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गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

सेंसर बोर्ड अंधा है वह आंखें बंद कर “ग्रैंड मस्‍ती” मार रहा है : सारंग उपाध्याय





 “वल्‍गर कॉमेडी के नाम पर हाफ पौर्न परोस रही फिल्‍म ग्रैंड मस्‍ती कुछ असफल और फिल्‍मी प्‍लेटफार्म से गायब होते जा रहे लोगों की अवसाद से ऊपजी भडास है. इंडस्‍ट्री में बनें रहने की दोयम दर्जे की घटिया, फूहड और अश्‍लील अभिव्‍यक्‍ति है. जिसे 70 करोड की कमाई के मानक पर सफल कहा जा रहा है. यह पूरी फिल्‍म ही मानों असफलता की बागुड में उलझे लोगों की मजबूर और बैचेन छटपटाहट है. भला ऐसी कौन सी आफत आन पडी थी कि कभी बेटा, मन, दिल जैसी संजीदा फिल्‍म बनाने वाले निर्माता और निर्देशक इंद्र कुमार फिल्‍म मस्‍ती का सिक्‍वेल बनाने को मजबूर हो गए, और यही काम कुछ अच्‍छी छबि वाले अभिनेताओं ने भी किया. हालॉंकि इस फिल्‍म को करने के पीछे लंबे समय से पर्दे से गायब दो असफल अभिनेताओं की मजबूरी मान भी लें, तो मराठी संस्‍कारों, परंपराओं और उसकी अस्‍मिता की प्रतिष्‍ठा को राजनीति में भुनाने वाले महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री के ठीक ठाक अभिनेता बेटे को पर्दे पर सफलता के लिए आखिर ग्रैंड मस्‍ती क्‍यों करनी पड गई? तब जबकि उन्‍हें महाराष्‍ट्र का पारंपरिक मराठी समाज विलासराओ देशमुख की छबि में पसंद करता रहा है.

क्‍या बॉलीवुड में बैठे समाज सुधारक रहनुमाओं को यह दिखाई नहीं दे रहा कि किसी महलनुमा कॉलेज में प्रिंसीपल द्वारा एक छात्र को सबके सामने पूरे कपडे उतारकर उसकी कमर के हिस्‍से को ब्‍लर कर नाम बडे और दर्शन छोटे जैसे डबल मिनिंग के घटिया संवाद कहती यह फिल्‍म समाज पर क्‍या प्रभाव डालेगी?  एक लडकी के सामने पूरे कॉलेज में बंद छतरी में एक लडका कॉंडम डालकर बेहुदा संवाद बोलता है, ऐसे दृश्‍य और संवाद समाज के दिमाग को किस रसातल में पहुँचाऍंगे? एक तंबु के चादर पर रोशनी के माध्‍यम से परछाई के जरिये अभिनेता रितेश देशमुख द्वारा लडकी के साथ किया गया बेहद गंदा दृश्‍य उनके सहित फिल्‍मी दुनिया को कहॉं लाकर छोडता है? बैल की जनन प्रक्रिया के रूप में आफताब शिवसादानी के निकलने का दृश्‍य, पुरुष जननांग को लेकर सीधे-सपाट विकृत दृश्‍य, समाज में महिला वर्ग के मानस को कैसा बनाऍंगे इसकी फिक्र फिल्‍मी समाज को है? लडकियों के साथ फूहड और गंदे दृश्‍य, पूरी फिल्‍म में सेक्‍स प्रतीकों के रूप में कॉमेडी के नाम पर अश्‍लील हरकतें, महानगर, शहरों, कस्‍बों और छोटे गांवों के हर युवा स्‍त्री–पुरुषों में कौन सा जहर भरेंगी? फिल्‍म में संवाद भी डबल मिनिंग नहीं बल्‍कि सीधे व सपाट हैं. ऐसी बहुत सारी हदों को लांघा गया है जिससे सेंसर बोर्ड के अंधे होने में कोई शक नहीं रह गया है.

पिछले साल हरियाणा में लगे बलात्‍कार के मासिक मेले से हतप्रभ, मुँह छिपाती राजनीति, चिथडे-चिथडे होती सामाजिक परंपराओं और संस्‍कारों की फोकली प्रतिष्‍ठा, उसके बाद राजधानी दिल्‍ली के चेहरे पर पुती निर्भया बलात्‍कार की कालिख, (जो अभी ठीक से मिटी भी नहीं है, और उस घटना के घाव अब तक हरे हैं) इस साल सो कॉल्‍ड सेफ सिटी के रूप में इतराती मुंबई में महिला पत्रकार की इज्‍जत को तार-तार करने की घटना और इन सबके बीच लगातार रोजाना देश के सुदूर गाँवों, अंचलों में बेटियों की अस्‍मिता पर डाका डालने की बुरी खबरें, यह सब हमारे बीमार और विकृत समाज की वास्‍तविक स्‍थिति प्रकट कर रही है. पुलिस, प्रशासन, सरकार, संसद समाज का हर वर्ग, हर संस्‍था, यहॉं तक की बॉलीवुड भी देश में बेटियों-बहनों के साथ हो रही इन घटनाओं पर चीख-चीखकर अपनी पीडा व्‍यक्‍त कर रहा है, समाज को जागृत करने के लिए छटपटा रहा है, वहीं ऐसे में बॉलीवुड में बन रही ग्रैंड मस्‍ती जैसी फिल्‍में और उन्‍हें पास करती सेंसर बोर्ड जैसी संस्‍थाओं की कामकाज की अंधी मस्‍ती पर सवाल उठना शुरू हो गए हैं.

