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रविवार, 13 अप्रैल 2014

12 इयर्स ए स्लेव - इस फिल्म को देखते हुए आप ‘पापकार्न’ नहीं खा सकते

                              


आस्कर पुरस्कारों की घोषणा ने इस बार सबको चौंका दिया है | अपने 86 सालों के इतिहास में आस्कर-अकादमी ने पहली बार किसी ऐसी फिल्म को पुरस्कृत किया है, जो अमेरिकी इतिहास के उन काले पन्नों को पढने की कोशिश करती है, जिनमें सदियों लंबा नरसंहार दर्ज है | हालाकि यह स्वाभाविक रूप से होना चाहिए था कि दुनिया के इतिहास को खंगालने की कोशिश करने वाली हालीवुड की फिल्म-इंडस्ट्री अपने इतिहास के भीतर झांकने और उसे पढने की कोशिश करने वाली फिल्मों को भी पुरस्कृत करती रहती | लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका | और ऐसा ही क्यों, अकादमी ने तो उन प्रत्येक विषयों पर बनने वाली फिल्मों को कूड़ेदान के हवाले ही किया है, जिसमें अमेरिकी मानसिकता के द्वंद्व को जांचने की कोशिश की गयी थी | हालीवुड में वियतनाम युद्ध पर बनी फ़िल्में इस बात की क्लासिक उदाहरण है कि आस्कर-अकादमी की मानसिकता क्या है | मतलब अकादमी के इतिहास को देखते हुए इस बात का जश्न मनाया जा सकता है, कि उसने इस बार ‘दास-प्रथा’ पर आधारित फिल्म ‘ 12 इयर्स ए स्लेव’ को ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म’ का पुरस्कार दिया है | यह जानते हुए कि इस पुरस्कार की ज्यूरी में लगभग 94 प्रतिशत ‘श्वेत’ लोगों का कब्ज़ा है, इसका महत्व और भी बढ़ जाता है |

हम सब जानते हैं कि अमेरिका में सदियों चली दास-प्रथा में लाखों लोगों के साथ किस अमानवीय तरीके का व्यवहार किया गया | 17 वीं शताब्दी से आरम्भ होकर 19 वीं शताब्दी तक चलने वाली इस नरसंहारक प्रथा में अफ्रीका से लाये गए लोगों की संख्या एक समय तो लगभग पचास लाख तक पहुँच गयी थी | आंकड़े बताते हैं कि 1865 में जिस समय इस दास-प्रथा का अंत किया गया, उस समय अमेरिका की पूरी आबादी लगभग चार करोड़ थी | और उस चार करोड़ में अश्वेत लोगों की संख्या लगभग पचास लाख के आसपास थी | हमें यह जानकर आश्चर्य होता है कि उन पचास लाख अश्वेतों में केवल तीन लाख ही ऐसे सौभाग्यशाली थे, जो ‘दासता’ से बाहर स्वतंत्र नागरिक का जीवन जीते थे | मतलब कुल अश्वेत आबादी की लगभग 90 प्रतिशत जनसँख्या ‘दासता’ के अधीन थी | और उन पर ढाये गए जुल्मों की फेहरिश्त भी बहुत लम्बी थी | हम इसे इस तरह से भी समझ सकते हैं कि ईसाईयत और लोकतंत्र के बड़े आदर्शों वाले उस देश में इन्हें मनुष्य मानने का प्रचलन तक नहीं था | इनके बारे में ऐसी धारणा थी कि ईश्वर ने इन्हें श्वेत लोगों की सेवा करने के लिए ही इस दुनिया में भेजा है | और फिर यह भी कि अश्वेत लोग ऐसे नहीं होते, जिन पर धर्म और लोकतंत्र के महान कानूनों को लागू किया जाए |

उन्हें एक तरह से संपत्ति के रूप में देखा जाता था | जिस समय तक वे इस रूप में उपयोगी होते थे, उन्हें जीने की सुविधा दी जाती थी | और अनुपयोगी होते ही उन्हें जीवन से बाहर से फेंक दिया जाता था | मार-पिटाई, महिला दासों के साथ यौन-उत्पीड़न, उन्हें सामान की तरह मंडी में बेचना-खरीदना और प्रतिरोध करने पर फांसी दे देना जैसे घटनाएं सामान्यतया प्रचलन में थीं | यूरोप और अमेरिका की चकाचौंध देखकर मुग्ध होने वाले लोगों को यह जरुर जानना चाहिए कि इन दोनों महाद्वीपों की बुनियाद किन रक्तिम आधारों पर निर्मित की गयी है | इन्हें बनाने में एक तरफ दुनिया के प्राकृतिक संशाधनों को लूटा गया है और दूसरी तरफ अपनी सुविधाओं के लिए दुनिया के नागरिकों की बलि चढ़ाई गयी है | इस औद्योगिक क्रान्ति की चमक में लाखों लोगों की खूनी शहादत भी शामिल है |

आईये फिल्म की तरफ लौटते हैं | सन 1841 में ‘सोलोमन नार्थप’ नाम का एक अफ्रीकी अश्वेत आदमी न्यूयार्क के एक ईलाके में अपने परिवार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी रह रहा होता है | वह अमेरिका में निवास कर रहे उन चन्द खुशनसीब लोगों में से एक हैं, जो अफ्रीकी अश्वेत होते हुए भी ‘दासता’ के नरक से मुक्त है | लेकिन उसकी खुशनसीबी उस समय जाती रहती है, जब उसे धोखे से शराब पिलाकर अपहृत कर लिया जाता है और ‘जार्जिया राज्य’ का ‘प्लाट’ नामक दास बताकर ‘न्यू आरलेन्स’ राज्य में बेच दिया जाता है | वह लगातार यह बताता है कि उसके साथ धोखा हुआ है, और वह एक स्वतंत्र आदमी है लेकिन उसकी गुहार व्यर्थ हो जाती है | इसके बाद फिल्म ‘प्लाट’ के बहाने उन अमानवीयताओं को चित्रित करती है, जिसमें वहां की अश्वेत आबादी पिसती रहती है | हलाकि ‘प्लाट’ का मालिक थोड़ा अच्छा आदमी है, लेकिन इस अच्छा होने का मतलब यह नहीं है कि वह उसे आजाद कर दे | बल्कि यह कि वह उस पर थोडा कम जुल्म ढाता है, और कभी-कभी उसकी बात भी सुनता है | परिस्थितिवश जब उसे ‘प्लाट’ की जरुरत नहीं रह जाती, तो वह उसे दूसरे व्यक्ति को बेच देता है | ‘प्लाट’ उससे दया की भीख मांगता है, तो वह कहता है कि उसके लिए वह एक संपत्ति है और वह अपनी सम्पति को यूँ ही नहीं जाने दे सकता है |

नए मालिक के यहाँ ‘प्लाट’ का सामना भयानक क्रूरताओं से होता है | उसके साथ रहने वाले और ‘दास’ भी उसी चक्की में पिसते रहते हैं, जिसमें कि ‘प्लाट’ | काम कम करने पर कोड़े लगाना और महिला दासों के साथ बलात्कार करना तो जैसे रोज-दिन का काम है | बाद में एक साथी कनेडीयाई मजदूर की मदद से ‘प्लाट’ अपने राज्य में यह सन्देश भिजवाने में कामयाब रहता है कि उसे यहाँ पर अपहृत करके ‘दासता’ में धकेल दिया गया है | वह आजाद होकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर लौट आता है |

फिल्म कई एक दृश्यों में बहुत प्रभावकारी है, जिनमें से दो-तीन का जिक्र करना यहाँ आवश्यक होगा | एक जगह जहाँ ‘प्लाट’ को खरीदकर लाया जाता है, एक महिला दास भी अपने बच्चों के साथ लायी गयी होती है | वह चाहती है कि उसे उसके बच्चों के साथ ही रखा जाए | मतलब एक ही व्यक्ति उसको और उसके बच्चों, दोनों को खरीदे | जबकि उस समाज में ऐसी संवेदनाओं के लिए बिलकुल भी जगह नहीं | उसे अपने बच्चों के साथ जिस दृश्य में अलग किया जाता है, वह इतना कारुणिक होता है कि उसे बेचने वाला भी असहज हो जाता है | वह ‘प्लाट’ को आदेशित करता है कि इस रुदन को ढकने के लिए वह वाइलिन बजाना आरम्भ कर दे | चीत्कार के मध्य वायलिन की धुन हृदयविदारक दृश्य उत्पन्न करती है | एक दूसरे दृश्य में ‘प्लाट’ का अपने साथी श्वेत व्यक्ति के साथ झगडा हो जाता है | वह श्वेत अपने साथियों की मदद से ‘प्लाट’ को फांसी दे देना चाहता है कि अचानक उसके मालिक का आदमी देख लेता है | वह ‘प्लाट’ के गले में डाला हुआ फंदा छोड़कर भाग जाता है | ‘प्लाट’ के हाथ पीछे बंधे हुए हैं, गले में फंदा कसा हुआ है, पैर किसी तरह जमीन पर बस लहराते हुए टिक भर पा रहे हैं | लेकिन किसी भी अन्य व्यक्ति के पास यह साहस नहीं है, कि वह जाकर उस रस्सी की काट दे | उसको काटने के लिए मालिक के आने का इन्तजार किया जाता है | साथी अश्वेत अगल-बगल में उसी रूटीन के साथ अपना काम कर रहे होते हैं, दुनिया उसी सामान्य तरीके से चल रही होती हैं, और ‘प्लाट’ तब तक घर के बाहर एक पेड़ से लटका अपनी जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा होता है, जब तक उसका मालिक आकर रस्सी को काट नहीं देता | और वह भी किसी हमदर्दी के कारण नहीं, वरन इसलिए कि उसे ‘प्लाट’ को खोने में आर्थिक नुकसान है |

यह दृश्य इतने बढ़िया एंगिल से ‘लांग और क्लोज शाट्स’ के जरिये फिल्माया गया है, कि दर्शक इस बात के लिए बेताब होने लगता है कि कोई तो उसकी रस्सी काट दे | तीसरे दृश्य में एक अश्वेत महिला दास को उसका मालिक सजा देता है | कोड़े खाने की सजा | लगाने का काम  ‘प्लाट’ से कराया जाता है | महिला दास को नंगा करके एक पेड़ से बाँध दिया जाता है, जिसके पीठ पर कोड़े बरसाए जाने हैं | अपने निर्दोष साथी पर कोड़े बरसाने में ‘प्लाट’ की रूह कापने लगती है | लेकिन वह ना नहीं कर सकता | उसे वह अमानवीय काम करना ही पड़ता है | लेकिन उसके मालिक को लगता है कि ‘प्लाट’ जोर से कोड़े नहीं लगा पा रहा है, तो वह स्वयं कोड़े बरसाने लगता है, जब तक कि वह महिला दास बेहोश होकर जमीन पर गिर नहीं जाती | ऐसे अनेक दृश्य उस दौर के समाज की गवाही देते हैं, जिसमें एक तरफ तो इसको करने वाले लोगों के दिलो-दिमाग में रंचमात्र का शिकन या अपराधबोध तक नहीं होता और दूसरी ओर इसको सहने वाले लोगों की परेशानियों का कोई अंत ही नही |

इस फिल्म को देखते हुए आप ‘पापकार्न’ नहीं खा सकते हैं | यह आपको बेचैन करती है, व्यथित करती है और मथती चलती है | उस व्यवस्था के प्रति, उस समाज के प्रति, उस ईश्वर के प्रति और इंसान के उस दिमाग के प्रति भी, जिसमें ऎसी अमानवीयताएं जन्म लेती हैं और जिससे खुराक ग्रहण करती हैं | फिल्म उस दौर की पूरी मनः-स्थिति को बताती है जिसमें अश्वेत लोगों को इतना अकेला कर दिया जाता है कि वे भी यही मानने लगते है कि उन्हें ईश्वर ने इसी अमानवीय कार्य के लिए इस धरती पर भेजा है | उन्हें जरा भी इस बात का अवकाश नहीं दिया जाता है कि वे इससे निकलने का प्रयास करें | फिल्म को देखकर सामान्यतया यह कहा जा सकता है, कि अकादमी ने इस फिल्म को पुरस्कृत करके साहसिक कार्य किया है, और अमेरिका को अपने भीतर झाँकने का एक अवसर भी दिया है |   

लेकिन इस सामान्य नजर से जैसे ही हम विश्लेष्णात्मक दृष्टि की तरफ पहुँचते हैं, इसमें कई पेंच फंसते हुए दिखाई देने लगते हैं | अकादमी में श्वेत लोगों का बर्चस्व रहा है, जिनकी भावनाएं उस देश में कुछ इस तरह से विकसित की गयी हैं कि वे अपने भीतर झाँकने की ईजाजत ही नहीं देती | बेशक वे जापान में परमाणु बम गिराने पर आहत नहीं होतीं, वे वियतनाम, ईराक और अफगानिस्तान में लाखों लोगों के नरसंहार पर भी साबुत बची रह जाती हैं, लेकिन इन विषयों पर फिल्म बनाने और उन फिल्मों को पुरस्कृत करने पर जरुर आहत हो जाती हैं | इसलिए हालीवुड में इन विषयों पर फिल्मों के बनने और अकादमी द्वारा उन्हें पुरस्कृत किये जाने की एक सीमा रेखा रही है | आस्कर विजेता फिल्मों की सूची देखकर आप अकादमी की उस सीमा रेखा को भी चिन्हित कर सकते हैं | मसलन दासता आधारित फिल्मों के लिए अकादमी के सामने ‘गान विथ द विंड’ एक सेट उदाहरण है | इसमें अकादमी की सूची भी समृद्ध हो जाती है, और श्वेत लोगों की भावनाएं भी आहत नहीं होतीं |

यह अनायास नहीं है कि अकादमी को किसी अश्वेत कलाकार को पुरस्कृत करने में ‘गान विथ द विंड’ के बाद लगभग पचास साल का समय लग जाता है | और ‘दासता’ आधारित फिल्म को पुरस्कृत करने में 86 साल | जबकि हालीवुड की उसी फिल्म-इंडस्ट्री में ’रूट्स’ ‘ग्लोरी’ , ‘एमिस्टेड’, ‘बिलव्ड’ ,और ‘जैन्गों अनचेंज्ड’ जैसी ‘दासता’ आधारित शानदार फ़िल्में बनती रही हैं | ‘ग्लोरी’ में पचास साल बाद कोई अश्वेत कलाकार पुरस्कृत होता है, तो इसलिए कि फिल्म यह बताती है कि अश्वेत लोग अपने ऊपर हुयी ज्यादतियों को भूलने के लिए तैयार हैं | ‘एमिस्टेड’ में पुरस्कार भी मिलता है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति एडम्स के चरित्र को और ‘बिलव्ड’ में कास्ट्यूम डिजाइनिंग को | वहीँ ‘जैन्गो अनचेंज्ड’ का सामना ‘जीरो डार्क थर्टी’ और ‘आर्गो’ जैसी अमेरिकी मानसिकता को तुष्ट करने वाली फिल्मों से होता है, सो उसके पुरस्कृत होने का सवाल ही नहीं उठता |

