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सोमवार, 9 अगस्त 2010

एकजुट होकर ही तोड़ी जा सकती है राय-कालिया गिरोहबंदी ..........उमाशंकर सिंह / रोहित प्रकाश

यह हंस की सालाना गोष्ठी थी जो विश्वरंजन को बुलाए जाने के विचार से उपजे विवाद और पत्रिका की २५ वीं वर्षगांठ के कारण पहले से ही चर्चा में थी। गोष्ठी में 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' पर बोलते हुए कथित धर्मनिरपेक्षता की मलाई खा चुके विभूति नारायण राय ने राज्य की हिंसा का समर्थन किया और कश्मीर की जनता के संघर्ष को इस्लामिक आतंकवाद की संज्ञा दे दी। साहित्यकार मार्का शिष्टता को तजते हुए (जिसे अपनाने की सलाह के विक्रम सिंह दे रहे हैं) वहीं हम सब ने वीएन राय का घेराव किया था। उनका जनविरोधी चेहरा तो उसी दिन सामने आ गया था। अगले दिन उनका नया रूप इंडियन एक्सप्रेस की खबर से सामने आ गया। ज्ञानोदय में प्रकाशित उनके इंटरव्यू को पढ़कर लगा कि सभ्यता का लबादा ओढ़े एक सामंती, दलित और स्त्री विरोधी सवर्ण मर्द ने अपने भीतर के जहर को निर्लज्जता से उगल दिया है। ज्ञानोदय के संपादक रविन्द्र कालिया का इसे छापना स्त्रियों के बारे में उनकी कुंठाजनित मानसिकता को दर्शाता है। पहले भी वे लेखक-लेखिकाओं पर नियमित अंतराल में औपचारिक-अनौपचारिक रूप से अभद्र टिप्पणीयाँ करते रहे हैं। रचनाओं के साथ अश्लील परिचय छापने की तो उन्होंने खास शैली ही विकसित कर ली थी जो कुछ युवा तुर्कों के खासा विरोध के बाद ही बंद हुई। मतलब ये कि इंटरव्यू देने वाला और छापने वाला सब के लिए उन्हीं के शब्दों में स्त्री शील्ड/ट्राफी है। कालिया और वीएन राय दोनों ने अलग-अलग जगह स्त्रियों के लिए इसी लफ्ज का इस्तेमाल किया है। सचमुच मित्रों के विचार कितने मिलते हैं न!
खैर हंस के कार्यक्रम और ज्ञानोदय के साक्षात्कार में वीएन राय द्वारा दिए गए वक्तव्य को लेकर हम काफी गुस्से में थे। एक-दूसरे से फोन पर बात करने के बाद हमने राय-कालिया के खिलाफ अभियान चलाने की योजना बनाई। यहीं से राय-कालिया गठजोड़ के हवाई नहीं ठोस और जमीनी विरोध की हमने शुरुआत की। आनन-फानन में मंगलवार ३ अगस्त को साहित्य अकादमी में एक मीटिंग रखी और लेखकों-पत्रकारों को संदेश भेज दिया। मंगलवार दोपहर को मंत्री सिब्बल ने लेखिकाओं के प्रतिनिधिमंडल को माफी दिलवा देता हूँ के झुनझुने के साथ वापस भेज दिया था। इसके कुछ ही देर बाद वीएन राय राठौरी स्टाइल में माफी मांग चुके थे। कुछ लेखक-पत्रकार साथियों ने पूछा मीटिंग करेंगे? हमने कहा जरूर करेंगे। अगर माफी ही काफी है तो लेखिकाएं उन्हें ५० जूते मारकर उनसे भी मांग लेंगी। खैर मीटिंग हुई। काफी शॉर्ट नोटिस और अप्रत्याशित घटनाक्रम के बीच तकरीबन ५० लेखकों ने इसमें हिस्सा लिया। स्त्री विमर्श के पैरोकार राजेंद्र यादव इस मीटिंग में आए तो थे पर पुरुष के रूप में ही आए थे। उन्होंने 'ठीक है गलती हो गई, जाने दो' वाली लाइन ले ली। जबकि कथाकार संजीव ने उनके सामाजिक बहिष्कार का प्रस्ताव रखा। लेकिन मैत्रेयी पुष्पा अनीता भारतीय, अंजलि सिन्हा आदि लेखिकाएं और मदन कश्यप, बजरंग बिहारी तिवारी, सुभाष गाताडे, रंजीत वर्मा, रामजी यादव आदि ने राय और कालिया के खिलाफ निर्णायक संघर्ष की जोरदार वकालत की। इसी बीच छह अगस्त को ज्ञानपीठ पर प्रदर्शन करने की योजना बनी। ज्ञानपीठ ने प्रदर्शन के डर से छह अगस्त को आकस्मिक छुट्टी घोषित कर दी। इसके बावजूद लेखकों-पत्रकारों ने ज्ञानपीठ के दफ्तर पर विरोध प्रदर्शन किया। संजीव, मैत्रेयी पुष्पा, रेखा अवस्थी, अनीता भारती, बजरंग बिहारी तिवारी, संजीव कुमार, अन्नू आनंद, इरा झा, विमल कुमार, कुमार मुकुल, भाषा सिंह, गीताश्री, पंकज चौधरी, अभिषेक कश्यप, बली सिंह, जितेंद्र कुमार सहित सौ से भी ज्यादा लोग जुटे। शुरुआती ना-नुकर के बावजूद आलोक जैन को भी आना पड़ा और हमारी बातें सुननी पड़ी। हमने रविन्द्र कालिया को हटाने संबंधी निर्णय करने के लिए उन्हें सोमवार तक का वक्त दिया। अगले दिन मैत्रेयी जी ने बताया कि आलोक जैन बहुत डरे-सहमे हुए हैं और उनके घर आकर माफी मांगने की बात कर रहे हैं। लेकिन लेखकों-पत्रकारों और संघर्षशील नौजवानों का यह समूह माफी के पाखंड में नहीं आने वाला है और अकेले मैत्रेयी जी को माफी देने का हक भी नहीं हैं।