टीवी न्‍यूज चैनल के पैनल्‍स में चिल्‍लाती पूजा बेदी हो या कलम के सिपाही जावेद अख्‍तर, तथाकथित स्‍त्री चेतना की आवाज बनती शबाना आजमी हो, या हमलावर मूड में दिखने वाले ओमपुरी, या फिर संजीदगी से लबरेज गंभीर बयानों से समाज को एक ही दिन में सुधारने का ठेका लेने वाली अनुपम खैर जैसी कई अन्‍य शख्‍सियतें, क्‍या इन्‍हें फिल्‍मी पर्दे से समाज में फैल रही वह मानसिक गंदगी दिखाई दे रही है, जिसने पिछले दस से बीस सालों में अपने कपडों को कम करके समाज की शर्म को उघाडा कर दिया है.

दाढी-मूंछ में एडल्‍ट का सर्टिफिकिट लेकर घूमने वाले युवा क्‍या मल्‍टीप्‍लेक्‍स के भव्‍य पर्दे पर इस तरह की फिल्‍म में एक स्‍त्री के गुप्‍तांगों को लेकर रचे गए प्रतीकात्‍मक सेक्‍स दृश्‍यों के प्रभाव से अपनी वयस्‍कता को समझदारी के स्‍तर पर बनाए रखते हैं? यहाँ तो बूढे भी बलात्‍कार के केस में पकडे जा रहे हैं, वह भी मासूम बच्‍चियों के साथ. स्‍कूल से भागकर चोरी-छिपे टिकिट की जुगाड कर हॉल में घुसने के लिए हाथ-पैर मार रहे बच्‍चों को तो यहीं मुंबई के मल्‍टीप्‍लेक्‍सों में आसानी से देखा जा सकता है, रिलीज के पहले दिन ही यह अनुभव रहा, उधर, रात के आखिरी शो में याचना और गिडगिडाहट के बाद 16 साल के लडके-लडकियॉं आपको अंदर मिल जाऍंगे. सोचिए महानगरों के मल्‍टीप्‍लेक्‍स थियेटरों का यह हाल है तो देश के कई राज्‍यों के छोटे कस्‍बों के सिंगल थियेटरों में, गॉंवों के कमरे में बंद सीडी प्‍लेयर्सों से क्‍या फैलाया जा रहा है? क्‍या फूहडता और सेक्‍स की अश्‍लील लीलाओं को देखने के बाद नाबालिक और युवा अपने आसपास, बच्‍चियों, लडकियों, औरतों के प्रति जो नजरिया अपना लेते हैं, वे क्‍या अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता और मॉर्डन सोच वाला बॉलीवुड का समाज समझ पा रहा है. हाल ही में आई मराठी फिल्‍म बीपी इस संदर्भ में बच्‍चों के साथ-साथ फिल्‍मों के समाज पर व्‍यापक, गहरे और गंभीर प्रभाव को पूरी ईमानदारी के साथ सामने लाती है और उसके दूरगामी परिणामों को भी.

ग्रैंड मस्‍ती, क्‍या सुपर कूल हैं हम, देल्‍ही बैली जैसी डबल मिनिंग संवादों, गीतों, आइटम सॉग्‍स वाली फिल्‍में हैं जिनके अश्‍लील दृश्‍य समाज के दिमाग में रील की तरह चलते हैं, और कहीं न कहीं दिल्‍ली सहित रोजाना देश के कोने-कोने से आ रही बलात्‍कार की घटनाओं में दिखाई पडते हैं. पैसे कमाने के लिए समाज को वह दिखाया जाए जो हमारे संस्‍कारों में छिपा है, गुप्‍त है, और अनुशासन में है और उसके पीछे यह तर्क दिया जाए कि समाज को खुला बनाओ, उसकी सोच को परिपक्‍व करो, संस्‍कारों की जकडन से बाहर करो, यह एक बेहूदा तर्क है जिसकी परिणिति बलात्‍कार और छेडछाड की बढती घटनाओं में हो रही है.

मनुष्‍य के जीवन के निजी और अंतरंग हिस्‍से को सार्वजनिक करना और फिर सेक्‍स को अपनी प्रतिष्‍ठा व सम्‍मान से जोडने वाले बेचारे अशिक्षित अपरिपक्‍व, अनपढ, गरीब, वंचित दबे-कुचले और शोषित समाज से सभ्‍य, सुसंस्‍कृत, शालीन और नैतिक बनें रहने की अपेक्षा करना. क्‍या यह दोहरे मापदंड, पैसे कमाने वाले प्रोड्यूसर और अपने कपडे उतारने वाले अभिनेताई समाज, दोनों के समझ में नहीं आते? ग्रैंड मस्‍ती फिल्‍म को लिखने वाले बेशर्म लेखक मिलाप जवेरी एक वेबसाइट को दिये अपने साक्षात्‍कार में इसकी आलोचना के प्रश्‍न पर कहते हैं- मुझे लगता है हमारे फिल्‍म समीक्षक मानसिक रूप से बडे नहीं हुए हैं, जबकि जनता परिपक्‍व हो चुकी है.मानों पूरे समाज का साक्षात्‍कार उन्‍होंने ही किया है, और बलात्‍कार की बढती घटनाएँ ही जनता की तथाकथित मानसिक परिपक्‍वता है. पॉर्न फिल्‍में करने वाली भारतीय मूल की सनी लियोनी ने भी भारत आने के बाद अब तक एक भी पॉर्न फिल्‍म नहीं की, और जो भी कि वह अपने पति के साथ की, जो पॉर्न फिल्‍में बनाने का काम करता है. प्रॉब्लम पॉर्न में नहीं है, मर्यादा की है, प्रोफेशल एथिक्‍स की है, ग्रैंड मस्‍ती सेक्‍स, गुप्‍तांगों और स्‍त्री-पुरुष संबंधों का दोयम दर्जे का एकदम महाघटिया संस्‍करण है, उनकी धज्‍जियॉं उडाता है, उन्‍हें गाली देता है. स्‍त्री और पुरुषों के बीच सहज शारारिक संबंध के सौंदर्य को इतना घिनौना, स्‍तरहीन और मजाक का विषय बनाकर दर्शाया है, जिसे देखकर हमारा पहले से ही सेक्‍स को लेकर विकृत समाज और बद्दिमाग होता है, और निर्भया जैसी घटनाऍं होती हैं.