अकादमी की इस मानसिकता के बीच यदि फिल्म ’12 इयर्स ए स्लेव’ पुरस्कृत हो जाती है, तो इसके अर्थों को समझना जरुरी है | पहला कारण तो यह है कि अकादमी अपने ऊपर लगने वाले आरोपों का जबाब देना चाहती है कि उसके पास अपने भीतर झाँकने का साहस नहीं है | और दूसरा कारण यह कि उसकी नजर में यह फिल्म श्वेत लोगों की भावनाओं का खयाल रखती है | फिल्म में दो-तीन प्रस्थापनाएं ऐसी ही हैं | एक तो यह कि अश्वेत लोग भी अमेरिका के आजाद बाशिंदे थे, और उनका जीवन भी किसी आम अमेरिकी जैसा ही सुखमय और बेहतरीन था | दूसरा यह कि श्वेत लोगों के सहयोग से ही ऐसे लोग दास प्रथा से बाहर निकले | तीसरा यह कि वहां की व्यवस्था न्यायप्रिय थी, जो गलती से ‘दासता’ में धकेल दिए गये दासों का खयाल रखती थी | और सबसे बढ़कर फिल्म का सुखान्त एंगिल, कि जिसमें दर्शक उस विपदा के बीच से हंसता हुआ अपने घर वापस आता है |

हकीकत में हालात इससे काफी कठिन और बीभत्स थे | दासता गलती से थोपी हुयी इक्का-दुक्का घटना नही थी, वरन सोची-समझी एक नीति थी, जिसमें दूसरे के श्रम को बंधक बनाकर अपने लिए सुविधाएँ जुटाई जाती थी | 1841 के अमेरिका में अश्वेतों की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी दासता का नरक झेल रही थी | यह कोई अपवाद या कि गलती से हो गयी कार्यवाई नहीं थी, वरन उस समूचे अमेरिकी समाज के विवेकच्युत और पतनशील होने की दास्तान थी | उसे समाप्त करने के लिए कितने संघर्ष हुए, और कितने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, फिल्म इस विषय पर मौन साधे हुए ख़त्म हो जाती है | इस गंभीर मसले को अमेरिकी श्वेत दर्शकों के लायक बनाने में यह फिल्म अपनी दिशा से भटक सी गयी है | अंत आते-आते पूरा मामला इतना ‘रिड्यूस’ हो जाता है कि दर्शक इतिहास की उस दारुण कथा के अंत में ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर लौटता है | जाहिर है, इतिहास का यह एकांगी सच इसलिए अकादमी की पसंद बन सका |

हालाकि इन तमाम बातों के होते हुए आस्कर-अकादमी की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि उसने ‘दासता’ आधारित फिल्मों को पुरस्कृत करने पर लगाया गया अघोषित प्रतिबन्ध हटा लिया है | सच तो ये है कि ’12 इयर्स ए स्लेव’ के पुरस्कृत होने से अकादमी का ही मान बढ़ा है, जिसने अपनी लगातार गिरती हुयी विश्वसनीयता को थोड़ा सँभालने की कोशिश की है | बेशक इसमें इतराने जैसा कुछ नहीं है, लेकिन इस दिशा में यदि अकादमीं ने कोई सार्थक कदम उठाया है, तो उसका आगे बढ़कर स्वागत तो किया ही जाना  चाहिए |   



प्रस्तुतकर्ता

रामजी तिवारी
बलिया, उ.प्र.
मो.न. 09450546312  


बुधवार, 27 नवंबर 2013

जहाँ नहीं पहुंचती विकास की कोई किरण - रामजी तिवारी

                                


विज्ञान और प्रकृति के नियम विविधताओं को जीवन की आवश्यक दशाओं के रूप में स्थापित करते हैं | उनके अनुसार यह संभव ही नहीं है कि इस धरा पर केवल और केवल मनुष्य ही रहे , और तब भी यह अपनी धुरी पर घूमती रहे , चलती रहे | मतलब प्रकृति का विविध होना , न सिर्फ आवश्यक है , वरन वांछनीय भी है | जाहिर तौर पर , यह हमारी खुशकिस्मती है कि इस देश को प्रकृति ने विविधताओं के साथ करीने से सजाया है , और उसकी यह नेमत अपने सारे आयामों , सारे रूपों में दिखाई देती है | आप चाहें तो यह कहने के लिए मेरा ‘अति-राष्ट्रवादी’ कहकर मजाक भी उड़ा सकते हैं , तो भी मैं अपनी बात कहने से पीछे नहीं हटूंगा | क्योंकि जिस समय जैसलमेर और बाड़मेर में रेत के टीलों की कटीली झाड़ियाँ अपनी नुकीली पत्तियों में पानी की आखिरी बूँद को बचाने का संघर्ष कर रही होती हैं , उस समय ‘चेरापूंजी’ और ‘मासिनराम’ की धरती पर बादलों द्वारा निसदिन प्रेम-गीत लिखा जाता है | जब मध्य-भारत की जमीन ‘विषुवत-रेखीय’ तापमान को छूने की तरफ बढ़ रही होती है , तब हिमालय की वादियों का तापमान ‘साइबेरियाई’ गहराईयों में डूबने के लिए बेकरार रहता है | जब चेन्नई की उमस आपकी ‘एड़ियों’ को ‘सर’ के पसीने से नहला रही होती हैं , उस समय दिल्ली की होठों पर परी ‘फेफरी’ को सुखाने के लिए जीभ पर पानी तलाशना पड़ता है | 

धर्म , भाषा , रंग-रूप , खान-पान , त्यौहार , रहन-सहन और पहनावे जैसी अन्य कई विविधताओं को याद दिलाते हुए मैं आपको आश्वस्त कर देना चाहता हूँ , कि यह अपने देश की हकीकत है , और इन तथ्यों को आप मेरे ‘अति-भावुक राष्ट्रवाद’ के रूप में परिभाषित करने से पहले , आगे बढ़कर समग्रता में देखे , समझें और तब निर्णय करें | लेकिन विविधताओं पर इतराने की कहानी प्रकृति की इन नेमतों तक ही सीमित है और जहाँ से उसमें मानवीय हस्तक्षेप आरम्भ होता है , वहीँ से शर्मिंदगी की दास्ताने भी आरम्भ हो जाती हैं | अब जरा इस तथ्य पर विचार कीजिए कि यह देश एक साथ ‘मैनहट्टन’ और ‘इथियोपिया’ क्यों है ? ऐसा कैसे हो सकता है , कि जिस मुंबई में लाखो-लाख लोग ‘स्लम’ के नरक में दिन रात घिसटने के लिए मजबूर रहते हैं , उसी मुंबई में चार आदमियों वाले परिवार के घर में २७ मंजिले , चार स्वीमिंग पूल और हेलीपैड तक की सुविधाएं हैं ? कि , जिस प्रदेश में ढाई लाख किसानों ने कर्ज में डूबने के कारण अपने जीवन को कपास के महीन और मुलायम धागों पर टांग दिया हो , उसी प्रदेश में हजार करोड़ की सम्पति वाले लोगों की संख्या हजारों और लाखों में है ? कि,  एक ही शहर में ‘मरीन-ड्राइव’ और ‘धारावी’ कैसे हो सकते हैं ?

तो क्या इन्हें भी विविधताएँ मानकर इतराया जाए कि हमारे देश में कुछ लोगों के सपने में ही केवल बिजली कटती है , और कुछ लोगों के सपने में ही केवल वह आती है ? इन जैसे सवालों की फेहरिश्त इतनी लम्बी है कि ऐसे कई लेख उनकी कहानी कहते-कहते थक जायेंगे , और वे फिर भी अपने अंत तक नहीं पहुँच पाएंगे | इसलिए विश्वास मानिए ,कि हमारा इरादा यह कत्तई नहीं है , कि इन सारी कहानियों को सुनाकर हम आपको ‘अवसाद’ से भर दें , वरन हम तो सिर्फ इशारा भर करना चाहते हैं कि इस देश के ‘अव्वल संस्थानों’ से निकले ‘अव्वल दिमागों’ के द्वारा कल को यह न प्रचारित किया जाने लगे , कि जिस तरह से प्रकृति ने हमें विविधताओं से नवाजा है , उसी तरह हमारे मानवीय नियंताओं ने भी इस देश में बड़ी मेहनत से इतनी विविधताएँ पैदा की हैं , और इसके लिए हमें उनका शुक्रगुजार होना चाहिए | आप इसे बिलकुल ही अतिशयोक्ति के रूप में मत लीजिये कि ‘ नहीं नहीं ....ऐसा कैसे हो सकता है ”  ? अजी साहब .... जब देश के प्राकृतिक संशाधनों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौपने के लिए अपने ही देश के नागरिकों के विरूद्ध अपनी ही सेना को लगाया जा सकता है , और उसे विकास की आवश्यक शर्त के रूप में परिभाषित भी किया जा सकता है , तो ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है ? इसलिए हमारा फर्ज है कि उन ‘अव्वल दिमागों’ द्वारा ‘विषमताओं’ को ‘विविधताओं’ के रूप में परिभाषित करने से पहले ही हम उन्हें समझ लें और इस देश को सबके जीने लायक बनाने का अपना सघर्ष जारी रखें |

मैं आज आपको अपने देश के एक ऐसे ही हिस्से में ले जाना चाहता हूँ , जो भौगोलिक दृष्टि से बिलकुल ही सामान्य सा इलाका है , और जिसकी कुल आबादी लगभग तीस-चालीस हजार है | इसे मैं इसलिए चुन रहा हूँ कि ‘आज़ादी के साठ साल बाद’ वाले जुमले से इतर जाते हुए अपने देश के एक निहायत ही सामान्य हिस्से की पड़ताल की जाए , कि हम इसके आईने में उस लोकतंत्र की पायदान पर आज कहाँ खड़े हैं , जिसमें सबके लिए कम से कम जीवन की मूलभूत दशाएं मौजूद हों | यह इलाका लद्दाख , लाहौल-स्फीति , माणा और अरुणांचल प्रदेश जैसे दुर्गम वादियों में बसा हुआ नहीं है , और न ही यहाँ पर बस्तर और अबूझमाड़ के दुर्गम जंगल हैं | यह लक्ष्यद्वीप और अंडमान जैसे भारत की मुख्य भूमि से कटा हुआ भी नहीं है , और न ही इस पर कश्मीर , मणिपुर , नागालैंड , असम या ‘लाल गलियारे’ जैसा ही कोई देश पर आया ‘आसन्न खतरा’ मौजूद है | यह सब मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जब भी देश की तरक्की को नापने के लिए किसी ऐसे पिछड़े और दुर्गम इलाके को चुना जाता है , तो सरकार यह कहकर उस पूरे सवाल को खारिज करने लगती है , कि यहाँ तक विकास को पहुँचाने के लिए हम पूरी तरफ कटिबद्ध हैं , और उसके लिए हम बहुत सारी लड़ाईयां भी लड़ रहे हैं | यहाँ तक कि अपने देश के हजारों जवानो की आहुति भी दे रहे हैं | मसलन सरकार के अनुसार आदिवासी इलाकों का विकास इसलिए नहीं हो पा रहा है , क्योंकि उन इलाकों में सक्रिय माओवादी यह जानते हैं , कि यदि इन इलाकों में विकास की धारा पहुँच जायेगी , तो उनका वर्चस्व समाप्त हो जाएगा , और इसलिए वे इसे होने देना नहीं चाहते | ऐसे में इस पूरी व्यवस्था की नीतियों और उनकी दिशा पर खड़ा किया गया सवाल हवा में उड़ जाता है , और लाखों-करोड़ों लोगों का जीवन मानव कहलाने की परिभाषा के दायरे से बाहर ही रह जाता है |

हकीकत तो यह है कि इस देश में जो भी विकास हुआ है , वह निहायत ही एकांगी और कुछ मुट्ठी भर लोगों के लिए हुआ है | दावों और प्रतिदावों तथा आंकड़ों और उनकी बाजीगिरियों में नहीं उलझते हुए , हम तो सिर्फ यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि किताबों के पन्नों पर ‘अंतिम आदमी के दरवाजे तक पहुँचने’ का दावा करने वाले हमारे जनतंत्र के कदम अभी कहाँ पर ठिठके हुए हैं | इसीलिए हम एक ऐसे इलाके को चुन रहे हैं , जो न सिर्फ विशुद्ध मैदानी इलाका है वरन हमारे देश के केंद्र में स्थित भी है | उत्तर-प्रदेश और बिहार की दक्षिण-पूर्वी सीमा पर स्थित इस इलाके की दास्तान इस कदर कारुणिक है कि वह शहराती और महानगरीय लोगों को चकित भी कर सकती है | खासकर उन लोगों के लिए , जो ‘इंडिया शाइनिंग’ और ‘देश निर्माण’ जैसे नारों को गाने में मशगूल हैं |

आईये उस दास्तान से रूबरू होते हैं , जो पूर्वी उत्तर-प्रदेश के एक जिले बलिया के कुछ गाँवों की है , और जिसकी सीमा तीन तरफ से बिहार प्रांत से मिलती है | दक्षिण में बक्सर , दक्षिण-पूर्व में आरा , पूरब में छपरा और उत्तर में सिवान | हम आपको इसके दक्षिणी और दक्षिणी-पूर्वी हिस्से की ओर ले जाना चाहते हैं , और भूगोल के साथ इतिहास को ध्यान में रखते हुए इसे बांचते हैं | आजादी से पहले जब उत्तर-प्रदेश और बिहार की सीमा का बंटवारा किया जा रहा था , तब इस ईलाके में गंगा की धारा को इन दोनों राज्यों की सीमा रेखा के रूप में तय कर दिया गया था | यह विभाजन लगभग सही भी था , और गंगा के बीचोबीच की धारा लम्बे समय तक उत्तर-प्रदेश और बिहार को अलगाती रही | समस्या तब शुरू हुयी , जब गंगा ने अपना रूख बदलना आरम्भ कर दिया | और यह बदलाव कुछ मीटर का नहीं होकर किलोमीटर में फैलता चला गया | जब गंगा ने ऊत्तर दिशा में बढ़ना आरम्भ किया , तो बलिया जिले में गंगा के उत्तरी किनारे पर बसे हुए सैकड़ों गावों की आबादी इसके चपेट में आ गयी | घर-द्वार , खेत-खलिहान सब गंगा में समाने लगे | लाखों की आबादी विस्थापित होने पर मजबूर हुयी | अधिकतर लोगों ने उत्तर दिशा का रूख किया , क्योंकि राज्य विभाजन के सिद्धांतों के अनुसार गंगा के दक्षिण में बिहार की सीमा पड़ रही थी | अब भले ही गंगा ने अपने उत्तरी हिस्से को काटते हुए दसियों किलोमीटर तक उस सीमा रेखा को बलिया जिले में घुसा दिया था | और गंगा की यह आवाजाही सिर्फ उत्तर दिशा में ही नहीं हुयी , वरन उसने बिहार की सीमा में कई जगहों पर अपना रूख दक्षिण की तरफ भी मोड़ा था |