हम मानते हैं कि समाज में मौजूद लोकतंत्र और प्रगतिशील मूल्यों की बुनियाद हमारा संघर्ष है। यहां हमारा से सीधा आशय उत्पीडि़त जनता और उनके पक्ष में खड़े होने वालों से है और राय- कालिया के निष्कासन की मांग इस संघर्ष का ही हिस्सा है। कुछ लेखक ऐसा कह रहे हैं कि इन दोनों का निकाला जाना एक प्रतीकात्मक मसला है। हम ये भी मानते हैं कि इतिहास के ऐसे ही प्रतीकों से प्रगतिशीलता और लोकतंत्र की परंपरा और परिपाटी बनी और बढ़ी है। हम जानते हैं कि इस अभियान में शामिल होना कई लेखकों के लिए निजी घाटे का सौदा हो सकता है। क्योंकि यदि वीएन राय अपने पद से हट भी गए तो सत्ता की दलाली और सांठगांठ उन्हें हमारे-आपके जैसे हाशिये पर पड़े हौसले वालों को नुकसान पहुंचाने वाली हैसियत में बनाए ही रखेगी। इसके अलावा कई संघर्ष के सहयात्री, संजीव, गौरनाथ और अल्पना मिश्र की किताबें ज्ञानपीठ से छपी हैं (वे किताबें वापस लेने को तैयार हैं।) इसके अलावा संघर्ष में शरीक हुए लेखकों के हित जुड़े हैं। ज्ञानपीठ पत्रिका और किताबों के प्रकाशन के अलावा वरिष्ठ-युवा लेखकों को समय-समय पर पुरस्कार आदि भी देता ही रहता है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में युवा-वरिष्ठ लेखक  अगर निर्णायक संघर्ष पर उतारू हैं तो साफ है बृहत्तर मानवीय और लेखकीय मूल्यों का जोखिमपूर्ण निर्वाह कर रहे हैं। वरना हमारे सामने मिसाल तो उन लेखक और लेखिकाओं की भी है ही जो निज लाभ-लोभ के लिए उनकी तरफ से हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं या अवसरवादी मौन साध के 'ऊंट किस करवट बैठता है' की बाट जोह रहे हैं। हमारा इस बात में पूरा भरोसा है कि लेखक प्रकाशक को खड़ा करते हैं। उनके निमित्त नही होते। ऐसे वक्त में हमें अपने निम्न बुर्जुआ निजी हितों की तिलांजली दे देनी होगी। लोकतंत्र और प्रगतिशील मूल्यों में आस्था रखने वाले तमाम लेखकों, संगठनों और व्यक्तियों से हमारी अपील है कि इस अभियान में शामिल होकर स्त्री-शोषण की सामंती  शैली के बरक्स स्त्री-सम्मान की प्रगतिशील परंपरा का निर्माण करें। हमें वीएन राय की वर्धा से बेआबरू विदाई, रवींद्र कालिया की ज्ञानपीठ से बर्खास्तगी और इन दोनों के सामाजिक बहिष्कार से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। यही मंगलवार, ३ अगस्त की मीटिंग में पारित प्रस्ताव थे। अब यह लड़ाई कैसे आगे बढ़ाई और जीती जाएगी इस पर विचार करने के लिए हम रविवार ८ अगस्त को कॉफी हाऊस, मोहन सिंह प्लेस में मिले। हमने तय किया कि ज्ञानपीठ को रवीन्द्र कालिया पर कार्रवाई के लिए एक हफ्ते की मोहलत देंगे। अगर इसमें उन्होंने उपयुक्त कार्रवाई नहीं की तो अगले हफ्ते से अपने प्रदर्शन से ज्ञानपीठ का खुलना मुहाल कर देंगे। शुक्रवार १४ अगस्त को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के शास्त्री हाउस स्थित दफ्तर पर प्रदर्शन करेंगे। साक्षात्कार देने वाले, छापने वाले संपादक और प्रकाशक के खिलाफ पीआईएल दायर करने का भी फैसला किया गया। लेखकों से ज्ञानपीठ से लेखक-पाठक हर रूप में संबंध खत्म करने की अशोक वाजपेयी की अपील में कॉफी हाउस की मीटिंग में आए लेखकों-पत्रकारों ने भी अपनी आवाज मिलाई। कॉफी हाउस की बैठक में इस संघर्ष को राय-कालिया के खिलाफ जन संघर्ष समिति का नाम दिया गया। इस लड़ाई को अपने-अपने स्तर पर चला रहे सभी साथियों से गुजारिश है कि इसमें शिरकत करें। राय-कालिया के खिलाफ संघर्ष की अलग-अलग धाराओं को इस मोड़ पर मिलकर एक नदी की शक्ल अख्तियार कर ही लेनी चाहिए।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

