अभी हाल में


विजेट आपके ब्लॉग पर
अंतरराष्ट्रीय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अंतरराष्ट्रीय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 5 मार्च 2013

फ्रांस का माली में सैन्य अभियान : कथित समाजवादी आलेंद का साम्राज्यवादी क्षुद्र विस्तार


  • शमशाद इलाही अंसारी 



 
पश्चिमी अफ्रीकी देश माली में फ्रांस जैसी यूरोपीय महाशक्ति इन दिनों इस्लामी कट्टरपंथियों के सफाया अभियान में जुटी हुई है. कुछ हथियारबंद  दाढ़ी वाले पग्गड़धारियों ने गत ८-१० माह से वहां अपनी गतिविधियाँ बढ़ा दी थी कभी वह मध्यकालीन सूफी मज़ारों की कब्रे राजधानी टिम्बकटू में तोड़ कर खबरों में आते तो कभी देश के अधिकतर भाग पर कब्ज़े की तथाकथित ख़बरों से दुनियाभर के प्रचार माध्यमो में जगह बनाते. यह कारोबार एक ख़ास तरह का जनमनस तैयार करने के लिए  पिछले साल के आख़िरी छह महीनो से बहुत कायदे-करीने से लगातार किया जा रहा था. आखिरकार फ़्रांस ने अपने नाटो मित्रो, अमेरिकी युद्धपोतो और कनैडियन सैन्य माल वाहक युद्धक विमान की मदद से माली पर चढाई कर दी. दुनिया को पहले ही बताया जा चुका था कि वहां इस्लामी  कठमुल्लों की बढ़ती ताकत से अफ्रीकी महाद्वीप पर कितनी बड़ी अस्थिरता पैदा होने वाली थी? लिहाजा जनता की मांग और दुनिया की भलाई के लिए समाजवादी राष्ट्रपति के नेतृत्व में फ्रांस को यह फ़ौजी कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस युद्ध में अभी तक सैंकड़ों लोगों की जाने गयी है और लाखो लोग बेघर हो चुके है.

दुनिया के सभी युद्धों का एक राजनीतिक अर्थशास्त्र होता है, मानव इतिहास में कोई ऐसा युद्ध खोजना मुश्किल है जिसका कोई राजनीतिक अर्थशास्त्र न हो. आखिर फ्रांस को अपनी सरहद से हजारो किलोमीटर दूर इस अपेक्षाकृत गरीब मुल्क से क्या खतरा था कि वह उसके खिलाफ युद्ध में कूद पड़ा? आइये इन खतरों की पड़ताल की जाए और यह जानने की कोशिश की जाए कि युद्धों का असल कारण आखिर क्या होता है ?

१९७३ के ‘आयल शाक’ (खनिज तेल की कीमतों में भारी उभार) के बाद फ्रांस ने ऊर्जा के वैकल्पिक उपाए खोजने का निर्णय किया और पाया कि परमाणु उर्जा खनिज तेल का सबसे अच्छा साफ़ सुथरा और सस्ता विकल्प है जिसके परिणामस्वरूप ५६ परमाणु ऊर्जा केन्द्रों की स्थापना की गयी. आज फ्रांस में कुल ५९ परमाणु ऊर्जा केंद्र है जो उसकी कुल ऊर्जा जरूरतों का ८० प्रतिशत हिस्सा वहन करती है. इस प्रकार फ्रांस परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षेत्र में दुनिया का सबसे पहला देश है जिसकी निर्भरता तेल पर सबसे कम है. वह परमाणु ऊर्जा का न केवल अपने देश में खपत के सिलसिले में अव्वल है बल्कि वह परमाणु ऊर्जा का सबसे बड़ा निर्यातक देश भी है. ब्रिटेन की अधिकतर ऊर्जा संबंधी जरूरतों को फ्रांस ही पूरा करता है. फ्रांस की परमाणु उर्जा का उत्पादन, प्रबंधन और बिक्री आदि  में सबसे बड़ा काम ‘अरेवा’ नाम की कंपनी करती है जो सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई है जिसकी सकल संपत्ति करीब नौ अरब यूरो है,इसके कामगारों की संख्या पचास हजार के आस पास है. अरेवा और ई डी ऍफ़ के अतिरिक्त फ़्रांस में कोई दर्जन भर कम्पनियां ऐसी है जो परमाणु ऊर्जा संबंधी कामों से जुडी है जिनका व्यापार अरबो डालरों का है.

आज पूरी दुनिया में करीब ४३६ परमाणु ऊर्जा केंद्र कार्यरत है, दुनिया में सर्वाधिक औसत विकास दर  से बढ़ते हुए इस व्यापार के चलते कोई ५२१ नए परमाणु केंद्र पूरी दुनिया में कहीं न कही बनाये जा रहे है जो अगले १० वर्षो में काम करना शुरू कर देंगे. आई ए ई ए की एक रिपोर्ट के अनुसार २००३ में  दुनिया भर में १६७४२ टेरा वाट हावर्स बिजली का उत्पादन हुआ जिसका ३९.९% कोयला जला कर, १९.२% प्राकृतिक गैस,१६.३ पानी से और १५.७ % परमाणु से पैदा की गयी. मात्र ०.४% बिजली सूरज और हवा से उत्तपन हुई, अगले २५ वर्षो में यह आंकड़े पूरी तरह बदल जायेंगे और परमाणु ऊर्जा विश्व की ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने में प्रथम स्थान ले लेगी.

उपरोक्त पृष्ठभूमि के साथ ही अब इसके अगले क्रम को भी समझ लेना चाहिए. परमाणु ऊर्जा बनाने के लिए दो बुनियादी  चीजों की आवश्यकता है पहला है उन्नत तकनीक और दूसरे कच्चा माल. फ्रांस सहित प्रथम विश्व के अन्य देशो में तकनीक की कोई समस्या नहीं है अगर कोई बाधा है तो वह है कच्चे माल की यानि प्राकृतिक संसाधनों की. परमाणु ऊर्जा के लिए युरेनियम की जरुरत होती है और कुदरत अपने इस खजाने को सभी देशो को नहीं देती. दुनिया में युरेनियम के प्राप्य भंडार करीब ५.५ मीलियन टन है जिसमे आस्ट्रेलिया,कजाखिस्तान,कनैडा के पास सबसे अधिक जखीरे मौजूद हैं. यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि ३००० टन कोयले को फूंकने से जितनी ऊर्जा प्राप्त होती है वह  एक किलोग्राम युरेनियम २३५ से प्राप्त की जाती है जिसकी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में  कीमत २००७ में १३८ डालर प्रति पाउंड थी (३०४,१५२ डालर प्रति टन). जाहिर है आस्ट्रेलिया और कनैडा से युरेनियम खरीद कर परमाणु बिजली बनाकर मुनाफा नहीं कमाया जा सकता इसीलिए फ्रांस की अरेवा कंपनी अफ्रीका के अपने पूर्व उपनिवेशी देशो में खनिज सम्पदा खोजने और उनकी खदानों को विकसित करने के कारोबार में संलग्न है. मनचाही खदानों के ढूँढने,उनके खनिज उत्पाद को  निर्यात करने, खदानों पर बसे लोगो को मनमर्जी से विस्थापित करने जैसे कार्यक्रमों को अंजाम देने के लिए अक्सर मन माफिक सरकारों की जरुरत होती है.

