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सोमवार, 19 अप्रैल 2010

बाटला इनकाउंटर का सच


बाटला हाउस में हुए कत्लों की सच्चाई?

यह रिपोर्ट देवाशीष प्रसून के ब्लाग से

बाटला हाउस में मुठभेड़ के नाम पर मारे गए लोगों की पोस्ट मोर्टम रिपोर्ट बड़ी शिद्दत के बाद सूचना के अधिकार के जरिए अफ़रोज़ आलम साहिल के हाथ लग पायी है।पोस्ट मार्टम रिपोर्ट इसे कत्ल बता रही है।जबकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने तो दिल्ली पुलिस के ही दलीलों पर हामी भरी थी। बिना घटनास्थल पर पहुँचे और आसपास व संबंधित लोगों से बातचीत किए बगैर ही इस मामले को सही में एक मुठभेड़ मानते हुए आयोग ने दिल्ली पुलिस को बेदाग़ घोषित कर दिया था। और तो और, सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस पूरे मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के रपट पर आँखें मूंद कर विश्वास करते हुए किसी तरह के भी न्यायिक जाँच से इसलिए मना कर दिया, क्योंकि उसे लगता है कि ऐसा करने से पुलिस का मनोबल कमज़ोर होगा। यह चिंता का गंभीर विषय है कि किसी भी लोकतंत्र में मानवीय जीवन की गरिमा के बरअक्स पुलिस के मनोबल को इतना तवज्जो दिया जा रहा है। बहरहाल, आतिफ़ अमीन और मो. साजिद के पोस्ट मोर्टम रिपोर्ट पर से पर्दा उठने के कारण नए सिरे से बाटला हाउस में पुलिस द्वारा किए गए नृशंस हत्याओं पर सवालिया निशान उठना शुरू हो गया है।

यह 13 सितंबर, 2008 के शाम की बात है, जब दिल्ली के कई महत्वपूर्ण इलाके बम धमाके से दहल गए थे। इसके बाद जो दिल्ली पुलिस के काम करने की अवैज्ञानिक कार्य-पद्धति दिखने को मिली, वह पूरी तरह से पूर्वाग्रह और मनगढ़ंत तर्कों पर आधारित है। बम धमाकों के तुरंत बाद ही पुलिस ने जामिया नगर के मुस्लिम बहुल बाटला हाउस इलाके के निवासियों को किसी पुख्ता सबूत के बगैर ही शक के घेरे में लेना और उनसे जबाव-तलब करना शुरू कर दिया था। अगले दिन ही, जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल राशीद अगवाँ और तीस साल के अदनान फ़हद को पुलिस के विशेष दस्ते के द्वारा पूछताछ के लिए उठा लिया गया और फिर बारह घंटे के ज़ोर-आज़माइश के बाद उन्हें छोड़ा गया। 18 तारीख़ को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एक शोध-छात्र मो. राशिद को भी पूछताछ के लिए ले जाया गया और उसे ज़बरन यह स्वीकारने के लिए बार-बार बाध्य किया गया कि उसके संबंध आतंकियों से हैं। इस दौरान पुलिस ने उसे नंगा करके कई बार पीटा और तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया। बाद में उसे 21 तारीख़ को छोड़ दिया गया।

इसी बीच 19 तारीख़ को दिल्ली पुलिस के विशेष दस्ते ने आनन-फानन में बाटला हाउस इलाके के एल -18 बिल्डिंग को चारों तरफ़ से घेर लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक फ्लैट संख्या 108 के रहने वालों पर पुलिस ने गोलियाँ बरसायी गयीं। बाद में पुलिसिया सूत्रों से पता चला कि उक्त फ्लैट में इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकियों ने ठिकाना बनाया हुआ था, जिन्होंने पुलिस को आते ही उन पर गोलियां चलायी थी। जबाव में पुलिस के गोली से उन में से दो आतिफ़ अमीन और मो. साजिद की मौत हो गयी, दो लोग फरार हो गए और मो. सैफ़ को गिरफ़्तार कर लिया गया। पुलिस के अनुसार बाटला हाउस के एल-18 में रहने वाले सभी लोग दिल्ली बम धमाके के लिए कथित तौर पर जिम्मेवार इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़े हुए थे। इस कथित मुठभेड़ में घायल हुए इंस्पैक्टर मोहन चंद्र शर्मा को भी जान से हाथ धोना पड़ा।

