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मंगलवार, 6 मार्च 2012

मौजूदा इरान संकट: क्या करें वाम-जनवादी ताकतें?



  • शमशाद इलाही 'शम्स'


इरानी परमाणु कार्यक्रम के चलते उसके पश्चिम के साथ बढ़ते अन्तर्विरोधों के मद्देनज़र तीसरी दुनिया के देशों में इरान के प्रति बढ़ती हमदर्दी एक गंभीर वैचारिक समस्या है. खासकर भारत की प्रगतिवादी-जनतांत्रिक ताकतें, अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों के विरोध के चलते इरानी सरकार के पक्ष में समर्थन जुटाने के ऐतिहासिक बोझ को ढोने का कार्य करती प्रतीत होती हैं. यही  काम उन्होंने इराकी तानाशाह सद्दाम के लिये किया था और यही लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफ़ी के लिये. इनके विरोधी सुरों के साथ  शिया इस्लामी बुनियाद परस्तों की आवाज़ें भी सुनी जा रही हैं, क्या यह नया राजनीतिक समीकरण है जिसमें वाम, लोकतांत्रिक शक्तियाँ राजनीतिक इस्लामी फ़ासीवादी शक्तियों के साथ एकजुट होंगी?

मौजूदा इरानी नेतृत्व को इरान की जनवादी और कम्युनिस्ट ताकतों को ठण्डे दिमाग से एक-एक कर कब्रिस्तान भेजने के गुनाह से क्या माफ़ कर दिया गया है? क्या इरानी सरकार अपनी परमाणु नीति के चलते अपने समाज के लोकतांत्रिकरण के किसी  ऐतिहासिक विशाल ऐजेण्डे पर काम कर रही है? क्या उसका परमाणु कार्यक्रम इरान में ज़मीदारी, इज़ारेदारी, बेरोज़गारी का खात्मा करने का कोई ऐसा दिव्य बल्यु प्रिंट तैयार कर रहा जिसे मानव जाति ने पहले कभी प्रयोग नहीं किया? क्या धर्म आधारित इरानी सरकार का जनविरोधी स्वरुप अब बदल गया है? क्या वहाँ की आवाम को जनवादी अधिकार, महिलाओं को  आत्मनिर्णय के अधिकार, समाज में व्यापक मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, जेलों में सड़ रहे हजारों राजनीतिक विरोधियों की मुक्ति, शरिया जैसे आदिम बर्बर कानूनों से मुक्ति जिनकी आड़ में राजनीतिक विरोधियों का अक्सर दमन (सरेआम फ़ांसियाँ देकर) किया जा रहा है, आर्थिक विषमतायें,स्वास्थ, परिवहन, शैक्षणिक विषमतायें, व्यापक भ्रष्ट्राचार, सरकारी खुफ़िया तंत्र/पुलिस से भयमुक्त समाज जैसे मूलभूत प्रश्नों को हल कर लिया गया है?

आईये आपको १९७९ की इरान की इस्लामी क्रांती के बाद हुए राजनीतिक दमन का एक नज़ारा करा दिया जाये, मुल्लाहों की सत्ता पर पकड़ मज़बूत होते ही इरानी ब्राण्ड के इस्लामी फ़ासीवाद ने अपने उस्ताद हिटलर के नक्शे कदम पर चलते सबसे  पहले अपने राजनीतिक विरोधियों की धर पकड़ शुरु की, जिसमें मुजाहिदीने ख़ल्क और तुदेह पार्टी सबसे पहले नंबर पर निशाना बनी, दोनों दलों के हजारों नेताओं, कार्यकर्ताओं, समर्थकों को पकड़ कर ऐविन और गौहर दश्त नाम की जेलों में ठूँस दिया गया, यह घटना १९८२ की है जब इरानी नेतृत्व ने एक सोची समझी नीति के साथ पूरे देश में अपने राजनीतिक विरोधियों के सफ़ाये का राष्ट्रीय अभियान चलाया. ध्यान रहे मुजाहिदीने ख़ल्क की स्थापना १९६५ में हुई थी और उसके द्वारा चलाये गये राजशाही के खिलाफ़ संघर्षों और कुबार्नियों का एक बड़ा इतिहास रहा है, इरान की मुल्लाह सरकार ने जेलों में बंद इस दल के कार्यकर्ताओं से काग़ज़ी कार्यवाही के तहत जो फ़ार्म भरवाये थे, उनकी कुछ लाईनें आपके सामने  नीचे दी जा रही हैं:-

* क्या  तुम अपने पुराने सहयोगियों के सार्वजनिक त्रिस्कार की इच्छा रखते हो?
* क्या तुम यह काम कैमरे के सामने कर सकते हो?
* क्या तुम उन्हें पकड़वाने में सरकार की मदद करोगे?
* क्या तुम हमें अपने गुप्त समर्थकों की सूची दोगे?
* क्या तुम हमें उन सहयोगियों के नाम दोगे जिन्होंने सरकार के समक्ष दिखावटी पश्च्यताप किया है?
* क्या तुम दुश्मन के खिलाफ़ युद्ध के मोर्चे पर जाओगे और बारुदी सुरंगों वाले इलाके से भी गुजरोगे?

दूसरे नंबर के खतरनाक राजनीतिक कैदी थे, तुदेह पार्टी के नेता और उसके कार्यकर्ता, तुदेह पार्टी की कुर्बानियाँ, शाह पहलवी शासन के विरुद्ध उसके शहादत भरे संघर्ष शायद तीसरी दुनिया में चल रहे किसी भी मुक्ति संघर्षों और तहरीकों से कमतर नहीं थे. इरान में कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास १९०६-७ से आरंभ हुआ, १९१७ में  इन्हीं तत्वों ने अदालत पार्टी बनायी, १९२० में विधिवत रुप से इसका नाम बदल कर कम्युनिस्ट पार्टी इरान रख दिया गया था, १९२१ से ३० के बीच शाह शासन के दमन के चलते पार्टी को लगभग खत्म ही कर दिया गया था. १९४१ तक आते आते फ़िर इरानी समाज के क्रांतिकारी तत्वों ने करवट ली और तुदेह पार्टी को जन्म दिया. तुदेह पार्टी के सदस्यों को इरानी इस्लामी सरकार ने जेल में जो फ़ार्म भरने के लिये दिये, उनकी कुछ लाईनें ज़ेरे ग़ौर हैं:-

* क्या तुम मुसलमान हो?
* क्या तुम खु़दा में यकीन रखते हो?
* क्या पवित्र कुरान खुदा के वचन हैं?
* क्या तुम जन्नत और दोज़ख़ में यकीन करते हो?
* क्या तुम पैगंबर मौहम्मद को आखिरी रसूल मानते हो?
* क्या तुम ऐतिहासिक भौतिकवाद को सार्वजनिक रुप से खारिज करोगे?
* क्या तुम अपने पुराने विचारों को कैमरे के समक्ष खारिज कर सकते हो?
* क्या तुम रमज़ान रखते हो?
* क्या तुम नमाज़ पढ़ते हो, कुरान शरीफ़ पढ़ते हो?
* क्या तुम किसी मुस्लिम अथवा गैर मुस्लिम के साथ जेल की सेल में रहना पसंद करोगे?
* क्या तुम इस बात का हलफ़ उठाते हो कि तुम खुदा में, कुरान में, पैगंबर में और कयामत में भरोसा रखते हो?
* तुम्हारे बचपन में तुम्हारे माता पिता क्या रोज़ा रखते, नमाज़, कुरान आदि पढ़ते थे?

इन सवालों के मद्देऩज़र आप इस बात का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि एक प्रगतिशील दिमाग उपरोक्त मध्यकालीन, बेहूदा सवालों का क्या जवाब देगा? जेल में जवाब देने वाले कार्यकर्ताओं-नेताओं को यह भी नहीं मालूम था कि उनके द्वारा दी गयी जानकारियों को एक साक्षात्कार की शक्ल दे दी जायेगी. एकतरफ़ा अदालती फ़ैसला लेकर उन्हें सीधे फ़ांसी के तख़्ते पर भेजने का आयोजन इस्लामी फ़ासीवाद कर चुका था. सही गिनती कोई नहीं जानता, एमनेस्टी और दिगर मानवाधिकार संगठनों के अनुमान के मुताबिक १९८२-८३ में मुजाहिदीने ख़ल्क और तुदेह पार्टी के  १० से ३० हजार पार्टी कार्यकर्ताओं को पूरे इरान में फ़ांसी दी गयी. इरानी सरकार ने  इन देशभक्त शहीदों को कहाँ दफ़न किया, यह एक साल के बाद उन परिजनों को ही बताया जिनसे हुकुमत ने एक खास समझौते पर हस्ताक्षर करवा लिये. समझौते में यह सब धारायें थी कि आप सार्वजनिक रुप से कोई सोग अथवा प्रचार नहीं करेंगे, कोई धार्मिक आयोजन नहीं करेंगे आदि आदि. इस "राजनीतिक सफ़ाई" का नतीज़ा यह  हुआ कि आज इरान में किसी भी विपक्षी पार्टी का कोई नेता अपने देश में नहीं है, ये सभी निर्वासित जीवन बिताने को मजबूर हैं. इरान में इस वक्त जो विपक्ष की भूमिका निभा रहा है वह सरकारी पक्ष का वह खेमा है जिसे सुधारवादी कहा जाता है. आज लगभग ७.५ करोड़ इरानी आबादी का एक बडा हिस्सा अपना देश छोड़ कर दूसरे देशों में रहता है जिसकी संख्या तकरीबन ४० से ५० लाख के बीच आंकी जाती है.

