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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

धर्म: एक वाहियात पोस्ट लाईफ इंश्योरेंस पालिसी


  • शमशाद इलाही अंसारी 

आधुनिक युग में इंसानी जीवन की अवधि ८० बरस से ऊपर है, मुसलमानों की औसत आयु कुछ कम होगी, चलिए किसी मान्य आंकड़े की अनुपस्थिती में अंदाजा ही लगा लेते हैं. कम से कम औसत आयु ६० बरस मान लीजिये. एक अच्छा मुसलमान बन कर अगर दस साल की उम्र से वह पांच वक्त की नमाज पढ़ने लगे तो पचास साल में कोई ३६,५०० घंटे (२ घंटे प्रतिदिन) वह इबादत में लगा देता है. इसमें कुरान की तिलावत और रमजान के दिनों में की जाने वाली विशिष्ट इबादत को जोड़ दे तब कम से कम यह आंकडा ५०,००० घंटो से कम नहीं हो सकता. डेढ़ अरब मुसलमानो में कम से कम आधे (७५ करोड़ ) तो नमाज पढ़ते ही है जिसके परिणामस्वरूप कम से कम १०२ अरब घंटे हर रोज़ मुसलमान एक अनुत्पादक कर्मकांड में व्यर्थ करता है. ७५ करोड़ लोगो में यदि १० प्रतिशत लोगो को प्रोफेशनल मान लिया जाए और उनकी प्रति घंटा उत्पादकता दर मात्र दस डालर भी मान ले तब इस समय की कीमत हर रोज़ करीब डेढ़ अरब डालर बैठती है.
हवाई जहाज निर्माण मौजूदा दुनिया की इंजीनियरिग का सबसे अनूठा और सर्वश्रेष्ठ उत्पाद है जिसे बनाने में करीब दस लाख घंटे लगते है, जाहिर है इसके निर्माण में सैकड़ो लोग रात दिन काम करते हैं तब जा कर एक हवाई जहाज़ बनता है जिसमे श्रम, तकनीक और दिमाग का विलक्षण मिश्रण होता है. इसे सर्वज्ञानी हिन्दू अथवा मुस्लमान क्यों नही बना पाए? इस प्रश्न की  पड़ताल कौन करेगा ? सिर्फ हवाई जहाज़ ही क्यों अपनी कमरे में अपने शरीर पर पहनी और रोज़मर्रा प्रयोग में की जाने वाली कितनी ऐसी चीजे हैं जो इन लोगो ने बनाई हो ? रेडियो, फोन, मोबाईल ,लेपटाप, वातानोकूलित यंत्र, कंप्यूटर, इंजेक्शन, इलाज की आधुनिक मशीने, दवाइयां, खुर्द बीन,चश्मा, टार्च, कपडे, जूते, कागज़ ,कलम कुछ तो हो जिसके निर्माण में- जिसकी इजाद में इन महापंडितों की  कोई भूमिका हो? इन तथाकथित सर्वज्ञानियों को अगर कुत्ते के  काटने से इंसान के मरने का खतरा था तो उसकी वैक्सीन १४०० पहले कुत्ते का बायकाट करते वक्त सूझ जानी चाहिए थी. सूअर के गोश्त को हराम घोषित करना एक आसान काम था बनिस्पत इसके की उसके टेप वार्म को जला डालने वाली हीट का निर्माण करते. शराब को हराम करने वाले सर्व ज्ञानियों  को यह मालूम  नहीं कि उसमे प्रयुक्त अल्कोहोल असंख्य दवाईयों में एक महत्वपूर्ण इकाई है.
  
डेढ़ अरब डालर का ‘समय’ हर रोज़ बेकार करने वाला समाज भला अपने पैरो पर कैसे खडा रह सकता है? जिस समाज को अपने समय और उसकी आर्थिक उत्पादकता का इतना भी इल्म नहीं; वह भविष्य में किसी प्रगति पथ पर अग्रसर होगा, इसकी कल्पना करना भी उचित नहीं. जिन समाजो में वक्त के लिए कोई स्थान न हो उनका गरीब रहना एक ऐतिहासिक शर्त है. समय को साधे बिना पूंजी और  संपदा का न सर्जन संभव है, न उसका  अर्जन. जिन समाजो ने समय को साधा उन्ही समाजो ने प्रगति की और आज वही समाज पूरी दुनिया पर काबिज़ हैं. दुनिया की कोई भी महान खोज, मानव जाति के इतिहास में आज तक किसी मदरसे अथवा धार्मिक इदारे ने नहीं की, क्यों? क्या यह समझाना अभी भी कोई टेहडी खीर है? आखिर धार्मिक कर्म काण्ड में उलझे मनस और समाज को अपनी वर्तमान दिशा-दशा का अहसास कब होगा? जाहिर है निहित स्वार्थ समाज में किसी प्रगतिशील विचार को जन्म लेने की न तो कोई स्थिती बनने देते है और न उसकी कोई गुंजाईश छोड़ते है.

सभी धर्मो ने वतर्मान दशा को यथास्थिति में स्वीकार करने का ही दर्शन दिया है, चतुर धर्माधिकारी को यह मालूम था कि ऐसा करके वह सत्ता के साथ अंतर्विरोध में नहीं जाएगा, लिहाजा वर्तमान को बुरा और गैर मुक्कमिल बना और उसे ऐसा समझा कर एक अलौकिक जगत का निर्माण कर लिया गया. अगर दुनिया अपूर्ण और दोयम दर्जे की  है तब अल्लाह का बनाया हुआ एक दूसरा जगत पूर्ण है. लेकिन उस असाधारण सर्वोच्च जगत को  प्राप्त करने के लिए तुम्हे पूजा पाठ, कर्म काण्ड करने होगे. कभी कब्र का डर तो कभी दोज़ख के अजीबो गरीब डराने वालो किस्सों के जरिये जनता को भरमाया गया. डर सभी धर्मो का वह प्रमुख औजार है जिसके जरिये वह इंसान की वर्तमान  जगत को बदलने वाली ऊर्जा का तिरोहण कर देती है. धर्म की अफीम के नशे में डूबा समाज राजा, सरकार, सत्ता और प्रशासन को पलटने के अपने ऐतिहासिक कार्यक्रम को छोड़ कर अपने परलौकिक जगत के सुखद सपनों में जीने के झंझट में पड जाता है. धर्माधिकारी ने समाज की जुझारू शक्तियों का अराजनीतिकरण करके न केवल समाज के बड़े हिस्से को क्रान्ति करने से रोका बल्कि उसे प्रतिक्रांतिकारी बना दिया. धर्म के नशे में डूबा ज़हन समाज को बदलने वाली हर तहरीक और हर शख्स के मुक़ाबिल खुद ब खुद एक दीवार बन जाता है. ऐसा होना स्वाभाविक है धर्माधिकारी/मुल्लाह को यह इल्म है कि अगर इंसान ने अपनी किस्मत खुद बनाने का हुनर सीख लिया तब उसका सबसे पहला संगठित हमला उनकी धार्मिक सत्ता पर ही होगा.