बॉलीवुड पूंजीवाद का एक अलग अड्डा है, उसके दिमाग में पूंजी का सुरुर चमक-धमक और सेक्‍स के साथ शराब, अफीम, चरस और कोकिन में घुलता है और कभी-कभी समलैंगिक भी हो जाता है. वह जिस मुंबई, दिल्‍ली, बैंगलोर जैसे महानगरों को देश का समाज मान बैठा है, वह जरा वहाँ से बाहर निकलकर, देश के गॉंवों, कस्‍बों और छोटे शहरों के समाज को भी देख ले, जहॉं समाज कुछ दूसरी स्‍थिति में है. भले ही वह कैसा हो, पर वैसा तो बिल्‍कुल भी नहीं है, जैसी सोच रखकर बॉलीवुड उन्‍हें ग्रैंड मस्‍ती दिखाना चाहता है और घरेलू सीरियलों में पहुँचकर परिवार सहित देखने के पीले चावल बॉंट रहा है. 

एक रूपये में वीडियो देखने का प्रचार कर रही मोबाइल कंपनियॉ समाज को कौन सा सेक्‍सुल धीमा डोज दे रही है यह बताने की जरूरत नहीं. बदलती तकनीक से झमाझम अपडेट हो रहे आईफोन, एन्‍ड्रायड फोन, कई एप्‍लीकेशन्‍स फीचर से सजे-धजे मोबाइल्‍स में चल रहे पॉर्न वीडियो मुंबई के पढे-लिखे खुले समाज में शाम की लौटती लोकल ट्रेनों का मनोरंजन बन गए हैं, तो सोचिए हरियाणा, यूपी, बिहार, मध्‍यप्रदेश सहित देश के कई राज्‍यों के कस्‍बों में क्‍या हो रहा है? घटनाऍं आकार यहीं से ले रही है. वहाँ तो बेरोजगारी, अशिक्षा, अभाव और आर्थिक शोषण वैसे ही युवाओं को निगले जा रहा है. वहॉं अवसाद को एक रूपये में पॉर्न बॉटा जा रहा है.

हाल ही में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने फिल्‍मों में आइटम सॉग्‍स पर रोक लगाने की पेशकश की है, लेकिन फिलहाल यह कोई आदेश में नहीं बदला है, ग्रैंड मस्‍ती जैसी फिल्‍मों पर रोक लगाने की मांग को लेकर महिला आयोग और न्‍यायालय में छटपटाहट है. बैचेनी उसमें दिखाई दे रही है. देश के कई शहरों से भी इस फिल्‍म के प्रदर्शन पर बैन लगाने की मांग की है, लेकिन बॉलीवुड तो केवल पैसे की अंधी भूख में उलझा है. एक भी सो कॉल्‍ड सेलीब्रीटी ग्रैंड मस्‍ती जैसी फिल्‍म पर बैन की मांग के साथ नहीं आई. कहॉं गए सब? क्‍या चैनल्‍स पर चिल्‍लाने वाले बॉलीवुड के सामाजिक सुधारक फिलहाल अपने दडबों में खामोशी की चिलम फूँक रहे हैं, ताकि रात को प्राइम टाइम में बलात्‍कार पर चिंता में छलने वाला चिंतन घोला जाए. 

बताते हैं कि सेंसर बोर्ड ने फिल्‍म के प्रदर्शन से पूर्व कई दृश्‍यों को छांटा-काटा और डबल मीनिंग संवादों को डिलिट करवाया, उसके बाद इसे एडल्‍ट फिल्‍म का सर्टीफिकेट देकर पास किया है. कमाल है कि उसके बाद भी यह फिल्‍म इतनी अश्‍लील, गंदी और फूहड है, तो पहले तो पता नहीं क्‍या होगी? प्रमोशन के दौरान परिवार के साथ उसके देखने की अपील छल के अलावा कुछ नहीं, ऐसे में क्‍या सेंसर बोर्ड अंधा है? और क्‍या ऐसी फिल्‍मों पर काम के नाम पर ग्रैंड मस्‍ती मार रहा है?