इरान की इस्लामी क्रांति के बाद इस तथ्य से कौन वाकिफ़ नहीं कि इरानी नेतृत्व ने अपने किस्म के (शिया) इस्लामी इंकलाब लाने का खुलेआम आह्वान अपने पड़ौसी देशों (इराक, कुवैत, सऊदी अरब आदि) की जनता से नहीं किया? खुमैनी की तकरीरें आज भी इस बात की शहादत हैं कि उसके उत्तेजक विचारों ने अपने पड़ौस की हुकूमतों को असुरक्षित ही नहीं किया बल्कि तत्कालीन इराकी उप-प्रधानमंत्री तारिक अज़ीज़ पर कथित कातिलाना हमला करवा कर उन्हें अस्थिर भी करने की कोशिश की, इरान के इसी धार्मिक कट्टरवाद के चलते इरान-इराक का युद्ध १९८०-१९८८ तक चला जिसमें लगभग १० लाख इरानियों ने जानें गवाईं, इरानी जनता को इस भयंकर खूनी युद्ध में न केवल बेशकीमती इंसानी जिंदगियों की बर्बादी झेलनी पड़ी वरन उसे लगभग ६०० अरब डालर की आर्थिक हानी भी उठानी पडी.

इस्लामी इरान के उपरोक्त खूनी इतिहास के मद्देनज़र क्या उसकी परमाणु महत्वकाँक्षाओं को शक की नज़र से नहीं देखना चाहिये? अब जबकि इरान के चिर-परिचित दुश्मन इराक का सफ़ाया हो चुका है लेकिन इरान में अभी उसी इरानी किस्म के इस्लामी विस्तारवादी विचारधारा का सामुहिक सम्मोहन मौजूद है जिसे महमूदनिजाद और सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह खामनेई के भाषणों से  भलिभांति समझा जा सकता है. इरान का मौजूदा नेतृत्व शातिराना ढ़ग से तीसरी दुनिया के देशों से अपनी एकजुटता के नाम पर अपने परमाणु कार्यक्रम के बचाव में आम सहमति लेने में जुटा है, इसमें वह सफ़ल होता भी दिख रहा है. इरान की क्षेत्रिय ताकत बनने की महत्वकाँक्षा अभी दबी-छिपी नहीं हैं. यह बात संयुक्त अरब अमीरात (जिसके तीन द्वीपों को इरान अपना बताता है), सऊदी अरब, कुवैत, बाहरीन, कतर, यमन आदि को भी समझ में आती हैं, यही कारण है कि इरानी परमाणु कार्यक्रम से इस्राईल को इतनी परेशानी नहीं जितनी इन मध्य एशियाई शाही हुक्मरानों को है. इरानी कुटिल राजनीतिक चालों के तहत इस्राईल पर राजनीतिक हमला, द्वितीय विश्वयुद्ध में यहूदियों के कत्लेआम को झुठलाने के पीछे उसके कुत्सित इरादे साफ़ हैं, और वह यह है कि उसे पूरी दुनिया के मुसलमानों का नेता बनना है. उसे दुनिया के मुसलमानों को सऊदी प्रभाव (वहाबी-सलफ़ी) से मुक्त करा कर उन्हें  शिया-सफ़विद छाप इस्लामी एजेंडे पर लाना है, इसका प्रमाण आप लेबनान में हिज़्बोल्लाह को २००६ से अब तक दी गयी मदद से देख सकते हैं. इसी एजेण्डे के तहत भारत-पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान में शिया मदरसों, शिक्षण संस्थाओं और काले मुसाफ़े लगाये शिया धार्मिक गुरुओं की आयी अचानक बाढ़ से अंदाज़ा लगा सकते हैं. यही नहीं अब इरानी प्रभाव को अफ़्रीकी महाद्वीप पर भी देखा जा सकता है. मिस्र से लेकर नाईजीरिया तक इरानी किस्म के इस्लाम की छाप और उससे जुड़ी गतिविधियों पर आँख मूँद कर  यदि कोई मौजूदा इरानी सरकार के परमाणु कार्यक्रम का बचाव करता हैं, तब इसे आत्महत्या का एक आसान राजनैतिक रास्ता ही कहा जायेगा.

आज यूरोप के कई देशों में जहाँ परमाणु सयंत्रों पर सवाल उठाये जा रहे हैं, जर्मनी जैसा देश परमाणु उर्जा सयंत्रों को बंद करने का ऐलान कर चुका है, जापान इसके दंश भुगत कर इससे तुरंत मुक्ति पाना चाहता है, वहाँ इरान जैसे पिछडे देश द्वारा परमाणु उर्ज़ा सयंत्रों को विकसित करने की कोशिश इस बात की तरफ़ साफ़ इशारा करता है कि इसका मकसद उर्जा से संबंधित नहीं वरन परमाणु शक्ति बन कर क्षेत्रीय शक्ति बनना अधिक है. याद रहे भारत में परमाणु उर्जा के प्रश्न पर भारी बहस हुई थी, पिछली केंद्रीय सरकार जिसे वाम समर्थन हासिल था,  तत्कालीन भारत सरकार अमेरिकी  सरकार के साथ परमाणु संधि नहीं कर सकी थी क्योंकि इसका विरोध सहयोगी वाम दलों ने किया था, तब परमाणु उर्जा के विकल्प पर ही बडी बहस हुई थी, आज यही शक्तियाँ इरान द्वारा परमाणु उर्जा के सयंत्र की उपादेयता पर प्रश्न क्यों नहीं उठा रही हैं?
इराक से सद्दाम सरकार को उखाड़ देने के बाद इरान का अभी किसी पडौसी शक्ति से प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं रहा, अभी उसका पूरा ध्यान अपने किस्म के इस्लामी ब्राण्ड को प्रोत्साहित करने में लगा है. उसका इस्राईल के विरुद्ध बढ़ चढ़ कर बोलना, इस्राईल की बैसाखी पकड़ कर मुस्लिम जगत में स्वंय को नेता स्थापित करने का एक सचेतन प्रयास है. वह ऐसे किसी प्रसंग पर खामोश नहीं रहता जिसमें उसे इस्लामी जगत के मध्य खुद को एक विकल्प बताने का मौका मिलता है. मध्य ऐशिया में इरानी प्रभाव को सीमित करने की दिशा में स्थानीय राजाओं ने अपने तरीके से रणनीतियाँ बनायी हैं. सऊदी अरब में तीन  बड़े अमेरिकी फ़ौजी अड्डे हैं, अमीरात में अमेरिकी और फ़्रांसीसी सेना के स्थायी अड्डे हैं. बहरीन, यमन, कतर में अमेरिका के भारी सैन्य ठिकाने हैं. इरान के पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ किसी भी किस्म के सैन्य संघर्ष होने की स्थिती में इरान को सऊदी अरब, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कतर स्थित अमेरीकी सैन्य ठिकानों पर वार करना प्राथमिक एंव महत्वपूर्ण कार्यवाही होगा. ऐसी स्थिती में ये मध्य पूर्वी देश आसानी से इरान के किसी भी हमले को अपनी सरकारों के खिलाफ़ हमला बता कर पूरी दुनिया के मुसलमानों को यह संदेश दे सकते हैं कि इरान अपनी शिया विचारधारा को सुन्नी देशों के खिलाफ़ युद्ध के जरिये थोपना चाहता है. जाहिर है इरान के किसी भी प्रकार के हमले को अपनी अदम्य सैन्य क्षमता के चलते इस्राईल भलिभाँति झेलने की स्थिती में है, लेकिन अन्य अरब देशों पर यदि इरानी हमले होते हैं तब भारी जान माल के नुकसान की आशंका है. यहाँ यह तथ्य बताना प्रसांगिक है कि पूरी दुनिया के मुसलमानों की संख्या का मात्र १० प्रतिशत तबका ही शिया अकीदे में यकीन रखता है.

साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा इरान के विरुद्ध युद्ध के मंसूबों को रोकना एक बात है, इरानी की मौजूदा सरकार के परमाणु शक्ति और उसके अधिकार को समर्थन देना- दो परस्पर विरोधी बातें हैं. इरानी धर्मराष्ट्र का समर्थन करना, इसके बढ़ते भार को ढ़ोना वाम-जनवादी शक्तियों के कार्यभार कदापि नहीं हो सकते. वाम-जनवादी शक्तियाँ यदि ऐसा करती हैं तब उनके सरों पर इरान की मौजूदा सरकार द्वारा किये गये अपराधों को न केवल खुला समर्थन देने जैसा होगा बल्कि उन शहीदों के प्रति सरासर गद्दारी होगी जिन्होंने इरान को एक लोकतांत्रिक, जनवादी शक्ति बनाने का ख्वाब लिये अपने जीवन का बलिदान दिया. भला ऐसी स्थिती में कोई महमूदनिजाद की सरकार को कोई कैसे समर्थन दे सकता है? याद रहे, १९९१ के सोवियत पतन के बाद यही राजनीतिक इस्लाम अब पूँजीवाद के मुकाबिले खुद को एक विकल्प बताने में जुटा है, इस्लाम के जेहादी तत्व आज पूरी दुनिया में स्वयं को एक ग्रहणीय विकल्प बताने/साबित करने में जुटे हैं और किसी भी वक्त कम्युनिस्ट ताकतों के विरुद्ध संघर्ष में आने पर  यह तबका कोई रियायत नहीं बरतता. यह निर्ममता के साथ दुनिया भर में कम्युनिस्ट और वाम ताकतों को सूली पर चढ़ाता है. क्या हमारे साथी अफ़गान राष्ट्रपति नजीबुल्लाह की सरेआम फ़ांसी के दर्दनाक, बर्बर प्रसंग को भूल गये? क्या आप यह भूल गये कि कामरेड नजीबुल्लाह को मौत देने से पूर्व इन इस्लामी ताकतों ने उनके साथ क्या क्या किया था?

राजनीतिक इस्लाम के किसी भी स्वरुप चाहे वह शिया हो या सुन्नी, चाहे वह कितने भी क्रांतिकारी ढ़ग से अमेरिकी साम्राज्यवाद से लड़ रहा हो, उसका समर्थन एक भारी राजनीतिक भूल होगी, महमूदनिजाद से लेकर नसरुल्लाह तक, कथा वाचक ज़ाकिर नायक से लेकर मिस्र के ब्रदरहुड तक, वाम ताकतों को न केवल वैचारिक स्तर पर स्वंय को उन्नत, बेहतर और सफ़ल विकल्प साबित करना होगा, बल्कि इन मज़हबी ताकतों के तमाम हथकण्डों और उनकी मानव विरोधी कारगुज़ारियों को बेनकाब करते हुये, इन्हें परास्त करना होगा. युद्ध का विरोध किसान, मज़दूर, छात्र, बुद्धीजीवी मेहनकश तबके की एकता के जरिये जनता के विशाल बहुमत द्वारा ही किया जा सकता है, हमारे लिये संघर्ष के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, सिर्फ़ संघर्ष के माध्यम से ही इन जन विरोधी शक्तियों का पर्दाफ़ाश किया जा सकता है. इरान की मेहनतकश आवाम ही उसके देश में सत्ता के शिखर पर बैठे मुल्लाह तंत्र को परास्त कर सकती है. वही उनके युद्दोंमादी ऐजेण्डे का भाण्डा फ़ोंड करेगी. वही शक्तियाँ पूरी मध्य ऐशिया में एक सच्चे लोकतांत्रिक विकल्प का रास्ता पैदा करेगी. हमें उन्हीं ताकतों को समर्थन देना है और उनका आह्वान करना है कि उनके इस मुक्ति युद्ध में हम बराबर के शरीक हैं, उन्हें ही हमें मज़बूत करना है, यही एक सच्चा वाम-जनवादी रास्ता है और यही उसके ऐतिहासिक कार्यभार भी हैं. राजनीतिक इस्लाम १४०० वर्ष पुराना एक असफ़ल प्रयोग है जिसे आज इस्लामी फ़ासीवादी ताकतें हथियारों के बल पर पूरी दुनिया को भयग्रस्त करके एक विकल्प बताते में जुटी हैं, साम्राज्यवाद के खूंखार चेहरे से अधिक भयानक इस्लामी फ़ासीवाद है जिसमें न कोई तर्क है न बुद्धि, बस अंधविश्वास के बूते उसमें पूरी दुनिया में हरी पताका फ़ैलाने का उन्मादी जुनून मौजूद है.

मौजूदा इरानी मुल्लाह सरकार की हिमायत करने से पूर्व कृपा करके उपर दिये गये इरानी प्रश्नों के उत्तर एक बार आप  खुद दें, फ़िर समझें कि आपकी दशा क्या होगी? मेरे-आपके उत्तर वही होते जो भगत सिंह के जवाब होते..मुझे और तुम्हें फ़ाँसी पर चढ़ा देने के ये प्रयाप्त सबूत हैं लिहाज़ा अगर जीना है और सचमुच किसी समाजवादी सपने को साकार होते देखना है तब इस्लामी ब्राण्ड के किसी भी राजनीतिक वाद के खिलाफ़ अपने म्यान में रखी तलवारें निकाल लें. आने वाली नस्लों को अफ़सोस नहीं होगा कि उनके बुज़ुर्गों ने हमेशा गोर्बाचेव की तरह गलतियाँ नहीं की.
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शनिवार, 28 अगस्त 2010

अमेरिका में शिवसेना!


अमरीकी सेनेट ने सीमा सुरक्षा विधेयक (बॉर्डर सिक्योरिटी बिल) को मंज़ूरी क्या दी, हमारे देश में हो-हल्ला मच गया. बहुत संभव है कि इस विधेयक की ओर भारत में किसी का ध्यान भी नहीं जाता अगर इसके अनुषंग से सेनेट ने एच-1बी और एल-1 वीज़ा के शुल्क में भारी बढ़ोतरी की घोषणा न की होती. किसी ने इस कदम को 'डिस्क्रिमिनेटरी' कहा तो किसी ने 'प्रोटेक्शनिस्ट' बताया. जैसा कि कहा जा रहा है भारतीय आईटी कंपनियों के संयुक्त मुनाफे पर बीस से पच्चीस करोड़ डॉलर वार्षिक तक का असर पड़ने की संभावना है. यह भी उम्मीद है कि भारत सरकार इसके खिलाफ विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू टी ओ) में शिकायत करे.

इस हो-हल्ले से परे एक नज़र अमरीका की राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर डालें तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है. इक्कीसवीं सदी का पहला दशक 'अमेरिकन ड्रीम' के लिए बड़ा उथल-पुथल भरा रहा; 'नाइन-इलेवन', गले की हड्डी बन चुके दो सामरिक अभियान (अफगानिस्तान और इराक),'दि ग्रेट रिसेशन' और पहले काले राष्ट्रपति का चुनाव जैसी घटनाएँ इसी दशक में हुईं. महामंदी के चलते व्यापक बेरोज़गारी, गृह-ऋण की किश्तें न चुका पाने के कारण हुई लाखों बेदखलियों के कारण फैले असंतोष और दो गैरज़रूरी लड़ाइयों के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश इत्यादि कारणों से गुज़रे दशक की तुलना कई बार साठ के दशक से की गई जब अमरीका में कुछ कुछ ऐसा ही माहौल था.

इस में कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रपति चुनावों में बराक ओबामा की सफलता के पीछे अफ्रीकी-अमरीकी समाज,श्रम संगठनों और अन्य प्रगतिशील हलकों का बहुत बड़ा हाथ है. इसके अलावा अमरीका के लैटिनो मतदाताओं की बदौलत नेवाडा, कोलोराडो, न्यू मेक्सिको, नॉर्थ कैरोलिना जैसे राज्यों में ओबामा को जॉन मै'केन के खिलाफ निर्णायक बढ़त प्राप्त हुई. पर पिछले डेढ़ साल के अपने कार्यकाल में राष्ट्रपति ओबामा से लगाई गई उम्मीदें पूरी नहीं हुईं. विदेश नीति के मामले में तो राष्ट्रपति ओबामा अपने पूर्ववर्ती की परंपरा का ही निर्वाह कर रहे हैं. इतना ही नहीं स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार (हेल्थ केयर रिफ़ॉर्म बिल) जैसे  अत्यंत महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर भी जनहित के आगे कॉर्पोरेट जगत के हितों को तरजीह दी गई. 

