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मंगलवार, 9 सितंबर 2014

फ़लस्तीन-इजराइल संघर्ष – इतिहास की क़ैद में फंसा भविष्य

 मेरा यह लेख आग़ाज़ के ताज़ा अंक में प्रकाशित है. 


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इन दिनों फिर एक बार फलस्तीन और इजराइल के बीच संघर्ष तेज़ हो गया है. यों तो यह संघर्ष लगभग अनवरत चलता ही रहता है और गाजा में बम विस्फोट तथा हिंसा अब जैसे रोजमर्रा की चीज़ हो गयी है. दस हज़ार वर्गमील का यह छोटा सा इलाका पूरी दुनिया में आज यह शायद सबसे अधिक अशांत इलाकों में से है, जिसकी घटनाओं का प्रभाव न केवल मध्य पूर्व बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ता है. दुनिया भर में इसे लेकर बहस मुबाहिसे हैं और अपनी पक्षधरता को लेकर दुनिया दो हिस्सों में बंटी है. जहाँ अमेरिका पूरी मज़बूती से इजराइल के साथ खड़ा है और उसे हर तरह की सहायता मुहैया कराता रहा है, वहीँ भारत जैसे तमाम देश परम्परागत रूप से फलस्तीन के साथ रहे हैं. हाल के वर्षों में भारतीय राजनीतिक वर्ग का झुकाव इजराइल की ओर बढा है लेकिन परम्परागत नीति का ही दबाव था कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव पर भारत ने हाल ही में इजराइल के खिलाफ़ वोट दिया. इस लेख में हमारी कोशिश फलस्तीन-इजराइल संघर्ष के इतिहास पर नज़र डालते हुए इसकी जड़ों की तलाश करना और इस मानवीय आपदा के लिए जिम्मेदार लोगों और नीतियों को चिन्हित करना है.

दखल विचार मंच की मासिक पत्रिका 
इस विवाद का इतिहास थोड़ा पुराना है. उन्नीसवीं सदी के अंत में जब ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त था तभी जियोनिस्ट विचारधारा के यहूदी लोगों ने बाइबिल में अब्राहम और उनके वारिसों के वादे के तथा इतिहास के उस तथ्य के आधार पर कि यह एक इजराइली राज्य था जिसे रोमन शासकों ने जीत लिया था, फलस्तीन में अपने लिए एक स्वतन्त्र यहूदी देश होने की बात की और योरप से वहां पहुंचना शुरू किया. वैसे तो इतिहास की भूलों को सुधारने वाला यह तर्क ही बेकार है लेकिन अगर एक बार इसे मान भी लें तो हिब्रू साम्राज्य ने खुद वह क्षेत्र कैनानाइट सभ्यता से 1100 ईसापूर्व में जीता था और जिस जगह आज का इजराइल है वहां बमुश्किल 73 वर्षों तक ही हिब्रू शासन रह पाया था. जियोनिज्म यहूदियों के थोड़े से हिस्से में प्रभाव रखने वाली  एक अतिवादी राजनीतिक विचारधारा थी जिसका जनक थियोडोर हर्ज्ल को माना जाता है जिन्होंने 1896 में लिखी अपनी किताब डेर ज्यूडेन्स्टाट में एक स्वतन्त्र यहूदी राष्ट्र के निर्माण की प्रस्तावना दी थी. यह विचारधारा योरप में उन दिनों प्रचलित एंटी सेमिटिज्म की उस नस्ली विचारधारा की प्रतिक्रिया में जन्मी थी, जिसका अर्थ था यहूदियों से गहरी घृणा. योरप में प्रचलित इस घृणा का चरम हिटलर द्वारा यहूदियों की बेरहम हत्या थी. खैर, जब जियोनिस्टो के पहले दस्ते प्रवासियों के रूप में फलस्तीन पहुँचा तो पिछले 1200 सालों से फलस्तीन एक शांतिपूर्ण बहुधार्मिक देश था. यहाँ की आबादी में 86 प्रतिशत मुसलमान, 10 प्रतिशत इसाई और 4 प्रतिशत यहूदी थे जो मिलजुल कर रहते थे. शुरू शुरू में ये प्रवासी भी उनमें घुल मिल गए और कोई बड़ी दिक्कत पेश नहीं आई. लेकिन जैसे जैसे इनकी संख्या बढ़ी और इनके इरादे साफ़ हुए, तनाव बढ़ने लगा. खासतौर पर हिटलर द्वारा की गयी नृशंस हत्याओं के बाद फलस्तीन आने वाले यहूदियों की संख्या में अचानक बढ़ोत्तरी हुई. इस जियोनिस्ट आबादी का शुरू से इकलौता ध्येय फलस्तीनियों को पूरी तरह से ख़त्म कर वहां एक यहूदी राष्ट्र का निर्माण था. ज्यूइश नेशनल फंड के नाम से जो ज़मीनें खरीदी गयीं उनके साथ यह नियम लागू किया गया कि उन ज़मीनों को कोई यहूदी फिर से अरब नागरिकों को बेच नहीं सकता था, न ही किराए पर दे सकता था. इन जियोनिस्ट लोगों का स्थानीय अरब आबादी के प्रति व्यवहार कितना क्रूर और अमानवीय था इसका एक उदाहरण सामी हदावी द्वारा अपनी किताब ‘बिटर हार्वेस्ट” में उद्धरित जियोनिस्ट आन्दोलन के सांस्कृतिक पिता माने जाने वाले अहद हाम के इस कथन से मिलता है, “अब तक जो यहूदी गुलाम कृषि मज़दूर थे, अचानक फल्सतीन में उन्होंने खुद को आज़ाद पाया. और आजादी के इस एहसास ने उनके भीतर तानाशाही के ओर झुकाव को बढ़ा दिया. वे अरबों के साथ दुश्मनाना और क्रूर व्यवहार करते थे, उनके अधिकार छीन लेते थे, बिला वज़ह उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे और यहाँ तक कि ऐसे कामों को बढ़ावा देते थे और हममें से कोई भी उनके ऐसे बुरे व्यवहार को रोकता नहीं था.” यह स्थिति अब भी ज़ारी है. उस दौर में जियोनिस्ट ताक़तों का नारा था “ एक मनुष्यहीन भूभाग, भूभाग हीन मनुष्यों के लिए.” सीधा मतलब है इसका कि उनके लिए वे फलस्तीनी कोई अर्थ ही नहीं रखते थे. फलस्तीनी लोगों से बसी उस धरती को वे एक खाली भूभाग मानते थे. ज़ाहिर है कि वे उस धरती को फलस्तीनी मूल निवासियों से खाली करना चाहते थे. वैसे ही जैसे ब्रिटिश लोगों ने आष्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड या अमेरिका में किया. इन कार्यवाहियों से स्वाभाविक ही था कि अरबों के बीच असंतोष ने जन्म लिया और उन्होंने इसका विरोध किया. ऐसे में तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य का जियोनिस्ट ताक़तों को पूरा सहयोग मिला. उनकी सैन्य ताक़त के बिना अरब प्रतिरोध का सामना करना उनके लिए संभव नहीं था. ब्रिटिश सैन्य सहायता के मदद से जियोनिस्ट ताकतें अपने औपनिवेशिक मंशा में कामयाब हुईं.



जियोनिस्ट लोगों के इस क्रूर व्यवहार की प्रतिक्रियाएं उनके “अपने” लोगों के बीच से भी आईं. इजराइली लेखक बेंजामिन बेत हलाहिमी ने अपनी किताब “ओरिजिनल सिन्स” में इजराइली प्रवेश के तीस साल बाद 1907 में एक यहूदी लेखक यित्झेक एप्स्तीन ने अरबों के प्रति एक नई जियोनिस्ट नीति की बात की जिसमें एक द्विराष्ट्रीय और सर्व समावेशी राज्य बनाने की बात थी और साथ में ज़मीन के ख़रीद के साथ ग़रीब अरब किसानों को बेदखल करने की जगह उनके विकास और आधुनिक तकनीक तथा शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात थी. लेकिन तत्कालीन जियोनिस्ट नेतृत्व ने एप्स्तीन की तीखी निंदा करते हुए यह प्रस्ताव ठुकरा दिया. ज़ाहिर है कि स्थानीय अरब जनता के प्रति इस नस्ली भेदभाव से भरे नेतृत्व के मन में किसी तरह की कोई मानवीय भावना नहीं थी. ध्यान दें मैं जब जियोनिस्ट कह रहा हूँ तो इसे यहूदी के समानार्थी रखकर नहीं देख रहा हूँ. यहूदियों का बहुसंख्यक जियोनिस्ट नहीं था न ही उनकी अपील पर फलस्तीन जाकर उनके अत्याचारों का भागीदार बना. इसी दौर में बड़ी संख्या में यहूदी योरप और अमेरिका जाकर बसे और वे इन कट्टरपंथी नीतियों के अन्धसमर्थक कभी नहीं रहे.

प्रथम विश्व युद्धोत्तर काल

अरब-इजराइल विवाद में नया मोड़ आया प्रथम विश्वयुद्ध के समय ब्रिटेन की दोहरी नीतियों से. एक तरफ इजिप्ट के तत्कालीन हाई कमीश्नर मैकमोहन (ये वही मैकमोहन हैं जिन्होंने कालांतर में पाकिस्तान और भारत के बीच बंटवारे की रेखा मैकमोहन रेखा खींची) ने तत्कालीन अरब के वृहत्तर भाग पर शासन कर रहे ओटोमन साम्राज्य के खिलाफ (जो विश्युद्ध में जर्मनी का साथ दे रहा था) विद्रोह करने के लिए मक्का के शेरिफ अली इब्न हुसैन को 1915 से 1916 के बीच लिखे पत्रों में वादा किया था कि अगर अरब ब्रिटेन का समर्थन करेंगे तो बदले में ब्रिटेन फलस्तीन, जार्डन, सीरिया और इराक की आज़ादी का समर्थन करेगा, दूसरी तरफ 1917 में ब्रिटिश विदेश मंत्री लार्ड आर्थर बाल्फोर ने एक घोषणापत्र ज़ारी कर फल्सतीन में जियोनिस्ट लोगों के स्वतंत्र देश के निर्माण के पूर्ण समर्थन की पर मुहर लगा दी. एक तीसरा गोपनीय समझौता फ्रांस और ब्रिटेन के बीच हुआ था जिसमें ओटोमन साम्राज्य के बंटवारे और उसके अलग अलग हिस्सों पर ब्रिटेन और फ्रांस के नियंत्रण की बात थी. विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने लीग आफ नेशंस को राजी कर लिया और आज का इजराइल, वेस्ट बैंक, गाज़ा पट्टी तथा जार्डन ब्रिटेन के नियंत्रण में आ गए. इसके बाद जियोनिस्टों का यहाँ आना अचानक बढ़ गया. 1933 में नाजी शासन के बाद जब योरप के इंग्लैण्ड सहित कई देशों ने यहूदियों के अपने यहाँ आने को रोकने के लिए नियंत्रण कड़े कर दिए तो हर तरफ से परेशान यहूदियों की एक बड़ी संख्या इस क्षेत्र में बसने के लिए आने लगी. यह एक अजीब सी विडंबना थी. हिटलर के आतंक से विस्थापित यहूदी खुद यहाँ मूल निवासियों को विस्थापित कर रहे थे. संख्या और ब्रिटिश समर्थन के बढ़ने के साथ जियोनिस्ट ताकतों का दमन और कब्ज़े का प्रयास भी और बढ़ गया. ज़ाहिर है अरब लोगों के बीच प्रतिरोध खड़ा हुआ. ब्रिटिश नियंत्रण और जियोनिस्ट बसाहट के खिलाफ अरब किसानों, लेखकों, राजनीतिक व्यक्तियों का यह मूलतः शांतिपूर्ण विद्रोह (1936-39) तत्कालीन ब्रिटिश शासन द्वारा क्रूरता से दमित कर दिया गया. लेकिन इस विद्रोह से सशंकित ब्रिटिश शासकों ने भविष्य में तनाव को रोकने के लिए यहूदी प्रवासियों की संख्या निश्चित करने का कदम उठाया. जियोनिस्ट ताकतों ने इसे धोखे की संज्ञा दी और इस तरह ब्रिटिश-जियोनिस्ट गठबंधन टूट गया.   