सामान्यतया यह हुआ , कि उत्तर दिशा में कटान के कारण बलिया के लोग और उत्तर की तरफ भागे , और जब गंगा ने अपने कटान का रूख दक्षिण की तरफ किया , तब बिहार के लोगों ने भी दक्षिण दिशा की तरफ ही भागने का विकल्प चुना | मतलब इस आपाधापी में भी लोगों ने सरकार द्वारा खींची गयी राज्य की सीमाओं को याद रखा | भले ही उनकी सारी जमीने    गंगा के इस या उस पार चली गयी हों , उन्होंने अपने बसने का आधार गंगा की धारा को देखकर ही चुना | यूं तो तमाम सही नियमों के भी अपवाद हो जाया करते हैं , इसलिए यहाँ के कृत्रिम विभाजन द्वारा पैदा की गयी इस काल्पनिक रेखा को लांघने के अपवाद भी सामने आये | मसलन बलिया के कुछ गाँवों – जिनमें जवहीं दियर और शिवपुर दियर जैसे बड़े गाँव भी शामिल हैं – ने उत्तर की तरफ कुछ सालों तक भागने के बाद यह पाया कि उनकी सारी जमीनें तो गंगा के दक्षिण में चली गयी हैं , और गंगा ने उत्तर की तरफ बढ़ते हुए इसी धारा को अब अपना स्थायी बहाव तय कर लिया है , तो उन्होंने अपनी पुरानी जमीन की ओर लौटने का फैसला किया | कहें तो एक तरह से उनके लिए यह विकल्पहीनता की स्थिति भी थी | पूरी आर्थिक व्यवस्था कृषि पर आधारित थी , और गंगा ने कुछ सालों तक उन जमीनों पर रेत छोड़ने के बाद अब कृषियोग्य नयी मिट्टी दाल दिया था | एक तरफ उनके सामने वर्तमान का खानाबदोश जीवन था , और दूसरी तरफ अपनी हजारों एकड़ की जमीन का आकर्षण | बस दूसरे विकल्प को चुनने में राज्य की सीमा का पेंच फंस रहा था | उन्होंने उसे चुनौती देने का फैसला किया और धीरे-धीरे लगभग पूरा गाँव अपनी पुरानी स्थिति की ओर लौटने लगा | यह प्रक्रिया दशकों में पूरी हुयी | लेकिन अकेले नहीं | इसके साथ भविष्य के संघर्ष की पटकथा भी लिख दी गयी |

गंगा जब बलिया के गाँवों को ढाहते हुए उत्तर की तरफ बढ़ रही थी , उसी समय सीमावर्ती बिहार के लोग गंगा के साथ – साथ अपनी सीमा रेखा को उत्तर की तरफ खिसकाते चले जा रहे थे | चुकि यह प्रक्रिया दशकों में चली और पूरी हुयी , इसलिए उनका कब्जा भी दशकों पुराना हो गया था | जवहीं दियर और शिवपुर दियर जैसे बड़े गाँव तो गंगा के दक्षिण में जाकर बस गए , लेकिन उनकी कृषियोग्य भूमि विवादों में फंस गयी | खूनी संघर्षों का एक लंबा सिलसिला आरम्भ हो गया , और जो आज भी किसी न किसी रूप में चलता आ रहा है | बाद में जब देश आजाद हुआ , तब इस सीमा रेखा को निर्धारित करने के लिए ‘त्रिवेदी आयोग’ का गठन किया गया | आयोग की देख-रेख में सीमा पर पत्थर गाड़े गए , लेकिन जैसा कि ऐसे आयोगों में सामान्यतया होता है , कि वे दिल्ली में बैठकर लद्दाख की सीमा तय करने लगते हैं , वैसा ही कुछ यहाँ भी हुआ | बहरहाल वह सीमांकन हुआ | और उस होने के मुताबिक राज्य बदलने पर भी काश्तकारी के मालिकाना हक़ में किसी भी तरह के परिवर्तन नहीं होने की बात की गयी थी | अर्थात जिसकी जमीन थी , वही उसका मालिक माना गया , भले ही उसकी सीमा दूसरे प्रदेश में चली गयी हो | बाद में ‘नायर आयोग’ ने भी कुछ-कुछ वैसा ही फैसला दिया , लेकिन जमीन पर वह विवाद सुलझ नहीं पाया | आजादी के बाद शायद ही ऐसा कोई साल गुजरा होगा , जब इस विवाद के कारण , इस क्षेत्र की जमीन इंसानी लहू से लाल नहीं हुयी होगी |

यह वह जड़ थी , जिस पर इस समस्या का विकराल पेड़ पैदा हुआ | कालांतर में जब रक्तपात अधिक तीव्र होता चला गया , और कृषि पर निर्भरता भी कम होती चली गयी , तब इन गाँवों से पलायन भी तेजी से होने लगा | वैसे तो पहले ही यहाँ के लोग गंगा द्वारा ढाहने के बाद अपने गाँव का मोह छोड़कर अन्यत्र पलायित हो चुके थे , लेकिन बाद में यह पलायन अत्यंत तीखा हो गया | जिसके पास भी यहाँ से भागने की लेश मात्र भी गुंजाईश थी , उसने अपनी ‘चौखट’ उखाड़ ली | और यह संख्या सैकड़ों में नहीं , वरन कई हजारों की थी | लेकिन जो लोग फिर भी वहां पर जमें रहे , उनकी संख्या भी , दो बड़े और दर्जनों छोटे – मोटे गाँवों को मिलाकर तीस-चालीस हजार के आसपास बैठती है |  

प्रशासन के लिए खीची गयी लकीरों ने इन हजारों लोगों के जीवन में एक गहरा और कभी नहीं ख़त्म होने वाला अँधेरा बो दिया है , और वह सीमा-रेखा इनकी गर्दन पर जकड़ गयी है | त्रासदी यह हुयी है , कि उत्तर-प्रदेश में इन्हें बिहार का समझा जाता है , और बिहार इन्हें उत्तर-प्रदेश के अवांछित नामाकुलों के रूप में देखता है | उत्तर में बहने वाली गंगा नदी इस समूचे क्षेत्र को बलिया से काटकर अलगा देती है , और दक्षिण में बिहार की सीमा रेखा इन गावों के साथ इस तरह से बर्ताव करती रही है , कि जीवन को संभव बनाने वाली सारी सुविधाएं इन सीमाओं तक पहुँचते-पहुँचते सूख जाएँ | स्थिति यह हुयी है , कि ये हजारों लोग आधुनिक युग के ऐसे ‘टोबा टेक सिंह’ बन गए है , जो इन दोनों राज्यों के बीच ‘नो मैन्स लैंड’ में फंसे हुए हैं | बिहार में पड़ने वाले सभी सीमावर्ती गाँवों वे सारी सुविधाएँ पहुँच गयी हैं , जिन्हें उस प्रदेश के अन्य गाँवों में देखा जा सकता है | चाहें पश्चिम में पड़ने वाले गाँव केशोपुर , राजपुर , नियाजिपुर , सेमरी , एकौना, सिंघनपुरा , खरहाटार , गंगौली , परंपुर और चक्की हो , या फिर दक्षिण में पड़ने वाले ब्रह्मपुर , निमेज , देवकली , गायघाट , भरौली , योगिया , कुंडेसर और रानीसागर हों , या फिर पूरब में पड़ने वाले वाले बिहार के गाँव माहुर , नैनीजोर , ईश्वरपुरा , करमानपुर , सोनबरसा , बंशीपुर और निमिया हों | सड़कों से लेकर बिजली तक , या फिर शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्द्धता तक | सबके कदम इन गाँवों तक पहुँचते तो हैं , लेकिन वे उत्तर-प्रदेश में पड़ने वाले इन पड़ोसी गाँवों तक आते-आते लडखडा जाते हैं | गंगा नदी के दक्षिण में बसे होने के कारण , बिहार राज्य के मन में बलिया के इन गाँवों के प्रति जिस तरह की कटुता पायी जाती है , उसे यहां की सड़कों के सन्दर्भ में देखा जा सकता है | ये सड़कें इस तरह से बनायी जातीं हैं , कि वे अपने ईलाके को तो जोड़ें , लेकिन बलिया के इन गाँवों का संपर्क कटा रहे |

लेकिन इसके लिए हम बिहार को जिम्मेदार ठहरा भी नहीं सकते | जाहिर है , यह उत्तर-प्रदेश और बलिया जिले की जिम्मेदारी है , कि वह इन गाँवों को देश की मुख्यधारा के साथ जोड़े | सबसे पहली बात संपर्क मार्ग की आती है | बलिया शहर मुख्यालय से मात्र बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर बसे इन गावों को आज भी इस बात का इन्तजार है , कि वे सड़क मार्ग से बलिया से जुड़ें | लगभग तीस-चालीस हजार की आबादी वाले इस क्षेत्र का विस्तार बीस-पच्चीस किलोमीटर में है , और यहाँ के लोग साल के छः-सात महीने – जून से लेकर दिसंबर तक - देश दुनिया से कटे रहते हैं | पीपा का एक अस्थाई पुल प्रतिवर्ष गंगा नदी पर बनता है , जिसके बनने का तय समय अक्टूबर में निर्धारित है , लेकिन वह खींचते-खींचते जनवरी में चला जाता है , और हटने का तय समय मध्य जून से पहले अप्रैल या मई में आने वाली किसी भी बड़ी आंधी द्वारा तय कर दिया जाता है | मतलब कागज में छः महीने का काम जमीन पर चार से पांच महीने ही चल पाता है | और वह भी तमाम दुश्वारियों  , बाधाओं के बीच से होते हुए | मसलन जनवरी से मई के बीच भी , जब यह पीपे का अस्थाई पुल बना होता है , तो भी बाकि रास्ता तो कच्चा ही होता है , जो दियारे के बीचो-बीच से होकर निकलता है , और हर साल गंगा की छाड़न और उसके द्वारा डाली गयी मिट्टी के आधार पर तय होता है | यह रास्ता  बलुई , काली और पीली मिट्टी से होकर गुजरता है , और त्रासदी देखिये कि एक तरफ अप्रैल और मई की तपन इसको जैसलमेर बना देती है , और खुदा-न-खाश्ता जब कभी इन चार-पांच महीनों में बारिश हो जाती है , और आप उस रास्ते में फंस जाते हैं , तो साइकिलों मोटरसाइकिलों तक को रास्ते के सूखने तक उसी स्थान पर छोड़ना पड़ता है |  

बारिश का मौसम इस इलाके के लिए जानलेवा मौसम होता है | कृषि और पशुपालन के मुख्य आधारों पर टिकी इनकी अर्थव्यवस्थाएं यहाँ के लोगों को प्रतिदिन बलिया शहर में ला पटकती हैं , और जो किसी भी तरह से चार अंको वाली संख्या से कम नहीं होती है | इनमे कुछ तो काम की तलाश में आने वाले दैनिक मजदूर होते हैं , और बाकि अधिकांश दूधिये , जिनके लिए प्रतिदिन दूध लेकर शहर पहुँचना अनिवार्य होता है , चाहे उस रास्ते पर चलने की चुनौती युद्ध लड़ने जितनी ही भयावह क्यों न हो |

संपर्क मार्ग से नहीं जुड़े होने के कारण यहाँ पर समस्यायों का अम्बार लगा हुआ है | मसलन क़ानून व्यवस्था , शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ | सबसे पहले कानून व्यवस्था की बात करते हैं , जो पूरी तौर से प्रकृति के सिद्धांतों पर आधारित है | इस विषय को लेकर सारा दियारा अपने पैरों पर खड़ा है | और यह आत्मनिर्भरता उस समूचे दियारे को एक अराजक क्षेत्र में तब्दील कर देती है | गंगा के उत्तर में पड़ने वाले हल्दी और दुबहड़ थानों के ऊपर इस क्षेत्र को सँभालने की जिम्मेदारी दी गयी है | और आपको जानकर यह आश्चर्य होगा , कि खून-खराबे की स्थिति में पहुँचने वाले झगड़े भी इन थानों तक नहीं पहुँच पाते हैं | ‘क्यों .....? का सवाल मत उठाईयेगा , अन्यथा रिकार्ड देखकर यह बताना पडेगा कि कितने महीने पहले इस क्षेत्र में कोई दरोगा , या उससे बड़ा अधिकारी गया था | और फिर जाएगा भी कैसे ...? अपराध मौसम देखकर तो होगा नहीं , कि भाई आजकल रास्ता बना हुआ है , तो आइये इसे कर ही लिया जाए | और फिर यदि वह बारिश के महीने में हुआ , या फिर तब , जब पगडंडिया कीचड़ से सनी हुयी हों , तो कोई भी पुलिस वाला वहां पहुंचेगा कैसे ? स्थिति तो इतनी भयावह है , कि झगड़ों में जाने वाली लाशों तक भी प्रशासन की पहुँच कुछ दिनों के बाद ही हो पाती है | संपर्क मार्ग से कटे होने के कारण बलिया शहर मुख्यालय से लेकर पूरब में लगभग पचास किलोमीटर , अर्थात छपरा जिले की सीमा तक का यह इलाका अपराधियों की यह शरणस्थली रहा है | और यह तब रहा है , जब इस इलाके में न तो कोई जंगल है , और न ही छिपने के हिसाब से कोई पहाड़ियां ही |

शिक्षा के नाम पर सरकारी कागजों में हाईस्कूल तक की दास्तान लिखी गयी है , और यह बताने की आवश्यकता नहीं कि यह पूरी तरह से कागजों पर ही सीमित है | अजी साहब .... जब इन गाँवों में डी.एम. , एस.पी. , विधायक और सांसद पंचवर्षीय योजनाओं जैसे दौरे करते हों , तो फिर प्राइमरी और मिडिल स्कूल का अध्यापक क्यों नहीं करेगा | इन इलाकों में उसे रहना मंजूर नहीं , और बलिया से आना-जाना संभव नहीं | हालत तो यह है कि इस इलाके के लगभग सभी प्राइमरी और मिडिल स्कूलों के भवनों में निजी विद्यालयों की कक्षाएं लगती हैं , और उन्ही के सहारे यहाँ के लड़के-लड़कियां अक्षरों , शब्दों और संख्याओं की इबारतें सीखते हैं | सबसे ख़राब स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं की है | सरकारी और निजी , दोनों ही स्तरों पर स्वास्थ्य सेवाएँ अपने अस्तित्व के होने का अभी इन्तजार कर रही हैं | यहाँ न तो कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है और न ही कोई निजी चिकित्सालय | इलाज की सारी जिम्मेदारी ‘झोला छाप डाक्टरों’ के भरोसे चलती है , जो किसी भी बिमारी का इलाज ‘एंटी-बायोटिक’ देकर या फिर ‘पानी चढ़ाकर’ करने का ‘मौलिक हुनर’ जानते हैं | अब यदि इस दौरान कोई भगवान को प्यारा हो जाता है , तो उसे नियति मान लिया जाता है , या परिजनों द्वारा उस ‘झोला-छाप’ डाक्टर की पिटाई करके सतुष्ट हो लिया जाता है | आपात स्थिति में बलिया के जिला चिकित्सालय में तभी पहुँचा जा सकता है , जब मौसम आपके साथ हो | मतलब , बीमारियों के लिए भी दिन और मुहूर्त निर्धारित है , कि वे इसी समय पर आयें | और जो असमय दस्तक देती हैं , उन्हें लोग ‘काल’ मान लिया करते हैं | मसलन यदि किसी को ‘सांप’ ने काट लिया , जो कि इस इलाके की एक सामान्य दुर्घटना है , और यदि मौसम विपरीत हुआ , तो बजाय ‘जिला चिकित्सालय’ जाने के लोग यह प्रार्थना करने लगते हैं कि काटने वाला वह सांप जहरीला नहीं हो | और यदि वह जहरीला हुआ , तो फिर उसे ‘काल’ ठहरा देने के अलावा उनके सामने दूसरा और कौन सा विकल्प बचता है |

