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शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

बढ़ती बेरोजगारी - उदारवाद का क्रूर चेहरा


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पिछले वर्षों में प्रभावी आर्थिक संवृद्धि के बावजूद रोज़गार के मोर्चे पर अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है....भूमंडलीय व्यवस्था से जुड़ाव जितना बढ़ता जा रहा है, देश की अर्थव्यवस्था पर भूमंडलीय आर्थिक शक्तियों की अनिश्चितताओं के प्रति हमारी अर्थव्यवस्था उतनी ही संवेदनशील होती जा रही है. हालिया मंदी ने हमारे देश की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया है और रोज़गार की स्थिति को भी.
·         रोज़गार-बेरोजगारी पर श्रम ब्यूरो की अक्तूबर – 2010 में प्रस्तुत रिपोर्ट, पूर्वकथन  un

पिछले साल अक्तूबर में आई इस रिपोर्ट में ही नहीं बल्कि इसके पहले और बाद आई तमाम रिपोर्टों और अध्ययनों से यह तथ्य बिल्कुल साफ़ हो गया है कि पिछले कई वर्षों से देश में रोज़गार की स्थिति बाद से बदतर होती चली जा रही है. एक तरफ संवृद्धि की दर के आंकड़े हैं तो दूसरी तरफ बढ़ती मँहगाई, भूखमरी और बेरोज़गारी. देखा जाय तो ये तीनों कोई अलग-अलग चीजें नहीं बल्कि एक ही तथ्य की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ हैं. बेरोज़गारी या फिर अत्यल्प मजदूरी वाले दोयम दर्जे के असुरक्षित रोज़गार परिवारों की क्रय शक्ति को बुरी तरह प्रभावित करते हैं, मंहगाई इस आग में और घी डालती है तथा इन सबका परिणाम होता है – कुपोषण तथा अशिक्षा. यह दुष्चक्र चलता ही जाता है और पीढियां इसमें पिसती रहती हैं.

देखा जाय तो भारत में ही नहीं दुनिया भर के पूंजीवादी देशों में अलग से रोज़गार, खासतौर पर उचित तथा सम्मानजनक रोज़गार पैदा करने के लिए अलग से कोई नीति बनाने की जगह सारा जोर ऎसी नीतियों पर रहा जिनमें यह मान्यता थी कि यदि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर को बढ़ा दिया जाए (जिसके लिए निजी पूँजी के विकास पर जोर दिया गया) तो रोज़गार सृजन अपने-आप हो जाएगा. लेकिन अनुभव इस तर्क को सिद्ध नहीं करता. कारण स्पष्ट है, जैसा कि जाने-माने अमरीकी विद्वान प्रोफ़ेसर जान कोजी अपने एक लेख ‘द ट्रायम्फ आफ कैपिटलिज्म- जाबलेस नेशन्स’ में कहते हैं – ‘ दरअसल, व्यवसायियों की नौकरियाँ पैदा करने में कोई रूचि नहीं होती. अमेरिका में ‘गोल्ड रश’ के उदाहरण को देखिये. जब सोना खोज लिया गया तो व्यापारी वहाँ टूट पड़े और जब सारा सोना निकल गया तो वहां से भाग गए. खानों से प्राप्त इस पूँजी का उपयोग उन्होंने उत्पादक व्यवसायों में नहीं किया और न ही अब बेरोजगार हो चुके मजदूरों के लिए नए रोज़गार पैदा करने में. पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में पूँजी खर्च करने के लिए एकत्र नहीं की जाती. यह केवल संचय के लिए एकत्र की जाती है. कर्मचारी बस इसी लक्ष्य की पूर्ति के साधन होते हैं, और जब भी एक व्यापार बिना कर्मचारियों के उपयोग के धन-संचयन में सक्षम हो जाता है, वह ऐसा ही करता है. और यही आज अमेरिका में बड़े स्तर पर हो रहा है. व्यवसायों ने बिना कर्मचारियों के धन-संचयन के तरीके ढूंढ लिए हैं और सरकार ने ऐसा करने में उनकी मदद की है तथा उन्हें प्रोत्साहित किया है. (देखें - http://www.globalresearch.ca/index.php?context=va&aid=26639) और ऐसा अकेले अमेरिका में ही नहीं हुआ है. सारी दुनिया में पूंजीवादी देशों ने निजीकरण और उदारीकरण के नाम पर लागू नवउदारवादी नीतियों को लागू कर रोज़गार सृजन की जिम्मेदारी जिस तरह से पूंजीपतियों पर डालकर ‘कल्याण कार्यों’ के ‘अनुत्पादक’ खर्चों को ‘धन की बर्बादी’ की श्रेणी में रखते हुए अपने आर्थिक क्रियाकलापों को केवल पूंजीपतियों को सुविधाएँ उपलब्ध कराने तक सीमित कर लिया है, उसका यह परिणाम अवश्यंभावी ही था. हाल में एन एस एस द्वारा जारी बेरोज़गारी के आंकड़े और बारहवीं पंचवर्षीय योजना का प्रस्ताव पत्र (approach paper) इन्हीं नीतियों और उनके स्वाभाविक प्रतिफलनों की गवाही देते हैं.