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एक तरफ फलस्तीनियों और जियोनिस्टों और दूसरी तरफ ब्रिटिश सैनिकों और जियोनिस्ट सेनाओं के बीच बढ़ते तनाव और हिंसा के मद्देनज़र ब्रिटेन के लिए नए हालात में इस क्षेत्र पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो रहा था. उसने नए बने संयुक्त राष्ट्र संघ से इस मामले में दख़ल देने को कहा और 1947 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने रेजोल्यूशन 181 पास किया जिसमें पूरे क्षेत्र को दो हिस्सों में बांटने की बात थी. जेरुसलम और बेथेलेहम को अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र घोषित किया गया और एक यहूदी तथा एक अरब देश के निर्माण की घोषणा की गयी जिसे जियोनिस्ट ताक़तों ने स्वीकार किया. इस तरह आज का इजराइल अस्तित्त्व में आया. फलस्तीनी अरबों और दूसरे अरब राज्यों ने इस विभाजन को स्वीकार नहीं किया. कारण स्पष्ट था. इस बंटवारे में इजराइल को 55% भूभाग दे दिया गया जबकि उस समय उनकी जनसंख्या केवल 30% थी और उनके कब्ज़े में केवल 7% भूभाग था. लोगों के स्वतः अधिकार के सर्व स्वीकृत आधुनिक सिद्धांत की जगह इस क्षेत्र में मध्यकाल का वह नियम लागू किया गया जिसमें एक ताक़तवर बाहरी ताक़त विजित राज्य का बंटवारा करती है. (देखें चित्र 1) इजराइली इस घटना के चलते 1947 को आज़ादी के वर्ष के रूप में मनाते हैं तो फलस्तीनी इसे अल नकबा या तबाही के वर्ष के रूप में. संयुक्त राष्ट्र के इस बंटवारे के साथ ही अरबों और इजराइलियों के बीच संघर्ष तीखा हो गया.

पहला अरब-इजराइल युद्ध

इसकी परिणिति पहले अरब-इजराइल युद्ध (1947-49) में हुई. इस पूरे युद्ध में हालांकि यह अक्सर कहा जाता है कि अरब सेना में पांच देशों की सेनायें शामिल थीं, लेकिन इस बात को छिपा लिया जाता है कि पूरे युद्ध के दौरान
डेरा यासीन हत्याकांड की स्मृति में इजिप्ट द्वारा ज़ारी डाक टिकट 
जियोनिस्ट ताक़तों की सेना हमेशा अरबों की सेना से दुगनी तिगनी संख्या में रही. अरब सेनाओं ने इजराइल पर आक्रमण भी नहीं किया था और यह पूरा युद्ध अरब धरती पर लड़ा गया था. यही नहीं अरब सेनायें युद्ध में तभी उतरीं जब जियोनिस्ट ताकतें 16 हत्याकांड कर चुकी थीं. इनमें डेर यासीन का भयानक हत्याकांड शामिल था जिसमें सौ से अधिक पुरुष, महिलाएं और बच्चे मारे गए थे. साथ ही यह समझना भूल होगी कि अरब सेनाएँ किसी एक साझा अरब उद्देश्य के लिए लड़ रही थीं. जार्डन और सीरिया का अपना अपना स्वार्थ था. साथ में उस शीतयुद्ध के काल में अमेरिका पूरी तरह से इजराइल के साथ था. उसे सैन्य तथा अन्य सहायताएँ उपलब्ध करा रहा था और इसीलिए सऊदी अरब जैसे अमेरिका परस्त मुल्क इस युद्ध से किनारा बनाए हुए थे. यह फलस्तीन-इजराइल संघर्ष की आगे भी एक लाक्षणिकता बनी रही. उन दिनों एक जियोनिस्ट आतंकवादी समूह के प्रमुख रहे मेनाकेम बिजिन ने बाद में इजराइल का प्रधानमन्त्री का पद संभाला. इन हत्याकांडों पर उनकी प्रतिक्रिया थी, “शानदार था वह, जैसे डेर यासीन पर हमने किया वैसे ही हम हर जगह करेंगे. हम आक्रमण करेंगे और दुश्मनों को तबाह कर देंगे. ईश्वर, तुमने हमें जीतने के लिए चुना है.” इस युद्ध में जियोनिस्ट ताक़तों ने कुल 33 हत्याकांड किये. युद्ध के अंत होने तक इजराइल फलस्तीन का 78 फीसदी भूभाग जीत चुका था. तीन चौथाई फलस्तीनी शरणार्थियों में तब्दील हो चुके थे. पांच सौ से अधिक गाँव और कस्बे ख़त्म कर दिए गए थे. हर शहर, नदी और पहाड़ का एक नया हिब्रू नाम रख दिया गया था. अरब संस्कृति को उस भूभाग से पूरी तरह ख़त्म करने की शुरुआत हो गयी थी. इसी बीच ब्रिटिश शासन ने 1948 में 15 मई को वह इलाका खाली कर दिया और जियोनिस्ट ताक़तों ने इजराइल राष्ट्र की घोषणा कर दी. युद्ध के बाद उस पूरे भूभाग को उन्होंने तीन हिस्से में बाँट दिया. 78 फीसदी हिस्सा तो इजराइल ने अपने पास रखा ही, बचे हुए हिस्से में से भी वेस्ट बैंक का हिस्सा जार्डन को तो गाजा पट्टी का हिस्सा इजिप्ट के नियंत्रण में दे दिया गया.  जैसा कि मैंने पहले कहा, जियोनिस्ट फलस्तीन और अरबों के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करते थे. संयुक्त राष्ट्र में विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार चुके इजराइल के एक पूर्व प्रधानमन्त्री गोल्डा मायर ने एक बार कहा था, फिलिस्तीन जैसी कोई चीज़ है ही नहीं.” और इस निर्णय से उन्होंने अपने इस विश्वास को मूर्त रूप दिया. इस तरह संयुक्त राष्ट्र का वह प्रस्ताव कभी लागू ही नहीं हुआ.

जो एक तिहाई अरब इस युद्ध के बाद पलायन करने की जगह उसी भूभाग में रह गए थे उन्हें अरब ने इजराइली नागरिकता दे दी. आज इजराइल में कोई 1.2 मिलियन अरब हैं जो उसकी कुल जनसंख्या का पांचवा हिस्सा है. इजराइल अपने आप को एक यहूदी और लोकतांत्रिक देश कहता है. ज़ाहिर है इस मानसिकता के साथ उन फलस्तीनी नागरिकों के साथ, जो यहूदी नहीं बल्कि मुसलमान और ईसाई हैं, दोयम दर्जे के नागरिक की तरह ही देखा जाता है.  इजराइल की गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों में से आधे यही लोग हैं. जिन क्षेत्रों में ये लोग रहते हैं उनमें सरकारी खर्च यहूदी क्षेत्रों की तुलना में बेहद कम है. वहां सरकारी सुविधाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि का प्रबंध बहुत खराब है. अरबों की ज़्यादातर ज़मीन यहूदियों ने कब्जा कर लिया गया है और अरबों के पास केवल 3.5% ज़मीन का ही स्वामित्व है.

जो 70% फलस्तीनी इस युद्ध में पलायित हुए थे वे आज दुनिया में किसी एक क्षेत्र के सबसे बड़े शरणार्थी हैं. संयुक्त राष्ट्र में दर्ज फलस्तीनी शरणार्थियों की कुल संख्या चार मिलियन से अधिक है. इनमें से अधिकतर उस क्षेत्र में बने 59 शरणार्थी कैम्पों में रहते हैं.  इजराइल ने हमेशा से आधिकारिक रूप से यही कहा है कि वे अरब नेताओं के आदेश पर वहां से पलायित हुए थे लेकिन इजराइली गुप्तचर सेवा के कागजात कहते हैं कि 75 फीसद से अधिक शरणार्थी जियोनिस्ट ताक़तों के सीधे और मनोवैज्ञानिक युद्ध के कारण भागे थे. फलस्तीनियों का मानना है कि उन शरणार्थियों को अपनी धरती पर लौटने का अधिकार है. 1948 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित आर्टिकल 194 स्पष्ट तौर पर कहता है कि फलस्तीनी शरणार्थियों को अपनी जन्मभूमि पर लौटने का पूरा अधिकार है लेकिन इजराइल इसे नहीं मानता. वही इजराइल “वापसी के अधिकार” के तहत दुनिया के किसी भी हिस्से में जन्में और बसे यहूदी को इजराइल में आने और वहां बसने का अधिकार देता है, लेकिन उस धरती पर जन्में फलस्तीनियों को लौटने और बसने का अधिकार नहीं देता. इस दोयम दर्ज़े की नागरिकता और अन्याय के खिलाफ़ फलस्तीनियों के बीच विरोध की सुगबुगाहटों ने मई 1964 में एक सांगठनिक रूप लिया. जेरुसलम में अहमद शकीरी के नेतृत्व में फलस्तीन के 422 प्रमुख नेताओं की एक बैठक हुई और “फलस्तीन मुक्ति संगठन(PLO)” का गठन किया गया. पी एल ओ ने एक राष्ट्रीय फंड बनाया तथा फलस्तीन नेशनल काउंसिल के साथ साथ सशस्त्र प्रतिरोध ज़ारी रखने के लिए फलस्तीन मुक्ति सेना (PLA) का गठन किया गया.