इस इलाके में प्रतिवर्ष सांप काटने से मरने वाले लोगों की संख्या , कुछ नहीं तो दहाई में तो होती ही है | और वही स्थिति कमोबेश गर्भवती महिलाओं की भी है | हालाकि आजकल लोगों ने अपने घरों की उन गर्भवती महिलाओं को गर्भ के आठवे महीने के बाद बलिया शहर के आसपास रखना आरम्भ कर दिया है , जिसमे किसी भी आपातकालीन स्थिति से निबटा जा सके | इसके अलावा दो प्राकृतिक विपत्तियाँ भी इस इलाके को प्रतिवर्ष झकझोरती रहती हैं | एक तो बरसात के मौसम में यहाँ आने वाली बाढ़ , और दूसरे गर्मियों के मौसम में लगने वाली आग | यहाँ के साठ-सत्तर फीसदी घर ‘घास-फूस’ के बने हुए हैं , और वे इन आपदाओं की चपेट में लगभग प्रतिवर्ष आते रहते हैं | फायर-ब्रिगेड की गाड़ी ने पिछली बार इस इलाके में कब कदम रखा था , इसके लिए उस विभाग का गजेटियर देखना पड़ेगा |

इस कारुणिक कहानी का वैसे तो कोई अंत नहीं है , लेकिन यहाँ पर इस दास्तान को बांचते हुए चलना जरुरी समझता हूँ , कि यहाँ के लोगों ने प्रधानमंत्री की उस घोषणा को बहुत गम्भीरता से लिया है , जिसमें उन्होंने सन २०२० तक सबको बिजली देने का वादा किया है | वैसे इनके पास इस आशावादिता में जीने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं है | नेहरू से लेकर गांधी तक , और गोलवरकर से लेकर लोहिया और अम्बेडकर तक के नाम पर चलने वाली तमाम योजनाओं में से एक के द्वारा भी , इस इलाके में अभी तक रोशनी नहीं हो पायी है | लगभग एक सदी पूर्व ‘एडिसन’ द्वारा आविष्कृत ‘बल्ब’ को यहाँ के लोगों ने – जलते या बुझते – किसी भी रूप में नहीं देखा | अजी साहब .....देखने के लिए तो इनके जीवन में बिजली के तार और खम्भे भी बचे हुए है | वैसे चाहें तो आप मेरी बात को झुठलाने के लिए , उन ऊँचे-ऊँचे विशाल डैनो वाले खम्भों का हवाला दे सकते हैं , और उन पर पर तने हुए पचीसों तारों के समूहों का भी , जिन्होंने पूर्व-प्रधानमंत्री चद्रशेखर जी के गाँव में स्थित बिद्युत केंद्र तक पहुँचने के लिए इस इलाके में गंगा नदी को चार जगह से पार किया है | अब आप ही बताइये , कि ऐसे में प्रधानमंत्री के शब्दों पर जतायी गयी उनकी आशावादिता का आधार बनता है या नहीं | भले ही उन भलेमानुस ने , मजाक के तौर पर ही यह कह रखा हो |

ऐसे में कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं , कि इस इलाके के लोग इन परिस्थितियों में आखिर रहते कैसे हैं ...? और उससे भी आगे बढ़कर ये कि ‘ये लोग यहाँ रहते ही क्यों हैं ...?’ |  जाहिर है कि ऐसे सवाल उठाने वाले लोगों को अपने देश की जमीनी हकीकत का अन्दाजा नहीं है | क्या उन्हें यह पता है कि ‘कनाट-प्लेस’ के भीतरी घेरे में बने शो-रूम में सजे एक शर्ट , एक पैंट , एक साड़ी या फिर एक जोड़ी जूते की कीमत को महीने भर की पगार के रूप में हासिल करने के लिए लोग-बाग़ जौनपुर , मोतिहारी  , कोडरमा और जगतसिंहपुर से क्या कुछ छोड़ते हुए , इसी दिल्ली में कैसे घिसटते हैं ? दरअसल ये लोग तो इन घिसटने वाले लोगों के दुनिया में आने से ही चिढ़ते हैं , किस इस बन्दे ने इस धरा का बोझ बाधा दिया , तो आगे और क्या कहा जाय ...| खैर ...बात यह हो रही थी कि ‘ये लोग इन परिस्थितियों में रहते कैसे हैं ..?’ तो उत्तर भी साफ़ है ...| केवल और केवल प्रकृति पर , और जिनके पास थोड़ा भी अवसर है , वे पलायन पर |

अब खुदा के लिए यह मत समझाईयेगा , कि मनुष्य को प्रकृति की गोद में रहना चाहिए | अजी साहब ... हम आपके दुश्मनों के लिए भी यह कामना नहीं करेंगे कि उन्हें अपने जीवन में प्रकृति की ऎसी कोई गोद मिले | वैसे आप चाहें तो इन सच्चाईयों को दो तरीकों से हवा में उड़ा सकते हैं | पहला यह कहकर कि आजादी के छः दशक बाद देश का कोई इलाका इतना पिछड़ा कैसे हो सकता है , और इस पर विश्वास करना संभव नहीं है ? और दूसरा कि इसमें नया क्या है , और इतने बड़े देश में यह तो होता ही रहता है | तो मैं पहले तर्क के लिए आपसे निवेदन करूंगा कि एक बार इस इलाके को देख जाइए , और दूसरे कि ‘बेगानापन’ अच्छा होता है , और उससे जीवन में तनाव को कम भी किया जा सकता है , लेकिन ध्यान रखियेगा कि इस दुनिया में हमने समाज में रहने का विकल्प चुना है , जो हमारे और आपके अलावा अन्य लोगों से मिलकर ही बनता है |

यह एक तस्वीर है , जिसमें हम अपने देश के विकास को देख-परख सकते हैं | यह चौपाटी , लुटियन जोन्स और साइबर सिटी के समानांतर रहने वाली हमारी ही दुनिया है , जिसे मनुष्य कहलाने की आवश्यक दशाओं का आज भी इन्तजार है | देश के बीचोबीच में बसे इस सामान्य इलाके में , दुःख की बात है , कि देश ही दिखाई नहीं देता | और यदि छः दशक में यह देश अपने ही शरीर के अंगों के प्रति इतना अनजान है , तो फिर उसकी सेहत के लिए इससे बुरी बात और क्या हो सकती है | क्या वह अपने इन अंगों में किसी घाव होने का इन्तजार कर रहा है , और जिसकी तभी देखभाल करेगा , जब वे सड़ने लगेंगे , उसे कष्ट देने लगेंगे | इसके अपने शरीर पर वैसे भी कम जख्म तो नहीं हैं , कि वह किन्ही और नए जख्मों के होने का इंतजार कर रहा है ? लोग कहते हैं कि सरकार तो आदिवासियों का विकास करना चाहती है , और माओवादी उसे रोककर आदिम समाज ही बनाए रखना चाहते हैं , क्योंकि वे विकास से डरते हैं और उन्हें लगता है , कि उनका प्रभुत्व खतरे में पड़ जाएगा | लेकिन इन इलाकों में तो कोई माओवादी नहीं रहता | हजारों – हजार की आबादी सड़क चाहती है , बिजली चाहती है , स्कूल चाहती है , अस्पताल चाहती है और मनुष्य होने की आवश्यक दशाएं चाहती हैं | लेकिन सरकार ....?

सोचियेगा ...... चाँद-तारों पर पहुँचने की ख्वाहिश रखने वाले इस मुल्क में क्या यह इतनी बड़ी मांग है ....?



संपर्क

रामजी तिवारी
बलिया , उ.प्र
मो.न. 09450546312     




  







सोमवार, 6 मई 2013

आस्कर’– फ़िल्म के पुरस्कार या विदेश नीति के हथियार


 रामजी तिवारी ने पिछले दिनों फिल्म समीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण काम किये हैं. खासतौर से हालीवुड की चर्चित तथा पुरस्कृत फिल्मों की जो राजनीतिक समीक्षा उन्होंने प्रस्तुत की है, वह  सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के हथियार के रूप में हालीवुड की भूमिका की गहरी पड़ताल है. हाल  ही में आई उनकी पुस्तक  आस्कर अवार्ड्स : यह कठपुतली कौन नचावे'  हिंदी सिनेमा लेखन की एक विशिष्ट उपलब्धि है.
'इसी क्रम में उनका यह आलेख इस वर्ष की आस्कर विजेता फिल्म 'आर्गो' पर केन्द्रित है. समयांतर में प्रकाशित इस लेख को हम जनपक्ष पर भी प्रस्तुत कर रहे हैं.   




‘आस्कर’ पुरस्कारों को लेकर अपने देश में ‘मोह और भ्रम’ से आगे बढ़कर ‘पागलपन’ की स्थिति बनती दिखाई दे रही है , और जो इधर के वर्षों में काफी बढ़ गयी है | ‘स्लमडाग मिलेनियेर’ फिल्म को ही लीजिये | उसे भारत में इस तरह से प्रचारित किया गया , गोया वह कोई भारतीय फिल्म हो , या वह भारतीय समाज को प्रतिविम्बित ही करती हो | वही ‘पागलपन’ इस साल भी ‘लाइफ आफ पाई’ के लिए दिखाया गया | खैर .... पुरस्कारों की घोषणा हुयी , और उम्मीद के मुताबिक़ ही ‘आर्गो’ फिल्म को इससे नवाजा गया | स्वतंत्र प्रेक्षक इस बात को पहले ही मान चुके थे , कि इस बार ‘आर्गो’ या ‘जीरो डार्क थर्टी’ में से ही किसी एक फिल्म को आस्कर दिया जाएगा | कारण साफ़ था | ‘आर्गो’ ईरान में घटित 1979 की इस्लामी क्रांति के दौरान अमेरिकी राजनयिकों के बंधक बनाये जाने , और उनमे से 6 को सी.आई.ए. के गुप्त मिशन के द्वारा छुड़ा लिए जाने की घटना पर आधारित है , जबकि ‘जीरो डार्क थर्टी’ ओसामा बिन लादेन की खोज और उसके पाकिस्तान में मारे जाने की घटना को दिखाती है | जाहिर है , ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों में चुनाव के दौरान उस फिल्म के हाथ में बाजी लगी , जिसमें अमेरिका अपने भविष्य की संभावनाएं देखता है | इन अर्थों में एक दशक पहले की अपेक्षा , चार दशक पहले की घटनाओं में गोते लगाने को अप्रत्याशित नहीं माना जाना चाहिए |

हैरानी की बात यही है , कि एक तरफ जहाँ दुनिया में इन पुरस्कारों को लेकर ‘मोह और भ्रम’ का यह वातावरण बना हुआ है , वहीँ दूसरी तरफ हालीवुड का फिल्म उद्योग इन पुरस्कारों के माध्यम से अमेरिकी विदेश नीति के हथियार के रूप में काम करता है | इस साल के पुरस्कारों से यह बात और स्पष्ट रूप से हमारे सामने आती है , कि साम्राज्यवादी और विस्तारवादी देशों की नीतियाँ अपने हिसाब से कलाओं को भी नियंत्रित करती हैं , और जिन कलाओं-विधाओं के ऊपर उस समाज को दिग्दर्शित करने की जिम्मेदारी आयत होती है , वही कलाएं और विधाएं उन विस्तारवादी नीतियों के हाथों में खेलने लगती हैं | अन्यथा अकादमी के सामने दो बेहतरीन फिल्मों  - ‘लिंकन’ और ‘ला मिजरेबल्स’ - का विकल्प तो था ही , जिनके आधार पर वह अपने चेहरे को चमका सकती थी , लेकिन उसने अपने इतिहास को दुरुस्त करने के बजाय , पूर्व की भाति ही इन फिल्मों को कूड़ेदान के हवाले कर दिया | तो आईये पहले यह जानने की कोशिश करते हैं , कि इस साल की आस्कर विजेता फिल्म ‘आर्गो’ आखिर दिखाती क्या है , और अंततः इस फिल्म से कौन सा सन्देश ध्वनित होता है ?

‘बेन अफलेक’ द्वारा निर्देशित यह फिल्म ‘आर्गो’ ईरान में इस्लामी क्रांति के दौरान हुयी उस ‘वास्तविक घटना’ को लेकर बनाई गयी है , जिसमें 4 नव. 1979 को एक अतिवादी मुस्लिम गिरोह द्वारा अमेरिकी दूतावास पर हमला किया जाता है , और दूतावास के 60 से अधिक कर्मचारियों को बंधक बना लिया जाता है | संयोगवश इनमे से 6 लोग किसी तरह से भागकर बगल के कनाडाई दूतावास में छिप जाते हैं | इन्ही 6 लोगों को सी.आई.ए. एक गुप्त मिशन के सहारे ईरान से सुरक्षित निकालने की योजना बनाती है | योजना के अनुसार एक ‘विज्ञान-फैंटेसी फिल्म’ बनाने वाली कम्पनी के रूप में सी.आई.ए. के अधिकारी यह कहते हुए ईरान में दाखिल होते हैं , कि उन्होंने इस देश को अपनी फिल्म की लोकेशन के लिए चुना है | बाद में कनाडाई दूतावास में छिपे उन सभी 6 लोगों को कनाडा का फर्जी पासपोर्ट देकर , फिल्म बनाने वाली उसी कंपनी का सहयोगी दिखा दिया जाता है | और एक नाटकीय अंदाज में 28 जन. 1980 को उन्हें सुरक्षित निकाल भी लिया जाता है | जाहिर है कि यह फिल्म उस मानसिकता को ध्यान में रखकर बनाई गयी है , जिसमें अमेरिकी लोग अपने आपको ‘हीरो’ जैसे दिखाना चाहते हैं |

फिल्म को वास्तविक दिखाने के लिए ऐतिहासिक पात्रों और टी.वी. दृश्यों का भरपूर प्रयोग किया गया है | जाहिर है ‘थ्रिलर’ फिल्मों को दिखाने में हालीवुड के पास अपनी महारत तो है ही | और इस फिल्म में जब ऐतिहासकिता के साथ उसे जोड़ा गया है , तो वह और अपीलिंग बन गया है | लेकिन इसी चक्कर में फिल्म एक-पक्षीय और प्रोपेगंडा-फिल्म की तरह से बन गयी है | इसमें ईरानी लोगों को असभ्य दिखाया गया है , और ऐतिहासिक संदर्भो की अपनी व्याख्या की गयी है | यह फिल्म न सिर्फ सी.आई.ए. को महिमामंडित करती है , वरन उस समूचे परिदृश्य को नजरअंदाज भी करती है , जिसमे यह घटना घटी थी | फिल्म कनाडा और न्यूजीलैंड के राजनयिकों द्वारा निभाई गयी भूमिका को भी महत्वहीन बनाने का काम करती है , जबकि ऐसा माना जाता है , कि उन 6 व्यक्तियों की रिहाई का मूल विचार कनाडा का ही था | तभी तो फिल्म को देखने के बाद कनाडा ने अपनी क्रुद्ध प्रतिक्रया दी | उसके अनुसार ‘यह फिल्म सी.आई.ए. के लिए लिखी गयी है , और हमारी भूमिका को महत्वहीन बनाती है |’ इन आपत्तियों के बाद इस फिल्म में कनाडा के लिए भी कुछ जोड़ा गया | वहीँ न्यूजीलैंड की आपत्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है , कि फिल्म को आस्कर दिए जाने के बाद 12 मार्च 2013 को वहां की प्रतिनिधि सभा ने यह प्रस्ताव पारित किया , कि ‘इस फिल्म के सहारे हमारे राजनयिकों की मेहनत और साहस को कमतर करने का प्रयास किया गया है |’

