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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

बिनायक सेन को जमानत और फुल इनबॉक्स



होली, दीवाली, न्यू ईयर, क्रिसमस पर तो मोबाइल पर मैसेजेस का ढेर लगना आम बात है. हर दो मिनट पर टूं-टूं की आवाज के साथ एक संदेश इनबॉक्स में इन होता है. लेकिन पंद्रह अप्रैल को ठीक उस वक्त जब डॉ. विनायक सेन की जमानत याचिका मंजूर हुई मेरे इनबॉक्स में पहला मैसेज दाखिल हुआ विनायक सेन को जमानत मिल गई...तो मन प्रसन्न हो गया. तुरंत टीवी ऑन किया. खबरों का रुख किया. तबसे लगातार इनबॉक्स में देश भर से बधाई संदेश आते जा रहे हैं. हर संदेश के साथ भरोसा जागता है कि लोग जागरूक हो रहे हैं. सोचा क्यों न कुछ संदेशों को साझा किया जाए. यूं सबके इनबॉक्स ऐसे ही भरे होंगे यह यकीन है मुझे फिर भी मैं अपना इनबॉक्स खाली कर रही हूं आप लोगों के बीच.

एसएमएस चूंकि निजी अभिव्यक्तियां हैं, इसलिए उनकी भाषा भी वैसी है. भाषा नहीं भाव जरूरी हैं इसलिए भाषा से फेरबदल नहीं कर रही हूं.

कॉन्ग्रेट्स दी- बिनायक सेन हैज गॉट बेल- आरुषि दिल्ली

बल्ले-बल्ले मैम. बिनायक सेन को मिल गई जमानत- अभय मिश्रा, दिल्ली

लंबी है गम की रात, मगर रात ही तो है...आखिर कट गई ना गम की रात. बधाई- अनुपम लखनऊ

हमको पता था कि जंजीरों में सच को कोई जकड़ नहीं पायेगा, एक न एक दिन वो सबके सामने आयेगा, जरूर आयेगा. हम सबको बधाई- रवि मिश्रा, कानपुर

देर लगी आने में सही जजमेंट, शुक्र है फिर भी आया तो- अशिमा, बंगलौर

ये बिनायक सेन की ही नहीं न्याय पर भरोसे की जीत है. लोकतंत्र की जीत है.- विनीत, कोलकता

पहले अन्ना फिर बिनायक सेन की हो गई है जीत, पुरानी पड़ जायेगी अब अन्याय और जुल्म की रीत- मनीषा, लखनऊ

लो रखो अपने महल-दुमहले, हम तो अपने सच्चे साथियों से काम चला लेंगे- राजवीर कौर- मुंबई

खुशखबरी...खुशखबरी...बिनायक सेन को जमानत मिली. याहू...- रितिका मिश्रा, जयपुर

ये तो होना ही था- कुमुद, मेरठ
मैसेजेस के ढेर में से फिलहाल इतने ही. सारे टाइप करने बैठी तो करती ही रह जाऊंगी. हालांकि चाहती हूं कि ऐसी खबरों और मैसेजेस का सिलसिला जारी रहे...बिनायक सेन के अलावा भी लोग हैं जो ऐसे फैसलों की बाट जोह रहे हैं.
- प्रतिभा कटियार

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

आप अकेली नहीं हैं एलिना सेन


मैं इसे एक अनौपचारिक मुलाकात के रूप में अपनी स्मृतियों में दर्ज रखना चाहती हूं. न कोई सवाल, न कोई जवाब. एक आत्मीय सी मुलाकात. गले मिलना और हथेलियों को कसकर दबाते हुए प्यार और विश्वास एक-दूसरे को सौंप देना. आंखों में रोप देना भरोसा कि आप अकेली नहीं हैं, हम हैं ना.
 