मौजूदा वैज्ञानिक युग में क्या धार्मिक प्रस्थापनाओ को सच की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए ? जाहिर है आज धर्मो की वकालत करने वाले खासकर इस्लाम की तरह-तरह की किस्मों को प्रोमोट करने वाले देश अथवा समूह  भूखे-नंगे नहीं है. उनके पास विश्वविद्यालय है और दुनिया का  हर जदीद वैज्ञानिक उपकरण भी  मौजूद है, फिर क्या कारण  है कि आज तक उनके धर्म द्वारा रचा गया स्वर्ग अथवा नरक का कोई जियोफिजिकल लोकेशन आज तक मुहैय्या नहीं कराया गया? आज तक किसी कब्र में कैमरा लगा कर मुलकिन नकीर के सवाल जवाब की कोई वीडियो क्यों नहीं बनी? बड़े बड़े अपराधी मरे लेकिन कब्र में तथाकथित अज़ाब का कोई दृश्य (जिसे सिर्फ मुल्लाह पिछले १४०० सालो से बांच रहा है) कि कब्र के दोनों पाट आपस में मिल कर मुर्दे को भींच देते है, पसलियाँ एक हो जाती है आदि आदि  अभी तक साक्षात क्यों नहीं दिखाया गया? क्या यह असंभव है ? इस्लामियत पढ़ने वाले छात्र इन बकवासो को कब तक सुनेंगे? बनिए की दूकान पर १० रूपए की साबुन लेने से पहले सौ सवाल करने वाला दिमाग मुर्दों पर ज़ुल्म करने वाले अल्लाह की दरिन्दगी पर सवाल क्यों नहीं उठाता? क्या कोई मुल्लाह प्रमाण मुहैय्या कराएगा कि पिछले १४०० सालो में किन-किन लोगो को जन्नत मिली और किसे दोज़ख ? जन्नत के जीवन की कोई वीडियो दिखा दो ताकि कुछ तर्क वादियों को तसल्ली हो जाए. ऐसे प्रमाणों से यकीन कीजिये धर्म के झंडाबरदारों को ही फ़ायदा होगा. जाहिर है धर्म ने सवाल करने की हदे तय की है
, वह उस हद को लांघने की इजाजत नही देता जहां धर्म और धर्माधिकारी की  सत्ता को सीधी चुनौती मिलनी शुरू हो जाए. यदि विज्ञान की दृष्टी और उसकी उपलब्ध तकनीको के माध्यम से धर्म पुस्तकों की बातों  को जांचना शुरू कर दिया जाए तब संभवत: धर्म के तमाम अतार्किक और गल्प शास्त्रों पर टिके सिद्धांत खुद ब खुद गिर जायेगे.

वैज्ञानिक चिंतन और तकनीक के बिना आधुनिक मानव समाज ने उन्नति नहीं की, उसके बिना विकास संभव नहीं. कहना न होगा जिन समाजो पर अभी धर्म का काला साया मौजूद है वह भले ही पैसे के बूते वैज्ञानिक उत्पादों को खरीद कर उपयोग कर रहा हो परन्तु उसके मनस  जगत में किसी वैज्ञानिक चिंतन की भोर नहीं हुई. वह भले ही इलाज कराने आधुनिक  अस्पताल में जाए या अमेरिका में स्वास्थ्य लाभ करे, चिंतन के स्तर पर वह अभी १४०० पहले वाले  ऊँट या गधे पर ही बैठा है. जिन उपकरणों के विकास में उसकी कोई भूमिका नहीं वह बस उनका प्रयोग पैसे देकर कर लेता है. आने वाले समय में बदलती पीढी और बदलते वातावरण में निश्चय ही लोग सवाल करना शुरू करेंगे कि यदि तुम सबसे बेहतर थे, हो या होने वाले हो तब इस तमाम वैज्ञानिक युग का निर्माण दूसरो ने क्यों किया? डेढ़ अरब डालर के समय को हर रोज़ बर्बाद करने वाला समाज एक दिन जरुर जागेगा क्योंकि जागना इंसानी फितरत है, जिस दिन जागेगा उस दिन वह सब से हिसाब ले लेगा, उसी दिन वह दुनिया का बदलने की जुस्तजू में लग जाएगा, मुझे लगता है यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, बहुत देर के लिए मुल्लाह की सलामती संभव नही, भले ही उसके पास दर्जनों ‘पोस्ट लाईफ इन्शुरेन्स’ पालिसी हो.     




शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

भगत सिंह पर विनोद मिश्र



भगत सिंह के आलेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' पर यह भूमिका कामरेड विनोद मिश्र ने समकालीन प्रकाशन द्वारा इसी नाम से प्रकाशित पुस्तिका में की है, जो न केवल इस किताब, बल्कि भगत सिंह के वैचारिक विकास को समझने में भी मदद करती है. पूरी पुस्तिका हमने ई-बुक के रूप में तैयार कर दी है, और आप उसे यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

मैं नास्तिक क्यों हूँ - ई बुक 


नौजवानों के क्रांतिकारी मानस के प्रकाश स्तम्भ

मृत्यु के समय भगत सिंह सिर्फ २३ वर्ष के थे. इस छोटे से कार्यकाल में और इतनी कम उम्र में राष्ट्रीय गतिविधियां  संगठित करने के साथ-साथ उन्होंने तमाम विषयों पर इतना कुछ पढ़ा व लिखा कि सोचकर अचम्भा होता है.

क्रूर अँगरेज़ शासकों ने इस प्रखर मस्तिष्क को, जिसकी लोकप्रियता उस समय आसमान छू रही थी, ख़त्म कर देने में ही अपनी खैरियत समझी और इतिहास गवाह है कि गाँधी-इरविन समझौते में जनमत को ठुकराते हुए गाँधी ने भगत सिंह की फाँसी रद्द करवाने को पूर्व शर्त बनाने से इनकार कर दिया.