माफ़ी काफी नहीं है, बर्खास्तगी ज़रूरी!

गतांक से आगे… 

स्त्री अधिकार संगठन

कुलपति विभूति नारायण राय के वक्तव्य की भर्त्सना

स्त्री अधिकार संगठन ने अपनी आपात बैठक में महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय के ‘नया ज्ञानोदय’ पत्रिका में प्रकाशित उस वक्तव्य की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है जिसमें उन्होंने समूचे स्त्राी समुदाय के बारे में अपमानजनक शब्द कहे थे।

अपने बयान में संगठन ने कहा कि उपरोक्त वक्तव्य श्री राय की घोर पितृसत्तात्मक मानसिकता को उजागर करता है जो शुचिता के अपने मध्ययुगीन मानदण्डों के तहत स्त्राी समुदाय को चूल्हा-चौके के के पुराने दायरों तक सीमित रखना चाहता है। संगठन ने इस बात पर जोर दिया कि चारों तरफ हुई आलोचना के बावजूद जिस अहंकार के साथ श्री राय ने टी वी चैनल पर अपने नारीविरोधी वक्तव्य को उचित ठहराने की केाशिश की उससे यह बात साबित होती है कि ऐसा शख्स विश्वविद्यालय का कुलपति बननेयोग्य नहीं है।