फिल्‍मों पर समाज का प्रभाव पडता है, वह उसके विवेक को संचालित करती है, वह उसके सामने उस सत्‍य को रखती है जो घट चुका है, छिपा है, भविष्‍य में घटने वाला है और वर्तमान में चल रहा है, ऐसे में यह निश्‍चित ही जिम्‍मेदारी का काम है कि बलात्‍कार की राजधानी होने का दुख व पीडा अपने दिल में लिए बैठा यह देश, फूहड और अश्‍लील फिल्‍मों से श्रंखलाबद्ध दिल के दौरों को न पाल बैठे.  वैसे भी अब तो यहॉं रोज बलात्‍कार हो रहे हैं.
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सोमवार, 6 मई 2013

आस्कर’– फ़िल्म के पुरस्कार या विदेश नीति के हथियार


 रामजी तिवारी ने पिछले दिनों फिल्म समीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण काम किये हैं. खासतौर से हालीवुड की चर्चित तथा पुरस्कृत फिल्मों की जो राजनीतिक समीक्षा उन्होंने प्रस्तुत की है, वह  सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के हथियार के रूप में हालीवुड की भूमिका की गहरी पड़ताल है. हाल  ही में आई उनकी पुस्तक  आस्कर अवार्ड्स : यह कठपुतली कौन नचावे'  हिंदी सिनेमा लेखन की एक विशिष्ट उपलब्धि है.
'इसी क्रम में उनका यह आलेख इस वर्ष की आस्कर विजेता फिल्म 'आर्गो' पर केन्द्रित है. समयांतर में प्रकाशित इस लेख को हम जनपक्ष पर भी प्रस्तुत कर रहे हैं.   




‘आस्कर’ पुरस्कारों को लेकर अपने देश में ‘मोह और भ्रम’ से आगे बढ़कर ‘पागलपन’ की स्थिति बनती दिखाई दे रही है , और जो इधर के वर्षों में काफी बढ़ गयी है | ‘स्लमडाग मिलेनियेर’ फिल्म को ही लीजिये | उसे भारत में इस तरह से प्रचारित किया गया , गोया वह कोई भारतीय फिल्म हो , या वह भारतीय समाज को प्रतिविम्बित ही करती हो | वही ‘पागलपन’ इस साल भी ‘लाइफ आफ पाई’ के लिए दिखाया गया | खैर .... पुरस्कारों की घोषणा हुयी , और उम्मीद के मुताबिक़ ही ‘आर्गो’ फिल्म को इससे नवाजा गया | स्वतंत्र प्रेक्षक इस बात को पहले ही मान चुके थे , कि इस बार ‘आर्गो’ या ‘जीरो डार्क थर्टी’ में से ही किसी एक फिल्म को आस्कर दिया जाएगा | कारण साफ़ था | ‘आर्गो’ ईरान में घटित 1979 की इस्लामी क्रांति के दौरान अमेरिकी राजनयिकों के बंधक बनाये जाने , और उनमे से 6 को सी.आई.ए. के गुप्त मिशन के द्वारा छुड़ा लिए जाने की घटना पर आधारित है , जबकि ‘जीरो डार्क थर्टी’ ओसामा बिन लादेन की खोज और उसके पाकिस्तान में मारे जाने की घटना को दिखाती है | जाहिर है , ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों में चुनाव के दौरान उस फिल्म के हाथ में बाजी लगी , जिसमें अमेरिका अपने भविष्य की संभावनाएं देखता है | इन अर्थों में एक दशक पहले की अपेक्षा , चार दशक पहले की घटनाओं में गोते लगाने को अप्रत्याशित नहीं माना जाना चाहिए |

हैरानी की बात यही है , कि एक तरफ जहाँ दुनिया में इन पुरस्कारों को लेकर ‘मोह और भ्रम’ का यह वातावरण बना हुआ है , वहीँ दूसरी तरफ हालीवुड का फिल्म उद्योग इन पुरस्कारों के माध्यम से अमेरिकी विदेश नीति के हथियार के रूप में काम करता है | इस साल के पुरस्कारों से यह बात और स्पष्ट रूप से हमारे सामने आती है , कि साम्राज्यवादी और विस्तारवादी देशों की नीतियाँ अपने हिसाब से कलाओं को भी नियंत्रित करती हैं , और जिन कलाओं-विधाओं के ऊपर उस समाज को दिग्दर्शित करने की जिम्मेदारी आयत होती है , वही कलाएं और विधाएं उन विस्तारवादी नीतियों के हाथों में खेलने लगती हैं | अन्यथा अकादमी के सामने दो बेहतरीन फिल्मों  - ‘लिंकन’ और ‘ला मिजरेबल्स’ - का विकल्प तो था ही , जिनके आधार पर वह अपने चेहरे को चमका सकती थी , लेकिन उसने अपने इतिहास को दुरुस्त करने के बजाय , पूर्व की भाति ही इन फिल्मों को कूड़ेदान के हवाले कर दिया | तो आईये पहले यह जानने की कोशिश करते हैं , कि इस साल की आस्कर विजेता फिल्म ‘आर्गो’ आखिर दिखाती क्या है , और अंततः इस फिल्म से कौन सा सन्देश ध्वनित होता है ?

