को देखने के लिए मजबूर होना पड़ता है.”

“...अपने उत्पादों के लिए निरंतर विस्तारमान बाजार की जरूरत बुर्जुआओं का दुनिया भर में पीछा करती है हर जगह घुसना, हर जगह पैर जमाना तथा हर जगह संपर्क कायम करना होता है.”

“कम्युनिस्ट अपने दृष्टिकोण और लक्ष्य छिपाने से घृणा करते हैं. वे खुले तौर पर एलान करते हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ समस्त मौजूदा सामाजिक दशाओं को बलपूर्वक उखाड़ फेंकने से ही हासिल हो सकता हैं. शासक वर्गों को कम्युनिस्ट क्रांति के भय से कांपने दो. सर्वहाराओं के पास अपनी बेड़ियों के सिवाय खोने के लिए कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.”
            दुनिया के मजदूरों एक हो !
                                                                                                                                                                       
 इसे पढ़ते हुए पाठक के लिए यह विश्वास कर पाना बेहद मुश्किल होता है कि यह सब मध्यपूर्व में तेल के भंडार मिलने के साथ इस क्षेत्र के दुनिया के दूसरे छोर पर बसे देशों के हितों चलते युद्धक्षेत्र में परिवर्तित हो जाने या फिर कोक और नाइक जैसे बहुराष्ट्रीय उत्पादों के विश्व की हजारों विभिन्न सभ्यताओं को प्रभावित करने या उस परिदृश्य के भी पहले बहुत पहले लिखा गया था जहां बम्बई के शेयर बाजार के एक निर्णय से लाखों करोड़ों लोग प्रभावित हो जाते हैं. [1]
घोषणा पत्र में सटीक विवेचना और पूंजीवादी तंत्र की कार्यप्रणाली तथा प्रभावों का विशद विवरण ही प्रभावशाली नहीं हैं अपितु जिस उत्कट तरीके से उन्होंने इसे बेपरदा किया है, जिस दृढ़ता के साथ इसकी भर्त्सना की है वह भी अद्भुत है. आखिकार यह एक कम्युनिस्ट घोषणा पत्र है जो कि पूँजीवादी तंत्र की आक्रामक गतिकी की पहचान इसकी प्रशंसा के लिए नहीं, इसे दफनाने के लिए करता है प्रश्न यह है कि इसकी कब्र खोदेगा कौन ?

इसका उत्तर हमें घोषणा पत्र में थोड़ा आगे मिलता है. जैसे जैसे पुरानी व्यवस्था से पूंजीवाद विकसित होता है छोटी कार्यशालाएं औद्योगिक पुंजीपति के विशाल कारखाने में बदल जाती हैं. विकसित हो रहे नगरों को आपूर्ति करने वाले आधुनिक फार्मों के गहन उत्पादन तंत्र में किसान खेत मजदूर बन जाते है
, चिरंतन विकासमान राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक इकाईयों के चलते छोटे व्यापारी नष्ट हो जाते है, और बहुराष्ट्रीय निगमों के निर्माण  की प्रक्रिया आरंभ हो जाती हैं. शहरों में और उसके इर्द गिर्द  विकसित उद्योगों में काम करने को मजबूर कामगार एक नई क्रूरता के शिकार होते है.

“कारखाने में ठुंसे झुंड के झुंड मजदूरों को सैनिकों की तरह संगठित किया जाता है. औद्योगिक फौज के सिपाहियों की तरह वे बाकायदा एक दरजावार तरतीब में बंटे हुए अफसरों और जमादारों की कमान में रखे जाते हैं. वे सिर्फ बुर्जुआ वर्ग या बुर्जुआ राज्य के ही दास नहीं है बल्कि उन्हें घड़ी घड़ी, दिन ब दिन
, अधीक्षक और सर्वोपरि खुद बुर्जुआ कारखानेदार द्वारा भी दासता में ले लिया जाता है. यह निरंकुशता जितना ही अधिक प्रच्छन्न तौर पर मुनाफे को अपना लक्ष्य घोषित करती है, वह उतनी ही तुच्छ, घृणित और कटु होती जाती है.[2]                     

“प्रांरभ में जैसे जैसे हताशा बढ़ती जाती है पहले इक्के दुक्के मजदूर लड़ते हैं, फिर एक कारखाने के मजदूर मिलकर लड़ते हैं और फिर एक पेशे के, एक इलाके के सब मजदूर एक  साथ उस साझा दुश्मन -बुर्जुआ से मोर्चा लेते हैं
, जो उनका सीधे सीधे शोषण करते हैं. वे अपने हमले उत्पादन की बुर्जुआ अवस्थाओं के विरूद्ध नहीं बल्कि उत्पादन के उपकरणों के विरूद्ध लक्षित करते हैं. अपनी मेहनत के साथ होड़ करने वाले आयातित सामानों को नष्ट कर देते हैं, मशीनों को तोड़ देते है, फैक्ट्रियों में आग लगा देते हैं. वे मध्ययुग की खोई हुई हैसियत को बलपूर्वक प्राप्त करने कोशिश करते हैं.”[3]

लेकिन दरअसल विडंबना तो यह है कि मशीन नहीं इनका वास्तविक शत्रु तो वह प्रयोजन है जिसके लिए इनका प्रयोग होता है. यह विरोधाभास ही है जैसा कि मार्क्स  स्पष्टतः रेखांकित करते हैं, कि मनुष्य जितना अधिक उत्पादन करने में सफल होता है मनुष्य को श्रम की दासता से मुक्त कराने की संभावना उतनी ही मजबूत होती जाती है. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में यह संभावना नष्ट कर दी जाती है. मानवता को मुक्त करने की जगह मशीन इसकी दासता में और अधिक अभिवृद्धि करती हैं. लेकिन इसके साथ ही एक और  प्रक्रिया होती है- सर्वहारा या श्रमिक वर्ग केवल शहरों की तरफ धकेला ही नहीं जाता बल्कि जैसे जैसे उत्पादन मुनाफे की होड़ में और परिष्कृत तथा यांत्रिक होता जाता है कालांतर में इसकी वजह से मजदूरों की सामूहिक शक्ति भी बढ़ती जाती है. जिससे उनके लिए संगठित होकर मशीनों के मालिकों से लोहा ले पाना संभव हो पाता है.

इस प्रकार मार्क्स की दृष्टि  में सर्वहारा ही समाजवादी क्रांति का प्रतिनिधि है. वह मजदूरों का किसी रूप में आदर्शीकरण नहीं करते. न तो वह उन्हों दुसरे संघर्षरत लोगों से मजबूत या बेहतर घोषित करते हैं और न ही उन्हें पूंजीवाद समाज में पैदा होने वाले अंतर्विरोधो से मुक्त समझते है. एक आम मजदूर व्यक्तिगत स्तर पर किसी भी दूसरे व्यक्ति की तरह ही स्वार्थी, पतित, पुरूष अहं की ग्रंथि का शिकार कुछ भी हो सकता है लेकिन इस नवीन पूँजीवादी समाज में एक वर्ग के रूप में वह ऐसी विशिष्ट स्थिति में होता है कि एक तरफ इसे बदलना उसके हित में होता है और दूसरी तरफ उसमें ऐसा करने की क्षमता भी होती है. सर्वहारा वर्ग के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और सामूहिक शक्ति ही उसका इकलौता हथियार होती है.

मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणा पत्र का ज्यादातर हिस्सा ब्रुसेल्स  के ब्लू पैरट रेस्त्रां में लिखा था.
1848 के फरवरी माह में यह छापाखाने में पहुंचा और जब यह छपकर आया तो फ्रांस से विद्रोहों की ख़बर आनी शुरू हो गई थी. वहां के अलोकप्रिय प्रधानमंत्री गीजो ने इस्तीफा दे दिया और अगले दिन राजा लुई फिलिप का भी पतन हो गया. कुछ ही हफ्तों में विद्रोह की लपटें बर्लिन तक पहुँच गईं और एक और सरकार गिर गई एंगेल्स ने उत्साहपूर्वक लिखा “ट्यूलेरिज और शाही महल की लपटें सर्वहारा के उदय की प्रतीक हैं...अब बुर्जुआ शासन हर जगह ध्वस्त हो जायेगा...हमें उम्मीद है कि जर्मनी में भी यही होगा.” फरवरी क्रांति के फलस्वरुप कम्युनिष्ट लीग की लंदन स्थित केन्द्रीय समिति ने समस्त अधिकार ब्रुसेल्स के उच्च मंडल को हस्तांरित कर दिये। पर जब यह फैसला ब्रुसेल्स पहुंचा तो वहां का प्रशासन यूरोप मे फैलते विद्रोह के मद्देनजर सावधान हो चुका था और घेराबंदी शुरु हो चुकी थी। जर्मन लोगों की बैठकों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। अतः नई केन्द्रीय समिति ने अपने को भंग कर दिया और सारे  अधिकार मार्क्स को सौंप कर उन्हें फौरन पेरिस में एक नई केन्द्रीय समिति गठित करने का निर्देश दिया। यह निर्णय करने वाले पांच आदमियों ने (3 मार्च 1848 को) अपने अपने अलग रास्ते पकड़े ही थे कि पुलिस मार्क्स के घर में घुस आई और उन्हे गिरफ्तार कर अगले ही दिन फ्रांस जाने को, जहां वह खुद ही जाना चाह रहे थे, मजबूर कर दिया। पेरिस में कम्यूनिष्ट लीग का नया मुख्यालय घोषित किया गया। बाद में एंगेल्स भी वहां आ गए और दोनो जन वापिस जर्मनी लौटने की कोशिश मे जुट गये। लेकिन उन दिनो पेरिस मे निर्वासितों के  बीच क्रांतिकारी दस्ते  कायम करने की एक खब्त सी फैली हुई थी। स्पेनी, इतालवी, बेल्जियम, पोल और ज़र्मन सभी अपने देशों को आजाद कराने के लिये ग्रुपों में एकत्र हो रहे थे. हरवे,बोर्न्स्तेड और बर्नस्टीन के नेतृत्व में गठित जर्मन सैन्य दस्ते द्वारा इस काम को अंजाम देने की (जिसमें नई सरकार भी सहयोग की बात कर रही थी) योजना को क्रांति के साथ खिलवाड बताते हुये मार्क्स  ने इसका पुरजोर विरोध किया। उनके अनुसार जर्मनी की तात्कालिक उथन पुथल के मध्य आक्रमण संगठित करने यानी बाहर से संगठित क्रांति का बलपूर्वक आयात करने का अर्थ खुद जर्मनी की क्रांति की जडे काटना, सरकारों के हाथ मजबूत करना और इन सैनिकों को हाथ पैर बांध कर जर्मन फौज  के हवाले करना था।

अप्रैल में मार्क्स जर्मनी लौट आये और क्रांतिकारी आन्दोलन में राजनीतिक बहसों द्वारा सक्रिय हस्तक्षेप के उद्देश्य से एक दैनिक समाचार पत्र
नया राईन समाचारनिकालने की तैयारी करने लगे. चार साल पहले जब ‘राईन समाचार’ के पिछले संस्करण निकले थे तो इसे जर्मनी के हताश मध्यवर्ग का व्यापक समर्थन मिला था। लेकिन इस बार वे मार्क्स के दृष्टिकोण का समर्थन करने में उतनी रुचि नहीं दिखा रहे थे। मार्क्स का पूरा जोर पुरानी व्यवस्थाओं क विनाश के बाद उभरी नई विधानसभा जैसी व्यवस्थाओं के आलोचनात्मक विश्लेषण पर था. इन दिनों पूरे जर्मनी में मजदूरों के ग्रुप बनाए जा रहे थे, हालांकि उनकी मांग या तो पूरी तरह तात्कालिक आर्थिक लाभों पर केन्द्रित थीं या फिर विशुद्ध लोकतांत्रिक सुविधाओं पर. जून में अखबार का पहला अंक प्रकाशित हुआ तो मार्क्स और एंगेल्स ने इस कम्युनिष्ट ताकतों के संगठन के केन्द्रीय बिंदु के रुप में देखा।

कम्यूनिष्ट लीग का क्या हुआ
? मार्क्स और एंगेल्स दोनों ने महसूस किया कि यह इतनी  छोटी थी कि तत्कालीन परिस्थितियों में, जब हजारों लोग सडको पर आ रहे थे , आंदोलन पर कोई व्यापक प्रभाव छोडने में सफल नहीं हो पा रही थी। मूलभूत बात तीव्र परिवर्तनो और उफान के समय आंदोलन का हिस्सा बनकर उसको प्रभावित करना था न कि कम्युनिष्टों को इससे अलग या फिर इसके विरुद्ध खडा करना। मार्क्स की इस नवीन विश्वदृष्टि  के केन्द्र में यह विचार था कि चेतना में महान रुपांतरण अपने आप नही अपितु भौतिक परिवर्तनों के संदर्भ में ही आता है। नए विचार केवल उसी सीमा तक  स्वीकार तथा अंगीकार किए जायेंगे जितना वे आंदोलन के भीतर प्रतिबिंबित होगें. इस तर्क ने मार्क्स की एक दूसरे महत्वपूर्ण जर्मन समाजवादी गोथे से उग्र बहस को जन्म दिया। गोथे जर्मन मजदूरों में काफी लोकप्रिय थे लेकिन उनके विचार इस धारणा को मजबूत करते थे कि ‘मजदूरो को व्यापक क्रांतिकारी आंदोलनों  से  दूर रहना चाहिये.’