अनुमान है कि बराक ओबामा के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से नफरत फ़ैलाने वाले समूहों की संख्या (हेट ग्रुप्स) की संख्या अमेरिका में दोगुनी हो गईटी पार्टी मूवमेंट नाम का एक राजनीतिक आन्दोलन भी पिछले साल ही अस्तित्व में आया. अपने नाम के अनुसार तो यह आन्दोलन अमरीकी क्रांति की एक प्रमुख घटना 'बॉस्टन टी पार्टी' से प्रभावित  है जिसका उद्देश्य करों में बढ़ोतरी का विरोध करना है, पर इसका चरित्र घोर दक्षिणपंथी है. और यह आन्दोलन बड़ी तेज़ी से सारे अमरीका में फ़ैल रहा है. इन हालातों के मद्देनज़र ही प्रसिद्ध अमरीकी विचारक नोम चोमस्की ने हाल ही में कहा था कि उन्हें अमरीका में फासीवाद की आहटें सुनाई दे रही हैं. इस सिलसिले में एरिज़ोना राज्य द्वारा अप्रैल माह में पारित क़ानून एसबी 1070 दृष्टव्य है. बहुत सी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का दोष शरणार्थियों,प्रवासियों और बाहरी समझे जाने वाले लोगों के मत्थे मढ़ना एक आम बात है. सीमा पार कर भारत आने वाले बांग्लादेशियों और मुंबई पहुँचने वाले उत्तर प्रदेश-बिहार के लोगों को लेकर हल्ला हमारे यहाँ भी मचता ही रहता है. एरिज़ोना राज्य का यह कानून राज्य पुलिस को अवैध आप्रवासन से निबटने के लिए असीमित अधिकार देता है. इसके बहुतेरे प्रावधानों में से एक के तहत पुलिस केवल शक़ के आधार पर आप्रवासियों को रोक कर उनसे पूछ-ताछ कर सकती है और कागज़ात तलब कर सकती है. सत्रह अन्य राज्य भी इसी तरह के  नस्ली पूर्वग्रह से ग्रस्त क़ानून बनाने के लिए अपने सदनों में विधेयक पेश कर चुके हैं.

ज़ाहिर है कि इस दक्षिणपंथी उभार के बीच ओबामा की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरता जा रहा है. फिर अमरीकी सेनेट और कांग्रेस के लिए मध्यावधि चुनाव नवम्बर में होने वाले हैं. इस सीमा सुरक्षा विधेयक (और उससे जुड़ी वीजा शुल्क में बढ़ोतरी) को इन दो बातों के आलोक में देखा जाना चाहिए. इस संवेदनशील मुद्दे पर बनी द्विपक्षीय सहमति भी देखते ही बनती है (यह प्रस्ताव ध्वनि-मत से पारित हुआ है). इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि एच-1बी और एल-1 श्रमिक अमरीका की कुल श्रमिक आबादी का एक हजारवां हिस्सा भी नहीं है. 

वीज़ा शुल्क में बढ़ोतरी से होने वाली अतिरिक्त आय का उपयोग अवैध आप्रवासन पर रोक लगाने के लिए अमरीका की दक्षिणी सीमा पर सुरक्षा मज़बूत करने के लिए किया जाने वाला है. उम्मीद की जा रही है  कि इस विधेयक के द्वारा ओबामा के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार लम्बे समय से अटके पड़े आप्रवासन सुधार विधेयक (इमिग्रेशन रिफ़ॉर्म बिल) के लिए ज़मीन तैयार कर रही है और यही इस कदम का सबसे सकारात्मक पहलू भी है.  मध्य और दक्षिण अमरीका के गरीब देशों से बेहतर ज़िन्दगी की उम्मीद लिए बहुतेरे लोग चोरी-छुपे 'लैंड ऑफ़ अपॉर्चुनिटीज़' पहुँचते हैं. मगर  वैध नागरिकता के अभाव में यहाँ कदम कदम पर शोषण का शिकार होते हैं. वे  कमरतोड़ मेहनत करते हैं, बिना किसी सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य बीमा के एक निहायत असुरक्षित जीवन बिताते हैं  और नस्ली भेदभाव का सामना  भी करते हैं. अमरीका में रह रहे ऐसे लाखों लोगों को आप्रवासन सुधार विधेयक के अंतर्गत नागरिकता प्रदान किये जाने की योजना है. अगर सचमुच ऐसा हुआ तो इन लाखों जिंदगियों में रौशनी लाने में सहायक होने के लिए भारतीय आईटी कम्पनियाँ अपनी पीठ थपथपा सकती हैं. 'कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी' का दायरा सिर्फ अपने देश तक ही सीमित तो नहीं होता!


इसी से जुड़ी एक और पोस्ट यहां देखें…


फिलहाल अमेरिका में रह रहे भारत भूषण तिवारी का यह आलेख 14 अगस्त को दिल्ली के दैनिक भास्कर में 'वीज़ा शुल्क का सामाजिक पक्ष' के शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। जनपक्ष के पाठक उनसे अच्छी तरह परिचित हैं।


शुक्रवार, 4 जून 2010

मास्को,बीजिंग और मार्क्सवाद

( अंतर्राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट आंदोलन के इतिहास में चीन और रूस दृष्टिकोणों का आपसी मतभेद बेहद रोचक अध्याय है…उस दौर को समझने के लिये भी और आगे के रास्ते की तलाश के लिये भी। इसी विषय पर (विजय प्रसाद की पुस्तक 'दि डार्कर नेशन्स : अ पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ़ दि थर्ड वर्ल्ड' के एक अध्याय बाली: डेथ ऑफ़ दि कम्युनिस्ट्स का अंश यहां प्रस्तुत है जिसे उपलब्ध कराया है हमारे नियमित लेखक भाई भारतभूषण तिवारी जी ने)




गठबन्धनों और क्रांति के सवाल पर मॉस्को और बीजिंग के बीच सैद्धांतिक एकमत बिलकुल न था. विवाद कई मुद्दों पर छिड़ते थे.  एक विचार पद्धति के अनुसार हर समाज के लिए यह ज़रूरी था कि वह पहले अपने घरेलू उद्योग का विकास करे, और उसके बाद अर्थात उत्पादन के साधन सुस्थापित हो जाने पर ही नैतिक रूप से जड़ हो चुके बुर्जुआ वर्ग पर सर्वहारा काबू पा सकता है. इस दृष्टिकोण का मानना था कि इतिहास को अवस्थाओं में आगे बढ़ना होगा, किसी समाज के सामंती अवस्था से पूंजीवादी अवस्था में प्रवेश कर जाने पर ही समाजवाद की ओर अवस्थांतर संभव होगा. एक अन्य विरोधी विचार का कहना था कि जिस प्रकार सांवले राष्ट्रों को स्थायी परवशता की अवस्था में रखा गया था, पूंजीवादी समाजों के तौर पर विकसित हो पाना उनके लिए असंभव होगा. विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय बुर्जुआ पूंजीवादी समाज विकसित करने में सक्षम होगा ऐसी उम्मीद करना अव्यवहारिक है. इसलिए साम्यवादियों को सत्ता हथिया कर, नए राज्य को अंतर्राष्ट्रीय पूँजी से अलग रखकर, देश को प्रयत्नपूर्वक इन अवस्थाओं से ले जाना होगा. चीन में लू शाओ-ची ने जहाँ 'अवस्थावादी' (stagist) नज़रिया सामने रखा, वहीं लिन बियाओ ने 'अबाधित क्रांति' का दृष्टिकोण अपनाया. मॉस्को में और अन्यत्र भी ऐसे मतभेद प्रकट हुए.