पूरे अफ्रीकी देशो के इतिहास पर अगर नज़र डाल कर देखे तब यही पायेंगे कि अफ्रीका सभी साम्राज्यवादी शक्तियों के लिए एक पसंदीदा क्षेत्र रहा है. इन शक्तियों को यहाँ बसे लोगो में कोई दिलचस्पी कभी नहीं रही हां अफ्रीका की ज़मीन में छिपे दुनिया भर के अपार खदानों में सभी का ध्यान अपनी और खींचा है चाहे अमेरिका हो या चीन सभी देशो को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए जिन प्राकृतिक संसाधनों की जरुरत है वह सब अफ्रीका के पास है. कच्चा तेल, लौह, अयस्क, कोयला, सोना, हीरा आदि खनिजों के भंडार यहाँ मौजूद है. इसी श्रखंला में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी युरेनियम भी जुड़ गया है नाईज़र,माली, सेनेगल, अल्जीरिया से होती हुई साहेल वादी में युरेनियम सहित एनी कई खनिजो के अपार भंडार मिले है जिसका दोहन करना फ्रांस की अरेवा कंपनी का काम है. माली का पडौसी देश नाईज़र युरेनियम उत्पादन में दुनिया में छठा स्थान रखता है. २०१० में दुनिया भर में ५३,६६३ टन युरेनियम का उत्पादन हुआ जिसका ४१९८ टन हिस्सा नाईज़र से आया. अरेवा की खदाने नाईज़र, माली और सेनेगल में मौजूद है जिसकी सहायता राकगेट नामक  कनैडियन खदान कंपनी भी करती है.

  • अरेवा को पिछले दिनों यहाँ एक बड़ी सफलता हाथ लगी.नाईज़र स्थित, माली सरहद के नज़दीक उसे इमोरारेन खदान मिली जिसमे प्रतिवर्ष ५००० टन (करीब १.५२ अरब डालर मूल्य) युरेनियम का अगले ३५ सालों (मौजूदा कीमतों के अनुसार लगभग ५३.२० अरब डालर) तक उत्पादन किया जा सकता है. इमोरारेन खदान को इसी वर्ष आरंभ होना था लेकिन स्थानीय असंतोष और अन्य राजनीतिक कारणों के चलते इसे अगले साल तक के लिए टाल दिया गया है. नाईज़र में अरेवा की खदानों की गतिविधियों का जनता पर भारी असर पड़ा है जिसका विरोध दिन बा दिन बढ़ता जा रहा है. जब स्थानीय नागरिको को यह पता चला कि खदानों के कारण वहां के पानी में रेडियशन की मात्रा अत्यधिक बढ़ गयी और लोग कैंसर जैसी बीमारियो का सामना करने लगे तब उन्होने संगठित विरोध करना शुरू किया जिसके चलते पिछले वर्ष अरेवा कंपनी के प्रबंधक एम ए लौवेर्गन को नाईज़र से भागना पड़ा. इस आन्दोलन का असर माली और सेनेगल पर भी पड़ने लगा और लोग संगठित होकर इन खदानों का विरोध करने लगे.


माली की अंदरुनी राजनीतिक स्थितियां भी पिछले दिनों कई संकटों से दो चार हुई. मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व यूरोपीय हितों की पूर्ती करके अपने पेट भरता रहा और देश की राजनीतिक समस्याओं का जवाब दमन और जनविरोधी नीतियों से ही देता रहा जिसके लिए उसे हथियार और धन पश्चिमी ताकतों से प्राप्त होते रहे. माली का तुआरेग आन्दोलन एक ऐसा ही जन जातियों का आन्दोलन है जो देश की आज़ादी के बाद से ही अपनी मांगो के लिए प्रयासरत है ताकि उन्हें देश के संसाधनों के बंटवारे में उनका हक़, जनवादी अधिकार और सत्ता में हिस्सेदारी मिल सके. १९६० के दशक से चl रहा यह आन्दोलन अफ्रीकी महाद्वीप के सर्वाधिक पुराने आंदोलनों में गिना जाता है जिसकी जडें नाईज़र तक में फ़ैली हुई है. लीबिया के पुर्व शासक गद्दाफी से समर्थन प्राप्त इस आन्दोलन के माली हकुमत के साथ १९९५ में शान्ति समझौते में गद्दाफी का बहुत बड़ा हाथ था लेकिन उसकी मृत्यु के बाद लीबिया सेना के हथियारों का एक बड़ा हिस्सा इस्लामी लड़ाकुओ के हाथ लग गया जिससे माली की सत्तारूढ़ सरकार, तुआरेग ताकतों और इस्लामी लड़ाकुओं के बीच  शक्ति संतुलन ही बिगड़ गया. हथियारों के बल पर टिम्बकटू में इस्लामी लड़ाकुओं ने वो कहर मचाया जो तुआरेग आन्दोलनकारी पिछले ५० सालो में न कर सके.

फ़्रांस की सरकार और अफ्रीकी खदानों में उसके हितों के रक्षको को इस अव्यवस्था में अपनी रोटी सकने का इससे अच्छा अवसर और कौन दे सकता था ? उनका इस समस्या के समाधान से कोई  लेना देना न पहले था; न अब है, और न भविष्य में होगा. फ्रांस के लिए इस इलाके (साहिल वादी) का महत्व उतना ही है जितना अमेरिकी कम्पनियों के लिए ईराक के तेल से था. अगर अमेरिकी कम्पनियां अपने फायदे के लिए ईराक को तबाह और बर्बाद कर सकती है तो फ्रांस के सैनिक माली में घुस कर पडौसी नाईज़र और सेनेगल को फूलों की भेंट देने नहीं गए है. वे इन देशो में फ्रांसीसी खदानों से खनन और उसके निर्बाध्य निर्यात को सुनिश्चित कराने वहां पहुंचे है जिसके खिलाफ वहां लगातार जन आक्रोष बढ़ रहा था. दुनिया भर में परमाणु ऊर्जा के शिखर पर बैठा फ्रांस अपनी धरती से एक किलो युरेनियम भी पैदा नहीं करता. फ्रांस का परमाणु ऊर्जा उद्योग पूर्णत: आयातित युरेनियम पर निर्भर है.

