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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

साहित्यिक –राजनीतिक पोस्टर - एक आधुनिक लोक-कला ·





यह आलेख परिकथा के लोक-कला विशेषांक में छपा है.


मैं एक पोस्टर हूँ
सड़क या दीवार पर
चिपका हुआ इश्तहार
तुम चाहो
सैनिक-ट्रक के नीचे कुचल सकते हो
फाड़कर चिन्दी-चिन्दी कर सकते हो!
पर उससे क्या ?
मैं ज़माने के दर्द को तो
बेनकाब कर चुका हूँ,
कुचल कर समझ लो
मर चुका हूँ!
                                                            (मुक्तिबोध की कविता ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ से)

कुछ कलाएं ऐसी होती हैं, जिनका बाज़ार नहीं होता या यों कहें जो अपने कद्रदानों से अपने काम के बदले पैसा नहीं मांगती. वे बहुत शोर भी नहीं करतीं. बस चुपचाप अपना काम करती रहतीं हैं. ज़ाहिर है उनकी ओर ध्यान भी किसी का नहीं जाता. उनके हिस्से न कोई पुरस्कार है न कोई चर्चा. असल में उन्हें अलग से किसी कला का दर्ज़ा न दिया जाता है, न वे मांगती हैं. उनके उद्देश्य दूसरे होते हैं और हासिल भी. पोस्टर और वाल राइटिंग भी ऐसी ही कलाएं है. आप इन्हें लगभग हर साहित्यिक जलसे में देखेंगे लेकिन इन्हें बनाने वाले कलाकार अनचीन्हे रह जाते हैं. अगर देखा जाय तो साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में इनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका है. अलग-अलग शहरों में सैकड़ों कलाकार धन के पीछे भागते हुए ‘मुख्यधारा’ की पेंटिंग्स बनाने की जगह पूरी लगन और निष्ठा से वैचारिक पक्षधरता के साथ साहित्यिक और राजनीतिक पोस्टर्स बनाने में लगे हुए हैं. ब्रश के सहारे रेखांकनों के साथ लिखे हुए ये पोस्टर लिखित शब्दों को दुगनी अर्थवत्ता के साथ आम लोगों के बीच ले जाते हैं. मैं इन्हें हमारे समय की एक महत्वपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण लोक-कला की तरह देखता हूँ.


हिंदी में इस तरह के पोस्टर ठीक-ठीक कब बनने शुरू हुए, यह तो मैं पता नहीं लगा सका, लेकिन वर्तमान रूप में पोस्टर शायद इप्टा तथा प्रलेस की स्थापना के साथ ही बनने शुरू हुए.  उन दिनों सिनेमा नया-नया आया था और छापेखाने वाले सिनेमा के पोस्टर हिन्दुस्तान के शहरों में प्रचार-प्रसार के लिए खूब उपयोग होते थे. इन नए बने वामपंथी संगठनों ने प्रेरणा वहीँ से ली होगी. वैसे सांडर्स ह्त्या के प्रकरण में भी पोस्टर्स का ज़िक्र आता है, जिन्हें भगत सिंह के साथियों ने बनाया और चिपकाया था. ज़ाहिर है कि लेखक संगठनों के पास छापेखाने से पोस्टर्स छपवाने की जगह कलाकारों द्वारा बनाए गए सुरुचिपूर्ण पोस्टर आर्थिक और कलात्मक दोनों दृष्टि से मुफीद थे. वैसे कविता और कला का सम्बन्ध तो बहुत पुरानी और वैश्विक अवधारणा है. बंगाल के प्रसिद्ध  चित्रकार चित्त प्रसाद ने कविताओं पर आधारित तमाम पेंटिंग्स और रेखांकन बनाए थे. एम ऍफ़ हुसैन ने अपनी कविता ‘पंढरपुर की औरत’ पर आधारित एक अद्भुत पेंटिंग बनाई है. हैदर रजा की पेंटिग्स में भी शब्दों का प्रयोग खूब दिखाई देता है. गोगी सरोज पाल और मंजीत बावा के यहाँ भी शब्द और चित्र की व्यापक आवाजाही है. पत्रिकाओं में रेखांकन भी साहित्य और कला को करीब लाते हैं तथा दोनों की अर्थवत्ता बढाते हैं. पत्रिकाओं में रेखांकन की शुरुआत यशस्वी संपादक भाऊ समर्थ ने की थी. बाद में के के हेब्बार जैसे  कलाकारों ने पत्रिकाओं के लिए खूब रेखांकन बनाए. धर्मयुग के जमाने में इसके संपादक धर्मवीर भारती तो बाक़ायदा रचनाएँ भेज कर उनके अनुरूप चित्र बनवाया करते थे. जाने-माने प्रतिबद्ध कलाकार अशोक भौमिक के चित्रों से तो साहित्य जगत बखूबी परिचित है ही. उनके राजनीतिक-सांस्कृतिक चेतना से भरे रेखांकन न जाने कितनी किताबों के आवरण बने हैं. जाने-माने कवि कुबेर दत्त ने भी प्रचुर मात्रा में कविताओं पर आधारिट रेखांकन और पेंटिंग्स बनाई हैं. खैर बात पोस्टर्स की हो रही थी.


मुक्तिबोध की कविता का जो हिस्सा मैंने ऊपर पोस्ट किया है, वह बताता है कि एक जन माध्यम के रूप में पोस्टर किस तरह की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. नक्सलबारी आन्दोलन और उसके पहले भी मजदूर आन्दोलनों में पोस्टर्स और वाल राइटिंग राजनीतिक कार्यवाहियों का ज़रूरी हिस्सा रहे. सस्ते सफ़ेद काग़ज़ों पर लाल-काले अक्षरों में लिखी कवितायें और राजनीतिक नारों की इबारतें रात के घुप अँधेरे और पुलिस-गुंडों के खौफ के बीच राजनीतिक कार्यकर्ता फैक्ट्रियों/ शहरों/कालेजों की दीवारों पर चस्पा हो जाती थी या फिर सीधे दीवार पर ही उन्हें कूची से उकेर दिया जाता और सुबह जनता के बीच ये सन्देश जब पहुँचते तो उनके दिलो-दिमाग में यह सब लम्बे समय के लिए पैबस्त हो जाता. जनता की राजनीतिक चेतना के उन्नयन में इनकी भूमिका भले इतिहास के पन्नों में दर्ज न हो, बेहद अहम रही है. इसका एक ताज़ा उदाहरण उत्तराखंड के आन्दोलन के दौरान जनकवि अतुल शर्मा की कविताओं पर बने पोस्टर हैं जिन्होंने उस आन्दोलन को आगे बढ़ाने में एक ज़रूरी भूमिका निभाई और उसे धार दी.


मेरे अपने निर्माण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है. उच्च शिक्षा के लिए गोरखपुर आने के बाद मेरी नज़र जब विश्विद्यालय की दीवारों पर लिखे ‘भगत सिंह की बात सुनो, इन्कलाब की राह चुनो’ जैसे नारों और मुक्तिबोध, पाश, कुमार विकल. आलोक धन्वा जैसे कवियों की कविताओं के तथा भगत सिंह के उद्धरणों के पोस्टर्स पर पड़ी तो वहाँ से दुनिया को देखने का एक बेहतर और जनपक्षीय नज़रिया पहली बार मेरे सामने आया. संगठन से जुड़ने के बाद इन पोस्टर्स को बनाने वाले प्रमुख कलाकार साथी आज़म अनवर से मुलाक़ात हुई और तब पता चला कि साधारण से दिखने वाले इन पोस्टर्स के पीछे कितनी लगन, कितना श्रम और कितना समर्पण ज़रूरी होता है. एक हायर सेकंडरी स्कूल के कला अध्यापक आज़म अनवर एक बेहद ज़हीन कलाकार हैं. उन्होंने ढेरों पेंटिंग्स बनाई लेकिन संगठन से जुड़ने के बाद उन्होंने लगभग पूर्णकालिक रूप से पोस्टर्स बनाने का ही काम किया. और ये पोस्टर्स भी उनकी निजी संपत्ति नहीं संगठन के होते थे, इन पर कहीं उनका नाम नहीं होता. हालत यह थी कि संगठन और उनसे अपरिचित लोग जब कार्यक्रमों में इनकी प्रसंशा किया करते तो आज़म भाई शर्माए, सकुचाये से पीछे खड़े रहते. और ऐसे प्रतिबद्ध कलाकार देश भर में मिल जायेंगे.

अशोक नगर के पंकज दीक्षित को तो लोग कविता पोस्टरों के लिए ही जानते हैं. इप्टा से जुड़े पंकज भाई के पोस्टरों की प्रदर्शनियाँ देश भर में लगी हैं. कम लोग जानते हैं कि उन्होंने देश की लगभग सभी प्रमुख पत्रिकाओं में रेखांकन बनाएं हैं तथा अनेकों बार उनके कवर तैयार किये हैं. इप्टा अशोकनगर और इप्टा मध्यप्रदेश ही नहीं प्राची, प्रलेस जैसे तमाम संगठनों की राजनीतिक पुस्तिकाओं के आवरण उनके रेखांकनों से बने हैं. आमतौर पर काले काग़ज़ पर ब्रश से बनाए गए उनके पोस्टर्स की सबसे बड़ी खूबी उनके मानीखेज रेखांकन ही होते हैं. समकालीन और पुराने कवियों में से शायद ही कोई ऐसा महत्वपूर्ण नाम होगा, जिसकी कविताओं पर आधारित पोस्टर उन्होंने न बनाए हों. भगत सिंह जन्म शताब्दी के अवसर पर भगत सिंह के उद्धरणों की उनके द्वारा बनाई गयी पोस्टर सीरीज देश भर में प्रदर्शित हुई थी. ऐसा एक और नाम है रावतभाटा, राजस्थान के रवि कुमार का. रवि पोस्टर को लेकर पैशन से इतने ज़्यादा भरे हुए हैं कि अपने कवि होने को उन्होंने लगभग भुला ही रखा है. विकल्प सांस्कृतिक मंच से जुड़े रवि एक प्रतिबद्ध वामपंथी कलाकार तथा कवि हैं. उन्होंने अपने पोस्टर्स के लिए एक अलग स्टाइल चुनी है. आम तौर पर सफ़ेद कागजों पर चुभते हुए शब्दों को उकेरने वाले रवि भी रेखांकनों का खूब प्रयोग करते हैं. अपनी पैनी राजनीतिक समझदारी के चलते वह चटख रंगों का भी कविता के अनुकूल प्रयोग बड़ी कुशलता से करते हैं तो श्वेत-श्याम पोस्टर्स में भी अर्थ भर देते हैं. हाल में जाने-माने कहानीकार स्वयंप्रकाश की कहानियों पर केन्द्रित चित्तौड़ के एक आयोजन में जिस तरह बेहद कम समय में उन्होंने स्वयंप्रकाश की कहानियों के पोस्टर तैयार किये और खुद उन्हें लगाने चित्तौड़ पहुंचे, वह उनके गहरे समर्पण की मिसाल है. उनके पोस्टर की एक बड़ी खूबी पठनीयता है. वह आम तौर पर बड़े अक्षरों का प्रयोग करते हैं जिससे दूर से ही पोस्टर पढ़ा जा सके. जबलपुर के विनय अम्बर ने भी पोस्टरों के क्षेत्र में काफी प्रयोग किये हैं. पिछले साल उन्होंने तमाम कवियों की कविताओं के हिस्से चुनकर हस्तनिर्मित कागज़ पर नव वर्ष के खूबसूरत बधाई कार्ड बनाए. इन दिनों उज्जैन में रह रहे चित्रकार मुकेश बिजौले ने भी कविता पोस्टर के क्षेत्र में महत्वपूर्ण किया है. इनके अलावा दीपक कुमार, बी मोहन नेगी, श्रीकांत आप्टे, महेश वर्मा, कैलाश तिवारी, अरुण मिश्र, धीरेन्द्र, अमज़द एहसास, के रवीन्द्र जैसे कलाकार भी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. जसम से जुड़े कलाकारों ने भी बहुत अच्छे पोस्टर बनाए हैं.


इधर कम्प्युटर के आने के बाद कई कलाकारों ने नई तकनीक का बेहतर प्रयोग किया है तो कुछ ने उसका सहारा लेकर बिना इस विधा की मूल भावना को समझे थोक के भाव से असंगत चित्रों के साथ जिस तरह से भोंडे अक्षरों में कवितायें चिपकानी शुरू की हैं, वह एक खतरनाक प्रवृति है. उन्हें देखकर मुझे कवि मित्र हरिओम राजोरिया का सुनाया वह किस्सा याद आता है जब एक नए-नए उत्साही कलाकार ने (जो अब परिपक्व और गंभीर कलाकार बन चुके हैं) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता जूता का कविता पोस्टर बनाते हुए एक बड़ा सा जूता बड़ी मेहनत से बनाया था. कविता पोस्टर बनाना न तो इतना आसान काम है, न इतना गैर-जिम्मेदाराना कि गूगल पर सर्च किये हुए किसी चित्र को चिपका कर और कविता को किसी कथित कलात्मक फांट में टाइप कर किया जा सके. यह एक तरफ कला की गहरी समझदारी माँगता है तो दूसरी तरफ साहित्य तथा विचार  में भी उतनी ही गहरी पकड़. पूरी कविता या कहानी से एक छोटे से हिस्से का चुनाव, फिर उसके भावों के अनुरूप रेखांकन बनाना और शब्द तथा रेखांकन के बीच ऐसा तालमेल बिठाना कि कविता का मूल सन्देश लोगों तक और अधिक अर्थवत्ता के साथ पहुँचे, यह किसी तकनीकी विशेषज्ञता का नहीं बल्कि वैचारिक समर्पण का मामला है. 