इन बहसों से परे, साठ के दशक तक मॉस्को और बीजिंग दोनों ने ऐसे सिद्धांत प्रस्तुत किये जिन्होंने बुर्जुआ लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ साम्यवादी गठबन्धनों पर स्वीकृति की मुहर लगा दी. 1960 में सोवियत संघ ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक राज्य की अवधारणा सामने रखी जिसका तात्पर्य तीसरी दुनिया के अंतर्गत उभरे गैर-साम्यवादी राष्ट्रीय मुक्ति राज्यों से था. ये राज्य समाजवाद के अपने अलग -अलग संस्करणों (अरब समाजवाद, अफ़्रीकी समाजवाद, नासकोम) के आधार पर शासन करते थे. बीजिंग ने नव लोकतंत्र का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसमें साम्राज्यवाद के विरुद्ध चार वर्गों (सर्वहारा, खेतिहर, निम्न-मध्य वर्ग अर्थात Petty Bourgeoisie और घरेलू पूंजीपति) का गठजोड़ खड़ा होकर समाजवाद की दिशा में देश का विकास करेगा. इन वर्गों की अगुवाई कम्युनिस्ट पार्टी करेगी जो विकास दर बढाने के लिए पूंजीवाद का विकास और समाजवाद की ओर अवस्थांतर करेंगे. इसलिए मॉस्को और बीजिंग दोनों ने सांवले राष्ट्रों के साम्यवादियों को राष्ट्रीय बुर्जुआ के लिए गुंजाइश रखने का निर्देश दिया; अर्थात उन्हें 'राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चों' में काम करके भविष्य के समाजवादी अवस्थांतर के लिए ज़मीन तैयार करनी होगी. 

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक राज्य एवं नव लोकतंत्र की संकल्पनाओं से मॉस्को और बीजिंग को गैर-साम्यवादी शासन व्यवस्थाओं और राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों को गैर-औद्योगिक विश्व के लिए पर्याप्त मान लेने  का अवसर मिला. मॉस्को और बीजिंग के बीच के टकराव की वजह से गठबंधन तैयार करने में विवेक की कमी को और बल मिला. राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चों को बढ़ावा देने के आगे साम्यवाद का विकास लगभग गौण हो गया था. सामाजिक उत्पादन का आधार बदलने हेतु शोषित और अन्य वर्गों को संगठित करने वाली उभरती हुई कम्युनिस्ट पार्टियों के मुकाबले  समाजवाद की माला जपने वाले और राज्य पर नियंत्रण वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक नेताओं को इस विश्लेषण पद्धति के आधार पर सोवियत संघ और चीन ने शायद ज्यादा समर्थन दिया. नासिर का मिस्र, क़ासिम का इराक़, बूमदियन का अल्जीरिया, इंदिरा गाँधी का भारत, ने विन का बर्मा, सेकू तूरे का गिनी, अयूब खान का पाकिस्तान और मोदिबो केईता का माली, सोवियत संघ और चीन के कृपापात्र बन गए बावजूदसके कि इनमें से अधिकतर नेताओं ने अपनी स्थानीय कम्युनिस्ट पार्टियों का दमन किया.

साठ के दशक की शुरुआत तक एशिया, अफ्रीका और अरब देशों में (किसी गैर-साम्यवादी राज्य में स्थित) तीन सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियाँ थीं क्रमशः इंडोनेशिया की पीकेआई, सूडान की अल-शुयुई अल-सूडानी (एससीपी) और इराक़ी कम्युनिस्ट पार्टी (आईसीपी). इन पार्टियों को अपने-अपने समाजों के बड़े हिस्से का सम्मान और आदर प्राप्त था और ट्रेड यूनियनों, महिला संघों और युवा संगठनों जैसे महत्त्वपूर्ण जन-संगठनों पर भी उनका नियंत्रण था. उसके बाद एक और दशक पूरा होते होते ये कम्युनिस्ट पार्टियाँ बर्बाद हो गईं जब राष्ट्रीय बुर्जुआ ने (अमेरिका  से मिली सहायता के साथ-साथ बीजिंग और मॉस्को के इस तरफ से आँखें मूँद लेने से) उनका उन्मूलन करने हेतु सेना को बैरकों से बाहर निकाला. सोवियत संघ और चीन ने इनमें से किसी एक भी अवसर पर कठोर रुख अपनाया होता तो इस बात से अन्य जगहों के साम्यवादियों को अपना काम जारी रखने का हौसला मिलता. ऐसा होने की बजाय इस चुप्पी से डरकर साम्यवादियों ने उन्हीं राजनीतिक शक्तियों से गठबंधन किया जो उनका इस्तेमाल करके उन्हें नष्ट कर देना चाहती थीं.

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

संसद का खेल इंगलिस्तान में!

ब्रिटेन के चुनाव और कुछ अहम् प्रश्न
  • अरुण माहेश्वरी




आगामी छ: मई को होने वाले ब्रिटेन के आम चुनाव पर सारी दुनिया की नजरें टिकी हुई है। यह सिफ‍र् इसलिये नहीं कि ब्रिटेन अपने जीवन के एक जिस सबसे बड़े आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है, इन चुनावों के जरिये उसका कोई समाधान हासिल हो जायेगा। पिछले एक साल में ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में 5 प्रतिशत का भारी संकुचन हुआ है। डेढ़ साल का हिसाब अर्थव्यवस्था में 6.2 प्रतिशत का संकुचन बताता है। जीडीपी के अनुपात में बजट घाटा दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अभी सबसे चरम पर है। चालू वित्तीय वर्ष में यह घाटा जीडीपी का 11.8 प्रतिशत कूता गया है। सरकार पर कर्ज जीडीपी के 83 प्रतिशत तक चला गया है। 2008 के वित्तीय संकट के वक्त बैंकों को बचाने की दौड़ में सबसे आगे रहने वाली ब्रिटिश सरकार 950 बिलियन पाउंड उढ़ेल कर भी वहां की बैंकिंग व्यवस्था को अब तक संकट से पूरी तरह उबार नहीं पायी है और यहां तक कहा जा रहा है कि यह स्थिति 90 के दशक के जापान के वित्तीय क्षेत्र के संकट की याद को ताजा कर देती है, जिससे जापान की अर्थव्यवस्था पर पड़े गहरे घावों को भरना आज तक मुमकिन नहीं हो पाया है। आईएमएफ के अनुसार इस साल सिफ‍र् जी 7 के देशों में ही नहीं, जी 20 के देशों में भी ब्रिटेन सबसे अधिक बजट घाटे का देश होगा। आर्थिक साख के मामले में उसकी गिनती ग्रीस और स्पेन जैसे आर्थिक रूप से बीमार हो चुके देशों में भी की जाने लगी है। ब्रिटेन का वित्तीय क्षेत्र सारी दुनिया के वित्त बाजार के सटोरियों की तमाम प्रकार की काली और मनमानी करतूतों का स्वर्ग राज्य बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर शेयरों के व्यापार का 40 प्रतिशत से ज्यादा ब्रिटेन में होता है और इसीप्रकार बैंकों के भी वैश्विक कारोबार का 20 प्रतिशत ब्रिटेन के वित्त बाजार से किया जाता है। गैरकानूनी बैंकिंग तथा संदेहास्पद वित्तीय कारस्तानियों के एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में लंदन को वाल स्ट्रीट का ग्वांतानामोकहा जाता है, अर्थात अपने देश के बाहर की एक ऐसी जगह जहां अमेरिकी धंधेबाज लोग वह सब कर सकते हैं, जिन्हें उनको अपने देश में करने की अनुमति नहीं है। इन्हीं कारणों से ब्रिटेन में भी अमेरिका की तरह ही संपत्तियों और उसको लेकर तैयार किये गये हुंडियों पर हुंडियों जैसे वित्तीय उत्पादों का बुलबुला तैयार होगया था और जीडीपी में वित्तीय लेनदेन की भागीदारी 1990 से 2007 के बीच में बढ़ कर 22 प्रतिशत से 33 प्रतिशत होगयी थी, जो सारी दुनिया में सबसे अधिक कही जा सकती है।

अर्थव्यवस्था के इस संकट का सीधा सामाजिक परिणाम यह हुआ कि अकेले 2009 में प्रतिदिन 1400 के हिसाब से पांच लाख लोगों के रोजगार छिन गये। 2009 के अंत तक ब्रिटेन में बेरोजगारों की संख्या 25 लाख पंहुच गयी है।

विदेश नीति के हर मामले में अमेरिका के सहोदर की भूमिका निभातेनिभाते ब्रिटिश सरकार की सूरत विदेश मामलों में एक जंगखोर और अपनी स्वायत्तता गंवा कर अमेरिका के पिछलग्गू की रह गयी है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर इस बीच ब्रिटिश राज्य की दमनकारी ताकत में भारी वृद्धि हुई है। ब्रिटेन के फौजदारी कानूनों के प्राविधानों में माग्र्रेट थैचर और जॉन मेजर के काल में औसतन 18 महीनों में एक विधेयक आया था, जबकि ब्लेयर के काल में इसप्रकार के विधेयकों की संख्या औसतन सालाना तीन की रही है। यही वजह है कि आज ब्रिटेन में यूरोप के दूसरे किसी भी देश की तुलना में सबसे अधिक दर से लोग जेल में बंद है। प्रति एक लाख लोग में 124 को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा है।