भविष्य में परमाणु ऊर्जा के प्रयोग पर लगातार बढ़ती निर्भरता युरेनियम की खोज और उसके उत्तखनन को और अधिक महत्व देता दिखाई पड़ा रहा है. आई ए ई ए के अनुसार २०१० में  दुनिया के विभिन्न देशों ने युरेनियम की खोज और उसके संसाधनों के विकास पर २ अरब डालर से अधिक खर्च किया है. मात्र २००८ और २०१० के बीच युरेनियम के उत्पादन में २५% वृद्धि दर्ज हुई . २०१२ में ८१९४८ टन युरेनियम का इस्तेमाल किया गया. अमेरिका ने २००५ में २२,३९७ टन जो कि दुनिया का ३३% है प्रयोग किया इस युरेनियम का मात्र ८३५ टन का उत्पादन घरेलू था जबकि २१,५६२ टन विदेशो से खरीदा गया था, फ़्रांस ने १०,४३१ टन युरेनियम इस्तेमाल किया जो दुनिया में प्रयुक्त हुए युरेनियम का १५% है लेकिन इसमे एक ग्राम युरेनियम भी घरेलू उत्पादित नहीं था.

उपरोक्त अध्ययन के पसेमंज़र में पाठकों को यह समझाना अब आसान होगा कि माली में फ्रांस के साथ अन्य यूरीपीय देशो की फ़ौजी कार्यवाही शुद्ध रूप से एक साम्राज्यवादी एजेंडे का रद्दे अमल है जिसे आजकल जनता की सुरक्षा के नाम पर अंजाम दिया जा रहा है. इन सैन्य कार्यक्रमों  का अर्थ दूसरे देशो के खनिज संसाधनों पर कब्ज़ा करना है और साथ ही इन देशो में पनप रहे जनवादी राष्ट्रीय मुक्ति से सच्चे आंदोलनों का गला घोंटना भी है. फ्रांस जिसने मानव जाति को १७८९ की क्रान्ति के बाद आजादी के नए मूल्य दिए आज उसका समाजवादी नेतृत्व अपने कथित राष्ट्रीय हितो को सामने रखते हुए दूसरे देशो की सार्वभौमिकता, स्वतंत्रता और जनांदोलनो को कुचलने के लिए अपनी सैन्य शक्ति का प्रयोग कर रहा है. उसके इस अतिक्रमण पर विश्व समुदाय ने मानो स्वीकृति प्रदान की हो. अमेरिका अपने हितो के लिए ईराक अफगानिस्तान में जाए, चीन सूडान, लीबिया, बर्मा,पाकिस्तान,  अल्जीरिया में कुण्डली लगाए तो  भारत कभी माल द्वीप,श्रीलंका ,नेपाल को धमकाए या फ्रांस माली में अपनी फौजे भेजे, इन सब प्रश्नों पर विश्व जनमत को न केवल गुमराह किया जा रहा है बल्कि उसे चुप्पी साधने के टोन टोटके कराये जा रहे है.

हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे है जिसमे प्राकृतिक संसाधनों के जायज़ प्रयोग पर कोई जन आधारित नीति अभी तक नहीं बनी है. यह सिर्फ  उद्दण्ड ताकतवरो का युग है जिसमे हर देश ने अपनी अपनी ताकत के बूते पर अपने देश अथवा अपने देश की सीमाओं से बाहर  दूसरे देशो के प्राकृतिक संसाधनों पर धन/नीति-करार/ भय के आधार पर  कब्ज़ा किया हुआ है. इस प्राकृतिक लूट के कारोबार में  में दुनिया भर के  खून चूसू नेतृत्व की चांदी ही चांदी है. वह खुद को बेच कर अपने देश के संसाधनों को कौड़ियो के भाव अपने देश के बाहर के व्यापारियों को बेच सकता है. भारत के छत्तीस गढ़ और उडीसा में पोस्को कम्पनी के विरोध को इसी नज़रिए से साफ़ देखा जा सकता है. दुनिया में मानवजाति की बराबरी, उसके संसाधनों पर बराबर के हक़ की जरुरत जितनी आज है उतनी पहले कभी महसूस नहीं की गयी. इन्ही प्रश्नों पर दो विश्व युद्ध पहले  हो चुके है, लेकिन अभी  तीसरा नहीं होगा यह कोई नहीं कह सकता. 

मंगलवार, 6 मार्च 2012

मौजूदा इरान संकट: क्या करें वाम-जनवादी ताकतें?



  • शमशाद इलाही 'शम्स'


इरानी परमाणु कार्यक्रम के चलते उसके पश्चिम के साथ बढ़ते अन्तर्विरोधों के मद्देनज़र तीसरी दुनिया के देशों में इरान के प्रति बढ़ती हमदर्दी एक गंभीर वैचारिक समस्या है. खासकर भारत की प्रगतिवादी-जनतांत्रिक ताकतें, अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों के विरोध के चलते इरानी सरकार के पक्ष में समर्थन जुटाने के ऐतिहासिक बोझ को ढोने का कार्य करती प्रतीत होती हैं. यही  काम उन्होंने इराकी तानाशाह सद्दाम के लिये किया था और यही लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफ़ी के लिये. इनके विरोधी सुरों के साथ  शिया इस्लामी बुनियाद परस्तों की आवाज़ें भी सुनी जा रही हैं, क्या यह नया राजनीतिक समीकरण है जिसमें वाम, लोकतांत्रिक शक्तियाँ राजनीतिक इस्लामी फ़ासीवादी शक्तियों के साथ एकजुट होंगी?

मौजूदा इरानी नेतृत्व को इरान की जनवादी और कम्युनिस्ट ताकतों को ठण्डे दिमाग से एक-एक कर कब्रिस्तान भेजने के गुनाह से क्या माफ़ कर दिया गया है? क्या इरानी सरकार अपनी परमाणु नीति के चलते अपने समाज के लोकतांत्रिकरण के किसी  ऐतिहासिक विशाल ऐजेण्डे पर काम कर रही है? क्या उसका परमाणु कार्यक्रम इरान में ज़मीदारी, इज़ारेदारी, बेरोज़गारी का खात्मा करने का कोई ऐसा दिव्य बल्यु प्रिंट तैयार कर रहा जिसे मानव जाति ने पहले कभी प्रयोग नहीं किया? क्या धर्म आधारित इरानी सरकार का जनविरोधी स्वरुप अब बदल गया है? क्या वहाँ की आवाम को जनवादी अधिकार, महिलाओं को  आत्मनिर्णय के अधिकार, समाज में व्यापक मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, जेलों में सड़ रहे हजारों राजनीतिक विरोधियों की मुक्ति, शरिया जैसे आदिम बर्बर कानूनों से मुक्ति जिनकी आड़ में राजनीतिक विरोधियों का अक्सर दमन (सरेआम फ़ांसियाँ देकर) किया जा रहा है, आर्थिक विषमतायें,स्वास्थ, परिवहन, शैक्षणिक विषमतायें, व्यापक भ्रष्ट्राचार, सरकारी खुफ़िया तंत्र/पुलिस से भयमुक्त समाज जैसे मूलभूत प्रश्नों को हल कर लिया गया है?