बेरोज़गारी पर एन एस एस ओ हर पाँच साल पर एक बड़े आकार के प्रतिदर्श का सर्वे कराता है और भारत में बेरोज़गारी के आंकडों के लिए यही सबसे बड़ा आधार है. इस बाबत आखिरी सर्वे २००९-२०१० में कराया गया, जिसके प्रारंभिक आंकड़े पिछले महीने जारी किये गए. ये आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं बल्कि चिंतित करने वाले भी. इन आंकडों से जो पहली चीज़ निकल के आती है वह है देश की       कुल , आम स्थिति – usual status पर आधारित श्रमशक्ति (लोगों की वह संख्या जो या तो काम कर रही है या काम की तलाश में है) में  नगण्य वृद्धि. २००४-०५ से २००९-१० के इस दौर में जब देश की आर्थिक संवृद्धि दर ९-१०% के ऊंचे स्तर पर रही तो देश के भीतर श्रमशक्ति की यह नगण्य वृद्धि आर्थिक संवृद्धि के साथ रोज़गार के अपने-आप बढ़ने के तर्क पर आरंभिक प्रश्चिन्ह खड़े करती है. देखा जाय तो ग्रामीण क्षेत्रों में तो श्रमशक्ति में कमी ही आई है. जहाँ २००४-०५ में इसमें शामिल कुल लोगों की संख्या थी ३४२.९० मिलियन वहीं २००९-१० में यह संख्या घटकर  ३३६.४० मिलियन हो गयी, शहरों में इसमें मामूली वृद्धि देखी गयी और इसी समयांतराल में यह ११५ मिलियन से बढकर १२२ मिलियन हो गयी.

यही नहीं, इस समयांतराल में सभी तरह के रोजगारों (स्वरोजगार, अंशकालिक रोज़गार, घरेलू रोज़गार आदि) में वृद्धि की दर पिछले समयान्तरालों की तुलना में काफी कम रही. जहाँ २०००-२००१ से २००४-२००५ क्र बीच में यह वार्षिक वृद्धि दर २.७% थी वहीं २००४-०५ से २००९-१०के बीच यह केवल ०.८२% रह गयी. यहाँ यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि किस तरह के रोजगारों में वृद्धि हुई. सबसे चौंकाने वाला तथ्य है स्वरोजगारों में कमी. जहाँ २००५-०५ तक अस्थाई तथा सीमांत मजदूरों के अनुपात में कमी आ रही थी और स्वरोजगारों में वृद्धि हो रही थी, वहीं २००९-१० में यह रुझान उलटा हो गया. इसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं के सन्दर्भ में देखा गया है. जहाँ २००४-०५ में कुल ६३.७% ग्रामीण और ४७.७% शहरी महिलायें स्वरोजगार कर रही थीं वही २००९-१० में यह संख्या घटकर क्रमशः ५५.७% और ४१.१% ही रह गयी. पुरुषों के लिए यह आंकडा गाँवों में ५८.१% से घटकर ५३.५% और शहरों में ४४.३% से घटकर ४१.१% रह गया जबकि इसी बीच अस्थाई ग्रामीण पुरुष श्रमिकों का अनुपात ३२.९% से बढकर ३८% और गाँवों के लिए १४.६% से बढकर १७% हो गया. महिलाओं के लिए यह अनुपात क्रमशः ३२.६% से बढ़कर ३९.९% तथा १६.७% से बढकर १९.६% हो गया.

इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि गाँवों और शहरों में छोटे-छोटे काम-धंधों पर बुरा असर पड़ा है. खोमचे, ठेले, सब्जी की दुकानें और औरतों तथा पुरुषों द्वारा बेहद कम पूँजी से किये जाने वाले व्यवसाय बड़ी पूँजी के दबाव में अलाभकारी हुए हैं और इनके ज़रिये अपना भरण-पोषण करने वाले लोग निम्न स्तर की मजदूरी वाले असुरक्षित अस्थाई श्रमिक बनने को मजबूर हुए हैं. ऐसा इस तथ्य से भी स्पष्ट होता है कि नियमित वेतन वाले रोज़गारों में भी इस दौरान कोई बहुत सकारात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिलता. २००४-०५ से २००४-०९ के बीच इस क्षेत्र में बहुत मामूली परिवर्तन ही देखने को मिला है. शहरों में नियमित वेतन वाले श्रमिकों का अनुपात पुरुषों के लिए ९% से घटाकर ८.५% हो गया है और गाँवों में ४०.६% से मामूली वृद्धि के साथ ४१.९% हो गया है. महिलाओं के लिए यह आँकड़ा क्रमशः ३.७% से बढकर ४.४% और ३५.६% से बढकर ३९.३% हुआ है. साफ़ है कि यह मामूली परिवर्तन स्वरोज़गार में आई भारी कमी को अवशोषित नहीं कर रहा. बेरोजगार हुए लोगों की फौज का बड़ा हिस्सा अस्थाई श्रमिकों में ही तबदील हुआ है.

श्रम शक्ति में आई कमी (विशेष तौर पर महिलाओं की संख्या में आई कमी) के लिए कुछ अर्थशास्त्री  शिक्षा में बढ़ती भागीदारी को जिम्मेदार बताते हैं. उनका कहना है कि १५-२९ आयु वर्ग के अब पहले से कहीं अधिक लोग शिक्षण संस्थानों में उपस्थित हैं तो लाजिमी है कि देश में काम के लिए उपलब्ध लोगों की संख्या में कमी आये. ऐसा माना जा सकता था लेकिन इस परिस्थिति में दो चीजों पर ध्यान देना ज़रूरी है. पहला यह कि देश में मौजूद बेरोजगारों की बड़ी फ़ौज के एक हिस्से को उनकी जगह लेने के लिए सामने आना चाहिए था और इस तरह स्थिर श्रमशक्ति के बरअक्स बेरोजगारों की संख्या में कमी दिखनी चाहिए थी, जो कि इन आंकड़ों से कहीं परिलक्षित नहीं होती, दूसरी बात यह कि इन उच्च शिक्षा में संलग्न लोगों के लिए नए और बेहतर रोजगारों का सृजन आवश्यक है जिससे कि अपने संस्थानों से निकलने के बाद इनके लिए उचित रोज़गार उपलब्ध हों. यहाँ तक कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना के प्रस्ताव पत्र में भी इस बात का ज़िक्र किया गया है. यह प्रस्ताव पत्र स्वीकार करता है कि ‘बड़ी संख्या में शिक्षित युवा बारहवीं पंचवर्षीय योजना के वर्षों में और उसके बाद भी श्रम शक्ति में शामिल होंगे. इसका सीधा निहितार्थ यह है कि रोजगार/ आजीविका सृजन के अवसरों को बहुत तेज़ी से बढ़ाना होगा (पेज-९). लेकिन न इस रिपोर्ट के आंकड़े और न ही इस प्रस्ताव पत्र के प्रस्ताव इस चिंता के प्रति किसी वास्तविक गंभीरता का पता देते हैं.

