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बुधवार, 7 दिसंबर 2011

अनामदास का पोथा उर्फ ऎसी किताबें क्या पढ़ना?


वातायन

पत्रिका यहाँ से प्राप्त करें.




पुरानी किताबें पुराने दोस्तों की तरह होती हैं. अगर दिल के करीब हों तो हाथ मिलाते ही दुनिया-जहान की बातें निकल आती हैं वरना यह सवाल खड़ा हो उठता है कि मिले ही क्यूँ? हर पाठक का पुस्तकालय ऐसी तमाम किताबों से भरा होता है जिन्हें अरसे पहले पढ लिए जाने के बाद भी उनसे बार-बार मिलने-बतियाने का जी करता है. इस अंक से ‘कल के लिए’ से पाठकीय जुड़ाव के सम्पादकीय जुड़ाव में तबदील हो जाने के बाद पहली जिम्मेदारी के रूप में मिले इस कालम के बहाने मैं हर बार ऎसी ही कुछ किताबों से अपने मिलने-बतियाने के पाठकीय अनुभव साझा करूँगा. शुरुआत हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘अनामदास का पोथा’ से.



अनामदास का पोथा से पहली मुलाक़ात शायद १९९३ या ९४ में गोरखपुर में अपने मित्र स्वदेश की किताबों की दुकान ‘अक्षरा’ पर हुई थी. उन दिनों किताबें पढ़ने और खरीदने का नया-नया शौक जागा था और इसे खरीदने के पीछे शायद एक बड़ी वज़ह राजकमल पेपरबैक्स की सस्ती कीमत भी रही हो. मुझे अच्छी तरह याद है कि जिस वक़्त इसे खरीद रहा था हमारे एक साथी वहाँ मौजूद थे और उन्होंने लगभग हिकारत के साथ कहा था कि ‘इस पंडिताऊ पोथे को क्यों खरीद रहे हो?’ मैंने पूछा- आपने पढ़ी है? वे बोले – ऎसी किताबें क्या पढ़ना? खैर, किताब खरीदी गयी...पढ़ी गयी और इसके बाद ऎसी तमाम ‘ब्लैक लिस्टेड’ किताबें भी खरीदी गयीं और तब से अब तक यह विश्वास दृढ हुआ कि बिना पढ़े किताब तथा बिना देखे फ़िल्म के बारे में बोलने की छूट बस हिन्दी के विद्वान आलोचकों और क्रांतिकारियों को है, एक पाठक/दर्शक को खुद पढ/देख के ही फैसले लेने चाहिए.

इस किताब को द्विवेदी जी ने एक बिल्कुल नई शैली में लिखा है जिसमें उन्होंने ‘अनामदास’ का एक चरित्र गढा है जिसके हाथों यह उपन्यास लिखवाया गया है. यह अनामदास उस हजारी प्रसाद द्विवेदी से वाकई अलग है जिसे हम आमतौर पर जानते हैं. बिल्कुल आरंभ में जैसे वह अनामदास का व्यक्तित्व गढते हैं और जितना मजा लेकर उसके बारे में बताते हैं, वह उनके आलोचक के भीतर छुपे एक मनोविनोदी कथाकार और कवि का पता देता है. एक जगह वह खुद ही लिखते हैं – ‘अनामदास के पोथे से लगता है कि उसके लेखक के भीतर का कवि सुप्त है, आलोचक अशक्त. फिर भी कोई बात है जो आकृष्ट करती है.’ लेकिन सच यह है कि इस पोथे को पढते हुए लगातार लगता है कि इसके लेखक का कथाकार मस्ती के मूड में है, कवि अपने रंग में और आलोचक उन दोनों को नियंत्रित करने की कोशिश करते-करते खुद मुस्करा रहा है.