भगत सिंह की लोकप्रियता गाँधी के नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती बन कर उभर रही थी. अधिकृत कांग्रेस का इतिहास खुद बताता है. इससे भी महत्वपूर्ण बात थी भगत सिंह का क्रांतिकारी से मार्क्सवादी बनने की ओर संक्रमण. अंग्रेजों व् कांग्रेसी नेतृत्व के बीच भगत सिंह की फांसी को लेकर मौन सहमति का यही मूल आधार था.

क्रांतिकारी आतंकवादी धारा, जिस पर आरम्भ में तीव्र हिन्दू धार्मिक भावनाओं का असर था, क्रमशः मार्क्सवाद में परिवर्तित हो गई, भगत सिंह इस संक्रमण के प्रतीक पुरुष थे और उन्हीं के साथ यह धारा भी ख़त्म हो गई.


अराजकतावाद से मार्क्सवाद की ओर

भगत सिंह ने पश्चिम से आने वाले तमाम प्रगतिशील विचारों का गहन अध्ययन किया. भारतीय समाज की तमाम समस्याओं पर, चाहे वह अछूतों के प्रति ब्राह्मणवाद का नजरिया हो, सांप्रदायिकता का रुझान हो या भारतीय संघ का स्वरूप, भगत सिंह ने अपने विचार प्रकट किये थे. शुरूआती दिनों में उन पर अराजकतावादी दर्शन व् उसके सिरमौर बाकुनिन का गहरा असर नज़र आता है, मई १९२८ से ‘किरती’ नामक पंजाबी पत्रिका में भगत सिंह ने अराजकतावाद पर एक लेखमाला शुरू की जो अगस्त तक चलती रही. इसमें धर्म व ईश्वर, राज्य व निजी संपत्ति को दुनिया से पूरी तरह ख़त्म कर देने की अराजकतावादी घोषणाओं से भगत सिंह काफी प्रभावित नज़र आते हैं.

इस दौर में वे धर्म और भगवान को मनुष्य की अज्ञानता, भय व आत्मविश्वास के अभाव की उपज मानते हैं. और बाकुनिन की किताब ‘ईश्वर और राज्य’, जिसमें ईश्वर को जम कर लताड़ा गया है, की काफी प्रशंसा करते हैं. लेकिन ५-६ अक्टूबर १९३० के उनके लेख ‘मैं नास्तिक क्यूं हूँ’ में धर्म और ईश्वर के बारे में उनकी सोच पर मार्क्सवाद की मज़बूत झलक दिखाई देती है.

धर्म को जिन अर्थों में मार्क्स ने ‘जनता की अफीम’ कहा था, उसका सारतत्व हम यहाँ भगत सिंह में पाते हैं. भगत सिंह कहते हैं – “जब मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करने लगे तथा यथार्थवादी बन जाए तो उसे ईश्वरीय श्रद्धा को एक तरफ फेंक देना चाहिए और ऐसे सभी कष्टों, परेशानियों का पौरुष के साथ सामना करना चाहिए जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं”, और भौतिकवादी दर्शन पर इसी अविचल आस्था के साथ वे हँसते-हँसते फाँसी चढ़ जाते हैं.

राजसत्ता के विषय में अराजकतावादियों व साम्यवादियों के बीच मतभेद के सवाल से भगत सिंह अनभिग्य न थे. अराजकतावाद पर अपने लेख में वे इस बात का ज़िक्र करते हैं कि साम्यवाद का अंतिम आदर्श भी राजसत्ता का विलोप है. फिर भी उनकी सहानूभूति हर तरह की राजसत्ता को खारिज़ करने की अराजकतावादी विचारधारा की ओर है. अराजकतावादियों का विचार था कि राजसत्ता की धारणा ख़त्म होने पर ही मनुष्य की मुक्ति का कोई मतलब हो सकता है. बाद के दिनों में भगत सिंह सर्वहारा की प्रभुसत्ता के पक्ष में खड़े होते हैं. निचली अदालत में क्रान्ति के बारे में अपने विचार स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा “क्रान्ति से हमारा अभिप्राय अंततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसको इस प्रकार के घातक खतरों का सामना न करना पड़े और जिसमें सर्वहारा वर्ग की प्रभुसत्ता को मान्यता हो तथा एक विश्व संघ मानव जाति को पूंजीवाद के बंधन से और साम्राज्यवादी युद्धों में उत्पन्न होने वाली बर्बादी से बचा सके.”
निजी सम्पति के विलोप से की अराजकतावादी अवधारणा से मुक्त होकर वे यह भी समझने लगे थे कि सर्वहारा क्रांति और समाजवाद के रास्ते से ही निजी मिल्कियत का विलोप संभव होगा.

असेंबली पर बम फेंकने की प्रेरणा भगत सिंह को वस्तुतः अराजकतावादियों से ही मिली, विश्व भर के अराजकतावादियों का ज़िक्र करते हुए वे लिखते हैं, “इधर यूरोप में भी अंधेर चल रहा था, पुलिस और सरकार के साथ इन अराजकतावादियों का झगड़ा बढ़ गया, अंत में एक दिन कैलेंट नाम के नवयुवक ने असेंबली में बम फेंक दिया – उसने बड़ी बुलंद आवाज़ में स्पष्टीकरण देते हुए कहा, “बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रुरत होती है”. एक वर्ष बाद, ८ अप्रैल १९२९ को भगत सिंह ने इसी घटना की भारत में पुनरावृति की. लेकिन जहाँ कैलेंट के लिए वह सिर्फ प्रतिशोधात्मक कार्यवाही थी, वहीँ भगत सिंह के यह राजनीतिक प्रतिवाद था.         

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

इस नई किताब का स्वागत करें...


जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष गाताड़े की किताब 'गोडसेज चिल्ड्रेन - हिंदुत्वा टेरर इन इंडिया' फेरास से प्रकाशित हुई है. हम सब पिछले दो दशकों से सुभाष को साम्प्रदायिकता और ब्राह्मणवाद के खिलाफ लगातार लिखने और लड़ने वाले लेखक के रूप में जानते हैं. जनपक्ष पर भी उन्होंने लगातार कई मुद्दों पर लिखा है. 

