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शनिवार, 15 मई 2010

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना अज्ञेय को 'सी आई ए का एजेंट कहते थे

(यह जनमत में प्रकाशित अजय सिंह के आलेख आलेख का दूसरा हिस्सा है। पाठकों ने इसके साथ इसी अंक में प्रकाशित प्रणय कृष्ण के जवाब को भी देने की मांग की थी तो उसका स्कैन भी लगाया जा रहा है। पहला हिस्सा यहां और कांग्रेस फ़ार कलचरल फ़्रीडम, जिससे अज्ञेय का गहरा नाता था, की जानकारी यहां क्लिक करके ली जा सकती है)

प्रामाणिक भारतीयता बनाम उर्दू-हिंदी का दोआब

जितनी बार अज्ञेय विदेश यात्रा से लौटते, देश के अंदर बड़े पूंजी घरानों से उनकी आत्मीयता बढ़ती चली जाती, जैसे-जैसे उनकी ज़िंदगी और-और शानो-शौकत से भरी होती जाती-उतनी ही बार, और उसी मात्रा में 'भारतीयता की खोज और व्याख्या', 'स्व का परिमार्जन', 'आत्म का अन्वेषण', 'अकेलेपन का सन्नाटा', 'मौन की साधना', निजता मे मुक्ति, 'समूह में व्यक्ति का अकेलापन और उसकी स्वतंत्रता का दमन ' आदि का उनका राग-विराग बढ़ता चला जाता था। यह अनायास नहीं था। जैसे-जैसे देश में आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक संकट बढ़ता चला गया, वैसे-वैसे अज्ञेय सन्नाटे का छंद बुनने की तरफ़ बढ़ते चले गये। अज्ञेय में प्रतिभा थी, कल्पनाशीलता थी, भाषा और शिल्प में महारत हासिल थी- 'शेखर एक जीवनी' इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। इस लिये वह प्रभावी और मायावी शब्द लोक रच ले जाते थे। मुक्तिबोध को महज 'आत्मान्वेषण का कवि' कहकर अज्ञेय ने जिस तरह उन्हें लगभग ख़ारिज़ कर दिया, उससे अज्ञेय की पालिटिक्स का पता चलता है।

1960 के आसपास अज्ञेय एक अंग्रेज़ी त्रैमासिक पत्रिका 'क्वेस्ट' बाद में 'द न्यू क्वेस्ट' निकालते थे, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसे सी आई ए से पैसा मिलता था। एडवर्ड सईद ने अपने निधन से पहले लिखे एक लेख में सी आई ए द्वारा वित्त पोषित पत्रिकाओं की सूची में इस पत्रिका का ज़िक्र किया है। लोगों को याद होगा, 1960 वाले दशक में कवि स्टीफेन स्पेंडर द्वारा संपादित प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी मासिक पत्रिका 'एनकाऊंटर' (लंदन) के बारे में सनसनीख़ेज़ रहस्योद्घाटन हुआ था कि यह पत्रिका सी आई ए के धन से निकलती है। नतीज़ा यह हुआ कि स्पेंडर को इस्तीफ़ा देना पड़ा, उनका सितारा डूब गया और पत्रिका बंद हो गयी।

हिंदी जगत के कई लोग अज्ञेय को अमरीका व सी आई ए का आदमी समझते थे। यहां तक कि कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना भी, जो एक ज़माने में अज्ञेय की मंडली के सक्रिय सदस्य थे और बाद में रेडिकल वामपंथ के काफी करीब आ गये थे, 1982 में निजी बातचीत में अज्ञेय को हिक़ारत से 'सी आई ए का एजेंट कहते थे

1942 में अज्ञेय ग़ुलाम भारत में अंग्रेज़ी फ़ौज़ में दाख़िल हुए और उन्हें पी आर ओ बनाकर उत्तर-पूर्व भारत में तैनात किया गया। अब वह नौकरी आजीविका के लिये थी, या 'फासीवाद विरोधी युद्ध में अंग्रेज़ों की मदद करने' की समझ से प्रेरित थी, या अंग्रेज़ों का जासूस बनने के एवज़ में मिला इनाम था, इस पर अलग-अलग राय है। इस दौर के बारे में उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया की पुत्री और अज्ञेय की सहजीवी साथी (लिव इन पार्टनर) इला डालमिया के लेख व संस्मरण कुछ और ही कहानी कहते लगते हैं, जिनसे अज्ञेय की भूमिका संदेहास्पद लगने लगती है।