इस उपन्यास में एक ऋषि रैक्व के एक उपनिषदीय चरित्र के सहारे द्विवेदी जी ने एक ऎसी अद्भुत कथा कही है जिसके मानी न केवल उनके समय में महत्वपूर्ण थे बल्कि साहित्य और समाज के आपसी रिश्तों के बरअक्स एक सार्वभौमिक और सर्वकालिक महत्व की स्थापना करते हैं. समाज से दूर एकांत साधना करने वाला रैक्व अपने स्वानुभूत ज्ञान से परम संतुष्ट है और यह संतुष्टि अहंकार तथा उसकी स्वाभाविक परिणिति धृष्टता तक पहुंची हुई है कि एक दिन एक स्त्री का स्पर्श उसके भीतर एक अजीब सी उथल-पुथल मचा देता है. वास्तविक दुनिया से उसका पहला संपर्क उसके आत्मगत ज्ञान को बौना साबित कर देता है. उसके भीतर ज्ञान की एक अपरिमित प्यास और कामनाओं का एक अपरिभाषित संसार जग उठाता है जिसे द्विवेदी जी ने पीठ की उस खुजली के माध्यम से बखूबी दिखाया है जिसके लिए वह बैलगाडी से अपनी पीठ खुजाता रहता है. यह प्यास उसे भटकाती है...यह भटकन उन्हें समाज तक ले जाती है एक और स्त्री के माध्यम से जो एक चेतस माँ है. माँ (ऋतुम्भरा) उसे बताती है कि ‘अकेले में आत्माराम या प्राणाराम होना भी एक तरह का स्वार्थ ही है’. इस आत्मगत और समाज से दूर रहकर अर्जित ज्ञान और उसके अहंकार ने ही मुक्तिबोध के ‘ब्रह्मराक्षस’ को भी रचा था. ब्रह्मराक्षस जिसका विराट ज्ञान बस अंधी बावडियों से सिर टकराने के लिए था. समाज से इसी साक्षात्कार ने सुविधाजीवी सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध बना दिया. और जब रैक्व का समाज से साक्षात्कार होता है तो फिर ‘सब हवा है’ मानने वाले रैक्व के लिए एकांत में समाधि लगाना मुश्किल हो गया. सिर्फ किताबी ज्ञान से भी उनका काम नहीं चला. जनता का दुःख और उसे दूर करने की तड़प सबसे महत्वपूर्ण हो गयी और इससे संचालित रैक्व एक ऐसे विचारक के रूप में सामने आता है जिसके लिए समस्त विचारों के केन्द्र में मनुष्य है. मनुष्यता की यही पक्षधरता इस उपन्यास को महत्वपूर्ण बनाती है.

इस उपन्यास में एक और चीज़ जो बेहद आकर्षित करती है वह है इसके स्त्री चरित्र. जहाँ जाबाला से पहली मुलाक़ात रैक्व के लिए समाज और वास्तविक संसार को जानने के पहले वातायन खोलती है, वहीं ऋतुम्भरा का मातृरूप उसे उंगलियाँ पकड़ा कर उस संसार तक ले जाता है और ऋजुका दुःख से उसका पहला साक्षात्कार कराती है. स्त्रियों के ये सभी चरित्र चेतना संपन्न और मानवीय हैं जो एक पत्थर को काट-छांट कर एक ख़ूबसूरत मूर्ति में तबदील कर देते हैं. उपन्यास में आया एक और चरित्र जटिल मुनि का है जो एक अब्राह्मण साधक हैं, श्रम की महत्ता को स्वीकार करने वाले. वह रैक्व को न केवल अनुभव जन्य ज्ञान का महत्व बताते हैं बल्कि प्रेम और स्त्री-पुरुष संबंधों में बराबरी और पारस्परिक सम्मान का पाठ भी पढ़ाते हैं. वह उसे एक धर्म सम्मत विवाह की जगह उद्वाह की सलाह देते हैं. उद्वाह, जिसमें ‘पति पत्नी को और पत्नी पति को ऊपर की और वहन करती है, अर्थात परस्पर की आध्यात्मिक चेतना को परिष्कृत करती है.’  
  
इस तरह से ये उपनिषदीय कथा एक ऐसा आदर्श रचती है जो हमारे समय के कला कला के लिए बनाम कला समाज के लिए की महत्वपूर्ण बहस में जनपक्षधर धारा के पक्ष में एक गंभीर हस्तक्षेप करता है. यह आदर्श समाज विमुख आत्मगत ज्ञान पर समाज चेतस वस्तुगत ज्ञान को वरीयता देता है और मनुष्यता की पक्षधरता वाले वैचारिक विमर्श के पक्ष में मजबूती से खड़ा होता है.