ज़ाहिर है कि देश भर में अनाम रहकर कलाकारों द्वारा किये  गए कामों का मूल्यांकन कर पाना किसी एक लेख के बस की बात नहीं है. ये काम किसी प्रसिद्धि के लिए नहीं बल्कि सामूहिक कार्यवाहियों की हिस्सेदारी के रूप में किये जाते हैं तो मैं भी इन सभी कलाकारों को सामूहिक रूप से इस आधुनिक लोक-कला की मुहिम के लिए सलाम करना चाहता हूँ और साहित्य के मठों पर बैठे बड़े लोगों से अपील करना चाहता हूँ कि इन कलाकारों के कामों को महत्त्व देने के लिए, जनता तक पहुँचाने के लिए और नए-नए कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए ज़रूरी क़दम उठाये जाएं. साहित्य के लगातार जनता से दूर होते जाने के इस दौर में ये पोस्टर साहित्य और जनता के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बन सकते हैं. हालांकि अपनी अदम्य जीजिविषा से संचालित ये कलाकार इन सबके बिना भी चुपचाप अपना काम कर ही रहे हैं. बकौल मदन डागा - मैं एक पोस्टर हूँ/ सड़क या दीवार पर/ चिपका हुआ इश्तहार/ तुम चाहो /सैनिक-ट्रक के नीचे कुचल सकते हो/ फाड़कर चिन्दी-चिन्दी कर सकते हो!/ पर उससे क्या ?/मैं ज़माने के दर्द को तो/ बेनकाब कर चुका हूँ/ कुचल कर समझ लो/ मर चुका हूँ!

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

तीन लेखकों द्वारा जारी प्रपत्र : सोने में जंग लगेगी तो फिर लोहा क्या करेगा



तीन लेखकों द्वारा जारी प्रपत्र
 भोपाल, 05 जुलाई 2012


सार्वजनिक साहित्यिक संस्थाओं का राजनैतिक रूपान्तरण और लेखकों की प्रतिरोधी भूमिका


पिछले एक दशक में मध्य प्रदेश के भारत भवन, साहित्य परिषद, उर्दू अकादमी और कला परिषद सहित कुछ संस्थानों से समय-समय पर, पृथक-पृथक कारणों से वामपंथी लेखक संगठनों तथा रचनाकारों द्वारा प्रत्यक्ष दूरी बना कर रखी गई है। कतिपय तात्कालिक कारण दूर हो जाने पर स्थिति यह है कि अनेक लोग जहाँ इन संस्थाओं, खासकर भारत भवन के आयोजनों में सीधी भागीदारी करने लगे हैं, वहीं गिने-चुने कुछ लेखकों ने इस दूरी को प्रखरता और दृढ़ता से बरकरार रखा है। इन लेखकों में से (भोपाल में रहनेवाले) पहले स्वर्गीय कमला प्रसाद जी के साथ और फिलहाल हम तीन यानी राजेश जोशी, कुमार अम्बुज और नीलेश रघुवंशी, लगातार इस मुद्दे पर विचार करते रहे हैं और अभी भी हमारा निष्कर्ष है कि इन संस्थानों में ‘रचनाकार के रूप में भागीदारी’ न करने की हमारे पास ठोस वजहें हैं। ये वजहें अनौपचारिक बातचीत में अन्य साथी लेखकों को बताई जाती रही हैं। लेकिन, अब जबकि कुछ महत्वपूर्ण, चर्चित वामपंथी लेखक या वामपंथी संगठनों से जुड़े रचनाकारों द्वारा भी इन संस्थाओं के आयोजनों में, बावजूद हमारे प्रदेश के एक प्रमुख लेखक संगठन की इस सलाह के, कि इन संस्थाओं में सीधी भागीदारी न की जाए, शिरकत शुरू कर दी है, तब हम अपना सकारण ‘स्टैण्ड’ यहाँ पुनर्विचार के बाद औपचारिक रूप से सार्वजनिक करना उचित समझते हैं।

सबसे प्रमुख और निर्णायक कारण है कि वर्तमान सरकार की अन्यथा स्पष्ट सांस्कृतिक नीतियों के चलते, इन संस्थानों का और साथ ही प्रदेश की मुक्तिबोध, प्रेमचंद और निराला सृजनपीठों का, वागर्थ, रंगमंडल आदि विभागों का, पिछले आठ-नौ वर्षों में सुनियोजित रूप से पराभव कर दिया गया है। जिसकी हद यह है कि इन संस्थाओं के न्यासियों, सचिवों, उपसचिव और अध्यक्ष पदों पर, जहाँ हमेशा ही हिन्दी साहित्य के सर्वमान्य और चर्चित लेखकों-कलाकारों की गरिमामय उपस्थिति रही, वहाँ अधिकांश जगहों पर ऐसे लोगोें की स्थापना की जाती रही है जो किसी भी प्रकार से हिन्दी साहित्य या कलाजगत के प्रतिनिधि हस्ताक्षर नहीं हैं। उनका हिन्दी साहित्य की प्रखर, तेजस्वी और उस धारा से जो निराला, प्रेमचंद, मुक्तिबोध (जिनके नाम पर सृजनपीठ हैं) से निसृत होती है, कोई संबंध नहीं बनता है। उनका हिन्दी साहित्य की विशाल परम्परा एवं समकालीन कला-साहित्य से गंभीर परिचय तक नहीं है, जिनकी हिन्दी साहित्य और वैश्विक साहित्य की समझ स्पष्ट रूप से संदिग्ध है। उनमें से अधिकांश की एकमात्र योग्यता सिर्फ यह है कि उनका वर्तमान सरकार की मूल राजनैतिक पार्टी या उनके तथाकथित सांस्कृतिक अनुषंग संगठनों से लगभग सीधा जुड़ाव, सक्रियता और समर्थन है। 

हमारा विरोध किसी राजनैतिक अनुशंसा से उतना नहीं है क्योंकि व्यवस्था में इन पदों पर पहले भी राजनैतिक अनुशंसाओं से लोग नामित किए जाते रहे हैं लेकिन वे सब असंदिग्ध रूप से हमारे समकालीन साहित्य के मान्य, समादृत हस्ताक्षर रहे हैं। कुछ नाम हम स्मरण कराना चाहते हैं कि इन जगहों पर किस स्तर के सर्जक रहे हैंः सर्वश्री त्रिलोचन शास्त्री, शमशेर बहादुर सिंह, स्वामीनाथन, बव कारंत, हरिशंकर परसाई, नरेश मेहता, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, विनोद कुमार शुक्ल, हबीब तनवीर, मंजीत बाबा, शानी, केदारनाथ सिंह, सोमदत्त, निर्मल वर्मा, प्रभाकर श्रोत्रिय, विजय मोहन सिंह, आग्नेय, भगवत रावत, कृष्ण बलदेव वैद, कमलेश, दूधनाथ सिंह, प्रभात त्रिपाठी, उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल, सुरेन्द्र राजन, फजल ताबिश, अशोक वाजपेयी, आफाक अहमद, सुदीप बैनर्जी, कमलेशदत्त त्रिपाठी, श्रीनिवास रथ, मंजूर एहतेशाम, रमेशचंद्र शाह, हरिनारायण व्यास, दिलीप चित्रे, नरेश सक्सेना, कमला प्रसाद, मनोहर वर्मा, धु्रव शुक्ल आदि। जाहिर है एवं हमारा स्पष्ट मत है कि यहाँ प्रश्न राजनैतिक पक्षधरता का न होकर, वामपंथी अथवा दक्षिणपंथी पदावलियों से भी बाहर, व्यापक रूप से उन लोगों की वर्तमान उपस्थिति से है जिनमें से अधिकांश की कोई साहित्यिक पहचान नहीं है, कोई साहित्यिक कद नहीं है। उनका हमारी साहित्यिक परंपरा, लेखकीय अस्मिता और समकालीनता से भी कोई संबंध नहीं बैठाया जा सकता। उन्होंने संस्थाओं से प्रकाशित अनेक, अन्यथा प्रतिष्ठित पत्रिकाओं की साहित्यिक संभावना, वैभव और प्रतिष्ठा को भी गंभीर क्षति पहुँचा दी है। 

वर्तमान में इन संस्थाओं को जिस तरह से पदावनत, पतित और गरिमाहीन कर दिया गया है, वह अस्वीकार्य है। इसके साक्ष्य पिछले कुछ वर्षों में म प्र संस्कृति विभाग द्वारा दिए जानेवाले अखिल भारतीय और प्रादेशिक स्तर पर पुरस्कृत लेखकों की सूची तथा कृतियों के स्तर पर भी सहज ही देखे जा सकते हैं।

इसके चलते वे सब लेखक, जो किसी राज्य की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की श्रेष्ठता, सर्जनात्मक हस्तक्षेप और वातावरण निर्मिति में भूमिका देखना चाहते हैं, वर्तमान परिदृश्य के समर्थक, सहयोगी या हिस्सेदार कैसे बने रह सकते हैं। यह इन महत्वपूर्ण संस्थाओं का, जो जनता की निधि से ही संचालित हैं, ऐसा अविवेकी लेकिन सजग राजनैतिक रूपान्तरण है, दुर्भाग्य से जिसका हिन्दी साहित्य और कला की उत्कृष्ट परम्परा से किसी तरह का सरोकार नहीं। यह समूचे साहित्य और सर्जना के उस पर्यावरण को प्रदूषित और न्यून करने की कवायद है जो अन्यथा लोगों को विचारवान, गतिशील, जिज्ञासु और परिवर्तनमूलक बनाती है, उन्हें मनुष्यता के विराट फलक से परिचित कराती है और किसी समाज की सांस्कृतिक विरासत को नया करते हुए, अग्रगामी बनाती है। समूची मानवता के लिए वह दुर्लभ स्वप्न देखती है और वैसा अप्रतिम रचाव करती है जो सर्जनात्मकता के माध्यम से ही संभव है।

हम मानते हैं कि इन चुनौतीपूर्ण और साहित्य-कला की गरिमा को नष्ट करनेवाली परिस्थितियों के बीच उन सब लेखकों को प्रतिरोध की ‘पोजीशन’ लेनी चाहिए जो इन सार्वजनिक संस्थाओं के इस तरह के अवमूल्यन के प्रति जरा भी चिंतित हैं। हम जानते हैं कि इधर कुछ महत्वपूर्ण लेखकों ने, अपनी तरह के तर्क प्रस्तुत करते हुए संदर्भित आयोजनों में भागीदारी की है। हमारी निगाह में उन्होंने इन पतनशील संस्थाओं को सुमान्य लेखकों की ओर से वह अवांछित, किंचित और तात्कालिक वैधता दी है जिसे वे अन्यथा अपनी सीमित गतिविधियों, दृष्टि, वैचारिकता और मेधा के कारण अर्जित करने में सक्षम नहीं हैं। इस भागीदारी से इन लेखकों ने प्रदेश के राजनैतिक-सांस्कृतिक कायांतरण में जाने-अनजाने ही अपना सहयोग, अपना तर्क और समर्थन दे दिया। साथ ही, एक दुविधापूर्ण और भ्रामक संदेश भी दिया, जिससे दूसरे लेखक भी प्रेरित हो सकते हैं। उनके उदाहरण की ओट में अपना औचित्य प्रतिपादित कर सकते हैं कि एक कहावत का सहारा लेकर कहें तोः ‘जब सोने में ही जंग लगने लगेगी तो फिर लोहा क्या करेगा।’ 