सच्चाई यह है कि उन दिनों जर्मन मजदूर आंदोलन अपने विकास की उस मंजिल पर था जहाँ वह जनतांत्रिक अधिकार प्राप्त करने की लडाई लड रहा था. इसके विपरीत इंग्लैड में चार्टिस्ट आंदोलन का प्रभाव अपने उच्चतम स्तर पर पहंच चुका था और मार्क्स एंगेल्स इसे निश्चित तौर पर यूरोपीय मजदूर आंदोलन के अग्रिम दस्ते के रुप मे देखते थे. साथ ही वे इस बात से भी अवगत थे कि ‘उदार’ तत्वों के साथ संघर्ष में साझा हिस्सेदारी का अर्थ कभी भी उनके हाथ में आन्दोलन का राजनैतिक नेतृत्व सौंप देना नही हो सकता।

‘नए राईन समाचार पत्र’ की पहली प्रतियां जब गलियों में आई तो यूरोप में एक बार फिर परिस्थितियां नए उच्चतर स्तर पर पहुँच रहीं थीं। फ्रांस में राजशाही को  अपदस्थ कर सत्ता में आई उदारवादी सरकार के जनतांत्रिक दावे खोखले साबित हो रहे थे. फरवरी क्रांति से प्राप्त अधिकार पर नव निर्वाचित राष्ट्रीय एसेंबली में प्रभावी दक्षिणपंथियों द्वारा कुठाराघात किया जा रहा था। ज़र्मनी में शहरी मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी कीगांरटी देने वाली राष्ट्रीय कार्यशालाएं बंद कर दिये जाने से मजदूर एक  बार फिर निराश्रित हो गए। इसके विरोध में लोग पेरिस की सडकों पर उतर आए। इस बार वे बर्बर दमन का शिकार हुये। जब मार्क्स ने फ्रांस की कायर बुर्जुआजी की इस कारवाई का विरोध किया तो जर्मन प्रशासन ने इसे अपने खिलाफ भी समझा और उनके अखबार को समर्थन देना बंद कर दिया.

जुलाई में जर्मनी की अपेक्षाकृत उदार सरकार की जगह प्रतिक्रयावादी सरकार  ने ले ली. मार्क्स और उनका अखबार उसकी दमनकारी नीति के पहले शिकार हुये और अगले महीने इसके प्रंबधन में एकाधिक बार बाधा पहुंचाई गई लेकिन वियना से बर्लिन तक लोकतांत्रिक अधिकारों पर गहराते जा रहे खतरों के बीच मार्क्स और उनका अखबार पूरी आक्रमकता के साथ मजदूरों के अधिकारों का पुरजोर समर्थन करते रहे. उनकी रणनीति का सबसे प्रमुख उद्देश्य मजदूरों के बीच अपने वैचारिक दृष्टिकोण का प्रभाव बढाना था जिसे बाद में उन्होने क्रांति की सततता कहा. लेकिन साथ ही उन्होंने इस दौरान स्टीफन बोर्न की मजदूर बिरादरी की पंचमेल वैचारिक खिचड़ी पर आधारित उस कार्यनीति का भी सक्रिय विरोध किया जिसके तहत हड़तालों, ट्रेड यूनियनों, उत्पादकों की सहकारी समितियों का आयोजन किया गया और यह भुला दिया कि सर्वोपरि प्रश्न राजनैतिक जीतों द्वारा वह भूमि विजित करने का है जिस पर चीजें टिकाऊ आधार पर प्राप्त की जा सकती हैं। मार्क्स और एंगेल्स इस आंदोलन की कमजोरियों को अच्छी तरह पहचानते .थे इसलिये उन्होने 1848 के उस समय को ‘क्रांतिकारी संयम’ का समय कहा।

वियना में आंदोलन का बर्बर दमन हुआ तो सडको पर आस्ट्रियाई  मजदूरों के समर्थन में विशाल जनांदोलन उमड़ पड़ा। अक्टूबर के अंत तक उसे भी  दबा दिया गया लेकिन बर्लिन तथा जर्मनी के दूसरे हिस्सों पर पूर्ण अधिकार करने में प्रतिक्रांतिकारियों को दो और महीने का समय लग गया और तब जाकर फ्रेडरिक चतुर्थ के हाथ में प्रशियाई सत्ता का पूर्ण अधिकार आ गया। इसके बाद के महीनों में मार्क्स और एंगेल्स ने खासतौर पर अपने समाचार पत्र के जरिये जनतांत्रिक ताकतों को एक मंच पर लाने मजदूरों और किसानों के बीच एकता कायम करने और सबसे महत्वपूर्ण तौर पर जर्मन आंदोलन को अंतराष्ट्रीय परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में समझने तथा व्याख्यायित करने का अथक परिश्रम किया।
जर्मनी के कई असफलताओं के बाबजूद यूरोप के दूसरे हिस्सों में जारी संघर्षों ने मार्क्स  के मन में क्रांतिकारी संभावनाओं के प्रति आशा की दीप जलाये रखा और अब भी प्रतिरोध कर रहे बेडेन तथा फैंकफर्ट की अस्थाई प्रतिनिधि सभाओं का समर्थन करने के लिये प्रोत्साहित किया।

लेकिन 13 जून 1849 को रुसी जार द्वारा हंगरी की क्रांति के कुचल दिये जाने के साथ 1848 की क्रांति के महान युग का अंत हो गया। 16 मई को मार्क्स को कोलोन से निष्कासित करने का आदेश थमा दिया गया और अगले ही दिन वह पेरिस के लिये रवाना हो गए। इस बीच एंगेल्स बेडेन के विद्रोहियों के साथ संघर्ष में शामिल हो गए. जर्मनी छोडने से पहले नए राईन समाचार पत्र के अंतिम अंक में, जो पूरा लाल स्याही में निकाला गया था, उन्होंने लिखा ...

“हमें अपना दुर्ग छोडना पड रहा है. लेकिन हम अपने हथियारों और साज-ओ- समान के साथ पीछे हट रहे हैं... युद्धक बैंडों और फहराते हुए झंडे के साथ...  हमारे अंतिम शब्द हमेशा और हर जगह बस एक ही होंगे.... ‘सर्वहारा वर्ग की मुक्ति’.”



[1] कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, पेज 34, पीपीएच 1986
[2] वही, पेज 39
[3] वही, पेज 40

मंगलवार, 1 मई 2012

मज़दूर यानि पुरुष मज़दूर?

आज मई दिवस है यानि कि दुनिया भर के कामगारों के संघर्ष और बलिदान को याद करने का दिन। लेकिन विमर्शों के उत्तर आधुनिक दौर में कुछ ऐसा प्रपंच रचा गया है कि लोगों की एक्सक्लूसिव पहचानों पर तो बहुत ज़ोर है पर सामूहिक पहचाने धुंधली हो गयी हैं। या तो आप दलित हैं, या ग़ैर दलित, नारी, मज़दूर या फिर कुछ और। लेकिन दरअसल एक जटिल समाज में हमारी सामूहिक पहचाने होती हैं और साझे संघर्ष। स्त्री अधिकार संगठन से जुड़ी रुपाली सिन्हा की यह टिप्पणी 8 मार्च और  1 मई के बीच के ताने-बाने को बयान करती है। कामगार दिवस पर क्रांतिकारी अभिनंदन सहित)
मई दिवस और महिलाएं

यह हम सबका दिन है!
दुनियाभर के मुक्ति संघर्षों अत्याचार और उत्पीडन के खिलाफ होने वाले संघर्षों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होने मर्दो के कंधे से कंधा मिलाकर संघर्षों में अपनी भागीदारी निभाई है। मई दिवस का इतिहास भी मर्दों के साथ-2 औरतों के संघर्षों से लिखा गया है। मजदूर दिवस दुनिया भर के मजदूरों की आकांक्षाओं, अधिकारों और जीत का दिन है। इस दृष्टि से अमेरिका के मजदूर आंदोलन ने कामगार वर्ग को दो अंतर्राष्ट्रीय दिन दिए है आठ मार्च और एक मई।

19 वीं सदी के अंत तक यूरोप और अमेरिका में औद्योगिक कामगारों के रुप मे औरतों ने अपनी जगह बना ली थी। हालांकि उनकी स्थिति और उनके काम की परिस्थितियां मर्दो की तुलना में बहुत बदतर थीं। मार्च 1857 में कपडा उद्योग में काम करने वाली औरतों ने बेहतर काम की परिस्थितियों, काम के 10 घंटे और बराबरी के अधिकार के लिए प्रदर्शन किया जिसका बुरी तरह दमन किया गया। मार्च 1908 में कामगार औरतों का एक और बडा प्रदर्शन हुआ। यह प्रदर्शन बालश्रम पर रोक और औरतों के मताधिकार की मांग को ले कर था। फिर दमन हुआ। 1909 में गारमेंट मजदूरिनों ने अमेरिका में आम हडताल कर दी। 20 से 30 हजार कामगारिनों ने बेहतर वेतन और बेहतर काम की परि0 के लिए भयंकर ठंड के 13 हफ्ते संघर्ष किये। 1903 में महिला ट्रेड यूनियन की स्थापना हुई जिसने गिरफतार हडतालियों को जेल से छुडाने की व्यवस्था की। इस संघर्ष को विशेष दिन का दर्जा दिलाने में क्लारा जेटकिन के प्रयासों से सभी परिचित हैं। 

अंतर्राष्टीय महिला दिवस ने कामगारों के संघर्ष को ताकत दी। रूस की फरवरी क्रांति में इसने महत्वपूर्ण उत्प्रेरक का कार्य किया।

19वीं सदी हलचलों का युग थी आंदोलनों का ज्वार था। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का विचार भी यहीं पनपा था। जब पुरूष कामगार 10 से 8 घंटे काम की मांग कर रहे थे महिला कामगार 1857 में 16 से 19 की मांग कर रही थी। इससे पता चलता है कि औरतों के साथ हर क्षेत्र में भेदभाव होता रहा है।  औरतें एक तरफ अपनी बराबरी और अधिकारों की लडाई लड रही थी दूसरी ओर पुरुष कामगारों के साथ कंधे से कंधा मिला कर संघर्ष में बराबरी से हिस्सेदारी भी कर रही थी। 

 महिलाओं के इस ऐतिहासिक संघर्ष को महिलाओं के संघर्ष के रुप में सीमित करके आंका जाता है जबकि वह भी उस व्यापक मजदूर आंदोलन का हिस्सा था जिसने पूरी दुनिया के मजदूरों को एक नई ताकत और दृष्टि दी थी। ठीक उसी प्रकार जैसे मई दिवस के संघर्ष को अनकहे ही पुरुष कामगारों का संघर्ष मान लिया जाता है। 8 मार्च का आंदोलन राजनीतिर्क आर्थिक और सामाजिक अधिकारों का संघर्ष था जो समूची मानवजाति से स्वयं को जोडता था। यह केवल ‘औरतों का मुद्दा’ नहीं था।

 उदाहरण के लिए जब 1866 में अमेरिका में ‘ नेशनल लेबर यूनियन की स्थापना हुइ थी तो बहुत सी महिला श्रमिक इसका हिस्सा थीं। अमेरिकी कांग्रेस ने 1868 में आठ घंटे के कार्यदिवस का जो कानून पास किया उसकी उत्प्रेरक नेता थीं बोस्टन की मेकेनिस्ट इरा स्टीवर्ड। 

 पिछले कुछ सालों से हम देख रहें है कि महिला दिवस को पत्नी दिवस के रुप में मनाना, कार्ड पर सुंदर कोमल कविताएं लिख कर देना, उपहार देना आदि का प्रचलन बढता जा रहा है। महिलाओ के जुझारु संघर्षों को बेहतर समाज के लिए होने वाले संघर्षो के हिस्से के रुप में नहीं देखा जाता। इस ऐतिहासिक संघर्ष ने यह साबित किया कि महिलाओं की भी राजनीतिक भूमिका है और इसे निभा सकने में वे सक्षम भी हैं। हालाॅकि महिला कामगारों के अधिकारों की हमेशा ही उपेक्षा हुई है। आज भी उनके साथ पुरुष कामगारों की तुलना में अधिक शोषण और उत्पीडन हिंसा और गैरबराबरी का शिकार होना पडता है। संगठित असंगठित दोनों क्षेत्रों में लगभग यही स्थिति है। इस दृष्टि से महिला मजदूरों को दोहरा संघर्ष करना होगा। एक तरफ पितृसत्तात्मक शोषण से तो दूसरी ओर एक कामगार के रुप में आज महिला कामगारों को संगठित करने की जरुरत को समझना होगा जो पितृसत्तात्मक मूल्यों को चुनौती देने के साथ ही व्यापक मजदूर आंदोलन का भी हिस्सा बनें।




यहाँ सुनिए पाश का क्रांतिकारी गीत...हम लड़ेंगे साथी..