लेकिन, गौरतलब है कि पूरे मामले में पुलिस, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायालयों के अपारदर्शी रवैये से यह मामला साफ़ तौर पर मुठभेड़ से इतर मासूम लोगों को घेर कर उनकी क्रूर हत्या करने का प्रतीत होता है। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों के इस शक को बाटला हाउस में मारे गए लोगों के पोस्ट मार्टम की रपट ने और पुख्ता किया है।

पोस्ट मोर्टम के रपट के मुताबिक आतिफ़ अमीन और मो. साजिद के शरीरों पर मौत से पहले किसी खुरदरी वस्तु या सतह से लगी गहरी चोट विद्यमान है। सवाल उठना लाजिमी है कि अगर दोनों ओर से गोलीबारी चल रही थी तो दोनों के शरीर पर मार-पीट के जैसे निशान कैसे आये? ध्यान देने वाली बात है कि दोनों ही मृतकों ने अगर पुलिस से मुठभेड़ में आमने-सामने की लड़ाई लड़ी होती, तो उनके शरीर के अगले हिस्से में गोली का एक न एक निशान तो होता, जो कि नहीं था। आतिफ़ और साजिद के अन्त्येष्टि के समय मौज़ूद लोगों के मुताबिक दोनों शवों के रंग में फर्क था, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि उन दोनों की मौत अलग-अलग समय पर हुई थी। प्रश्न है कि क्या उन्हें पहले से ही प्रताड़ित किया जा रहा था और बाद में उन पर गोलियाँ दागी गयी?

चार पन्नों के रपट में साफ़ तौर पर लिखा है कि आतिफ़ अमीन की मौत का कारण सदमा और कई चोटों की वजह से खून बहना है। चौबीस साल के आतिफ़ के शरीर में कुल मिलाकर इक्कीस ज़ख्म थे। उस के शरीर में हुए ज्यादातर ज़ख्म पीछे की तरफ़ से किए गए थे, वह भी कंधों के नीचे और पीठ पर। इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि, आतिफ़ पर पीछे की ओर से कई बार गोलियाँ चलायी गयीं।

सत्रह साल के मो. साजिद की लाश के पोस्ट मोर्टम से पता चलता है कि उसके सिर पर गोलियों के तीन ज़ख्मों में से दो उसके शरीर में ऊपर से नीच की ओर दागे गए हैं। ये भी प्रतीत होता है कि साजिद को जबरदस्ती बैठा कर ऊपर से उसके ललाट, पीठ और सिर में गोलियाँ दागी गयीं।

साजिद और आतिफ़ की हत्या को मुठभेड़ के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है। पूरे मामले में सीधे रूप से जुड़ा हुआ मो. सैफ़ अब तक पुलिस हिरासत में है। अगर पुलिस की मानें तो मो. सैफ़ को वहीं से गिरफ़्तार किया गया, जहाँ आतिफ़ और साजिद की मौत हुई थी। ऐसे में उसके बयान का महत्व बढ़ जाता है, जिसे को पुलिस ने अब तक बाहर नहीं आने दिया है। साथ ही, इस मामले पर दिल्ली पुलिस का ’मुठभेड़ कैसे हुआ’ के बारे में बार-बार बदलता स्टैंड भी यह स्वीकारने नहीं देता है कि मृतकों की मौत किसी मुठभेड़ में हुई है। अपितु लगता यह है कि मृतक निहत्थे थे और उन्हें घेर कर वहशियाना तरीके से मारा गया।