लेकिन सबसे तीखी प्रतिक्रया ईरान द्वारा दिखाई गयी | उसका कहना था , कि इस फिल्म में ईरान के पक्ष को बिलकुल भी नहीं दिखाया गया है और ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है | ईरान का यह भी मानना है , कि इसे पुरस्कृत करके हालीवुड ने अमेरिकी प्रचार युद्ध को ही पोषित किया है | इस फिल्म को लेकर आपत्तियां और भी हैं , जिसमें तथ्यों के साथ छेड़छाड़ और एकपक्षीय बनाने की बात शामिल है | लेकिन इन आपत्तियों से आगे बढ़कर उन मूल बिन्दुओं की तरफ नजर दौडाना उचित होगा , जिन्हें ध्यान में रखकर हालीवुड ने इस फिल्म को पुरस्कृत किया है | और जाहिर है , कि ऐसा करने के लिए उस समूचे परिदृश्य को समझना आवश्यक हो जाता है |

शीत युद्ध के दौर में गुप्तचर संस्थाओं की मदद से महाशक्तियों ने विभिन्न देशों में तख्तापलट कराया था | 1953 का ईरान हमारे सामने इसी उदाहरण के रूप में है | जब अमेरिकी गुप्तचर संस्था सी.आई.ए. और ब्रिटिश गुप्तचर संस्था एम.आई. 6 ने मिलकर डा. मोहम्मद मुसद्देह की जनता द्वारा चुनी गयी लोकप्रिय सरकार को सत्ताच्युत कर दिया गया था, और अपने पसंद के ‘शाह’ की सरकार को सत्तासीन | डा. मोहम्मद मुसद्देह उन साम्राज्यवादी ताकतों की आँखों में इसलिए खटक रहे थे , क्योंकि उन्होंने अपने देश की तेल संपदा का राष्ट्रीयकरण कर दिया था | उनकी जगह पर जब ‘शाह’ को सत्ता मिली , तो वे उन साम्राज्यवादी शक्तियों की गोद में बैठ गए , जो ईरान को दोनो हाथों से लूट रही थी | लगभग तीन दशकों तक ईरान में अमेरिकी समर्थित ‘शाह’ की सरकार चलती रही | इस दौरान अमेरिकी तेल कंपनियों को ईरान में तेल उत्पादन की खुली छूट मिली गयी थी , और वहाँ के पाकृतिक संसाधनों को दोनों हाथों से लूटा जा रहा था | उधर ईरानी जनता तमाम तरह के कष्टों को झेल रही थी | ‘शाह’ अपने देश में लगातार अलोकप्रिय होते जा रहे थे , और कुल मिलाकर लोगों के बीच यह धारणा बन गयी थी , कि ईरान की इस बदहाली की जिम्मेदारी अमेरिकी हस्तक्षेप और लूट के कारण पैदा हुयी है | 1967 और 1973 के अरब-ईजराईल संघर्ष में भी ईरान इसी वजह से किनारे खड़ा रहा , जबकि वह युद्ध पूरे क्षेत्र में फैला हुआ था | ऐसे में वहां अयातुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी क्रान्ति हो गयी , और ‘शाह’ को देश छोड़कर अमेरिका भागना पड़ा | इसी अफरातफरी और अमेरिका विरोधी माहौल में 4 नव. 1979 को एक इस्लामिक गुट द्वारा अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया गया , और साठ से अधिक लोगों को बंधक भी बना लिया गया था |

आरम्भ में उस इस्लामिक गुट की मंशा एक तात्कालिक मांग और प्रदर्शन तक ही सीमित थी  , और जिसे अयातुल्लाह खुमैनी द्वारा हतोत्साहित भी किया जाता रहा , क्योकि उससे ईरान की पूरी दुनिया में बदनामी हो रही थी | लेकिन जैसे-जैसे समय बीतने लगा , और अमेरिका द्वारा ईरान को अस्थिर करने की कोशिशे की जाने लगी , इस्लामिक नेतृत्व वाली ईरानी सरकार का रवैया भी बदलने लगा | वह उस पूरी घटना को अपनी सरकार को मजबूती प्रदान करने के लिए इस्तेमाल करने लगी , और अमेरिका के सामने कुछ ऐसी मांगे रखी गयी , जिनसे दुनिया भर में ईरान की गिरती हुयी छवि को बचाया जा सके | एक – ‘शाह’ को ईरान को सौंपा जाए | दो – अमेरिका ईरान में हुए 1953 के तख्तापलट के लिए माफ़ी मांगे | और तीन – ईरान की अमेरिका में जब्त और संचित राशि को लौटाया जाए | जाहिर है , कि ये मांगे अयातुल्लाह को सूट करती थी , और इससे अपने देश में उनकी पकड़ मजबूत भी होने लगी थी | एक लम्बी और थका देने वाली वार्ता के परिणामस्वरूप अंततः इन बंधकों को 444 दिनों बाद 20 जन.1981 को रिहा किया गया , जिसकी मध्यस्थता अल्जीरिया ने की थी | बदले में अमेरिका ने ईरान की कुछ संपत्ति को तो लौटाया ही , साथ ही साथ दुनिया को यह आश्वासन भी दिया , कि वह भविष्य में उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा | इस पूरे बंधक संकट में दो बड़ी घटनाएं और हुयी थी | एक - जैसा कि इस फिल्म में दिखाया गया है , कि 6 कर्मचारियों को एक गुप्त अभियान के तहत छुड़ा लिया गया था , जिसमे कनेडियन दूतावास की बड़ी भूमिका थी |  और दो – 24 अप्रैल 1980 को एक दूसरा गुप्त सैन्य-अभियान असफल भी हो गया था , और जिसमें अमेरिका के आठ सैनिक मारे गए थे |

फिल्म को देखने और उसके वास्तविक ऐतिहासिक परिदृश्य को समझ लेने के बाद शायद ‘आस्कर पुरस्कारों’ की इस राजनीति को समझा जा सकता है | पहली बात तो यह कि ‘आर्गो’ उस समूचे परिदृश्य को नहीं पकडती , वरन चयनित तरीके से अपने ख़ास हितों की घटनाओं को पकड़ कर आगे बढ़ती है | दूसरे , वह जिन चयनित घटनाओं को पकडती भी है ,उन्हें भी तोड़-मरोड़कर पेश करती है | और तीसरे यह कि , इसका परिणाम यह होता है , कि उस समूचे परिदृश्य की समझ लगभग उलट सी जाती है | क्योंकि जिस सी.आई.ए. की वजह से ईरान में तख्तापलट होता है , और जिसके सहयोग से एक भ्रष्ट व्यवस्था को तीन दशक तक ईरानी लोगों पर थोपा जाता है , वही सी.आई.ए. इस फिल्म में हीरो की भूमिका में आ जाती है | वहीँ दूसरी तरफ , उन कठिन दिनों को झेलने वाला ईरानी समाज खलनायक बन जाता है | और इन सबसे बढ़कर यह भी , कि इसके द्वारा अमेरिका ने ईरान पर एक तरह का ‘कूटनीतिक हमला’ भी किया है | आज अमेरिका की नजर ईरान पर है , और समूचे खाड़ी-क्षेत्र में वही एक ऐसा देश है , जो अमेरिकी नीतियों को चुनौती देता आया है | संयुक्त राष्ट्र-संघ और यूरोपीय संघ के साथ मिलकर अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंधो के सारे हथियार आजमा लिए हैं | अब इस फिल्म के सहारे सांस्कृतिक मोर्चे पर दुनिया भर में यह भ्रम फैलाया जा रहा है , कि ईरानी लोग असभ्य होते हैं , इसलिए उन्हें सबक सिखाया ही जाना चाहिए , और यह सबक ‘छल, बल और कल’ किसी भी तरीके से सिखाया जा सकता है | हालीवुड फिल्म उद्योग ने इस ‘आस्कर पुरस्कार’ के द्वारा अमेरिकी विदेश नीति के इन्हीं लक्ष्यों को संरक्षित किया है , न कि कला का सम्मान |

अमेरिका का प्रत्येक उद्योग इसी तरह से संचालित होता है , गोया दुनिया की सारी जिम्मेदारी उन्ही के ऊपर आयत होती हो | हालीवुड भी इससे अछूता नहीं है | वहां की फिल्मों में पूरी दुनिया को देखने का चलन बहुत पुराना है | वे इसे अपनी जिम्मेदारी भी मानते हैं | लेकिन जब उस दुनियावी दखल में अमेरिकी भूमिका की बात आती है , तो उनकी फिल्मे मौन साध लेती हैं | और जब कोई फिल्म यह साहस दिखाती है , तो उसे किनारे कर दिया जाता है | ‘आस्कर’ पुरस्कारों के 85 वर्षों की समूची सूची इस बात की गवाही देती है , कि उसने किस तरह से उन फिल्मों को किनारे किया है , जिनमे अमेरिका की दुनियावी दखल का खुलासा होता है | और साथ ही साथ यह भी , कि किस तरह से उन फिल्मों को पुरस्कृत किया गया है , जिन्होंने बदनाम अमेरिकी चेहरे को चमकाने का काम किया है | एक सवाल यहाँ यह खड़ा हो सकता है , कि आप अमेरिकी फिल्म उद्योग से यह अपेक्षा ही क्यों करते हैं , कि वह अपने देशहित को छोड़कर एक निष्पक्ष नजरिये का प्रदर्शन करे | उसका फिल्म उद्योग यदि अपने देश के चेहरे को चमकाता है , तो इसमें गलत क्या है ?  बिलकुल .... इसमें कुछ भी गलत नहीं है |  लेकिन दुनिया भर में यह ‘मोह और भ्रम’ क्यों पाया जाता है , कि ये पुरस्कार श्रेष्ठ फिल्मों को प्रदान किये जाते हैं , और भारत जैसे देशों में टी.वी.चैनलों पर लाइव दिखाकर , तथा समाचार पत्रों में उनकी खबरे पाटकर यह ‘पागलपन’ क्यों दिखाया जाता है ? यह ठीक है , कि अमेरिका में बनने वाली फिल्म अमेरिकी दृष्टि से ही निर्मित होगी , लेकिन यदि वह दृष्टि ‘इतिहास के निरस्तीकरण’ और ‘फिल्म द्वारा पुनर्लेखन’ तक पहुँच जाए , तो उसे बेनकाब किया जाना चाहिए | ऐसे में यह जरूरी है , कि हालीवुड फिल्म उद्योग के इस खेल को न सिर्फ समझा जाए , जो वह ‘आस्कर’ के माध्यम से खेलती आयी है , वरन उसे ख़ारिज भी किया जाए | ‘आर्गो’ नामक फिल्म इसी खेल का हिस्सा है , और इसलिए इसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए |
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रामजी तिवारी
कवितायें, संस्मरण लेख तथा फिल्म समीक्षाएं प्रकाशित
मो.न. 09450546312



   

                         


शुक्रवार, 23 मार्च 2012

अलविदा ‘पाश’ ...तुम सदा हमारे दिलों में हो और रहोगे


आज शहीद ए आज़म भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव के साथ पाश के भी शहादत का दिन है 


  • राम जी तिवारी 


 आज अवतार सिंह संधू उर्फ ‘पाश’ की 24 वीं पुण्य तिथि है | 23 मार्च 1988 को आज ही के दिन इस क्रांतिकारी जन-कवि की आतंकवादियों ने उनके अपने ही गांव में गोली मारकर हत्या कर दी थी | पंजाब के जालंधर जिले में सन 1950 में जन्में ‘पाश’ का जीवन कई मायनों में अनोखा रहा | पहला तो यही कि “साहित्य के जरिये भी आतताईयों के चेहरे पर वार किया जा सकता है और वह वार इतना तिलमिला देने वाला हो सकता है कि वे आपकी जान भी ले लें” | हालाकि अपनी लेखनी के लिए जीवन को कुर्बान करने वाले साहित्यकारों में ‘पाश’ अकेले नहीं हैं , वरन उनमे से एक हैं जो कुछ लोगों के इन शातिराना सवालों का , कि ‘लिखने मात्र से क्या होता है?’ , माकूल उत्तर छोड़ जाते हैं, कि व्यवस्थाओं की गोद में बैठकर तमगे लूटने वालों से इतर भी देखने पढ़ने की कोशिश होनी चाहिए , जहाँ कवि कहता है कि ‘ तुम मुझे एक चाकू दो / मैं अपनी रगें काटकर दिखा सकता हूँ / कि कविता कहाँ है ” |(सर्वेश्वर)|  दूसरा यह कि “जीवन को मापने का तरीका हमेशा से गुड़वत्ता ही हुआ करता है , उसकी मात्रात्मकता नहीं” | ‘पाश’ के 37 वर्षीय जीवन की लम्बाई और सौ – सवा सौ कविताओं की संख्या उन तमाम लोगों के जीवन और पुस्तकों पर इक्कीस बैठती है , जिन्हें आठ-नौ दशकों का भरा-पूरा जीवन नसीब हुआ और जिनकी किताबों की सूचियाँ इस व्यवस्था की विडंबनाओं जितनी ही लंबी हैं |

 एक तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण अनोखापन यह देखा जा सकता है कि न तो ‘पाश’ को न ही उनके चाहने वालों को,  तब या अब,  किसी भी कटघरे में खड़े होकर जबाब देना पड़ा है, या पड़ता है कि इन कविताओं का आशय वह नहीं वरन यह था | न तो उनके पास कोई ‘महामौन’ की ‘गुफा-कन्दरा’ है और न ही शब्दों की ओट में खेली गयी बाजीगरी , वरन वे तो सीधे-सीधे स्वीकार करते हैं कि “ मैं शायरी में क्या समझा जाता हूँ / जैसे किसी उत्तेजित मुजरे में / कोई आवारा कुत्ता आ घुसे |” , ठीक उसी तरह जैसे की आलोक धन्वा स्वीकार करते है कि “मेरा कविता में इस तरह से आना / उन्हें एक अश्लील उत्पाद लगा ” | तो एक तरफ ऐसी स्वीकारोक्तियां साहित्य के प्रचलित  प्रतिमानों के खोखलेपन को दर्शाती हैं और दूसरी तरफ इन ‘इन आवारा कुत्तों’ और  ‘अश्लील उत्पादों’ के साथ आने वालो को मिलने वाली पाठकीय स्वीकारोक्ति नए प्रतिमानों को रचती नजर आती हैं |

                            
हम जानते हैं कि “पाश” की किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी लेकिन सत्ता और उनके खिलाफ लड़ रहे आतंकवादी - दोनों पक्षों – को उनकी क्रांतिकारी कवितायेँ इतनी अखरने लगीं कि उन्होंने “पंजाब के लोर्का” माने जाने वाले इस जनवादी कवि की असमय बलि ले ली | यह कवितायें हीं थीं , जिन्होंने एक तरफ तो उन्हें अवाम में अमर कर दिया, वहीँ दूसरी तरफ 37 वर्ष की अल्पायु में उनकी हत्या का कारण भी बनीं | कहा तो यह भी जाता है कि यह महज एक संयोग था कि “धर्म दीक्षा के लिए विनयपत्र” वालों की ट्रिगर पर तैनात तर्जनी पहले हरकत में आ गयी ,और “बेदखली के लिए विनयपत्र” वालों का माथा कलंक के लगने वाले टीके से साफ़ बच गया |
                
 “पाश” की काव्य-यात्रा 15 वर्ष की उम्र से ही आरम्भ हो गयी थी और 20 वर्ष के होते-होते जब उनका पहला संकलन ‘लौह कथा’ छपा था , तब वे पंजाबी के एक प्रतिष्ठित कवि बन गए थे | पाश के कुल चार कविता संग्रह मूल पंजाबी में प्रकाशित है , और ये हैं “लौह कथा”(1970) , “उडडदे बाँजा मगर”(1974), “साडे समियाँ विच”(1978) और “लड़ान्गे साथी”(1988) | और हिंदी में अनूदित दो संग्रह “बीच का रास्ता नहीं होता” और “समय ओ भाई समय” भी प्रकाशित हुए हैं |  इस प्रतिभाशाली युवक ने उसी अल्पवयस्क उम्र में लिखा था ...
               