ब्रिटेन के इसबार के आम चुनाव पर सारी दुनिया की नजर के टिके होने का अभी सबसे बड़ा कारण यह कहा जाता है कि वहां पिछले 13 वर्षों के लंबे शासन के उपरांत इसबार लेबर पार्टी की स्थिति बेहद कमजोर दिखाई दे रही है। लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री गौर्डन ब्राउन की तुलना में एक नेता के रूप में कम प्रभावशाली माने जारहे कंजरवेटिव पार्टी के उम्मीदवार डेविड कैमरोन, अपनी सारी सीमाओं और अक्षमताओं के बावजूद इस चुनाव की दौड़ में पहले नम्बर पर हैं। इसके साथ ही गौर करने की बात यह है कि वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में नीतियों के सवाल पर ब्रिटेन का मतदाता प्रगतिशील मानी जाने वाली लेबर पार्टी को किसी भी रूप में कंजरवेटिव पार्टी के दक्षिणपंथी रास्ते से भिन्न नहीं समझ पा रहा है।

प्रश्न है कि ऐसा क्यों हुआ? इस सवाल के साथ थोड़ा सा पीछे, इतिहास के कुछ पन्नों की ओर नजर डालना उचित होगा।

ब्रिटेन के संसदीय इतिहास में लेबर पार्टी का अपना एक खास स्थान रहा है। इस पार्टी का गठन 20वीं सदी के पहले साल में हुआ था। ऐतिहासिक रूप में इसका लक्ष्य था समाजवाद की स्थापना। सभी प्रमुख उद्योगों की मिल्कियत सार्वजनिक क्षेत्र में हो, अर्थव्यवस्था में सरकारकी पूरी दखलंदाजी हो, संपत्ति का पुनर्वितरण और मजदूर वर्ग को ज्यादा से ज्यादा अधिकार मिले तथा राज्य का चरित्र जनकल्याणकारी हो जिसमें स्वास्थ्य और चिकित्सा की तरह के विषय पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में हो। ये चंद बातें लेबर पार्टी की मूलभूत प्रतिज्ञाओं, इसके कार्यक्रम और संविधान के अविभाज्य अंग माने जाते थे। कम्युनिस्ट पार्टियों की तरह वर्गसंघर्ष और समाजवादी क्रांति पर विश्वास न करने के कारण उसने शुरू से ही संसदीय रास्ते को ही अपनी गतिविधियों के सबसे प्रमुख रास्ते के रूप में अपनाया और सन् 1900 के बाद से वहां के हर चुनाव में हिस्सा लेती रही है। 1900 के चुनाव में उसे सिफ‍र् 1.8 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन उसके बाद के चुनाव में धीरेधीरे उसके मतों की संख्या में वृद्धि होती चली गयी और सन् 1923 की त्रिशंकु पार्लियामेंट में अल्पमत में होने पर भी उसे पहली बार एक साल के लिये सत्ता का स्वाद मिला था। 1929 में भी उसकी एक अल्पमत की सरकार बनी थी, लेकिन 1945 और 1950 में पूरी तरह से उसकी अपनी सरकारें बनी। इसके बाद 1964, 1966, 1974 में भी लेबर पार्टी की सरकारें बनी।

1974 के पूरे 23 साल बाद 1997 में टोनी ब्लेयर के नेतृत्व में फिर एक बार जो लेबर पार्टी की सरकार बनी, वह दरअसल पुरानी लेबर पार्टी की सरकार नहीं थी। इसे न्यू लेबर (नयी लेबर) पार्टी कहा जाता है। इसने समाजवाद के लक्ष्य को पूरी तरह से छोड़ कर एक तीसरे रास्तेकी बात करना शुरू कर दिया था। और, यह तीसरा रास्ता क्या और कैसा रहा है, हमारे सामने विचार का यही प्रमुख मुद्दा है। जहां तक चुनावी गणित का सवाल है, 1997 में टोनी ब्लेयर को वहां के हाउस आफ कामन्स में 174 सीटों के साथ भारी बहुमत मिला था, जिसे 1945 के बाद किसी भी पार्टी के पक्ष में मतदाताओं का सबसे बड़ा रूझान माना जाता है। 2001 के चुनाव में भी लेबर पार्टी की जबर्दस्त जीत का सिलसिला जारी रहा। उसकी सीटों में मामूली 7 सीटों की कमी आई। लेकिन 2001 के बाद 2005 के चुनाव में जब ब्रिटेन के वर्तमान प्रधानमंत्री गोर्डन ब्राउन के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया, लेबर पार्टी को एक करारा झटका लगा। वह सत्ता में तो बनी रही, लेकिन उसकी सीटों में 66 सीटों की कमी आगयी। और दरअसल, यही, 1997 से 2005 तक का, खास तौर पर 2001 से 2005 तक का टोनी ब्लेयर का काल है, जिस दौरान लेबर पार्टी की नीतियों में एक प्रकार का जो मूलभूत परिवर्तन आया और जिसने न सिफ‍र् घरेलू राजनीति के क्षेत्र में बल्कि विश्व राजनीति के परिप्रेक्ष्य में भी इंगलैंड को दुनिया की चरम दक्षिणपंथी और आक्रामक साम्राज्यवादी ताकतों का कठपुतला बना कर छोड़ दिया, वह बिंदु है जिसपर पूरी गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।

जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, टोनी ब्लेयर की इस न्यू लेबर की सरकार के तीसरे रास्तेकी सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि उसने लेबर पार्टी के अब तक चल आरहे समाजवाद, सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुखता तथा अर्थव्यवस्था में सरकार के हस्तक्षेप की तरह की घोषित नीतियों से अपना पल्ला पूरी तरह झाड़ लिया था। स्वतंत्र बाजार इसका सबसे प्रिय और प्रमुख नारा बन गया और इस मामले में वह यूरोप के अन्य देशों की सोशल डेमोक्रेट सरकारों से हमेशा चार कदम आगे रही। इस न्यू लेबर की दूसरी सबसे बड़ी विशेषता थी अमेरिका की सभी आक्रमणकारी सामरिक योजनाओं के साथ इसका पूरी तरह से जुड़ जाना। इसका अमेरिका प्रेम जिसे अन्य पदावली में अटलांतिकवाद कहते हैं, इतना अंधा था कि इसने जर्मनी, ांस, इटली और स्पेन की दक्षिणपंथी सरकारों से भी आगे बढ़ कर, जिन्होंने कोसोवा और अफगानिस्तान पर हमलों का समर्थन करने पर भी इराक के मामले में अमेरिका का साथ देने से इंकार कर दिया था, इराक में भी अमेरिका की सैनिक कार्रवाई में सक्रिय भागीदारी की। हालत यह होगयी कि जहां अमेरिका जायें वहीं ब्रिटेन भी रामलक्ष्मण की जोड़ी की तरह मौजूद रहे। ब्लेयर का यह रास्ता ब्रिटेन की अब तक चली आ रही नीतियों से काफी भिन्न रास्ता था। पहले की ब्रिटिश सरकारें अमेरिका से थोड़ी दूरी रखती थी। अपने औपनिवेशिक अतीत और साम्राज्यवादी इरादों के बावजूद आंख मूंद कर अमेरिका के नक्शे कदम पर चलना उन्हें मंजूर नहीं था। 1964–68 के काल में लेबर पार्टी के ही प्रधानमंत्री हैरोल्ड विल्सन और अमेरिका के डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति लिंडन बी. जानसन के बीच वियतनाम में सेना भेजने के प्रश्न पर जो विरोध हुआ था, उसे इतिहास के सभी विधार्थी जानते हैं। 1973 के अरब इसराइल युद्ध के समय प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ ने अमेरिकी वायु सेना को अपने हवाई अड्डे का इस्तेमाल करने से रोक दिया था। अमेरिका की राय के खिलाफ जाकर मार्गे्रट थैचर ने अर्जेंतिना के खिलाफ युद्ध छेड़ा था। युगोस्लाविया के मामले में जॉन मेजर को पूछा तक नहीं गया था। लेकिन 1990 के बाद तैयार हुए एकधु्रवीय विश्व के साथ अपना तालमेल बैठाने के चक्कर में ब्लेयर ने विदेश नीति के मामले में ब्रिटेन की सार्वभौमिकता की पूरी परंपरा को खत्म कर दिया।

अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में सभी स्तरों पर पूरी तरह से विफल और ब्रिटेन को अमेरिका का पिछलग्गू बना देने वाली इस न्यू लेबर के पक्ष में आज जो दलीलें दी जारही है, उनमें पहली दलील, जिसे अक्सर भारत में भी हर हारने वाले शासक दल से सुना जाता है, वह यह है कि लेबर पार्टी की सरकार ने काम तो बहुत अच्छे किये, लेकिन उन कामों के बारे में जनता तक जानकारी देने के मामले में वह चूक रही है। इसलिये जरूरत न्यूज मैनेजमेंट की है। दूसरी अनोखी दलील यह भी है कि लेबर पार्टी को सत्ता में बनाये रख कर ही अंतत: उसे उसके अतीत के बेहतर सामाजिक जनतांत्रिक चरित्र में वापस लौटाया जा सकेगा। और तीसरी, वही अंधों में काना राजा वाली दलील कि ब्लेयरब्राउन कंपनी कितनी भी बुरी क्यों न हो, कंजरवेटिव पार्टी हर हाल में उनसे बदतर है। कंजरवेटिव पार्टी का अभिजनवादी नजरिया बजट में कटौती करके जनसेवाओं को नुकसान पहंुचायेगा और सामाजिक न्याय के हितों के खिलाफ होगा, इत्यादि।

सवाल उठता है कि क्या बारबार इस प्रकार की कम बुराईवाली दलीलों से लेबर पार्टी का काम चल पायेगा? सचाई यह है कि ब्रिटिश मतदाता लेबर पार्टी के प्रति अब किसी प्रकार के भावनात्मक आवेग से चलने के लिये तैयार नहीं है। ब्रिटेन में वामपंथी बुद्धिजीवियों का एक तबका कह रहा है कि ब्रिटेन की संसदीय सड़ांध में किसी भी सच्चे वामपंथी को सिर्फ़ एक शत्रुतक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इस समूची सड़ीगली स्थिति पर हमला करते हुए इससे निकलने का रास्ता बनाना चाहिए। जो आज भी इस न्यू लेबरके पक्ष में दलील दे रहे हैं, वे जनतंत्र की इस मूल बात को भूल रहे हैं कि जहां राजनीतिक फर्क न्यूनतम हो, वहां, किसी भी सरकार को अनंत काल तक सत्ता में नहीं रहने दिया जाना चाहिए। जनतंत्र में जवाबदेही का यदि कुछ मायने है तो उसका पहला तकाजा है कि जिस सरकार का कार्यकाल इतनी विफलताओं और बुराइयों से भरा हुआ हों, उसे चुनाव के मौके पर निश्चित तौर पर दंडित किया जाना चाहिए। देखना यह है कि ब्रिटेन के आगामी चुनाव में वहां के बौद्धिक समाज के लोगों की यह सोच कहां तक फलीभूत होती है।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

चीन और अमेरिका की जुगलबंदी पर अरुण माहेश्वरी


अमेरिका–चीन संबंधों पर कुछ और



‘मंथली रिव्यू’ में प्रकाशित एरिक हाब्सवाम के साक्षात्कार में आज की दुनिया के प्रमुख रूझानों के संदर्भ में अमेरिका और चीन के बीच के संबंधों का जो जिक्र किया गया है, (जिसकी चर्चा इसी स्तंभ के अन्तर्गत हम पिछली बार कर आये हैं) उस पर यहां थोड़े और विस्तार से बात करना हर लिहाज से जरूरी और समीचीन जान पड़ता है।

सरसरी तौर पर यह साफ दिखाई देता है कि चीन और अमेरिका की अर्थ–व्यवस्थाएं आपस में पूरी तरह से गुथ गयी है। चीन का विकास उसके निर्यात पर निर्भर है और उसके निर्यात का काफी बड़ा हिस्सा अमेरिका जाता है। 2001 में चीन का निर्यात उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 20 प्रतिशत था, जो 2007 तक बढ़ कर 36 प्रतिशत होगया। देशों के समूह के तौर पर निश्चित तौर पर यूरोपियन यूनियन उसके मालों का सबसे बड़ा ग्राहक है, लेकिन अकेले एक ग्राहक के रूप में अमेरिका का ही स्थान अव्वल है। इसके अलावा, अमेरिका को आपूर्ति करने वाले देशों में कुछ अर्से पहले तक कनाडा सबसे आगे था, लेकिन अब उसका स्थान चीन ले चुका है। चीन ही आज अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों का सबसे बड़ा खरीदार और मालिक है। पहले यह स्थान जापान को प्राप्त था। 2008 के बाद से चीन अब उससे आगे चला गया है। हाल के अमेरिकी संकट में अगर किसी देश ने अमेरिका के लिये सबसे बड़े त्राणदाता की भूमिका अदा की तो वह चीन ही था। अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये चीन अमेरिका को ऋण देने वाला आज सबसे बड़ा देश बन चुका है।

चीन और अमेरिका के संबंधों को लेकर अभी जिसप्रकार का चित्र बनता है, उसमें लगता है जैसे अमेरिका चीन में बने सामानों को खरीद रहा है और चीन अमेरिका की सरकारी प्रतिभूतियों को। एक विकासशील देश चीन एक धनी देश अमेरिका को खर्च करने के लिये उधार दे रहा है। इसके एवज में अमेरिका चीन में बने सामानों को खरीद कर उधार में आए डालर को फिर से चीन को सौंप देता है और यही डालर फिर कर्ज के तौर पर अमेरिका के पास आ जाता है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश है और चीन सबसे बड़ा कर्जदाता। सवाल उठता है कि क्या ऐसी कोई चीज लंबे समय तक चल सकती है? साधारण बुद्धि से सोचने पर यह सारा मामला कुछ अजीब सा, उटपटांग जान पड़ता है। ओबामा के आर्थिक सलाहकार लारेंस समर्स ने किसी समय अमेरिका और उसके विदेशी कर्जदाताओं के संबंधों को ‘वित्तीय आतंक का संतुलन’ कह कर परिभाषित किया था। चीन का प्रमुख अंग्रेजी सरकारी दैनिक ‘पिपुल्स डेली’ लिखता है कि चीन के हाथ में भारी मात्रा में अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों के होने का अर्थ यह है कि वह कभी भी डालर की एक आरक्षित मुद्रा की हैसियत को खत्म कर सकता है। लेकिन साथ ही वह यह कहने से भी नहीं चूकता कि यह स्थिति ‘वस्तुत: निश्चित परस्पर विनाश पर आधारित शीत युद्धकालीन गतिरोध का विदेशी मुद्रा संस्करण है।‘ अर्थात, दोनों ही यह मान कर चल रहे हैं कि जो आज चल रहा है, उसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। दूसरा विकल्प सिर्फ परस्पर विनाश है।

चीन अमेरिका संबंधों के इस जटिल और अबूझ से रूप को देखकर ही अब कुछ ‘भविष्यद्रष्टा’ इन दोनों अर्थव्यवस्थाओं की परस्पर–निर्भरशीलता के बजाय इनकी अनिवार्य जुदाई की बात भी कहने लग गये हैं। हार्वर्ड के प्रसिद्ध इतिहासकार नियाल फगु‍र्सन एक समय में जिस चीज को चिमेरिका कह कर प्रचारित कर रहे थे, वे ही अब इसे एक ऐसा विवाह बंधन बताने लगे हैं जिसका अंत विछोह के अलावा और कुछ नहीं हो सकता।



इसी सिलसिले में चीन और अमेरिका के बीच चीनी मुद्रा युआन के विनिमय मूल्य को लेकर इधर जो थोड़ी नोक–झोंक चल रही है, उसकी तह में जाना काफी उपयोगी होगा। यह बात जग जाहिर है कि चीन और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन काफी अधिक बिगड़ा हुआ है। चीन के साथ अमेरिका के व्यापार घाटे में पिछले दिसंबर महीने में 18.14 बिलियन अमेरिकी डालर की वृद्धि हुई, जबकि इस जनवरी महीने में यह वृद्धि 18.3 बिलियन डालर हुई। अमेरिका इसके लिये अक्सर चीन को कोसता है कि उसने अपनी मुद्रा युआन की विनिमय दर को कृत्रिम ढंग से काफी कम कर रखा है, जिसकी वजह से अमेरिकी बाजार में चीनी सामानों को अनुचित लाभ मिल रहा है और अमेरिका का चीन के साथ व्यापारिक घाटा बढ़ता जा रहा है।