तालिका 1: आतिफ़ की लाश पर पाये गए ज़ख्मों का ब्यौरा

बंदूक की गोली का निशान संख्या (रपट के मुताबिक) ज़ख्म का आकार ज़ख्म कहाँ पर है

14 1 सेमी व्यास, गहरा गड्ढा पीठ पर बायीं ओर

9 2X1 सेमी, 1 सेमी घर्षण और गहरा गड्ढा पीठ पर बायीं ओर

13 9.2 सेमी घर्षण और 3x1 सेमी गहरा गड्ढा पीठ की मध्य रेखा, गर्दन के नीचे

8 1.5 x1 सेमी गहरा गड्ढा दायें कंधे पर की हड्डी का हिस्सा, मध्य रेखा से 10 सेमी दूर और दायें कंधे से 7 सेमी नीचे

15 0.5 सेमी व्यास, गहरा गड्ढा निचले पीठ की मध्य रेखा, गर्दन से 44 सेमी नीचे

6 1.5 X1 सेमी, आकार में अंडाकार बायीं जांघ का अंदरूनी हिस्सा (ऊपर की ओर), बाये चूतड़ों पर ज़ख्म संख्या 20 जहाँ से धातु का एक टुकड़ा मिला से जुड़ा हुआ। बंदूक की गोली का निशान संख्या 20 आश्चर्यजनक रूप बहुत बड़ा 5x2.2 सेमी का है।

10 1x0.5 सेमी दायें कंधे से 5 सेमी नीचे और बीच से 14 सेमी नीचे

11 1x0.5 सेमी कंधे के हड्डी के बीच, मध्य रेखा के 4 सेमी दायें

12 2x1.5 सेमी पीठ के दायीं ओर, मध्य रेखा से 15 सेमी, दायें कंधे से 29 सेमी नीचे

16 1 सेमी व्यास दायीं बांह की कलाई और पिछला बाहरी हिस्सा



तालिका 2: साजिद की लाश पर पाये गए ज़ख्मों का ब्यौरा

बंदूक की गोली का निशान संख्या 1 दायें तरफ़ माथे पर आगे के ओर(ललाट पर)

बंदूक की गोली का निशान संख्या 2 दायें तरफ़ ललाट पर

बंदूक की गोली का निशान संख्या 5 दायें कंधे की ऊपरी किनारा (नीचे की तरफ जा रहा)

बंदूक की गोली का निशान संख्या 8 बायीं छाती के पीछे( गर्दन से 12 सेमी )

बंदूक की गोली का निशान संख्या 10 सिर के पिछले हिस्से का बायां भाग



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देवाशीष प्रसून

संप्रति: स्वतंत्र पत्रकार और हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में शोधार्थी
संपर्क-सूत्र: रामायण, बैद ले आउट, सिविल लाइन्स, वर्धा-442001,
दूरभाष: 09555053370 (दिल्ली) 09028357466 (वर्धा)
ई-मेल: prasoonjee@gmail.com
ब्लॉग: http://jaanib.blogspot.com

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

रोटी मिले तो फिर पेटभर मिले!

( ग्वालियर में कुछ बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम के संदर्भ में प्रस्तावित मांगपत्र)

भोजन का अधिकार -- जरूरी मांगें


इस देश में रहने वाले सभी लोगों को भूख और कुपोषण से मुक्त रहने का बुनियादी अधिकार है। इसके लिए एक ओर जहां खाद्य पदार्थों की समुचित उपलब्धता जरूरी है वहीं इसे सुनिश्चित करने के लिए टिकाऊ कृषि उत्पादन पद्धति को मजबूत करना, खासकर आधारित लघु किसानों पर विशेष ध्यान देने की खास जरूरत है। इसके लिए यह भी तय करना होगा कि खाद्य उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली भूमि तथा जल का जबरन इस्तेमाल नगदी फसलों या औद्योगिक उपयोगों के लिए कतई न किया जाए। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य, दामों में स्थिरता, अनाजों का प्रभावी लेन.देन व भंडारण सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी तंत्र होने के अलावा जमाखोरी तथा खुले व्यापार पर कड़ी निगरानी की भी जरूरत है।