दूसरा अरब-इजराइल युद्ध

1967 में इजराइल ने इजिप्ट के राष्ट्रपति नासेर पर धमकी देने का आरोप लगाते हुए युद्ध की घोषणा कर दी. इजराइल ने इसे “छः दिन का युद्ध” कहा तो फलस्तीनियों ने “अल नक्शाह (धक्का)” कहा. इस युद्ध में उसने जार्डन से वेस्ट बैंक, इजिप्ट से गाजा पट्टी और सिनाई प्रायद्वीप और सीरिया से गोलन पहाड़ी का क्षेत्र जीत लिया. सिनाई प्रायद्वीप तो इजिप्ट को लौटा दिया गया लेकिन बाकी क्षेत्र अब भी इजराइल के कब्ज़े में हैं. वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी पर शासन के लिए उसने सैन्य शासन स्थापित कर दिया. इस युद्ध के बाद एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र ने हस्तक्षेप किया और प्रस्ताव 194 पास किया जिसमें युद्ध द्वारा भूभाग पर कब्जे को अनुचित ठहराते हुए जीते हुए भूभाग वापस करने की बात की गयी और शरणार्थी समस्या को न्यायपूर्ण तरीके से सुलझाने की बात की गयी. लेकिन इजराइल ने इसे भी स्वीकार नहीं किया. अमेरिका का वरदहस्त और आर्थिक-सैन्य सहयोग इजराइल को एक ताक़तवर राष्ट्र में तब्दील कर रहा था और इस ताक़त का उपयोग वह लगातार सेना के बल पर अपना आधिपत्य बनाए रखने और फलस्तीनियों के उत्पीडन में कर रहा था. यह युद्ध भी उसकी विस्तारवादी कूटनीति का हिस्सा था. इसे समझने के लिए उस दौर में गोलन पहाड़ियों पर आक्रमण का आदेश देने वाले इजराइल के पूर्व रक्षा मंत्री मोशे डायन की न्यूयार्क टाइम्स में 11 मई, 1997 को छपी यह स्वीकारोक्ति पढ़ लेना काफी होगा, “सीरिया के तमाम हथियारबंद लड़ाकों को इजराइल ने जान बूझकर भड़काया था और किब्बुत्ज़ के जिन नागरिकों ने ऐसा करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया था उन्होंने सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि ज़मीन की लालच में ऐसा किया था. उन्होंने ज़मीन के लिए अपनी लालच छिपाने की कोशिश तक नहीं की. हम ऐसे असैन्य क्षेत्रों में खेती के लिए ट्रैक्टर भेजते थे जहाँ कुछ भी करना मुमकिन नहीं था और हमें मालूम था कि हमारे इस कब्जे से सीरियाई गोलीबारी शुरू कर देंगे. अगर वे गोली नहीं चलाते तो हम ट्रैक्टरों को और आगे बढ़ने के लिए कहते थे, तब तक जब तक सीरियाई चिढ़ कर गोली चलाना न शुरू कर दें. और फिर हम पहले अपनी सेना का और फिर अपनी एयर फ़ोर्स का भी उपयोग करते...ऐसे हुआ था वह सब ...युद्ध के चौथे दिन तक सीरियाई हमारे लिए ख़तरा नहीं रह गए.” दरअसल यह विस्तारवाद इजराइल की विचारधारा का हिस्सा रहा है और अब भी है.  नोम चाम्सकी अपनी किताब “द फेटफुल ट्रायंगल” में डेविड बेन-गोरियन के तीस के दशक के हवाले से बताते हैं कि किस तरह इजराइल बाइबिल में दिए गए यहूदी देश की सीमाओं को लागू करने के लिए किसी भी सूरत में अपने पड़ोसियों की ज़मीनों को कब्जाना चाहता है तो इजराइली प्रोफ़ेसर इजराएल शाहक अपनी किताब “ज्यूइश रिलीजन : ज्यूइश हिस्ट्री, द वेट आफ 2000 ईयर्स में लिखते हैं, “एक यहूदी देश के रूप में इजराइल जो मुख्य खतरा अपनी जनता, अन्य यहूदियों और अपने पड़ोसियों के लिए पैदा करता है वह अपनी वैचारिक जड़ों से निकली क्षेत्र विस्तार की भूख है और इस उद्देश्य के चलते उपजे युद्धों की अनंत श्रेणी, किसी जियोनिस्ट नेता ने आजतक बेन-गोरियन के उस विचार का विरोध नहीं किया है जो कहता है कि इजराइल की नीतियाँ एक यहूदी राज्य के लिए बाइबिल में दी गयी सीमाओं को हासिल करने के उद्देश्य से संचालित होनी चाहिए.”

पी एल ओ का उदय

PLO के निर्माण के साथ अरब जगत की हलचलों में भी काफी बदलाव आया. जार्डन के सुल्तान को देश में बढ़ते इसके प्रभाव से अपनी गद्दी पर खतरा महसूस हुआ और सितम्बर 1970 में देश में मार्शल ला लगाकर उन्होंने PLO के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी. दोनों सेनाओं के बीच इस युद्ध में तीन हज़ार से अधिक लोग हलाक हुए. इजिप्ट के शासक गामेल अब्देल नासेर की पहल पर हुए समझौते के बाद पी एल ओ ने अपना मुख्यालय जार्डन से लेबनान स्थानांतरित कर दिया और वहां से हिंसक तथा अहिंसक गतिविधियाँ चलती रहीं. एक बड़ी घटना में फलस्तीनी बंदूकधारियों ने म्यूनिख ओलम्पिक के दौरान 11 इजराइली सैनिकों की हत्या कर दी. 6 अक्टूबर 1973 को इजिप्ट और सीरिया ने रमजान के महीने में इजराइल पर अचानक से हमला किया. इस औचक हमले से इजराइल को बचाने के लिए अमेरिका ने हवाई जहाजों से हथियार और अन्य सहायता मुहैया करवाई. यह दोनों अरब देशों की एक तरह की नैतिक और रणनीतिक जीत थी, हालांकि अमेरिकी सहायता और फिर इजराइल के प्रत्याघात के चलते वे अपने भूभाग वापस लेने में सफल नहीं हुए. अक्टूबर 73 में एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र की सिक्योरिटी काउंसिल ने प्रस्ताव 338 पारित कर तत्काल युद्ध विराम कर मध्य पूर्व में एक न्यायपूर्ण और दीर्घकालीन शान्ति स्थापित करने के लिए UNSCR 242 लागू करने का प्रस्ताव किया.  लेकिन इजराइल ने इसे स्वीकार नहीं किया. फिर 1976 की उस घटना से तो सब परिचित ही हैं जब पी एल ओ ने एयर फ्रांस के उस विमान को अपहृत कर लिया था जिसमें बड़ी संख्या में इजराइली नागरिक जा रहे थे. बाद में इस विमान को मुक्त करा लिया गया. इस पूरे दौर में इजराइली उत्पीड़न तथा पी एल ओ (जिसे अब सभी अरब देशों तथा दुनिया के तमाम मुल्कों ने फलस्तीन का इकलौता प्रवक्ता स्वीकार कर लिया था) की हिंसक-अहिंसक प्रतिरोधी कार्यवाहियां चलती रहीं.

इस बीच एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम में नासेर के बाद इजिप्ट के राष्ट्रपति बने अनवर सादात ने अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर की पहल पर इजराइल के प्रधानमन्त्री मेनाकेम बेइन के साथ 1978 में एक त्रिपक्षीय समझौते पर कैम्प डेविड में हस्ताक्षर किये. इस समझौते के तहत इजराइल ने सिनाई रायद्वीप इस शर्त पर लौटा दिया कि इजिप्ट इजराइल के खिलाफ किसी तरह की हिंसात्मक कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनेगा. इस घटना का महत्त्व इसलिए भी था कि पहली बार किसी अरब देश ने इजराइल को आधिकारिक मान्यता दी थी. अरब लीग ने इस घटना के बाद इजिप्ट से अपनी सदस्यता छीन ली. देश के भीतर भी सादात का बहुत विरोध हुआ. लेकिन इन सब को दरकिनार करते हुए सादात ने 1980 में राजनायिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए. इसके कुछ ही महीनों के भीतर इजिप्ट की सेना के तीन सैनिकों ने 6 अक्टूबर 1981 को उनकी हत्या कर दी.

एक अन्य घटनाक्रम में 6 जून 1982 को इजराइल ने लेबनान के दक्षिणी हिस्से पर हमला करके पी एल ओ के नेता यासर अराफात को अपने मुख्यालय को ट्यूनीशिया ले जाने पर मजबूर कर दिया. इसके बाद सितम्बर के महीने में इजराइली सेनाओं ने बेरुत के साबरा और शातिला शरणार्थी शिविरों में घुस कर पी एल ओ के दो हजार निहत्थे सदस्यों का कत्लेआम किया.

पहला इंतिफादा

इस उत्पीड़न का प्रतिकार भी स्वाभाविक था. 1987 में इजराइली कब्जे के 20 वर्ष पूरे होने पर वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी के फलस्तीनियों ने इजराइली कब्जे के खिलाफ एक जनांदोलन शुरू किया जिसे इंतिफादा (उखाड़ फेंकना) के नाम से जाना जाता है. इस आन्दोलन में बच्चों, किशोरों और औरतों सहित लाखों लोगों ने हिस्सेदारी की. यह पहली बार था जब गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक के नागरिकों ने इजराइल के प्रतिकार में सीधी हिस्सेदारी की. इसके पहले तक इन सीमाओं से बाहर पी एल ओ ही अपने तरीके से इजराइल का प्रतिकार करता नज़र आता था. शुरू में इस आन्दोलन में सिविल नाफ़रमानी के गांधीवादी तरीकों को अपनाया गया. आम हड़तालें, इजराइली वस्तुओं का बहिष्कार आदि करने के साथ इजराइल द्वारा बंद करा दिए गए स्कूलों की जगह भूमिगत स्कूलों की स्थापना का  इजराइली सेना ने जब क्रूर दमन किया तो लोगों ने पथराव करने शुरू किये. बच्चों तक को क्रूरता से मारते पीटते, कैदियों को पत्थर पर पटक कर उनकी हड्डियाँ तोड़ते, महिलाओं को बेइज्जत करते, पथराव करते प्रदर्शनकारियों पर गोलियां और बम बरसाते इजराइली सैनिकों की तस्वीरें जब दुनिया भर में पहुँचीं तो इस समस्या को देखने के नजरिये में एक बड़ा बदलाव आया. पश्चिमी देशों में भी फलस्तीन के पक्ष में पहलकदमियां हुईं. चार साल चले इस आन्दोलन में एक हज़ार से ज्यादा फलस्तीनियों को मार दिया गया.