देश में हिन्दुत्ववादी शक्तियों के आतंकी इरादों की झलक ब्राह्मणवादी-कारपोरेट मीडिया की नजरअंदाजी और कई सरकारों की मिली भगत के बावजूद अब सतह से ऊपर दिखने लगी है. सुभाष की यह किताब उसी का एक गहन उत्खनन करती है और बताती है कि किस तरह अपनी शुरुआत से ही आर एस एस समाजसेवा की आड़ में धार्मिक राष्ट्रवाद के नाम पर हिटलर की तर्ज़ पर 'मनु स्मृति' आधारित एक 'हिन्दू राष्ट्र' की स्थापना का प्रयास कर रहा है. अपने समय में गाँधी से लेकर अम्बेडकर तक ने इसकी पहचान की थी. गाँधी के आर एस एस के बारे में विचार यहाँ पढ़े जा सकते हैं.

किताब मात्र २७० रुपये में यहाँ उपलब्ध है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्दी ही इसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध होगा. जनपक्ष की ओर से साथी सुभाष को बधाई और बिरादराना सलाम.

शनिवार, 31 जुलाई 2010

कुरान में औरत

धर्म के दायरे में नारी मुक्ति का सवाल

तैयब हुसैन

जुलैखा जबीं का लेख (समयांतर, अप्रैल 2010 अंक) ‘महिला आरक्षण और पुरुष सत्ता’ के पूर्वार्द्ध से तो मैं सहमत हूं किंतु उत्तरार्द्ध में कई बातें आधी-अधूरी, विवादास्पद और विरोधाभासी हैं। मजहब (धर्म) चाहे कोई भी हो, वह मर्दों की देन है और हंसिया जब भी खींचेगा, अपनी ओर ही खींचेगा। (‘मर्दों ने बनाई जो रस्में, उनको हक का फरमान करा’ -साहिर)। इसलिए कोई मजहबी औरत अगर अपने मजहब के दायरे में मुक्ति या पुरुषों से बराबरी की पड़ताल करती है तो सबसे पहले उसकी दृष्टि सिर्फ इंसान की होनी चाहिए न कि हिंदू-मुसलमान या अन्य धर्मावलंबी नारी की। लेखिका ने तो ‘मैं कोई इस्लाम की जानकार नहीं हूं और न ही इस्लाम बघारने की जुर्रत की जा रही है’ कहकर यह लड़ाई ही कमजोर ढंग से लड़ने की कोशिश की है। यह कुछ वैसी ही बात है, जैसे मुस्लिम नारियों का ‘मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड’ इस्लाम के दायरे में कुछ अधिकार की मांग करता है और पुरुष वर्चस्व वाला मुस्लिम-समाज उसे नक्काड़खाने में तूती की आवाज समझकर उस पर ध्यान ही नहीं देता। यह एक कैदी का जेल के अंदर ही कुछ सुविधाओं की मांग जैसी भी लगती है जिससे मुस्लिम औरतों की बेड़ियां नहीं कटने वाली।

जुलैखा जबीं को समझना चाहिए कि भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति तो दोयम दर्जे की है ही, इनकी दुर्दशा तब और बढ़ जाती है जब ये दलित और मुस्लिम भी हों। बकौल मुक्तिबोध, ‘मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिलते हैं। उसे सामाजिक मुक्ति के व्यापक सवाल से जोड़कर देखना ही पड़ेगा।

औरत की गुलामी का इतिहास अगर मजहबों के परे देखें तो एंगेल्स के ‘परिवार, व्यक्तिगत संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में कहा गया है कि ‘‘पाषाण युग में खेती का अधिकारी पूरा कबीला होता था। हल और फावड़े अविकसित अवस्था में थे। पुरुष को खेती करनी पड़ती थी और औरत बागवानी संभालती थी। श्रम के इस आदिम विभाजन के काल में स्त्री और पुरुष पारस्परिक समानता के आधार पर समाज को संगठित करते थे। वस्तुतः अधिक शारीरिक शक्ति की अपेक्षा वाले काम पुरुष और कम शारीरिक शक्ति वाले काम स्त्रियां करती थीं।

धातुओं के संबंध में जानकारी बढ़ने के साथ विकास की संभावनाएं अधिक व्यापक हुईं। जंगलों को काट-काटकर मैदानों में बदलने के लिए ज्यादा कठिन श्रम की आवश्यकता पड़ने परआदमी ने दूसरों को अपनी ताकत से गुलाम बनाना शुरू कर दिया। व्यक्तिगत संपत्ति के लोभ से पुरुष स्वामित्व की भावना विकसित हुई। वह जमीन का मालिक था, वह गुलामों का मालिक था और अब बना स्त्री का मालिक। यहां से औरत की गुलामी की कहानी शुरू होती है।

जिस स्थिति ने घरेलू काम-काज संभालने के कारण औरत को परिवार में सर्वोच्च सत्ता के सिंहासन पर बैठाया था, वही अब औरत की गुलामी का आधार बन गई। व्यक्तिगत संपत्ति के साथ पितृसत्तात्मक परिवारों का उदय हुआ। इस प्रकार के परिवार में औरत की एक अधीनस्थ स्थिति ही संभव थी।’’

इस्लाम में तो औरत आदम की पसली से बनाई गई है। शैतान के बहकाने पर जन्नत में उसने आदम को वर्जित फल चखने को मजबूर किया और शैतान की बेटी कहलाई। फिर अगर मां (औरत) के कदमों के नीचे जन्नत है तो अल्लाह के बाद औरत को अगर किसी के आगे झुकने की इजाजत होती तो यह दर्जा उसके शौहर का होता, कहकर ‘एक हाथ से (कम) दे तो दूसरे हाथ से (ज्यादा) ले’ जैसी कहावत ही चरितार्थ की गई है। क्या इस अधिकार में गैर बराबरी नहीं है कि मर्द तलाक देता है, औरत तलाक (खुला) मांगती है?