इसी तरह भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए दूसरी ओर यह भी जरूरी है कि लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर की जाए। इसके लिए उन्हें पर्याप्त रोजगार और वेतन मुहैया कराया जाएए आजीविका के मौजूदा संसाधनों व तरीकों की रक्षा की जाए तथा जल, जंगल व जमीन पर उनके अधिकार संरक्षित किए जाएं। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि सामाजिक तौर पर आने वाली बाधाओं मसलन लिंग, जाति,विकलांगता, भेद-भाव व उम्र को भी भोजन के अधिकार पाने की राह में न आने दिया जाए।

ऐसी परिस्थिति बहाल करने की जिम्मेदारी जहां सरकार की है वहीं भोजन के अधिकार को अमली जामा पहनाने के लिए यह भी जरूरी है कि जरूरतमंद लोगों को सीधे भोजन मुहैया कराने की व्यवस्था जन सहयोग से अंजाम दी जाए। हम मांग करते हैं कि केंद्र की यूपीए सरकार द्वारा प्रस्तावित सीमित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का दायरा बढ़ाकर इस व्यवस्था को भोजन का अधिकार अधिनियम में अंतर्निहित किया जाए।
भोजन का अधिकार अधिनियमः जरूरी मांगें
.
1. अधिनियम में सरकार को यह सुनिश्तचित करने के लिए जवाबदेह बनाया जाए कि कोई भी महिलाए पुरुष या बच्चा न तो भूखा सोए न ही कुपोषित रहे।

2. अधिनियम में सरकार को इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वह टिकाऊ तथा अन्य मान्य तरीकों से खाद्य उत्पादन को बढ़ावा दे तथा सभी स्थानों पर हर वक्त पर्याप्त खाद्य की उपलब्धता सुनिश्चित करे।

3. अधिनियम यह भी सुनिश्चित करे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेषों (परिषिष्ट 1) तथा मौजूदा योजनाओं में दिए सभी अधिकारों को इसमें शामिल करे ,खासकर

-- सभी सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में गर्म पका हुआए पोषाहार मध्यान्ह भोजन में मिले।

--छह साल से कम उम्र के सभी बच्चों को एकीकृत बाल विकास योजना के लाभों में शामिल किया जाए।

-- अंत्योदय योजना के लाभ हितग्राहियों को प्राथमिकता के आधार पर दिए जाएं।


4. इस अधिनियम का विस्तार अन्य अधिकारों मसलन वृद्धावस्था पेंशन योजनाए मातृत्व अधिकार व राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना तक किया जाए।

5.. इस अधिनियम में उनके लिए यह अधिकार शामिल किए जाने चाहिएं जो मौजूदा योजनाओं से बाहर हैंय मसलन स्कूलांे के ड्रॅाप आउट बच्चे बुजुर्ग व बीमार जिन्हें रोजाना देखभाल की जरूरत हैए प्रवासी मजदूर व उनके परिवारए बंधुआ मजदूरों के परिवार बेघर व शहरी गरीब।

6. 0-6 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि मांओं को प्रसव के दौरान मदद दी जाएए स्तनपान को प्रोत्साहन देने के लिए जरूरी समझाइश दी जाए, मातृत्व अधिकार दिए जाएं तथा कार्यस्थल पर झूलाघर की सुविधा मुहैया कराई जाए।

7..इस अधिनियम में सरकार को बाध्य किया जाए कि वह गंभीर भुखमरी की स्थिति को रोके व ऐसे लोगों तक खाद्य की आपूर्ति सुनिश्चित करे जो भूख के संभावित शिकार होने वाले हों।

8.. इस अधिनियम में यह प्रावधान भी होना चाहिए कि सरकार प्राकृतिक व मानवजनित आपदाओं से बेहतर ढंग से निपटे तथा आंतरिक विस्थापन जैसी स्थिति में प्रभावित क्षेत्र में कम से कम एक साल तक भोजन की मात्रा दो गुना किया जाए तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कार्यदिवस की ऊपरी सीमितता खत्म कर दी जाए।