समझौतों की ओर : ओस्लो और आगे

इन पहलकदमियों का असर दिखना शुरू हुआ और इंतिफादा के दौरान हुए एक महत्त्वपूर्ण विकास क्रम में पी एल ओ के नेता यासेर अराफात ने 14 दिसंबर 1988 को सभी आतंकवादी कार्यवाहियों की निंदा करते हुए इजराइल को मान्यता दे दी. तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने पी एल ओ के साथ गंभीर वार्ता के लिए स्वीकृति दी. लेकिन इजराइल ने पी एल ओ को लेकर अपनी अनिच्छा स्पष्ट रखी. जार्डन ने वेस्ट बैंक पर अपने सभी अधिकार छोड़ने की बात की. और अगले ही दिन पी एल ओ के प्रति अपना समर्थन ज़ाहिर करते हुए संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव 53/196 पारित किया और गोलन पर सीरिया तथा फलस्तीन के “अटूट और अविलगनीय अधिकार” की पुष्टि की और इजराइल से इस कब्जे वाले क्षेत्र के संसाधनों को रोकने को कहा. इन सबके चलते 1991 में “मैड्रिड शान्ति सम्मलेन” आयोजित हुआ. इसमें अरब देशों के सभी प्रतिनिधि (इजिप्ट को छोड़कर) तथा इजराइल पहली बार एक टेबल पर बैठे. बातचीत द्विपक्षीय और बहुपक्षीय, दोनों आधार पर हुई. समझौते की इस पहल का परिणाम 1993 के ओस्लो समझौते के रूप में सामने आया जहां यासेर अराफात और तत्कालीन इजराइली प्रधानमन्त्री यित्झेक राबिन ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके तहत इजराइल ने पी एल ओ को मान्यता दी तथा शान्ति के बदले वेस्ट बैंक और गाजा के कब्ज़े वाले क्षेत्र में सीमित स्वायत्तता देना स्वीकार किया. पी एल ओ ने 1967 के युद्ध के पहले निर्धारित सीमा को स्वीकार किया और इंतिफादा को ख़त्म करते हुए   वेस्ट बैंक और गाजा में सुरक्षा स्थापित करने की बात स्वीकार की. ज़ाहिर है इस प्रस्ताव से कोई अंतिम निर्णय तो नहीं निकलना था न ही सीमाओं के विवाद का खात्मा होना था. लेकिन यह उस दिशा में एक प्रक्रिया की शुरुआत तो थी ही. इसीलिए इसे दुनिया भर में “ओस्लो शान्ति प्रक्रिया” कहा गया. कम से कम इतना तो हुआ ही कि उस खूनी संघर्ष और एक दूसरे का वजूद ही स्वीकार न करने वाली सोच पर विराम लगा तथा दोनों पक्षों ने एक ऐसी आपसी स्वीकृति की ओर बढ़ने का वादा किया जिससे इस क्षेत्र में स्थाई शान्ति हो सके.

रेबिन, क्लिंटन और अराफात 


छुटपुट घटनाओं के बीच 1997 तक स्थितियां काफी बेहतरी की ओर बढती दिखाई दे रही थीं. मई, 94 में कैरो समझौता हुआ जिसमें गाजा पट्टी के लगभग साठ फीसदी हिस्से से सेनायें हटाने पर इजराइल सहमत हुआ, उम्मीद की गयी कि इजराइल अगले पांच सालों में अपनी बाक़ी सेना हटा लेगा. बारह साल ट्यूनीशिया से पी एल ओ की कमान संभालने वाले यासेर अराफात 1 जुलाई को विजेता की तरह गाजा पट्टी में वापस आये और फलस्तीनी अथारिटी के प्रमुख के रूप में कार्यभार संभाला, इसी साल 26 अक्टूबर को इजराइल और जार्डन के बीच एक समझौता हुआ जिसमें कब्जे वाला क्षेत्र वापस करने की बात थी और 28 सितम्बर 1995 को रेबिन और अराफात के बीच वाशिंगटन में ताबा समझौता हुआ (जिसे ओस्लो द्वितीय के रूप में जाना जाता है) जिसमें फलस्तीनी स्वायत्त शासन के विस्तार और चुनावों के बारे में महत्त्वपूर्ण पहलकदमी की गयी. 20 जनवरी 1996 को फलस्तीन में पहली बार चुनाव भी हुए. लेकिन यह सब दोनों तरफ के कट्टरपंथी धड़ों को नागवार गुज़र रहा था. 4 नवम्बर को इजराइल के एक कट्टरपंथी यहूदी ग्रुप के सदस्य यिगल आमिर ने रेबिन की हत्या कर दी और साइमन पेरेज इजराइल के नए प्रधानमन्त्री बने. उधर फलस्तीन में हमास (हरकतुल मुजावमाती इस्लामिया या इस्लामी प्रतिरोध आन्दोलन) सक्रिय हुआ. हमास पूरी तरह से हिंसा पर आधारित संगठन के रूप में काम करने वाला ग्रुप था. शान्ति की प्रक्रिया को नुक्सान पहुँचाने के लिए हमास ने आत्मघाती दस्ते तैयार किये और इन आत्मघाती हमलों में पचास से ज्यादा इजराइलियों की हत्या हुई. इसी बीच 1996 के चुनावों में इजराइल की दक्षिणपंथी पार्टी लिकुड ने लेबर पार्टी को परास्त कर सत्ता पर कब्ज़ा किया और नेतान्याहू नए प्रधानमन्त्री बने. जनवरी 1997 में नेतान्याहू ने वेस्ट बैंक का अस्सी प्रतिशत क्षेत्र लौटा दिया लेकिन शेष पर कब्ज़ा बरकरार रखा. डेढ़ साल का यह गतिरोध अमेरिका के हस्तक्षेप से टूटा और अक्टूबर 1998 में अमरीकी राष्ट्रपति क्लिंटन और नेतान्याहू की मुलाक़ात में वाई रिवर मेमोरेंडम पर सहमति बनी. अगले चुनावों में लेबर पार्टी फिर सत्ता में आई और एहुद बराक प्रधानमंत्री बने. बराक ने अपना चुनाव अभियान सभी पडोसी देशों से एक कायमी शान्ति स्थापित करने की बात को लेकर ही चलाया था. 5 सितम्बर 1999 को बराक और अराफात के बीच वाई रिवर समझौते के तहत बातचीत हुई जिसका उद्देश्य मध्य पूर्व में एक स्थाई शान्ति की ओर बढना ही कहा गया लेकिन फरवरी 2000 में सेनाओं की वापसी की समय सीमा को लेकर दोनों पक्षों के बीच की बातचीत एक बार फिर टूट गयी. मार्च 2000 में बराक ने वेस्ट बैंक का जो हिस्सा वापस किया वह कुल क्षेत्र का केवल 6.1 प्रतिशत था. जुलाई में एक कोशिश और हुई लेकिन इस बार कैप्म डेविड में किसी समझौते की जगह दोनों पक्ष एक दूसरे पर शान्ति के लिए गंभीर न होने और अनिच्छुक होने का आरोप लगाकर पीछे हट गए. जहाँ इजराइल अपने प्रस्ताव को उदार बता रहा था और वेस्ट बैंक के उन हिस्सों को अपने कब्जे में रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़रूरी बता रहा था वहीँ फलस्तीन का कहना था कि वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी मिलकर वैसे भी मूल फलस्तीन का केवल एक चौथाई हिस्सा हैं उसमें भी एक हिस्से पर इजराइल का कब्ज़ा इन्हें असम्बद्ध क्षेत्रों ( दो हिस्सों के बीच के हिस्से पर इजराइली कब्जे के चलते एक दूसरे तक जाना मुमकिन नहीं होता) में बदल दे रहे हैं जिससे एक देश की तरह प्रशासन असंभव हो जाता.

फिर तनाव



इस तनाव के दौर के बीच में ही इजराइल की दक्षिणपंथी पार्टी लिकुड के नेता एरिअल शेरोन 28 सितम्बर 2000 को एक हजार इजराइली सैनिकों के साथ टेम्पल माउंट की यात्रा पर गए, यह जगह अरब जगत में हरम-अल-शरीफ़ के नाम से जानी जाती है और मुसलमान इसे पवित्र मानते हैं. उन्होंने शेरोन की यात्रा को जानबूझकर पवित्रता खंडित करने वाला माना और इसका विरोध शुरू हो गया. फलस्तीनियों ने इसे अल अक्सा इंतिफादा का नाम दिया. पहले से चल रहे तनाव और तीखे हो गए और एक बार फिर इजराइल-फलस्तीन के बीच हिंसक संघर्ष शुरू हो गया. इस बार जो सबसे अधिक भड़काने वाली घटना हुई वह थी एक दूसरे के धार्मिक स्थानों पर हमले. इजराइल के फलस्तीनी नागरिकों ने भी इसमें बढ़ चढ़ के हिस्सा लिया. इजराइली कब्ज़े में दोयम दर्ज़े की ज़िन्दगी जी रहे फ़लस्तीनियों का यह क़दम इजराइल की नज़र में आतंकवाद था (इजराइल ने इसे आतंकवादी इंतिफादा कहा).