मुझे तो यहां विश्व प्रसिद्ध लेखक बाल्जाक की औरत पर की गई एक टिप्पणी याद आ रही है कि ‘औरतों से नौकरानी की तरह काम लेना चाहिए मगर समझाकर रखना चाहिए कि वह महारानी है।
इस्लाम से पूर्व के धर्मों में भी औरतों के प्रति लगभग ऐसा ही पक्षपातपूर्ण रवैया देखने में आता है।

सिनगाॅग में नारियां गैलरी में अलग बैठती हैं, पुरुषों के साथ नहीं। भारत की तत्काल प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जब इजराइल-यात्रा के क्रम में येरूशलम गईं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि वहां की प्रधानमंत्री (जो उस समय संयोगवश कोई नारी ही थी) नारी होने के नाते उन्हें लेकर बालकनी में बैठीं जबकि वहां का संपूर्ण पुरुष समुदाय मुख्य हाॅल में रहा

स्त्रियों को संघ में शामिल करने में बुद्धदेव तक को आपत्ति थी। वर्द्धमान महावीर को तो स्त्री के शरीर से किसी के निर्वाण (परम मुक्ति) का रास्ता ही नहीं सूझा था

मुस्लिम औरतें भी मस्जिद में नहीं जा सकतीं। भले काबा जा सकती हैं। फिर औरतें खेती हैं, उसे जोतो! लिबास है, पहनो! कुरआन की ही उक्ति है।

मोहतरमा जबीं ढूंढ़ें तो ‘मनुस्मृति’ की तरह उनका पवित्र कुरआन भी कहता मिलेगा कि पुत्र हमेशा पुत्री की तुलना में प्राथमिकता पाता है क्योंकि ‘‘पुरुष स्त्रियों के निगरां और जिम्मेदार हैं, इसलिए कि अल्लाह ने एक दूसरे पर बड़ाई (तरजीह) दी है। …नेक स्त्रियां आज्ञा का पालन करने वाली होती हैं। सरकश स्त्रियों को समझाओ, बिस्तरों पर उन्हें तन्हा छोड़ो और न मानने पर पीटो। यह खुदा की ख्वाहिश है और अल्लाह सबसे उच्च और महान है।’’

और भी कि, ‘पुरुष स्त्रियों का पोषक है।’ ‘ईश्वर प्रदत्त श्रेष्ठ गुणों के कारण पुरुष स्त्रियों से श्रेष्ठ हैं।’ ‘पुरुष का हिस्सा दो स्त्रियों के बराबर है।’
(‘कुरआन मजीद’: अनु. – मुहम्मद फारख खां: प्रकाशक, अलहसनात, दिल्ली,: 1994: क्रम चार अन-निसा, आयत 34: पृष्ठ-80 और 84) तथा (‘हिंदुस्तान के निवासियों का जीवन और उनकी परिस्थितियां’: प्रकाशक-शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, 1969: पृ. 169)

असल में ये उक्तियां समय-समय पर परिस्थितिवश आई हैं, इसलिए स्वभावतः परस्पर विरोधाभासी भी हो गई हैं। कहना नहीं होगा कि जुलैखा जबीं को औरतों के पक्ष में कुरआन के उद्धरण एकांगी हैं, क्योंकि वे सिक्के का एक पहलू ही बयान करते हैं।

चलते-चलते एक दृष्टांत की याद दिलाना प्रासंगिक लगता है। याद होगा कि अक्सर अरबियन सेठ हैदराबाद के होटलों में ठहरकर गरीब मां-बाप की कमसिन लड़कियों से दैन मोहर के रूप में अच्छी रकम देकर एक साथ निकाहनामा और तलाकनामा दोनों के कागज साथ तैयार कराते हैं फिर जब तक चाहते हैं बीवी के रूप में ऐश-व-आराम करते हैं और फिर तलाक देकर चले जाते हैं। यात्रा के क्रम में यह विवाह जायज है। एक बार एक सेठ ने बारह साल की नाबालिग लड़की के साथ यही कारनामा अंजाम दिया था और बलात्कार जैसा मामला बन गया था लेकिन वह सजा नहीं पा सका क्योंकि इस्लाम के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद ने भी अपनी सबसे छोटी बीवी आयसा से तब किया था जब वह मात्र नौ साल की थीं। सेठ की इस ज्यादती पर मुसलमान चुप रहे मगर ‘बाजार’ फिल्म ने इस आक्रोश को कला के स्तर पर वाणी देने की कोशिश की है।

निष्कर्षतः धर्म की भूमिका अपने समय में सार्थक रही होगी लेकिन बदलते समय में स्थिर रहकर उसने वह उपयोगिता खो दी है। फिर मजहब इंसान के लिए बना है, इंसान मजहब के लिए नहीं।

इसलिए नारी-शोषण पर पुनः एंगेल्स का यह कथन महत्वपूर्ण लगता है कि ‘‘जिस समाज में उत्पादक तथा उपभोक्ता इकाई एक ही होगी, उसमें स्त्री-पुरुषों के बीच पराधीनता के संबंध विकसित होने की संभावना नहीं होगी। …स्त्रियों की पराधीनता निजी संपत्ति के विकास तथा आर्थिक वर्गों के उदय से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है और इन दोनों बातों के कारण ही स्त्रियों को सार्वजनिक उत्पादन कार्यों से हटकर घरेलू सेवा में प्रवृत्त होना पड़ा।’’
(‘द आॅरिजन आॅफ द फैमिली, प्राइवेट प्राॅपर्टी एंड द स्टेट’, पृ. 35)।

चीजें वैज्ञानिक और ऐतिहासिक संदर्भ में ही साफ दिखाई देंगी, किसी रंगीन चश्मे की आंख से नहीं।


(समयांतर से साभार)

शुक्रवार, 11 जून 2010

जिंदे को ना पूछे बात...मरे को दूध और भात

पिछले दिनों मेरी कामवाली बाई ने जल्दी जाने की छुट्टी मांगी क्यूंकि उसे बैंक जाना था,मैंने यूँ ही हंस कर पूछ लिया... और पैसे जमा करने है?कहने लगी,..ना..पैसे निकाल कर घर भेजने हैं, दस हज़ार का इन्तजाम और करना है...मैं आश्चर्य में डूब गयी...अभी कुछ ही दिन पहले उसने सात हज़ार रुपये मुझसे गिनवा कर बैंक में जमा किये थे,मुझसे अपना पास बुक भी चेक करवाया था.उसके खाते में पहले से पांच हज़ार की रकम देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी...चलो दिन रात मेहनत करती है...कुछ पैसे तो जमा कर रखे हैं और आज वो सारे पैसे घर भेज रही थी ऊपर से क़र्ज़ लेने को भी तैयार....पता चला उसकी दादी गुजर गयीं हैं और उनके श्राद्ध के लिए पैसे चाहिए...इसके पिता की मृत्यु हो चुकी थी ..और कोई भाई भी नहीं इसलिए माँ को पैसे भेजने की जिम्मेवारी उसकी है.