9.. देश के सभी नागरिकों कोए खासकर वे जिन्हें उनकी संपत्ति की वजह से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लाभ से दूर रखा गया है, इस योजना के तहत शामिल किया जाना चाहिए। इसके तहत प्रत्येक परिवार को 35 किलो अनाज या (7किलो प्रति व्यक्ति) प्रति माह, तीन रुपए किलो चावल व दो रुपए किलो गेहूं की दर से मुहैया कराया जाना चाहिए। पीडीएस के जरिए सब्सिडी के तहत सस्ते दाम वाले मोटे अनाज के अलावा तेल तथा दालों को भी मुहैया कराया जाना चाहिए।

10.. महिलाओं को परिवार के खाद्य संबंधी तमाम मामलों में मुखिया माना जाना चाहिए और राशन कार्ड पर भी इसका उल्लेख किया जाना चाहिए।

11.. इस अधिनियम में खाद्य संबंधी मामलों में सभी तरह के सामजिक भेदभाव खत्म करने पर जोर दिया जाना चाहिए। मसलन अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग व अल्पसंख्यक आदि के साथ भेदभाव।

12.. इस अधिनियम में पोषण संबंधी किसी भी योजना में खाद्य सामग्री की जगह नकद देने की व्यवस्था नहीं की जानी सुनिश्चित की जाए।

13.. इस अधिनियम में खाद्य नीति व पोषाहार संबंधी योजनाओं में औद्योगिक हित व निजी ठेकेदारों का दखल रोके जाने के लिए जरूरी प्रावधान किए जाने चाहिएंए खासतौर पर जब यह मामला खाद्य सुरक्षा तथा बालपोषण से जुड़ा हो। खास.तौर पर सार्वजनिक पोषाहार योजनाओं में जीन सवंर्धित या हानिप्रद मिलावटी भोजन की आपूर्ति को कतई मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए। जिन क्षेत्रों में निहित स्वार्थों का संघर्ष दिखता हो वहां सरकार को निजी क्षेत्रों के साथ भागीदारी नहीं करनी चाहिए।

14.. इस अधिनियम का उल्लंघन किए जाने की हालत में दोषियों को अनिवार्य दंड व वंचित हितग्राहियों को मुआवजा देने के लिए विषेष व्यवस्था की जानी चाहिए। इसके लिए एक मजबूतए स्वतंत्र व जवाबदेह संस्था बननी चाहिए जो तमाम शिकायतों का नियत समयावधि में निवारण कर सके (इसके पास आपराधिक मामलों पर कार्रवाई के भी अधिकार हों।) खासकर शिकायत निवारण तथा खाद्य संबंधी योजनाओं की देखरेख के मामले में ग्रामसभा को विषेष अधिकार दिए जाने चाहिएं।

15.. भोजन के अधिकार संबंधी योजनाओं में पारदर्शिता संबंधी अंतर्निहित मजबूत प्रावधान होेने चाहिएं। साथ ही सोशल आॅडिट की भी अनिवार्य व्यवस्था की जानी चाहिए।

16.. मौजूदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली में इस अधिनियम के तहत जरूरी सुधार किए जाने चाहिएं। मसलन राशन दुकानों के निजीकरण का खात्माए इन्हें महिला समूहों को पर्याप्त पूंजी की मदद व कमीशन के साथ देने के प्रयास, साथ ही खाद्य सामग्रियों का राशन दुकानों पर आवंटन व पारदर्शिता के अन्य उपायों के साथ समूची प्रणाली का कंप्यूटरीकरण भी किया जाना चाहिए।

17.. इस अधिनियम में यह प्रावधान साफ तौर पर उल्लिखित होना चाहिए कि ऐसा कोई भी कानून या नीति नहीं बननी चाहिए जिसका भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करने के माहौल पर विपरीत असर पड़े।