इस चिंता के मद्देनज़र यह होना चाहिए था कि विनिर्माण (manufacturing) क्षेत्र तथा सेवा क्षेत्र में रोज़गार की वृद्धि होती. लेकिन एन एस एस के आंकड़े इसके उलट कहते हैं. विनिर्माण क्षेत्र में तो रोज़गार बढ़ने की जगह घट कर ८.१% से ७.२% (ग्रामीण क्षेत्रों में ) और २४.६% से घटकर २४.३% (शहरों में)  रह गया है. अन्य क्षेत्रों में भी कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं दिखती. जिस इकलौते क्षेत्र में वृद्धि हुई है वह है निर्माण क्षेत्र (real sector) जिसकी कुल रोज़गार में भागीदारी शहरों में ८ से १०.२% तथा गाँवों में ४.९ से ९.४% हो गयी है. शुभानिल चौधरी गाँवों में इसका सबसे बड़ा कारक नरेगा को मानते हैं और शहरों में रियल सेक्टर के विकास को. (देखें एकोनामिक एंड पोलिटिकल वीकली, ६ अगस्त,२०११, पेज- २३-२७) ज़ाहिर है दोनों जगहों पर ‘उच्च शिक्षित युवाओं के लिए रोज़गार की कोई बड़ी संभावना नहीं दिखाई देती.

वैसे एन एस एस और सरकार ने इसका एक कारण सर्वे अवधि को मंदी के कारण एक असामान्य अवधि बताया है. यही वज़ह है कि इस सर्वे के एक साल बाद ही फिर से बेरोज़गारी का सर्वे कराया जा रहा है. ज़ाहिर है कि मंदी के कारण आंकड़ों पर कुछ फर्क तो ज़रूर पड़ा होगा. अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन (आई एल ओ) ने अपनी एक रिपोर्ट में दिसंबर २००७ से २००९ के बीच दुनिया भर में बेरोजगारों की संख्या में १९८ से २३० मिलियन के बीच की वृद्धि की आशंका जताई थी. भारत में श्रम ब्यूरो द्वारा अक्तूबर से दिसंबर २००८ के बीच २५८१ औद्योगिक इकाइयों के लिए कराये गए एक सर्वे के नतीजे भी इस दौरान ०.५ मिलियन मजदूरों की बेरोज़गारी की ताकीद करते हैं. संभव है कि इसका असर इन आंकड़ों पर पड़ा हो, लेकिन वह कितना है इसका पता तो इस साल के सर्वे के नतीजों के सामने आने पर ही चलेगा. अभी तो हालत यह हैं कि मंदी का भूत अमेरिका से लेकर हिन्दुस्तान तक फिर से मंडराने लगा है. यहाँ सवाल यह भी है कि मंदी इसी पूंजीवादी विकास नीति की स्वाभाविक उपज है तो फिर उसके प्रभावों को नज़रअंदाज करके आंकड़ों में वृद्धि दिखाना भी कितना न्यायसंगत होगा? क्या यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि आगे भविष्य में कोई मंदी नहीं आयेगी? जब मंदी और उछाल इस विकास पद्धति के स्वाभाविक हिस्से हैं तो बेहतर यही होगा कि उनके समग्र प्रभावों के साथ सामने आये तथ्यों पर ही विचार किया जाय. साफ़ है कि मंदी के बहाने रोज़गार सृजन की असफलता को छुपाने की कोशिश की जा रही है.

लेकिन इससे भी चिंताजनक बात यह है कि योजना आयोग का प्रस्ताव पत्र इससे कोई सबक लेने को तैयार नहीं है. अपनी शुरुआती चिंताओं के बावजूद इस दस्तावेज में रोजगार में वृद्धि के लिए कोई रणनीति घोषित नहीं की गयी है. हालत यह है कि रोजगार के लिए इसमें कोई अलग से अध्याय भी नहीं रखा गया है. साफ़ है कि अब तक के प्रतिकूल अनुभवों के बावजूद हमारे नीति निर्माता यही मान  रहे हैं कि सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि दर बढ़ने से रोज़गार अपने-आप बढ़ जाएगा. तभी तो विनिर्माण क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि दर में भारी वृद्धि के बरक्स नकारात्मक बढ़त के बावजूद यह दिवास्वप्न दिखाया जा रहा है कि ‘ विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार सृजन की दर इस गति से बढाई जानी चाहिए कि वर्ष २०२५ में इस क्षेत्र में १०० मिलियन अतिरिक्त नौकरियाँ उपलब्ध हों’ (पेज ११०). अब यदि २००४-०५ से २००९-१० के बीच विनिर्माण क्षेत्र में ८% की चक्रवृद्धि संवृद्धि के बावजूद इस क्षेत्र में रोज़गार में कमी आई तो बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के आगामी वर्षों में यह अतिरिक्त नौकरियाँ कैसे सृजित की जाएँगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है.