              “ भारत –
               मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द 
               जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए 
               बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते है 
               इस शब्द के अर्थ 
               खेतों के उन बेटों में हैं 
               जो आज भी बृक्षों की परछाइयों से 
               वक्त मापते हैं 
               और वह भूख लगने पर
               अपने अंग भी चबा सकते हैं 
               ....................................
               .................................
               कि भारत के अर्थ 
               किसी दुष्यंत से सम्बंधित नहीं 
               वरन खेतों में दायर हैं 
               जहाँ अन्न उगता है 
               जहाँ सेंध लगती है |”
                            
पाश की कविता हमारी क्रांतिकारी काव्य-परंपरा की अत्यंत प्रभावी और सार्थक अभिव्यक्ति है | मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर आधारित व्यवस्था के नाश और एक वर्ग विहीन समाज की स्थापना के लिए जारी जन-संघर्षों में इसकी पक्षधरता स्पष्ट है | नामवर सिंह ठीक ही कहते है कि “ पाश की कविता की यह ताकत है जो अनुवाद में भी इतना असर रखती है | मूल पंजाबी में वह कैसी होगी इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है |” बिलकुल ...जैसे कि यह ---
               
               “हाथ यदि हों तो 
                जोड़ने के लिए ही नहीं होते 
                न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं 
               यह गर्दनें मरोडने के लिए भी होते हैं 
               हाथ यदि हों तो 
               हीर के हाथ से छुरी पकड़ने के लिए ही नहीं होते 
               सैदे की बारात रोकने के लिए भी होते है 
               कैदो की कमर तोड़ने के लिए भी होते हैं
               हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते 
               शोषक के हाथो को तोडने के लिए भी होते हैं |”

(हीर- प्रसिद्द लोक गायिका ),  (सैदे-हीर का अनचाहा पति)  , (कैदो-हीर के प्यार का दुश्मन चाचा ) 

  ‘पाश’ को समझने के लिए किसी खास कविता का चयन करना आवश्यक नहीं है , आप कही से भी उठाकर उन्हें उद्धरित कर सकते है | आपको वही ‘पाश’ मिलेंगे , जिसे आप पढते और समझते आये थे | ध्यान रहे कि यह ‘पाश’ की एकरसता या दोहराव नहीं है , वरन उनकी प्रतिबद्धता और जन-पक्षधरता है , जो आईने की तरह साफ़ और स्पष्ट है और यही स्पष्टता उनकी कविता की विशेषता और बड़ी ताकत है | उनकी कविताओं के संग्रहकर्ता और अनुवादक चमन लाल ठीक ही कहते है कि “ ‘पाश’ हमारे समाज के जिस वस्तुगत यथार्थ को विश्लेषित करना चाहते हैं , उसके लिए वे अपनी भाषा , मुहावरे और बिम्बों-प्रतीकों का चुनाव ठेठ ग्रामीण जीवन से करते हैं | वे तमाम लोग जो अपनी तरह से एक बेहतर मानवीय समाज की आकांशा रखते हैं , बार-बार इन कविताओं में आते हैं |” जिस ट्रेडमार्क कविता ‘सबसे खतरनाक’ के लिए उन्हें याद किया जाता है , ध्यान रहे कि वह उनकी एक अधूरी कविता है | अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यदि यह पुरी हुई होती तो कैसी होती , बल्कि सच तो यह है कि हम और आप यह अंदाजा भी नहीं लगा सकते | न ही हम यह बता सकते हैं कि नाजिम हिकमत , पाब्लो नेरुदा और मुक्तिबोध के कैम्प का यह आदमी किन अनलिखी कविताओं के साथ इस दुनिया से कूच कर गया | वह हमें और किन खतरनाक चीजों से आगाह करना चाहते थे  , मसलन .... 

                मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
                पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती 
                गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती 
                ....................................................................
                ....सबसे खतरनाक होता है 
                मुर्दा शांति से भर जाना 
                न होना तड़प का सब सहन कर जाना 
                घर से निकलकर काम पर 
                और काम से लौटकर घर जाना 
                सबसे खतरनाक होता है 
                हमारे सपनों का मर जाना |

रवि कुमार स्वर्णकार का कविता पोस्टर 
चमन लाल को यहाँ पुनः उद्दृत करना चाहूँगा कि “लोक जीवन से उर्जा ग्रहण करती हुई ‘पाश’ की कविताये प्रतिगामी आस्थाओं और विश्वासों की स्पष्टतः शिनाख्त करती हैं |वे हमें हर उस मोड़ पर सचेत करती हैं , जहाँ प्रतिगामिता के खतरे मौजूद हों और ऐसा करते हुए ये कविताएं प्रत्येक उस आदमी से संवाद बनाये रखती हैं , जो देर-सबेर जनता के पक्ष में खड़ा होगा | यही खूबी ‘पाश’ को एक विलक्षण कवि का दर्जा प्रदान करती है |  समाज की प्रत्येक जकड़नों , प्रतिगामिताओं और यथास्थितियों को खुली चुनौती देते हुए वे स्वतंत्रता , प्रगतिशीलता और वास्तविक जनतंत्र के विकल्प का मार्ग सुझाते हैं | धर्म , व्यवस्था , राजनीति और समाज को लेकर उनकी स्पष्ट राय है | कहीं कोई दुराव नहीं , कहीं कोई छिपाव नहीं | बिलकुल स्पष्ट ....तभी तो “सब कुछ ईश्वर की मर्जी से होता है” , जैसे जुमले को ख़ारिज करते हुए वे सवाल करते हैं कि 

               “रब की यह कैसी रहमत है 
               जो गेंहूँ गोड़ते फटे हाथों 
               और मंडी के तख्तपोश पर बैठे                            
               मांस के उस पिलपिले ढेर पर
                                                                               एक साथ ही होती है |”

‘भारत’, ‘समय कोई कुत्ता नहीं’ , ‘तूफ़ान कभी मात नहीं खाते’ , ‘कांटे का जख्म’  ‘अंत में’ , ‘उड़ते हुए बाजो के पीछे’ , ‘हम लड़ेंगे साथी’ , ‘हमारे समयों में’ , ‘मैं अब विदा लेता हूँ’ , ‘कामरेड से बातचीत’ (पुरी श्रृंखला) , ‘धर्म दीक्षा के लिए विनयपत्र’, ‘बेदखली के लिए विनयपत्र’ और ‘सबसे खतरनाक’ जैसी अनेक कविताओं को पढते हुए पाठक को यह समझाने की जरुरत नहीं होती कि ‘पाश’ की कविताएं किस पक्ष के साथ और किसके खिलाफ खड़ी हैं | जीवन में सबको साधने वाले और कविताओं में मुलायमियत टटोलने वाले लोगों के लिए ऐसी पक्षधरता और स्पष्टता एक ऐसे आईने का कार्य करती है , जिसमे ऐसे लोगों को उनका अपना नंगापन साफ़ साफ़ दिखाई दे सके | ऐसे आदमी ‘पाश’ को यदि सत्ता परेशान करती है , अपनी लेखनी के लिए जेल की सजा भुगतनी पड़ती है , उसके पीछे आतंकवादी पड़ जाते हैं , तो कैसा आश्चर्य ..? आश्चर्य तो यह है कि जिस अंत को “पाश’ ने दस साल पहले भांप लिया था , वह दस साल तक मौन कैसे रहा..?  एक सच्चे क्रांतिकारी की तरह , जो अपना जीवन दूसरों के लिए छोड़ जाता है “पाश” ने गहन संवेदना के साथ लिखा था ---- 

               मैं अब विदा लेता हूँ 
               मेरी दोस्त 
               .......................
               प्यार करना और लड़ सकना 
               जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त , यही होता है 
               धूप की तरह धरती पर खिल जाना 
               और फिर आलिंगन में सिमट जाना 
               बारूद की तरह भड़क उठना 
               और चारों दिशाओं में गूँज जाना 
               जीने का यही सलीका होता है मेरी दोस्त 
               .....................................................
और फिर प्यार में बिताए खूबसूरत क्षणों को जीते हुए कविता के अंत में इस सबको भूलकर सिर्फ यह याद दिलाते हैं , 
               
               तुम यह सभी कुछ भूल जाना मेरी दोस्त ,
               सिवाय इसके 
               कि मुझे जीने की बहुत लोचा (लालसा) थी 
               कि मैं गले तक जिंदगी में डूबना चाहता था 
               मेरे भी हिस्से का जी लेना , मेरी दोस्त 
               मेरे हिस्से का भी जी लेना ....|”
                               
‘पाश’  की इस लंबी कविता को पढते हुए आँखे नम हो जाती हैं और इस दुनिया को जी भरकर कोसने की ईच्छा होती है , जिसमें “पाश” जैसों के जीने के लिए कोई जगह नहीं है |इसे यहाँ फिर दोहराना उचित होगा कि पंजाबी से हिंदी में अनूदित होने के बाद भी उनमे इतनी आग बची है , कि आज भी जन-पक्षधर लोगों को उनसे उर्जा मिलती रहे | “कामरेड से बातचीत” श्रृंखला की कविताओं में “पाश” एक विलक्षण साम्यवादी विचारक के रूप में हमारे सामने आते है और यह अनायास नहीं है कि इस श्रृंखला को उनके रचनात्मक जीवन यात्रा का उत्कर्ष भी माना जाता  हैं |

 23 मार्च 1988 को “पाश” भी अपने जीवन के प्रिय आदर्श , शहीद-ए-आजम के रास्ते पर चले गए | याद हो कि 57 वर्ष पूर्व इसी दिन भगत सिंह भी अपने साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ देश के स्वतंत्रता-आंदोलन की बलिवेदी पर चढ़े थे | यह अदभुत संगम इस तारीख को न सिर्फ अमर बनाता है , वरन चमन लाल के शब्दों में , “हमें यह भी सिखाता है कि राजनीतिक कार्यकर्ता और संस्कृतिकर्मी को मानव-मूल्यों की रक्षा के संघर्ष में अलगाया नहीं जा सकता |”  ‘पाश’ पर लिखते समय लेख के अंत का ख्याल अंदर तक कचोटने वाला होता है | उँगलियाँ की-बोर्ड पर आंसुओं को दर्ज तो करना चाहती हैं , कि तभी “पाश” का यह सन्देश आँखों में चमक उठता है ..........
                   “हम लड़ेंगे साथी जब तक 
                   दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है 
                   जब बन्दूक न हुई , तब तलवार होगी 
                   जब तलवार न हुई , लड़ने की लगन होगी 
                   लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरुरत होगी 
                   और हम लड़ेंगे साथी.......
                   हम लड़ेंगे  
                   कि लड़ने के बगैर कुछ भी नहीं मिलता 
                   हम लड़ेंगे 
                   कि अभी तक लड़े क्यों नहीं 
                   हम लड़ेंगे 
                   अपनी सजा कबूलने के लिए 
                   लड़ते हुए मर जाने वालों 
                   की याद जिन्दा रखने के लिए 
                   हम लड़ेंगे साथी ........हम लड़ेंगे साथी.........

          
अलविदा ‘पाश’ ...तुम सदा हमारे दिलों में हो और रहोगे .......
                                                   
                                                                                                       हम सबका क्रांतिकारी लाल सलाम .....


                                               

             
             
                

         

                                 

मंगलवार, 13 मार्च 2012

आस्कर विजेता फ़िल्में और हमारी दुनिया



  • रामजी तिवारी
स्कर पुरस्कारों की राजनीति और पक्षधरता पर केंद्रित यह महत्वपूर्ण आलेख समयांतर के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुआ है. हम इसे यहाँ साभार प्रकाशित कर रहे हैं. जिस तरह आस्कर को लेकर एक दीवानगी हमारे यहाँ देखी जाती है, यह आलेख कई ज़रूरी मुद्दों को उठाता है और उस पूरी राजनीति का खुलासा करता है जिसमें नोबल और आस्कर जैसे सम्मान अमेरीकी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के उपकरण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं. 




गत 27 फ़रवरी को आस्कर पुरस्कारों की घोषणा की गई और अगले दिन सभी भारतीय अखबार और टी.वी. चैनल इस समाचार को गाते मिले | इसके पूर्व भी भारत में इसकी प्रतिक्रिया व्यापक रूप से महसूस की जाती रही है | जिस फिल्म द आर्टिस्ट को इस वर्ष का आस्कर पुरस्कार दिया गया , उसने दुनिया की प्रत्येक सी.डी. लाइब्रेरी में  वर्षों तक के लिए अपना स्थान पक्का कर लिया | आस्कर पुरस्कारों का ठप्पा लगना इस बात के लिए काफी माना जाता है कि वैश्विक स्तर पर इस फिल्म की मांग भविष्य में भी हमेशा बनी रहेगी | जीतने वाली फिल्मों के अलावा यह बात आस्कर के लिए नामांकित फिल्मों पर भी लागू होती है | अगली बार जब आप सी.डी. लाइब्रेरी में जायेंगे , तो आपको वह दुकानदार उस सी.डी. रैपर के ऊपर लिखा आस्कर नामांकन का सन्देश अवश्य दिखायेगा और आप उसे देखना भी चाहेंगे | वर्ष 2008 में इस पुरस्कार को जीतने वाली फिल्म स्लमडाग करोड़पतिऔर उसमे सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार जीतने वाले ए.आर.रहमान के प्रति हमारा दृष्टिकोण इस बात की पुष्टि करता है | आज इस बात पर कम ही बहस होती है , कि जय होन तो गुलजार का सर्वश्रेष्ठ गीत है और न ही उसमे दिया गया संगीत ए.आर.रहमान की क्षमता की बुलंदी है |रही बात फिल्म की तो उसे भी सिर्फ इसीलिए आलोचनात्मक तरीके से विश्लेषित नहीं किया जाता क्योकि उसने आस्कर पुरस्कार जीता है |अन्यथा आप तो यह जानते ही हैं कि वह फिल्म समाज और जीवन के सामान्य धारा की कहानी नहीं कहती , वरन अपवाद के विजय की दास्तान को महिमामंडित करती है , जिसे पूंजीवादी दौर ने आम-सामान्य लोगों के गिरते पस्त मनोबल को बचाने के लिए एक स्वप्न के रूप में गढ़ा है | वर्तमान व्यवस्था इस भय से कांपती रहती है कि आमसामान्य जन के मन में इस व्यवस्था के प्रति जो आक्रोश और गुस्सा उत्पन्न हुआ है , वह कहीं फूट ना जाये |इसीलिए वह हमें स्वप्न के इस छलावे में रखना जरुरी समझती है कि तुम भी सिंहासन की उस स्वप्निल कतार में  पहुँच सकते हो , बशर्ते कि भाग्य तुम्हारा भी साथ दे |