‘बेन अफलेक’ द्वारा निर्देशित यह फिल्म ‘आर्गो’ ईरान में इस्लामी क्रांति के दौरान हुयी उस ‘वास्तविक घटना’ को लेकर बनाई गयी है , जिसमें 4 नव. 1979 को एक अतिवादी मुस्लिम गिरोह द्वारा अमेरिकी दूतावास पर हमला किया जाता है , और दूतावास के 60 से अधिक कर्मचारियों को बंधक बना लिया जाता है | संयोगवश इनमे से 6 लोग किसी तरह से भागकर बगल के कनाडाई दूतावास में छिप जाते हैं | इन्ही 6 लोगों को सी.आई.ए. एक गुप्त मिशन के सहारे ईरान से सुरक्षित निकालने की योजना बनाती है | योजना के अनुसार एक ‘विज्ञान-फैंटेसी फिल्म’ बनाने वाली कम्पनी के रूप में सी.आई.ए. के अधिकारी यह कहते हुए ईरान में दाखिल होते हैं , कि उन्होंने इस देश को अपनी फिल्म की लोकेशन के लिए चुना है | बाद में कनाडाई दूतावास में छिपे उन सभी 6 लोगों को कनाडा का फर्जी पासपोर्ट देकर , फिल्म बनाने वाली उसी कंपनी का सहयोगी दिखा दिया जाता है | और एक नाटकीय अंदाज में 28 जन. 1980 को उन्हें सुरक्षित निकाल भी लिया जाता है | जाहिर है कि यह फिल्म उस मानसिकता को ध्यान में रखकर बनाई गयी है , जिसमें अमेरिकी लोग अपने आपको ‘हीरो’ जैसे दिखाना चाहते हैं |

फिल्म को वास्तविक दिखाने के लिए ऐतिहासिक पात्रों और टी.वी. दृश्यों का भरपूर प्रयोग किया गया है | जाहिर है ‘थ्रिलर’ फिल्मों को दिखाने में हालीवुड के पास अपनी महारत तो है ही | और इस फिल्म में जब ऐतिहासकिता के साथ उसे जोड़ा गया है , तो वह और अपीलिंग बन गया है | लेकिन इसी चक्कर में फिल्म एक-पक्षीय और प्रोपेगंडा-फिल्म की तरह से बन गयी है | इसमें ईरानी लोगों को असभ्य दिखाया गया है , और ऐतिहासिक संदर्भो की अपनी व्याख्या की गयी है | यह फिल्म न सिर्फ सी.आई.ए. को महिमामंडित करती है , वरन उस समूचे परिदृश्य को नजरअंदाज भी करती है , जिसमे यह घटना घटी थी | फिल्म कनाडा और न्यूजीलैंड के राजनयिकों द्वारा निभाई गयी भूमिका को भी महत्वहीन बनाने का काम करती है , जबकि ऐसा माना जाता है , कि उन 6 व्यक्तियों की रिहाई का मूल विचार कनाडा का ही था | तभी तो फिल्म को देखने के बाद कनाडा ने अपनी क्रुद्ध प्रतिक्रया दी | उसके अनुसार ‘यह फिल्म सी.आई.ए. के लिए लिखी गयी है , और हमारी भूमिका को महत्वहीन बनाती है |’ इन आपत्तियों के बाद इस फिल्म में कनाडा के लिए भी कुछ जोड़ा गया | वहीँ न्यूजीलैंड की आपत्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है , कि फिल्म को आस्कर दिए जाने के बाद 12 मार्च 2013 को वहां की प्रतिनिधि सभा ने यह प्रस्ताव पारित किया , कि ‘इस फिल्म के सहारे हमारे राजनयिकों की मेहनत और साहस को कमतर करने का प्रयास किया गया है |’

लेकिन सबसे तीखी प्रतिक्रया ईरान द्वारा दिखाई गयी | उसका कहना था , कि इस फिल्म में ईरान के पक्ष को बिलकुल भी नहीं दिखाया गया है और ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है | ईरान का यह भी मानना है , कि इसे पुरस्कृत करके हालीवुड ने अमेरिकी प्रचार युद्ध को ही पोषित किया है | इस फिल्म को लेकर आपत्तियां और भी हैं , जिसमें तथ्यों के साथ छेड़छाड़ और एकपक्षीय बनाने की बात शामिल है | लेकिन इन आपत्तियों से आगे बढ़कर उन मूल बिन्दुओं की तरफ नजर दौडाना उचित होगा , जिन्हें ध्यान में रखकर हालीवुड ने इस फिल्म को पुरस्कृत किया है | और जाहिर है , कि ऐसा करने के लिए उस समूचे परिदृश्य को समझना आवश्यक हो जाता है |