लेकिन अगर उनके हालात पर गौर फरमाएँ तो यह विद्रोह स्वाभाविक लगता है. बेट्टी जेन बेली ने कुछ दिसंबर 1996 के द लिंक में लिखा था “बेथेहलम विश्वविद्यालय के छात्रों के एक समूह की जेरुसलम के अंतर्राष्ट्रीय एन जी ओज की संयोजन समिति को सौंपी गयी स्टडी रिपोर्ट बताती है कि कई परिवारों को पांच पांच दिन तक पानी मयस्सर नहीं होता था. रिपोर्ट आगे कहती है कि वेस्ट बैंक और गाजा में रह रहे फलस्तीनियों को मिलने वाले पानी का कोटा तय था जबकि इन्हीं इलाकों में रहने वाले इजराइलियों को भरपूर पानी मिलता था...जबकि फलस्तीनियों को पानी मंहगे दामों में खरीदना पड़ता था यहूदी इलाकों में गर्मियों के दोपहर में लान हरे भरे थे और उन पर पानी का छिड़काव हो रहा था. घर के बाहर बने स्वीमिंग पूल में बच्चों के तैरने की आवाज़ सुनी जा सकती थी.”  सेना का उत्पीड़न एक दूसरा भयानक पहलू था. गाजा कम्युनिटी मेंटल हेल्थ प्रोग्राम के शोध निदेशक डा समीर कोटा ने उसी साल की गर्मियों में “द जर्नल आफ पेलेस्टाइन स्टडीज” में लिखा “आपको याद रखना होगा कि दो साल से बड़े नब्बे फीसदी बच्चों ने कई कई बार यह सब देखा है – इजराइली सेना को घरों में घुसते, रिश्तेदारों को पीटते, सामान नष्ट करते. कई ने खुद पिटाई का अनुभव किया है. उनकी हड्डियाँ तोड़ दी गयीं, गोली मार दी गयी, आँसू गैसे के गोले दागे गए...और चीज़ें उनके अपने भाई बहनों और रिश्तेदारों के साथ हुईं...बच्चों के मनोविज्ञान पर इस असुरक्षा का सीधा असर होता है. उसे सुरक्षित महसूस करने की आवश्यकता होती है. अगर यह नहीं हुआ तो इसके परिणाम आगे देखे जाते हैं. अपने शोध में हमने पाया है कि इस तरह की यंत्रणा से गुज़रे बच्चे अपने व्यवहार में अधिक अतिवादी होते हैं और आगे चलकर अपने राजनीतिक विश्वासों में भी.” असंतोष का एक तीसरा पहलू एडवर्ड सईद के 4 मई 1998 को द नेशन में लिखे लेख से मिलता है. सईद लिखते हैं, “ इस दुःख से बड़ा कोई दुःख नहीं है कि जब आप सुनते हैं कि कोई 35 साल का फलस्तीनी जिसने पंद्रह साल एक अवैध दैनिक मज़दूर की तरह काम करके बचाए पैसे से अपने परिवार के लिए एक घर बनाया है और वह जब एक दिन लौटकर शाम को घर आता है तो पाता है कि उसका घर ज़मीदोज कर दिया गया है. जब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों किया गया तो मुझे बताया गया कि अगले दिन एक इजराइली सैनिक ने उसे एक काग़ज़ दिया जो कहता था कि यह घर बिना लाइसेंस के बनाया गया है. दुनिया में और कौन सी जगह के बाशिंदों को अपनी ही ज़मीन पर घर बनाने के लिए लाइसेंस (जो उन्हें कभी नहीं दिया जाता है) लेना पड़ता है. यहूदी बना सकते हैं, लेकिन फलस्तीनी नहीं बना सकते. यह रंगभेद है.
नाजी अल अली द्वारा बनाये गए हंडाला सीरिज के कार्टूनों में एक 

फलस्तीनी आतंकवाद के बारे में बहुत कुछ कहा सुना जाता है लेकिन इजराइल के सरकारी आतंकवाद के बारे में मुख्यधारा की मीडिया अक्सर चुप लगा जाती है. अमेरिकी बौद्धिक सर्किल में इजराइल के अत्याचारों पर खामुशी स्वाभाविक है. लेकिन नोम चाम्सकी जैसे लोग इसे देख पाते हैं. एडवर्ड सईद और हिचेन्स द्वारा संपादित पुस्तक “ब्लेमिंग द विक्टिम्स” वैसे तो इसी अमेरिकी दुहरेपन को साफ़ करती है, लेकिन चाम्सकी ने इसमें लिखे एक लेख में इसे खासतौर पर स्पष्ट किया है. वह लिखते हैं “इजराइली आतंकवाद का इतिहास राज्य के उद्भव से भी पीछे जाता है असल में बहुत पीछे जिसमें जुलाई 1948 में ढाई सौ नागरिकों की बर्बर हत्या और सत्तर हज़ार लोगों के लिड्डा और रामले से निर्दय निष्कासन का इतिहास, अक्टूबर 1948 में हैब्रान के पास दोइमा नामक गाँव में सैकड़ों निहत्थे लोगों की ह्त्या, क्यूबिया, काफ्र कासेम और ऐसे तमाम गाँवों में कत्लेआम, 1948 के युद्ध के तुरत बाद हज़ारो बेदोइंस का नागरिक क्षेत्रों से निष्कासन और सत्तर के दशक में उत्तरी शिनाई में यहूदियों को बसाने के लिए हज़ारों लोगों का निष्कासन शामिल है. ऐसी तमाम तमाम घटनाएं हैं.

इतिहास के बीच में ये उदाहरण मैंने सिर्फ उन अमेरिकी और इजराइली मीडिया रिपोर्ट्स के बरक्स दिए हैं जिनमें इजराइल के दमनकारी क़दमों को सिर्फ अपने देश में आतंकवाद के दमन की तरह दिखाया जाता है और आजकल हमारे देश में इस पर भरोसा करने वाले और इन्हीं नीतियों को अपनाने की सलाह देने वालों में तमाम पढ़े लिखे लोग शामिल हैं. किसी भी धर्म के निर्दोष नागरिकों की हत्या निंदनीय है, लेकिन यह तो देखना ही होगा कि इसकी जिम्मेदारी कहाँ है. इतिहास से आँखें मूँद के भविष्य की ओर नहीं देखा जा सकता.   

खैर, इस संघर्ष को रोकने के लिए बिल क्लिंटन ने इजिप्ट के शर्म-अल-शेख रिजार्ट में फलस्तीनी और इजराइली नेताओं को बुलाया गया था. इसमें युद्ध विराम का तय किया लेकिन वह कुछ दिन भी चल नहीं सका. इजराइल के सत्ताधारी दल में बिखराव जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी और एहुद बराक ने नए जनमत संग्रह का निर्णय लिया. लेकिन इस बार जनता ने उन्हें समर्थन नहीं दिया और दक्षिणपंथी एरियल शेरोन के सत्ता में आने के साथ ही फलस्तीन-इजराइल समझौते की उम्मीदें धूमिल हो गयीं. 14 फरवरी को एक फलस्तीनी ड्राइवर द्वारा एक बस स्टाप पर खड़े लोगों पर बस चढ़ा देने की घटना में कुछ इजराइली नागरिकों की मौत के बाद ब्लाकेड लगा दिए गए. शेरोन ने ओस्लो प्रक्रिया का पालन करने से इनकार कर दिया और अप्रैल में इजराइली सेना ने गाजा पट्टी को अधिकार में ले लिया और इसे तीन हिस्सों में बाँट दिया. मई में मिशेल कमीशन ने तुरत युद्ध रोकने और बातचीत शुरू करने को कहा. कमीशन ने यहूदी बसाहट के विस्तार को रोकने की भी बात की. योरोपीय युनियन ने भी कब्ज़े वाले क्षेत्र में सेना के अत्यधिक प्रयोग की मलामत की. लेकिन जहां अराफात ने अपनी ओर से युद्ध विराम की घोषणा की वहीँ अब तक सिर्फ आतंकवादियों को मारने की अनुमति देने वाली इजराइली सिक्युरिटी काउंसिल ने सेना को फलस्तीनी क्षेत्रों पर खुले आक्रमण की छूट दे दी. अब वे “आतंकवादियों” पर शक के आधार पर हमला करने के लिए आज़ाद थे जो भले उस समय हमलावर हों या न हों. यह फलस्तीनियों की हत्या का खुला लाइसेंस था. यही दौर हमास के लगातार प्रभावी होते जाने और पी एल ओ के प्रभाव के घटने का था. हमास ने अपनी हिंसक कार्यवाहियां बढ़ानी शुरू की और इजराइल ने बेहिचक नागरिक ठिकानों पर ड्रोन से लेकर मिसाइलों तक से हमले. इजराइल में सत्ता दक्षिणपंथियों के हाथ में थी और सेना अब उत्तरोत्तर अमेरिका के मदद से अधिक आधुनिक साजो सामान वाली तथा अधिक घातक बनती चली गयी. पूरी गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक को सैन्य छावनी में बदल दिया गया जहाँ एक फलस्तीनी नागरिक को कदम कदम पर सैन्य जांच से गुजरना होता है. अकेले वेस्ट बैंक में पांच सौ से अधिक चेक बैरियर्स हैं. 2006 में हुए चुनावों में कट्टरपंथी हमास की जीत के साथ यह लड़ाई एक नए दौर में चली गयी. पी एल ओ के नियंत्रण वाली फतह पार्टी के शान्ति प्रयासों के विफल होने पर लोगों ने यह अतिवादी रास्ता चुना. चुनावों के बाद हुए सशस्त्र संघर्ष में हमास ने फतह से गाजा का इलाका छीन लिया. इस लड़ाई में भी सौ से अधिक लोग मारे गए. परिणाम यह कि इजराइल ने इसे आतंकवादियों की जीत बताते हुए करों आदि का हिस्सा देने से इनकार कर दिया और दुनिया भर की सहायता एजेंसियों ने फलस्तीन को दी जाने वाली सहायता बंद कर दी. 2006 में एक हमले में इजराइल ने गाजा के सभी ट्रांसफार्मर नष्ट कर दिए, बाद में इजिप्ट और फ्रांस से प्राप्त धन से उनकी मरम्मत तो हो गयी लेकिन उसके बाद से ही बिजली की समस्या वहां भयावह रूप से जारी है. 2008 में हमास और इजराइल के बीच एक सहमति बनी. दोनों ने युद्ध विराम की घोषणा की, लेकिन अब तक फलस्तीन में हमास से भी अधिक कट्टर आतंकवादी ग्रुप्स पैदा हो चुके थे. दरअसल इरानी की पुनरुत्थानवादी क्रान्ति के बाद इस पूरे इलाक़े में कट्टरपंथी इस्लामी आन्दोलन खड़े हो गए. हमास और हिजबुल्ला खुद ऐसे ही संगठन थे जिन्होंने अब तक के लोकतांत्रिक और उदार संगठनों और आंदोलनों (जैसे पी एल ओ) को अपदस्थ कर दिया था. ईरान इन दोनों का समर्थन करता था. ज़ाहिर है एक बार उस राह के खुल जाने पर अब वहां और नए तथा और कट्टरपंथी संगठनों ने जगह बना ली. राजनीतिशास्त्र और इतिहास के विद्यार्थी शीतयुद्ध काल की राजनीति के दौरान कट्टरपंथी इस्लाम को अमेरिका के परोक्ष-प्रत्यक्ष समर्थन की कहने जानते ही हैं. तो न राकेट के हमले कभी पूरी तरह रुके न ही इजराइल की ओर से ज़रूरी सामानों की भरपूर खेप कभी आ पाई. उसी साल दिसंबर में राकेट हमले अचानक बढ़ गए और इजराइल ने जवाबी कारवाई में मिसाइलों के हमले से हज़ार से अधिक सैनिकों और नागरिकों को मार दिया. तनाव फिर अपनी पुरानी स्थिति में पहुँच गया.