रविवार, 1 मई 2011

चाकलेट डे और वेलेंटाइन डे के बीच लेबर्स डे!



मई दिवस पर जनसंदेश टाइम्स के लिए लिखा गया एक आलेख 

सपने कभी नहीं मरते ...

चाकलेट डे से लेकर मदर्स डे तक मनाने वाले हमारे समय में मई दिवस एक असुविधा की तरह है. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में अमेरिका में मज़दूरों के ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान घटी हेमार्केट की घटना के  बाद से ही पूरी दुनिया के मज़दूरों द्वारा मनाये जाने वाला यह दिन तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी इतिहास और वर्तमान के पन्नों से मिटाया नहीं जा सका है. विडम्बना यह कि उसी अमेरिका द्वारा सरकारी तौर पर इसे १९५८ में ही ‘स्वामिभक्ति दिवस’ घोषित कर दिए जाने के बाद भी वहाँ के मज़दूर इसे ‘अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस’ के रूप में ही मनाते हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं कि कुछ बदला ही नहीं. १८८६ से अबतक दुनिया भर की नदियों में बहुत पानी बह चुका है. कभी दुनिया के आधे से अधिक हिस्से पर लहराने वाला मज़दूर का झंडा अब लगातार सिकुडता जा रहा है और पूंजी के प्रपंच के आगे मज़दूरों के अधिकार और शोषणमुक्त समाज का स्वप्न न केवल कमजोर पड़ा है बल्कि इसे मुख्यधारा की मीडिया ने यूटोपिया से प्रहसन में बदल दिया है. ऐसे में २०११ में मई दिवस की बात करते हुए यह देखना उचित होगा कि आखिर आज दुनिया का कामगार कहाँ खड़ा है और आने वाले समय में समानता के उस महास्वप्न के लिए कितनी जगह बची है जिसे कार्ल मार्क्स और उनके अनुयायियों ने ही नहीं बल्कि दुनिया भर में शोषण के चक्के के नीचे पिसती आम जनता और उनसे सहानुभूति रखने वाले तमाम बुद्धिजीवियों ने भी जिसकी अपने-अपने हिसाब से रूपरेखा बनाई थी. यह भी देखना रोचक होगा कि उस समय से अब तक यह परिदृश्य कितना बदला है और क्या उस दौर के  मज़दूर और आज के मज़दूर में कोई समानता बची भी है?

बीसवीं सदी के पहले पचास साल समाजवाद के साल थे. पेरिस कम्यून से पैदा हुआ मज़दूरों के राज्य का स्वप्न १९१७ में सोवियत संघ में लेनिन की अगुआई में समाजवादी राज्य की स्थापना के साथ पहली बार मूर्त रूप में दिखाई दिया. तमाम विपत्तियों और देश के बाहर-भीतर के तमाम दुश्मनों से लोहा लेते इस देश ने दुनिया को दिखाया कि पूंजीवादी लोभ-लालच वाली गलाकाट प्रतियोगिता की जगह मजदूरों की समाजवादी प्रतियोगिता और समर्पण से एक बेहतर भविष्य और वर्तमान बनाया जा सकता है. तीसरे दशक की महामंदी के दौर में जब पूंजीवादी विश्व में त्राहि-त्राहि मची थी तो सोवियत संघ न केवल सामान्य था बल्कि प्रगति के नित नए सोपान चढ रहा था. इस समाजवादी विकास ने दुनिया भर की मेहनतकश जनता के साथ-साथ पूंजीवादी विचारकों को भी आकर्षित किया था. सोवियत संघ के बाद १९४९ में चीन और फिर हो ची मिन्ह के नेतृत्व में वियतनाम और फिदेल कास्र्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा में क्रांतियां हुई. इसके अलावा दुनिया के लगभग हर देश में कम्यूनिस्ट पार्टियां तथा कामगार यूनियनें मजदूरों के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाली प्रमुख तथा ईमानदार ताकतों के रूप में उभरीं. कभी केवल बौद्धिक बहसों के लिए महत्वपूर्ण माना जाने वाला समाजवाद का यूटोपियाई विचार अब दुनिया के सामने एक हकीक़त के रूप में मौजूद था. इसका असर यह हुआ कि धुर पूंजीवादी देशों को भी अपने कामगारों को सुरक्षा और अधिकार देने पड़े. ‘मानवीय चेहरे वाला पूंजीवाद’ और ‘कल्याणकारी राज्य’ जैसी अवधारणायें एक तरफ इस दबाव का नतीजा थीं तो दूसरी तरफ पूंजीवादी राज्य के अमानवीय और अकल्याणकारी होने का स्वीकार भी. विकल्प की स्थापना हो चुकी थी और अब सवाल था इसे दीर्घकालिक बनाने और जनता के लिए एक वास्तविक जनता के राज्य को लगातार और बेहतर बनाते जाने की. लेकिन समाजवाद के ये पहले प्रयोग इन चुनौतियों पर खरे नहीं उतर सके. अपने समय में महानतम सफलताएं अर्जित करने वाले तथा उत्पीडन और दमन के खिलाफ तीव्रतम संघर्ष चलाने वाली ये व्यवस्थाएं कालान्तर में बिखर गयीं. सोवियत संघ में यह बिखराव भौगोलिक स्तर तक हुआ तो चीन आज एक समाजवादी नाम के बावजूद पूरी तरह से पूंजीवादी राज्य में तबदील हो चुका है.

असल में आपातकाल में बेहद सफल रही ये व्यवस्थाएं सामान्य परिस्थितियाँ आने पर अपने-आप को उनके अकुरूप ढाल नहीं सकीं. बीसवीं सदी की ये क्रांतियां पिछड़े हुए सामंती समाजों में हुई थीं और उन्होंने उन समाजों का अप्रतिम आधुनिक एवं औद्योगिक विकास किया तथा उन देशों को दुनिया के सबसे विकसित देशों के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जिन पद्धतियों और राजनीतिक-सामाजिक सरंचनाओं ने जन्म लिया वे ही अंततः इनके पूंजीवादी रास्तों पर लौटने का कारण बनी. मज़दूर सारी सुविधाएँ तो पा गया लेकिन उत्पादन की प्रक्रिया से उसकी दूरी बनी रही, वह श्रम का आपूर्तिकर्ता तो बना लेकिन वह उत्पादन और सत्ता का निर्णायक नहीं बन सका. सर्वहारा की प्रतिनिधि के रूप में कम्यूनिस्ट पार्टियों की जकडबंदी मज़बूत होती गयी और सर्वहारा की तानाशाही धीरे-धीरे पार्टी और फिर पार्टी प्रमुख की तानाशाही में तबदील होती चली गयी. कम्यूनिज्म के नाम पर भी सत्ताओं ने दमन और हत्याओं के तमाम पाप किये और एक समय दुनिया की उद्धारक माने जाने वाली विचारधारा कटघरे में खडी हुई. वैसे इस सन्दर्भ में साम्राज्यवादी मीडिया का भयावह दुष्प्रचार और अमेरीकी सत्ता तंत्र का सी आई ए के माध्यम से संचालित कम्यूनिज्म विरोधी अभियान भी दुनिया भर में वामपंथ को बदनाम करने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है, लेकिन दुश्मन से भलमनसाहत की उम्मीद कौन करता है? जिम्मेदारी तो दोस्तों की थी.

लेख की सीमाओं के चलते इस मुद्दे की और गहराई में जाना संभव नहीं लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि बीसवीं सदी के अंतिम दशक के आते-आते यह महास्वप्न खंडित हुआ और पूंजीवाद दुनिया भर में एक प्रभावी सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक विचार के रूप में स्थापित हो गया. परिणाम यह हुआ कि पूरी दुनिया में नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत निजीकरण-उदारीकरण की संरचनात्मक समायोजन की नीतियां अपनाई गयीं. कामगारों के अधिकार ही कम नहीं किये गए अपितु उनके प्रतिरोध को भी नियंत्रित करने का पूरा दुष्चक्र रचा गया है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारी फिल्मों में देखा जा सकता है जहां सत्तर के दशक में आदर्श नायक होने वाला मज़दूर नेता अब एक विलेन में तबदील हो गया है. एक तरफ आदिवासियों और किसानों की ज़मीनें छीन कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी जा रही हैं तो दूसरी तरफ ऐसे कानून बनाए जा रहे हैं जिनसे कामगारों को अपनी मर्जी से कभी भी काम से निकाला जा सके. हडतालों-प्रदर्शनों पर प्रतिबन्ध लगाया जा रहा है तो दूसरी तरफ कामगारों के आन्दोलनों को पूरी बेरहमी से दबाया जा रहा है! और सबसे बड़ी विडम्बना यह कि इसे लेकर समाज और राजनीति में एक स्वीकार की बेशर्म चुप्पी है. वर्षों के संघर्ष और असंख्य बलिदानों से हासिल किया गया आठ घंटे के काम का अधिकार देखते-देखते छीन लिया गया और कहीं कोई प्रतिरोध सुनाई नहीं दिया. अन्ना के मामले में सक्रियता की हदें तोड़ देने वाला मीडिया दिल्ली की सडकों पर लाखों कामगारों के हुजूम को अनदेखा कर जाता है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिम है कि मई दिवस केवल एक उत्सव बन कर रह गया है?
इस सवाल पर सोचते हुए मुझे विजय गौड़ के हालिया प्रकाशित उपन्यास फाँस का एक दृश्य याद आता है जहां साफ़-सुथरे कपडे पहने ट्रेड युनियन कर्मियों का एक जुलूस सड़क से गुजर रहा है और दिहाड़ी मजदूर, सफाईकर्मी और दुसरे गरीब लोग मजदूर एकता के नारे लगाते उन लोगों को थोड़ा आश्चर्य और थोड़ा व्यंग्य से देख रहे हैं! दुनिया के मज़दूरों को एक होने का आह्वान करने वाले कामगार एक ही फैक्ट्री या दफ्तर में अलग-अ क्या इन दोनों में कोई वास्तविक एकता है? पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली ने कामगारों की जो तमाम श्रेणियाँ पैदा की हैं और दुनिया के मज़दूरों एक हो का आह्वान करने वाली ताकतें एक ही फैक्ट्री या दफ्तर में अलग-अलग खांचों में बाँट दी गयी हैं.  क्या उन सब को आपस में बाँधने वाली कोई डोर है? अगर मार्क्स की माने तो निश्चित रूप से है. इन सब के पास बेचने के लिए बस अपना श्रम है- मानसिक या शारीरिक! आज बड़े पॅकेज पाने वाला प्रोफेशनल अपने आप को भले मजदूर न माने लेकिन जब मंदी के संकट के दौरान मालिक के मुनाफे में कमी आती है तो छंटनी की तलवार उसकी गर्दन तक पहुंचती है. हमें यह समझना होगा कि चाहे दुनिया कितनी भी बदल गयी है लेकिन आज भी दो ही वर्ग हैं – पहला जिसके पास उत्पादन के साधन हैं और दूसरा जो अपना श्रम बेचता है. ज़ाहिर है कि जब तक ये दो वर्ग रहेंगे इनके बीच अंतर्विरोध भी रहेगा ही.  अपनी तमाम कमजोरियों और बिखराव के बावजूद इस अंतर्विरोध के चलते आज भी कामगार दुनिया भर में सड़क पर उतरता दिख जाता है. पिछले दिनों पेंशन सुधार जैसे मुद्दे पर अगर हमने यूरोप की सड़कों पर कामगारों का हुजूम देखा तो अपने देश में भी भयावह उत्पीडन के बावजूद बस्तर से बम्बई तक किसानों-कामगारों के संघर्ष दिखाई दे रहे हैं. यह सच है कि देश-दुनिया में कामगारों का नेतृत्व करने वाली ताकतें न केवल कमज़ोर हुई हैं बल्कि विभ्रम का भी शिकार हैं लेकिन यह भी सच है कि इतिहास में ऐसा दौर पहली बार नहीं आया है.