और अंत में हमारे तमाम उन सम्माननीय मित्रों के प्रति कुछ शब्द जो इन संस्थानों में पदों पर आते हैं अथवा नौकरी कर रहे हैं और सुसंयोगवश समकालीन कला-साहित्य संसार में जिनकी उपस्थिति का भी आदर है। हम जानते हैं कि उनका समय-समय पर बुलावा हमारे प्रति प्रेम, सदभावना और कार्यक्रमों की स्तरीय साहित्यिक चिंता से भरा हो सकता है किंतु क्या वे इस विराट और प्रत्यक्ष पराभव से निरपेक्ष रह सकते हैं। यदि वे स्वयं लेखक भी हैं तो उनसे अपेक्षा भी कुछ बढ़ जाती है क्योंकि यह दीर्घकालिक, गहरी सांस्कृतिक हानि है। इसके दूरगामी और बहुआयामी दुष्परिणाम हैं। किसी हस्तक्षेप के बजाय, वे इसका बेहद सतही, कामचलाऊ और तात्कालिक आयोजनधर्मी, व्यक्तिगत मैत्रीपूर्ण हल खोजते हैं। तमाम सदाशयता और समझ के बावजूद यह विरूपताओं को ढँकने की हास्यास्पद कोशिश है। यहाँ याद कर सकते हैं कि पहले कुछ पदाधिकारी ऐसा दखल संभव करते रहे हैं कि विभिन्न पदों पर नामित या चयनित लोगों से संस्थाओं का भी स्तर बना रहे, उनका मान सुरक्षित रहे। तंत्र में उनकी सीमाएँ और असमर्थताएँ अपनी जगह हैं लेकिन दुर्भाग्यवश हम नहीं जानते कि इन संस्थाओं में पदस्थ हमारे वर्तमान मित्रों ने, अपनी उपस्थिति का लाभ लेकर प्रतिरोध की दिशा में क्या पहल और दखल मुमकिन की है।

मध्य प्रदेश शासन की इन सांस्कृतिक नीतियों और कार्यकलापों के परिप्रेक्ष्य में, इस पूरे परिदृश्य के पतनशील राजनीतिक रूपान्तरण को रोकने के लिए एक सामूहिक कोशिश जरूरी है। हम हमारे चेतनासंपन्न वरिष्ठ और युवा लेखकों से अपेक्षा करते हैं कि वे इस पूरे दृश्य पर विचार करें। यद्यपि हमारे अनेक लेखक-संस्कृतिकर्मी भोपाल और भोपाल से बाहर भी, इन परिस्थितियों और पराभव के प्रति सजग हैं और अपनी भूमिका का यथाशक्ति निर्वहन कर रहे हैं लेकिन हम चाहते हैं कि साहित्य-कला-संस्कृति में काम कर रहे सभी विवेकवान रचनाकार-कलाकर्मी एक सामूहिक प्रतिरोध की कार्यवाही के लिए न केवल सुझाव दें बल्कि पहलकदमी भी करें। 



  राजेश जोशी                                      कुमार अम्बुज                            नीलेश रघुवंशी





                                           विशेष अनुरोध
चूंकि कि इस वक्तव्य को प्रसारित करने की हमारी अपनी निजी सीमाएँ हैं, इसलिए सभी साथियों, पत्रकारों, संपादकों और ब्लागर्स से हमारा अनुरोध है कि वे इसे अपने-अपने माध्यम से अधिकतम लोगों तक पहुंचाने में  सहयोग करें। यह अपने मूल रूप में प्रकाशनार्थ है।

रविवार, 17 जून 2012

एक थे सआदत हसन मंटो


(बाराबंकी से निकलने वाली पत्रिका लोकसंघर्ष ने पिछले महीने जब अपनी पत्रिका के बैक कवर के लिए मंटो पर एक नोट लिखने के लिए कहा तो दो-ढाई सौ शब्दों में मंटो जैसे लेखक के बारे में लिखना मुझे लगभग असंभव लगा. इतना प्रिय और इतना बड़ा लेखक...और दो-ढाई सौ शब्द! लेकिन इसके संपादक सुमन जी जिस लगन और पक्षधरता से यह पत्रिका निकालते हैं, उनके आग्रह को मैं हमेशा ही आदेश की तरह लेता हूँ. तो लिखा...) 




सआदत हसन मंटो अपने वक़्त से आगे के अफसानानिगार थे. इतना आगे कि उनकी मौत के बाद आधी सदी से अधिक का वक़्त गुजर जाने के बाद भी आज तक शायद उन्हें ठीक से पहचाना जाना बाकी है. यह हमारी भाषा की बदनसीबी ही हो सकती है कि मंटो जैसे लेखक की अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खोल दो, काली सलवार, बू और टोबाटेक सिंह जैसी कहानियाँ कस्बाई रेलवे स्टेशनों के सस्ते स्टालों में मंटों की बदनाम कहानियाँ शीर्षक से लुगदी के कागज़ और बेहद घटिया आवरण वाली किताबों में बेची जाती हैं. जीते जी भी  हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के तमाम एलीट लेखकों और आलोचकों के लिए वह  दंगों, फ़िरकावाराना वारदात और वेश्याओं पर कहानियाँ लिखने वाले सामान्य से साहित्यकार थे. बहुत कम लोग यह देख पाए थे कि वह, दरअसल हिन्दी-उर्दू के तत्कालीन परिदृश्य के सारे पाखंड को छिन्न-भिन्न कर समाज का वह बदरंग चेहरा दिखाने वाले रचनाकार थे, जिस तक शहर-ओ-गाँव की शरीफ गलियों में रहने वाले जाते तो हैं, मगर दिन के उजाले में नहीं, रात के अँधेरे में.

अमृतसर की गलियों में अपने पहले उस्ताद अब्दुल बारी से कम्यूनिज्म और शहर की जुए की फड़ों से लेकर तमाम बदनाम गलियों में आवारागर्दी करते हुए ज़िंदगी की तल्ख़ हकीक़त सीखने वाले मंटो सही अर्थों में एक बोहेमियन और विद्रोही लेखक थे. अमृतसर से लाहौर फिर बम्बई की फिल्मी दुनिया और फिर बँटवारे के बाद पाकिस्तान तक के सफर में उन्होंने ज़िंदगी को किताबों के भीतर भी देखा और बाहर भी. सच कहने की उनकी जिद ने उन्हें वह नज़र भी बख्शी और कलम भी जिससे वह इस देखे-भोगे गए को उसकी पूरी तल्खी के साथ दर्ज कर सके. साहित्य की चारदीवारी से बाहर रह गए लोग उनकी कहानियों के नायक बने.

बंटवारे के वक़्त जब चारों ओर साम्प्रदायिकता का दैत्य अट्टाहास कर रहा था, तब मंटों उन गिने-चुने कहानीकारों में से थे जो धर्म के नाम पर किये जा रहे इस खून-खराबे के असली चेहरे देख पा रहे थे. स्त्री विमर्श के हालिया शोर-शराबे से बहुत पहले उन्होंने यह साफ़-साफ़ देखा था कि नफ़रत का यह खेल सबसे पहले स्त्री देह पर खेला जाता है. इसीलिए उनकी कहानियों में यह बहुत तल्खी के साथ और बहुत साफगोई से आता है, बिना किसी परदे के. ज़ाहिर है कि कुलीन और मध्यवर्गीय परिवेश के लोगों की भवें टेढ़ी होतीं, ज़ाहिर है कि काल्पनिक आदर्शों में जीने वालों को वह सब अश्लील लगता. लेकिन मंटो ने इसकी कब परवाह की. उन्होंने नंगे सच लिखे और उसकी कीमत चुकाई. वह उस आदमी की तरह थे जिसने राजा को नंगा देखा ही नहीं था, उसे नंगा कहने की हिम्मत भी की थी. 

42 साल की कम उम्र में उनका चले जाना दक्षिण एशियाई ही नहीं बल्कि दुनिया भर के साहित्य की एक अपूरणीय क्षति थी. फिर भी कोई बीस साल के अपने लेखन काल में उन्होंने जितना कुछ लिखा, वह हमारी धरोहर है जिसके आईने में इतिहास और वर्तमान के कई सफे बहुत साफ़-साफ़ पढ़े जा सकते हैं. जन्मशताब्दी के इस वर्ष में अगर हम यह ज़रूरी काम कर सके तो यह मंटो के साथ हो न हो अपनी अदबी विरासत के साथ एक बड़ा न्याय होगा.
   

बुधवार, 13 जून 2012

जनसत्ता की बहस में समयांतर का दखल

(मंगलेश डबराल के एक संस्था में जाने और उसके बाद हम जैसों के विरोध के बाद उस पर खेद व्यक्त करने के प्रकरण को बहाना बनाकर जनसत्ता के यशस्वी संपादक आदरणीय श्री ओम थानवी जी ने जो 'बहस' चलाई, उससे आप लोग परिचित हैं. वह इस कदर 'लोकतांत्रिक' थी कि एक साहब ने यह लिखा कि 'योगी आदित्यनाथ साम्प्रदायिक हैं, लेकिन राष्ट्रभक्त हैं. उनके यहाँ जाने में क्या दिक्कत?". मैंने जो उत्तर दिया था उसे न छापने की वजह श्री थानवी जी ने उसका एक ब्लॉग पर प्रकाशित होना बताया, लेकिन अगले ही हफ्ते उसी ब्लॉग पर टिप्पणी के रूप में दर्ज एक पीस जनसत्ता के महान पन्नों पर प्रमुखता से छपा. और फिर झूठे तथ्यों और आरोपों से भरी अपनी एक टिप्पणी से उन्होंने इस 'बहस' को खत्म कर दिया. एक 'महान' अखबार का संपादक होने की यह सुविधा तो है उनके पास कि उसके पन्नों पर वह अपनी सुविधा के हिसाब से 'बहस' चलायें, लेकिन दुनिया जनसत्ता पर ही खत्म नहीं होती. समयांतर के ताजा अंक में 'दिल्ली मेल' स्तंभ के तहत  ओम थानवी जी और उनके चम्पूओं (शब्द जनसत्ता के एक चर्चित कालम से साभार) द्वारा चलाई गयी  उस बहस के तमाम मिथ्या आलापों-प्रलापों का जवाब देती यह टिप्पणी  यहाँ साभार प्रस्तुत है)


शीतयुद्ध के पुराने हथियार, नये प्रहार

पिछले पांच सप्ताह से जनसत्ता ने ऐसी बहस चला रखी है, जिसके लिए एब्सर्ड (बेहूदी, इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि हिंदी में बेहतर पर्यायवाची सूझ नहीं रहा है)सबसे उपयुक्त शब्द है। इसे जनसत्ता की सीमा कहें या हिंदी का दुर्भाग्य कि जब देश में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर इतनी जबर्दस्त हलचल हो और अखबार का संपादक या तो इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ रहा होता है या साहित्य के। क्या आपने इस संपादक को कभी किसी राजनीतिक विषय पर लिखते देखा है? अगर वह सामयिक होता है तो भी कुल मिलाकर साहित्यकारों की आवाजाही से आगे नहीं बढ़ पाता वरना तो आप जानते ही हैं कि वह 'मुअनजोदड़ो' पहुंच जाता है। इस पर हमें नवक्लासिकी अंग्रेजी कवि एलेक्जेंडर पोप की याद आ रही है जिन्होंने जुल्फों पर हुए एक विवाद पर 'रेप ऑफ द लॉक' नाम की लंबी कविता लिख मारी थी। वह कविता और कवि अंग्रेजी साहित्य के इतिहास में साहित्य के क्षुद्रताओं में फंस जाने के उदाहरण के तौर पर याद किया जाता है। 

इस एब्सर्डिटी का सबसे बड़ा कारण यह है कि यह पूरा लेख इंटरनेट के उन गैरजिम्मेदाराना और अधिकांशत: संदेहास्पद स्रोतों पर आधारित है जिनके चलानेवालों में से अधिकांश की विश्वसनीयता ही शंकास्पद है। यह अचानक नहीं है कि वे अराजकता व उच्छृंखलता के माहिर हैं। पर इससे क्या! ओम थानवी तो अपने लेख की शुरुआत ही इंटरनेट की आरती के साथ करते हैं। सवाल है क्या यह संजाली-प्रेम यों ही उमड़ पड़ा है? और क्या अब संपादक महोदय बुक नहीं सिर्फ फेसबुक में ही उलझे रहते हैं? ऐसा लगता नहीं है। अशोक वाजपेयी की शब्दावली में कहें तो वह ''चतुर-सुजान'' आदमी हैं। विवाद की शुरुआत 29 अप्रैल, 12 के अंक में थानवी के लिखे लेख से हुई जिससे ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है मानो वह साहित्य और बौद्धिक जगत में उदारता की वकालत कर रहे हों। इस में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? पर उदारता की आखिर सीमा क्या है या क्या होनी चाहिए इसकी बात वह नहीं करते।  असल में इस लेख का असली उद्देश्य वामपंथियों और उनके संगठनों को निशाना बनाना है। दक्षिण पंथ की यह सबसे बड़ी रणनीति रही है कि वह जिसे निशाना बनाता है उसे सबसे पहले अनुदार व कट्टर घोषित करता है और फिर आतंकवादी करार देता है।

फिलहाल लोकतंत्र और उदारता की बात करनेवाले पश्चिम द्वारा दुनिया के मुसलमानों के खिलाफ यही तरीका अपनाया जा रहा है। दूसरे महायुद्ध के बाद दुनिया भर में ठीक यही रणनीति कम्युनिस्टों के खिलाफ अपनायी गई थी। उसी दौरान कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम जैसी सीआईए पोषित संस्थाएं अस्तित्व में आईं और भारत में उससे ओम जी के आराध्य अज्ञेय व अन्य कलावादी और रेडिकल ह्यूमेनिस्ट जुड़े थे।इस पर याद आया कि थानवी के कम्युनिस्टों पर इस बार निशाना साधने का कारण निजी है। (यह बात और है कि वह नवउदारवादी नीतियों से मेल खा रहा है।) वह कम्युनिस्टों से इसलिए जले बैठे हैं कि उन्होंने थानवी के अज्ञेय महोत्सव को उस तरह सफल नहीं होने दिया जैसा वह चाहते थे। इसलिए मंगलेश डबराल तो सिर्फ बहाना हैं।