शीत युद्ध के दौर में गुप्तचर संस्थाओं की मदद से महाशक्तियों ने विभिन्न देशों में तख्तापलट कराया था | 1953 का ईरान हमारे सामने इसी उदाहरण के रूप में है | जब अमेरिकी गुप्तचर संस्था सी.आई.ए. और ब्रिटिश गुप्तचर संस्था एम.आई. 6 ने मिलकर डा. मोहम्मद मुसद्देह की जनता द्वारा चुनी गयी लोकप्रिय सरकार को सत्ताच्युत कर दिया गया था, और अपने पसंद के ‘शाह’ की सरकार को सत्तासीन | डा. मोहम्मद मुसद्देह उन साम्राज्यवादी ताकतों की आँखों में इसलिए खटक रहे थे , क्योंकि उन्होंने अपने देश की तेल संपदा का राष्ट्रीयकरण कर दिया था | उनकी जगह पर जब ‘शाह’ को सत्ता मिली , तो वे उन साम्राज्यवादी शक्तियों की गोद में बैठ गए , जो ईरान को दोनो हाथों से लूट रही थी | लगभग तीन दशकों तक ईरान में अमेरिकी समर्थित ‘शाह’ की सरकार चलती रही | इस दौरान अमेरिकी तेल कंपनियों को ईरान में तेल उत्पादन की खुली छूट मिली गयी थी , और वहाँ के पाकृतिक संसाधनों को दोनों हाथों से लूटा जा रहा था | उधर ईरानी जनता तमाम तरह के कष्टों को झेल रही थी | ‘शाह’ अपने देश में लगातार अलोकप्रिय होते जा रहे थे , और कुल मिलाकर लोगों के बीच यह धारणा बन गयी थी , कि ईरान की इस बदहाली की जिम्मेदारी अमेरिकी हस्तक्षेप और लूट के कारण पैदा हुयी है | 1967 और 1973 के अरब-ईजराईल संघर्ष में भी ईरान इसी वजह से किनारे खड़ा रहा , जबकि वह युद्ध पूरे क्षेत्र में फैला हुआ था | ऐसे में वहां अयातुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी क्रान्ति हो गयी , और ‘शाह’ को देश छोड़कर अमेरिका भागना पड़ा | इसी अफरातफरी और अमेरिका विरोधी माहौल में 4 नव. 1979 को एक इस्लामिक गुट द्वारा अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया गया , और साठ से अधिक लोगों को बंधक भी बना लिया गया था |

आरम्भ में उस इस्लामिक गुट की मंशा एक तात्कालिक मांग और प्रदर्शन तक ही सीमित थी  , और जिसे अयातुल्लाह खुमैनी द्वारा हतोत्साहित भी किया जाता रहा , क्योकि उससे ईरान की पूरी दुनिया में बदनामी हो रही थी | लेकिन जैसे-जैसे समय बीतने लगा , और अमेरिका द्वारा ईरान को अस्थिर करने की कोशिशे की जाने लगी , इस्लामिक नेतृत्व वाली ईरानी सरकार का रवैया भी बदलने लगा | वह उस पूरी घटना को अपनी सरकार को मजबूती प्रदान करने के लिए इस्तेमाल करने लगी , और अमेरिका के सामने कुछ ऐसी मांगे रखी गयी , जिनसे दुनिया भर में ईरान की गिरती हुयी छवि को बचाया जा सके | एक – ‘शाह’ को ईरान को सौंपा जाए | दो – अमेरिका ईरान में हुए 1953 के तख्तापलट के लिए माफ़ी मांगे | और तीन – ईरान की अमेरिका में जब्त और संचित राशि को लौटाया जाए | जाहिर है , कि ये मांगे अयातुल्लाह को सूट करती थी , और इससे अपने देश में उनकी पकड़ मजबूत भी होने लगी थी | एक लम्बी और थका देने वाली वार्ता के परिणामस्वरूप अंततः इन बंधकों को 444 दिनों बाद 20 जन.1981 को रिहा किया गया , जिसकी मध्यस्थता अल्जीरिया ने की थी | बदले में अमेरिका ने ईरान की कुछ संपत्ति को तो लौटाया ही , साथ ही साथ दुनिया को यह आश्वासन भी दिया , कि वह भविष्य में उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा | इस पूरे बंधक संकट में दो बड़ी घटनाएं और हुयी थी | एक - जैसा कि इस फिल्म में दिखाया गया है , कि 6 कर्मचारियों को एक गुप्त अभियान के तहत छुड़ा लिया गया था , जिसमे कनेडियन दूतावास की बड़ी भूमिका थी |  और दो – 24 अप्रैल 1980 को एक दूसरा गुप्त सैन्य-अभियान असफल भी हो गया था , और जिसमें अमेरिका के आठ सैनिक मारे गए थे |

फिल्म को देखने और उसके वास्तविक ऐतिहासिक परिदृश्य को समझ लेने के बाद शायद ‘आस्कर पुरस्कारों’ की इस राजनीति को समझा जा सकता है | पहली बात तो यह कि ‘आर्गो’ उस समूचे परिदृश्य को नहीं पकडती , वरन चयनित तरीके से अपने ख़ास हितों की घटनाओं को पकड़ कर आगे बढ़ती है | दूसरे , वह जिन चयनित घटनाओं को पकडती भी है ,उन्हें भी तोड़-मरोड़कर पेश करती है | और तीसरे यह कि , इसका परिणाम यह होता है , कि उस समूचे परिदृश्य की समझ लगभग उलट सी जाती है | क्योंकि जिस सी.आई.ए. की वजह से ईरान में तख्तापलट होता है , और जिसके सहयोग से एक भ्रष्ट व्यवस्था को तीन दशक तक ईरानी लोगों पर थोपा जाता है , वही सी.आई.ए. इस फिल्म में हीरो की भूमिका में आ जाती है | वहीँ दूसरी तरफ , उन कठिन दिनों को झेलने वाला ईरानी समाज खलनायक बन जाता है | और इन सबसे बढ़कर यह भी , कि इसके द्वारा अमेरिका ने ईरान पर एक तरह का ‘कूटनीतिक हमला’ भी किया है | आज अमेरिका की नजर ईरान पर है , और समूचे खाड़ी-क्षेत्र में वही एक ऐसा देश है , जो अमेरिकी नीतियों को चुनौती देता आया है | संयुक्त राष्ट्र-संघ और यूरोपीय संघ के साथ मिलकर अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंधो के सारे हथियार आजमा लिए हैं | अब इस फिल्म के सहारे सांस्कृतिक मोर्चे पर दुनिया भर में यह भ्रम फैलाया जा रहा है , कि ईरानी लोग असभ्य होते हैं , इसलिए उन्हें सबक सिखाया ही जाना चाहिए , और यह सबक ‘छल, बल और कल’ किसी भी तरीके से सिखाया जा सकता है | हालीवुड फिल्म उद्योग ने इस ‘आस्कर पुरस्कार’ के द्वारा अमेरिकी विदेश नीति के इन्हीं लक्ष्यों को संरक्षित किया है , न कि कला का सम्मान |