मई दिवस इसी रूप में कामगारों के उस लंबे ऐतिहासिक संघर्ष को याद करने तथा उनसे सीखकर अपने समय में संघर्ष तथा क्रांतियों के नए संस्करण खड़े करने के संकल्प को मज़बूत करने का दिन है. चुनौती जितनी मुश्किल है उतनी ही ज़रूरी भी. सामंतवाद को हराने में हज़ार वर्ष लगे थे, पूंजीवाद की उम्र तो अभी महज डेढ़ सौ साल है. अपराजेय लगने वाली यह व्यवस्था निश्चित रूप से पराजित की जा सकती है बशर्ते जनता की आँखों में इस व्यवस्था की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक और प्रगतिशील व्यवस्था का स्वप्न दिया जा सके. उसे बताया जा सके कि इससे बेहतर समाज बनाया जा सकता है जहां अधिक शान्ति होगी, अधिक समृद्धि और इन सबके साथ बराबरी भी. अगर हम यह कर पाए तभी मई दिवस को उसका खोया हुआ गौरव दिला पायेंगे.

सोमवार, 3 मई 2010

कम्युनिज्म एक बेकार के यूटोपिया के अलावा और कुछ नहीं ?

मई दिवस का संक्षिप्त इतिहासः
हे मार्केट के शहीदों का खून बेकार नहीं जायेगा -- अरुण माहेश्वरी
पेरिस कम्यून 

कार्ल माक्र्स और फ्रेडरिख एंगेल्स ने ‘कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणा-पत्र’ का प्रारंभ इन पंक्तियों से किया था - ”समूचे यूरोप को एक भूत सता रहा है - कम्युनिज्म का भूत“। 1848 में लिखे गये इन शब्दों के बाद आज 154 वर्ष बीत गये हैं और सचाई यह है कि आज भी दुनिया के हर कोने में शोषक वर्ग की रातों की नींद को यदि किसी चीज ने हराम कर रखा है तो वह है मजदूर वर्ग के सचेत संगठनों के क्रांतिकारी शक्ति में बदल जाने की आशंका ने। 

सोवियत संघ में जब सबसे पहले राजसत्ता पर मजदूर वर्ग का अधिकार हुआ उसके पहले तक सारी दुनिया में पूंजीपतियों के भांेपू कम्युनिज्म को यूटोपिया (काल्पनिक खयाल) कह कर उसका मजाक उड़ाया करते थे या उसे आतंकवाद बता कर उसके प्रति खौफ पैदा किया करते थे। 1917 की रूस की समाजवादी क्रांति के बाद पूंजीवादी शासन के तमाम पैरोकार सोवियत व्यवस्था की नुक्ताचीनी करते हुए उसके छोटे से छोटे दोष को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने लगे और यह घोषणा करने लगे कि यह व्यवस्था चल नहीं सकती है। अब सोवियत संघ के पतने के बाद वे फिर उसी पुरानी रट पर लौट आये हैं कि कम्युनिज्म एक बेकार के यूटोपिया के अलावा और कुछ नहीं है। 

कम्युनिज्म की सचाई को नकारने की ये तमाम कोशिशें मजदूर वर्ग के प्रति उनके गहरे डर और आशंका की उपज भर है। रूस, चीन, कोरिया, वियतनाम, क्यूबा और दुनिया के अनेक स्थानों पर होने वाली क्रांतियां इस बात का सबूत हैं कि पूंजीवादी शासन सदा-सदा के लिये सुरक्षित नहीं है। सभी जगह मजदूर वर्ग विजयी हो सकता है। यही सच शोषक वर्गों और उनके तमाम भोंपुओं को हमेशा आतंकित किये रहता है। और, मई दिवस के दिन दुनिया के कोने-कोने में मजदूरों के, पूंजीवाद की कब्र खोदने के लिये तैयार हो रही शक्ति के, विशाल प्र्रदर्शनों और हड़तालों से हर वर्ष इसी सच की पुरजोर घोषणा की जाती है कि ‘पूंजीवाद चल नहीं सकता’। इस दिन शासक वर्गों को उनके शासन के अवश्यंभावी अंत की याद दिलाई जाती है, उन्हें बता दिया जाता है कि उनके लिये अब बहुत अधिक दिन नहीं बचे हैं। 

कैसे मई दिवस सारी दुनिया में मजदूर वर्ग के एक सबसे बड़े उत्सव के रूप में स्वीकृत हुआ? क्यांे इसे हर देश का मजदूर वर्ग अपना उत्सव मानता है और सारी दुनिया के मजदूर इस दिन अपनी एकजुटता का परिचय देते हंै? क्यों आज भी वित्त और उद्योग के नेतृत्वकारी लोग मई दिवस के पालन से आतंकित रहते हैं? इन सारे सवालों का जवाब और कही नहीं, मई दिवस के इतिहास की पर्तों के अंदर छिपा हुआ है। 

मई दिवस का जन्म आठ घंटों के दिन की लड़ाई के अंदर से हुआ था। यही लड़ाई क्रमशः सारी दुनिया के मजदूर वर्ग के जीवन का एक अभिन्न अंग बन गयी। 

इस धरती पर कृषि के जन्म के साथ ही पिछले दस हजार वर्षों से मेहनतकशों का अस्तित्व रहा है। गुलाम, रैयत, कारीगर आदि नाना रूपों में ऐसी मेहनतकश जमात रही है जो अपनी मेहनत की कमाई को शोषक वर्गाें के हाथ में सौंपती रही है। लेकिन आज का आधुनिक मजदूर वर्ग, जिसका शोषण वेतन की प्रणाली की ओट में छिपा रहता है, इसका उदय कुछ सौ वर्ष पहले ही हुआ था। इस मजदूर के शोषण पर एक चादर होने के बावजूद यह शोषण किसी से भी कम बर्बर नहीं रहा है। किसी तरह मात्र जिंदा रहने के लिये पुरुषों, औरतों, और बच्चों तक को निहायत बुरी परिस्थितियों में दिन के सोलह-सोलह, अठारह-अठारह घंटे काम करना पड़ता था। इन परिस्थितियों के अंदर से काम के दिन की सीमा तय करने की मांग का जन्म हुआ। सन् 1867 में माक्र्स ने इस बात को नोट किया कि ”सामान्य (निश्चित) काम के दिन का जन्म पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग के बीच लगभग बिखरे हुए लंबे गृह युद्ध का परिणाम है।“

काल्पनिक समाजवादी रौबर्ट ओवेन ने 1810 में ही इंगलैंड में 10 घंटे के काम के दिन की मांग उठायी थी और इसे अपने समाजवादी फर्म ‘न्यू लानार्क’ में लागू भी किया था। इंगलैंड के बाकी मजदूरों को यह अधिकार काफी बाद में मिला। 1847 में वहां महिलाओं और बच्चों के लिये 10 घंटे के काम के दिन को माना गया। फ्रांसीसी मजदूरों को 1848 की फरवरी क्रांति के बाद ही 12 घंटे का काम का दिन हासिल हो पाया। 

जिस संयुक्त राज्य अमरीका में मई दिवस का जन्म हुआ वहां 1791 में ही फिलाडेलफिया के बढ़इयों 10 घंटे के दिन की मांग पर काम रोक दिया था। 1830 के बाद तो यह एक आम मांग बन गयी। 1835 में फिलाडेलफिया के मजदूरों ने कोयला खदानों के मजदूरों के नेतृत्व में इसी मांग पर आम हड़ताल की जिसके बैनर पर लिख हुआ था - ”6 से 6 दस घंटे काम और दो घंटे भोजन के लिये“। 

इस 10 घंटे के आंदोलन ने मजदूरों की जिंदगी पर वास्तविक प्रभाव डाला। सन् 1830 से 1860 के बीच औसत काम के दिन 12 घंटे से कम होकर 11 घंटे हो गये। 

इसी काल में 8 घंटे की मांग भी उठ गयी थी। 1836 में फिलाडेलफिया में 10 घंटे की जीत हासिल करने के बाद ‘नेशनल लेबरर’ ने यह ऐलान किया कि ” दस घंटे के दिन को जारी रखने की हमारी कोई इच्छा नहीं है, क्योंकि हम यह मानते हैं कि किसी भी आदमी के लिये दिन में आठ घंटे काम करना काफी होता है।“ मशीन निर्माताओं और लोहारों की यूनियन के 1863 के कन्वेंशन में 8 घंटे के दिन की मांग को सबसे पहली मांग के रूप में रखा गया। 

जिस समय अमरीका में यह आंदोलन चल रहा था, उसी समय वहां दास प्रथा के खिलाफ गृह युद्ध भी चल रहा था। इस गृह युद्ध में दास प्रथा का अंत हुआ और स्वतंत्र श्रम पर टिके पूंजीवाद का सूत्रपात हुआ। गृह युद्ध के बाद के काल में हजारों पूर्व दासों की आकांक्षाओं को बढ़ा दिया। इसके साथ आठ घंटे का आंदोलन भी जुड़ गया। माक्र्स ने लिखाः ” दास प्रथा की मौत के अंदर से तत्काल एक नयी जिंदगी पैदा हुई। गृह युद्ध का पहला वास्तविक फल आठ घंटे के आंदोलन के रूप में मिला। यह आंदोलन वामन के डगों की गति से अटलांटिक से लेकर पेसिफिक तक, नये इंगलैंड से लेकर कैलिफोर्निया तक फैल गया।“

प्रमाण के तौर पर माक्र्स ने 1866 में बाल्टीमोर में हुई जैनरल कांग्रेस आफ लेबर की घोषणा से यह उद्धरण भी दिया था कि ” इस देश को पूंजीवादी गुलामी से मुक्त करने के लिये आज की पहली और सबसे बड़ी जरूरत ऐसा कानून पारित करवाने की है जिससे अमरीकी संघ के सभी राज्यों में सामान्य कार्य दिवस आठ घंटों का हो जाये।“

इसके छः वर्षों बाद, 1872 में न्यूयार्क शहर में एक लाख मजदूरों ने हड़ताल की और निर्माण मजदूरों के लिये आठ घंटे के दिन की मांग को मनवा लिया। आठ घंटे के दिन को लेकर इसी प्रकार के जोरदार आंदोलन के गर्भ से मई दिवस का जन्म हुआ था। आठ घंटे के लिये संघर्ष को 1 मई के साथ 1884 में अमरीका और कनाडा के फेडरेशन आफ आरगेनाइज्ड ट्रेड्स एंड लेबर यूनियन (एफओटीएलयू) के एक कंवेशन में जोड़ा गया था। इसमें एक प्रस्ताव पारित किया गया था कि ” यह संकल्प लिया जाता है कि 1 मई 1886 के बाद कानूनन श्रम का एक दिन आठ घंटों का होगा और इस जिले के सभी श्रम संगठनों से यह सिफारिश की जाती है कि वे इस उल्लेखित समय तक इस प्रस्ताव के अनुसार अपने कानून बनवा लें। “

एफओटीएलयू के इस आह्नान के बावजूद सचाई यह थी कि यह यूनियन अपने आप में इतनी बड़ी नहीं थी कि उसकी पुकार पर कोई राष्ट्र-व्यापी आंदोलन शुरू हो सके। इस काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया स्थानीय स्तर की कमेटियों ने। तय हुआ कि देश भर में 1 मई को दिन व्यापक प्रदर्शन और हड़तालें की जायेगी। शासक वर्गाें में इससे भारी आतंक फैल गया। अखबारों के जरिये यह व्यापक प्रचार किया गया कि इस आंदोलन में कम्युनिस्ट घुसपैठियें आ गये हैं। लेकिन कई मालिकों ने पहले से ही इस मांग को मानना शुरू कर दिया और अप्रैल 1886 तक लगभग 30 हजार मजदूरों को 8 घंटे काम का अधिकार मिल चुका था। 

मालिकों की ओर से 1 मई के प्रदर्शनों में भारी हिंसा का आतंक पैदा किये जाने के बावजूद दुनिया के पहले मई दिवस पर जबर्दस्त प्रदर्शन हुए। सबसे बड़ा प्रदर्शन अमरीका के शिकागो शहर में हुआ जिसमें 90,000 लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें से 40,000 ऐसे थे, जिन्होंने इस दिन हड़ताल का पालन किया था। न्यूयार्क में 10,000, डेट्रोयट मंे 11000 मजदूरों ने हिस्सा लिया। लुईसविले, बाल्टीमोर आदि अन्य स्थानों पर भी जोरदार प्रदर्शन हुए। लेकिन इतिहास में मई दिवस के स्थान को सुनिश्चित करने वाला प्रदर्शन शिकागो का ही था। 