ज़ाहिर है कि निकट भविष्य में बेरोजगारी की इस भयावह समस्या से निपटने की न तो कोई तैयारी दिखाई देती है और न ही कोई सही इच्छाशक्ति. दुनिया भर में संवृद्धि और बेरोजगारी के एक साथ बढ़ने के तमाम उदाहरणों के बावजूद सरकारें इससे कोई सबक लेने को तैयार नहीं हैं. इसका दुष्परिणाम सारी दुनिया में सामने आ रहा है. विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक ताक़त होने का दावा करने वाला अमेरिका इस समय अपने इतिहास की सबसे बड़ी रोजगार समस्या से जूझ रहा है. राष्ट्रपति बराक ओबामा की लोकप्रियता गर्त में जा रही है और पूंजीवाद के संकटमोचक पाल क्रुगमैन के पास भी ओबामा की रोजगार योजना पर चौंकाने और उससे उम्मीद बाँधने के अलावा कोई चारा नज़र नहीं आ रहा. ब्रिटेन में द गार्जियन में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार बेरोजगारों की संख्या २.५१ मिलियन की संख्या पार कर चुकी है और इसमें सबसे बड़ी संख्या, ९,७२,००० युवा बेरोजगारों की है. स्पेन में २००७ से २०११ के बीच बेरोज़गारी की दर ८% से बढकर २१.२% हो गयी है और ४६.२% युवाओं को नौकरी नहीं मिल पा रही है. पिछले पाँच सालों में स्पेन सहित सभी ओ ई सी डी (आर्गेनाइजेशन फार इकानमिक कोआपरेशन एंड डेवलपमेंट) के रईस समझे जाने वाले तमाम देशों (जिनमें ग्रीस, आयरलैंड, इटली, फ्रांस, अमेरिका, पुर्तगाल, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे देश शामिल हैं) में युवाओं की बेरोज़गारी दर में भारी वृद्धि हुई है. योरोपीय युनियन में २५ साल से कम आयु के २०% युवा बेरोज़गार हैं तो सभी ओ ई सी डी देशों के लिए सम्मिलित रूप से यह आँकड़ा है लगभग १८% (देखें १० सितम्बर, २०११ का द इकानामिस्ट)  हालत यह है कि ओबामा की घोषणाओं के बावजूद अमेरिका में बेरोजगारी भत्ते के लिए आवेदनकर्ताओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. १५ सितम्बर को अखबारों में छपी खबर के अनुसार सितम्बर के पहले हफ्ते में ४ लाख २८ हज़ार से अधिक लोगों ने वहाँ बेरोजगारी भत्ते के लिए आवेदन दिए. यहाँ यह बता देना भी समीचीन होगा कि अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन पार्टी ने ओबामा की रोज़गार योजना का विरोध इस आधार पर किया है कि इसके लिए अमीरों पर जो कराधान होगा उससे आर्थिक वृद्धि प्रभावित होगी. इसकी तुलना आप भारतीय पूंजीपतियों की संस्था फिक्की की उन प्रतिक्रियाओं या फिर सुप्रीम कोर्ट के अनाज बाँट देने के प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया से कर सकते हैं. ऐसे में बेरोजगारी में कमी के लिए अलग से कोई नीति बनाने की जगह संवृद्धि के सहारे रोजगार सृजन के तर्क हास्यास्पद ही नहीं क्रूर भी लगते हैं.

संवृद्धि दर और रोज़गार के बीच किसी निश्चित सह-सम्बन्ध की अनुपस्थिति की बात बार-बार अनेकानेक अध्ययनों में सामने आया है। इन्डियन इन्स्टीट्यूट आफ़ पब्लिक एड्मिनिस्ट्रेशन के एक हालिया अध्ययन के बाद प्रस्तुत ‘इण्डिया क्रानिक पावर्टी रिपोर्ट – टुवार्ड्स सलूशन्स एण्ड न्यू काम्पेक्ट्स इन ए डायनामिक कन्टेक्स्ट’ में पाया गया ‘1994-200 के बीच 8% की संवृद्धि दर के बावज़ूद उत्पादन वृद्धि के साथ रोज़गार बढने की प्रत्यास्थता केवल 0.15% पाई गयी‘ … तब से अब तक परिदृश्य में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। …इस प्रकार ‘आर्थिक सुधारों के बाद के दौर में पर्याप्त रोज़गार अवसरों की अनुपलब्धता सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण चुनौती है। असल में ग़रीबी से अधिक देश की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से की खुली और छिपी बेरोज़गारी अर्थव्यव्स्था के लिये एक दीर्घकालिक समस्या है’…असल में एक ऐसी अर्थव्यव्स्था में जहां बड़ी संख्या में श्रम अतिरेक उपलब्ध है और क्षमताओं का उचित दोहन भी नहीं हुआ है, श्रमिकों के बेरोजगार रहने की समस्या एक ऐसा सैद्धांतिक सवाल खड़ा करती है जिसको मुख्यधारा का विकास दृष्टिकोण स्वीकार करने और उसका उत्तर देने से इंकार करता है।‘ (देखें, उपरोक्त रिपोर्ट का पेज़ 137) 
    
मुख्यधारा के इस विकास-विमर्श के लिये वास्तव में इस कड़वी हक़ीक़त को स्वीकार करना बेहद मुश्किल है कि निजी पूंजी के विकास और संचयन पर आधारित संवृद्धि दरों और एक सर्वसमावेशी वास्तविक विकास, जिसमें बहुसंख्या को सम्मानजनक रोज़गार और आजीविका मिल सके, में कोई सीधा अन्तर्संबंध नहीं है। इस तरह के विकास के लिये पूंजीवाद की मूल सन्कल्पनाओं और मान्यताओं पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े करने पड़ेंगे। पूंजीपतियों को धन-संचयन के लिये अपार सुविधायें देने की जगह ऐसी उत्पादक तथा जनोन्मुख कार्यवाहियों को प्रोत्साहित करना होगा जिनसे एक तरफ़ ऐसी वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन हो जिनसे लोगों का जीवन स्तर परिमाण तथा गुणवत्ता दोनों के स्तर पर बेहतर हो सके। शिक्षा, स्वास्थ्य, सेनीटेशन, शुद्ध एवं परिष्कृत पेयजल, ऊर्ज़ा एवं ईंधन के आधुनिक साधन जैसी चीज़ों की उपलब्धता का सतत विस्तार न केवल लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठायेगा बल्कि खतरे मे पड़ते जा रहे हमारे पर्यावरण के बरअक्स एक ऐसे विकास पथ को प्रोत्साहित करेगा जो पर्यावरणीय और आर्थिक दोनों सन्दर्भों में संवहनीय हो। (विस्तार के लिये देखें यू एन डी पी की मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट, 2010)