अमेरिका का प्रत्येक उद्योग इसी तरह से संचालित होता है , गोया दुनिया की सारी जिम्मेदारी उन्ही के ऊपर आयत होती हो | हालीवुड भी इससे अछूता नहीं है | वहां की फिल्मों में पूरी दुनिया को देखने का चलन बहुत पुराना है | वे इसे अपनी जिम्मेदारी भी मानते हैं | लेकिन जब उस दुनियावी दखल में अमेरिकी भूमिका की बात आती है , तो उनकी फिल्मे मौन साध लेती हैं | और जब कोई फिल्म यह साहस दिखाती है , तो उसे किनारे कर दिया जाता है | ‘आस्कर’ पुरस्कारों के 85 वर्षों की समूची सूची इस बात की गवाही देती है , कि उसने किस तरह से उन फिल्मों को किनारे किया है , जिनमे अमेरिका की दुनियावी दखल का खुलासा होता है | और साथ ही साथ यह भी , कि किस तरह से उन फिल्मों को पुरस्कृत किया गया है , जिन्होंने बदनाम अमेरिकी चेहरे को चमकाने का काम किया है | एक सवाल यहाँ यह खड़ा हो सकता है , कि आप अमेरिकी फिल्म उद्योग से यह अपेक्षा ही क्यों करते हैं , कि वह अपने देशहित को छोड़कर एक निष्पक्ष नजरिये का प्रदर्शन करे | उसका फिल्म उद्योग यदि अपने देश के चेहरे को चमकाता है , तो इसमें गलत क्या है ?  बिलकुल .... इसमें कुछ भी गलत नहीं है |  लेकिन दुनिया भर में यह ‘मोह और भ्रम’ क्यों पाया जाता है , कि ये पुरस्कार श्रेष्ठ फिल्मों को प्रदान किये जाते हैं , और भारत जैसे देशों में टी.वी.चैनलों पर लाइव दिखाकर , तथा समाचार पत्रों में उनकी खबरे पाटकर यह ‘पागलपन’ क्यों दिखाया जाता है ? यह ठीक है , कि अमेरिका में बनने वाली फिल्म अमेरिकी दृष्टि से ही निर्मित होगी , लेकिन यदि वह दृष्टि ‘इतिहास के निरस्तीकरण’ और ‘फिल्म द्वारा पुनर्लेखन’ तक पहुँच जाए , तो उसे बेनकाब किया जाना चाहिए | ऐसे में यह जरूरी है , कि हालीवुड फिल्म उद्योग के इस खेल को न सिर्फ समझा जाए , जो वह ‘आस्कर’ के माध्यम से खेलती आयी है , वरन उसे ख़ारिज भी किया जाए | ‘आर्गो’ नामक फिल्म इसी खेल का हिस्सा है , और इसलिए इसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए |
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रामजी तिवारी
कवितायें, संस्मरण लेख तथा फिल्म समीक्षाएं प्रकाशित
मो.न. 09450546312



   

                         


सोमवार, 23 अगस्त 2010

टाय स्टोरी 3 की एक मार्क्सवादी समीक्षा

मुझे पता नहीं कि टॉय स्टोरी ३ आप लोगों ने देखी है या नहीं,पता नहीं यह फिल्म भारत में अब तक रिलीज़ भी हुई है या नहीं. इसके बावजूद इस फिल्म की यह (मार्क्सवादी)समीक्षा आप लोगों से साझा करने का लोभ-संवरण नहीं कर पा रहा हूँ. याद नहीं कि इस से अच्छी समीक्षा मैंने पहले कभी पढ़ी हो. http://leninology.blogspot.com/ इसी लेखक का ब्लॉग है- भारत भूषण तिवारी
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People say the most unlikely things about films. They say Toy Story 3 is a miraculous film. They say it's a marxist parable about exploitation and authority. Or a treatise on Stalinism, or the Nazi holocaust. Neither Walt Disney nor its Pixar subsidiary will comment to make it clear which of the various interpretations is accurate. John Lasseter, whose long apprenticeship as a writer in the CGI end of the business has culminated in the Toy Story franchise, won't speak up either. This is poor customer service. Someone, somewhere, has to break the silence and let us the consumers know what the commodity does, forchristsake. Well, here's a thought.

Toy Story 3 is a story of how freedom is achieved through commodification, and how "the consent of the governed" roughly equals the willing embrace of bondage. You only have to bear in mind that the main characters are themselves commodities. It's a jocular, mocking, morality story about toys, their particular role in pedagogy and socialisation, the pseudo-history<http://www.thirdworldtraveler.com/Pilger_John/Have_Nice_War_DV.html> and televisual cliches they condense. Toys are a micro-cosm of the adult universe, produced so that the child doesn't have to invent the mainsprings of her future life, but can instead go about constructing her ego-ideal around these always-already present objects. They come laden with meanings which naturalise the myths of adult life, meanings that the franchise knowingly smirks about but doesn't really explore or problematise. They allow for the minimum of creative input and construction from the child.