                           
पूरी दुनिया में आस्कर पुरस्कारों के प्रति मोह और भ्रम पाया जाता है , जबकि हकीकत यह है कि ये पुरस्कार अमेरीकी फिल्म इंडस्ट्री हालीवुडके पुरस्कार  हैं , जिसे एकेडमी आफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एण्ड साइंसेजद्वारा प्रति वर्ष प्रदान किया जाता है | इनका आरम्भ 1929 में किया गया था और इस वर्ष द आर्टिस्ट फिल्म को प्रदान किया जाने वाला यह 84 वां  आस्कर पुरस्कार है | इसमें नामांकन के लिये यह आवश्यक है कि वह फिल्म लॉस-एंजलिस के कैलीफ़ोर्निया शहर में उस वर्ष जनवरी से दिसंबर के मध्य रिलीज हो | मोशन पिक्चर्स अकादमी के सदस्य ही इसकी चयन समिति के सदस्य होते हैं, जिनकी संख्या तो घोषित नहीं है लेकिन अनुमानतः यह 6000 के आसपास है | अभी तक 84 वर्षों के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार जीतने वाली सिर्फ आठ ही फिल्मे ऐसी हैं , जो हालीवुड से बाहर बनी हैं और आश्चर्यजनक तरीके से बाहर के इस देश का नाम ब्रिटेन ही है  | ये पुरस्कार कुल 24 श्रेणियों में प्रदान किये जाते हैं , जिसमे एक श्रेणी विदेशी फिल्मों की भी है | पहले इस श्रेणी में 5 फिल्मों का नामांकन होता था , जिसे आजकल बढाकर 10 कर दिया गया है |विदेशी भाषा के लिए अलग से रखी गई इसी श्रेणी की वजह से दुनिया भर में यह भ्रम गाढ़ा हो जाता है कि इन पुरस्कारों की व्याप्ति वैश्विक है |

                          
 इन सवालों को देखने से पहले हमें फिल्मों के स्वरुप और उद्देश्य को भी देख लेना चाहिए | आखिर इनके बनने और देखे जाने के पीछे कौन सी मानसिकता कार्य करती है |वह कौन सी चीज है जो आपको सिनेमा घरों तक खींच ले जाती है | क्या यह मनोरंजन तक सीमित है ? या फिर इनके बनाने में इस्तेमाल की गई तकनीक का आकर्षण आपको खींचता है  ? वह अभिनय है या पटकथा , गीत है या संगीत जिसे देखने के लिए आपका मन कुलबुलाता है ? दरअसल फिल्मे इन सबके होते हुए कुछ और बातों के लिए भी देखी और बनाई जाती हैं | वे अपने समय और समाज का आख्यान होती हैं | वे आईना होती हैं , जिसमे एक तरफ समाज अपना ऐतिहासिक चेहरा देखता है , तो दूसरी तरफ उस चेहरे को भविष्य में बेहतर बनाने का सपना भी संजोता है | बेशक फिल्मो का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, फिर भी कला और मनोरंजन को साथ रखते हुए इन पर मानव सभ्यता के इतिहास को रचने और जाँचने की जिम्मेदारी तो आयत होती ही है | रचनात्मक विधा के रूप में फिल्मों की भूमिका साहित्य जैसी ही होती है , जिनके ऊपर समाज को विश्लेषित करने के साथ-साथ उसे दिग्दर्शित करने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई मानी जाती है | सो फिल्मों में अपने समय की इबारतों को पढ़ने की ईच्छा रखना बेमानी नहीं है | और जहाँ सर्वश्रेष्ठ फिल्मो की बात हो , तो उनमे इस इबारत को और साफ-साफ पढ़ने की ईच्छा होनी ही चाहिए |

तो इन पुरस्कारों की वैश्विक पहचान और स्वीकृति के आधार पर यदि हम इसकी पड़ताल करते हैं कि इनके 84 वर्षों के इतिहास में हमारे समय और समाज की कोई तस्वीर बनती भी है या नहीं, तो हमें निराशा ही हाथ लगती है |हमारी इस पड़ताल का आधार सर्वश्रेष्ठ फिल्मो की श्रेणी है , जो इन पुरस्कारों की रीढ़ भी मानी जाती है और जिसे समारोह के अंतिम पुरस्कार के रूप में दिया जाता है | इन वर्षों की दुनिया पर जब हम नजर दौड़ते हैं , तो पाते हैं कि 1929 से लेकर 1945 तक के 16 वर्षों को छोड़कर , बाकि समय में इस दुनिया पर अमेरिकी आधिपत्य और प्रभुत्व साफ़-साफ़ दिखाई देता है | जाहिर है कि यदि फिल्मे समय और समाज का आईना होती हैं , तो उनमे भी यह झलक मिलनी ही चाहिए |
                       
 एक ऐसा देश जो अपने आपको दुनिया का लम्बरदार समझता है , जिसके दुनिया भर में प्रत्यक्ष और परोक्ष सैनिक अड्डे हैं , जिसे प्रत्येक घटना को अपने अस्तित्व से जोड़कर देखने की आदत है और जो दुनिया को अपने हिसाब से संचालित करने की अपनी ईच्छा को कभी नहीं छिपाता , उसकी फिल्मो को देखने का आधार भी वैश्विक ही होना चाहिए | हम ऐसी आशा किसी तीसरी दुनिया की फिल्म इंडस्ट्री से नहीं कर सकते क्योकि इन देशो की दुनियावी दखल बेहद सीमित और स्थानीय होती है | अमेरिका की बात आते ही हमारे जेहन में, दुनिया के चौधरी बनने वाली उसकी तस्वीर सामने उभरती है | वह एक ऐसा देश है जो अपने भीतर से अधिक अपने बाहर जीता है और इस बाह्य जीवन के स्पष्ट कारण भी हैं | संपत्ति , सत्ता और ऐश्वर्य के शिखर पर बैठे होने की त्रासदी उसके पैरों में चक्कर बनाती है और वह देश उसे और अधिक  सुरक्षित करने की तलाश में “और-अधिक और-अधिक” बटोरने को ही अपना ध्येय मानने लगता है |
                    
 जाहिर है , ऐसे देश की फिल्मो पर इस बाहरी जीवन का असर स्पष्टतः परिलक्षित होना चाहिए | कहना न होगा कि हालीवुड की फिल्म इंडस्ट्री हमें इस मुद्दे पर निराश भी नहीं करती | उसके निर्माताओं की  जापान से लेकर रूस , चीन , कोरिया , भारत और मध्य-पूर्व होते हुए अफ्रीका ,यूरोप और दक्षिणी अमेरिका को नापने वाली ईच्छा से हम सब परिचित हैं | अब यह बात अलग है कि उसका नायक अनिवार्यतः अमेरिकी ही होता है | यदि हम उस देश के जीवन को आधे-आधे भागो में बाँट दे , और जो तार्किक भी है , तो उस लिहाज से कम से कम 40 पुरस्कृत फिल्मों में उसका यह बाह्य जीवन दिखाई देना चाहिए | आस्कर विजेता फिल्मों की सूची देखने पर यह संख्या कुछ कम जरुर दिखाई देती है , लेकिन इतनी भी कम नहीं कि हम यह पड़ताल ही नहीं कर सकें कि वे फ़िल्में दुनिया को किस नजर से देखती हैं | हाँ....जरुरी नहीं कि उनका विषय राजनीतिक ही हो , लेकिन उनके बहिर्मुखी होने की आशा तो होनी ही चाहिए |
                            
1929 में आरम्भ इन पुरस्कारों को परखने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि उसके बाद की दुनिया की हलचलों और परिवर्तनों की झलक इन फिल्मो में कितनी मिलती है | इनमे उन घटनाओ की ओर विशेष नजर होनी चाहिए , जिनमे अमेरिका मुख्य भागीदार रहा है | फिल्म पुरस्कारों के आरम्भ के बाद की सबसे बड़ी घटना दूसरे विश्व युद्ध का पागलपन और उस समाप्त होते युद्ध पर अमेरिकी परमाणु बम के भौतिक प्रयोग की कोशिश है | लेकिन आस्कर विजेता फिल्मों की सूची  देखने पर आपको यह जानकार हैरानी होती है कि इनमे इस पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मे लगभग गायब हैं और जो तीन फ़िल्में इस युद्ध से कहीं न कहीं जुड़ती हैं , वे भी उन बर्बर और पाशविक कुकृत्यों को दूर से ही छूकर निकल जाती हैं | 1946 की फिल्म “बेस्ट इयर्स आफ आवर लाइफ्स” हो या 1957 की फिल्म “द ब्रिज आन द रिवर क्वाई” , दोनों में से किसी भी फिल्म से युद्ध की तस्वीर साफ़ नहीं होती | तीसरी फिल्म “शिंडलर्स लिस्ट” है , जो रोंगटे खड़ी कर देने वाली विभत्सताओं के मध्य मानवीय मूल्यों के बचे होने को रेखांकित करती हुयी एक अदभुत फिल्म है , लेकिन इसमें अमेरिका कहीं नहीं आता | वहीँ विश्व युद्ध के दो सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव भी इस सूची से गायब ही दिखाई देते हैं |  लेनिनग्राद की हिटलर द्वारा की गई घेरेबंदी , जहाँ से युद्ध निर्णायक मोड़ इख्तियार करता है और हिरोशिमा-नागासाकी पर डाले गए परमाणु बमों की दास्तान , जिनका भविष्य की दुनिया पर आकलित प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योकि यह मानव जाति के अस्तित्व से जुड़ा हुआ सवाल है , के दृश्य किसी भी फिल्म के कैमरे में दर्ज दिखाई नहीं देते हैं |
                                
उसी तरह तीसरी दुनिया की आजादी का संघर्ष भी इस सूची से लगभग नदारद है | यहाँ रिचर्ड एटिनबरो द्वारा निर्देशित फिल्म “गाँधी” यदि पुरस्कृत दिखाई भी देती है , तो इसलिए कि उसमे लगे दाग-धब्बे ब्रिटिश समाज को कलंकित करते हैं , न कि अमेरिकी चेहरे को | इस सूची में दक्षिणी अमेरिका को अपने पंजो में कसने के लिए चली गई अमेरिकी चालें भी सिरे गायब हैं | वहाँ ना तो क्यूबा आता है और ना ही निकारागुआ | इनसे तो यह भी नहीं पता चल पाता कि इस महाद्वीप में पिट्ठू तानाशाहों के माध्यम से हथियारों और मादक द्रव्यों की तस्करी का अमेरिकी खेल कितना भयावह है | पूरे अफ्रीका को कबीलाई झगडो में उलझाकर वहाँ के खनिज उत्पादों को किस प्रकार अपने देश की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया गया है , इसकी हवा तक नहीं लगती | अफ्रीका केंद्रित आस्कर विजेता फिल्म “आउट आफ अफ्रीका” (1985) केन्या की तरफ नजर तो उठाती है , लेकिन इसमें अमेरिका नहीं आता | वहीँ चीन की साम्यवादी क्रांति पर भी आस्कर की नजर बेहद सतही और दूर की है | 1987 की विजेता फिल्म “द लास्ट एम्परर” उस प्रक्रिया को नहीं समझाती , जिसने चीनी क्रांति को जन्म दिया |
                              
अब हम उस सबसे महत्वपूर्ण दौर पर आते हैं , जिसने अमेरिका को अंदर तक मथ दिया था | और वह था “वियतनाम का युद्ध” | इस पर बनी दो फिल्मो 1978 की “डियर हंटर” और 1986 की “प्लाटून” को आस्कर पुरस्कार मिले हैं | “डियर हंटर” वियतनाम युद्ध के अमेरिका पर पड़ने वाले प्रभाव को अमेरिकी समाज के माध्यम से देखती है और वहाँ अगर वियतनाम का मोर्चा आता भी है , तो वह एक ट्रेलर के रूप में गुजर जाता है | उससे हमें उसकी जमीनी हकीकते पता नहीं चल पाती | अलबत्ता “प्लाटून” वियतनाम में चलती हुई फिल्म है , लेकिन यहाँ भी कैमरा अमेरिकी सैनिकों की जिजीविषा और संघर्षो की कहानी पर ही केंद्रित रहता है | वह यह गोल कर जाता है कि शेर और मेमने के इस युद्ध में जब शेर ने इतने घाव खाए थे तब मेमने का क्या हुआ होगा |
                            
आखिर दुनिया वियतनाम युद्ध को किसलिए याद करती है | वह अमेरिकी गुरुर के टूटने और बिखरने का युद्ध है , जो अमेरिका और वियतनाम के साथ-साथ पूरी दुनिया पर भी अपना गहरा असर छोड़ता है | वियतनाम का पडोसी थाईलैंड आज जिस “अन्तर्राष्ट्रीय चकलाघर” के रूप में जाना जाता है , वह अमेरिका के लिए उसी युद्ध में निभायी गई खातिरदारी का परिणाम और उत्पाद है | जब अमेरिकी सेनाओ को मनोरंजन के लिए वेश्याओ की आपूर्ति की गई थी और बदले में उस देश को डालर की चमक में नाथ दिया गया था | आज भी वह देश उसी नथिये में घिसट रहा है | कोई भी आस्कर विजेता फिल्म इस प्रकाश नहीं डालती | “ऐसा क्यों है ..?” के जबाब में एक प्रसिद्द अमेरिकी फिल्म निर्देशक अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं “ यह अमेरिका की दुखती हुई रग है | न तो कोई इस पर फिल्म बनाना चाहता है और न ही देखना |” जाहिर है कि इस स्थिति में पुरस्कृत होने की बात ही बेमानी है |
                               
दरअसल अमेरिका जब भी अपनी चौखट से बाहर निकलता है , वह ‘वियतनाम युद्ध’ जैसे सवालो से अपने आपको घिरा हुआ पाता है | मध्यपूर्व से लेकर अफ्रीका के तानाशाहों तक , इराक से अफगानिस्तान तक , हथियारों की बिक्री से हिरोशिमा के हाहाकार तक और धरती के गर्भ में सुरक्षित तेल भंडारों से अंतरिक्ष की ऊँचाईयों में तार-तार होती ओजोन परत तक , यह देश जहाँ भी देखता है , उसे वियतनाम ही दिखाई देता है | यही दुखती राग उसे इन विषयों पर फिल्म बनाने से रोकती है | वह अपनी खोल में सिमट जाता है और जब कभी कोई निर्माता-निर्देशक इससे बाहर निकलने का साहस दिखाता है , तो आस्कर की निर्णायक मंडली उसे कूड़ेदान में फेंक देती है | ऐसी स्थिति में आस्कर पुरस्कारों की सूची से अमेरिका के इस बाह्य जीवन की अनुपस्थिति स्वाभाविक ही लगती है |
                                
