अमेरिकी इतिहास में एक अज़ीम मुकाम रखने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर की ३९ वर्ष की अवस्था में आज के ही दिन (१९६८ में) मेंफ़िस शहर में उस समय गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी जब वह सफ़ाई कर्मचारियों के साथ आंदोलनरत थे. उनकी शहादत से पूरा अमेरिका दहल गया था, कई नगरों में दंगे भी हुये. जीते जी लूथर किंग जिन मूल्यों के लिये समर्पित थे..उन्ही के लिये उनकी मृत्यु होने से अमेरिकी समाज में फ़ैले रंग भेद को उखाड फ़ैंकने में एक बडी ताकत मिली जिसका नतीजा यह है कि आज ओबामा के रुप में एक काला व्यक्ति अमेरिका का सदर है.
भारत में नस्लभेद, जिसका जातिगत स्वरुप आज भी एक बडी चुनौती है, भारतीय समाज में आज भी यह रोग इस कदर पेवस्त है कि इसके खिलाफ़ एक बडी सार्थक बहस और निर्णायक लडाई की आवश्यकता है, मार्टिन लूथर किंग, डा. अम्बेडकर के बाद इस आंदोलन में एक बडी भूमिका अदा कर सकते हैं, भारतीय विश्वविद्ध्यालयों में मार्टिन लूथर के विचारों को अनिवार्य रुप से सम्मलित करने की पुरजोर मांग करके हम किंग को भावभीनी श्रद्धाजंलि दे सकते है, उनका एक वाक्य मुझे हमेशा चौंकाता है और रौंगटे भी खडे करता है:
"दुश्मनों ने हमें क्या कहा ये हम याद नहीं रखेंगे, लेकिन दोस्तों की खामोशी को हम कभी भुला नहीं सकते"
मानव समाज में एकता, समरुपता, समानता और बराबर के अधिकारों की लडाई के इतने बडे नायक को मेरा शत शत नमन..
- शमशाद इलाही अंसारी