In the franchise, the toys inexplicably have personalities, aspirations and purposiveness remarkably like those of their human masters. In fact, in the CGI universe, their level of reality is no different from that of their owners (who are, in their different ways, also commodities). But their ultimate fulfilment is in being owned, being put to work, "being there for" Andy. That this "being there for" involves being totally placid, pliable, silent and impersonal does not detract from their, er, humanity. That is the required performance. Everyone, and everything, has its place in the Toy Story scheme of things. That scheme is a hierarchy of commodities with toys near the bottom, subordinate and devoted to their owners. And ultimately, their devotion is reciprocated as, when the time comes for Andy to go to college, he emotes more about parting with his toys than he does about parting with his relatives.

Any attempt to break free of such mastery is illusory, merely a search for another master who will be even more tyrannical. When, after years of neglecting them, Andy appears to leave most of his toys out for garbage collection before heading off to college, the toys respond by sneaking into another box of toys destined for donation to the Sunnyside Day Centre. They refuse to heed Woody's pleas that Andy didn't mean for them to be sent to the incinerator, and instead revel in what appears to be a toy utopia, "without owners". But utopia is soon revealed as a totalitarian nightmare run by an embittered big boss toy named Lotso. The toys are forced to stay in a room where they are smashed up by crazy, dysfunctional kids who don't know how to play with toys. Buzz Lightyear, brainwashed (re-programmed to factory settings) by Lotso and his henchmen, is chosen to guard the prisoners. (Worth saying, this is the first scene in which any black characters appear at all. It is also the scene where the usual Toy Story ritual of sado-comical limb amputating, beheading and eye-gouging is repeated with maximum gusto.)

When the toys orchestrate the standard great escape from the prison camp, it is foiled by Lotso and his henchmen. There follows a cliched scene wherein the bad guy tries to break the defiance of the good guys with a demoralising patter about how the world works, and how they'd best try to fit in. Among the toys, Barbie suddenly erupts with the indignant cri de coeur: "Government should be based on the consent of the governed, not the threat of force!" It is immediately ironised, because such earnest expostulations don't really fit in with the tone of the film. But the writers will certainly have been aware of the long tradition of Disney films regurgitating tropes from liberal political theory, albeit slightly more subtly than this. Not only that, but they will be aware that the first CGI Barbie movie, adapted from the Nutcracker, was based around precisely this struggle between liberalism and tyranny. (I watched it with my nieces one day.) This is merely one example of the constant self-referential ironizing that regurgitates these tropes in a knowing way without really problematising them. And of course, the "consent of the governed" that is referred to here is the commodity's enjoyment in bondage, her revelling in being used and owned by a master, her sense of freedom in such subjection.

The story is thus an ironic, potted re-telling of American mythologies, as related by commodites, especially through the medium of television. Woody and Buzz Lightyear, the main characters, are traditional models of upright American masculinity, Woody a fifties prototype of the overland frontiersman, Buzz Lightyear a sixties prototype of the space frontiersman. The female characters exist principally as helpmeets and romantic encounters for the toy boys, highlighting their natural heteronormativity, confirming their dominant status, reinforcing a gendered dichotomy that, as everyone knows, real toys themselves do a great deal to produce. The toys exist as a community of sorts, a community of heroes, living the strenuous life, their shared pain and sacrifice bonding them together, the mortal peril elevating them to new planes of existence - all of this struggle so that they can continue to be the willing bonded serfs of rich, white yanqui scum. The narrative confirms that commodities are the most important things in life, real friends, closer friends than anyone you'll ever meet, and that to be a commodity is the most rewarding mode of existence. The latter claim is hardly unique to Hollywood films, but in drawing out and embracing the servitude implicit in commodification. Toy Story takes it a step farther than others.

The extravagant praise for the Toy Story franchise therefore demands some sort of explanation. It is a crashingly dull series, manipulative and predatory toward child consumers, tedious in its little nudge-nudge gestures to adult consumers, punctuated with aesthetic cliches that don't really qualify as ironic (oh the weather's taken a bad turn, so there must be trouble afoot), etc. I suppose the terms "feel good" and "life-affirming" must apply here. The films leave a warm little glow in the heart, reminding you that your alienated, commodified relationships are perfectly normal, human, desirable and moreover actually protected as human rights in the advanced capitalist states - it's in the constitution, dammit. There's also, though, a calculated element of Rorschach, wherein elements and motifs from history and ideology are scavenged and re-deployed, so that you can retrospectively read into the movie - whose effects you have just involuntarily responded to at a basic physical level - whatever rationalisation for so responding that makes you good with it. Indeed, there is marxism in the film, and the American revolution, and Stalinism, and the Nazi holocaust, and freedom, and sacrifice, and family values, and so on... because the film proves that all such aspects of experience are susceptible to being broken up and rearticulated in the commodity form. It is capital's highest tribute to itself, to its mode of production, distribution and exchange, its ability to convert all materials into some exchangeable, fungible base. In the furnace of capitalist culture, all of human existence is silly putty or play doh, malleable, protean, and saleable. That too is the basic message of the Toy Story franchise.