लेकिन मुनाफ़े की हवस में पूंजीपति और दुनिया भर में उनकी हितैषी सरकारें ऐसा कुछ भी करने के लिये तैयार नहीं हैं। समस्याओं से जूझने की जगह ज़ोर आंकड़ों की कलाबाजियों से तथ्यों पर पर्दा डालने पर ही है। लेकिन मंदी की समाप्ति की हालिया घोषणाओं के बावजूद पूंजीवादी विश्व का संकट लगातार बढ़ता ही जा रहा है. कभी वह ऋण संकट के रूप में सामने आ रहा है तो कहीं बेरोज़गारी के रूप में. दुनिया भर में शासकों के खिलाफ जो गुस्सा फूटता दिखाई दे रहा है उसकी जड़ें भी इन्हीं संकटों में हैं. लेकिन पूंजीवादी सत्ताओं के लिये पूंजीपतियों के हितों से कोई समझौता करना या उदारीकरण की नीतियों से पीछे हटना संभव नहीं. विकल्पों की अनुपस्थिति ने अभी पूंजीवाद के सामने कोई गंभीर संकट तो नहीं खड़ा किया है लेकिन जिस तरह का भविष्य सामने दिखाई दे रहा है उसमें असम्भाव्य कुछ भी नहीं. पूंजीवाद को विकल्पहीन बताने वालों के सामने सिर्फ़ इतनी सी सुविधा है कि उनके विरोधी कोई ऐसा विकल्प अब तक प्रस्तुत नहीं कर पाये हैं जो दुनिया भर में एक बेहतर आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था के रूप में सबको स्वीकार्य हो। यह जितनी बड़ी चुनौती पूंजीवाद के लिये है उससे कहीं अधिक उन वैकल्पिक व्यव्स्था के पक्षधर ताक़तों की जो दुनिया की बहुसंख्यक आबादी को इस दुष्चक्र से बाहर निकालना चाहते हैं। यह संकट उनके लिये सुअवसर लेकर आया है, देखना यह है कि वे इसका कितना उपयोग अपने पक्ष में कर पाते हैं।
   
            

सोमवार, 5 जुलाई 2010

मुनाफ़े का पहाड़ और जेनोम!

अरुण माहेश्वरी
जीव विज्ञान के दूसरे चरण की दहलीज पर


पूरे दस साल पहले की बात है। 26 जून 2000 के दिन जीव विज्ञान के क्षेत्र में खुशियों की एक लहर दौड़ गयी थी जब यह पता चला था कि मानव जेनोम के पूरे नक्शे को तैयार कर लिया गया है। जेनोम के तीन अरब अक्षरों को क्रमवार सजा कर यह दावा किया गया था कि अब आदमी के जीवन की किताब को पढ़ा जा सकेगा। हालांकि तब इसे किताब का एक मसौदा ही कहा गया था, क्योंकि अभी आगे और बहुत कुछ सामने आना बाकी था। तथापि, सरकारी, गैरसरकारी सभी स्तरों पर इस दिशा में वर्षों से चल रहा शोध तब एक मुकाम पर पहुंचा था और अमेरिका में सार्वजनिक क्षेत्र के फ्रांसिस कौलिन्स और निजी क्षेत्र के क्रैग वेंटर, दोनों ने एक साथ ही अपने इस अभूतपूर्व काम के एक बड़े पड़ाव तक पहुंच जाने की घोषणा की थी।

जिनोम का मतलब है आदमी के शरीर की प्रत्येक कोशिका के अंदर की जेनेटिक सामग्री का समग्र रूप। आदमी के शरीर की प्रत्येक कोशिका में 23 डीएनए मोलिक्यूल अर्थात क्रोमोजोम्स होते हैं जिनमें वे दो क्रोमोजोम्स भी शामिल हैं, जो उसे उसके मातापिता से मिलते हैं। ऐसे प्रत्येक क्रोमाजोम में तीन अरब रासायनिक इकाइयां (बेस पेयर) होती है। इन रासायनिक इकाइयों के क्रमवार नक्शे को ही जेनोम कहते है। आदमी के शरीर में हर प्रकार का परिवर्तन निश्चित तौर पर इस नक्शे में हेरफेर का कारण बनता है, इसीलिये मानव जेनोम के पूरे होजाने को मानव जिंदगी के रहस्य तक पहुंचने और इस प्रकार शरीर में हर प्रकार के विकार से निपटने की कुंजी के तौर पर देखा जारहा है। जाहिर है कि इससे चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में तो एक प्रकार का आमूल परिवर्तन आजाने की बात तक की जाती है।

बहरहाल, दस वर्ष पहले जब मानव जिनोम का नक्शा पूरा हुआ, उस समय नयीनयी दवाओं, व्यक्तिव्यक्ति पर लागू होने वाली खास जेनेटिक दवाओं के क्रांतिकारी उद्भव की जो सारी बातें कही गयी थी और ढेर सारी दवा कंपनियों ने इससे अपने लिये बेशुमार मुनाफे का पहाड़ तैयार करने के जो सपने देखने शुरू किये थे, दस वर्ष बीतते न बीतते बहती गंगा में हाथ धोने की ललक से इस दिशा में कूद पड़ने वाली कई निजी कंपनियां अब तक उसमें डूब कर शांत हो चुकी है। जिस सेलेरा कंपनी ने बड़ी भारी उम्मीदों से डा. वेंटर के जिनोम कार्य के लिये धन जुटा कर दिया था, उसने दो साल बाद, 2002 में डा.वेंटर को ही एक भारी घाटे का सौदा मान कर अपनी कंपनी से निकाल बाहर किया। सेलेरा से निकलने के बाद डा.वेंटर अपनी एक नौका में सारी दुनिया की समूद्री यात्रा पर निकल पड़े थे और विश्व समुद्री नमूना संग्रह अभियानके अंतर्गत जगहजगह के समुद्रों से बैक्टेरिया के नमूने इके करने के अलावा उन्होंने एक शोध संस्थान की स्थापना की, जिस संस्थान में एक महीने पहले ही पहली बार पूरी तरह से कृत्रिम जेनोम के जरिये जीव की रचना संभव हुई है। मानव जिनोम का पूरा नक्शा तैयार कर लिये जाने के एक दशक बाद, कृत्रिम जिनोम (सिंथेटिक जिनोम) के जरिये जीव की उत्पत्ति को जेनेटिक शोध के क्षेत्र की एक ऐसी असाधारण उपलब्धि कहा जा रहा है, जिसे जीव विज्ञान में गुणात्मक रूप से एक बिल्कुल नये दौर का प्रारंभबिंदु, बल्कि जीव विज्ञान मात्र का दूसरा चरण कहां जा सकता है।