अमेरिका में 2011 के आतंकवादी हमले के बाद बदली विश्व परिस्थितियों का असर मध्य पूर्व पर पड़ना ही था. अपने समर्थक मुस्लिम तथा अरब देशों के कहने पर बुश प्रशासन ने एक बार फिर इजराइल और फलस्तीन के बीच सुलह की कोशिशें कीं. 2 अक्टूबर 2011 को की गयी एक आश्चर्यजनक घोषणा में अब तक की मध्य पूर्व नीति से हटते हुए जार्ज बुश ने एक स्वतन्त्र फलस्तीन राज्य के निर्माण से सहमति जताई और उनके विदेश मंत्री ने दोनों देशों के बीच वार्ता शुरू करवाने की मंशा ज़ाहिर की. कुछ हलचल हुई लेकिन कुल मिलाकर बात बनी नहीं. इस बीच अरब देशों में जो गुलाबी क्रांतियाँ हुईं और पुराने शासक अपदस्थ हुए उससे भी जो अस्थिरता पैदा हुई उसने इलाक़े की राजनीतिक परिस्थिति को पूरी तरह बदल दिया. इजिप्ट, यमन और लीबिया में सरकारें बदलीं तथा सीरिया में सरकार और जिहादी विद्रोहियों के गठबंधन के बीच हिंसक संघर्ष और तीखा हो गया. बग़दाद में सद्दाम हुसैन के पतन के बाद आई शिया सरकार की नीतियाँ भी आग में घी डालने वाली साबित हुईं और अब वहां आई एस आई एस की तबाही मचाने वाली ख़बरें जो आ रही हैं, उनसे हाल फिलहाल इस संकट के टलने या किसी दीर्घकालिक हल की संभावना और कम हो गयी है. सच यह है कि पहले से ही इजराइल का पक्षधर रहा अमेरिका अब चीजों को संभाल सकने वाली पुरानी स्थिति में है भी नहीं.
हाल में ही जो हुआ वह भविष्य की एक भयानक तस्वीर दिखाता है. जून में इजराइल ने आरोप लगाया कि हमास ने तीन इजराइली बच्चों का अपहरण कर हत्या कर दी है. इसके बाद वेस्ट बैंक में इजराइल ने हवाई हमले शुरू कर दिए. हमास ने इस घटना के पीछे अपना हाथ होने से इनकार किया. फिर जेरुसलम में 2 जुलाई को एक फलस्तीनी किशोर की हत्या से तनाव और बढ़ गया. 7 जुलाई को हमास ने स्वीकार किया कि इजराइल के हवाई हमलों में अपने दल के तमाम लोगों के मारे जाने के बाद उसने राकेट फायर किये हैं. उसके बाद चल रही हिंसा में अब तक गाजा पर 5000 के आसपास राकेट हमले हो चुके हैं तो हमास ने भी 4000 के आसपास राकेट हमले किये हैं. विश्व समुदाय के पहल के बाद फिलहाल थोड़ी शान्ति है लेकिन यह कब तक रहेगी, यह कोई नहीं कह सकता. इस लड़ाई में अब तक हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं जिसमें बच्चों की बड़ी संख्या शामिल है.

तो हालिया घटनाओं के विस्तार में न भी जाएँ तो यह कह सकते हैं कि इजराइल और फलस्तीन के बीच के ताल्लुक सुधरने की राह से भटक कर एक अंधी गली में पहुँच गए हैं जहाँ दोनों पक्षों की कमान ऐसे कट्टरपंथी लोगों के हाथ में हैं जो भविष्य नहीं इतिहास की ओर देखते हैं. इन सबके बीच फलस्तीनी नागरिक, जिनमें औरतें और बच्चे सब शामिल हैं, लगातार इजराइली सेना के आक्रमण झेलने को मज़बूर हैं.


मंगलवार, 12 मार्च 2013

पूँजीवादी विकास की अंतर्कथा


क्या विकास पूरा हो चुका है?

--लूई प्रोयेक्ट 


पूँजीवाद के संकट का सवाल विश्व के प्रमुख औद्योगिक राष्ट्रों के सम्मुख जिस तरह खड़ा है वैसा 1930 के दशक के बाद कभी नहीं हुआ था। जहाँ एक ओर बहुत से लोग मानते हैं कि मंदी की विकटता अपने चरम पर है, वहीं यह मानने वाली प्रवृत्ति भी चली आई है कि पूँजीवाद अब व्यवसाय चक्र (बिज़नेस साइकल) के दुरुस्त होने के चरण में है। मसलन, सं. रा. अमेरिका में अब बेरोज़गारी की दर 7.7 फ़ीसदी है जो पिछले चार सालों में सबसे कम है। इस सुधार के बावजूद यूरोप का बहुत सा हिस्सा अब भी यूरोज़ोन संकट में डूबा हुआ है।

वामपंथ के सामने खड़े अहम सवालों में से एक है पूँजीवादी व्यवस्था की दीर्घकालिक व्यवहारिकता (लॉन्गटर्म वाएबिलिटी) । और अगर आप इस सिद्धांत को आधार मान कर चलते हैं कि यह व्यवस्था तेजी और मंदी के चक्रों से संचालित होती है, तो एक तार्किक निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि बेरोज़गारी की स्थिति में सुधार होने के साथ ही मुकम्मल लड़ाई छेड़ने का मौका हमारे हाथों से निकल गया है। इसमें अगर ऑक्युपाई आन्दोलन के कमज़ोर पड़ने की बात जोड़ दी जाए तो ऐसा आभास होता है कि इस व्यवस्था ने अपने आप को फिलवक्त स्थिर कर लिया है।

पूँजीवादी विचारधारा के खेमे के भीतर से एक बेमेल सी मगर पते की बात निकल कर आई है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमन ने, जो 'वैश्वीकरण' को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स के अपने साथी स्तंभकार थॉमस फ्रीडमन जितने ही प्रतिबद्ध हैं, पंचकोटि महामनी वाला सवाल हाल ही में पूछा है: क्या प्रौद्योगिक उन्नति से नई नौकरियाँ तैयार होती हैं? यह शूमपेटर के सृजनात्मक विध्वंस (क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन) वाले सिद्धांत - जिसे कैपिटल के दूसरे खंड में वर्णित पूँजी संचयन चक्र (कैपिटल एक्युमुलेशन साइकल) का अश्लीलीकरण (वल्गराइजेशन) कहा जा सकता है - की मूल कल्पना है।

दिसंबर 2012 को अपने एक स्तम्भ में क्रुगमन ने अपना ध्यान सजीव श्रम के स्थान पर मशीनरी के उपयोग की तरफ मोड़ा, जिसे उन्होंने "पुराने अंदाज़ वाली लगभग मार्क्सवादी किस्म की बहस" करार दिया:

हाल ही में आई एक पुस्तक 'रेस अगेंस्ट दि मशीनमें एमआईटी के एरिक ब्रिंजल्फ़्सन और एंड्रयू मैकाफी तर्क देते हैं बहुत से क्षेत्रों की यही दास्ताँ है और इनमें अनुवाद और वैधानिक अनुसंधान (लीगल रिसर्च) जैसी सेवाएँ भी शामिल हैं। उनके द्वारा दिए गए उदाहरणों के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि बहुत सारे पेशे जो ख़त्म हो रहे हैं वे उच्च कौशल वाले और ऊँची तनख्वाहों वाले हैं; प्रौद्योगिकी का नकारात्मक असर केवल निचले दर्जे का काम करने वालों तक ही सीमित नहीं है।
फिर भी, क्या नवप्रवर्तन (इनोवेशन) और प्रगति से सचमुच ज़्यादातर मजदूरों का, या व्यापक रूप से सभी मजदूरों का नुकसान होता है? अक्सर ऐसे दावे सुनाई पड़ते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता। मगर हकीकत यह है कि ऐसा हो सकता है और गंभीर अर्थशास्त्री इस संभावना से पिछली दो सदियों से वाकिफ हैं।

27 दिसंबर को 'इस ग्रोथ ओवरशीर्षक वाले अपने एक कॉलम में  क्रुगमन ने पूँजीवादी कट्टरपंथियों के समक्ष एक और गंभीर चुनौती पेश की। इसमें रॉबर्ट गॉर्डन नाम के एक अर्थशास्त्री के शोध का ज़िक्र किया गया है।

हाल ही में नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के रॉबर्ट गॉर्डन के इस तर्क से सनसनी फैल गई कि आर्थिक विकास के तेज़ी से धीमे पड़ते जाने की सम्भावना है- हो सकता है कि विकास का युग जिसकी इब्तिदा अठारहवीं सदी में हुई थी वह सचमुच ख़त्म होने वाला है। गॉर्डन ध्यान दिलाते हैं कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास एक स्थिर और नियमित प्रक्रिया नहीं रही है; और वह कई सारी अलग-अलग "औद्योगिक क्रांतियों' से चालित रहा है जिनमें से हरेक किसी विशेष प्रौद्योगिकी समुच्चय (सेट ऑफ़ टेक्नॉलॉजीज़) पर आधारित थी। पहली औद्योगिक क्रान्ति ने, जो मुख्य रूप से भाप के इंजन पर आधारित थी, अठारहवीं सदी के आखिरी और उन्नीसवीं सदी के शुरूआती दौर में विकास को गति प्रदान की। मुख्यतः विद्युतीकरण, आतंरिक दहन (इन्टरनल कम्ब'शन) और रासायनिक इंजीनियरिंग जैसी प्रौद्योगिकियों में विज्ञान की प्रयुक्ति से मुमकिन हो पाई दूसरी औद्योगिक क्रान्ति 1870 के आसपास शुरू हुई और उसने 1960 के दशक तक विकास को गति दी। तीसरी औद्योगिक क्रान्ति, जो सूचना प्रौद्योगिकी पर केन्द्रित है, हमारे वर्तमान युग का निर्धारण करती है।

अगर यह सच है तो मार्क्सवाद के समक्ष अभूतपूर्व परिस्थितियाँ खड़ी हैं। जब कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो लिखा गया था तब पूँजीवाद हरसू उत्पादन के साधनों में इंकलाब ला रहा था।