मुझे श्राद्ध के धार्मिक कृत्यों के बारे में ज्यादा मालूम नहीं. लोगों को भोज खिलाने..दान पुण्य करने से सचमुच उनकी आत्मा को शांति मिलती है या नहीं,पता नहीं. पर इतना जरूर पता है कि धरती पर बचे लोगों की ज़िन्दगी में कई बार घोर अशांति आ जाती है...इन पैसों से वो मेरी बाई कितना कुछ कर सकती थी और कितना कुछ करने का सपना उसने देखा होगा. मैंने उसे कितना समझाया.....माँ को ही अगर ये पैसे देने हैं तो वह इन पैसों से...अपने घर की मरम्मत करवा सकती है,एक गाय खरीद सकती है लेकिन वो मुझे उल्टा समझाने लगी...आपको नहीं मालूम,अगर पूरे गाँव को भोज नहीं खिलाया तो गाँव वाले हमें जात बाहर कर देंगे,हमारा हुक्का पानी बंद कर देंगे...हमारे घर का पानी कोई नहीं पिएगा,हमें किसी शादी ब्याह,जन्मोत्सव में नहीं बुलाएँगे. एक बार तो मैंने खिन्न मन से ये भी कह दिया,क्या फर्क पड़ता है,बस पांच पंडित को खिला दो और माँ को यहीं बुला लो.लेकिन मुझे पता था मेरे लिए कहना आसान है.पर अपनी जड़ों से कटकर कौन रह पाया है? ये लोग इतने कष्ट में यहाँ रहते हैं पर कभी बताना नहीं भूलते, घर में हमारा अपना मकान है,खेती बाड़ी है,..यह बताते हुए इनकी आँखों में जो चमक आ जाती है.उस से कैसे महरूम किया जा सकता है...शायद एक एक पैसे जोड़ते हुए इनकी ज़िन्दगी चली जाए पर मन में ये सपना जरूर पलता रहता है कि बहुत सारे पैसे जमा कर लेंगे फिर गाँव जाकर आराम की ज़िन्दगी बसर करेंगे,इसी सपने के सहारे ये इस महानगर की कड़वी हकीकत रोज झेलते हैं.

लेकिन इन आडम्बरों में अगर ये अपनी पसीने की कमाई ऐसे बहाते रहेंगे तो कैसे जोड़ पायेंगे पैसे?बचपन में गाँव जाना होता था,तो ऐसी बाते सुनने को मिलती थीं. इतने दिनों बाद भी, कहीं कुछ नहीं बदला,वही जन्म जन्मान्तर का क़र्ज़ जिसे दादा लेता है और पोते,परपोते चुकाते रहते हैं...ब्याज चुकाते ही सारी ज़िन्दगी चली जाती है,मूल तो वैसे ही अनछुआ पड़ा रहता है.फिल्मो में कुछ ज्यादा बढा चढा कर दिखाते हैं पर स्थिति सचमुच ज्यादा अलग नहीं..पर इस स्थिति को बदलने का बीडा कौन उठाएगा?ज्यादातर पढ़े लिखे लोग नौकरी की तलाश में शहर का रुख कर लेते हैं और जो एकाध शिक्षित घर होते हैं वे इन गरीबों को क़र्ज़ देने का काम करते हैं.वे तो उन्हें इस से दूर रहने की सलाह देंगे नहीं.कौन इसके विरूद्व अलख जगायेगा ?,ये सचमुच चिंता का विषय है.
बरसों पहले गोदान पढ़ी थी और उसके बरसों पहले वह लिखी गयी थी पर आज भी हर गाँव में ना जाने कितने 'होरी' और कितने 'गोबर' ज़िन्दगी की उसी पुरानी जद्दोजहद
से जूझ रहें हैं.

बाई यह भी बता रही थी कि बहुत सारी चीज़ें दान करनी पड़ेंगी. कहीं सुनी एक कहावत याद आ गयी."जिंदे को ना पूछे बात...मरे को दूध और भात' चाहे फटे चिथडों में ज़िन्दगी गुजरी हो,,टूटी चारपाई भी नसीब ना हो.पर मरने के बाद,नए कपड़े,चारपाई,गद्दे सब दान किये जाते हैं .कुछ बदले हुए रूप में ही सही पर ऐसा संपन्न घरों में भी खूब होता है.बचपन की ही एक घटना है,मेरे पड़ोस में एक वृधा रहती थीं.घर वाले उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं करते थे,खाने पीने,डॉक्टर दवा.सबका ख्याल रखते थे.पर इसके परे भी उन बूढे मन की भी कुछ ख्वाहिशें होती हैं,इससे निरपेक्ष थे. दादी की चप्पल टूट गयी थी,जिसे मोची से मरम्मत करवा दी गयी थी.उसने एक भद्दा सा कला रबर का टुकडा लगा दिया था.दादी को अपने भाई के पोते की शादी में जाना था.कई बार उन्होंने बेटे बहू से कहा,मुझे एक नयी चप्पल ला दो.पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.अक्सर दादी कोने में पड़ी चारपाई पर लेटी रहतीं,हम बच्चे आस पास खेलते रहते थे,ना जाने दादी को कितनी बार खुद से कहते सुना,'लोग हसेंगे कि बेटा माँ का ख्याल नहीं रखता' यहाँ भी उन्हें अपने बेटे की इज्जत की ज्यादा फिकर थी..आखिर उन्हें एक दिन मय साजो समान के शादी में जाते देखा..पैरों में वही टूटी चप्पल थी.काफी दिनों बाद वे बीमार पड़ीं.मैं भी माँ के साथ,उन्हें देखने हॉस्पिटल गयी,देखा बेड के नीचे वही टूटी चप्पल रखी है.दादी गुजर गयीं,बड़ी धूमधाम से उनका श्राद्ध हुआ.पूरा खानदान जुटा,सारे शहर को न्योता था और दान में पलंग,बर्तन,कपडों के साथ थी,एक चमचमाती हुई नयी चप्पल...

किसी शायर की ये पंक्तियाँ याद आती हैं.