शिकागो में 8 घंटे की मांग पर पहले से ही एक शक्तिशाली आंदोलन के अस्तित्व के अलावा आईडब्लूपीए नामक संस्था की मजबूत उपस्थिति थी जो यह मानती थी कि यूनियनें किसी भी वर्ग-विहीन समाज के भ्रूण के समान होती हैं। इसके नेता अल्बर्त पार्सन्स और अगस्त स्पाइस की तरह के प्रभावशाल व्यक्तित्व थे। यह संस्था तीन भाषाओं में पांच अखबार निकालती थी और इसके सदस्यों की संख्या हजारों में थी। यहां 1 मई के प्रदर्शन के बाद भी हड़तालों का सिलसिला जारी रहा और 3 मई तक हड़ताली मजदूरों की संख्या 65,000 तक पंहुच गयी। इससे खौफ खाये उद्योग के प्रतिनिधियों ने मजदूरों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने का फैसला किया। 3 मई की दोपहर से ही जंग शुरू हो गयी। स्पाईस आरा मिल के मजदूरों को संबोधित कर रहे थे और मालिकों के साथ आठ घंटे के लिये समझौते की तैयारियां करने में लगे हुए थे। उसी समय कुछ सौ मजदूर लगभग चैथाई मील दूर स्थित मैक्कौर्मिक हार्वेस्टर वक्र्स की ओर चल दिये जहां इस आरा मिल से निकाले गये मजदूर मौजूद थे। मिल कुछ गद्दार मजदूरों के जरिये चलायी जा रही थी। 

पंद्रह मिनट के अंदर ही वहां पुलिस के सैकड़ों सिपाही पंहुच गये। गोलियों की आवाज सुन कर इधर सभा में उपस्थित स्पाईस और बाकी आरा मजदूर मैक्कौर्मिक की ओर बढ़े। पुलिस ने उन पर भी गोलियां चलायी और घटना-स्थल पर ही चार मजदूरों की मौत हो गयी। 

इसके ठीक बाद ही स्पाईस ने अंग्रेजी और जर्मन भाषा में दो पर्चे जारी किये। एक का शीर्षक था ”प्रतिशोध! मजदूरो, हथियार उठाओ“। इस पर्चे में पुलिस के हमलों के लिये सीधे मालिकों को जिम्मेदार ठहराया गया था। दूसरे पर्चे में पुलिस के हमले के प्रतिवाद में हे मार्केट स्क्वायर पर एक जन-सभा का आह्नान किया गया था। 
चार मई को सभा के दिन पुलिस ने मजदूरों का दमन शुरू कर दिया, इसके बावजूद शाम की सभा के समय हे मार्केट स्क्वायर पर 3000 लोग इकट्ठे हुए। शहर के मेयर भी आये थे, यह सुनिश्चित करने के लिये कि सभा शांतिपूर्ण रहे। सभा को सबसे पहले स्पाईस ने संबोधित किया। उन्होंने 3 मई के हमले की भत्र्सना की। इसके बाद पार्सन्स बोले और आठ घंटे की लड़ाई के महत्व पर प्रकाश डाला। जब ये दोनों नेता बोल कर चले गये तब बचे हुए लोगों को सैमुएल फील्डेन ने संबोधित करना शुरू किया। फील्डेन के शुरू करने के कुछ मिनट बाद ही मेयर भी चले गये। 

मेयर के जाते ही लगभग 180 पुलिस वालों ने वक्ताओं को घेर लिया और सभा को भंग करने की मांग करने लगे। फील्डेन ने कहा कि यह सभा पूरी तरह से शांतिपूर्ण है, इसे क्यों भंग किया जाये। इसी समय भीड़ में से पुलिस वालों पर एक बम गिरा। इससे 66 पुलिसकर्मी घायल होगये जिनमें से सात बाद में मारे गये। इसके साथ ही पुलिस ने भीड़ पर अंधाधंुध गोलियां चलानी शुरू कर दी, जिसमे कई लोग मारे गये और 200 से ज्यादा जख्मी हुए। 

इसके साथ ही अखबारों और मालिकों ने मजदूरों के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया, व्यापक धर-पकड़ शुरू हो गयी। मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया । स्पाईस, फील्डेन, माइकल स्वाब, अडोल्फ फिशर, जार्ज एंजेल, लुईस लिंग, और आस्कर नीबे पकड़ लिये गये। पार्सन्स को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पायी, वे खुद ही मुकदमे के दिन अदालत में हाजिर हो गये। 

इन सब के खिलाफ अदालत में जिस प्रकार मुकदमा चलाया गया वह एक कोरे प्रहसन के अलावा और कुछ नहीं था। अभियुक्तों के खिलाफ किसी प्रकार के प्रमाण पेश नहीं किये गये। सरकार की ओर से सिर्फ यही कहा गया कि ” आज कानून दाव पर है। अराजकता पर राय सुनानी है। न्यायमूर्तियों ने इन लोगों को चुना है और इन्हें अभियुक्त बनाया गया है क्योंकि ये नेता हैं। ये अपने हजारों समर्थकों से कहीं ज्यादा दोषी हैं। ... इन लोगों को दंडित करके एक उदाहरण पेश किया जाए, हमारी संस्थाओं, हमारे समाज को बचाने के लिये इन्हंे फांसी दी जायें। “

नीबे को छोड़ कर सबको फांसी की सजा सुनायी गयी। फील्डेन और स्वाब ने माफीनामा दिया तो उनकी सजा कम करके उन्हंे उम्र कैद दी गयी। 21 वर्षीय लिंग फांसी देने वाले के मूंह में डाइनामाइट का विस्फोट करके उसे चकमा देकर भाग गया। बाकी को 11 नवंबर 1887 के दिन फांसी दे दी गयी। 

मजे की बात यह है कि इसके छः साल बाद इलिनोइस के गवर्नर जान ऐटजेल्ड ने नीबे,फील्डेन और स्वाब को दोषमुक्त कर दिया तथा जिन पांच लोगों को फांसी दी गयी थी, उन्हंे मृत्युपरांत माफ कर दिया गया, क्योंकि मामले की जांच करने पर पाया गया कि उनके खिलाफ सबूतों में कोई दम नहीं था और वह मुकदमा एक दिखावा भर था। 

गौर करने लायक बात यह भी है कि हे मार्केट की उस घटना के ठीक बाद सारी दुनिया में मजदूरों के खिलाफ व्यापक दमन का दौर शुरू हो गया था। जिन मजदूरों ने अमरीका में आठ घंटे काम का अधिकार हासिल कर लिया था, उनसे भी यह अधिकार छीन लिया गया। इंगलैंड, हालैंड, रूस, इटली, फ्रांस, स्पेन सब जगह मजदूरों की सभाओं पर पाबंदियां लगा दी गयी। लेकिन हे मार्केट की इस घटना ने अमरीका में चल रही आठ घंटे की लड़ाई को सारी दुनिया के मजदूर आंदोलन के केेंद्र में स्थापित कर दिया। इसीलिये 1888 में जब अमेरिकन फेडरेशन आफ लेबर(एएफएल) ने यह ऐलान किया कि 1 मई 1990 का दिन आठ घंटे काम की मांग पर हड़तालों और प्रदर्शनों के जरिये मनाया जायेगा तो इस आह्नान की तरफ सारी दुनिया का ध्यान गया था। 

1889 में पैरिस में फ्रांसीसी क्रांति की शताब्दी पर माक्र्सिस्ट इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस की सभा में जिसमें 400 प्रतिनिधि उपस्थित थे, वहां एएफएल की ओर से एक प्रतिनिधि एक मई के आंदोलन के कार्यक्रम का आह्नान करने पंहुचा था। कांग्रेस में सारी दुनिया में इस दिन विशाल प्रदर्शन करने का प्रस्ताव पारित किया गया। दुनिया के कोने-कोने में 1 मई 1990 के दिन मजदूरों के शानदार प्रदर्शन हुए और यहीं से आठ घंटे की लड़ाई ने एक अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष का रूप ले लिया। 

फ्रेडरिख ऐंगेल्स इस दिन लंदन के हाईड पार्क में मजदूरों की 5 लाख की सभा में शामिल हुए थे। इसके बारे में 3 मई को उन्होंने लिखाः ”जब मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूं, यूरोप और अमरीका के मजदूर अपनी ताकत का जायजा ले रहे हैं; वे पहली बार एक फौज की तरह, एक झंडे के तले, एक फौरी लक्ष्य के लिये लड़ाई के खातिर, आठ घंटों के काम के दिन के लिये इकट्ठे हुए हैं।“

इसके बाद धीरे-धीरे हर साल मई दिवस के आयोजन में दुनिया के एक-एक देश के मजदूर शामिल होने लगे। 1891 में रूस, ब्राजील, और आयरलैंड के मजदूरों ने भी मई दिवस मनाया। 1920 में पहली बार रूस की समाजवादी क्रांति के बाद चीन के मजदूरों ने मई दिवस मनाया। भारत में 1927 में कलकत्ता, मद्रास और बंबई में व्यापक प्रदर्शनों के जरिये पहली बार मई दिवस का पालन किया गया। और, इस प्रकार मई दिवस सच्चे अर्थों में मजदूरों का एक अन्तर्राष्ट्रीय दिवस बन गया। 

हे मार्केट के शहीदों के स्मारक पर अगस्त स्पाईस के ये शब्द खुदे हुए हैं कि ” वह दिन आयेगा जब हमारी खामोशी आज हमारी दबा दी गयी आवाज से कहीं ज्यादा शक्तिशाली होगी।“ 

सारी दुनिया में आज जिस पैमाने पर मई दिवस का पालन होता है और इस अवसर पर लाल झंडा उठाये मजदूर दुनिया की परिस्थितियों का ठोस जायजा लेते हुए जिस प्रकार अपने आगे के आंदोलन की रूप-रेखा तैयार करते हंै, इससे स्पाईस के शब्द आज बिल्कुल सच में बदलते हुए जान पड़ते हैं। आज भी यह सच है कि साम्राज्यवादियों और पूंजीपतियांे की रूह मई दिवस के नाम से कांपती है। मई दिवस आज भी मजदूर वर्ग को उसकी निश्चित विजय की प्रेरणा देता है और शासक वर्गों की निश्चित हार का ऐलान करता है।   

शनिवार, 1 मई 2010

कामगारों का सवाल











मई दिवस का गौरवशाली इतिहास और आज की चुनौतियाँ

- सत्यम सत्येन्द्र पाण्डेय


औद्योगिक पूंजीवादी क्रांति ने सामंतवादी उत्पादन संबंधों को समाप्त किया. फलस्वरूप बड़ी संख्या में दस्तकार और भू-दास बेरोजगार होकर और अपना सब कुछ खोकर फैक्ट्री व्यवस्था को मजदूर बनने के लिए बाध्य हुए. औपनिवेशक व्यवस्था प्रारंभ होने के बाद पूंजीपतियों को जरूरी था कि वे उपनिवेशों के नए उभरते हुए बाजारों की आवश्यकता पूर्ति के लिए अधिक उत्पादन करें लेकिन ज्यादा मुनाफे की लालच में वे कम मजदूरों से ही काम लेते थे. फलस्वरूप काम के घंटे बढ़ते गए और मजदूर १८ से २० घंटे काम करने के लिए बाध्य हुए क्योंकि सूर्योदय से सूर्यास्त तक सामन्यतः काम लिया जाता था, और उनके पास अन्य कोई ठोस विकल्प नहीं था. इसके बदले में उन्हें इतना वेतन प्राप्त होता था कि वे रुखा सूखा भोजन खाकर अगले दिन के फिर काम करने के लायक उर्जा प्राप्त कर सकें.

१९ वीं सदी इस अमानवीय शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने की शक्ति लेकर आई और कई स्थानों पर मजदूरों ने संगठित होकर प्रतिरोध करना प्रारंभ किया. अमेरिका और फिलाडेल्फिया में मोचियों ने वेतन और काम के घंटे तय करने की मांगों को लेकर १८०६ में हड़ताल की. इसके जवाब में साजिश रचने के मुकदमे में सरकार ने उन पर उनपर मुकदमे लगे. इसके बाद के दशक तो उक्त दोनों मांगों पर केन्द्रित हड़तालों के दिन थे दुनिया कीपहली ट्रेड यूनियन, मेकेनिक्स यूनियन ऑफ फिलाडेल्फिया ने १८२७ में निर्माण उद्योग में काम करने वाले मजदूरों को हड़ताल के लिए आह्वान किया.काम के घंटे तय करने की मांग जोर पकडती जा रही थी कि १८३७ का आर्थिक संकट आया और पूंजीपति वर्ग ने नरम पड़ते हुए दस घंटे काम का प्रावधान अमेरिका के कुछ राज्यों में किया. लेकिन मांगें यहाँ रुकने वाली नहीं थीं. आखिर मजदूर तो आठ घंटे काम की मांग कर रहे थे. अब यह मांग केवल अमेरिका तक ही नहीं सीमित थी बल्कि पूरी दुनिया के मजदूरों के जुबां पर थी. सुदूर, ऑस्ट्रेलिया के मजदूरों ने इसी समय नारा दिया था ''आठ घंटे काम,आठ घंटे मनोरंजन और आठ घंटे आराम''.