एक और तथ्य की ओर ध्यान दिलाना है। वह है- 'जय जानकी यात्रा'। 1980 के आसपास अज्ञेय ने इला डालमिया व उनके घनिष्ठ सहयोगी ब्राह्मणवादी-प्रतिक्रियावादी लेखक विद्यानिवास मिश्र और उनके कुछ चेलों-अनुयायियों के साथ मिल 'जय जानकी यात्रा' निकाली थी। यह 'यात्रा' देश के कई हिस्सों में, लेकिन मुख्य तौर पर हिंदी-उर्दू पट्टी में, निकाली गयी। इसका मक़सद था, 'रामकथा की पात्र जानकी (सीता) का जन्मस्थान ढूंढ़ना' और इसके ज़रिये 'भारतीयता की खोज' करते हुए 'अपनी जड़ों को तलाशना' व 'जातीय स्मृति' को पुनर्सृजित करना'। इसमें गहरा हिंदुत्ववादी रुझान मौजूद था। इसने हिंदुत्ववादी ताकतों के फासीवादी 'राम जन्मभूमि आन्दोलन' को आवेग प्रदान किया, जिसकी चरम परिणिति आगे चलकर बाबरी मस्ज़िद विध्वंस में हुई।

अज्ञेय का तथा कथित 'प्रामाणिक भारतीयता का संधान' ( उद्धरण चिह्न के अंदर के शब्द प्रणय कृष्ण के हैं) शुद्ध रूप से हिंदूवादी व प्रतिगामी था और इस्लाम निषेध पर आधारित था। उनकी 'भारतीयता' में इस्लाम के लिये कोई जगह नहीं थी। उर्दू से अज्ञेय की दूरी व अरोचि छुपी हुई नहीं थी। जो लोग 'भारतीयता-भारतीयता' की रट लगाते हैं उनसे सावधान रहना चाहिये - वे 'जय जानकी यात्रा' से शुरु करके 'रथयात्रा', 'बाबरी विध्वंस' और फिर 'गुजरात नरसंहार' तक जा पहुंचते हैं। हर चीज़ के लिये पश्चिम से प्रेरणा लेने वाले लोग 'भारतीयता' और 'आध्यात्म' की रट कुछ ज़्यादा ही लगाते हैं( अज्ञेय और निर्मल वर्मा को देखिये)। इस भारतीयता' ने भारत का बेड़ा ग़र्क कर दिया है। इसने देश को हिंदू वर्चस्ववादी व सैनिक दमनकारी भारत बनाने की ओर ठेल दिया है। सवाल है, क्या इस्लाम का निषेध करके 'प्रामाणिक भारतीयता का संधान' संभव है?

अगर 'प्रामाणिक भारतीयता' जैसी कोई चीज़ है (अलबत्ता यह टर्म ही गहरा संदेह व शंका पैदा करता है), तो उसकी खोज का एक छोटा सा लेकिन बेहतरीन नमूना शमशेर में देखिये - ' मैं हिंदी और उर्दू का दोआब हूं/ मैं वह आईना हूं जिसमें आप हैं' उर्दू व हिंदी का दोआब्। (उर्दू पहले नंबर पर है) यही है भारतीयता का बीज, भले ही वह प्रामाणिक हो या न हो।

ज़रूरत इस बात की है कि 'प्रामाणिक भारतीयता का संधान' करने की बजाय अज्ञेय की प्रामाणिक जीवनी लिखी जाय- उनके प्रति मोह, आसक्ति और जयजयकार से दूर्। लेकिन दिक़्क़त यही है कि हिंदी में जीवनी लेखन आम तौर पर व्यक्ति पूजा और 'जय हो-जय हो' के शोर में तब्दील हो जाता है। अज्ञेय ने जान-बूझकर अपने इर्द-ग़िर्द रहस्य, मिथ, कुतूहल व किवदंती का घेरा बनाया था। उन्होंने अपना ऐसा आभासी प्रभामण्डल रचा था कि उसके आगे कई प्रबुद्धजनों की भी आंखें और बुद्धि झपक जाती थी। ऐसे में पूरी छानबीन के बाद अज्ञेय की कोई प्रामाणिक' वस्तुपरक जीवनी लिखी जा सकेगी, इसमें संदेह है। अज्ञेय बड़े लेखक ज़रूर हैं- हालांकि सवाल है कि वह किस तरह के बड़े लेखक हैं- लेकिन उनके अंधेरे पक्ष बड़े प्रबल हैं।