बयान में आगे कहा गया है कि अपनी नौकरी बचाए रखने हेतु जिस तरीके से उन्होंने माफी मांगने की औपचारिकता पूरी की है, वह काफी नहीं है और यह अब जरूरी हो गया है कि उन्हें कुलपति जैसे जिम्मेदारी के पद से तुरन्त मुक्त किया जाए।

बुधवार, 2 जून 2010

महिलायें तो यही सब पढ़ती हैं

औरतों की दुनिया में किताब
· किरण पाण्डेय

कुछ लिखकर कुछ पढ़कर सो
तू जिस जगह सबेरे जागा
उससे आगे बढ़कर सो

भवानी प्रसाद मिश्र


ग्वालियर से बेंगलूर जा रही थी किसी स्टेशन पर गाडी रुकी तो एक पत्रिका वाला सामने से गुजरा। मैने किताबें देखना शुरू किया तो उसने फटाफट गृहशोभा, गृहलक्ष्मी, सहेली फेमिना जैसी किताबें बढ़ाते हुए कहा कि मैडम महिलाओं की सारी किताबें मौज़ूद हैं। मुझे थोड़ा गुस्सा सा आया, मैने कहा, महिलाओं की मैगज़ीन से क्या मतलब? वह थोड़ा हड़बड़ाया फिर बोला, मैडम महिलायें तो यही सब पढ़ती हैं!

इसी तरह हमारे घर में अख़बार वाले ने कहा कि मैडम सर की तो बहुत सी मैगज़ीन आती हैं, आपके लिये भी कुछ दे दिया करुं…वैसे हमारे पास महिलाओं की सारी पत्रिकायें हैं। मुझे आश्चर्य भी हुआ और इन घटनाओं ने मुझे सोचने पर मज़बूर भी किया। मैने पाया कि वाकई मैने अक्सर महिलाओं को इन्हीं पत्रिकाओं को पढ़ते देखा है और जब कोई पुरुष भी किसी महिला के लिये पत्रिका लाता है तो वे इसी तरह की होती हैं। या फिर नयी पीढ़ी के हाथ में चेतन आनन्द जैसों के बाज़ारु उपन्यास। शायद समाज भी औरतों को इन्हीं पत्रिकाओं तक सीमित रखना चाहता है जहां घर-गृहस्थी और ब्यूटी टिप्स ही होती हैं। यह समाज का पुरुष प्रधान ढांचा बनाये रखने में पितृसत्तात्मक शक्तियों के लिये मुफ़ीद भी होता है, इसीलिये अख़बारों में पुरुषों के लिये तो राजनीति, देश-विदेश और समाज होता है वहीं महिलाओं के लिये व्यंजन बनाने की विधि, पति को खुश कैसे करें जैसे आलेख या फिर ब्यूटी टिप्स होती हैं।

जब भी हम महिलाओं के किसी समूह में होते हैं तो उनकी बातचीत का विषय भी अधिकतर साड़ी, गहने, फ़ैशन या किचेन से आगे नहीं बढ़ पाता या फिर एक-दूसरे की खिंचाई और घर-गृहस्थी की उलझने। घरेलु औरतों का तो यह व्यवहार फिर भी समझ आता है लेकिन कामकाजी औरतें भी कुछ ज़्यादा अलग नहीं होतीं। बस नौकरी का रुटीन काम और उसके बाद वही घर-गृहस्ती।

जबकि इसके ठीक विपरीत पुरुषों की प्रिय पत्रिकायें इण्डिया टुडे, आउटलुक, फ्रंटलाईन जैसी पत्रिकायें और समाचार आदि होतें हैं। उनकी सुबह चाय के साथ अख़बार से होती है जो उन्हें बीते हुए कल से और एक कदम आगे ले जाती है।