"सारा शहर उसके जनाजे में था शरीक
तन्हाइयों के खौफ से, जो शख्स मर गया"

एक तरफ तो ये गरीब, अपनी सारी जमापूंजी खर्च करके,यहाँ तक कि क़र्ज़ लेकर भी सारे कर्मकांड निभाते हैं और दूसरी तरफ ये भी देखा कि लाखो कमाने वाले, साधारण औपचारिकता भी नहीं अपनाते.एक परिचित के पिता की मृत्यु हो गयी थी.जब वे बीमार थे पूरी सोसायटी के लोग उनका हालचाल पूछते रहते थे..पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने एक हवन रखा था.अपने कुछ रिश्तेदारों के अलावा सिर्फ हमें बुलाया था वो भी शायद इसलिए क्यूंकि मैं उन्हें दो बार हॉस्पिटल में देखने गयी थी.एक नौजवान पंडित हवन करवा रहा था.इतने लोगों को नतमस्तक, अपनी बाते सुनते देख शायद वह कुछ ज्यादा ही उत्साह में आ गया.बीच बीच में भजन गाने लगता और सबसे आग्रह करता कि 'एक पंक्ति मैं गाता हूँ,उसे आपलोग भी दुहरायें'.सबलोग तन्मयता से भजन गाते रहें.करीब ३ घंटे तक पूजा चली.फिर पंडित जी ने बोला सबलोग आकर प्रसाद ले लें.मैं बैठी रही,पहले घर वालों को लेना चाहिए.कुछ देर बाद पतिदेव ने इशारा किया...चलते हैं.हमने पति-पत्नी दोनों को दिलासा के दो शब्द कहे और इजाज़त मांगी...दोनों ने सर हिलाया.हाँ ठीक है.ये लोग मुंबई के नहीं हैं,इनके सारे नाते-रिश्तेदार अभी भी गाँव में ही हैं.पर यहाँ आकर,ये इतने बदल गए हैं.कैसी विडंबना है,कहीं तो कोई इसलिए परेशान है कि कोई मेरे घर का पानी नहीं पिएगा,और कहीं किसी को इतनी भी परवाह नहीं कि एक ग्लास पानी ही पूछ लें.

गुरुवार, 18 मार्च 2010

बाबा रामदेव, आप ही क्या तीर मार लेंगे?