सभी उत्पादन उपकरणों में तीव्र सुधार और अत्यंत सुगम बनाए गए संचार-साधनों के ज़रिये बुर्जुआ वर्ग सभी, यहाँ तक कि बर्बर से बर्बर राष्ट्रों को भी सभ्यता की परिधि में खींच लाता है। उसके जिंसों के सस्ते दाम से, जो उसके लिए एक भारी तोपखाना है जिसकी मदद से वह सभी चीन की दीवारों को ढहा देता है और विदेशियों के प्रति बर्बर जातियों की अत्यंत अदम्य घृणा को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देता है। वह प्रत्येक राष्ट्र को, अन्यथा विलुप्त हो जाने के भय से, बुर्जुआ उत्पादन प्रणाली अपनाने के लिए मजबूर करता है; वह उन्हें मजबूर करता है कि वे अपने बीच उस चीज़ को दाखिल करें जिसे वह सभ्यता कहता है, अर्थात खूद बुर्जुआ बन जाएँ। संक्षेप में, वह अपने ही साँचे में ढली दुनिया का निर्माण करता है।

लेकिन अगर यह "भारी तोपखाना" महज एक फूँकनी में तब्दील हो गया हो तो? जो अपनी बढ़ती आबादी (खासकर विकासशील देशों में) की ज़रूरतों का और विस्तार नहीं कर सकती ऐसी सामाजिक व्यवस्था के राजनीतिक परिणाम क्या हैं? वामपंथी केन्सवादी अर्थशास्त्री जोअन रॉबिन्सन ने एक बार लिखा था,"...पूँजीपतियों द्वारा शोषण किए जाने का दर्द उस दर्द के आगे कुछ भी नहीं जो शोषण बिलकुल न होने से उपजता है।" अगर मेहनतकश लोग वेतन दास (वेज स्लेव) होने की आशा नहीं कर सकते, तो जिस सामाजिक व्यवस्था के साथ उन्होंने सदियों से समझौता कर रखा है उसके साथ मुकाबला करने के अलावा उनके पास और क्या विकल्प हैं? अरब बसंत को निरंकुश सत्ताओं के खिलाफ खड़े हुए आन्दोलन के तौर पर देखने की तमाम (और दुरुस्त) प्रवृत्तियों के बीच जीवन की बुनियादी ज़रूरतें मुहैया कराने में पूँजीवाद की मूलभूत विफलता ने ही विद्रोह को हवा दी है। जब ट्यूनीशिया में सड़क पर ठेला लगाने वाले शख्स ने आत्मदाह किया तो यह उसका तरीका था यह कहने का कि यह व्यवस्था उसके लिए कारगर नहीं रही है। जब एक यूनानी पेंशनभोगी आदमी ने पिछले साल संसद भवन के सामने अपनी जान दी, तो वह ऐसा ही वक्तव्य दे रहा था।

एक ऐसे दौर में जब 1930 के दशक के बाद पहली बार वर्गभेद और तीक्ष्ण होते जा रहे हैं, मार्क्सवादी वाम को अपनी सलाहियत साबित करनी होगी। ह्यूगो शावेज़ की अगुवाई में लातिन अमेरिकी वामपंथियों द्वारा रखी गई इक्कीसवीं सदी के समाजवाद (ट्वेंटी-फर्स्ट सेंचुरी सोशलिज्म) की माँग को ध्यान में रखकर हमें गौर करना होगा कि अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन या फ्रांस जैसे देशों के क्रांतिकारियों के लिए इस बात के क्या मायने हैं। हालाँकि इन देशों में मेहनतकश तबका तुलनात्मकरूप से निष्क्रिय बना हुआ है (जो मुख्यतः उस विऔद्योगिकरण का नतीजा है जिसको लेकर क्रुगमन चिंतित हैं), मगर इसमें शुबहा नहीं कि संघर्ष जारी रहेंगे भले ही वे वह भूमिका न अख्तियार करें  जो उन्होंने 1930 के दशक में की थी। इसका पहला संकेत क्युपाई आन्दोलन था और हमें इसके आगामी आविर्भावों को लेकर सचेत रहना होगा। शासक वर्ग हमको लेकर तैयार है और आगामी महत्त्वपूर्ण लड़ाइयों के लिए हमारा उतना ही तैयार रहना लाजिमी है।
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(न्यूयॉर्क में रहने वाले लूई प्रोयेक्ट जाने-माने वामपंथी विचारक-लेखक, एक्टिविस्ट और ब्लॉगर हैं। वे दुनिया भर के वामपंथियों में लोकप्रिय ईमेल समूह 'मार्क्समेल' के मॉडरेटर भी हैं। यह आलेख उन्होंने हमारे आग्रह पर ख़ास समयांतर के लिए लिखा है।- भारत भूषण तिवारी, अनुवादक

*समयांतर  के वामपंथ  केन्द्रित विशेषांक से साभार 

सोमवार, 6 अगस्त 2012

आज़ादी का आंदोलन और भारतीय मुसलमान


पिछले दिनों प्रोफ़ेसर शांतिमय रे की किताब 'फ्रीडम मूवमेंट एंड इंडियन मुस्लिम्स' का अनुवाद किया। इसी से एक हिस्सा...
किताब अब उपलब्ध है सो उसका कवर भी लगा  रहा हूँ. नेशनल बुक ट्रस्ट से मात्र ८०/ रुपये में ख़रीदी जा सकती है 



राष्ट्रवाद के उभार का दौर (1857-1905)   


1857 से 1905 के बीच के दौर को उभरते भारतीय राष्ट्रवाद का दौर कहा जा सकता है. मुस्लिम समुदाय का तीखा साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष 1871 तक अपना दौर पूरा कर चुका था. विद्रोह के बाद के दमन के दौरान वहाबियों ने आर-पार की अपनी अंतिम लड़ाई लड़ी और गुलामी की चांदी की जंजीर पहनने की जगह अंडमान के सेल्यूलर जेल की काल-कोठरियाँ चुनीं.
1858 के महारानी विक्टोरिया के घोषणापत्र के साथ भारत में ब्रिटिश राज में मानीखेज परिवर्तनों के चिन्ह दिखाई देने लगे.
(1) भारतीय समाज में हिन्दू और मुस्लिम के नाम पर, और हिन्दूओं के बीच ऊंची जातियों, जैसे ब्राह्मण और नीची जातियों, जैसे चांडाल के नाम पर उपस्थित व्यापक विभेद पर ध्यान देते हुए यह तय किया गया कि रोमन साम्राज्य की तरह ब्रिटिश शासन को कायम रखने के लिए बांटो और राज करो की नीति अपनाई जाय.[1] 
(2) व्यवहारिक राजनीति के सन्दर्भ में ब्रिटिश अधिकारियों के एक हिस्से ने मुस्लिमों के उच्च वर्ग के हितों के समर्थन करने की नेतृत्वकारी भूमिका अपना ली, जिससे कि वे प्रशासनिक पदों में अपना वाजिब हिस्सा और 1861 के कौंसिल एक्ट के ढाँचे में राजनीतिक महत्व प्राप्त कर सकें.[2]
(3) यही वह वक़्त था जब विलियम हंटर ने अपनी प्रसिद्ध किताब द इन्डियन मुसलमान लिखी और अब्दुल लतीफ ने 1850 के दशक के अंत में मुस्लिम लिटरेरी सोसायटी शुरू की थी. कर्नल बीक के साथ सर सैयद अहमद ने 1876 में अलीगढ़ में एंग्लो-ओरिएंटल कालेज का आरम्भ किया.[3]
(4) इस बाबत गंभीरता से तय किया गया कि पुराने सामंती रिश्तों में कोई व्यवधान नहीं पैदा किया जाएगा और पुराने पड़ चुके मूल्य-मान्यताओं और भारतीय लोगों की युगों पुरानी अंध-विश्वासी प्रथाओं से कोई छेड़छाड़ नहीं की जायेगी.[4]
(5) इलियट, डावसन, एल्फिन्स्टोन और ब्रिग्स जैसे पूर्व-नागरिकों को भारत में मुस्लिम शासन के इतिहास के बारे में हिंदुओं के ऊपर मुस्लिम अत्याचार के रूप में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिसमें राजपूतों और मराठों ने वीरतापूर्ण प्रतिरोध दर्ज किया. टाड की एनाल्स आफ राजस्थान आरंभिक हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए काफी हद तक अपने भावनात्मक संघटन के निर्माण हेतु सबसे अधिक इच्छित पुस्तक बन गयी.[5]
(6) यह दौर राजा राम मोहन राय, डेराजियो, रेव कृष्णा मुखर्जी, अक्षय कुमार दत्ता, इश्वर चन्द्र विद्यासागर, माइकल मधुसूदन दत्त और अन्य द्वारा मुख्यधारा के राष्ट्रवाद में विभिन्न प्रणालियों में विपथन का भी गवाह है. जब मैक्समूलर ने आर्यों की महिमा को पुनरुज्जीवित किया तो इसे उत्साहपूर्वक स्वीकार किया गया और इसका प्रचार किया गया. राजनारायण बोस ने एक हिन्दू मेला आयोजित किया और हिन्दू धर्मेर श्रेष्ठता नामक किताब भी लिखी.[6]
(7) जबकि नील विद्रोह (1859) की आग मद्धम पड़ रही थी और वहाबी विद्रोह की आखिरी चिंगारियां भी बुझ रही थीं तो पंजाब में राम सिंह कूका एक छोटा सा धार्मिक मुद्दा उठा कर पंजाब के दबंग किसानों को आंदोलित कर रहे थे जो भू वितरण के मुद्दे  पर पहले से ही असंतोष के शिकार थे. बाबा रामसिंह कूका अपने एक सौ अड़तालीस अनुयायियों के साथ तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिए गए.[7] केवल छः साल बाद महाराष्ट्र के एक और नेता बलवंत फड़के (1876-78) ने धार्मिक बाने में इब्राहिम खान के साथ मिलकर फिरंगी राज से देश को मुक्त कराने के लिए महाराष्ट्र के किसानों को संगठित किया. इसका भी दमन कर दिया गया. लेकिन इसकी धार्मिक रंगत प्रभावी थी.
(8) यह वह दौर था जब दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की और वेदों तथा उपनिषदों की श्रेष्ठता पर जोर देते हुए हिंदुओं के पुनर्जागरण पर ध्यान दिया. बंकिम चन्द्र चटर्जी, विवेकानंद और उनकी शिष्या बहन निवेदिता ने उभरते राष्ट्रवाद को  एक नया अर्थ, अंतर्वस्तु और नई दिशा दी. हिन्दू बौद्धिक वर्ग के बीच, खासतौर पर वे जो निम्न मध्यवर्ग से आते थे उनके बीच हिन्दू मिथकीय पदों और मुहाविरों का पूरे उत्साह के साथ और जोश-ओ-खरोश से प्रचारित किया गया.
(9) यह एक ऐसा माहौल था जिसमें आरम्भिक संवैधानिक विरोध आंदोलनों ने अपना आकार ग्रहण किया जब शिशिर कुमार घोष और उनकी प्रसिद्ध अमृत बाजार पत्रिका ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सुरेन्द्र नाथ बंदोपाध्याय ने आनंद मोहन बोस के साथ इन्डियन एसोसियेशन (1876) की स्थापना की. 1870 के दशक में इस तरह के संगठन पूरे देश में, खासतौर पर बम्बई, मद्रास और बाद में लाहौर में स्थापित किये गए.जब 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ तो प्रभावी राष्ट्रीय माहौल हिन्दू पुनरुत्थानवादी स्वर से भरा हुआ था.