और प्रणय कृष्ण का जवाब


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रविवार, 9 मई 2010

जन्मशती पर शमशेर स्मरण

अतृप्ति का विवेक : शमशेर
  • अरुण माहेश्वरी
(अरुण जी नियमित तौर पर अपने आलेख जनपक्ष पर उपलब्ध करा रहे हैं। हम उनके इस सहयोग के लिये आभारी हैं)

बात बोलेगी… हम नहीं!
जन्म शताब्दी के मौके पर शमशेर बहादुर सिंह का स्मरण आदमी की अंतहीन दबी हुई इच्छाओं के एक पावन खजाने के स्मरण जैसा है। चुका भी हूं मैं नहीं, कहां किया मैंने प्रेम अभीकी अतृप्ति का रचनाकार, ‘आज निरीह कल फतहयाब निश्चितके आत्मविश्वास से परिपूर्ण मानवता के भविष्य पर अटूट आस्था वाला सच्चा साम्यवादी, ‘बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात हीकहने वाला यथार्थवादी, और सर्वोपरि जनजन का हितैषी, एक निश्छल और सहज इंसान शमशेर की कविताएं इसका यथेष्ट साक्ष्य है।

शमशेर अपनी सादगी के कारण ही प्रपंचों भरी इस दुनिया में सारी जिंदगी अनेक लोगों के लिये एक अबूझ पहेली बने रहे। उनमें घोषित मार्क्सवादी तक शामिल रहे हैं, उत्कट आत्मवादी और सुरुचिसंधानीआभिजात्यों की तो बात ही क्या! प्रकृति और मानव के अंतहीन रहस्यों तथा अनगिनत रंगों को विस्मय की फंटी आंखों से देखने की शमशेर की मानवसुलभ जिज्ञासाओं ने बहुत सारे लोगों को भरमाया है, उन पर रहस्यसाधना’ (डा. रामविलास शर्मा की शब्दावली) के प्रेतों की छाया से आशंकित किया है, जनमन के कवि को कवियों का कविघोषित करने के लिये उत्साहित किया है। दरअसल खंडित मनुष्यता के आज के समय में शमशेर की तरह का एक पूर्ण इंसान, जिसके लिये मार्क्‍स के शब्दों में, मानवोचित किसी भी वस्तु से कोई परहेज नहीं था, स्वयं में किसी महारहस्य का रूप न ले, तो यही आश्चर्य की बात होती। न अपने जीवन में और न अपनी कविता में ही उन्होंने इस पूर्णता की, स्वप्न और यथार्थ की द्वंद्वात्मक एकता की अवहेलना की, इसीलिये जितना उन्होंने अपने से बाहर के यथार्थ को व्यक्त किया, मन के भीतर की अथाह गहराइयों, वस्तु के अतियथार्थवादी बिंबों को भी उन्होंने सदा उतना ही महत्व प्रदान किया। प्रेम के दुर्लभ क्षणों की अतिवायवीय और अति मांसल अनभूतियों से लेकर जनजीवन की कठिनतम चुनौतियों और क्रांति की गहरी समस्याओं तक उनके व्यक्तित्व, उनकी कविता और उनकी चिंताओं का सहज विस्तार था और यही सहजता तथा उनके व्यक्तित्व की दुर्लभ निश्छलता ही उनकी रचनाओं के सौंदर्य का राज थी, दबी हुई इच्छाओं और अतृप्ति की पावनता का स्रोत थी। जो कभी बुरा नहीं सोच सकता, जो अपने अवचेतन की अंतिम तहों तक में शिव और सुंदर की ही कामना करता है और जो सुप्त नहीं, पूरी तरह जागृत मानव है, उसकी रचना कभी बुरी नहीं हो सकती शमशेर एक ऐसे ही कवि थे।