अमेरिका में गृह युद्ध के दौरान कर्र ट्रेड यूनियनों ने मिलकर शनल लेबर यूनियन का गठन किया. इसने आठ घंटे काम की मांग को लेकर अपने को प्रतिज्ञाबद्ध किया. यूनियन का नेता कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स की अगुवाई में हो रही प्रथम इंटरनेशनल के भी निरंतर संपर्क में था. इसी दौर में आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग को लेकर ष्आठ घंटा - दस्तोंष् का भी निर्माण किया गया. सतम्बर १८६६ में पहले इंटरनेश्नल की जेनेवा कांग्रेस ने इस मांग का पुरजोर समर्थन किया. कार्ल मार्क्स ने भी अपनी महानतम पुस्तक ''पूंजी'' में आठ घंटे के कार्य दिवस की जरूरत और मजदूरों की जायज मांगों के लिए गोरे और काले श्रमिकों की एकता की जरूरत को रेखांकित किया.

अगले बीस बरस दुनिया भर में, ख़ास तौर पर अमेरिका और यूरोप में मजदूर वर्ग के जुझारू आन्दोलनों के नाम रहे. मजदूरों की व्यापल हड़तालों के दमन के लिए पूंजीपतियों और उनकी पक्षधर सरकारों ने सेना का सहारा लिया. सैनिक दस्तों ने निर्ममता से हड़तालों को जरूर कुचला परन्तु वे सर्वहारा वर्ग में उभर रही वर्गीय चेतना को नहीं कुचल सके. इस दौरान पूंजीवाद ने १८७३ और १८८४ के आर्थिक संकरों का दामन किया परन्तु जैसा पूंजीवाद आंतौर पर करता है, छटनी और बेरोजगारी का सहारा लेकर उनसे वक्ती निजात पाई. इससे मजदूर वर्ग का गुस्सा और भड़क उठा. इसी दौरान मार्क्स और एंगेल्स मानवता की मुक्ति के दर्शन का सृजन कर रहे थे और मजदूरों के अंतरराष्ट्रीय संगठन इंटर नेशनल का सञ्चालन भी. इसी दौरान पेरिस के मजदूरों ने बुर्जुआ सरकार का तख्ता पलटकर दुनिया की पहली मजदूर सरकार ' पेरिस कम्यून'' का गठन किया. हालांकि यह प्रयोग २ साल ही चल सका.

इस समय अमेरिका में दो बड़े श्रमिक संगठन काम कर रहे थे '' द अमेरिकन फेडरेशन आफ़ लेबर'' और ''नाइट्स ऑफ लेबर'' इनके अलावा ''आठ घंटा'' एसोशियेसन भी थीं, अमेरिकन फेडरेशन और लेबर ने अपने चैथे सम्मलेन 1884 में घोषित किया कि पहली मई १८८६ से आठ घंटे का कार्यदिवस होगा. फेडरेशन ने मजदूरों और अन्य मजदूर संगठनों से आठ घंटे ही काम करने का आह्वान किया.

पहली मई १९८६ के आन्दोलन की तैयारियों में कई स्थानों पर व्यापक हड़तालें हुईं. नाइट्स ऑफ लेबर भी आठ घंटे कार्य दिवस की व्यापक लोक प्रियता को भांपकर आन्दोलन के साथ जुड़ गया. इस कारण नाइट्स की बेतहाशा बढ़ी लोकप्रियता ने उसकी सदस्य संख्या २ लाख से सात लाख तक पंहुचा दी. फेडरेशन की सदस्य संख्या में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई. मजदूरों का मुद्दे के प्रति जुड़ाव और जुझारूपन इसी बातसे समझा जा सकता है कि १८८१ से १८८४ तक हड़तालों का वार्षिक औसत ५०० था और इनमें करीब १५००० लोगों ने भाग लिया, इसके विपरीत १८८६ में हड़तालों की संख्या उत्तरोत्तर बढती हुई १५७२ तक जा पंहुची और इसमें करीब ६ लाख लोगों ने हिस्सेदारी की.

व्यापक हड़ताल के दिन अर्थात १ मई १८८६ को शिकागो में हड़ताल सर्वाधिक आक्रामक थी क्योंकि यह शहर उस वक्त जुझारू वामपंथी आन्दोलन का प्रमुख केंद्र था. हड़ताल का आह्वान ष्अमेरिकन फेडरेशन और लेबर और नाइट्स ऑफ लेबर ने किया. अमेरिका के मजदूर वर्ग की पहली संगठित राजनैतिक पार्टी ष्सोशलिस्ट लेबर पार्टीष् भी इसमें शरीक हुई. हड़ताल के एक दिन पूर्व सेंट्रल लेबर यूनियन ने एक प्रदर्शन किया जिसमें २५००० मजदूर शरीक हुए.

१ मई को शिकागो में मुकम्मल हड़ताल हुई. सारी फैक्ट्रियां और कारखाने बंद रहे. ''काम के आठ घंटे'' के नारे लगाते हुए जब मजदूर शहर की सड़कों पर निकले तो शहर जाम हो गया. मजदूरों के वर्गीय हितों को हुई इस महान एकजुटता को पूंजीपति और उनकी सरपरस्त सरकार बर्दाश्त नहीं कर पाई. मजदूरों के आन्दोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने जुलूस को गिरफ्तार कर लिया. सरकार की इस कार्यवाही का विरोध करने के लिए शिकागो के एक चैक पर ३ मई को मजदूरों की विशाल विरोध सभा हुई. इस सभा पर पुलिस ने हमला किया. इस बर्बर हमले में चाह मजदूर शहीद हुए और सैंकड़ों घायल हुए. अगले दिन पुनः आयोजित विरोध सबह में पुलिस ने कायराना हमला किया, और बमबारी की.

इस हमले में ४ मजदूर फिर शहीद हुए पुलिस ने अपनी वर्गीय पहचान उजागर करते हुए मुकदमे चलाए, और पार्सन्स, स्पाइस, फिशर तथा एंजेल को फांसी की सजा दी गई मजदूरों की वर्ग चेतना के विरुद्ध यह पूंजीवादी प्रतिशोध था जिसमें पूरी दुनिया के मजदूरों को उत्तेजित किया तथा एकजुटता के लिए प्रेरित भी किया.इस आन्दोलन में मजदूरों का जो लहू बहा उसने मजदूरों को वर्गीय प्रतीक लाल झंडे के नीचे आने के लिए प्रेरित किया बाद में शहादत और प्रतिरोध की १ मई की तारीख को दूसरे इंटरनेशनल समेत अनेक संगठनों ने अंतर राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया. इस बलिदान में आठ घंटे के कार्य दिवस को भी व्यापक लोकप्रियता और कानूनी समर्थन दिलाने के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम किया. बाद में लगभग सभी देशों में आठ घंटे को ही वैधानिक कार्य दिवस स्वीकार किया गया.

आज जब हम इक्कीसवें शताब्दी में बैठकर मई दिवस केमुताल्लिक चर्चा कर रहे हैं तो हमें हालात ज्यादा कठिन और चुनौती भरे नजर आते हैं. सोवियत संघ के पतन के बाद एक ध्रुवीय हो चली दुनिया में पूंजी परस्त निजाम भू मंडलीकरणध्उदारीकरणध्निजीकरण की ऐसी भयंकर आंधी लेकर आया है कि तथाकथित लोकतंत्र का दमन भी तार-तार हो गया है. और पूंजीवाद नंगा दिखाई देने लगा है. हमारे देश में यद्यपि सार्वजानिक क्षेत्र में आठ घंटे का कार्य दिवस मानी है, परन्तु पूंजी परस्त सरकारें धीरे धीरे इसकी जडें खोदने में लगी हुई हैं देश की कुल श्रम शक्ति का ९३ फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है जहाँ न तो आठ घंटे के कार्य दिवस की सीमा है और न ही किसी तरह की सार्वजानिक सुरक्षा, ना ही परिवार के गुजारे लायक युक्ति-युक्त वेतन है. आवास शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए तो खैर कुछ नहीं ही है. नए उत्पादन संबंधों में सेवा क्षेत्र को तैयार किया है, बी पी ओ कॉल सेंटर है जहाँ काम के कोई न्यूनतम घंटे नहीं है. यहाँ काम करने वाले १५ से २० घंटे लगातार काम करने के लिए मजबूर हैं. यदि काम करना है तो ठीक वर्ना बाहर क्योंकि कोई सेवा शर्तें तो उन्हें बचाती नहीं.

किसी भी तरह के उत्पादन में दो वस्त में निवेश करनी होती हैं - श्रम और पूंजी. पूंजीवाद के नग्न दौर में पूंजी को ही सब कुछ माँ लिया गया है. वित्ते पूंजीवाद के समय में स्टाक मार्केट की आवारा पूंजी वास्तविक संपत्ति से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है. स्टॉक मार्केट की इस पूंजी के पैरोकार हमारे राजनेता और पूंजीपति वेश्यालयों के दलालों की भूमिका निभाते हुए जानता को ठग रहे हैं. पूंजी के आवारापन और नव अमेरिकी साम्राज्यवाद ने मौजूदा आर्थिक महामारी को जन्म दिया है जिसने कई देशों की अर्थ व्यवस्थाओं को बर्बाद कर दिया है. साम्राज्यवादी सरकारें हमेशा की तरह आर्थिक संकट से निजात पाने के लिए युद्धों की भूमिका तैयार कर रहे हैं.

यकीनन पूंजीवाद की इस विकसित अवस्था ने जो विशाल समृद्धि पैदा की है, उसका छोटा सा हिस्सा रिसकर मजदूरों की ओर भी आया है. (हालांकि अमीरी-गरीबी की खाई निरंतर बढती चली जा रही है). सार्वजनिक और सेवा क्षेत्रों में कर्मचारियों की जो नई बिरादरी पैदा की है. वह स्वयं को मजदूर मानने से इन्कार करती है. और इस वजह से स्वयं पर हो रहे शोषण को प्रकारांतर से न्यायोचित ठहराती है.लम्बे समय से मजदूर आन्दोलन इन्ही सफेदपोश मजदूरों की नुमायन्दगी करता रहा है और इस कारण से उसकी लड़ाई वेतन भत्तों के बढ़ोत्तरी यानी अर्थवाद पर केन्द्रित रही है. तथा पूंजीवादी निजाम को ध्वस्त करने का सवाल कभी उसके अजेंडे पर आया ही नहीं. अभी पिछले कुछ समय से केन्द्रीय वामपंथी श्रमिक संगठनों में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के सवालों को उठाना और उन्हें स्वयं से जोड़ना शुरू कियाहै. यही आज के दौर का सर्वहारा है और यदि इसमें वर्गीय चेतना उत्पन्न की जा सकी तो समाज बदलने के लिए असली हथियार साबित होगी. और मई दिवस के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि भी.

रविवार, 25 अप्रैल 2010

तू ज़िंदा है तो ज़िन्दगी की जीत पर यक़ीन कर

आष्ट्रेलिया में काम के घंटे आठ किये जाने के लिये 1886 में लगाया गया पोस्टर

( (युवा संवाद के प्रदेश संयोजक प्रदीप की मई दिवस पर लेखमाला का तीसरा और अंतिम अंश)

ऐसा नहीं है कि आज पूंजी के निजाम के खिलाफ दुनिया में मजदूर प्रतिरोध नहीं कर रहे है। लेकिन इस दौरान पूंजी के आंतरिक और बाह्य चरित्र में काफी परिवर्तन आये हैं। आज के पूंजीवाद की वयाख्या 19 वी सदी के औद्योगिक पूंजीवाद को ध्यान में रखकर नही की जा सकती । पूंजीवाद के अधीन उत्पादन शक्तियों के विकास ने नए-नए सेक्टर पैदा किए है। उसने अपना आंतरिक पुर्नगठन किया है। उदाहरण के लिए दुनिया के सभी पूंजीवादी देशों में सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण व बड़ा हिस्सा है। पूंजीवाद की आंतरिक पुर्नगठन की इस प्रक्रिया ने इसके अंदर आने वाली मंदी की तीव्रता को कम करने में मदद पहुॅचायी है। मार्क्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टों में पूंजीवाद की जिस विश्व-व्यापकता की बात कहीं थी, आज वो साकार हो रही है। अपने इतिहास के दौर में आज पंूजीवाद उत्पादन प्रणाली एवं राजनीति व्यवस्था के रूप में एक वैश्विक हकीकत बना है और लगातार बन रहा है। पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में आए इन परिवर्तनों ने मजदूर वर्ग के स्वरूप को भी बदल दिया है।