इसी तरह वह कहते हैं कि  ''पंकज बिष्ट देहरादून में रमाशंकर घिल्डियाल 'पहाड़ी' की जन्मशती पर भाजपाई कवि रमेश पोखरियाल निशंक के साथ मंच पर बैठे तो इसकी चर्चा भी तल्खी से हुई।'' यह बात भी तथ्यात्मक रूप से गलत है। पंकज बिष्ट मंच पर बैठे ही नहीं। वह सिर्फ अपनी बात कहने के लिए मंच पर चढ़े थे और उस के खत्म होने के साथ नीचे उतर गए।  वैसे भी वह मंच निशंक का नहीं था न ही वह अवसर किसी कलावादी या प्रतिक्रियावादी या सांप्रदायिक नेता की जन्मशती का था। बल्कि वह अवसर एक कम्युनिस्ट की जन्मशती का था। बिष्ट वहां क्यों गए और वहां उन्होंने क्या कहा वह सब (समयांतर दिसंबर, 11) उन्हीं के द्वारा लिखा जा चुका है। सच यह है कि आज तक किसी ने उस लिखे हुए को कहीं भी किसी तरह की कोई चुनौती नहीं दी है। यहां तक कि संजालियों-जंजालियों ने भी नहीं।  वामपंथियों ने कहीं भी इस बात पर आपत्ति नहीं की कि पंकज बिष्ट वहां क्यों गए। जहां और जिन लोगों ने शुरू में करने की कोशिश की उनसे ओम थानवी खासे परिचित हैं। वे वामपंथी नहीं हैं हां संजालिए जरूर हैं। उन्हें वामपंथी कहने के पीछे थानवी के निहित स्वार्थ हैं जो छिपे नहीं हैं।   

पर हम इस विवाद पर समय खराब करने की जगह उनके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों पर बात करने की कोशिश करते हैं। 

कोई कहां जाता है और क्यों जाता है यह मसला निजी विवेक और तात्कालिकता से जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए आपातकाल में वामपंथ और आरएसएस तक ने मिल कर काम किया था। या माना कल को नरेंद्र मोदी अहमदाबाद में कोई आयोजन वली दकनी पर करें तो कैसे कोई सेक्युलर कवि, बुद्धिजीवी या संस्था उसमें भाग लेने जा सकती है? या धर्मनिरपेक्षता पर ही कोई आयोजन करे तो कोई कैसे वहां जाएगा? अपने उत्तर में चंचल चौहान ने यह बात बड़े  तार्किक ढंग से रख दी है। उन्होंने थानवी के इस अरोप को भी बे-बुनियाद साबित कर दिया है कि वामपंथी लेखक संगठन अपने सदस्यों को आदेश देते हैं कि वे कहां जाएं और कहां न जाएं। उन्होंने उदय प्रकाश के जलेस से तथाकथित मोहभंग के झूठ को भी साफ कर दिया है: ''ओम थानवी ने उदय प्रकाश के जनवादी लेखक संघ से 'मोहभंग' के विचित्र कारण की शोधमयी पत्रकारिता करते हुए ऐसा आभास दिया जैसे जनवादी लेखक संघ 'अर्जुन सिंह की गोद में जा बैठा', और इस वजह से उदय प्रकाश जलेस से भाग गए, ऐसा विचित्र तर्क तो उदय प्रकाश भी संभवत: स्वीकार नहीं करेंगे, और जलेस से उन्होंने इस्तीफा दे दिया हो, ऐसा भी कोई सबूत नहीं है।'

पर थानवी के लेख में हिंदी साहित्य के परम पीडि़त लेखक उदय प्रकाश को लेकर कुछ बहुत ही मजेदार बातें कही गई हैं। उन पर आने से पहले हम याद दिलाना चाहेंगे कि जब अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उदय प्रकाश दौड़कर नौकरी के लिए भोपाल पहुंचे थे। वहां उन्हें किसने बुलाया था या वह कैसे गए थे इन पर विस्तार से बात करने का यह स्थान नहीं है। उन्होंने उदय प्रकाश के इंटरनेट के हाल के लेख को उद्धृत करते हुए कहा है कि वह 16 साल सीपीआई के पूर्णकालिक सदस्य थे, बाईस वर्ष सीपीएम से जुड़े जनवादी लेखक संघ में सक्रिय रहे। सात साल पहले उनका जनवादी लेखक संघ से मोहभंग हुआ है। 

अब जरा इस गणित को देखिये। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि उदय प्रकाश दिल्ली आने के बाद, और वह दिल्ली आपात काल के दौरान आ चुके थे, जनवादी लेखक संघ (जिसका जन्म ही 1982 में हुआ) से जुड़ गए थे। फिर सात साल पहले उनका जलेस से मोहभंग भी हो चुका है यानी इस तरह 36 वर्ष तो उन्हें दिल्ली में ही हो गए हैं। तब निश्चय ही उससे पहले वह सीपीआई में होंगे। क्या वह सीपीआई के सदस्य 12-13 वर्ष की अवस्था में हो गए थे? क्या उनके इलाके में सीपीआई ने 'बाल-भाकपा' बनाई हुई थी? 

अब दूसरी बात लीजिए। थानवी लिखते हैं, ''तीन साल पहले गोरखपुर में उदय के फुफेरे भाई का निधन हो गया। वे जिस कॉलेज के प्राचार्य थे, वहां उनकी बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में कॉलेज की कार्यकारिणी के अध्यक्ष और विवादास्पद सांसद योगी आदित्यनाथ ने उदय प्रकाश को उनके भाई की स्मृति में स्थापित पुरस्कार दिया।... उदय बार-बार कहते हैं उन्हें खबर नहीं थी, न अंदाज कि उनके और भाई की स्मृति के बीच योगी आदित्यनाथ आ जाएंगे।''

पहली बात तो यह है कि आदित्यनाथ का साहित्य या पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं है। वह उस कालेज की कार्यकारिणी के अध्यक्ष हो सकते हैं जो उनका मठ चलाता है पर उनका अकादमिक जगत से भी कोई संबंध नहीं है। यहां उनके और राकेश सिन्हा के बीच के अंतर को समझा जा सकता है। राकेश सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिविज्ञान के प्राध्यापक हैं और लेखक हैं। यह ठीक है कि उन्होंने हेडगेवार पर किताब लिखी है इस पर भी वह हैंतो लेखक ही। उनसे असहमति और बातचीत की गुंजाइश बनी रहती है पर आदित्यनाथ और एक लेखक के बीच कौन- सा ऐसा बिंदु है जो किसी तरह के संबंध या संवाद की गुंजाइश छोड़ता है? भारत नीति प्रतिष्ठान संघियों का गढ़ हो सकता है पर वह स्वामियों का अखाड़ा तो नहीं ही है। इसलिए उसे लेकर जिस तरह से विवाद खड़ा किया  गया है वह पूरी तरह शंकास्पद है। फिर आदित्यनाथ मात्र विवादास्पद नहीं हैंबल्कि घोर सांप्रदायिक और जातिवादी हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई सांप्रदायिक दंगों से उनका संबंध रहा है और 'उत्तर प्रदेश को गुजरात बना देना है' जैसे आह्वान वह समय-समय पर करते रहे हैं। यही कारण है कि लेखकों ने उदय प्रकाश के आदित्यनाथ के हाथ से 'कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह स्मृति सम्मान' लेने की आलोचना करते हुए कहा था: 'हम अपने लेखकों से एक जिम्मेदार नैतिक आचरण की अपेक्षा रखते हैं...।'  (उस समारोह के निमंत्रण पत्र में बतलाया जाता है कि उदय प्रकाश का नाम कुंवर उदय प्रकाश सिंह छपा था। क्या यह संयोग मात्र था?) यहां याद करना जरूरी है कि लेखक कोई तटस्थ व्यक्ति नहीं होता है। यह देश सांप्रदायिकता के कारण विभाजन जैसी त्रासदी से गुजर चुका है और आज भी इस समस्या से पार नहीं पा सका है। नरेंद्र मोदी और आदित्यनाथ इस समाज के लिए कलंक हैं। हर रचनात्मक कर्म का संबंध गहरी नैतिक चेतना और दायित्व बोध से होता है। अगर ऐसा नहीं होता तो लेखक होने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। यही कारण है कि उदय प्रकाश और मंगलेश डबराल आदि की द्विजदेव पुरस्कार लेने के लिए आलोचना की गई थी। द्विजदेव ने 1857 में  अंग्रेजों का साथ दिया था और स्वतंत्रता सेनानियों के दमन के पुरस्कार स्वरूप उन्हें अयोध्या की जागीर मिली थी।  

पर इन सब बातों को छोडि़ए। तत्काल कई  सवाल हैं जिनके जवाब उदय प्रकाश को (और उनके पब्लिसिस्ट ओम थानवी को भी) देने चाहिए। पहला, उनके फुफेरे भाई के नाम पर शुरू किया गया वह पुरस्कार क्या सिर्फ परिवार के ही लोगों के लिए था या औरों के लिए भी था? अगर औरों के लिए भी था तो क्या शालीनता के लिए उदय प्रकाश को यह नहीं कहना चाहिए था कि इस पुरस्कार को कम से कम पहली बार परिवार से बाहर के किसी और लेखक को दिया जाए, मैं बाद में ले लूंगा? यह किसी से छिपा नहीं है कि उदय प्रकाश हिंदी के सबसे ज्यादा अलंकृत लेखकों में से हैं। अगर वह एक पुरस्कार के लिए थोड़ा रुक ही जाते तो क्या उनकी प्रतिष्ठा घट जाती? 

क्या थानवी बताएंगे कि इस शृंखला का दूसरा, तीसरा या चौथा पुरस्कार किस-किस को मिला है? तब क्या यह सिर्फ उदय प्रकाश को देने के लिए आयोजित किया गया था? कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्वर्गीय भाई की स्मृति को सिर्फ आड़ के रूप में इस्तेमाल किया गया हो? ऐसा तो नहीं है कि इस आयोजन के पीछे उद्देश्य  कुछ और ही रहा हो, जिसमें आदित्यनाथ महत्त्वपूर्ण घटक था? 

इंटरनेट पर ही एक और लेख इस बीच आया है जो सुना है प्रकाशन के लिए पहले जनसत्ता को भेजा गया था पर संपादक महोदय ने उसे छापने से इंकार कर दिया। वह है अशोक कुमार पाण्डेय का। इस लेख में दावा किया गया है कि आदित्यनाथ ने अमर उजाला को दिए अपने साक्षात्कार में विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि मैंने तो उदय प्रकाश को पहले ही कह दिया था कि मुझे न बुलवाएं विवाद हो जाएगा। यह बात 5 अगस्त, 2009 को इंडिया टुडे हिंदी ने अपने उत्तर प्रदेश संस्करण में भी छापी थी। हफ्तों से चल रहे विवाद में, जिसमें अब तक दर्जन भर लेख छप चुके हैं, जनसत्ता के पास अशोक कुमार पाण्डेय का लेख छापने की जगह नहीं है। इसलिए कि सारा अभियान निश्चित रणनीति के तहत चलाया जा रहा है इसलिए सिर्फ चुनिंदा लेख छप रहे हैं। जो लेख जरा भी असुविधाजनक साबित हो रहे हैं उनका जवाब प्रायोजित तरीके से अगले सप्ताह दिया जा रहा है।

संयोग देखिए, साल के अंदर ही उदय प्रकाश को मोहन दास कहानी (उर्फ उपन्यास?) पर साहित्य अकादेमी मिला।

संयोग और भी बहुत से हैं। जैसे कि साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी उसी गोरखपुर के हैं जहां आदित्यनाथ का लट्ठ पुजता है। (जनवरी, 2011 के दिल्ली मेल में लिखा गया था, ''हिंदी भाषा के संयोजक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हैं। इस पर याद आया कि पिछले वर्ष किसी प्रसंग में समयांतर में ही लिखा गया था कि आजकल अकादेमी का एक रास्ता वाया गोरखपुर होकर भी जाता है, जो स्वामी आदित्यनाथ का कार्य और संसदीय क्षेत्र है।'')

इसी तरह उदय प्रकाश का जलेस से मोहभंग उसी दौरान होता है जब दिल्ली में एनडीए की सरकार आ जाती है। वह थानवी को बतलाते हैं कि उन्होंने जलेस छोड़ दिया है पर संगठन से नहीं कहते कि वह जलेस छोड़ रहे हैं।  न ही इतने बड़े नैतिक स्टैंड (?) की सार्वजनिक घोषणा करते हैं या जलेस की अर्जुन सिंह की गोद में बैठ जाने के लिए आलोचना करते हैं। (निर्बाध आवाजाही के लिए?) इसी दौरान उनका पांचजन्य में साक्षात्कार छपता है। वहां भी तर्क यही है कि मुझे नहीं पता था कि यह साक्षात्कार पांचजन्य के लिए लिया जा रहा है। इस पर उदय प्रकाश की जो छीछालेदर उनकी पुरानी सहयोगी ने की वह पाखी (मई, 2011)के पन्नों में दर्ज है।

यह प्रसन्नता की बात है कि उदय अमेरिका में हैं। वह जिस परंपरा से जुड़ गए हैं वह भी कम भव्य नहीं है: अज्ञेय, कैलाश वाजपेयी, निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद और अशोक वाजपेयी। इनमें कुछ भारतीय दर्शन, संस्कृति और राष्ट्रीयता के अग्रदूत हैं तो कुछ रूपवाद के। पर ओम थानवी यह बताएं कि अगर उदय सीपीआई में होते या सीपीएम में होते तो वर्जीनिया विश्वविद्यालय उन्हें बुलाता? या फिर क्या किसी घोषित कम्युनिस्ट लेखक को आज तक किसी अमेरिकी विश्वविद्यालय ने बुलाया है?