आईये आपको १९७९ की इरान की इस्लामी क्रांती के बाद हुए राजनीतिक दमन का एक नज़ारा करा दिया जाये, मुल्लाहों की सत्ता पर पकड़ मज़बूत होते ही इरानी ब्राण्ड के इस्लामी फ़ासीवाद ने अपने उस्ताद हिटलर के नक्शे कदम पर चलते सबसे  पहले अपने राजनीतिक विरोधियों की धर पकड़ शुरु की, जिसमें मुजाहिदीने ख़ल्क और तुदेह पार्टी सबसे पहले नंबर पर निशाना बनी, दोनों दलों के हजारों नेताओं, कार्यकर्ताओं, समर्थकों को पकड़ कर ऐविन और गौहर दश्त नाम की जेलों में ठूँस दिया गया, यह घटना १९८२ की है जब इरानी नेतृत्व ने एक सोची समझी नीति के साथ पूरे देश में अपने राजनीतिक विरोधियों के सफ़ाये का राष्ट्रीय अभियान चलाया. ध्यान रहे मुजाहिदीने ख़ल्क की स्थापना १९६५ में हुई थी और उसके द्वारा चलाये गये राजशाही के खिलाफ़ संघर्षों और कुबार्नियों का एक बड़ा इतिहास रहा है, इरान की मुल्लाह सरकार ने जेलों में बंद इस दल के कार्यकर्ताओं से काग़ज़ी कार्यवाही के तहत जो फ़ार्म भरवाये थे, उनकी कुछ लाईनें आपके सामने  नीचे दी जा रही हैं:-

* क्या  तुम अपने पुराने सहयोगियों के सार्वजनिक त्रिस्कार की इच्छा रखते हो?
* क्या तुम यह काम कैमरे के सामने कर सकते हो?
* क्या तुम उन्हें पकड़वाने में सरकार की मदद करोगे?
* क्या तुम हमें अपने गुप्त समर्थकों की सूची दोगे?
* क्या तुम हमें उन सहयोगियों के नाम दोगे जिन्होंने सरकार के समक्ष दिखावटी पश्च्यताप किया है?
* क्या तुम दुश्मन के खिलाफ़ युद्ध के मोर्चे पर जाओगे और बारुदी सुरंगों वाले इलाके से भी गुजरोगे?

दूसरे नंबर के खतरनाक राजनीतिक कैदी थे, तुदेह पार्टी के नेता और उसके कार्यकर्ता, तुदेह पार्टी की कुर्बानियाँ, शाह पहलवी शासन के विरुद्ध उसके शहादत भरे संघर्ष शायद तीसरी दुनिया में चल रहे किसी भी मुक्ति संघर्षों और तहरीकों से कमतर नहीं थे. इरान में कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास १९०६-७ से आरंभ हुआ, १९१७ में  इन्हीं तत्वों ने अदालत पार्टी बनायी, १९२० में विधिवत रुप से इसका नाम बदल कर कम्युनिस्ट पार्टी इरान रख दिया गया था, १९२१ से ३० के बीच शाह शासन के दमन के चलते पार्टी को लगभग खत्म ही कर दिया गया था. १९४१ तक आते आते फ़िर इरानी समाज के क्रांतिकारी तत्वों ने करवट ली और तुदेह पार्टी को जन्म दिया. तुदेह पार्टी के सदस्यों को इरानी इस्लामी सरकार ने जेल में जो फ़ार्म भरने के लिये दिये, उनकी कुछ लाईनें ज़ेरे ग़ौर हैं:-

* क्या तुम मुसलमान हो?
* क्या तुम खु़दा में यकीन रखते हो?
* क्या पवित्र कुरान खुदा के वचन हैं?
* क्या तुम जन्नत और दोज़ख़ में यकीन करते हो?
* क्या तुम पैगंबर मौहम्मद को आखिरी रसूल मानते हो?
* क्या तुम ऐतिहासिक भौतिकवाद को सार्वजनिक रुप से खारिज करोगे?
* क्या तुम अपने पुराने विचारों को कैमरे के समक्ष खारिज कर सकते हो?
* क्या तुम रमज़ान रखते हो?
* क्या तुम नमाज़ पढ़ते हो, कुरान शरीफ़ पढ़ते हो?
* क्या तुम किसी मुस्लिम अथवा गैर मुस्लिम के साथ जेल की सेल में रहना पसंद करोगे?
* क्या तुम इस बात का हलफ़ उठाते हो कि तुम खुदा में, कुरान में, पैगंबर में और कयामत में भरोसा रखते हो?
* तुम्हारे बचपन में तुम्हारे माता पिता क्या रोज़ा रखते, नमाज़, कुरान आदि पढ़ते थे?

इन सवालों के मद्देऩज़र आप इस बात का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि एक प्रगतिशील दिमाग उपरोक्त मध्यकालीन, बेहूदा सवालों का क्या जवाब देगा? जेल में जवाब देने वाले कार्यकर्ताओं-नेताओं को यह भी नहीं मालूम था कि उनके द्वारा दी गयी जानकारियों को एक साक्षात्कार की शक्ल दे दी जायेगी. एकतरफ़ा अदालती फ़ैसला लेकर उन्हें सीधे फ़ांसी के तख़्ते पर भेजने का आयोजन इस्लामी फ़ासीवाद कर चुका था. सही गिनती कोई नहीं जानता, एमनेस्टी और दिगर मानवाधिकार संगठनों के अनुमान के मुताबिक १९८२-८३ में मुजाहिदीने ख़ल्क और तुदेह पार्टी के  १० से ३० हजार पार्टी कार्यकर्ताओं को पूरे इरान में फ़ांसी दी गयी. इरानी सरकार ने  इन देशभक्त शहीदों को कहाँ दफ़न किया, यह एक साल के बाद उन परिजनों को ही बताया जिनसे हुकुमत ने एक खास समझौते पर हस्ताक्षर करवा लिये. समझौते में यह सब धारायें थी कि आप सार्वजनिक रुप से कोई सोग अथवा प्रचार नहीं करेंगे, कोई धार्मिक आयोजन नहीं करेंगे आदि आदि. इस "राजनीतिक सफ़ाई" का नतीज़ा यह  हुआ कि आज इरान में किसी भी विपक्षी पार्टी का कोई नेता अपने देश में नहीं है, ये सभी निर्वासित जीवन बिताने को मजबूर हैं. इरान में इस वक्त जो विपक्ष की भूमिका निभा रहा है वह सरकारी पक्ष का वह खेमा है जिसे सुधारवादी कहा जाता है. आज लगभग ७.५ करोड़ इरानी आबादी का एक बडा हिस्सा अपना देश छोड़ कर दूसरे देशों में रहता है जिसकी संख्या तकरीबन ४० से ५० लाख के बीच आंकी जाती है.