यदि हम आज भी मजदूर वर्ग को सिर्फ़ 19वी सदी के औद्योगिक सर्वहारा के रूप में देखना चाहते है तो हमें निराशा ही हाथ लगेगी। आज जब परिवर्तकामी लोगों में मजदूर तबके के बीच काम करने का सवाल आता है तो सबसे पहले यहीं बात सामने आती है कि हमें शहर की झुग्गी-बस्ती में रहने वाले गरीब मजदूरों के बीच काम करना चाहिए या औद्योगिक क्षेत्र की गरीब मजदूर बस्तियों में। मैं यह नहीं कह रहा हूॅ कि गरीब मजदूर वर्ग के तबकों को संगठित करना और उनके मुद्दों पर काम करना जरूरी नहीं है। लेकिन मेरा सवाल यह है कि आखिरा हमारे जहन में मजदूर वर्ग की यही एकमात्र छवि क्यों बनती है? क्या इसका कारण मजदूर वर्ग की पुराने दौर की राजनीतिक समझ में तो नहीं है? इस बात पर गौर किया जाना चाहिए। हमें पूंजीवाद के अंदर आए बदलावों और उससे पैदा हुआ श्रम-विभाजन के कारण मजदूर वर्ग के स्वरूप में आये बदलावों व उसके लिए जिम्मेदार कारकों पर भी गौर करना चाहिए।

आज मजदूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अपने को मजदूर ही नहीं समझता। ये वहीं मजदूर वर्ग का हिस्सा है जिसे हम आज मध्यम वर्ग के रूप में देखते है जो अपने आप को एग्जीक्यूटिव, इंजीनियर, टेकनीशियन आदि के रूप में देखता है न कि मजदूर वर्ग के सदस्य के रूप में। अपने आप को मजदूर न समझने वाला मजदूरों का यह तबका भी मुख्यतः अपने श्रम के बाजार में बिक्री पर निर्भर करता है। ये लोग कम्पनीयों के थोडे़-बहुत शेयर भी लिए रहते है या कोई कम्पनी अपने इन कर्मचारियों में शेयर का एक छोटा सा हिस्सा दे देती है। ऐसी परिस्थिति में इनकों मजदूरों द्वारा पैदा किए गए अधिशेष में एक छोटा टुकड़ा लाभांश के रूप में मिल जाता है लेकिन वे इसके बारे में चिंता नहीं करते कि वे अपने श्रम से मिलने वाले पारिश्रमिक की तुलना में कई गुना अधिशेष पैदा कर रहे हैं और जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। पिछलें दिनों जब मंदी का असर अर्थव्यस्था पर पड़ा और उसी समय कुछ कम्पनियों के शेयर के दाम भी नीचे गिरे तो मेंरे एक मित्र जोकि एक प्रतिष्ठित कम्पनी में एग्जीक्यूटिव है वह अपनी नौकरी से ज्यादा वह उस कम्पनी के शेयरों के दाम गिरने से ज्यादा परेशान था जिसके चंद शेयर उसने भी खरीदे हुए थे। ये मजदूर यह भूल जाते हैं कि मजदूर वर्ग ही सारी संपदा पैदा करते है लेकिन यह सारी संपदा उनके हाथ में पहूंच जाती है जो पूंजी कि नियमों के मुताबिक उसके ‘मालिक’ होते है।

अपनी संपदा की बढोत्तरी के लिए पूंजीवाद मेहनतकशों के एक तबके की क्षमताओं में लगातार वृद्धि करता है व उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन पूंजीवाद मजदूर वर्ग के बहुत बड़े हिस्से को अमानवीय विपन्नता और स्थायी असुरक्षा के हालात में बनाए रखता है। जिन्हें काम मिल जाता है उन्हे चंद पैसों के लिए दिन-रात पसीना बहाना पड़ता है क्योकि उनके अलावा बहुत सारे लोग ऐसे भी है जिन्हें काम नहीं मिला है और वे इनसे से भी कम पैसों पर काम करने के लिए तैयार है। इस प्रकार पूंजीवाद मजदूरों को एक-दूसरे के ही खिलाफ खड़ा कर देता है। जो मुट्ठी भर लोग किसी प्रकार का हुनर हासिल कर लेते है और अच्छी नौकरियां पा लेते हैं, अच्छी तनख्वाह पाने लगते हैं और खुद को मजदूर नहीं मानते वे पूंजी के इस बेरहम तर्क से अछुते नहीं रह पाते। उन्हें भी अपनी हैसियत और पद बनाए रखने के लिए लगातार और ज्यादा, और कठोर परिश्रम करते रहना पड़ता है।

पूंजी और श्रम के बीच के इस अंतर्विरोध को यह व्यवस्था समाप्त नहीं कर सकती। जिस पूंजीवाद ने पूंजीपति वर्ग को पैदा किया है उसी ने मजदूर वर्ग को भी जन्म दिया है। आज मजदूर वर्ग व पूरी मानवता पर जिस अमानवीयता को पूंजीवाद ने थोप रखा है वह इसके लिए किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकता। पूंजी की अपने मुनाफे तथा उसे लगातार बढ़ाते जाने के लिए प्रकृति के निमर्म दोहन के तर्क के कारण आज पृथ्वी के अस्तित्व पर ही खतरें मडराने लगे हैं। पूंजीवाद पहले पर्यावरण को बर्बाद करके मुनाफा कमाता है और फिर पर्यावरण सुधाराने के नाम पर भी मुनाफा बनाता है। इसलिए आज मजदूर वर्ग पर मानवता को पूंजी के शोषण से बचाने के एतिहासिक कार्यभार के साथ-साथ उस प्रकृति को बचाने का जिम्मा भी है जिसका मानवता एक अभिन्न हिस्सा है।

अब दुनिया के पैमाने पर इतिहास में पहली बार मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश तबकों के सामने पूंजीवाद से लड़ने की सीधी चुनौती सामने है। भविष्य में जब भी इंकलाब होगें वे सीधे पूंजीवाद की परिस्थितियों में पूंजीवाद के खिलाफ सम्पन्न होगें और इसके लिए उचित रणनीति बनाने एवं समाजवाद के अगले दौर की रूपरेखा पेश करने का कार्यभार मजदूर वर्ग व उसके अगुवाओं की आज सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। इस बार वे समाजवाद के निर्माण के लिए अपने वर्ग के तमाम तबकों को साथ लाने के लिए तैयार होंगे। इस बार समाजवाद जनतंत्र, समानता और आजादी का तथा उत्पादकता, सृजनात्मकता और समृद्धि का प्रेरक माॅडल होगा। मजदूर वर्ग इतिहास से सबक लेते हुए पंूजीवाद को विष्व ऐतिहासिक मुकम्मल शिकस्त देने के लिए फिर उठ खड़ा होगा। मजदूर दुनिया का सृजन करते हैं, परंतू दुनिया उनके हाथों में नहीं है। वे स्वर्ग का निर्माण करते हैं, लेकिन स्वर्ग से बाहर धकेल दिए जाते है। जिंदा रहने के लिए मजदूरी और वेतनों पर आश्रित ये मजदूर अभी भी पूंजीवाद के ‘‘उजरती गुलाम’’ है। अपनी जीवन परिस्थितियों में आये तमाम बदलावों के बावजूद आज भी दुनिया के मजदूरों के पास खोने के लिए कुछ नहीं है; आज भी उनके सामने जीतने के लिए एक सारी दुनिया पड़ी है।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

फिर पूंजीवाद किस बात का जश्न मना रहा है?



(युवा संवाद के प्रदेश संयोजक प्रदीप की मई दिवस पर लेखमाला का दूसरा अंश)





19 वी शताब्दी में पूंजीपति वर्ग के खिलाफ संघर्ष में तेजी आयी। 1831 में फ्रांस के लियों  नगर में मजदूरों का विद्रोह हुआ, जिसे सरकारी सैनिकों ने निर्ममता से कुचल डाला। ब्रिटेन जोकि उन दिनों सबसें अधिक विकिसित देश था और अति उत्पदन के संकटों से सबसें अधिक त्रस्त था, पूंजीपतियों के विरूद्ध मजदूर वर्ग के संघर्ष प्रथम व्यापक, जनव्यापी तथा राजनीतिक रूप से संगठित सर्वहारा (मजदूर जिनके पास अपनी श्रम शक्ति बेचेने के अलावा उत्पादन का कोई साधन नहीं होता) के क्रांतिकारी आंदोलन - चार्टिस्ट आंदोलन - का रूप  ग्र्रहण किया। चार्टिस्ट आंदोलन में दो तरह की धाराएं थी। एक, जो शासक वर्गों से व्यस्क मताधिकार, संसद के सालाना सत्र की मांग कर रही थी। दूसरे, वे थे जो शासक वर्ग को उखाड़ फेंकना चाहते थे लेकिन उनके पास भी अपनी लक्ष्य पूर्ति के लिए निश्चित विचार नहीं थे। चार्टिस्ट आंदोलन के बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार क्रिस हरमन अपनी पुस्तक ‘विश्व का जन इतिहास’ में लिखते है कि ‘अभी तक पूंजीपति वर्ग ने सामंतशाही के विध्वंस का काम युरोप में नहीं किया था, पर उसने एक नया शोषित वर्ग पैदा कर लिया था जो फ्रांसीसी क्रांति की क्रांतिकारी भाषा का इस्तेमाल पूंजीपति वर्ग के ही विरूद्ध कर सकता था’। 

हितों की समानता वस्तुगत रूप से मजदूरों को उनके संघर्ष के लिए एकताबद्ध करती थी। निर्मम शोषण इसे अवश्यंभावी बनाता था। उन दिनों मजदूर की जीवन परिस्थितियां बहुत कठोर थी। काम की सामान्य परिस्थितियां बनाने की उद्योगपति कोई चिंता नहीं करते थे। सवेतन छुट्टी नहीं मिलती थी, न ही सप्ताह में एक दिन की अनिवार्य छुट्टी। मेहनतकशों को कारखानों की ही दुकान से बढ़ी-चढ़ी कीमतों पर घटिया क़िस्म का माल खरीदना पड़ता था। मजदूरों को अपने संगठन बनाने और हड़ताल करने का अधिकार नहीं था।  19वी शताब्दी के आरम्भ में मजदूर ‘सूरज निकलने से सूरज ढलने तक’ काम करते थे। उस समय मजदूर को 14,16 यहां तक कि 18 घंटे तक अमानवीय हालातों में काम करने के लिए मजबूर किया जाना आम बात थी। इन्हीं परिस्थितियों ने मजदूरों को अपने संगठन बनाने के लिए बाध्य किया। 19वी सदी के नौवें दशक के अंत में इंगलैंड में मजदूर आंदोलन के विकास के कारण नयी ट्रड यूनियनें बनने लगी। उन्होंने मजदूर कानून लागू करने, विशेषकर आठ घंटे का कार्य दिवस शुरू करवाने के लिए संघर्ष किया। 

ट्रेड यूनियन आंदोलन का विस्तार अब युरोप और अमेरिका में भी होने लगा। पहली मई 1886 को संयुक्त राज्य अमेरिका में पूरे देश में मजदूरों की हड़ताल हुई और जलूस निकाले गए। सबसे बड़ी हड़ताल शिकागों में हुई। भयानक शोषण के शिकार मजदूर श्रम की परिस्थितियां सुधारने तथा आठ घंटे का कार्य दिवस निश्चित करने की मांग कर रहे थे। यह मांगे उस समय बेहद क्रांतिकारी मंागें थी। मजदूरों के आंदोलन को कुचलने के लिए अमेरिकी सरकार ने पूंजीपतियों के साथ मिलकर मजदूरों की शांतिपूर्ण प्रदर्षन पर पुलिस से गोलियां चलवायी। कई मजदूरों पर मुकदमा चलाकर उन्हें फाॅसी की सजा दे दी गई। अनेकों को लम्बी कैद की सजा सुनायी गयी। अमेरिका में हुई इन घटनाओं ने दुनिया के मजदूरों को यह दिखा दिया पूंजीवाद से संघर्ष कें लिए सभी देशों के मजदूरों का एकजुट होना आवश्यक है। तब से पहली मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी एकजुटता के प्रदर्शन का दिन बन गया। मजदूरों के आंदोलन के दबाव के कारण ही आठ घंटे के कार्य दिवस का कानून बनाया गया तथा मजदूरों के हितों में अन्य अनेक कानून बनाये गए। 

ऐसा नहीं है कि इस दौर में मजदूर वर्ग ने केवल अपने कार्य-दशाओं में सुधार के लिए व जनतांत्रिक अधिाकरों के लिए संघर्ष किया और उसमें जीत भी हासिल की। 18 मार्च 1871 को फ्रांस के मजदूर वर्ग ने पेरिस पर कब्जा कर अपनी सत्ता कायम कर ली । मार्क्स और एंगेल्स ने कम्युनिष्ट घोषणा-पत्र में लिखा था कि ‘पूंजीपति वर्ग अपनी कब्र खोदने वाले’ स्वंय पैदा करता है, 18 मार्च 1871 को फ्रांस के पंूजीपति वर्ग ने देखा कि उपर्युक्त कथन कितना सही है। मजदूर वर्ग राज्य-सत्ता पर अपना कब्जा सिर्फ़ दो माह ही रख पाया लेकिन इस दौरान उसने मजदूर वर्ग के हितों में कई कदम उठाये - बेकरियों में रात के काम पर पाबंदी, मालिकों द्वारा बंद किए फैक्ट्रियों और वर्कशाप मजदूर संगठनों के सुपंर्द, विधवाओं को पेंशन, हर बच्चे को मुफ़्त षिक्षा तथा महिलाओं को मताधिकार आदि। हम जानते है कि पुंजीवाद के अधीन महिलाओं को मताधिकार के लिए काफी लम्बा संघर्ष करना पड़ा। भयानक षोषण की चक्की में पिस रहे मजदूरों के लिए ये काफी क्रांतिकारी मांगें थी। मजदूरों के सत्ता के इस पहले प्रयोग ‘पेरिस कम्यून’ के बारे में मार्क्स ने लिखा कि ‘‘पूंजी की दुनिया के लिए यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौती थी। पूंजी द्वारा अपनें विरूद्ध पैदा किए गए वर्ग के लिए सबसे बड़ी प्ररेणा भी वही थी।’