ओम थानवी ने उदय प्रकाश के ब्लॉग में प्रकाशित लेख का उद्धरण विस्तार से छापा है जिसमें उदय ने त्रिलोचन शास्त्री और शैलेश मटियानी के संदर्भ से वामपंथी लेखक संगठनों पर हमला बोला है। उनके अनुसार:  '' क्या हम हिंदी के अप्रतिम कवि - और प्रगतिशील कविता वृहत्रयी में से एक - त्रिलोचन को याद करें, जो पहले स्वयं वामपंथी संगठन से निकाले गए, फिर दिल्ली से उनको शहर बदर करके हिंदू तीर्थ-स्थल हरिद्वार भेज दिया गया। अत्यंत विषम परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई ...। क्या हम शैलेश मटियानी को याद करें, जिन्हें जिंदा रहने और अपना परिवार पालने के लिए कसाई (चिकवा-गीरी) का काम करना पड़ा, ढाबों में बर्तन मांजने पड़े?...।'
   
जिस तरह से ये प्रसंग उठाए गए हैं वे लेखकीय मंशा को पूरी तरह उजागर कर देते हैं। त्रिलोचन शास्त्री को कितनी उम्र में जसम से हटाया गया? उन्हें किसने हरिद्वार भेजा? क्यों भेजा? क्या उनके परिवार में कोई नहीं था? वहां वह किसके साथ रहते थे? उनके दो बेटे कहां हैं? वह अंतिम दिनों में वृद्धावस्था के कारण होनेवाले सेनाइल सिंड्रोम या एलजेमियर से पीडि़त नहीं थे? उनकी मृत्यु भरी-पूरी उम्र में बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के कारण हुई, क्या यह सच नहीं है?

मटियानी को कसाई का काम अपनी पारिवारिक दुकान में करना पड़ा था। इसमें क्या बुराई है? काम तो काम है! उदय प्रकाश जिस ब्राह्मणवाद की कब्र खोदने में लगे हैं क्या वह स्वयं उसी के शिकार नहीं नजर आते हैं? वैसे क्या लेखक दलाई लामा होता है कि पैदा होने के साथ ही उसमें ऐसे चिह्न होते हों कि उसे तुरंत पहचान लिया जाए कि बेटा नामी कथाकार होने वाला है? एक बार लेखक बन जाने के बाद मटियानी ने सिवा लेखन के क्या कोई और काम किया? नौकरी न करना उनका अपना निर्णय था। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें नौकरियां मिलती ही नहीं या मिल ही नहीं रही थीं।

मटियानी, शास्त्री आदि के नाम का इस्तेमाल करना आसान है, उनके डंडे से दूसरों को पीटना तो और भी आसान। पर क्या उदय प्रकाश बतलाएंगे कि जब मटियानी दिल्ली के मानसिक रोग चिकित्सालय में भर्ती थे वह उनसे एक बार भी मिलने गए थे? यह अस्पताल उदय प्रकाश के घर से चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर ही है। उनके पास तो कार भी कई वर्षों से है। क्या उन्होंने कभी मटियानी की कहानियों पर या उनके जीवन संघर्ष पर कहीं एक पैरा भी लिखा है? उन्हें कहीं श्रद्धांजलि ही दी हो? वह तो हिंदी में पीएचडी हैं। इतना तो कर ही सकते थे। त्रिलोचन शास्त्री के लिए उन्होंने क्या किया, जो बीमारी के दौरान अंतिम दिनों में उनके घर के बगल में ही रहते थे? उदय प्रकाश और थानवी को भी याद दिलाना जरूरी है कि शास्त्री जी के उपचार व मदद के लिए दिल्ली की मुख्य मंत्री के पास जो प्रतिनिधि मंडल गया था उसमें कई वामपंथी लेखक निजी तौर पर और उनके तीनों संगठन के प्रतिनिधि शामिल थे पर जो रिपोर्ट जनसत्ता में इस संबंध में छपी थी, क्या उसमें उदय प्रकाश का नाम था? वैसे यह बतलाना जरूरी है कि दिल्ली सरकार ने शास्त्री जी की भरसक मदद की थी। इसी तरह भाजपा सरकार ने शैलेश मटियानी की।

थानवी ने लिखा है: ''एक लेखक के किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के विरोध में इतनी बड़ी तादाद में हिंदी लेखक न कभी पहले एकजुट हुए, न बाद में।' निश्चय ही यह सही है पर इस के साथ यह भी सही है कि इस दर्जे की अवसरवादिता न कभी पहले देखने को मिली और न ही बाद में। पर ऐसा भी नहीं है कि हिंदी लेखक समय-समय पर उन बातों का विरोध न करते रहे हों जिनसे समाज और साहित्य का सरोकार हो। स्वयं जनसत्ता के सती प्रथा का महिमा मंडन करनेवाले एक संपादकीय का विरोध करने में पूरे सौ लेखक शामिल थे। इसलिए लेखकों का विरोध न कोई नई बात है और न ही आश्चर्य की। समझने की बात यह है कि वह किसी एक कारण तक सीमित नहीं होता और न ही भविष्य में होगा।

जो भी हो यह कितना दुखद है कि उदय प्रकाश निजी स्कोर सैटल करने के लिए दो दिवंगतों का इस्तेमाल इतनी अशालीनता और हृदयहीनता से करने में जरा भी झिझक नहीं महसूस कर रहे हैं और थानवी भी उसी हथियार से वामपंथियों के आखेट का आनंद ले रहे हैं।

2 - पर उपदेश कुशल बहुतेरे

समयांतर और पंकज बिष्ट ओम थानवी का किस तरह से पीछा (हांट) करते हैं उसका उदाहरण इधर तहलका पाक्षिक में छपा उनका साक्षात्कार है। यह साक्षात्कार कई तरह की गलत बयानियों से भरा है और स्वयं उनके दोहरे चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है।

साक्षात्कार पर आने से पहले थानवी के इन आप्त वाक्यों को देखें: ''लेकिन क्या ये प्रसंग सचमुच ऐसे हैं, जिन्हें लेकर इतना हल्ला होना चाहिए? क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं, जिसमें उन्हीं के बीच संवाद हो जो हमारे मत के हों? विरोधी लोगों के बीच जाना और अपनी बात कहना क्यों आपत्तिजनक होना चाहिए? क्या अलग संगत में हमें अपनी विचारधारा बदल जाने का भय है? क्या स्वस्थ संवाद में दोनों पक्षों का लाभ नहीं होता? यह बोध किस आधार पर कि हमारा विचार श्रेष्ठ है, दूसरे का इतना पतित कि लगभग  अछूत है! पतित है तो उस पर संवाद बेहतर होगा या पलायन?... दुर्भाव और असहिष्णुता का यह आलम हमें स्वतंत्र भारत का अहसास दिलाता है या स्तालिनकालीन रूस का? 'आवाजाही के हक में' जनसत्ता, 29 अप्रैल, 2012।

कितनी उत्तम बातें हैं! कैसे उदात्त विचार और कैसी सदाशयता है! क्या बात है!

अब देखिये थानवी 15 दिन बाद ही  तहलका (15 से 31 मई) के  साक्षात्कार में क्या कहते हैं: ''पंकज बिष्ट ने अपनी पत्रिका समयांतर में लिखा कि वामपंथियों को अज्ञेय की जन्मशती का विरोध करना चाहिए। उन्होंने तीन पेज की रिपोर्ट लिखी। उसमें अपील की कि लेखकों को कार्यक्रम में शिरकत नहीं करनी चाहिए। हम लोगों ने पंकज बिष्ट जी को आमंत्रित किया और वे कलकत्ता चले आए। आप देख सकते हैं कि इनकी कथनी और करनी में कितना अंतर है।''

निश्चय ही किसी कथनी और करनी में अंतर है, पर जानने की बात यह है कि किसकी?

जनसत्ता, 29 अप्रैल, 2012 में लिखे अपने लेख 'आवाजाही के हक में' के अनुसार तो उन्हें प्रसन्न होना चाहिए था कि पंकज बिष्ट उन के आमंत्रण को स्वीकार कर अपने-अपने अज्ञेय के दूसरे विमोचन, जो उपराष्ट्रपति द्वारा किया जा रहा था, और संगोष्ठी में भाग लेने कोलकाता 'चले आए' थे। 'आवाजाही' की उनकी वकालत का इससे अच्छा प्रमाण क्या हो सकता था। पर तब उन्हें वामपंथियों को कोसने का मौका कैसे मिलता! साफ है कि हाथी के दांत खाने के और हैं और दिखाने के और। इस वक्तव्य में और भी कुछ छिपा है, जो छोटेपन या कहें उनकी अनुदारता का प्रमाण है। उनको पंकज बिष्ट का कोलकाता आना अच्छा नहीं लगा। क्यों कि बिष्ट ने कोलकाता पहुंचकर भी उस अखंड कीर्तन में अपना स्वर नहीं मिलाया जिसमें शेष आमंत्रित शामिल थे। वह पंकज बिष्ट का 'भंडाफोड़'  इसलिए करना चाहते हैं कि उन्होंने वहां भी अज्ञेय के बारे में कई ऐसी बातें कही थीं जो थानवी को रास नहीं आईं। कहां गई उनकी वह उदारता जो वह अपने जनसत्ता वाले लेख में मंगलेश डबराल को पीटने के लिए इस्तेमाल करते हैं? कोलकाता से लौट कर बिष्ट ने जो लिखा वह ओम थानवी के लिए किस तरह से असुविधाजनक साबित हुआ वह भी देखने लायक है। थानवी ने अपने साक्षात्कार में कहा है: ''एक अखबार ने लिखा कि अज्ञेय आयोजन में हिंदी के लोग कम बंगाल के लोग ज्यादा शामिल थे...। '' उन्होंने बतलाया नहीं कि वह कौन-सा अखबार था? वह था समयांतर जिसने लिखा था, वहां जो बंगाली भद्रलोक इकठ्ठा हुआ फिर चाहे उसमें शंको घोष हों, सौमित्र चटर्जी हों या अन्य छोटे-बड़े अभिनेता-अभिनेत्री, वे सब उपराष्ट्रपति के कारण ही शामिल हुए थे क्योंकि कोलकाता में उपराष्ट्रपति का आना बड़ी बात थी। उस रिपोर्ट में और भी कई ऐसी बातें थीं जो निश्चित है कि अज्ञेय भक्तों को रास नहीं आई होंगी। (देखें: 'सरोकार निजी बनाम सामाजिक', समयांतर, मार्च, 2012)

आप तहलका के इस साक्षात्कार की भाषा को नोट कीजिए 'चले आए'।  यानी बिष्ट बैठे हुए थे कि उन्हें कोई कोलकाता बुलाए। बेचारे ने कोलकाता कभी देखा नहीं था या हवाई यात्रा नहीं की थी, विशेषकर फ्री फंड की, जो पत्रकारों को अक्सर ही उपलब्ध रहती है।  इसलिए वह मरे जा रहे थे। पर वह वहां कैसे गए चूंकि ये बातें समयांतर की रिपोर्ट में बताना जरूरी नहीं था इसलिए उस पर बात ही नहीं की। पर चूंकि थानवी ने इस छोटी बात को उठा दिया है तो अब यह भी बता ही दिया जाना चाहिए। क्या ओम थानवी ने उस पंकज बिष्ट को, जो अज्ञेय को अंग्रेजों का एजेंट बताता रहा हो, उसी उदारता के चलते बुलाया था जिसकी वकालत उन्होंने जनसत्ता के अपने लेख में की है? या क्या वह बिष्ट को जानते नहीं थे? या थानवी उन्हें कोलकाता की यात्रा की घूस देकर अपने पक्ष में कर लेना चाहते थे? उन्हें सबसे बड़ा दुख इस बात का होगा कि समयांतर ने ही इस बात को रेखांकित किया था कि थानवी अपनी किताब का तीन बार विमोचन करवा चुके हैं। यहां तक कि उपराष्ट्रपति को भी इस बात का पता नहीं था कि अपने-अपने अज्ञेय का उनसे पहले भी लोकार्पण किया जा चुका है।