दस वर्ष पहले जब मानव जिनोम का नक्शा तैयार हुआ उसके साथ मनुष्य के बारे में कुछ ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई जिन्होंने सिफ‍र् जीव विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि समाज विज्ञान, नृतत्वशास्त्र और राजनीति शास्त्र के क्षेत्र में भी कई प्रकार की प्रचलित अवधारणाओं और पूर्वाग्रहों को उलटपुलट कर रख दिया था। मसलन्, समाज विज्ञान के क्षेत्र में मानवीय जेनोम से यह बात निर्विवाद तौर पर साबित होगयी कि पूरी मानव जाति जिसमें गोरे, काले, भूरे सब रंग के लोग शामिल हैं, जीव विज्ञान की दृष्टि से बिल्कुल एक, और समान है। मनुष्य की अलगअलग नस्लों की बातें कह कर आदमी आदमी में भेद करने के नस्लवाद के अब तक जो तमाम सिद्धांत गढ़े जाते रहे हैं, वे शैतान दिमागों की कपोल कल्पनाओं से अधिक और कुछ नहीं रहे हैं। मानवीय जिनोम की पहचान के बाद आगे के शोध के ताजा नतीजों से यह बात और भी पुष्ट हुई है कि मनुष्यों में रंग और व्यवहार संबंधी सारी विविधताओं से उनकी जेनेटिक संरचना का कोई संबंध नहीं है। इन विविधताओं का गहरा और बुनियादी संबंध आदमी के परिवेश, मौसम, प्रागऐतिहासिक बैक्टीरिया और संस्कृति आदि से है।

इस शोध से दूसरी, और भी महत्वपूर्ण बात यह साबित हुई है कि जीव विज्ञान के पूरे मामले में किसी बाहरी, सर्वशक्तिमान के लिये कोई जगह नहीं है। जीव के प्राणों को लेकर भौतिकी और रसायनशास्त्र से इतर, ईश्वरीय शक्ति को लेकर जितने प्रकार की दार्शनिक अटकलपच्चियां की जाती रही है, जेनोम प्रकल्प ने उन्हें पूरी तरह से निराधार और बेतुका साबित कर दिया है।

जिस प्रकार टेलिस्कोप ने नक्षत्र विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति की, माइक्रोस्कोप ने जीव विज्ञान में तथा स्पेक्ट्रोस्कोप ने रसायन शास्त्र में उसी प्रकार यह जिनोमिक क्रांति कमप्यूटर की ताकत पर निर्भर है। कमप्यूटर भी तो उसके अंदर की लगातार बदलती भौतिक स्थितियों के कुल योग के अलावा कुछ नहीं है, जिन स्थितियों को कमप्यूटर के प्रोसेसर के अंदर विद्युत आवेगों की तेजी से बदलती आकृतियों से स्वतंत्र रूप में सूचना विज्ञान नामक ज्ञान की एक शाखा के जरिये प्रत्ययों में कल्पित और प्रसंस्करित किया जा सकता है। नये जीव विज्ञान में किसी भी कोशिका के अंदर के रसायन को हार्डवेयर माना जा रहा है। डीएनए में निहित सूचना उसमें पहले से उपस्थित(प्रीलोडेड) साफ्टवेयर की तरह है। कोशिकाओं के अंदर रसायनों की अंतक्र्रिया प्रोसेसिंग और मेमोरी चिप्स की लगातार परिवर्तनशील स्थितियां है। लेकिन गौर करने लायक बात यह है कि जेनोम के बारे में पूरी समझ का विकास आशा से कहीं ज्यादा जटिल और पेचीदा साबित हुआ है। यद्यपि अब तक की किसी भी खोज ने इसके अलावा और कुछ नहीं बताया है कि किसी भी कोशिका को बनाने के लिये जरूरी सारी सूचनाएं डीएनए में निहित होती है। लेकिन इन सबका योगफल दो और दो चार की तरह सीधा और सरल नहीं है। अलगअलग हिस्सों के कुल योग की तुलना में उनका इका और समग्र रूप कहीं ज्यादा बड़ा होता है।  

मसलन्, आदमी की तरह के सबसे उन्नत और जटिल समझे जाने वाले प्राणी की कोशिकाओं में जीन्स की संख्या अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत ज्यादा नहीं है। सबसे तुच्छ प्राणी मानी जाने वाली एक किरमी में 18हजार जीन्स पाये जाते हैं जबकि सबसे उन्नत प्राणी मनुष्य में इनकी संख्या 31 हजार के करीब है। संख्या के लिहाज से किरमी की तुलना में बहुत अधिक जीन्स न होने पर भी मानवीय जेनोम के चमत्कारी कार्य की वजह यह है कि ये जीन्स अलगअलग नहीं बल्कि आपस में मिल कर एक नेटवर्क के रूप में काम करते हैं। अरबों रासायनिक इकाइयों की तरह ही जीन्स की आपसी नेटवर्किंग के अरबों रूप हो सकते हैं। यही वजह है कि जल्दबाजी में इनसे कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना विवेकसंगत नहीं है, जो चट मंगनी पट ब्याह की मानसिकता से रातोरात दवाओं की नयी पौद तैयार करके जेनेटिक विज्ञान को अपने मुनाफे के लिये तत्काल दूह लेने को आकुल लोगों के रास्ते की बाधा बन गया है।