शमशेर की कविताएं यथार्थ और स्वप्नों के अनेक रंगों वाले निकटस्थ और दूरस्थ परस्पर विलीन होते बिंबों का, मौन और मुखर भावों का एक ऐसा निजी संसार है, रिक्तताओं की ऐसी आकर्षक घाटियां हैं जो पाठक को किसी सम्मोहक इन्द्रजाल की भांति अपनी ओर खींचती तथा गहरे उतारती जाती है। कोरा प्रलाप और अनापशनाप की गहरी खाइयों में महीन चेतना की जो रोशनी शमशेर की कविताओं में दिखाई देती है, उसमें कवि नहीं, उसका पाठक भी स्नात हो अनूठी अनुभूतियों की खुमारी में खो जाता है। जैसे पाठ की रिक्तताओं से बोलते अर्थ पात्र की सामर्थ्‍य के अनुरूप खुलते खुलते ही खुलते हैं शमशेर का विलयनशील, मौन बिंबों का महीन और चेतन काव्य भी पाठक से उसकी पात्रता का प्रमाणपत्र जरूर मांगता है।

देहरादून के एक संपन्न और शिक्षित जाट परिवार में जन्मे शमशेर का जीवन शुरू से नाना कारणों से बड़े उद्देश्यों का एकाकी जीवन रहा। 9 वर्ष की उम्र में ही मां चल बसना, पढ़ाई के समय होस्टल का जीवन, 24 वर्ष की उम्र में सिर्फ़ 6 वर्ष साथ निभा कर पत्नी का गुजर जाना और उसके चार वर्ष बाद ही पिता का न रहना। साथ रह गया किताबों का, पत्रिकाओं और कविताओं का। युवा वय में ही माडर्न रिव्यू’,‘रूपाभ’, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘नया साहित्यतथा रवीन्द्रनाथ, सरोजिनी नायडू, एजरा पाउंड और निराला की कविताओं के रोमांच को वे उम्र की अंतिम घड़ी तक भुला नहीं पाये थे। इसके अलावा पार्टी, उसका कम्यून, साहित्यकारों की संगत, मजलिसें और मार्क्‍सवाद।

उर्दू के शहरी और महीन मिजाज को संस्कारों और साधना, दोनों से ही उन्होंने काफी हद तक जज्ब कर लिया था। उर्दू को वे गंगाजमुना के दोआब वाले उस क्षेत्र की खड़ी बोली का सबसे स्वाभाविक विकास मानते थे और उधर के जनमानस की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम। उनका कहना था, उर्दू हमारे भावों को जन के साथ अधिक निकटता से प्रकट करती है। (कवियों का कवि शमशेर, रंजना अरगड़े, पृ.210)। यही वजह है कि अपने क्षेत्र के परिवेश को, वहां की जनसंस्कृति को, जनता का कवि बनने की अपनी आस को पूरा करने के लिये ही सारी उम्र वे उर्दू को साधते रहे, लेकिन कवि बने हिंदी के ही। मैं उर्दू और हिंदी का दोआब हूं उनकी कई आंतरिक इच्छाओं की तरह की एक इच्छा ही रह गयी, सचाई यह है कि उर्दू में तो वे कविता का ककहरा पढ़ते रहे, हिंदी में सचमुच नयी जमीन तोड़ डाली।

शमशेर ने दिल्ली जाकर पेंटिंग की बाकायदा शिक्षा ली थी। उनके चित्रांकन में सफाई थी, रेखाओं में गति और अर्थ भी थे लेकिन वे चित्रकार नहीं बने। हालांकि, पेंटिंग के प्रशिक्षण ने रंगों के उनके बोध को इतना जागृत कर दिया कि बाद में उनका कोई भी काव्य बिंब रंगविहीन नहीं रहा हमेशा उनके पसंदीदा रंगों की छाया बिंबों के अनुरूप विलयित रंगों में उनके समूचे सृजन का अभिन्न अंग बनी रही।