इस परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है कि उन्हें पंकज बिष्ट के कोलकाता आने से क्यों कष्ट हुआ होगा। ऐसे में वह बिष्ट को क्यों बुलाते और उन्होंने बुलाया भी नहीं।  वह यह बतलाने से झिझक क्यों रहे हैं कि पंकज बिष्ट उन पर लादे गए थे। पंकज बिष्ट को निमंत्रण प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से उनके ही आदमी द्वारा मिला था। यह दो दिन तक कोलकाता रहने का था, पर बिष्ट उस दौरान इतने व्यस्त थे कि उन्होंने मेजबानों से कहा कि उनके लिए एक रात से ज्यादा कोलकाता ठहरना संभव नहीं है और इसीलिए वह अगले ही दिन, यानी गोष्ठी खत्म होने से एक दिन पहले, चले आए थे। उनके लौटने का प्रबंध प्रभा फाउंडेशन ने यथानुसार कर दिया था। बिष्ट को प्रभा खेतान फाउंडेशन ने इसलिए बुलाया था क्योंकि वह प्रभा खेतान के मित्रों में रहे हैं। वह भी वहां प्रभा खेतान के सम्मान के कारण गए थे। यह पहली बार भी नहीं था कि वह प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा आयोजित किसी समारोह में कोलकाता गए हों। इससे पहले फरवरी, 2010 में भी वह फाउंडेशन के समारोह में वहां जा चुके थे। संयोग से उसमें भी ओम थानवी उपस्थित थे पर उस आयोजन में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।

ओम थानवी बताएं कि उनकी किताब के विमोचन के इस आयोजन में किस संस्था ने क्या और कितना आर्थिक सहयोग किया था? असल में आयोजन का सारा खर्च प्रभा खेतान फाउंडेशन ने ही उठाया था, जिसमें डेढ़ हजार रुपए कीमत की अपने अपने अज्ञेय की सौ प्रतियां खरीदना भी शामिल था, बाकी संस्थाओं की भूमिका मात्र प्रतीकात्मक थी।

ओम थानवी अपने तथ्यों में कितने दुरुस्त हैं इसके सिर्फ दो प्रमाण प्रस्तुत हैं:

एक : ओम थानवी ने तहलका  में कहा है कि ''पंकज बिष्ट ने अपनी पत्रिका समयांतर में लिखा कि वामपंथियों को अज्ञेय की जन्मशती का विरोध करना चाहिए। उन्होंने तीन पेज की रिपोर्ट लिखी। उसमें अपील की कि लेखकों को कार्यक्रम में शिरकत नहीं करनी चाहिए। वामपंथियों को अज्ञेय की जन्मशती का विरोध करना चाहिए?'' हम थानवी और तहलका, दोनों को चुनौती देते हैं कि वे बतलाएं कि पंकज बिष्ट ने समयांतर के कौन से अंक में यह लिखा? इससे ज्यादा गैरजिम्मेदाराना कोई बात हो ही नहीं सकती। 

हां उनके द्वारा संपादित पत्रिका में एक लेख में यह जरूर कहा गया था कि वाम पंथियों को अज्ञेय की शताब्दी नहीं मनानी चाहिए।  उस में भी ''जन्मशती का विरोध'' जैसी कोई बात नहीं थी। बल्कि यह कहा गया था कि जो मनाना चाहते हैं मनायें। दोनों बातों में कितना अंतर है, पाठक समझ सकते हैं। स्वयं गत वर्ष अपने लेख 'अज्ञेय के दिल जले' को अगर थानवी देखें तो उन्हें मिल जाएगा कि यह बात अजय सिंह ने लिखी थी। क्या थानवी और तहलका अपनी गलती सुधारेंगे?

दूसरा: थानवी के अनुसार, ''शमशेर बहादुर सिंह और केदारनाथ उनके पहले सप्तक तार सप्तक में शामिल थे।'' यह बात तथ्यात्मक रूप से गलत है। 'उनके पहले सप्तक' का क्या अर्थ है वही जानें? पर तार सप्तक का मतलब ही पहला सप्तक है। सच यह है कि तार सप्तक में न तो शमशेर शामिल थे और न ही केदारनाथ, फिर चाहे वह अग्रवाल हों या सिंह। केदारनाथ अग्रवाल तो किसी भी सप्तक में शामिल नहीं थे। हां, केदारनाथ सिंह जरूर तीसरे सप्तक में शामिल हैं।

अगर थानवी के इस साक्षात्कार को देखा जाए तो, जो बात उभर कर सामने आती है, और जिसे कोई अंधा भी देख सकता है वह यह है कि संकीर्णता वामपंथी नहीं वह दिखला रहे हैं बल्कि वह स्वयं वैचारिक संकीर्णता और जबर्दस्त छोटेपन के शिकार हैं। अगर वामपंथी लेखक संगठन अपने लेखकों को अन्य जगह जाने से रोकते तो फिर नामवर सिंह (प्रलेस) और मैनेजर पाण्डेय (जसम) अज्ञेय के जन्मशती समारोहों में कैसे पहुंचते? पंकज बिष्ट कैसे पहुंचते? और प्रणय कृष्ण कैसे अज्ञेय पर मुग्ध भाव से लिखते? पर लेखक संगठन और स्वयं सामाजिक रूप से सजग लेखक अपने साथियों से यह अवश्य चाहते हैं कि वे जहां भी जाएं देख-भाल कर जाएं। अगर कोई इरादतन कुछ करता है और फिर अपने पापों को ढकने के लिए उसे दूसरों के सर मढ़ता है तो इसका क्या किया जा सकता है?

समयांतर में जब कोलकाता (मार्च) और उसके बाद दिल्ली (अप्रैल) समारोहों की रिपोर्टें छपीं तो निश्चित था कि इन्हें इतनी आसानी से सहन नहीं किया जाएगा। हम तैयार थे पर यह जवाबी कार्रवाही इतनी  बचकानी होगी इसकी हमें उम्मीद नहीं थी। पर मजे की बात यह है कि उन्होंने जो बातें अपने लेखक में कही हैं जैसे कि पंकज बिष्ट निशंक के साथ बैठे या फिर कोलकाता हमारे बुलाने पर गए ये दोनों ही बातें उनके प्रिय ब्लॉगों में से एक में लिखी गईं थीं। आखिर ओम थानवी से पहले यह बात उस ब्लॉग में कैसे लिखी गई जिसे बाद में उन्होंने उद्धृत किया है? संभव है, और इस अतार्किकता के माहौल में तो कुछ भी संभव है, कि कभी ब्लॉग के जंजाली थानवी से प्रेरणा लेते हों और फिर थानवी ब्लॉगों से।

गुरुवार, 7 जून 2012

देखना अदम को यहाँ से


'कल के लिए' का 'अदम स्मृति विशेषांक' आ गया है. अंतिम पन्ने पर लिखे जाने वाले कालम की जगह मैंने इस बार अदम की शायरी और उसके बरक्स हिन्दी आलोचना की स्थिति और स्टैंड पर लिखने की कोशिश की है...


न रहना अदम का


सब चले जाते हैं एक दिन. अदम भी चले गए. जो उम्र थी उनकी वह जाने की नहीं थी. कुछ अपनी वजूहात, कुछ ज़माने की बेजारी. उन्हें जाना पड़ा. जैसे कोई भरी महफ़िल से अचानक उठे और भाड़ में जाओ जैसा कुछ कहकर गुस्से से पाँव पटकते चला जाय. सब दो पल के लिए ठहर जाय और फिर कारोबार चलने लगे अपनी गति से. अब चाहें तो इसे शो मस्ट गो आन की आशावादिता से देखें, या क्या फर्क पड़ता है की कृतघ्नता से. दरअसल यह अदम से ज़्यादा आपके सोचने के ढंग पर निर्भर करता है.

अदम से मेरा रिश्ता केवल पाठक का था. गोरखपुर के दिनों में देखा था एक-दो बार. सुना भी था. बाद में कथाक्रम से लेकर और जगहों के तमाम किस्से भी सुने. होटलों के शानदार कमरों में मंहगी शराब पीते हुए बड़े साहित्यकार लोग जब अदम की शराबखोरी की बात कर रहे होते थे तो मुझे उनका बेहद प्रसिद्ध शेर काजू भुने हैं प्लेट में याद आता था.रामराज विधायक निवास निवास तक ही महदूद नहीं है, उसके छीटें हम सब के घरों तक पहुंचे हैं. अदम को याद करते हुए मुझे भुवनेश्वर याद आते हैं, मजाज याद आते हैं, गोरख याद आते हैं...और भी कई-कई लोग जिन्हें इतना नाम भी नहीं मिला. यह आत्महंता प्रवृति अगर किसी संवेदनशील कलाकार में घर कर जाती है तो इसके लिए वह समाज ज़िम्मेदार है जो एक कलाकार को बेकार की चीज़ में तब्दील कर देता है. जो हर उस चीज़ को बढ़ावा देता है जो दुनिया को बदसूरत बनाने वाली होती है. दुनिया बदलती नहीं और उन आँखों की तकलीफ का समंदर और-और गहरा होता चला जाता है. मजाज और अदम जैसे लोग जिस रुमान को लेकर शायरी की दुनिया में आते हैं, हकीक़त से रोज-ब-रोज की जद्दोजेहद उसे रेशा-रेशा बदशक्ल करती और बिखेरती चली जाती है और हकीकी दुनिया से दूर एक नशा उसे सहारा देता है.

लेकिन अदम को पढते हुए यह तथ्य मुझे चौंकाता है कि ज़िंदगी में जो शराब उनकी अभिन्न हिस्सा बनती है वह कविता में पूरी तरह से गायब है. सत्तर-अस्सी के दौर का जो संघर्ष का व्याकरण है वह उनकी कविता में अपने पूरे अज्म के साथ मौजूद है. अदम की शायरी में कहीं कोई पलायन नहीं है. लगातार भिड़ते हुए, तंज करते हुए, टकराते हुए. हालत यह कि अन्ना के दौर में जब बड़े-बड़े स्तंभ भ्रम के चक्रवात में पूरी गति से परिक्रमा कर रहे थे उस दौर में भी अदम सवाल उठा रहे थे कि ये महाभारत है जिसके पात्र सारे आ गए/ योगगुरु भागे तो फिर अन्ना हजारे आ गए. और गौरतलब बात यह है कि वह अमेरिका या किसी ऎसी ताकत के खिलाफ वह जबानी संघर्ष ही नहीं कर रहे थे जिसमें दरअसल कोई खतरा नहीं होता. वह विधायक से लेकर स्थानीय प्रधान तक पर तंज कर रहे थे. यह सीधी लड़ाई साहित्य से गायब होती सी चीज़ है. इसीलिए अदम हमें एक चुनौती की तरह लगते हैं. इसीलिए मंगलेश डबराल की तरह वह मुझे नागार्जुन की परम्परा के लगते हैं. अपने शहर के कवि मुकुट बिहारी सरोज की तरह लगते हैं. गिर्दा या हरीश भादानी की तरह लगते हैं. उर्दू के उस तौर के तरक्की पसंद शायरों की जमात के लगते हैं जब हिन्दी कविता अपनी कूढ़मगजी में प्रेम और पलायन के वाहियात आख्यान रच रही थी. फैज़, मजाज, साहिर जैसे शायरों के साथ देखने पर अदम की शख्सियत के तमाम दरवाज़े खुलते हैं.

यहाँ यह मैं ज़रूर कहूँगा कि अदम को उर्दू शायरी के उस उरूज़ से देखने पर कई दुसरे तथ्य भी सामने आते हैं. मसलन वह उस ऊंचाई और गहराई के शायर नहीं थे. आप देखिये कि वह जिस बेवा के शिकन की बात करते हैं मजाज महल की आड़ से निकले पीले माहताब के बरक्स उसके सबाब को रखकर एक बड़ी बात कह चुके हैं. लेकिन मजाज के दौर से जदीदी दौर के बीच एक बड़ा फासला पैदा हो चुका है. गजल फिर से जाके महबूब की जुल्फों के पेंच-ओ-ख़म में उलझकर रह गयी है. अदम उसे अपने काबिल बुजुर्गों की तर्ज़ पर एक बार फिर गाँव की गलियों और बेवा के शिकन तक ले जाने की बात कर के उस रौशन तहरीक के अलम्बरदार बनते हैं और वह भी लगभग अकेले. वह हिन्दी के नहीं हो पाते कि उन्होंने एक ऎसी विधा चुनी जिसे दुष्यंत के बावजूद अब भी  उर्दू की माना जाता है और उर्दू के नहीं हो सके कि उन्होंने वह भावभूमि चुनी जिसकी आंच से उर्दू ग़ज़ल रोज-ब-रोज दूर होती चली जा रही है. हिन्दी और उर्दू के दोआब कहें या दोराहे पर खडा होकर अपनी बुलंद आवाज़ में गंगा-जमुनी संस्कृति के पक्ष में आवाज़ लगाता यह कवि अपने श्रोताओं के साथ अकेला खड़ा नज़र आता है. शायद इसीलिए बहुत दूर से अलग दिखाई भी देता है. जो चीज़ मुझे खटकती है वह है उनके गज़लों की सीमित संख्या. मुझे हमेशा लगता है कि वह जिस पाए के शायर थे, जितनी विस्तृत उनकी नज़र थी और जैसा उनका अनुभव-संसार था, मुझे हमेशा लगता है कि उन्होंने खुद अपने साथ इन्साफ नहीं किया. 