18.. संलग्नक 1-- सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के मुताबिक प्रदत्त वर्तमान अधिकारों की सार स्थिति (पीयूसीएल बनाम भारत सरकार एवं अन्य का मामला सीडब्ल्यूपी 196 (2001) )

1.. एकीकृत बाल विकास योजना --

-- सभी बसाहटों, विशेष तौर पर अनुसूचित जाति, जनजाति व शहरी झोपड़पट्टियों मे आंगनवाड़ी केंद्र होने चाहिएं। स्थानीय आबादी की मांग पर भी उन क्षेत्रों में आंगनवाड़ी केंद्र खोले जाने का प्रावधान होना चाहिए जहां 6 वर्ष के कम आयुवर्ग के कम से कम 40 बच्चे हों लेकिन कोई आंगनवाड़ी न हो।

-- एकीकृत बाल विकास योजना के सभी हितग्राहियों को साल में तीन सौ दिन पूरक पोषाहार पाने का अधिकार है। यह पूरक पोषाहार निम्न जरूरतों को पूरा करने वाला होः छह वर्ष की आयु वर्ग के हर बच्चे को 300 कैलोरी तथा 8-10 ग्राम प्रोटीनए हर किशोरीए गर्भवती महिला तथा स्तनपान कराने वाली मांओं को 500 कैलोरी तथा 20-25 ग्राम प्रोटीन तथा हर कुपोषित बच्चे को 600 कैलोरी तथा 16.20 ग्राम प्रोटीन उपलब्ध कराने वाला हो।

-- आंगनवाड़ी केंद्रों में पोषाहार की आपूर्ति के लिए ठेकेदारों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

--एकीकृत बाल विकास योजना के सार्वभौमीकरण में इस योजना की सभी सेवाओं (पूरक पोषाहारए वृद्धि की नियमित जांच, पोषण व स्वास्थ्य षिक्षाए टीकाकरण, स्कूल पूर्व शिक्षा) का विस्तार 6 वर्ष से कम आयुवर्ग के हर बच्चे, सभी गर्भवती महिलाओंए स्तनपान कराने वाली माताअृों तथा किशोरियों तक होना चाहिए।

2.. मध्यान भोजन योजना--

-- प्रत्येक सरकारी तथा सरकारी सहायता प्राप्त प्राइमरी स्कूल के हर बच्चे को पका हुआ भोजन पाने का अधिकार है। इसमें साल में कम से कम 200 दिन 300 कैलोरी तथा 8.12 ग्राम प्रोटीन दिया जाना चाहिए।

-- सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों को गर्मियों की छुट्टियों में भी मध्यान भोजन पाने का अधिकार है।

3.. लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली--

--गरीबी रेखा से नीचे जीवन.यापन करने वाले सभी परिवार हर माह 35 किलोग्राम अनाज पाने के हकदार हैं।

-- बीपीएल परिवारों को अपना राषन किस्तों पर खरीदने की अनुमति होनी चाहिए।

4.. राशन की सभी दुकानें नियमित तौर पर खुलनी चाहिएं

5-- अंत्योदय अन्न योजना--

निम्न विशेष प्राथमिकता वाले समूह अंत्योदय कार्ड पाने के हकदार हैंः

1-- ज्यादा उम्र वाले, बेहद विकलांग, बेसहारा महिला व पुरुष, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाएं

2-- विधवा तथा अकेले रहने वाली महिलाएं जिनका कोई नियमित सहयोग न हो

3-- बुजुर्ग (60 से ज्यादा उम्र वाले) जिनका कोई नियमित सहयोग न हो

4--परिवार जिनमें विकलांग वयस्क सदस्य हों

5-- ऐसे परिवार जिन्हें उम्रदराज बुजुर्ग, सामाजिक परंपरा के चलते किसी शारीरिक या मानसिक क्षमता के अभाव वाले विकलांग की देखभाल करनी पड़े या परिवार में नियमित रोजगार के लिए कोई वयस्क सदस्य न होए