भारतीय राजनीति में लोग उथल-पुथल की संभावना तलाशने में जुट गए हैं। उसकी वजह बने हैं योग गुरु बाबा रामदेव। कल को कुछ लोग उनमें लोकनायक जयप्रकाश नारायण की छवि भी देख सकते हैं। योग गुरु बाबा रामदेव ने अपनी पार्टी बनाने और राजनीति में कूदने की घोषणा की है।
रामदेव की इस घोषणा के बाद देशभर में बहस शुरू हो चुकी है। रामदेव ने अभी कुछ साल पहले ही योग को भारत में इस कदर लोकप्रिय बनाया कि वह फिल्म स्टारों और क्रिकेट खिलाड़ियों से भी बड़ा दर्जा पा गए। मीडिया ने भी उनकी छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस वक्त बाबा रामदेव कई अरब रुपये की संपत्ति के मालिक हैं। उन्होंने आस्था अध्यात्मिक चैनल भी खरीद लिया है और कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री उन पर मेहरबान हैं। तमाम राज्यों में उन्हें कौड़ियों के दाम जमीन सरकारें दे रही हैं।
बाबा के खिलाफ किसी मीडिया में खबर छापने या सवाल खड़ा करने की जुर्रत नहीं है लेकिन रामदेव ने अब जब राजनीति की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं तो जाहिर है कि उनके हर एक्शन और हर बात पर लोगों की नजर रहेगी।
इस योग गुरु से जब तक मैं नहीं मिला था तब तक मेरे मन में भी उनके लिए बहुत आदर था लेकिन जैसे ही मैंने उनके बारे में जानना शुरू किया तो मुझे उनमें और देश के बाकी बाबाओं या उलेमाओं में रत्तीभर फर्क नहीं आय़ा। अगर आप उनके पिछले चार साल के बयानों को ही निकालकर पढ़ लें तो उनमें और एक नेता में कोई फर्क आपको महसूस नहीं होगा। बहरहाल, उस पर अभी चर्चा नहीं। पहले बात उनकी जीवन शैली पर की जाए।
मेरे साथ पढ़े कई मित्र बहुत पैसे वाले हैं और इस समय उनका काफी बड़ा कारोबार है। सच कहें तो वे पूंजीपतियों की जमात में शामिल हैं। उनमें से कई सारे बाबा रामदेव के भक्त हैं। इसलिए बाबा को मैंने थोड़ा नजदीक से जानने की कोशिश की।
बाबा हर दिन दौरे पर रहते हैं। ज्यादातर ऐसा होता है कि वे किसी राज्य के सरकारी हवाई जहाज या किसी उद्योगपति के प्लेन से यात्रा करते हैं। चार दिन पहले रामदेव शिमला में थे। वहां उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और उनकी बगल में हिमाचल प्रदेश के सीएम प्रेमकुमार धूमल बैठे थे। धूमल वैसे तो उद्योगपति हैं लेकिन बीजेपी के बड़े नेताओं में शुमार किए जाते हैं। जालंधर और कुछ अन्य शहरों में उनके परिवार की फैक्ट्रियां हैं। यहां मैने परिवार शब्द इसलिए कहा कि वह इस आरोप का खंडन कर चुके हैं कि यह फैक्ट्रियां उनके नाम से नहीं हैं। बहरहाल, उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में रामदेव को कई एकड़ जमीन देने की घोषणा धूमल ने की। यह जमीन सोलन में है और इसकी कीमत करोड़ों में है।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनका पूरा परिवार रामदेव का अनन्य भक्त है। पिछले दिनों उन्हें मध्य प्रदेश में जमीन देने के फैसले से बीजेपी के ही कुछ विधायक नाराज हो गए। लेकिन चौहान ने विधायकों की नाराजगी की जरा भी परवाह नहीं की। मध्य प्रदेश में उनके कार्यक्रम में जिस तरह स्टेट मशीनरी जुटती है, उस पर कई बार उंगलियां उठ जाती हैं।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बीजेपी के ही मुख्यमंत्री उनके चेले चपाटे हैं, बल्कि कई कांग्रेसी सीएम भी उनकी हाजरी बचाते हैं। हरियाणा, राजस्थान के सीएम इसी लिस्ट में हैं।
अब बात करते हैं बाबा के अनुयायियों की। जिस शहर में रामदेव का कार्यक्रम होता है, उसके आयोजन में वहां के पैसे वालों की ही भूमिका होती है। सुबह-सुबह लगने वाले योग शिविर में सबसे आगे कौन सेठ या सेठानी योगा सीखने के लिए बैठेगी, उसका फैसला भी यही चंद लोग करते हैं। अगर गलती से कोई आम आदमी पहुंच गया तो उसे जगह मिलेगी ही नहीं या फिर किसी अंतिम पंक्ति में।
उस शहर में अब सीएम या किसी नेता का सेठों द्वारा बुलाना बीते जमाने का स्टेटस सिंबल बन गया है। अब अगर उसके घर रामदेव आ गए तो समझिए की पूरी सरकार ही आ गई। बाबा रामदेव ने वहां जितना समय दिया, उसी हिसाब से उस सेठ का कद भी घटना-बढ़ता रहता है। अब तो कई शहरों में रामदेव को बुलाने को लेकर राजनीति होती है। जिसे उन्होंने समय दे दिया, वह यह मानता है कि उसने धार्मिक रूप से कुछ कमाई कर ली है। ऐसे तमाम लोगों के घरों में भगवान की बड़ी तस्वीरों के बजाय बाबा रामदेव की तस्वीर लटक गई है। ऐसे विशालकाय घरों में ड्राइंगरूप में आपको बाबा तस्वीर के रूप में विराजमान मिल जाएंगे। दरअसल, बीच में शिऱडी वाले साईं बाबा की तस्वीरें लटकनी शुरू हो गई थीं लेकिन अब रामदेव उनके प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे हैं। बाजी रामदेव ही मार रहे हैं।
शहर दर शहर होने वाले ऐसे आयोजनों में आम आदमी कहीं नहीं होता। नेता, अफसर और सेठों के समुदाय का पूरा कुनबा उनमें मौजूद होता है। लेकिन बाबा प्रसन्न हैं। मीडिया कवरेज और ऐसे लोगों की वाहवाही से उन्हें लग रहा है कि पूरा भारत उनके साथ है और जिस दिन उनके लोग चुनाव लड़ने मैदान में उतरेंगे, वह सारे राजनीतिक दिग्गजों को धूल चटा देंगे।
पर, बाबा रामदेव शायद कहीं चूक कर रहे हैं। हो सकता है कि भारत का तथाकथित मध्यम वर्ग उन्हें अपना नेता या स्टार मान रहा हो लेकिन देश के जिस किसान-मजदूर को दो वक्त की रोटी कड़ी मेहनत के बाद मिलती है और जिसके पास योगा करने की फुर्सत नहीं है, वह शायद ही रामदेव की भावी पार्टी को सपोर्ट करे। बाबा के बयान और हावभाव यही बता रहे हैं कि वह बीजेपी के काफी नजदीक हैं। हो सकता है कि कल को वह बीजेपी से गठबंधन कर लें या फिर पार्टी बनाकर उनमें अपना विलय कर लें और भारी संख्या में टिकट मांग लें। बहरहाल, मेरी एक बात मेरे पाठक याद रखें कि बाबा या तो बीजेपी को सपोर्ट करेंगे या फिर उससे गठबंधन करेंगे।
अब उनके बयान पर आते हैं। बाबा रामदेव ने राजनीतिक पार्टी या अभियान की घोषणा करते हुए कहा है कि वह कई सारे संगीन जुर्म करने वाले (जिसमें आतंकवाद भी शामिल है), दहेज मांगने वालों, बलात्कारियों, नशे का व्यापार करने वालों के लिए मृत्युदंड कानून बनवाएंगे। सुनने में तो यह बात बहुत अच्छी लगती है लेकिन बाबा ऐसा कर नहीं पाएंगे। अगर यहां हम लोग दहेज मांगने वालों की बात करें तो अभी बाबा जिन सेठों के यहां मेहमान बनते हैं या उनके यहां विभिन्न कार्यक्रमों में जाते हैं, वहां वह क्यों दहेज का आदान-प्रदान होते हुए देखते हैं। वह इतनी तड़क-भड़क वाली शादियों में क्यों जाते हैं, क्यों नहीं उसका बहिष्कार करते। अगर उनमें हिम्मत हो तो घोषणा करें कि वह ऐसे लोगों के समुदाय से मतलब नहीं रखेंगे जो दहेज लेता-देता है या शादी में बेपनाह पैसा खर्च करता है। बाबा ऐसी घोषणा की हिम्मत शायद ही जुटा पाएं।
अभी तक तो ऐसे जुर्मों की सजा सिर्फ अरब में ही सुनी जाती है और जहां के कानून को बीजेपी के सरपरस्त मुल्क अमेरिका वाले बर्बर कानून मानते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं बाबा रामदेव भारत को बर्बर कानून वाला देश बनाने का सपना देख रहे हों। अब उनकी जो भी मंशा हो लेकिन बाबा साहब आंबेडकर के लिखे संविधान को अगर वह बदलना चाहते हैं तो वह उनकी मर्जी है। कोई किसी को कैसे रोक सकता है।
बाबा ने राजनीतिक घोषणा करते हुए एक बात और भी कही है कि इन दिनों बाबाओं को जानबूझकर साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। हालांकि उन्होंने किसी एक बाबा का नाम नहीं लिया। लेकिन इधर तीन बाबा चर्चा में हैं। संत आसाराम बापू (स्वयंभू बापू) के गुजरात स्थित आश्रम में रेड पड़ रही है, वह अब गुजरात जाना नहीं चाहते। उनके आश्रम में बच्चों की लाशें मिलने के बाद केस दर्ज किया गया है।
संत कृपालु महाराज के आश्रम में भगदड़ मचने के दौरान कई बच्चे और महिलाएं मारे गए। उस घटना के बाद बाबा वहां से फरार हो गए। पुलिस ने उस केस में आगे क्या किया, किसी को नहीं मालूम।
एक बाबा दिल्ली में पकड़े गए हैं, जिनके नाम के आगे इच्छाधारी लगा हुआ है। इस बाबा को सेक्स रैकेट चलाने के जुर्म में पकड़ा गया है। पुलिस ने उसके ठिकानों से बरामद डायरियों को कोर्ट में पेश किया है जिसमें सैकड़ों ग्राहकों और लड़कियों के पते और टेलीफोन मिले हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि बाबा ने देशभर में कई करोड़ की संपत्ति बना रखी है।
इनमें से किस बाबा के प्रति बाबा रामदेव का स्नेह जागा है, यह उन्होंने साफ नहीं किया। लेकिन जो बात साफ किया है, वह यह कि उनकी पार्टी का राज आने के बाद बाबाओं की पौ बारह हो जाएगी।


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