कहते हैं शिक्षा सबसे मूल्यवान धन है, सबसे करीबी दोस्त और ऐसी पूंजी जिसे कोई आपसे छीन नहीं सकता। जरा सोचिये क्या केवल डिग्री ले लेने से शिक्षा पूरी हो जाती है। नौकरी मिलने के बाद क्या पढ़ने की ज़रूरत ही ख़त्म हो गयी। ऐसा नही है मित्रों, शिक्षा आपके व्यक्तित्व का समग्र विकास करती। वैसे तो आबादी का अधिकतर हिस्सा नौकरी के बाद पढ़ाई को महत्व नहीं देता और इसमें हम औरतों की स्थिति और भी दयनीय है। हम सिर्फ़ चूल्हे-चौके तथा अन्य घरेलु कामों द्वारा कुशल गृहणी का ख़िताब जीतने की कोशिश करते हैं और इससे भी वक़्त मिला तो सुन्दर दिखने की होड़ में जी तोड़ लग जाते हैं।

कितना बुरा लगता है जब थोड़ा बड़ा होते ही बच्चा अपनी समस्याओं के लिये आपको मना कर देता है और कहता है कि, रहने दो आपको नहीं आयेगा पापा से ही पूछ लेता हूं। यदि थोड़ा सा ज़ोर दें तो सच्चाई ख़ुद समझ आयेगी। हमने वाकई पढ़ने का कभी सोचा ही नहीं। यदि अख़बार को हाथ में लिया भी तो लोकल न्यूज़ या फिल्मी गासिप को उलट-पुलट कर परे कर दिया। सम्पादकीय पन्ना तो कभी पढ़ने की कोशिश ही नहीं की, राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों से ख़ुद को हमेशा दूर रखा और यही सोचा कि यह हमारा क्षेत्र नहीं। नतीज़ा यह कि हम समाज से इतना कट जाते हैं कि जब कहीं इन मुद्दों पर बात भी हो तो हम सिर्फ़ मुंह देखते रह जाते हैं और हीन भावना से भरकर यही सोचते हैं कि काश हम भी इस बहस में शामिल हो पाते। वैसे समाज और शिक्षा व्यवस्था का ढांचा भी कुछ ऐसा है जो इन प्रवृतियों कि शुरु से बढ़ावा देता है। इसीलिये तो कक्षा पांच की किताब की तस्वीर में पिता अख़बार पढ़ रहे होते हैं, राजू खेल रहा होता है, मां खाना बना रही होती है और कमला पानी ला रही होती है और ग्रेज़ुएशन में लड़कियों के लिये एक अलग विषय ही होता है- गृह विज्ञान!

इन सबका नतीज़ा यह कि हमें अपने ऊपर आत्मविश्वास ही नहीं हो पाता। हमेशा किसी भी निर्णय के लिये हम परिवार या बाहर के पुरुषों पर ही निर्भर होते हैं। हमारी अपनी स्वतंत्र समझ या राय नहीं बन पाती। इसलिये अपने व्यक्तित्व के विकास के लिये ज़रूरी है कि हम समाज से कट कर नहीं बल्कि इसका हिस्सा बनकर रहें ताकि हम अपने निर्णय आत्मविश्वास के साथ ले सकें।

आज जब समाज में महिलायें हर क्षेत्र में काम कर रही हैं। समानता स्थापित करने के लिये जी तोड़ मेहनत कर रही हैं तो यह ज़रूरी हो जाता है कि हम अपने मानसिक स्तर को भी समृद्ध करें। यह तभी संभव है कि हम अपनी रुचि का विस्तार घर-गृहस्थी से आगे देश, समाज, राजनीति, इतिहास, दर्शन, साहित्य और अन्य उच्चतर क्षेत्रों तक करें जिससे एक तरफ़ हम समाज को पूरी तरह समझ सकें और दूसरी तरफ़ अपनी वर्तमान स्थिति का भी सही आकलन कर सकें।

और मुझे बेहद ख़ुशी तब हुई जब मेरी ही एक सहयात्री एक स्टेशन पर उतरी और जब लौटी तो उसके हाथ में मेन्स्ट्रीम और हिन्दुस्तान टाईम्स के साथ एक ब्लैक काफ़ी थी। दुनिया बदल रही है- रफ़्तार भले धीमी हो। क्या हम इसमे शामिल नहीं होंगे?