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सोवियत पराभव की दास्तान तक की कहानी शीत युद्ध की तिकडमी चालों की कहानी है | ऐसी चालों की कहानी , जिसमे कौन आपका मित्र है और कौन शत्रु , जान पाना कठिन है | वह जो आपको मदद करने वाला है , आपके पिछवाड़े आग भी सुलगा रहा होता है |दुनिया के क्रूरतम अधिनायकों को इसलिए पोसा और पाला जाता है , कि संतुलन कायम रखना है |आस्कर पुरस्कार विजेता फिल्मे इस सच्चाई को जानती ही नहीं | वो यहाँ भी वही शातिराना चुप्पी अख्तियार करती है |इस सूची में ईरान-इराक संघर्ष के साथ-साथ अरब-इसराइल संघर्ष भी सिरे से नदारद है | ये दोनों युद्ध हांलाकि अमेरिका से दूर और उससे अलग देशों के बीच लड़े गए, लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि अमेरिका यहाँ उतना दूर खड़ा नहीं था , जितना वह इन देशो से भौतिक दूरी पर निवास करता है |
                             
पूरा अरब जगत आज जिन सर्वसत्तावादी अधिनायको को जनविद्रोह के माध्यम से चुनौती दे रहा है , उन अधिनायकों को पोसने-पालने  वाले उसी अमेरिका में निवास करते हैं , जहाँ हालीवुड फिल्म इंडस्ट्री कार्य करती है |सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात , बहरीन , क़तर और कुवैत सरीखे देशों के सुल्तानो और अमीरों का अलोकतांत्रिक शासन वाशिंगटन की मदद और मर्जी से ही चलता है | लोकतंत्र की दुहाई देने वाला अमेरिका इन तानाशाहों और एकाधिकारवादी शासकों में ही अपना हित देखता है |वह यहाँ लोक के तंत्र की कमान संभालने से ही सिहर उठता है, तभी तो   आज जब इन देशों में एक-एक कर सत्ताए घुटने टेक रही हैं , तो उसे सांप सूँघा हुआ है |वह इस विभ्रम का शिकार है कि अब लोकतंत्र की घंटी को कैसे बजाया जाए, कि वह बजती तो दिखे , लेकिन उसकी आवाज उसके कानों तक ना पहुंचे | यह सूची तेली की इस घानी को चुपचाप अनदेखा करती हुई गुजर जाती है , क्योकि वह जानती है कि इसमें आधा तेल और आधा क्रूरता की कहानी है |
                            
 इस सदी के आरम्भ में ही 9/11 की घटना हो जाती है , जिसमे अमेरिका पहली बार आतंकवाद के वृक्ष के उस फल को सीधा चखता है , जिसे उसने शीत युद्ध के दौरान अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बोया था | जिस अफगानिस्तान की पहाड़ियों और पाकिस्तान के पश्चिमी सीमांत प्रान्त की खाईयों में वह “आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक युद्ध” लड़ रहा है ,वहाँ की फसलों को आखिर किसनें बोया है ? फिर आज जब वे खड़ी होकर लहलहाने लगी हैं , तो उसे कँपकपी क्यों छूट रही है ? आस्कर पुरस्कारों की सूची इस संपूर्ण परिदृश्य को भी साफ़ नजरंदाज कर देती है |
                               
 इराक के एक देश के रूप में बर्बाद हो जाने के पीछे भी अमेरिका ही है | जैविक और रासायनिक हथियारों की खोज के नाम पर आज इराक बारूद के ढेर पर बैठा देश बन गया है | आखिर इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ..? लेकिन आस्कर की सूची यहाँ भी वही शातिराना खेल खेलती है , जिसे वियतनाम युद्ध पर वह आजमा चुकी है | 2009 की विजेता फिल्म “हर्ट-लाकर” के सहारे यहाँ भी चुप्पी तो तोड़ी जाती है , लेकिन इस फिल्म को देखकर आप सिर्फ यह जान पाते हैं , कि बम निरोधक दस्ता युद्ध से कराह रहे एक देश में किस प्रकार काम करता है | एक ऐसे देश में , जिसके कदम-कदम पर बारूदी सुरंगों और बिस्फोटकों को बो दिया गया है | अब आप ही बताईये कि क्या इराक युद्ध की कहानी को आप इसी पटकथा के सहारे पकड़ पायेंगे..? क्या आप यह जान पाएंगे कि एक नालायक बेटे ने अपने क्रूर बाप द्वारा आरम्भ किये गए इस युद्ध को अंजाम तक पंहुचाने के नाम पर लाखों लोगों की बलि चढ़ा दी | इराक युद्ध एक देश के साथ-साथ, एक व्यक्ति के अहंकार की तुष्टि की भी घृणित मिसाल है , जिसे ‘हर्ट-लाकर’ फिल्म दूर-दूर तक नहीं जानती |
                                 
आस्कर की इस सूची में कामेडी और ऐतिहासिक फिल्मो की भरमार है |लेकिन यहाँ की कामेडी दूसरे की फिसलनो से उपजी हुए कामेडी है | उनमे यह साहस नहीं है कि वे अपने ऊपर भी हँसे | रही बात ऐतिहासिकता की , तो वह रोमन साम्राज्य से लेकर मध्ययुगीन अन्धकार तक गोते जरुर लगाती है , जिसमे ‘बेन-हर’ , ‘ग्लेडिएटर’ और ‘ब्रेभहार्ट’ जैसी बेहतरीन फिल्मो की उपस्थिति भी है , लेकिन यह सूची अपने समाज की रक्तिम बुनियादों की तरफ नजर उठाकर नहीं देखना चाहती | अपने ही देश के मूल निवासियों के साथ उसने कैसा व्यवहार किया है , विजेता फिल्मों की सूची इस पर पूरी तरह मौन है |
                                  
 यहाँ पिछले दो दशक की फिल्मो पर एक सरसरी निगाह डालना उचित होगा , जिससे यह समझा जा सके कि दुनिया में इस दौरान हुए बदलाओं का आस्कर विजेता फिल्मो पर कितना असर पड़ा है | 1991 की विजेता फिल्म ‘द साइलेंस आफ लैम्ब्स’ अपराध की थ्रिलर फिल्म है |1992  में क्लिंट ईस्टवुड निर्देशित फिल्म ‘अन्फारगिभेन’एक हत्यारे के जीवन पर आधारित है |1993 की फिल्म ‘शिंडलर्स लिस्ट’ है , जिसका जिक्र पहले ही किया जा चुका है | 1994 की विजेता फिल्म फारेस्ट गम्प है , जो बीसवीं सदी की घटनाओं को एक सरसरी निगाह से देखती है | 1995  की ब्रेभहार्ट और 2000 की ग्लेडिएटर ऐतिहासिक फिल्मे हैं, जिसमे अमेरिका कहीं नहीं आता |1996 की विजेता ‘इंग्लिश पेशेंट’ एक रोमांटिक ड्रामा है , जबकि 1997  की टाईटेनिक इसी नाम के समुद्री जहाज के डूबने की पड़ताल करती कहानी पर आधारित है | 1998 की विजेता फिल्म ‘शेक्सपीयर इन लव’ एक रोमांटिक कामेडी है और 1999 की विजेता ‘अमेरिकन ब्यूटी’ अमेरिकी मध्य वर्ग को दिखाती एक सेटायर है | 2001  की ‘ब्यूटीफुल माइंड’ ,2002 की ‘शिकागो’, 2003 की ‘लार्ड आफ द रिंग्स’, 2004  की ‘मिलियन डालर बेबी’, 2005 की ‘क्रैश’, 2006 की ‘डिपार्टेड’, 2007 की ‘नो कंट्री फार ओल्ड मैन’ , 2008 की ‘स्लमडाग करोडपति’, 2009 की ‘हर्ट लाकर’  और 2010 की विजेता फिल्म ‘द किंग्स स्पीच’ में से अधिकतर फिल्मे अमेरिका के भीतर की कुछ पड़ताल तो करती है , वह चाहें उसके अपराध का ही चेहरा क्यों ना हो, लेकिन इसके द्वारा किये गए उन अपराधों पर मौन साध लेती है , जिससे यह दुनिया त्राहि-त्राहि कर रही है |
                             
आस्कर विजेता इन फिल्मों को देखने के बाद आप इस दुनिया और समाज की सामान्य समझ भी विकसित नहीं कर पाएंगे और न ही इनसे आप कोई ऐसी तस्वीर ही बना पाएंगे , जिसे पिछली सदी ने अपने रंगों और खून के छीटों से भरा है | यहाँ आत्ममुग्ध अमेरिका का चेहरा ही दिखता है , जो हमसे यह सवाल करता है कि “आखिर पूरी दुनिया हमसे घृणा क्यों करती है ...?” जबाब जानने से पहले उसका अहंकार सामने आ जाता है और अपने को श्रेष्ठ समझता हुआ वह उठकर चल देता है |
                                
यहाँ एक प्रश्न उठाया जा सकता है कि हम अमेरिकी फिल्म इंडस्ट्री से इस तरह के सिनेमा की उम्मीद ही आखिर क्यों करें ..? वह भी तो एक देश ही है , जिसे अन्यों की भांति अपने भीतर देखने की इजाजत होनी चाहिए | उसकी फ़िल्में दुनिया के झमेलों में अपना सिर क्यों खपाए ..?..बात में दम है , लेकिन क्या अगली बार जब आप सी.डी. लाईब्रेरी में जायेंगे तब अब्बास किआरुस्तामी और कुरुसोवा की , मजीदी और आर्सन वेल्स की , बेला तार और इंगमार बर्गमैन की , अल्मोडोवर और माइकल हैंक की या फिर इल्माज गुने और जोल्टन फाबरी की फिल्मो को देखने की ईच्छा व्यक्त करेंगे..?..क्या आप चाहेंगे विमल राय, सत्यजीत राय , अदूर गोपालकृष्णन और जाहनु बरुवा की फिल्मो को  देखना ..? यदि हां तो मुझे आपसे कुछ नहीं कहना है | और यदि नहीं तो मुझे यह पड़ताल जारी रखनी पड़ेगी |यदि अमेरिका अपने आपको दुनिया का चौधरी और अगुवा समझता है , तो उसकी फिल्मो में भी हमारी इस दुनिया की झलक मिलनी चाहिए | साथ ही साथ उन फिल्मो को पुरस्कृत भी होना चाहिए , जिसमे यह चेहरा साफ़ और स्पष्ट दिखाई देता है |
                               
आस्कर पुरस्कारों को देखकर नोबेल पुरस्कारों की याद आती है और याद आते हैं ‘तालस्तोय’ अपने प्रश्न के साथ कि “एक आदमी को आखिर कितनी जमीन चाहिए ..?” आपको क्या लगता है कि इस दुनिया के आकाश से पाताल तक को अपने कब्जे में करने की ईच्छा रखने वाले इस प्रश्न के उत्तर में उन्हें ‘नोबेल पुरस्कार’ दे देते ..?और तब क्या नोबेल के नहीं मिलने से ‘तालस्तोय’ सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार नहीं रह जाते ..? यही वह मिथक है , जिसे आज तोडने की आवश्यकता है |  आस्कर पुरस्कार उसे नहीं मिलता , जिसमे हमारे समय और समाज का चेहरा दिखाई देता है और न ही आस्कर पुरस्कार जीत जाने से ही कोई फिल्म श्रेष्ठ हो जाती है | हमें इस मिथक से भी निजात पानी होगी कि दुनिया की सारी श्रेष्ठ फ़िल्में हालीवुड इंडस्ट्री में ही बनती हैं |  
                              
यदि आप दुनिया की तस्वीर को फिल्मों के माध्यम से जानना चाहते हैं तो आपको जापान से लेकर अमेरिका तक की यात्रा करनी होगी | इसमें तमाम पड़ाव आयेंगे और आपको वहाँ रूककर उसे देखना और समझना होगा | जाहिर है कि अमेरिका भी इसमें एक पड़ाव होना चाहिए , न कि आपका स्थाई निवास | क्या आप जानते हैं कि एक औसत अमेरिकी दुनिया की फिल्मों के बारे में क्या राय रखता है ..? वह किस ठस अहंकार से उन्हें अनदेखा करता है ..? वह तो तीसरी दुनिया की फिल्मो को , उसके समाज जैसा ही, देखने लायक भी नहीं समझता | और हम हैं कि उसको देखे बिना दुबले हुए जा रहे हैं | यह ठीक है कि उनकी फिल्मे तकनीकी आधार पर बहुत उन्नत होती हैं और उनकी वित्तीय ताकत उन्हें बनाने का एक मजबूत आधार भी प्रदान करती है , लेकिन क्या वित्त और तकनीक के आधार पर ही कोई फिल्म श्रेष्ठ या कमजोर हो सकती है ..? दुनिया के स्तर पर फिल्मों का इतिहास इस प्रश्न का उत्तर ‘नहीं’ में देता है | फिल्मो में कालजयिता , दृष्टि  संवेदना और सरोकार से मिलकर आती है , न कि वित्त और तकनीक के बल पर | इनकी भूमिका उनके सहयोगी जैसी ही हो सकती है , उससे अधिक नहीं |
                                
 हमारे अपने आँगन में सत्यजीत राय, विमल राय ,श्याम बेनेगल, गौतम घोष, अदूर गोपालकृष्णन , जाहनु बरुवा जैसे कई महत्वपूर्ण फिल्मकार मौजूद रहे है , जिनकी फिल्मे दुनिया भर में देखी और सराही जाती हैं | जापान, ईरान, तुर्की, इटली, पुर्तगाल , चीन , फ़्रांस और कोरिया जैसे देशो की फ़िल्में आज दुनिया भर में धरोहर के रूप में देखी-परखी जाती हैं | इनमे वे सारे रंग हैं, जिनसे आपकी फ़िल्मी दुनिया की मुकम्मल तस्वीर बन सके | आप उसमे अपने समय और समाज का चेहरा भी देख पाएंगे और साथ ही साथ यह भी जान सकेंगे कि उसे कैसा होना चाहिए | विश्व सिनेमा के सितारे सिर्फ हालीवुड के आँगन में ही नहीं टिमटिमाते , वरन वे उन खेतों और जंगलों , नदियों और पहाड़ों के ऊपर भी चमकते हैं , जिन्हें आप हासिये के बाहर का मानकर छोड़ आये हैं | आज हालीवुड की स्थिति साहित्य सरीखी हो गई है , जिसमे चर्चा का केंद्र महानगर तो होता है , परन्तु रचनात्मकता का नहीं | वहाँ तो तिकडमों के पीछे अवसाद और सन्नाटा पसरा हुआ है और सृजन के नाम पर सिर्फ फतवे दिए जाते हैं, जबकि सुदूर इलाके लगातार चुपचाप अपना काम करते चले जा रहे हैं |
                            
 इस आँगन से बाहर निकलकर आप सीधे पश्चिम की तरफ ना चल पड़ें , वरन चारो ओर दृष्टिपात करें | दुनिया के सतरंगी फिल्मकार आपको अपनी साधना में लीन मिलेंगे | तो अगले वर्ष के नामांकन और उसकी घोषणा के समय आप आस्कर पुरस्कारों को एक देश की फिल्म इंडस्ट्री के पुरस्कारों के रूप में ही देखें और सर्वश्रेष्ठ सिनेमा को देखने की ईच्छा के मन में आते ही भारत की अन्य भाषाओ से गुजरते हुए दुनिया भर के सिनेमा की गलियों को भी छानें | वह समय आपके सिने शौक के साथ-साथ स्वयं सिनेमा के लिए भी शुभ होगा ....|