12 मार्च को राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी निर्यात–आयात बैंक के वार्षिक सम्मेलन में अमेरिका के बढ़ते हुए व्यापार घाटे के संदर्भ में जोर देकर कहा कि फिर से व्यापार संतुलन को कायम करने में चीनी मुद्रा युआन की विनिमय दर को बाजार पर आधारित किया जाना एक महत्वपूर्ण कदम होगा। ओबामा के इस वक्तव्य के दूसरे दिन ही चीन के केंद्रीय बैंक, पिपुल्स बैंक आफ चायना के उप–राज्यपाल सू निंग ने उन्हें तुर्की दर तुर्की जवाब देते हुए कहा कि युआन के मूल्य के प्रश्न का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। युआन की विनिमय दर को बढ़ाना चीन और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन की समस्या का समाधान नहीं है। सू निंग की दलील थी कि सन् 2005 के जून महीने में डालर के दामों को अस्थिर कर दिये जाने के बाद से युआन की दर 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ गयी है। 2002 से लेकर 2008 के बीच अमेरिकी डालर की कीमत सालाना तीन प्रतिशत की दर से कम हुई थी। लेकिन इसी दौरान अमेरिकी व्यापार घाटा 500 बिलियन डालर से बढ़ कर 900 बिलियन डालर होगया। अर्थात, डालर के कमजोर होने से अमेरिकी घाटे में कोई कमी नहीं आयी है।





इसी सिलसिले में निंग ने अमेरिका के इस व्यापार घाटे के दूसरे रहस्यों पर से पर्दा उठाते हुए जिन तथ्यों का उल्लेख किया, वे चीन और अमेरिका के बीच के व्यापार की वास्तविकता और इन दोनों अर्थ–व्यवस्थाओं के संबंधों को जानने की दृष्टि से महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि चीन के पक्ष में व्यापार संतुलन का अर्थ सिर्फ चीन की अर्थ–व्यवस्था को लाभ नहीं समझा जाना चाहिए। सचाई यह है कि चीन के अधिकांश निर्यातकों में विदेशी पूंजी लगी हुई है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष चीन के विदेश व्यापार में निवेश का 55.2 प्रतिशत विदेशी है और 56 प्रतिशत निर्यात चीन में स्थित विदेशी कंपनियों ने किया है। चीन को इस व्यापार से जो मामूली मुनाफा होता है उसका अधिकांश विनिर्माण की श्रंखला के अंतिम चरण से आता है। जबकि, अमेरिका खुद उत्पाद की डिजाइन और उसके वितरण से अच्छा खासा मुनाफा ले लेता है। इस बात को ठोस उदाहरण से समझने के लिये कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता की इस रिपोर्ट पर गौर किया जा सकता है, जिसके अनुसार एक 30 गिगाबाईट के विडियो आईपॉड पर 299 अमेरिकी डालर की लागत में से 163 डालर अमेरिकी कंपनियों और मजदूरों को मिलते हैं, तथा 132 डालर दूसरे एशियाई देशों के कलपुर्जे निर्माताओं को, जबकि चीन में, जहां उसे अंतिम रूप से तैयार किया जाता है, इसका सिर्फ 4 डालर भुगतान किया जाता है। चीन के मजदूरों द्वारा आईपॉड के निर्माण में सिर्फ एक प्रतिशत का योगदान किये जाने पर भी चीन से अमेरिका को होने वाले निर्यात में इसके चलते 150 डालर का योगदान होता है, अर्थात चीन–अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन में एक आईपॉड 150 डालर का योगदान करता है।

इसीलिये आज भी चीन और अमेरिका की अर्थ–व्यवस्था को बराबरी के दर्जे पर रखना एक बड़ा भ्रम है। बाजार विनिमय दरों के आधार पर चीन की अर्थ–व्यवस्था अभी भी अमेरिका से एक तिहाई है। उसका प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन अमेरिका के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन का चौदहवां हिस्सा भर है। अमेरिका का प्रतिरक्षा बजट चीन से छ: गुना है। जहां तक सरकारी प्रतिभूतियों का सवाल है, चीन के लिये यह संभव नहीं है कि वह उसे बाजार में छोड़ सके। डालर की कीमत के गिरने से सबसे अधिक नुकसान चीन को ही होगा। इसीलिये जो लोग आज दोनों को बराबर के वजन वाला बताकर जी 2 की बात करते हैं, वह सच से कोसों दूर, कुछ खास गरज से एक राजनीतिक भ्रम फैलाने की बात के अलावा और कुछ नहीं है। और यही वह बिंदु है जिसकी ओर इशारा करना यहां हमारा अभीष्ट है।



उपरोक्त विश्लेषण से एक बात साफ है कि चीन की अर्थ–व्यवस्था के लिये निर्यात में अभिवृद्धि महत्वपूर्ण होने पर भी उतनी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है जितनी आम तौर पर समझी जाती है। निर्यात की राशि में चीन के द्वारा जोड़े गये मूल्य का अंश उसके जीडीपी का बहुत छोटा सा हिस्सा है। अमेरिका में खपने वाले अधिकांश मालों का ज्यादातर हिस्सा अन्य स्थानों पर निर्मित होता है। युआन के विनिमय मूल्य पर नियंत्रण और डालर से अमेरिकी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये वह अपने निर्यातकों की मदद करता है। बदले में अमेरिका में ब्याज की दर नियंत्रित रहती है और अमेरिकी उपभोक्ता की खर्च की आदत बनी रहती है। लेकिन, मूल सचाई यह है कि चीन के विकास की असली चालक शक्ति वहां होने वाला निवेश ही है।

इस समूचे उपक्रम में जिस बात पर नजर रखने की जरूरत है वह है चीन और अमेरिका के बीच विकसित की जा रही एक प्रकार की रणनीतिक समझ और साझेदारी। चीन आज की दुनिया में पूंजीवाद के बरक्स सोवियत संघ की तरह कोई समाजवादी विकल्प नहीं पेश कर रहा है। दुनिया के गरीब और विकासशील देश उससे कोई विशेष उम्मीद नहीं रख पारहे हैं। चीनी विशिष्टता वाला समाजवाद अमेरिकी विशिष्टता वाला पूंजीवाद जैसा प्रतीत हो रहा है– इस बात को कहने वालों की कमी नहीं है। अमेरिकी सरकार की हरचंद कोशिश इस बात की है कि कैसे चीन को अपनी समग्र विश्व रणनीति का अंशीदार बनाया जाए। अमेरिकी पत्र–पत्रिकाओं में चीन की सारी लानत–मलामत के बाद भी पूरा जोर इस बात पर रहता है कि जलवायु परिवर्तन से लेकर आर्थिक पुनर्बहाली तक, सभी मामलों में दुनिया के इन दोनों देशों के बीच एक प्रकार का सामंजस्य कायम हों। चीन और अमेरिका की बराबरी की बात कहने वालों के बारे में अमेरिका के पूर्व ट्रेजरी अधिकारी अलबर्ट कीडेल कहते हैं कि दोनों अर्थ–व्यवस्थाओं में बराबरी करने का कोई तुक नहीं है, फिर भी ‘चीन को यह जताने के लिये कि वह हमारा भागीदार है और इसीलिये उसकी कुछ जिम्मेदारियां है, और हम जिस चीज को महत्वपूर्ण समझते हैं, उसे उस बात को सुनना चाहिए, इस बात में कुछ सार है।‘



ओबामा ने इसी बीच चीन के साथ हाथ मिलाने के लिये रणनीतिगत और आर्थिक संवाद का एक सालाना मंच बनाया है, जिसकी पहली बैठक वाशिंगटन में पिछले जुलाई महीने में हुई थी। इस मंच का मूल उद्देश्य यह है कि दोनों देशों के प्रमुख नीति निर्धारक आपस में मिले और उनके सामने जो समस्याएं है उनपर बात करें। ओबामा के शब्दों में, इसप्रकार के प्रयोग को निरर्थक नहीं समझा जाना चाहिए।

भ्रम को बनाये रखने के लिये अमेरिकी पत्रिकाएं यह जरूर कहती है कि चीन और अमेरिका हमबिस्तर होकर भी अलग–अलग सपने देखते हैं। शासन की किसकी प्रणाली ज्यादा सही और कारगर है, इसकी प्रतिद्वंद्विता में वे लगे हुए है। लगभग तीन दशक से भी ज्यादा समय पहले जब देंग ज्याओ पिंग ने चार आधुनिकीकरण के नारे के साथ चीन के तीव्र विकास की एक समग्र नीति अपनायी थी, तभी उन्होंने यह भी कहा था कि चीन को विकसित देश बनाने की प्रक्रिया में चीन समाजवादी रहेगा या पूंजीवादी, यह बात आने वाले पचास वर्षों बाद ही तय होगी। विश्व रणनीति की सही समझ को विकसित करने के लिये चीन और अमेरिका के बीच इस निरंतर विकासमान घटना–चक्र पर नजर रखने की जरूरत है।
  • अरुण माहेश्वरी