बहरहाल, इतना तो साफ है कि लगातार बढ़ रही कमप्यूटरों की ताकत के चलते वह दिन दूर नहीं, जब व्यक्तिव्यक्ति के जिनोम को तैयार करके उसके हर क्रोमोजोम की तीन अरब रसायनिक इकाइयों का तुलनात्मक अध्ययन करना पूरी तरह से संभव होगा और इससे चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में संभावनाओं के अकल्पनीय दरवाजे खुलेंगे। पिछले सिर्फ एक दशक के काल में कमप्यूटर की ताकत 30 गुना से ज्यादा बढ़ी है। इसके चलते अब आगे के जिनोम प्रकल्पों पर तुलनात्मक रूप में बेहद कम खर्च पड़ रहा है। अमेरिका में डीएनए का नक्शा तैयार करने में लगे सबसे बड़े केंद्र ब्रोड इंस्टीट्यूट, कैम्ब्रिज, मैस्चुशेट्स के प्रमुख एरिक लेंडर के अनुसार उनके संस्थान में डीएनए को क्रमवार सजाने का खर्च एक दशक पहले के खर्च की तुलना में लाख हिस्से के बराबर रह गया है। आज यह अनुमान किया जाता है कि आने वाले तीन वर्षों में सिर्फ हजार डालर की लागत पर पंद्रह मिनट में एक मानव जिनोम तैयार हो जायेगा।

यह जीव विज्ञान के इस दूसरे चरण की शक्ति का ही परिचय है जिसके चलते मनुष्य से सबसे निकटवर्ती माने जाने वाली प्रजाति, नियेनडर्टल मैन के चालीस हजार साल पुराने डीएनए के लगभग एक अरब तीस लाख हिस्सों को सजा कर उनका नक्शा तैयार कर लिया गया है। जिस दिन लिपजिग के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के स्वाते पाबो ने अमेरिकन एशोसियेशन फार द एडवांस साइंस की एक सभा में यह घोषणा की थी कि नियेनडर्टल मैन का जेनोम तैयार होगया है, यह संयोग की बात है कि 12 फरवरी 2009 का वह दिन युगांतकारी प्राणीविज्ञानी चाल्र्स डार्विन का 200वां जन्मदिन था। नियेनडर्टल मैन से आज के मनुष्य के जेनोम का तुलनात्मक अध्ययन कितना महत्वपूर्ण होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। इससे एक प्रकार से मनुष्य के जेनेटिक विकास के पूरे इतिहास की रचना संभव हो पायेगी। डार्विन के निरीक्षणों, संग्रह, अनुशीलन और सैद्धांतिक परिकल्पनाओं में उनकी समूद्री यात्राओं का बड़ा योगदान माना जाता है। अपनी इन यात्राओं के जरिये ही वे जीवित और लुप्त जातियों के संबंधों, उनके भौगोलिक वितरण आदि के बारे में इतना कुछ जान पाये थे जो विकासवाद के उनके सिद्धांत का कारक बना। इसीप्रकार, आज दुनिया की नजर डा.वेंटर द्वारा तैयार किये गये कृत्रिम जिनोम और इसके साथ ही जगहजगह से संग्रहीत बैक्टीरिया के नमूनों को लेकर किये जाने वाले परीक्षणों पर है। इन सबसे सिफ‍र् चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में नहीं, पूरे मानव समाज के विकास के बारे में ऐसे चौंकाने वाले नतीजे सामने आयेंगे, जिनकी अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मानव समाज की गतिप्रकृति पर नजर रखने के लिये ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र की ऐसी सभी युगांतकारी खोजों के बारे में जागरूक रहना जरूरी है।
 
इस बात का भी ख्याल रखने की जरूरत है कि विश्वपूंजीवाद के चलते विज्ञान की यह महान उपलब्धि दुनिया में विषमता की खाई को और ज्यादा चौड़ा करने का सबब न बने। जिस प्रकार आज की दुनिया में डिजिटल डिवाइड की बात की जाती है, उसी प्रकार आगे किसी जेनोमिक डिवाइड का खतरा पैदा न होने पायें।


सोमवार, 21 जून 2010

हर जगह मारे जा रहे हैं ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता

ट्रेड यूनियनों के अंतर्राष्ट्रीय महासंघ (ITUC) द्वारा करवाए गए वार्षिक सर्वेक्षण में सामने आया है कि वर्ष 2009 में दुनिया भर में यूनियन कार्यकर्ताओं की हत्याओं में भारी बढ़ोतरी हुई है- 2009 में हुई हत्याओं की संख्या 101 है जो वर्ष 2008 के मुकाबले तीस प्रतिशत अधिक है.सर्वेक्षण में यह भी सामने आया है कि रोज़गार की स्थितियों पर वैश्निक आर्थिक संकट के बढ़ते असर के फलस्वरूप दुनिया भर में मजदूरों के मूलभूत अधिकारों पर भी दबाव बढ़ा है. 

इन 101 हत्याओं में  कोलम्बिया में 48, ग्वाटेमाला में 16, होंदुरस में 12, मेक्सिको में 6, बांग्लादेश में 6, ब्राज़ील में 4, डोमिनिकन गणराज्य में 3, फिलिपीन्स में 3 और भारत, इराक और नाइजीरिया में हुई एक-एक हत्या शामिल है. कोलम्बिया में पूर्ववर्ती सालों की तरह खूनखराबा जारी रहा, वहां मारे गए लोगों में 22 वरिष्ठ मजदूर नेता थे और पाँच महिलाएँ थीं.