6-- आदिम आदिवासी।

7-- राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना--

सभी सुपात्र बुजुर्गों को हर माह नियमित तौर पर पेंशन ही जानी चाहिए। वर्तमान योजना के तहत बीपीएल परिवारों के 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गाें को हर माह 400 रुपए की पेंशन दी थी।

8-- राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना-- बीपीएल परिवारों की सभी गर्भवती महिलाएं हर माह 500 रुपए नकद पाने की हकदार हैं। इसके लिए मां की उम्र, बच्चे के जन्म का स्थान व बच्चों की संख्या की कोई बाध्यता नहीं है।

9.. राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना--बीपीएल परिवार अपने मुख्य कमाई करने वाले सदस्य की मौत के चार हफ्ते के भीतर सरपंच के जरिए 10,000 रुपए की आर्थिक मदद पाने के हकदार हैं।

10.. ग्राम सभाओं की जिम्मेदारीः-- ग्राम सभाओं को सभी खाद्यध्रोजगार योजनाओं की सोषल आॅडिट का अधिकार है, तथा किसी भी तरह की वित्तीय सूचना संबंधित अधिकारियों को देने का भी अधिकार है। अधिकारियों को ऐसी शिकायतों पर जांच के बाद कानून के तहत उचित कार्रवाई करनी चाहिए।

11.. सूचना तक पहुंच-- ग्रामसभाओं को विभिन्न योजनाओं पर नजर रखने या उनकी निगरानी करने का अधिकार है। साथ ही योजनाओं से संबंधित विभिन्न जानकारियों और हितग्राहियों के चयन व लाभ के बंटवारे संबंधी सूचनाओं तक भी पहुंच होनी चाहिए।

12.. योजनाओं पर रोक न लगे-- सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश भी दिया है कि उसके आदेश के तहत आने वाली कोई भी योजना बिना कोर्ट के पूर्व निर्देश या अनुमति के रोकी या निरस्त नहीं की जा सकती। करने के लिए टिकाऊ कृषि उत्पादन पद्धति को मजबूत करनाए खासकर आधारित लघु किसानों पर विशेष ध्यान देने की खास जरूरत है। इसके लिए यह भी तय करना होगा कि खाद्य उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली भूमि तथा जल का जबरन इस्तेमाल नगदी फसलों या औद्योगिक उपयोगों के लिए कतई न किया जाए। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्यए दामों में स्थिरताए अनाजों का प्रभावी लेन.देन व भंडारण सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी तंत्र होने के अलावा जमाखोरी तथा खुले व्यापार पर कड़ी निगरानी की भी जरूरत है।

इसी तरह भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए दूसरी ओर यह भी जरूरी है कि लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर की जाए। इसके लिए उन्हें पर्याप्त रोजगार और वेतन मुहैया कराया जाएए आजीविका के मौजूदा संसाधनों व तरीकों की रक्षा की जाए तथा जलए जंगल व जमीन पर उनके अधिकार संरक्षित किए जाएं। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि सामाजिक तौर पर आने वाली बाधाओं मसलन लिंग जाति विकलांगता भेद.भाव व उम्र को भी भोजन के अधिकार पाने की राह में न आने दिया जाए। ऐसी परिस्थिति बहाल करने की जिम्मेदारी जहां सरकार की है वहीं भोजन के अधिकार को अमली जामा पहनाने के लिए यह भी जरूरी है कि जरूरतमंद लोगों को सीधे भोजन मुहैया कराने की व्यवस्था जन सहयोग से अंजाम दी जाए। हम मांग करते हैं कि केंद्र की यूपीए सरकार द्वारा प्रस्तावित सीमित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का दायरा बढ़ाकर इस व्यवस्था को भोजन का अधिकार अधिनियम में अंतर्निहित किया जाए।


पीपुल्स इनिशेटिव फ़ार जस्टिस एण्ड इक्वालिटी, ग्वालियर द्वारा ज़ारी