बनारस में त्रिलोचन का साथ, इलाहाबाद में इप्टा के लोगों से संपर्क, गालिब, निराला, फैज के अलावा ांस के सुरियलिज्म के आंदोलन, ब्रेतां और उसकी लोक घोषणा, अमेरिकी कवियत्री मैरियम मूर और एडिथ सिट्वेल आदि के प्रभावों से बन रहे शमशेर सन् 45 में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनें और मुंबई के पार्टी कम्यून के निवासी। उन्हीं दिनों की कविता है– ‘‘वाम वाम वाम दिशा/समय साम्यवादी/हीन भाव, हीन भाव/मध्यवर्ग का समाज, दीन/किंतु उधर/पथ प्रदर्शिका मशाल/कमकर की मुट्ठी मेंकिंतु उधरआगेआगे जलती चलती है/लाल लाल.../वामपक्षवादी है.../समय साम्यवादी।‘‘

12 जुलाई 1944 के दिन रोटियां टंगे लाल झंडों को लिये ग्वालियर के मजदूरों पर रियासती सरकार ने गोलियां चलाई, इधर शमशेर की कविता आई, – ‘‘ये शाम है।‘‘ ‘‘ये शाम है कि/आसमान खेत है पके हुए अनाज का/लपक उठी लहू भरी दर्रातियांकि आग है:/धुंआधुंआ/ सुलग रहा/ग्वालियर के मजदूर का हृदय।.../गरीब के हृदय/टंगे हुए/ कि रोटियां लिये हुए निशान/लाललाल/जा रहे /कि चल रहा/लहू भरे ग्वालियर के बाजार में जुलूस/जल रहा/धुआंधुआं/ग्वालियर के मजदूर का हृदय।‘‘

‘‘बात बोलेगी‘‘ इसी दौर की कविता है। कम्युनिस्टों के अभिवादन पर उनके एक मुक्तक की पंक्तियां हैं:
‘‘यह सलामी दोस्तों को है, मगर मुट्ठियां तनती है दुश्मन के लिए।‘‘

शमशेर सन् 1948 तक ‘‘माया‘‘ के सम्पादक रहे। 1951 के दूसरे सप्तकमें प्रयोगवादी समझे जाने वाले कवियों भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंत माथुर, हरिनारायण व्यास, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती के साथ ही शमशेर की बीस रचनाएं प्रकाशित हुई थी। इन रचनाओं के साथ दिये गये अपने वक्तव्य में शमशेर ने लिखा – ‘‘उसको (यानी कि अपने चारों तरफ की जिंदगी को) ठीकठाक यानी वैज्ञानिक आधार पर (मेरे नजदीक वह वैज्ञानिक आधार मार्क्सवाद है) समझना और अनुभूति और अपने अनुभव को इसी समझ और जानकारी से सुलझा कर, स्पष्ट करके, पुष्ट करके अपनी कलाभावना को जगाना। यह आधार इस युग के हर सच्चे और ईमानदार कलाकार के लिये जरूरी है।‘‘

शमशेर ने अपने समकालीनों को जैसे देखा, उसमें खुद उनको भी देखा जा सकता है। मुक्तिबोध उनके लिये निराला के बाद सबसे मीनिंगफुल पोइट थे। उनकी बीमारी के दिनों में वे उनकी सेवा कर रहे थे और हर दिन लौट कर एक शेर लिखा करते थे। एक ही मीटर में लिखे गये उन शेरों से अंत में जो पूरी गजल बनी, उस गजल का अंतिम शेर है
‘‘वो सरमस्तों की महफिल में मुक्तिबोध आया/सियासत जाहिदों की खन्दएदीवाना हो जाए

नार्गाजुन ठेठ जनता की ठाठ के अनमोल खजाने जैसे थे। ‘‘बाबा हमारे, अली बाबा/नार्गाजुन बाबा.../बहादुर कविता के जीतेजागते/कभी न हार मानने वाली जनता के/बहादुर तराने/और जिंदा फसाने.../ऐसे खजाने कविता की/झोली में बरसाते/हमारे बाबा अली बाबा/नार्गाजुन बाबा।‘‘