ये स्त्रियाँ हिन्दी में किसी उत्तर आधुनिक विमर्श के पहले की स्त्रियाँ हैं. ये आदर्श किसी वैचारिक उद्घोष के हेतु से मुक्त हैं. तो इसमें उनकी अपनी आभा है – अपनी सीमाएँ. द्विवेदी जी की योजना इसका दूसरा भाग लिखने की भी थी तो ज़ाहिर है कि बहुत कुछ कहना अभी बाक़ी रह गया था. लेकिन उस ‘बहुत-कुछ’ का अनुमान बस एक बौद्धिक उठापठक ही हो सकता है. हमारे सामने जो है वह बस यही कही हुई कथा है. अब यह हम पर है कि हम इसे पढकर देश-काल के परिप्रेक्ष्य में इससे सकारात्मक नतीजे निकालते हैं या फिर किसी मार्खेज, किसी मुराकामी, किसी सरामागो के मिथकों से लहालोट होने के बाद इसके ‘उपनिषदीय’ चरित्रों से नाक-भैंह सिकोड़ते हुए इसे बिना पढ़े खारिज कर देते हैं. 

पुस्तक यहाँ से प्राप्त की जा सकती है...
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शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

भारतीय लोकतंत्र पर एक टिप्पणी - मदन कश्यप


भारतीय लोकतंत्र एक सामन्ती लोकतंत्र है 
·  मदन कश्यप 

दखल के लिए यह कोलाज भाई महेश वर्मा ने बना कर भेजा था..


ग्राम्शी ने कहा था कि एक बुर्जुआ लोकतंत्र में पूँजी जनता के सामूहिक विवेक को नियंत्रित करती है. आज भारत सहित सारी दुनिया में यह देखा जा सकता है. इन लोकतंत्रों में सारे निर्णयों और सारी गतिविधियों के केन्द्र में लोक नहीं पूंजीपति हैं. बड़े स्पष्ट तरीके से नीतियाँ इस प्रकार बनाई जा रही हैं कि वे पूंजीपतियों के वर्ग-हितों के अनुरूप हों. इस प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से समाज का बड़ा हिस्सा वंचना का शिकार होकर हासिये पर जा रहा है. किसान, मजदूर और आदिवासी अब सत्ता विमर्श के केन्द्र पर नहीं हैं. एक ऐसा विकास-विमर्श प्रचलित किया जा रहा है जिसमें पूंजीपतियों की समृद्धि को ही विकास का पर्याय बना दिया गया है. यह केन्द्र लगातार संकुचित हो रहा है और हाशिया बढ़ता जा रहा है.




इसके स्रोत सत्ता की बदली हुई शब्दावली में भी देखे जा सकते हैं. संविधान में कहीं केन्द्रशब्द का प्रयोग नहीं है. वहाँ संघीय शासनकी बात की गयी थी. लेकिन आप देखेंगे कि मीडिया से लेकर सत्ता तक की भाषा में केन्द्र सरकारका प्रचलन है. यह सिर्फ भाषा का खिलवाड नहीं. यह उस बदले हुए वैचारिक परिदृश्य को भी दिखाता है जिसमें सभी का प्रतिनिधित्व करने वाली और विभिन्न राष्ट्रीयताओं तथा समाजों के एक संघ की प्रतिनिधि सरकार एक सर्वाधिकारी केन्द्रीय सत्ता में तब्दील हो गयी है. यह सत्ता स्वाभाविक रूप से उन बड़े तथा प्रभावी समुदायों की सत्ता है जिनकी बहुसंख्या इस संख्या आधारित चुनाव प्रणाली को प्रभावित करती है. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे प्रदेशों का संघीय राजनीति में जिस तरह से दबदबा है वह इसी कारण से है. और ठीक यही कारण है जिसकी वज़ह से उत्तर पूर्व जैसे हिस्से लगातार उपेक्षा झेल रहे हैं. दिल्ली में होने वाले अन्ना के आंदोलन को तो राष्ट्रीय आंदोलन का दर्ज़ा मिल जाता है लेकिन इरोम शर्मिला का आंदोलन हासिये का आंदोलन बन कर रह जाता है. हालाँकि मैं यहाँ यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि अन्ना के आंदोलन की इतनी भूमिका मैं स्वीकार करता ही हूँ कि उसने लंबे समय बाद मध्य वर्ग के एक हिस्से को आंदोलित किया और उन्हें सड़क पर ले आया. इससे आगे का काम परिवर्तनकारी शक्तियों का है. यही नहीं इन राज्यों और समुदायों के भीतर के तमाम अल्पसंख्यक समाज भी लगातार हासिये पर बने रहते हैं. चूंकि वे संख्या में इतने बड़े नहीं होते कि किसी चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकें तो उनकी आवाज़ को भी कोई महत्व नहीं दिया जाता. यह लोकतंत्र की एक बड़ी सीमा है और इसके सबका राज्यहोने के मिथक पर एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है.