इरान की इस्लामी क्रांति के बाद इस तथ्य से कौन वाकिफ़ नहीं कि इरानी नेतृत्व ने अपने किस्म के (शिया) इस्लामी इंकलाब लाने का खुलेआम आह्वान अपने पड़ौसी देशों (इराक, कुवैत, सऊदी अरब आदि) की जनता से नहीं किया? खुमैनी की तकरीरें आज भी इस बात की शहादत हैं कि उसके उत्तेजक विचारों ने अपने पड़ौस की हुकूमतों को असुरक्षित ही नहीं किया बल्कि तत्कालीन इराकी उप-प्रधानमंत्री तारिक अज़ीज़ पर कथित कातिलाना हमला करवा कर उन्हें अस्थिर भी करने की कोशिश की, इरान के इसी धार्मिक कट्टरवाद के चलते इरान-इराक का युद्ध १९८०-१९८८ तक चला जिसमें लगभग १० लाख इरानियों ने जानें गवाईं, इरानी जनता को इस भयंकर खूनी युद्ध में न केवल बेशकीमती इंसानी जिंदगियों की बर्बादी झेलनी पड़ी वरन उसे लगभग ६०० अरब डालर की आर्थिक हानी भी उठानी पडी.

इस्लामी इरान के उपरोक्त खूनी इतिहास के मद्देनज़र क्या उसकी परमाणु महत्वकाँक्षाओं को शक की नज़र से नहीं देखना चाहिये? अब जबकि इरान के चिर-परिचित दुश्मन इराक का सफ़ाया हो चुका है लेकिन इरान में अभी उसी इरानी किस्म के इस्लामी विस्तारवादी विचारधारा का सामुहिक सम्मोहन मौजूद है जिसे महमूदनिजाद और सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह खामनेई के भाषणों से  भलिभांति समझा जा सकता है. इरान का मौजूदा नेतृत्व शातिराना ढ़ग से तीसरी दुनिया के देशों से अपनी एकजुटता के नाम पर अपने परमाणु कार्यक्रम के बचाव में आम सहमति लेने में जुटा है, इसमें वह सफ़ल होता भी दिख रहा है. इरान की क्षेत्रिय ताकत बनने की महत्वकाँक्षा अभी दबी-छिपी नहीं हैं. यह बात संयुक्त अरब अमीरात (जिसके तीन द्वीपों को इरान अपना बताता है), सऊदी अरब, कुवैत, बाहरीन, कतर, यमन आदि को भी समझ में आती हैं, यही कारण है कि इरानी परमाणु कार्यक्रम से इस्राईल को इतनी परेशानी नहीं जितनी इन मध्य एशियाई शाही हुक्मरानों को है. इरानी कुटिल राजनीतिक चालों के तहत इस्राईल पर राजनीतिक हमला, द्वितीय विश्वयुद्ध में यहूदियों के कत्लेआम को झुठलाने के पीछे उसके कुत्सित इरादे साफ़ हैं, और वह यह है कि उसे पूरी दुनिया के मुसलमानों का नेता बनना है. उसे दुनिया के मुसलमानों को सऊदी प्रभाव (वहाबी-सलफ़ी) से मुक्त करा कर उन्हें  शिया-सफ़विद छाप इस्लामी एजेंडे पर लाना है, इसका प्रमाण आप लेबनान में हिज़्बोल्लाह को २००६ से अब तक दी गयी मदद से देख सकते हैं. इसी एजेण्डे के तहत भारत-पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान में शिया मदरसों, शिक्षण संस्थाओं और काले मुसाफ़े लगाये शिया धार्मिक गुरुओं की आयी अचानक बाढ़ से अंदाज़ा लगा सकते हैं. यही नहीं अब इरानी प्रभाव को अफ़्रीकी महाद्वीप पर भी देखा जा सकता है. मिस्र से लेकर नाईजीरिया तक इरानी किस्म के इस्लाम की छाप और उससे जुड़ी गतिविधियों पर आँख मूँद कर  यदि कोई मौजूदा इरानी सरकार के परमाणु कार्यक्रम का बचाव करता हैं, तब इसे आत्महत्या का एक आसान राजनैतिक रास्ता ही कहा जायेगा.