शमशेर की कविताओं में प्रकाशचंद गुप्त, सज्जाद जहीर, आर.डी.भारद्वाज, रजिया सज्जाद जहीर, भुवनेश्वर, प्रभाकर माचवे से लेकर मोहन राकेश, रघुवीर सहाय और अज्ञेय भी आए हैं। अज्ञेय उनके लिये एक महत्वपूर्ण हस्ती थे। उनके पहले संकलन, जगत शंखधर द्वारा संकलित ‘‘चुनी हुई कविताएं‘‘ की अंतिम कविता है– ‘अज्ञेय से। सम्पर्क में आये अन्योंं के प्रति एक आंतरिक स्वीकार का जो भाव शमशेर में अक्सर देखने को मिलता है, अज्ञेय के मामले में वे थोड़ा ठहर कर उनके आभिजात्य की वेदनाओं को सहला भर के रह जाते हैं। ‘‘जो नहीं है/जैसे कि सुरुचि/उसका गम क्या?/वह नहीं है।/किससे लड़ना?/रुचि तो है शांति,/स्थिरता,/कालक्षण में/एक सौंदर्य की/मौन अमरता।/अस्थिर क्यों होना/फिर?/जो है उसे ही क्यों न संजोना?/उसी के क्यों न होना?/जो कि है।‘‘

अज्ञेय जी के ड्राइंग रूम में वान गौग के चित्र को देखकर उन्होंने एक कविता लिखी थी। लेकिन दिलचस्प है मोहन राकेश और रघुवीर सहाय पर उनकी कविताएं। अन्य सभी शमशेर के हमसफर थे, लेकिन मोहन राकेश से उनका वैसा कोई संबंध नहीं था। रंजना अरगड़े को उन्होंने कहा भी था कि ‘‘असल में मोहन राकेश के साथ मेरा बहुत कम परिचय था। वैसे भी मैं संकोची हूं। मैं स्वभाव के कारण कभी उनके यहां गया नहीं।‘‘ फिर भी राकेश उनकी जिज्ञासाओं और आकर्षण के कारण जरूर बने थे। इसका पहला कारण था राकेश की संस्कृत की पृष्ठभूमि और दूसरा सबसे बड़ा कारण था सिफ‍र् कलम के बूते, बिना किसी नौकरी के सहारे के एक सम्मानित जीवन जीने का उनका माद्दा। राकेश ने अन्यथा उन्हें बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं किया था। राकेश के बारे में उथला होने तक की उनकी गंभीर आपत्ति थी। रंजना को कहा था : राकेश में सोशल कांसियसनेश ज्यादा नहीं थी, ‘‘और अनलेस यू आर इंटरेस्टेड इन द डीपर प्रोबलम्स आफ सोसायटी यू आर नॉट कंप्लीट, आपका ड्रांइग रूम लिटरेचर हो जायेगा।‘‘

राकेश की मौत पर शमशेर ने कविता लिखी : ‘‘मोहन राकेश के साथ एक तटस्थ बातचीत‘‘

ठहाके लगाने के लिये मशहूर राकेश इतनी जल्दी मौत की ओर क्यों चले गये, शमशेर कविता में इसी प्रश्न को मंथते हैं। कहते हैं, ‘मौत कोई सेंटीमेंट की चीज नहीं, कि राकेश उसमें बह गये। वह एक ठोस हस्ती है व्यक्ति के लिये, हर व्यक्ति के लिए।‘‘ और फिर गहरी शंका के साथ पूछ बैठते हैं, ‘‘तुम बहुत अधिक पी गये थे क्या/क्या अब भी जाम तुम्हारे हाथ में है।‘‘

शमशेर आगे राकेश की खूबियों, आधुनिक नाटक को उनके अवदान की चर्चा करते हैं। मृत्यु से, इस लोक से परे एक दूसरे रहस्य लोक से संवाद शमशेर का प्रिय विषय है। राकेश को भी वे इसका निमित्त बनाते हैं। एकएक करके कितने ही अपनों को गंवा चुके शमशेर के लिये मृत्यु के बाद का लोक डरावना कत्तई नहीं है, लेकिन राकेश से उनकी यही शिकायत रही, ‘‘ओह माडर्न आर्टिस्ट/काश तुम इतने मार्डन न होते/ताकि जिंदा रहते/जिंदा रहते/अभी कुछ और दिन जिंदा रहते।