 मेहनतकशों के पास अपनी राज-सत्ता कायम करने का अवसर पेरिस कम्यून के कई दशकों बाद 1917 में पहली बार रूस में आया। जब वहां षोषक वर्गों की सत्ता को उखाड़ कर मजदूर वर्ग के नेतृत्व में पहली बार समाजवाद बनाने का कार्य ्शुरु हुआ। क्रांति के परिणामस्वरूप देखते ही देखते सोवियत रूस जो कि एक पिछड़ा हुआ मुख्यतः किसानी अर्थव्यस्था और जारषाही की राजसत्ता वाला देष था, मजदूर वर्ग के अथक मेहनत की बदौलत एक औद्याोगिक मुल्क में बदल गया। यह वही समय था जब पूंजीवादी मूल्क महामंदी के मकड़ जाल में फंसे हुए थे, जबकि सोवियत रूस विकास के नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा था। समाजवादी विकास को देखकर पूंजीवाद के विचारक भी आश्चर्यचकित थे। उन्होंने समाजवाद के बारे में कहां कि हमने भविष्य देखा है और वह काम करता है। 

रूसी इंकलाब के बाद 1949 में चीन में उसके बाद क्युबा में मेहनतकश वर्गों के नेतृत्व में सफल इंकलाब हुए। एक समय ऐसा था जब समाजवाद के विचार को सिर्फ़ विचार - विमर्श का विषय माना जाता था, अब वह मानवता के एक बहुत बड़े हिस्से की मुक्ति की हकीकत बन गया। इन इंकलाबों ने एक समय महान सफलताएं अर्जित की। इन्होंने अपने समाज की उस समय की उत्पीड़नकारी व्यवस्थाओं का खात्मा किया। लेकिन ये क्रांतियां पुंजीवाद की विश्वव्यापी व्यवस्थाा को शिकस्त देने में सफल सबित नहीं हुई। 20वी सदी की महान समाजवादी क्रांतियां अंततः पूंजीवादी रास्ते पर चली गई। सोवियत संघ का विघटन हो गया और आज का तथाकथित ‘कम्युनिस्ट’ चीन शुद्ध पूंजीवाद के रास्ते पर है। सोवियत संघ के विघटन के साथ की पूंजी के पैरोकारों और विचारकों ने ‘इतिहास के अंत’ की घोषणा कर दी। क्या यह वास्तव में इतिहास का अंत था? क्या पूंजीवाद के जिन अंतर्विरोधों ने समाजवादी क्रांति की जमीन तैयार की थी, उस पर पूंजीवाद ने विजय प्राप्त कर ली है? 

यहां यह बात ध्यान रखने की है कि 20वी ्सदी का कोई भी इंकलाब सीधे पूजीवाद के खिलाफ सम्पन्न नहीं हुआ था। फिर पंूजीवाद किस बात पर जश्न मना रहा है? 20वी सदी की समाजवादी क्रांतियां मुख्यतः सांमती अर्थव्यस्था, गैर जनतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली व विष्व युद्ध की परिस्थितियों में सम्पन्न हुई थी। ये सभी समाज बेहद पिछडे हुए समाज थे जहां पूंजीवादी उत्पादन संबधों की अभी षुरूआत ही हो रही थी। इन क्रांतियों के मुख्य नारे थे - रोटी और शांति, जमीन जोतने वाले को। ये इंकलाब जिन सवालों और परिस्थितियों से निपटने के लिए हुए थे, उन कार्यभारों को इन्होंने सफलतापूर्वक पूरा किया। इन क्रांतियों ने इन पिछड़े हुए समाजों को एक आधुनिक व औद्योगिक समाजों में तब्दील कर दिया। इस दौरान आपातकाल और पिछड़ेपन से निपटने के लिए जिन आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं का जन्म हुआ वहीं बाद में जाकर इनके पूंजीवादी रास्ते पर लौटने का मुख्य कारण बनी। अपनी तमाम खुबियों के बावजूद समाजवाद के इन माॅडलों में भी मजदूर वर्ग अपने श्रम का सिर्फ़ आपूर्तिकर्ता बना रहा तथा उसका अपने श्रम से उत्पन्न अधिशेष पर कोई नियंत्रण नहीं था। मजदूर वर्ग की न तो अर्थवयस्था के संचालन में कोई भूमिका बन पायी और न ही राजनीतिक सत्ता के संचालन में। मजदूर वर्ग की राजसत्ता का पहला प्रयोग 1871 में पेरिस में हुआ। उससे सीख कर समाजवाद के निर्माण का दुसरे बड़े प्रयोग 20वी शताब्दी में हुए और इन इंकलाबों ने पूरी दुनिया का इतिहास बदल दिया। आज जब समाजवाद की अंतिम मृत्यू की घोषणाऐं की जा रही है, यह याद रखना चाहिए कि पूंजीवाद को एक आर्थिक और राजनीतिक प्रणाली के रूप में स्थापित होने में 200 वर्षों से ज्यादा का समय लगा। और मजदूर वर्ग द्वारा पूंजीवाद को एक आर्थिक-राजनीतिक प्रणाली के रूप में  सीधे चुनौती देने का समय पहली बार अब आ रहा है

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

मई दिवस पर कुछ मुख़्तसर सी बातें


(युवा संवाद के प्रदेश संयोजक प्रदीप की मई दिवस पर लेखमाला का पहला अंश)

मनुष्य जितना अधिक मूल्य पैदा करता है वह उतना ही कम उपभोग करता है, वह जितना ही मूल्य पैदा करता है उतना ही मूल्यहीन होता जाता है’........‘बुर्जूआ समाज में जीवित श्रम संग्रहीत श्रम को बढ़ाने का ज़रिया मात्र है....पूंजी स्वतंत्र है, उसका व्यक्तित्व है जबकि जिंदा व्यक्ति निर्भर है, उसका कोई व्यक्तित्व नहीं’
कार्ल मार्क्स





14वी-15वी शताब्दी में युरोप में पूंजीवादी उत्पादन पद्वति के प्रारम्भिक अंकूर फूटने लगे थे। लेकिन 16 वी शताब्दी तक उजरती मजदूर (ऐसे लोग जिनके पास उत्पादन के अपने कोई साधन नहीं होते तथा अपने श्रम-षक्ति के बाजार में बिक्री पर निभर्र करते है) आबादी का नगण्य हिस्सा थे। लेकिन औद्योेगिक क्रांति के परिणामस्वरूप पहले इंगलैंड में उसके बाद पूरे युरोप व अमेरिका में उजरती मजदूरों की संख्या लागातार बढ़ती गई। पूंजी के संकेन्द्रण के साथ ही मजदूरों का संकेन्द्रण भी बढ़ने लगा। इसी के साथ पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग के हितों में टकराहट भी तेज होती गई। पूंजीवादी उत्पादन के संबंधों के प्रकट होने व विस्तार के साथ पंूजीवादी शोषण के विरूद्व मजदूरों का संघर्ष भी आरम्भ हूआ। जाॅन थेलवेल नामक रेडिकल आंदोलनकारी ने 1796 में लिखा था कि भविष्य की संभावनाऐं क्या थी - ‘‘कुछ हाथों में पूंजी के संकेन्द्रण और एकाधिकार.....की विराटता में समाधान के बीज़ थे......जो कुछ भी मनुष्य साथ लाता है उसमें कुछ बुराइयां भी होती हों तो अंततः उससे मानव स्वतंत्रता प्रोन्नत होती है, इसलिए हर बड़ा वर्कषाप या उत्पादन ग्रह एक तरह का राजनीतिक समाज होता है जिसे किसी पार्लियामेंट का कोई कानून चुप नहीं करा सकता और कोई मजिस्ट्रेट उसे भंग नहीं कर सकता.’’ उसकी भविष्यवाणी की पुष्टि दो दषकों में ही हो गई। ब्रिटेन में आंदोलनों का एक सिलसिला षुरू हो गया जो पहले से अधिक व्यापक और स्थायी षाबित हुआ। 1790 में लंदन के रेडिकल कारीगरों ने जिनमें मोज़ा बनाने वाले और जुलाहे जिनकी मजदूरी मषीने बनाने के कारण घट गई थी और कुशल मजदूरों, सूत कातने वालों, खेत मजदूरों की गैर-कानूनी यूनयिनों के संघर्ष के कई दौर आये - मशीने तोड़ी गई, जन प्रदर्शन हुए।


यह मजदूर वर्ग के विरोधों का आरंभिक दौर था। अभी तक मजदूर पूंजीवादी व्यवस्था के अधीन होने वाले अपने शोषण के स्वरूप को समझने में सक्षम नहीं थे। मजदूरों के अस्तित्व की परिस्थितियां ही उन्हें संघर्ष के लिए विवष करती थी। लंबें समय तक वे अपने वर्गीय हितों को नहीं समझ पाये और यह भी कि उनके ये हित पूंजीपति वर्ग के हितों के विपरीत हैं। अपनी सामाजिक परिस्थितियों (जिंदगी के हालातो) को बदलने की कोषिष में मजदूर अपना गुस्सा मशीनों पर निकालते थे। वे अपने हालातों के लिए मशीनों को जिम्मदार समझते थे। उन दिनों मजदूरों की वर्ग चेतना के पिछड़ेपन के कारण इसने मशीनों के खिलाफ विद्रोह का रूप ग्रहण किया। पंूजीपतियों के भयानक षोषण के जवाब में मजदूर मशीनें तोड़ते थे। मशीनों या नई मशीनों के आ जाने से श्रम की उत्पादकता कई गूना बड़ जाती है, जिसके कारण मजदूरों की छटनी कर दी जाती है क्योकि अब नई मशीनों के माध्यम से पहले से कम मजदूर कई गुना अधिक उत्पादन कर सकते हैं। नई तकनीक और मशीनों का परिणाम काफी मजदूरों के बेरोजगार हो जाने में होता था जिसके कारण वे भूखमरी के कगार पर पहूॅच जाते थे। इसके लिए वे मशीनों को दोषी समझते थे। परंतू अपने जीवन अनुभव के आधार पर मजदूर धीरे-धीरे यह सीख रहे थे कि बात मषीनों की नहीं है, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था की है, जिसमें इन मषीनों का उपयोग उद्योगपतियों को ओर समृ़द्ध बनाने के लिए किया जाता है। अभी भी मजदूर पूंजीपतियों को अपना वर्ग षत्रु नहीं समझते थे, कतिपय दुष्ट व्यक्तियों के नाते ही उनसे संघर्ष करते थे। पूंजीवाद के विकास के साथ ही अपने हितों के लिए संघर्ष के दौरान ही मजदूर वर्ग ने अपने असली शत्रुओं की पहचाना, अपने वर्गीय हित समझे और यह भी कि वे शासक वर्ग के हितों के विपरीत हैं।

लेकिन आज भी काफी संख्या में ऐसे विचार और लोग मौजूद है जो लोगों की गरीबी, शोषण और बेरोजगारी के लिए मशीनों या मशीनीकरण को जिम्मेदार समझते हैं। न कि उस सामाजिक व्यवस्था को जिसके अधीन आज तकनीक का इस्तेमाल पूंजीपति वर्ग के मुनाफे को बढ़ाने के लिए किया जाता है, न कि मजदूर वर्ग को काम के घंटे कम करके उनके व्यक्त्वि के अन्य पहलुओं का विकास करने के लिए। जब से मानव सभ्यता विकसित हुई है तभी से मनुष्य अपनी आजीविका को बेहतर और कम समय में कमाने के लिए नई तकनीकों का विकास करता रहा है। उत्पादन की तकनीकों में यह विकास पूंजीवाद के अधीन सबसे ज्यादा हुआ है। जरूरत तकनीक के विरोध की नहीं बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था के स्थान पर समाजवादी व्यवस्था के स्थापना की है ताकि मजदूर अपने श्रम से पैदा अधिशेष का स्वंय मालिक व नियोजनकर्ता बन सकें और उत्पादन की शक्तियों का विकास पूरी मानवता की मुक्ति का माध्यम बनें न कि आज की तरह केवल पूंजीपतियों की शोषण और लूट का माध्यम।