अदम को खास बनाने वाली दूसरी चीज़ है उनके तेवर और लगातार मुख्यधारा से बाहर जा रहे गाँव-जवार की उनकी गहरी समझदारी. ऐसा नहीं कि गाँव हिन्दी कविता में नहीं रहा है. लेकिन नागार्जुन के विपरीत बाद की कविता में यह एक नास्टेल्जिक इमेजरी के रूप में आया है. वर्षों पहले गाँव से दूर हुए और अपने संस्कारों से व्यवहार तक में पूरी तरह शहरी हो चुके मध्यवर्गीय कवियों के यहाँ किसी दूरस्थ स्मृति में दर्ज गाँव जब आता है तो वह एक आभासी छवि की तरह दर्ज होता है या फिर पत्र-पत्रिकाओं में दर्ज कथाओं और आंकड़ों के आधार पर. इसका सीधा कारण है हिन्दी कवियों का मध्यवर्गीय परिवेश. आज हिन्दी कविता का पंचानवे फीसदी हिस्सा शहरों और महानगरों से आता है. ऐसे में अदम का गाँव में रहते हुए खेती-किसानी से जुड़े होकर लिखते रहना उन्हें एक विशिष्ट अवस्थिति प्रदान करता था जहां से वह बिना किसी पूर्वाग्रह या मोह के ग्रामीण सच को लिख पाते. और वह लिख रहे थे. चमारों की गली जैसी कविता उस परिवेश का हिस्सा हुए बिना लिखी ही नहीं जा सकती थी. लेकिन यहीं यह भी कह देना होगा कि ऎसी कविता सिर्फ उस परिवेश का हिस्सा हो जाने भर से ही नहीं लिखी जा सकती. उसके लिए एक और ज़रूरी चीज़ की दरकार है- वह है प्रतिबद्धता. यही वह विशिष्टता है जो ग्रामीण परिवेश पर लिख रहे तमाम दूसरे गीतकारों/गजलकारों और अक्सर कवियों से भी उन्हें अलग करती है. उनके यहाँ अगर जितने हरामखोर थे कुर्बो-जवार में / परधान बन कर आ गए अगली कतार में जैसी पंक्ति आती है तो वह उनकी उस समझौताहीन प्रतिबद्धता के चलते ही. अदम का अदबी सफर इन प्रतिबद्धताओं के लगातार और मजबूत होते जाने और इसकी कीमत चुकाते चले जाने का गवाह है. उनकी गजलें सक्रिय प्रतिरोध की गजलें हैं, प्रगतिशील जीवन मूल्यों की गज़लें हैं और अवाम के दोस्त शायर की गजलें हैं. यही वह नुक्ता है जो उन्हें कई अन्य लोकप्रिय गीतकारों/गजलकारों से अलग खड़ा करता है. वह लोकप्रिय हैं लेकिन लोकप्रियतावादी नहीं हैं. वह नाजुक नब्जों को सहलाकर या फिर कुछ घिसी-पिटी लिजलिजी भावनाओं को उकसा कर मंच लूटने वालों में से नहीं. वह सीधे जनता से संवाद करते हुए उसके दुःख-दर्द को उभारकर बगावत का आह्वान करने वाले शायर हैं. महिलाओं को लेकर जिस कदर सम्मान उनके यहाँ दिखता है वह दुर्लभ है. शायरी में ओशो के दर्शन के परखच्चे उड़ाने वाले वह अकेले शायर दिखे मुझे. और इन सब के बावजूद अगर वह जनता के करीब पहुँच सके तो इसको विचारधारा की ताक़त और उनकी शायरी के अज्म की बुलंदी माना जाना चाहिए.



लेकिन अफ़सोस की हमारी मुख्यधारा की आलोचना के पास इस तरह की कविता के लिए कोई जगह नहीं है. कहा जा सकता है कि ऎसी कविता को आलोचना की ज़रूरत ही नहीं होती. वह खुद ही स्पष्ट होती है, जनता तक पहुंचती है. लेकिन मेरा सवाल है कि क्या आलोचना को ऎसी कविता की ज़रूरत नहीं होती? जिस तरह से एक तरह की कविता का वर्चस्व (hegemony) साहित्य के भीतर स्थापित कर दिया गया है क्या वह हमारी भाषा के साहित्य के लिए अच्छा है? जहां राजनीति से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश तक में हम विविधताओं के सम्मान की बात करते हैं वहीं साहित्य के भीतर एक खास तरह की संरचना को ही मान्यता देना और बाक़ी सबको खारिज कर देना क्या है? क्या यह एक तरह का वर्चस्ववादी व्यवहार नहीं? क्या पापुलर साहित्य की पूरी तरह से अनदेखी एक तरह के आभिजात्य की स्थापना नहीं करती? क्या इस तरह के साहित्य की अनुपस्थिति हिन्दी में नए पाठक तैयार करने के अभियान को बुरी तरह बाधित नहीं करती?

दुर्भाग्य से इन सवालों से जूझना हमारी आलोचना के लिए कभी कोई मुद्दा रहा ही नहीं.
तुलसी के काव्य में सामजिक चेतना से लेकर प्रेमचंद की कहानियों में ग्राम्य चेतना जैसे महाउबाऊ विषयों पर हर दुसरे-तीसरे संगोष्ठियां कराने वाली संस्थाएं और उनमें हिस्सेदारी करने वाले लेखक/कवि/आलोचक कभी इस सवाल से रु-ब-रू होना ही नहीं चाहते कि आने वाले बीस सालों में हिन्दी पढ़ने/लिखने वालों की क्या हालत होने जा रही है. अंग्रेजी किस तरह भारतीय भाषाओं का दम घोटे दे रही है. किस तरह हमारे पास नए पाठकों के लिए कोई साहित्य है ही नहीं. किस तरह हमारा पूरा साहित्यिक परिवेश एक तयशुदा फ्रेम में इस कदर बांध गया है कि उसके बाहर झांकना तक कुफ्र घोषित कर दिया जाता है. कभी-कभी जब कोई अदम, कोई दुष्यंत, कोई गिर्दा, कोई मुकुट बिहारी सरोज इसे तोड़ने की कोशिश करता है तो हम आध्यात्मिक चुप्पी के साथ उसका नकली एहतराम करते हैं और फिर अपनी गहरी नींद में सो जाते हैं. एक खास तरह के  आभिजात्य ने हमारे साहित्यिक परिदृश्य को पूरी तरह से ढक दिया है. अदम जैसे लोग उसके प्रतिपक्ष बनकर सामने आते हैं. इसीलिए उन पर बात करना, उनकी ग़ज़लों पर बात करना मुझे इस आभिजात्य पर सवाल खडा करना लगता है. इस अंक के लिए आये तमाम लेखों को पढते हुए मुझे यह संतोष हुआ कि इसके खिलाफ एक असंतोष तो दिखाई दे ही रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि यह आगे जाएगा. 

गुरुवार, 17 मई 2012

पर्सनल इस पोलिटिकल कामरेड...


गौरव सोलंकी ने ज्ञानपीठ पर जो सवाल उठाये थे और उसके बाद हिन्दी के साहित्यिक जगत में जिस तरह बहस तेज हुई है, उसके बाद इस बाबत "निरपेक्ष" रहना कम से कम हमारे लिए संभव नहीं था. यह मामला अपने आरम्भ में भले एक युवा लेखक (जो कभी ज्ञानपीठ के स्वेच्छाचारी निदेशक की गुड बुक में रहा) और संस्था के बीच में रहा हो लेकिन आज यह हिन्दी में प्रकाशक और लेखक के बीच के संबंधों, लेखक के स्वाभिमान और हिन्दी प्रकाशन के पूरे परिदृश्य में नियमों के भयावह उल्लंघनों की बहस बन चुकी है. हमने इस बारे में उठ रहे तमाम सवालों पर गौरव सोलंकी से प्रतिक्रिया देने का अनुरोध किया था जो अब शब्दशः यहाँ प्रकाशित की जा रही है. जो मित्र इस पूरे घटनाक्रम से परिचित हैं उनके लिए कुछ ज़रूरी लिंक भी दिए जा रहे हैं.







मैं हिन्दी साहित्य की इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश तो करूंगा लेकिन इसके हिसाब से ख़ुद को किसी कीमत पर नहीं बदलूंगा !






इस पूरी बहस में कुछ साथी लगातार मेरे चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं या ऐसी कोशिश कर रहे हैं। एक तरह से यह सही भी है। अंधे होकर मेरी सब बातें मानी भी नहीं जानी चाहिए। मुझे भी उसी कसौटी पर कसा जाना चाहिए, जिस पर मैं उन्हें कसने की कोशिश कर रहा हूं, जिनके विरोध में हम सब खड़े हैं। 



मुझ पर संदेह करने और कभी कभी तो उसे यक़ीन के साथ कह रहे साथियों को तीन बातें 'निश्चित' तौर पर लग रही हैं कि पहले भी यह पुरस्कार मुझे सेटिंग से मिला था, मुझे इस पूरे सिस्टम की जानकारी शुरू से ही थी और अब व्यक्तिगत परेशानी हुई तो आवाज़ उठाई। यह वक्तव्य उन्हीं से बात करने और अपनी बात कहने के लिए है। साथ ही अपना अतीत खोलकर रखने के लिए भी। बाकी फ़ैसला आपको करना है। 



सबसे पहले तो, कृपया मुझे फ़ैशनपरस्त या किसी भी तरह का क्रांतिकारी समझने की भूल न करें। मैंने यह सब किसी के लिए भी नहीं किया है। मेरी सारी लड़ाई एक पूर्वाग्रही, भ्रष्ट और बेशर्म व्यवस्था से है और अपने लेखक और अपनी किताब के सम्मान की है। लेकिन यह इसी तरह सब लेखकों और सब किताबों के सम्मान से जुड़ जाती है। हर लड़ाई ऐसे ही तो शुरू होती है कहीं ना कहीं। गाँधी जी को भी तो अफ़्रीका में काला होने के कारण ट्रेन से फेंक दिया गया था। क्या तब उनकी लड़ाई भी व्यक्तिगत हो जाती है? मैं उनसे अपनी तुलना नहीं कर रहा, और न ही लाखों करोड़ों मील दूर तक ऐसा कर सकता हूं। मैं बस लड़ाई शुरू होने के ढंग को समझाने के लिए एक उदाहरण दे रहा हूँ। 



एक और तथ्य है, जिसे उठाने का कोई तुक नहीं और न ही मैं इसे बलिदान की तरह कह रहा हूं इसलिए इस पर मुझे कोसने मत लगिएगा। यह सिर्फ़ अपने चरित्र को समझाने की कोशिश में कह रहा हूँ। यह मेरा अपना निर्णय था कि मैंने आईआईटी से पढ़ाई के बाद एक कम्पनी की नौकरी छोड़ी और फ़िलहाल सिर्फ़ लेखक हूं। अगर आपको लगता है कि बहुत महत्वाकांक्षी और किसी भी शर्त पर ऊपर जाने की चाह रखने वाले लोग ऐसे फ़ैसले लेते हैं तो इस बारे में क्या कहूं? 