महासंघ के महासचिव गाइ राइडर (Guy Ryder) के अनुसार कोलम्बिया एक बार फिर वह  देश साबित हुआ जहाँ मजदूरों के मूलभूत अधिकारों के लिए लड़ने का मतलब मारे जाने का खतरा उठाना है जबकि वहां की सरकार का समूचा प्रचार तंत्र इस बात का जोर-शोर से खंडन करता है; ग्वाटेमाला, होंदुरस और अन्य देशों में बिगड़ती स्थिति को वे गहन चिंता का विषय मानते हैं.
140 देशों में श्रमिकों के हितों की रक्षा हेतु संघर्ष कर रहे यूनियन नेताओं द्वारा उठाई गई तकलीफों और अवहेलनाओं की विस्तृत सूची इस वर्ष की रिपोर्ट में भी मौजूद है. कई अन्य मामले तो इसलिए दर्ज भी नहीं हो पाते क्योंकि कामगारों को अपनी बात सामने रखने से रोका जाता है. इसके अलावा नौकरी खोने या अपनी शारीरिक सलामती का डर भी लगा होता है. हत्याओं की भयावह सूची के अलावा रिपोर्ट में उत्पीडन, डराने-धमकाने और यूनियन-विरोधी प्रताडनाओं के अन्य स्वरूपों का विस्तृत ब्यौरा रिपोर्ट में मौजूद है.

कोलम्बिया और ग्वाटेमाला में हत्या के प्रयास के दस और जान से मारने की धमकी के पैंतीस मामले भी दर्ज किये गए. इन देशों में कई यूनियन कार्यकर्ता जेलों में बंद रहे और लगभग सौ कार्यकर्ताओं को बंदी बनाया गया. विशेषकर ईरान, होंदुरस, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, तुर्की और ज़िम्बाब्वे में भी कई कार्यकर्ताओं को जेल में बंद कर दिया गया. 

लोकतंत्र-विरोधी शक्तियां इस बात से वाकिफ हैं कि लोकतंत्र की रक्षा में श्रमिक संगठन अक्सर सबसे आगे होते हैं, इस वजह से उन्होंने यूनियन गतिविधियों को निशाना बनाना जारी रखा. होंदुरस में तख्ता-पलट के पश्चात हुई हिंसा और 28 सितम्बर को गिनी में सैनिक शासन के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान हुआ भीषण नरसंहार  इस बात का प्रमाण हैं.

हर क्षेत्र में हड़तालें तोड़ने और हड़ताली मजदूरों के दमन के अनेकों मामले दर्ज हुए हैं. अल्जीरिया, अर्जेंटीना, बेलारूस, म्यांमार, आइवरी कोस्ट, भारत, ईरान, केन्या, नेपाल, पाकिस्तान और तुर्की सहित अन्य देशों में मजदूरी प्राप्त करने के लिए, काम की बदतर स्थितियों का विरोध करने अथवा वित्तीय और आर्थिक संकट के दुष्प्रभावों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हज़ारों मज़दूरों को मार-पीट, गिरफ्तारियों और कारावास का सामना करना पड़ा. यूनियन गतिविधियों के कारण नौकरी से निकाले जाने के मामले कई देशों में दर्ज हुए. बांग्लादेश में पुलिस की दखलंदाज़ी के बाद वेतन बढ़ाने और बकाया राशि के भुगतान के लिए हड़ताल कर रहे कपडा उद्योग के छह मजदूरों की मौत हो गई.

मालिकों द्वारा यूनियनें तोड़ने और दबाव बनाने का काम बड़े पैमाने पर जारी रहा. कई देशों में कंपनियों ने मजदूरों को उनके संगठित होने या यूनियनें बनाने पर उत्पादन संयंत्र को बंद करने या स्थानांतरित करने की धमकी दी. अक्सर तो कंपनियों ने मजदूरों के वास्तविक प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करने से ही मना कर दिया जबकि प्रशासन ने चुप्पी साधे रखी. कुछ और 'लचीलापन' लाने एवं सामाजिक कल्याण व्यवस्थों में तब्दीली लाने के लिए कुछ श्रम कानूनों को बदला गया जिसका प्रभाव वर्तमान औद्योगिक संबंधों पर पड़ा, जिस से ट्रेड यूनियन अधिकारों में कटौती हुई.

अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त श्रम मानकों को कमज़ोर बनाने की वजह से ज्यादा से ज्यादा श्रमिकों को काम की जगहों पर असुरक्षा और जोखिम का सामना करना पड़ा, विश्व भर के श्रमिकों में लगभग पचास प्रतिशत जोखिम भरी स्थितियों में काम करते हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य अमेरिका के एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग ज़ोन में काम करने वाले मजदूरों, मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के घरेलू श्रमिकों, प्रवासी मजदूरों और खेतिहर मजदूरों पर इसका काफी बुरा असर पड़ा. बुरी तरह प्रभावित इन क्षेत्रों में महिला श्रमिकों की संख्या अधिक है. इसके अलावा, अनौपचारिक रोज़गार में बढोतरी और रोज़गार के 'असामान्य' स्वरूपों का विकास हर भौगोलिक एवं औद्योगिक क्षेत्र में देखा गया. 

जहाँ ट्रेड यूनियन अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है उन जगहों पर अधिकारों को लागू करने की कानूनी और प्रशासनिक अक्षमता ने पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रमिकों की स्थिति को और असुरक्षित बनाया है. कई सारे देशों में या तो कड़े प्रतिबन्ध हैं या सीधे-सीधे हड़तालों पर रोक लगी हुई है.

रिपोर्ट ने ध्यान दिलाया है कि वर्ष 2009 में संगठन और सामूहिक सौदेबाज़ी के अधिकार (Right to Organize and Collective Bargaining) से सम्बंधित अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 98 वें समझौते को साठ साल हो गए हैं पर अब तक कनाडा,चीन, भारत, ईरान, मेक्सिको, थाईलैंड, दक्षिण कोरियाई गणराज्य, सं.रा.अमेरिका और वियतनाम जैसे देशों ने उसे अंगीकार नहीं किया है. इस तरह दुनिया की आर्थिक रूप से सक्रिय आबादी का लगभग आधा हिस्सा इस समझौते के दायरे से बाहर है.

सर्वेक्षण की सम्पूर्ण रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.