आज यूरोप के कई देशों में जहाँ परमाणु सयंत्रों पर सवाल उठाये जा रहे हैं, जर्मनी जैसा देश परमाणु उर्जा सयंत्रों को बंद करने का ऐलान कर चुका है, जापान इसके दंश भुगत कर इससे तुरंत मुक्ति पाना चाहता है, वहाँ इरान जैसे पिछडे देश द्वारा परमाणु उर्ज़ा सयंत्रों को विकसित करने की कोशिश इस बात की तरफ़ साफ़ इशारा करता है कि इसका मकसद उर्जा से संबंधित नहीं वरन परमाणु शक्ति बन कर क्षेत्रीय शक्ति बनना अधिक है. याद रहे भारत में परमाणु उर्जा के प्रश्न पर भारी बहस हुई थी, पिछली केंद्रीय सरकार जिसे वाम समर्थन हासिल था,  तत्कालीन भारत सरकार अमेरिकी  सरकार के साथ परमाणु संधि नहीं कर सकी थी क्योंकि इसका विरोध सहयोगी वाम दलों ने किया था, तब परमाणु उर्जा के विकल्प पर ही बडी बहस हुई थी, आज यही शक्तियाँ इरान द्वारा परमाणु उर्जा के सयंत्र की उपादेयता पर प्रश्न क्यों नहीं उठा रही हैं?
इराक से सद्दाम सरकार को उखाड़ देने के बाद इरान का अभी किसी पडौसी शक्ति से प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं रहा, अभी उसका पूरा ध्यान अपने किस्म के इस्लामी ब्राण्ड को प्रोत्साहित करने में लगा है. उसका इस्राईल के विरुद्ध बढ़ चढ़ कर बोलना, इस्राईल की बैसाखी पकड़ कर मुस्लिम जगत में स्वंय को नेता स्थापित करने का एक सचेतन प्रयास है. वह ऐसे किसी प्रसंग पर खामोश नहीं रहता जिसमें उसे इस्लामी जगत के मध्य खुद को एक विकल्प बताने का मौका मिलता है. मध्य ऐशिया में इरानी प्रभाव को सीमित करने की दिशा में स्थानीय राजाओं ने अपने तरीके से रणनीतियाँ बनायी हैं. सऊदी अरब में तीन  बड़े अमेरिकी फ़ौजी अड्डे हैं, अमीरात में अमेरिकी और फ़्रांसीसी सेना के स्थायी अड्डे हैं. बहरीन, यमन, कतर में अमेरिका के भारी सैन्य ठिकाने हैं. इरान के पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ किसी भी किस्म के सैन्य संघर्ष होने की स्थिती में इरान को सऊदी अरब, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कतर स्थित अमेरीकी सैन्य ठिकानों पर वार करना प्राथमिक एंव महत्वपूर्ण कार्यवाही होगा. ऐसी स्थिती में ये मध्य पूर्वी देश आसानी से इरान के किसी भी हमले को अपनी सरकारों के खिलाफ़ हमला बता कर पूरी दुनिया के मुसलमानों को यह संदेश दे सकते हैं कि इरान अपनी शिया विचारधारा को सुन्नी देशों के खिलाफ़ युद्ध के जरिये थोपना चाहता है. जाहिर है इरान के किसी भी प्रकार के हमले को अपनी अदम्य सैन्य क्षमता के चलते इस्राईल भलिभाँति झेलने की स्थिती में है, लेकिन अन्य अरब देशों पर यदि इरानी हमले होते हैं तब भारी जान माल के नुकसान की आशंका है. यहाँ यह तथ्य बताना प्रसांगिक है कि पूरी दुनिया के मुसलमानों की संख्या का मात्र १० प्रतिशत तबका ही शिया अकीदे में यकीन रखता है.

साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा इरान के विरुद्ध युद्ध के मंसूबों को रोकना एक बात है, इरानी की मौजूदा सरकार के परमाणु शक्ति और उसके अधिकार को समर्थन देना- दो परस्पर विरोधी बातें हैं. इरानी धर्मराष्ट्र का समर्थन करना, इसके बढ़ते भार को ढ़ोना वाम-जनवादी शक्तियों के कार्यभार कदापि नहीं हो सकते. वाम-जनवादी शक्तियाँ यदि ऐसा करती हैं तब उनके सरों पर इरान की मौजूदा सरकार द्वारा किये गये अपराधों को न केवल खुला समर्थन देने जैसा होगा बल्कि उन शहीदों के प्रति सरासर गद्दारी होगी जिन्होंने इरान को एक लोकतांत्रिक, जनवादी शक्ति बनाने का ख्वाब लिये अपने जीवन का बलिदान दिया. भला ऐसी स्थिती में कोई महमूदनिजाद की सरकार को कोई कैसे समर्थन दे सकता है? याद रहे, १९९१ के सोवियत पतन के बाद यही राजनीतिक इस्लाम अब पूँजीवाद के मुकाबिले खुद को एक विकल्प बताने में जुटा है, इस्लाम के जेहादी तत्व आज पूरी दुनिया में स्वयं को एक ग्रहणीय विकल्प बताने/साबित करने में जुटे हैं और किसी भी वक्त कम्युनिस्ट ताकतों के विरुद्ध संघर्ष में आने पर  यह तबका कोई रियायत नहीं बरतता. यह निर्ममता के साथ दुनिया भर में कम्युनिस्ट और वाम ताकतों को सूली पर चढ़ाता है. क्या हमारे साथी अफ़गान राष्ट्रपति नजीबुल्लाह की सरेआम फ़ांसी के दर्दनाक, बर्बर प्रसंग को भूल गये? क्या आप यह भूल गये कि कामरेड नजीबुल्लाह को मौत देने से पूर्व इन इस्लामी ताकतों ने उनके साथ क्या क्या किया था?

राजनीतिक इस्लाम के किसी भी स्वरुप चाहे वह शिया हो या सुन्नी, चाहे वह कितने भी क्रांतिकारी ढ़ग से अमेरिकी साम्राज्यवाद से लड़ रहा हो, उसका समर्थन एक भारी राजनीतिक भूल होगी, महमूदनिजाद से लेकर नसरुल्लाह तक, कथा वाचक ज़ाकिर नायक से लेकर मिस्र के ब्रदरहुड तक, वाम ताकतों को न केवल वैचारिक स्तर पर स्वंय को उन्नत, बेहतर और सफ़ल विकल्प साबित करना होगा, बल्कि इन मज़हबी ताकतों के तमाम हथकण्डों और उनकी मानव विरोधी कारगुज़ारियों को बेनकाब करते हुये, इन्हें परास्त करना होगा. युद्ध का विरोध किसान, मज़दूर, छात्र, बुद्धीजीवी मेहनकश तबके की एकता के जरिये जनता के विशाल बहुमत द्वारा ही किया जा सकता है, हमारे लिये संघर्ष के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, सिर्फ़ संघर्ष के माध्यम से ही इन जन विरोधी शक्तियों का पर्दाफ़ाश किया जा सकता है. इरान की मेहनतकश आवाम ही उसके देश में सत्ता के शिखर पर बैठे मुल्लाह तंत्र को परास्त कर सकती है. वही उनके युद्दोंमादी ऐजेण्डे का भाण्डा फ़ोंड करेगी. वही शक्तियाँ पूरी मध्य ऐशिया में एक सच्चे लोकतांत्रिक विकल्प का रास्ता पैदा करेगी. हमें उन्हीं ताकतों को समर्थन देना है और उनका आह्वान करना है कि उनके इस मुक्ति युद्ध में हम बराबर के शरीक हैं, उन्हें ही हमें मज़बूत करना है, यही एक सच्चा वाम-जनवादी रास्ता है और यही उसके ऐतिहासिक कार्यभार भी हैं. राजनीतिक इस्लाम १४०० वर्ष पुराना एक असफ़ल प्रयोग है जिसे आज इस्लामी फ़ासीवादी ताकतें हथियारों के बल पर पूरी दुनिया को भयग्रस्त करके एक विकल्प बताते में जुटी हैं, साम्राज्यवाद के खूंखार चेहरे से अधिक भयानक इस्लामी फ़ासीवाद है जिसमें न कोई तर्क है न बुद्धि, बस अंधविश्वास के बूते उसमें पूरी दुनिया में हरी पताका फ़ैलाने का उन्मादी जुनून मौजूद है.