दूसरा, एक साथी का आरोप आया है कि 'किसी' ने उन्हें पिछले साल नवलेखन पुरस्कार की खबर पहले ही दे दी थी कि दो में से एक को मिलेगा और मुझे मिला। इस तरह वे घोषणा कर रहे हैं कि मैं उसी व्यवस्था का हिस्सा था और मुझे किसी जुगाड़ से ही सब मिला था। बहरहाल, उस समय चार लोगों को यह पुरस्कार दिया गया था, दो को कविता की किताब के लिए, दो को कहानी की किताब के लिए, फिर एक को मिलने का कैसे पता चला उन्हें और वे कह रहे हैं कि सही भी निकला? फिर भी, अगर कोई एक भी आदमी किसी भी तरह यह सिद्ध कर सके कि मैंने एक भी दफ़ा किसी से इसकी सिफारिश करवाई हो, कोई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष चापलूसी की हो तो मैं खुद फेसबुक पर सार्वजनिक रूप से घोषणा करूंगा कि मेरा पूरा पत्र खोखला और झूठा है और मैं एक नम्बर का दोहरे चरित्र का आदमी हूँ।



मेरा उन साथी से आग्रह है कि उस आदमी का नाम लीजिए, जिसने पहले ही आपसे यह बता दिया था। जो आदमी सबके नाम के साथ सब कुछ बता रहा है, उसकी नीयत पर आप शक कर रहे हैं और मुझे आपसे यह भी शिकायत है कि आपको सब 'इल्हाम' पहले से है, आपने उसी समय यह क्यों नहीं कहा? यह पूरी लड़ाई को और मज़बूत बनाता। आप अब भी बिना नाम लिए बात कर रहे हैं। मुझे इसी से शिकायत है। इस रवैये से। कि जो बोल रहा है, उसमें फलां कमियाँ हैं और हम को सब पता तो है लेकिन बोलेंगे नहीं। उस आदमी का नाम प्लीज़ बताइए और पूरी प्रक्रिया। मैं ख़ुद इस फ़िक्सिंग को सामने लाने में जो बन पड़ेगा, करूंगा। 



कुछ तो तथ्यों के साथ कहिए। कम से कम उस आदमी को तो यह जानने का हक बनता है, जिसने भले ही सब साहित्यकारों को मालूम बातों का ही उद्घाटन किया लेकिन जब उसे पता चला, उद्घाटन किया तो। 



जहाँ तक आपको यह लगता है कि मुझे इस राजनीति और भ्रष्टाचार का सब पहले से पता था, तो मैं साहित्य का विद्यार्थी नहीं था। इंजीनियरिंग पढ़ी और आईआईटी के वे चार साल देश की सबसे पारदर्शी व्यवस्थाओं में से एक में बिताए। वहीं शायद यह अपेक्षा शुरू हुई कि पूरी दुनिया को ऐसा ही होना चाहिए। वहाँ से निकलने के बाद तहलका में लिखता था, कविताएँ कहानियाँ लिखता था। हर जगह छपती थी। दो-चार लोगों के अलावा किसी से मिलता नहीं था। उनसे भी औसतन तीन-चार महीने में एक बार। चन्दन ने कुणाल से मिलवाया था। कुणाल की कई कहानियाँ मुझे बहुत पसन्द थीं/हैं और इस नाते मैं उनकी लेखक के रूप में इज़्ज़त करता था। मैंने उन्हें एक दो बार अपनी फ़िल्मों के कलेक्शन से फ़िल्में दीं और उनसे किताबें लीं। मेरी पहली कहानी तद्भव में छपी थी। उसके बाद जो कहानी ज्ञानोदय में छपी, वह भेजने के करीब छ: महीने बाद छपी होगी। ऐसा ही चला, जब तक चला। परस्पर लेखकीय सम्मान के सम्बन्ध थे। कम से कम मेरी ओर से तो यही। मुश्किल से एक या दो बार ही सिर्फ़ मैं और कुणाल मिले होंगे। चन्दन दिल्ली आते थे तो कई बार उनके पास रुकते थे। तब इस बहाने उनसे मिलना हो जाता था। ऐसी ही एक मुलाकात में दो-तीन और लेखक आए थे। मनोज पांडेय, राकेश मिश्र भी थे। दोनों से इकलौती बार तभी मिला। सब मुझसे बड़े थे और मुझे लगभग बच्चे की तरह ट्रीट करते रहे। राकेश मिश्र से बाद में भी दो-तीन बार बात हुई, जब उन्होंने मेरी कहानियां पढ़कर बधाई देने के लिए फ़ोन किया। मैं शायद कभी उन्हें फ़ोन नहीं कर पाया और एकाध बार व्यस्त होने के कारण उठा भी नहीं पाया। उसके बाद से शायद वे नाराज़ हैं, ऐसा दूसरे लोग ही बताते हैं। 



ख़ैर, उस इकलौती मुलाकात में मैंने पहली बार देखा कि एक लेखक शशिभूषण द्विवेदी बिना बुलाए चले आए थे। पूरा समय कुणाल ने उन्हें अपमानित किया और वे हँसते हुए शराब पीते रहे। कुणाल कह रहे थे कि वे आए भी शराब के लिए ही हैं। मैंने पहली बार किसी को इस तरह अपना आत्मसम्मान खोकर हँसते हुए देखा था। सब हँस रहे थे। लौटते हुए मुझे बहुत बुरा लगा। कुणाल ने बाद में पुराना कुछ बताते हुए कहा कि उनसे इसी तरह बात की जा सकती है। मुझे अजीब लगा लेकिन यह भी लगा कि कुछ पर्सनल प्रॉब्लम होगी, वे दोनों सालों से एक दूसरे को जानते थे और शशिभूषण भी तो सब सुन रहे थे। मैंने शशिभूषण द्विवेदी की एक किताब 'ब्रह्महत्या' कभी खरीदी थी। उसके बाद से वह किताब नहीं पढ़ पाया। कैसे पढ़ता? 



इसके बाद कुणाल से अक्सर चंदन या श्रीकांत के साथ ही मिलना हुआ। कुल पाँच-छ: बार। दो साल के अंतराल में। सैटिंग ऐसे हो जाती हो तो बहुत आसान है। मेरा तज़ुर्बा ठीक ठाक ही रहा था। कहानियां लिखता था, छप जाती थी। चार कहानियां कथादेश में छपी हैं-एक शायद छपने वाली है, चार कहानियां ज्ञानोदय में, दो कहानियाँ तद्भव में और एक कहानी वागर्थ में छपी हैं. एक अभी लमही में छपी है, कुछ कहानियाँ अखबारों में. बाकी ब्लॉग पर. पर सवाल उठा रहे साथी इनमें से ज्ञानोदय की चार कहानियों को ही याद रखेंगे अपनी सुविधा से और ज्ञानपीठ वालों की तरह चाहेंगे कि यह सिद्ध करें कि गौरव सोलंकी की कहानियां वहीं छपती थीं बस। हर जगह छपती थी, हर जगह भेजता था कहानी। हंस में भी दो बार भेजी लेकिन उन्हें छापने लायक नहीं लगी. इसमें मेरी क्या ग़लती? आप यह कैसे कह देते हैं कि गौरव ज्ञानपीठ का लेखक था? कथादेश का क्यों नहीं था? तहलका का क्यों नहीं था? और लेखक था सिर्फ़, कहीं का क्यों होगा?



और इनमें से किसी भी संपादक से कहानी भेजते वक्त या कभी पत्रिका मंगवाते वक्त के अलावा बात तक हुई हो तो मुझे बताया जाए। कथादेश के हरिनारायण जी ने मेरी चार कहानियां छापी हैं और अब तक हमारी फ़ोन पर कुल पांच मिनट से ज़्यादा बात नहीं हुई होगी। हम बस एक बार एक फ़ंक्शन में एक डेढ़ मिनट के लिए मिले हैं। तद्भव के अखिलेश जी से मैं कभी नहीं मिला। उन्होंने कहानी छापने से मना किया तो महीनों तक दूसरी कहानी भेजने की बात तक नहीं की। कालिया जी से दो तीन बार बहुत सारे लोगों की उपस्थिति में मिला और इस मुद्दे से पहले उनसे फ़ोन पर इकलौती बात तब की थी, जब तहलका के साहित्य अंक के लिए उनसे किताबों की लिस्ट लेनी थी। आप अपने घर में बैठे मुझे सैटिंग वाला मानते हैं क्योंकि आपने तय कर लिया है कि इसी से कोई आदमी छप सकता है। 



सब कुछ मालूम होने की बात है तो मैं इतना अनजान था कि साल भर पहले उदय प्रकाश जी ने हिन्दी साहित्य की राजनीति पर कुछ लिखा था तो मैंने उन्हें फ़ेसबुक पर मैसेज करके कहा था कि मैं चाहूंगा कि आप तहलका के लिए इन सब सच्चाइयों पर एक लेख लिख सकें. मैंने यह भी लिखा था कि मुझे ख़ुशकिस्मती से अब तक ऐसा कोई तज़ुर्बा नहीं हुआ है. आप मेरी नीयत पर तो हमेशा की तरह शक करेंगे. संभव हो तो उदय जी से कनफ़र्म कर सकते हैं. मैं लेखकों से मिलना कम ही पसंद करता हूं और लेखकों के बारे में बातें करना उससे भी कम। कई दोस्तों से कह भी चुका हूं यह। यह ख़ूबी नहीं कह रहा, बस स्वभाव है मेरा। ऐसे में क्या पता होगा मुझे? जो दिखता गया, पता चलता गया, जितना चलता गया, उसका विरोध करता रहा, समर्थन करता रहा. 



अब इतनी भयानक चीजें साफ हुईं तो उनका भी विरोध किया. आगे भी कुछ हुआ तो करूंगा. और सिर्फ़ अपनी बातें नहीं खोलीं, जिन साथियों की तकलीफ़ मालूम थी, उनकी भी लिखी. अब भी लिख रहा हूं, लिखता रहूंगा. मुझे तकलीफ़ बस इस बात से होती है कि आप या दूसरे लोग गर्व से यह कह रहे हैं कि हमें तो यह सब पहले से पता था। शायद पहले दिन से ही पता हो आपको। सौ साल से पता हो, लेकिन उससे हुआ क्या? और मुझे तो इस दुनिया में आने के बाद ही समझ आएगा ना? बमुश्किल तीन साल से हूं साहित्य में और उसमें भी पूरी राजनीति से लगभग आउट ऑफ टच। मैं दूसरों की नहीं मानता, जब तक वे कनविंस न कर दें मुझे। कुछ गलत दिखता है, समझ आता है, तभी बोलता हूं। लेकिन मुझे तकलीफ़ है कि आपको पता था और ज़ाहिर है कि सब कुछ इतना बुरा है, फिर कोई सीधे सीधे क्यों नहीं बोलता। इतनी बुरी बातें हैं, रोज़ एक बात तो बोलनी ही चाहिए। आप कहेंगे कि आपका ख़त तहलका नहीं छापता पर ब्लॉग हैं, फ़ेसबुक है अब तो। मुझे तकलीफ़ है कि हम इतना शक करने लगे हैं कि हर आदमी की हर बात पर शक करते हैं और सिर्फ़ शक नहीं करते, फ़तवे जारी कर देते हैं। उसका पक्ष सुनने से पहले ही। 



और आप इसके बावजूद मानकर ही बैठे हैं कि इसे सब पहले से पता था तो बोला क्यों नहीं, इसके इरादे खराब थे। तो यह कि लोग पचास साल से झेल रहे हैं. कोई कितना भी कमीना है, लेकिन तीन साल में भी अगर बोला तो बोला तो. कोई और तो तब भी नहीं बोल रहा, जो बोलता है, उसे आप उसे कोसने लगते हैं. ऐसे में हम उन अन्यायियों को ही मज़बूत कर रहे होते हैं। ज्ञानपीठ से छप रहे एक-दो युवा लेखक ऐसा खूब कह रहे हैं क्योंकि उन्हें छपने और ऊपर जाने का यही एक तरीका आता है। राजनीति ऐसी है कि वह आदमी, जिसने बार बार मांगकर 'ग्यारहवीं ए के लड़के' ली थी कि कहीं और बिल्कुल मत देना, वही उसे अश्लील बताता है।



कुछ साथी मुझे सलाह देते हैं कि हर बात का जवाब मत दो। यह तुम्हारा ध्यान भटकाने के लिए है। लेकिन झूठ मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। आप मेरी कमी पर मुझे थप्पड़ मारिए, लेकिन झूठे आरोप इस विश्वास से लगाएँगे तो मैं चुप न रह पाऊंगा। मैंने ख़त में भी लिखा है, यहाँ भी कह रहा हूँ कि मैं हिन्दी साहित्य की इस व्यवस्था का आदमी नहीं हूं। इसे बदलने की कोशिश तो करूंगा लेकिन इसके हिसाब से ख़ुद को किसी कीमत पर नहीं बदलूंगा। 



जो तहलका में ख़त के छपने से बहुत गुस्से में हैं, उनके लिए आख़िरी बात ये कि तहलका ने वह ख़त छापकर बहुत बुरा किया। वह कई अख़बारों को भी भेजा गया था लेकिन बाकी सब मुख्य अख़बारों और पत्रिकाओं की तरह उन्हें भी इसे इगनोर कर देना चाहिए था। ऐसी बातों को सामने लाना ग़लत है। इसके लिए मैं तहलका की भर्त्सना करता हूं।



मैंने अपनी सब बातें कह दी हैं। बहुत ज़रूरी न हुआ तो और नहीं लिख पाऊंगा। आप देख ही रहे हैं कि कुर्सी वालों के कितने सवालों का जवाब देना पड़ रहा है। ऐसे में आप साथी बुरा नहीं मानेंगे तो मेरी मदद होगी।

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फेसबुक पर चली बहस यहाँ

१- प्रभात रंजन का सवाल - आप गौरव के साथ हैं या कौरव के?
२ - गौरव सोलंकी द्वारा ज्ञानपीठ को भेजा पत्र यहाँ पढ़ें  

३ - जनादेश पर छपा हिमांशु बाजपेई का आलेख यहाँ पढ़ें 
४ - वरिष्ठ कहानीकार बटरोही का आलेख यहाँ पढ़ें