शनिवार, 27 मार्च 2010

किस युग में रह रहे हैं हम

समाज में ऐसे विचारों के लिए जगह क्यों है ?

  • अंजलि सिन्हा


खाप पंचायतें लोगों के निजी जीवन को निर्देशित करने के लिए पंचायत और महापंचायत करती हैं और सार्वजनिक रूप से कत्ल का फरमान सुनाती हैं। सोचने का मुद्दा यह है कि ऐसा कर पाने में वे सफल क्यों हो रही हैं ? इन ताकतों और विचारों पर प्रश्न खड़ा करने का वातावरण तैयार करने के बजाय स्थानीय लोग इसे मजबूती प्रदान करने में क्यों लगे हैं ? देखने में आया है कि हजारों की संख्या में एकत्रा होकर दिनभर और कई दिन की मीटिंग करते हैं और फिर फैसला लेेते हैं कि अन्तरजातीय या सगोत्रा विवाह करने पर जान गंवानी पड़ेगी। इतनाही नहीं वे अब अपने फरमानों को लागू करवाने के लिए कानूनी वैधता हासिल करने का भी प्रयास कर रहे हैं। पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आयोजित एक ऐसे ही महापंचायत में घोषणा की गयी है कि वे हाईकोर्ट में अपील दायर करेंगे कि ‘‘हिन्दू विवाह अधिनियम 1956’’ में संशोधन करके सगोत्रा विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया जाए। इन पंचायतों को अपने निरंकुश आदेश को लागू करवाने में किसी कानूनी अड़चन का सामना न करना पड़े इसके लिए वे खाप पंचायतों को कानूनी वैधता के लिए प्रयास कर रहे हैं।

पिछले 13 सितम्बर को शामली में उत्तर भारत के कई राज्यों के विभिन्न खापों के प्रमुखों ने एकत्रा होकर महापंचायत की। इसमें दो अलग अलग खापों के मुखिया हरिकिशन सिंह तथा महेन्द्र सिंह टिकैत ने सुर मिलातेे हुए सगोत्र विवाह करने वाले युगलों के लिए कत्ल का फरमान जारी किया। क्या ऐसे सार्वजनिक बयानों पर हत्या के लिए उकसानेवाली धारायें लगा कर कानूनी कार्रवाई नहीं किया जाना चाहिए ? विभिन्न न्यायालयों ने इन जनविरोधी कार्रवाइयों के खिलाफ फैसला भी दिया है जैसे कि जिन्द जिले के वेदपाल मोर को पंजाब एवम हरियाणा हाईकोर्ट ने सोनिया के साथ उसके विवाह को वैध ठहराते हुए अपनी पत्नी को गांव से लाने का आदेश दिया था। लेकिन कोर्ट के निर्णय को ठेंगा दिखाते हुए गांववालों ने वेदपाल को पीट पीट कर मार डाला जब वह पुलिस को साथ लेकर वहां पहुंचा। जिन युगलों या परिवारों को ये पंचायतें गांव से निकाल देती हैं और कोर्ट उन्हें वापस गांव जाने का हक देता है तथा पंचायतों के व्यवहार के खिलाफ उन पर कार्रवाई के भी आदेश देता है लेकिन गांव में पुरूषप्रधान तथा दबंगई के वातावरण में सबकुछ निष्प्रभावी हो जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि न्याय के पक्षधर तथा जनतांत्रिक आवाजें गांव के अन्दर एकजुट नहीं हो पायी हैं। 8 जुलाई 2006 को भी एक मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ‘‘अक्सर अपनी मर्जी से अन्तरजातीय या अन्तरधर्मीय शादी करनेवालों को मार डालने की ख़बरंे आती हैं। दरअसल यह क्रूर और सामन्ती दिमाग के लोगों द्वारा किया गया ऐसा जघन्य कृत्य है जिसके लिए कठोर दण्ड मिलना चाहिए। ’’ गृहमंत्राी पी चिदम्बरम ने भी अपनी टिप्पणी में कहा कि बिरादरी के नाम पर की जानेवाली हत्याओं को भारतीय कानून में अलग से परिभाषित नहीं किया गया है इसीलिए क्राइम रेकार्ड ब्युरो के आंकड़ों में भी इन हत्याओं को अलग से पहचाना नहीं जाता है और इन्हें पारिवारिक मामला बता कर दबा दिया जाता है।’’ कोर्ट और सरकार की ये प्रतिक्रियाएं सुन कर ऐसा प्रतीत होता है कि इतना बड़ा तंत्र जिसने अपने नागरिकों को न्याय दिलाने तथा सुरक्षा मुहैया कराने की कसमें खायी हैं वह निरीह हो गया है। वह पड़ोसी देशों को अपने हद में रहने के लिए दहाड़ें मारता है और आतंकवादी मंसूबों को धूल में मिला देने का हौसला और ताकत रखने की बात करता है, फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम देने में भी वह सोचता नहीं है तथा अपने हकों के लिए आन्दोलन करनेवालों के खिलाफ अपनी ताकत और संसाधन झोंक देने में भी संकोच नहीं करता है।