मौजूदा इरानी मुल्लाह सरकार की हिमायत करने से पूर्व कृपा करके उपर दिये गये इरानी प्रश्नों के उत्तर एक बार आप  खुद दें, फ़िर समझें कि आपकी दशा क्या होगी? मेरे-आपके उत्तर वही होते जो भगत सिंह के जवाब होते..मुझे और तुम्हें फ़ाँसी पर चढ़ा देने के ये प्रयाप्त सबूत हैं लिहाज़ा अगर जीना है और सचमुच किसी समाजवादी सपने को साकार होते देखना है तब इस्लामी ब्राण्ड के किसी भी राजनीतिक वाद के खिलाफ़ अपने म्यान में रखी तलवारें निकाल लें. आने वाली नस्लों को अफ़सोस नहीं होगा कि उनके बुज़ुर्गों ने हमेशा गोर्बाचेव की तरह गलतियाँ नहीं की.
================================================================

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

मिस्र, ट्यूनीशिया…इतिहास अभी मरा नहीं है!


अरब परिघटना – सवाल सिर्फ़ तानाशाही का नहीं है
·         
पहले ‘उत्तरी अफ़्रीका के हांगकांग’ कहे जाने वाले ट्यूनीशिया और अब अरब क्षेत्र में अमरीकी साम्राज्यवाद के सबसे विश्वस्त सहयोगी मिस्र में पिछले दिनों हुई घटनाओं ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। जहाँ ट्यूनीशिया के तानाशाह बेन अली को देश छोड़ कर भागना पड़ा, वहीं मिस्र में होस्नी मुबारक़ द्वारा मंत्रिमण्डल में व्यापक फेरबदल के बावज़ूद लाखों की जनता सड़कों पर है और वह मुबारक़ के सत्ता छोड़े जाने से पहले वापस लौटने के मूड में नहीं लग रही। इन लड़ाईयों ने अब निर्णायक रूप ले लिया है और स्थिति लगातार विस्फोटक बनी हुई है।  दशकों से सत्ता में बने हुए इन शासकों के प्रति जनता का जबर्दस्त गुस्सा सिर्फ़ तानाशाही के प्रति नहीं है। पश्चिमी और पूंजीवादी मीडिया इस पूरी परिघटना को केवलचुनाव आधारित लोकतंत्र के समर्थन में तानाशाही के ख़िलाफ़ जनाक्रोशके रूप में दिखाने का प्रयास कर रहा है। इसके पीछे उन जगहों पर पुराने शासकों की जगह अपने समर्थन वाले नये चेहरों को स्थापित करने की मंशा भी है कि जिससे वहाँ अमेरीकी नेतृत्व वाले साम्राज्यवाद के हित सुरक्षित रह सकें। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस आक्रोश की जड़ें गहरी हैं और सीधे-सीधे नव उदारवादी नीतियों के उन घातक तथा विभाजनकारी परिणामों से जुड़ी हुई हैं जिनके स्पष्ट धब्बे हम अपने देश की आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में भी देख सकते हैं।

वैसे तो इन दोनों देशों की स्थितियों में काफ़ी फ़र्क है, जहां मिस्र अरब जगत की सबसे अधिक जनसंख्या वाला सामरिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण देश है तथा सऊदी अरब व इज़राइल के साथ अरब में अमरीकी  साम्राज्यवाद का मज़बूत स्तंभ है, वहीं ट्यूनीशिया फ्रांसीसी उपनिवेशवाद से मुक्ति के बाद भी फ्रांस के व्यापक प्रभाव वाला एक छोटा सा देश है, हालाँकि, अपनी नवउदारवादी व्यवस्था के कारण ट्यूनीशिया भी साम्राज्यवादियों का दुलारा था। लेकिन इन दोनों के बीच समानता का भी एक बिंदु है। वर्ष 2000 के आसपास ही इन दोनों देशों में विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष नियंत्रित नव उदारवादी आर्थिक नीतियाँ लागू की गयीं और अगले कुछ वर्षों में इन नीतियों के परिणाम सतह पर दिखने लगे। ट्यूनीशिया के आंदोलन के दौरान वहां के अर्थशास्त्री स्ट्रास काह्न ने कहा, ‘ट्यूनीशिया की जनता अब ‘विश्व अर्थव्यवस्था की आज्ञाकारी शिष्य बन कर और नहीं रह सकती। इस प्रक्रिया ने उसे भूखों मार दिया है।’ दरअसल, इन दोनों देशों में इन नीतियों के लागू होने के बाद से ही आम जनता का जीवन बेहद मुश्किल होता गया है। 2006 से 2008 के बीच ट्यूनीशिया में मक्के, गेंहू और चावल की क़ीमतों में तीन गुने से भी अधिक की बढ़ोत्तरी हुई और इसी दौर में बेरोज़गारी में भी तीस फीसदी से अधिक की बढ़ोत्तरी देखी गयी। बात यहीं पर नहीं रुकी और 2010 के दिसम्बर तक अनाजों और शक्कर की क़ीमतों में और बत्तीस फीसदी की बढ़ोत्तरी हो गयी। जहाँ एक तरफ़ जनता मंहगाई और बेरोज़गारी के बोझ तले दबी जा रही थी वहीं अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक वहाँ की सरकार पर खाद्य पदार्थों से सभी प्रकार की सब्सीडियाँ हटाने तथा व्यापार को और मुक्त करने के लिये दबाव बना रहे थे। मिस्र में भी वर्ष 2000 में लागू इन नीतियों के ऐसे ही परिणाम सामने आये। वहां ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या बढ़कर चालीस फ़ीसदी हो गयी, मंहगाई में भयावह वृद्धि हुई और बेरोज़गारी की दर अभूतपूर्व रूप से ऊंचे स्तर पर चली गयी। इन सबसे बेख़बर बेन अली और उसके पारिवारिक सद्स्यों सहित सत्ता वर्ग से जुड़े लोग दोनों हाथों से पैसे कमाने में लगे रहे। भ्रष्टाचार द्वारा सरकारी ख़ज़ाने का एक बड़ा हिस्सा इन लोगों ने अपनी तिजोरियों में भर लिया। इन सबका प्रतिरोध होना स्वाभाविक ही था। ट्यूनीशिया में वर्ष 2000 में ही हाई स्कूल के छात्रों ने एक बड़ा और देशव्यापी आंदोलन किया था, इसके ठीक बाद इराक़ युद्ध के विरोध में हज़ारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे, 2002-2003 में दूसरा इंतिफ़ादा आंदोलन उभरा तथा 2008 में गफ़्सा में हड़तालें और प्रदर्शन हुए। हालांकि इन सबको बेन अली की फ्रांस समर्थित तानाशाही सरकार ने पुलिस तथा सेना के दम पर दबा दिया लेकिन इसके ठीक बाद जून 2010 में सिडी बोज़िड में एक छात्र मोहम्मद अल-बुआज़िज़ी ने बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ एक आंदोलन के दौरान आत्मदाह कर लिया और इसके बाद से ही आंदोलन पूरे ट्यूनिशिया में फैल गया तथा देश भर में हड़तालों, प्रदर्शनों तथा दमन का दौर शुरु हो गया जो जनवरी इंक़लाब की पूर्वपीठिका बनी और अंततः जनता बेन अली को देश बदर करने में सफल हुई। हालांकि यह भी सच है कि अभी भविष्य के ट्यूनीशिया की शक्ल साफ़ नहीं हुई है लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि जनता किसी एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं एक जनविरोधी व्यवस्था के ख़िलाफ़ सड़क पर आई थी और उसे ज्यादा दिन तक ख़ामोश नहीं रखा जा सकता।