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यहाँ हमें थोड़ी देर के लिए ठहरना चाहिए और मुस्लिम मष्तिष्क के पुनर्विचार की प्रक्रिया की ओर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रयास करना चाहिए.
एक आधुनिक इतिहासकार ने मुस्लिम मस्तिष्क को ब्रिटिश समर्थक तथा ब्रिटिश विरोधी की जगह आधुनिक तथा पारंपरिक के रूप में विभाजित किया है.[8] ब्रिटिश समर्थक मुस्लिम नेताओं में अब्दुल लतीफ, सर सैयद अहमद और आमिर अली को विशिष्ट प्रवृति की तरह समझा जा सकता है. ये सभी मुसलमानों, खासतौर पर ढहते हुए कुलीन तंत्र और उनके परिजनों तथा पुरोहित वर्ग, जिसे उलेमा कहा जाता है उनकी अथाह कुंठा के कारण संत्रासग्रस्त थे. इन सभी ने वहाबियों के आत्मघाती प्रतिरोध का विरोध किया और खासतौर पर उलेमाओं के नकारात्मक रवैये का.
उन सभी ने ब्रिटिश शासन को मुक्ति के रूप में स्वीकार करने गंभीर अपील की और मुसलमानों को फारसी की जगह अंग्रेजी को वरीयता देते हुए पश्चिमी ढंग से शिक्षित करने के अथक प्रयास किये.
अब्दुल लतीफ ने कलकत्ता में लिटरेरी सोसायटी (1859) शुरू की, सर सैयद ने अलीगढ़ में 1875 में एंग्लो-ओरिएंटल कालेज शुरू किया. सैयद आमिर अली की प्रसिद्ध किताब द स्प्रिट आफ इस्लाम और द हिस्ट्री आफ सारासेन ने शिक्षित मुसलमानों में उनकी प्राचीन धरोहर के बारे में नया आत्मविश्वास पैदा किया. हालांकि उनमें से सभी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बहिष्कार के लिए, क्योंकि उस पर हिन्दू राष्ट्रवादियों का प्रभाव था, पुरजोर अपील की बावजूद इसके उन्होंने भारत को भारतीय मुसलमानों की मातृभूमि के रूप में स्वीकार किया और अपनी सामाजिक तथा सांस्कृतिक जिंदगी में स्पष्ट सेकुलर दृष्टिकोण अपनाया. वे कुरआन और हदीस को तेजी से बदलती दुनिया की रौशनी में नए अभिसंस्करण देना चाहते थे.[9] 
अंग्रेजी सरकार ने मुस्लिम अभिजात वर्ग को सर सैयद अहमद, अब्दुल लतीफ और सैयद आमिर अली द्वारा शुरू किये गए अंग्रेजी पढ़ने के रास्ते पर प्रवृत करने के लिए हर संभव सहायता दी. 1860 से 1905 के दौरान ब्रिटिश प्राधिकारियों के प्रत्यक्ष संरक्षण में  एक शिक्षित मुस्लिम बौद्धिक वर्ग उभरा. वे उभरते हुए राष्ट्रवाद तथा कांग्रेस द्वारा रखी गयीं राष्ट्रीय मांगों के खिलाफ अंग्रेजों के सहयोगी बने.
उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ थे वे उनके सहयोगी बन गए, और जो उनके सहयोगी थे वे विरोधियों में बदल गए.
मुस्लिम नवजागरण केवल अंग्रेजी शिक्षा तक ही सीमित रह गया. उनके पास आम तौर पर किसी विचारधारात्मक संघर्ष का अनुभव नहीं था जिससे वे इस्लाम की सीमाओं से पार जा पाते.
लेकिन यह कहना गलत होगा कि मुस्लिम आधुनिकतावादियों के अलावा और कोई चिंतन प्रक्रिया नहीं थी. मुस्लिम समुदाय की महान औलादें, जो परम्परावादी उलेमाओं के नाम से बेहतर जानी जाती थीं, अपने समुदाय के पूर्वाग्रहों और अवरोधों को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए सामने आये और तात्कालिक साम्प्रदायिक लाभ से आगे बढकर भारत के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का हिस्सा बने जिसके लिए वे इतिहास में एक बाहक पहचान की बिलाशक मांग कर सकते हैं.
दारुल उलेमा ने भारतीय मुसलामानों के धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक जीवन में जो भूमिका निभाई है वह उन उद्देश्यों और लक्ष्यों के सन्दर्भ में वैधानिक रूप से व्याख्यायित किया जा सकता है जो इनके संस्थापकों ने विद्रोह के दिनों में तय किये थे.[10]
वस्तुतः शामली और देवबंद एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं. अंतर सिर्फ हथियारों में है. अब तलवार और भाले की जगह कलम और जबान ने ले ली. जहाँ शामली में राजनीतिक स्वतंत्रता और धर्म तथा संस्कृति की आजादी के लिए हिंसा को माध्यम बनाया गया वहीं देवबंद में इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शांतिपूर्ण तरीकों से सहारे एक शुरुआत की गयी. हालांकि रास्ता एक दूसरे से अलग जाता हुआ दिखता है लेकिन ले एक ही मंजिल की तरफ जाता है. यह बिलाशक एक महान उपलब्धि थी और उन मुसलमानों की जीवन्तता और उनका उत्साह काबिल-ए-गौर था, जो 1857 के दुर्भाग्यशाली दिनों के थोड़े दिनों के बाद और अत्यंत हतोत्साहकारी परिस्थितियों में भी आधिकारिक ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था द्वारा खतरे में डाल दिए गए अपने धर्म तथा अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए नए रास्ते तलाशने की नए सिरे से फिर से कोशिशें कर रहे थे.[11]
दारुल उलेमा देवबंद के संस्थापक फराजिया आंदोलन के दिनों के क्षुब्ध मुसलामानों की विद्रोही चेतना का प्रतिनिधित्व करते थे. वे 1857 की अपनी विफलता के बाद के उत्पीडन के आगे न झुकने के के लिए कटिबद्ध थे और विनाशकारी निष्क्रियता से डरते थे.
दारुल उलेमा देवबंद के संस्थापकों ने विद्रोह में सक्रिय हिस्सेदारी की, दिल्ली के बाहर की जनता को संगठित किया और कुछ समय के लिए जिस क्षेत्र में वे कार्य कर रहे थे वहाँ से अंग्रेजों को बाहर करने में कामयाब भी रहे. उनकी गतिविधियों का केन्द्र वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले के पास का एक छोटा सा कस्बा शामली था जो दिल्ली से नजदीक ही था. हाजी इमादुल्लाह (1817-99), जो विद्रोह के असफल होने के बाद मक्का चले गए, शामली में जेहाद के इमाम थे और मौलाना मोहम्मद कासिम (1832-80) और राशिद अहमद गंगोबी (1828-1905) ने फौजों के सेनाध्यक्ष की भूमिका निभाई. कादी मौलाना मदनी ने नक़्श-ए-हयात के खंड दो में विद्रोह के दौर के उनके बहादुर कारनामों की एक रोचक और प्रामाणिक रिपोर्ट दी है और वह विद्रोह के दमन के बाद के अंग्रेजों के बेरहम प्रतिशोध के पंजों से उनके भाग्यशाली तरीके से बच निकलने के किस्से का बयान करते हैं.[12]
वे इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि ब्रिटिश शासन, जो अब पहले से अधिक शक्तिशाली था, उनके अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विरासतों के आदर्शों के मुताबिक़ रहने के प्रयासों में कोई सहायता नहीं करने जा रहा था. न ही वे समझौतों और तुष्टीकरण की नीति में भरोसा करते थे, फिर भी उन्हें आगे बढ़ना था और वे सारे सरकारी हस्तक्षेपों को खारिज करते हुए और ईश्वरीय सहायता तथा अपने साथियों की निष्कपट धार्मिकता के भरोसे स्वतन्त्र रूप से आगे बढे, और खुद को अर्ध एकेश्वरवादी और आधे मध्यकालीन गोपनीय मुस्लिम समितियों की तरह संगठित किया. यह दारुल उलूम के शिक्षकों और छात्रों तथा शिक्षित भूस्वामी कुलीन वर्ग का एक भूमिगत संगठन था. दारुल उलूम के शैक्षणिक प्रयासों पर धार्मिक प्रतिबंधों के उसके राजनैतिक उद्देश्यों के साथ अंतर्विरोध पैदा हुए. लेकिन धार्मिक समितियों के ब्रिटिश विरोधी चरित्र ने, जिसने 1857-58 के विद्रोह की परम्पराओं को बचा कर रखा, धार्मिक एकांगीपने से उभरने और मुक्ति आंदोलन में विभिन्न जातियों और धर्मों के लोगों के प्रयासों को एकताबद्ध करने की वस्तुनिष्ठ ज़मीन प्रदान की. देवबंद केन्द्र कांग्रेस की ओर झुका और पहले विश्वयुद्ध के वक़्त भारतीय राष्ट्रीय बुर्जुआजी के रेडिकल हिस्से के साथ था.[13] 


[1] देखें, स्ट्राची के सेक्रेटरी आफ स्टेट को लिखे पत्र, डा एन एल गुप्ता की किताब नेहरू एंड कम्यूनलिज्म से उद्धृत, पेज-32 
[2] देखें,कैंटवाल स्मिथ, माडर्न इस्लाम इन इंडिया, पेज-190
[3] देखें, वही, पेज -192
[4] वही,पेज -192
[5] वही
[6] वही
[7] देखें, कूका आंदोलन, फंजा सिंह बाजवा, पेज-177,176   
[8] देखें, हिस्ट्री आफ फ्रीडम मूवमेंट, डा ताराचंद, खंड III, पेज-178, कैंटवाल स्मिथ, वही पेज-42,

[9]देखें, वही डा ताराचंद, वही, कैंटवाल स्मिथ, पेज-46-48
[10] देखें, देवबंदी और पाकिस्तान की माँग, डा फारुकी, पेज-50
[11]देखें, वही, डा ताराचंद, खंड III, पेज-256
[12] देखें, वही, डा फारूकी, पेज-22
[13] देखें, ए हिस्ट्री आफ पकिस्तान, वाई वी गैन्कोव्यसकी, एल आर गार्डन-पोलोंस्काया