इतनी सारी ताकत रखने के बावजूद आखिर क्या वजह है कि वह खाप पंचायतों की जनविरोधी भूमिका तथा अमानवीय क्रूर गतिविधियों पर अंकुश लगाने में असमर्थ दिखता है ! वह यह संकेत नहीं दे पा रहा है कि इस लोकतांत्रिक देश को तालिबानी रंग में नहीं रंग सकते हैं। उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करनी होगी।

मेरे खयाल से जिस तरह हमारे समाज के एक मुखर हिस्से में ऐसी ताकतों या उनकी हरकतों की स्वीकार्यता है, जो उन्हें शेष समाज पर भी अपना दबदबा कायम रखने में सहूलियत प्रदान करती है उसी तरह यह भी देखा जा सकता है कि इन सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों के लिए भी इन खाप पंचायतों के जरिये अपना आधार या दबदबा बनाये रखना आसान जान पड़ता है। हरियाणा में इन दिनों सत्तासीन कांग्रेस पार्टी की चुनावी जीत में खाप पंचायतों की भूमिका को विश्लेषकों ने रेखांकित किया था, जिन दिनों जिन्द या झज्जर में खाप पंचायतों की निरंकुश कार्रवाइयों को लेकर विरोध तीव्र हो रहा था, उन दिनों कांग्रेस के युवा सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने इन्हें ‘सामाजिक परिघटना या सामाजिक परम्परा का हिस्सा’ कह कर मामले को हल्का करने की कोशिश की थी।

सगोत्र विवाह करनेवालों के खिलाफ मौत का फरमान जारी करनेवाले टिकैत जो किसानों के हकों के लिए सरकारो ंसे लड़ते रहते हैं वे नहीं चाहते कि बेटियों को अपनी पिता की सम्पत्ति में बराबर का हक मिले या युवा पीढ़ी अपनी मर्जी से अपने जीवनसाथी का चुनाव करे।

जरूरत है कि ऐसी ताकतों और फरमानों के खिलाफ कानूनी सख्ती के साथ साथ आम स्थानीय लोग भी कमर कसें तथा देश भर की न्यायप्रिय तथा प्रगतिशील ताकतें भी इसमें मदद के लिए आगे आएं।


(अंजलि सिन्हा, ‘स्त्री अधिकार संगठन’ से सम्बद्ध हैं एवम दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती काॅलेज (सांन्ध्य) में कौन्सिलर के पद पर कार्यरत हैं , यह आलेख युवा दख़ल के ताज़े अंक में प्रकाशित)