मौत का अर्थ सीन से हट जाना भर है, यह शमशेर जानते थे। फिर भी यह बात राकेश पर लागू नहीं की जा सकती थी, इसलिये अफसोस करते है। गुमशुदगी तो शमशेर की चीज थी, राकेश भला क्यों उस ओर चला गया! शमशेर लिखते हैं : मैं/एक गुमशुदगी को प्यार/करता हूं/और तुम उसीकी तरफ चले गये हो/कैसे कहूं कि मुझे तुमसे/ईष्र्या नहीं‘‘
इसके साथ ही शमशेर अपनी गुमशुदगी का राज खोलते हैं और उसी सिलसिले में कुछ ऐसी पंक्तियां कह जाते हैं, जिनसे शमशेर के व्यक्तित्व का मौन जैसे पूरी ऊर्जा के साथ मुखर हो उठता है। जैसे मुक्तिबोध अपनी अंधेरे मेंकविता की डरावनी दुनिया से जुझते हुए यही सब कुछ नहीं है, ‘‘मुझको जिंदगीसरहद/सूर्यों के प्रांगण पर भी जाती सी दीखती।‘‘ कह कर अद्भूत दृप्त स्वरों में बोल उठते हैं:
‘‘कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूं
वर्तमान समाज चल नहीं सकता।
पूंजी से जुड़ा हुआ ह्यदय बदल नहीं सकता‘‘

बिल्कुल वैसे ही लहजे में अपनी गुमशुदगी के मृत्यु पार के उस लोक के बारे में शमशेर कहते हैं कि वह ऐसा लोक है :
‘‘जहां यह गंदगी /आज की सियासत की/आज की गंदी कला की/आज के झूठ की/आज के फरेब, आज के पैसे की/आज के वीभत्स शासक और शोषक की/नहीं है।

वही शमशेर का अपना लोक है जिसमें वे गुमशुदा रहते थे। अपनी सारी अतृप्तियों के साथ भटकते थे। कइयों ने इस कविता से ही शमशेर में गहन मृत्युबोध के तत्व की खोज कर उन्हें अस्तित्ववाद के दोजख में रशीद कर देना चाता था। लेकिन मृत्यु की यह कितन सुंदर जीवन की उत्कट कामना है, इसे अतृप्ति के विवेक तत्व से ही समझा जा सकता है। शमशेर जानते थेमृत्यु पार के ऐसे लोक में किसी माडर्निस्ट का मन नहीं बस सकता। इसीलिये विस्मित थे कि फिर राकेश वहां क्यों गये!

इसी सिलसिले में एक और जरूरी बात। रहस्यसंहार के उन्माद में आचार्य शुक्ल ने निगु‍र्णपंथी भक्ति साहित्य की पूरी लोक परंपरा की निंदा की, छायावाद को दुत्कारा और रवीन्द्रनाथ को भी अस्वीकारा। आचार्य से विरासत में मिले इसी फोबिया के चलते परवर्ती समय के प्रगतिशील दक्काकों ने शमशेर, मुक्तिबोध के सफाये की, उन्हें प्रगतिशील साहित्य की धारा से काटने की कम कोशिशें नहीं की। लेकिन इतिहास का न्याय यह है कि आज साहित्यिक गुटबाजियों से दूरकविता में की गयी शमशेर की यह प्रार्थना ज्यादा सटीक जान पड़ती है जिसमें वे कहते हैं :
देवताओं मेरे साहित्य के युगयुग के सुनो/साधनाओं की परमशक्तियों इतना वर दो–(अपने भक्तों की चरण धूलि जो समझो मुझको)/एक क्षण भी मेरा व्यय ऐसों की संगत में न हो।/एक वरदान यही दो जो हो दया मुझ पर/स्वप्न में भी न पड़े ऐसों की छाया मुझ पर।‘‘

शमशेर की शताब्दी के मौके पर उनके फिर से सम्यक मूल्यांकन का निवेदन करते हुए उनकी लिखी ‘‘एक प्रभात फेरी‘‘ के गीत के उद्धरण के साथ हम उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित करते हैं :

‘‘फिर वह एक हिल्लौर उठीगाओ।/वह मजदूर किसानों के स्वर कठिन हठी।/कवि हे, उनमें अपना दय मिलाओ।/उनके मिट्टी के तन में है अधिक आग/है अधिक ताप/उसमें, कवि हे/अपने विरह मिलन के ताप जलाओ।/काट बुर्जुआ भावों की गुमठी को–/गाओ।‘‘