साथ ही मैं भारतीय लोकतंत्र को एक सामंती लोकतंत्रभी कहना चाहूँगा. इसमें जाति, धर्म और क्षेत्रीयता जैसी संरंचनाएँ बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. पश्चिमी देशों में जहाँ लोकतंत्र बुर्जुआ प्रकृति का है, वहाँ अपनी सीमाओं के बावजूद मनुष्य की अस्मिता तथा जीवन का सम्मान है. उदाहरण के लिए वहाँ दवा या खाने-पीने के चीजों में मिलावट संभव नहीं. इसके लिए बेहद कड़ी सज़ाएँ हैं, लेकिन भारत में ये अपराध आम हैं. यहाँ का लोकतंत्र अभी मनुष्य की अस्मिता के सम्मान का प्राथमिक गुण भी नहीं सीख पाया है. औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के बाद जिस तरह किसी बड़े और व्यापक आमूलचूल परिवर्तन की जगह सामंती वर्ग ही सत्ता वर्ग में तबदील हुआ, उसमें यह स्वाभाविक था. ऊँची जातियों के पूर्व सामंतों का समाज के भीतर दबदबा रहा. जाति और धर्म की उत्पीडक संरंचनाओं को तोड़ने के कोई गंभीर प्रयास नहीं किये गए. बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया को जाति/क्षेत्र/धर्म के आधार पर तय किया गया. लोकसभा से लेकर ग्रामसभा तक जातियाँ चुनावी नतीजों और नीतियों के केन्द्र में रहीं और जातिमुक्त समाज का स्वप्न हासिये पर. आरक्षण ने एक धीमी प्रक्रिया के तहत वंचित जातियों से एक हिस्से को मुख्यधारा में लाने में निश्चित रूप से सकारात्मक भूमिका निभाई है लेकिन जाति और धर्म के भारतीय लोकतंत्र से अविभाज्य रिश्ते को वह भी प्रभावित नहीं कर पाया है. ज़ाहिर है कि इस सामंती लोकतंत्रमें केन्द्र और हासिये का विभाजन प्रभावशाली तथा वंचित जातियों, बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक धर्मों और संपन्न तथा उपेक्षित क्षेत्रों में होता ही है.

इस केन्द्र और हासिये के विभाजन का असर भी शुरू से ही साफ़ दिखाई देने लगा था. कश्मीर, पूर्वोत्तर ही नहीं देश के तमाम हिस्सों सहित लगभग हर राज्य में इस द्वंद्व का प्रतिफलन हिंसक/अहिंसक संघर्षों में हुआ है. सुविधाप्राप्त तथा वंचितों के बीच बढ़ती खाई ने भारत ही नहीं दुनिया भर में एक ऎसी स्थिति बनाई है जिसमें लोगों का गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा है. अरब देशों से लगाए यूरोप और अमेरिका तक में जारी जनता के विरोध प्रदर्शन पूंजीवादी लोकतंत्र की इसी विफलता के स्वाभाविक परिणाम हैं. यहाँ बड़ी भूमिका निभाने में क्रांतिकारी शक्तियों की अक्षमता ही पूंजीवाद को अब तक ज़िंदा रखे है. ऐसा क्यों है, इस पर गंभीर विचार की ज़रूरत है.  

दखल विचार मंच के कार्यक्रम में दिए गए व्याख्यान के आधार पर 
प्रस्तुति - फिरोज खान