मिस्र की स्थिति भी अलग नहीं है। देश के भीतर बढ़ती बेरोज़गारी, मंहगाई और भ्रष्टाचार, ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध, विपक्षी पार्टी बनाने पर अघोषित प्रतिबंध तथा अमरीका परस्त नीतियों के चलते लोगों में भारी आक्रोश था। हालिया परिघटना के पहले भी 2 अप्रैल, 2010 को पूरे मिस्र में लाखों लोग सड़कों पर उतर आये थे और उन्हें पुलिस तथा शासन के भयावह दमन के बाद ही शांत किया जा सका था। पिछले नवम्बर में चुनावों के नाम पर हुई नौटंकी के बाद से ही देश भर में गुस्सा खदबदा रहा था और ट्यूनीशिया की बग़ावत ने लोगों में वह हिम्मत भर दी कि पिछले कई दिनों से देश भर में लाखों प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं और अब सेना ने भी जनता के इस हिरावल दस्ते पर कोई दमनात्मक कारवाई करने से मना कर दिया है। राष्ट्रपति की सरकार में दिखावटी तब्दीली की तमाम कोशिशों के बावज़ूद जनता किसी समझौते के लिये तैयार नहीं।

मिस्र में न केवल इन नीतियों को अधांधुंध तरीके से लागू किया गया, बल्कि प्रतिरोध की हर आवाज़ को दबाने का भी प्रयास किया गया। वहाँ विपक्षी राजनीतिक पार्टियाँ बनाने के लिये राष्ट्रपति से लाईसेंस लेने को ज़रूरी बना दिया गया और इसके चलते सिर्फ़ वही लोग सक्रिय राजनीति में आगे आ पाये जो होस्नी मुबारक़ तथा अमेरीकी नीतियों के समर्थक थे। वहाँ के समाजवादियों और वामपंथियों को पार्टी बनाने की छूट नहीं दी गयी और इन संगठनों से जुड़े लोग सामाजिक संगठन बना कर भी बड़ी मुश्क़िल से ही काम कर पा रहे थे। नये औद्योगिक क्षेत्रों में ट्रेड यूनियन नहीं बनाने दिये गये और पुरानी जगहों पर जो ट्रेड यूनियनें हैं उन्हें भी एक सरकारी फेडरेशन के अधीन रखा गया है।फ़ोर्थ इंटरनेशनलमें ल्यूक स्टाबार्ट को दिये गये एक साक्षात्कार में वहाँ की भूमिगत कम्यूनिस्ट पार्टी के प्रवक्ता ने इन ट्रेड यूनियनों कोमज़दूरों की पुलिस चौकीक़रार दिया। यही नहीं, 1956 में तत्कालीन राष्ट्रपति नासिर द्वाराइजिप्टियन वीमेन्स यूनियनको भंग किये जाने के बाद से ही वहाँ महिलाओं के अपना संगठन बनाने पर पाबंदी है। यहाँ तक कि डाक्टर, शिक्षक, इंजीनियर जैसे प्रोफेशनल लोगों को भी अपना संगठन बनाने की छूट नहीं है। अपने अधिकारों की मांग उठाने वाले बीस हज़ार से अधिक लोग सींखचों के पीछे हैं तथा इनके साथ घोर अमानवीय व्यवहार किया जाता है। ज़ाहिर है कि जब जनता की मुसीबतें हद से ग़ुज़र जाती है तो ऐसे सैलाब आते ही हैं। इस समय मिस्र में चल रहा आंदोलन ऐसा ही सैलाब है जिसे मुबारक़ और उनके अमेरीकी आका तिनकों से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी ही एक कोशिश के तहत उन्होंने बेहद बदनाम गृहमंत्री अबीब अल अदीली को हटाकर उनकी जगह एक पूर्व सैन्य जनरल तथा अमेरीकी पिट्ठू महमूद वागडी को लाकर की, लेकिन जनता इन छोटे-मोटे परिवर्तनों से नहीं मानने वाली। वह मुबारक़ की पूरी सत्ता और व्यवस्था का परिवर्तन चाहती है। कभी पूरी तरह सत्ता के दमन चक्र की साझीदार रही सेना भी अब आमजन पर गोली चलाने से इंकार कर रही है और तमाम पुराने न्याधीश तथा दूसरे अधिकारी जनता के पक्ष में सामने आये हैं। उपन्यासकार अला अल अस्वानी, कवि मेहमूद सहित तमाम लेखक जनता के आंदोलन के साथ हैं और वे न केवल तानाशाही बल्कि नव उदारवाद की कोख से निकली आर्थिक-व्यवस्था से छुटकारा चाहते हैं। ज़ाहिर है कि एक  निष्पक्ष चुनाव-आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था इसका पहला कदम हो सकती है लेकिन इसकी मंज़िल तो एक समतावादी समाज की स्थापना ही होगी।

 भारत में भी पिछले दो दशकों से लागू नव उदारवादी नीतियों के विषफल सामने गये हैं। कमरतोड़ मंहगाई, भूख, बेरोज़गारी, असमानता से जनता आज त्राहि-त्राहि कर रही है। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद अब कोई अपवाद नहीं नियम बन गये हैं। राजनैतिक व्यवस्था के प्रति लोगों के बीच भयावह आक्रोश और मोहभंग की स्थिति है जिसका प्रस्फुटन समय-समय पर तमाम आंदोलनों के रूप में दिख ही रहा है। बिनायक सेन जैसे मसलों पर सत्ता के दमन चक्र की क्रूरता जिस तरह सामने आ रही है वह इस आक्रोश की आग में घी डालने वाली ही है। आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में यह सैलाब हिन्दुस्तान की सड़कों पर भी दिखाई दे। इतिहास अभी मरा नहीं है।