ये मुलाकात थी एलिना सेन से. मेरे लिए वो डॉक्टर बिनायक सेन की पत्नी भर नहीं थीं. वो एक ऐसी मजबूत स्त्री थीं जो अन्याय के खिलाफ जमकर खड़ी थी. यह जानते हुए कि इस लड़ाई में उनका सामना राज सत्ता से है. यह जानते हुए कि उनके हर सच को काटकर बड़ा सा झूठ लिखने वालों की कमी नहीं है


एलिना सेन से मिलकर न जाने क्यों मुझे कार्ल मार्क्स  की पत्नी जेनी, लेनिन की पत्नी क्रूप्सकाया, गांधी की पत्नी कस्तूरबा की याद आ गई. इतिहास पुरुषों की ये पत्नियां. इनका संघर्ष किन्हीं मायनों में कम नहीं रहा. न ही ये वैचारिक स्तर पर कम थीं. अपने पति के विचारों को, उनकी लड़ाई को आगे बढ़कर हाथ में लेना, उसे आगे बढ़ाना, घर-परिवार को संभालना, आलोचना, प्रवंचना, प्रताडऩा, धमकियां और न जाने क्या-क्या इनके हिस्से आता है. इन स्त्रियों के योगदान पर कितनी बात होती है.


एलिना वर्धा में पढ़ाती हैं. उन पर दो बेटियों की जिम्मेदारी है. बेटियों के ढेर सारे सवाल हैं. उनके मासूम दिल और दिमाग को संभालते हुए, अपनी नौकरी को चलाते हुए डॉ बिनायक सेन के लिए वे पूरे देश में एक माहौल बनाना चाहती हैं.

 
वे प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहती हैं डॉ. सेन माओवादी नहीं हैं. वे उस कानूनी कार्रवाई के खिलाफ कानूनी तरह से लड़ रही हैं जिसने उनके पति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. उन्हें देश की जनता पर भरोसा है. उन्हें विश्वास है कि उन्हें न्याय मिलेगा. ये विश्वास उन्हें क्यों है, पता नहीं. वे धीमी आवाज में कहती हैं क्योंकि हमारे घर में स्टेथोस्कोप नहीं मिला, इसलिए पुलिस ने डॉ. सेन को डॉक्टर मानने से इनकार कर दिया.
 
एलिना पत्रकारों के सारे सवालों के जवाब पूरे धीरज के साथ देती हैं. एक ही सवाल के बार-बार पूछे जाने पर खीझती नहीं. हालांकि उनकी आवाज थकती है कभी-कभी. मैं अपनी आवाज को पूरे देश की आवाज बनाना चाहती हूं. मैं अपनी आवाज को सच का साथ देने वालों की आवाज बना देना चाहती हूं. मैं बहुत जोर से चिल्लाना चाहती हूं, कहना चाहती हूं कि एलिना आप अकेली नहीं हैं. मुट्ठियां भींच लेना चाहती हूं. लेकिन प्रेस क्लब के उस हॉल में बस उन्हें गले लगाती हूं.

  • प्रतिभा कटियार 

रविवार, 2 जनवरी 2011

ग्वालियर में बिनायक सेन के समर्थन में धरना

पूर्वघोषित कार्यक्रम के अनुसार आज ग्वालियर में महाराज बाड़े चौराहे पर जनसंगठनों के अम्ब्रेला ग्रुप 'पीपुल्स इनिशियेटिव फ़ार इक्विटी एण्ड जस्टिस' के बैनर तले डा बिनायक सेन की रिहाई की मांग को लेकर धरना तथा आमसभा आयोजित की गयी। सभा में आमराय से पास प्रस्ताव में डा सेन की रिहाई की माँग की गयी।

कार्यक्रम का विषयप्रवर्तन करते हुए युवा कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा कि आज देश में फासीवाद की स्पष्ट आहट सुनाई दे रही है। देश भर में काले क़ानूनों के पैरों तले जनता की आवाज़ को कुचला जा रहा है। डा सेन की गिरफ़्तारी इसी सिलसिले का हिस्सा है। सरकारें विरोध करने वालों को एक संदेश देना चाहती हैं। लेकिन आज देश भर में जिस तरह डा सेन के पक्ष में आवाज़ें उठ रही हैं, यह भी साफ़ है कि लोग अब और बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं।

सी पी आई के राजेश शर्मा ने कहा कि बिनायक सेन की सज़ा लोकतंत्र की हत्या है। माओवाद के नाम पर चल रहे हिंसक आंदोलन के हम विरोधी हैं लेकिन सरकारें इसकी आड़ लेकर जिस तरह आम लोगों की पक्षधर ताक़तों को कुचल रही हैं वह जन विरोधी है।

का नरेन्द्र पाण्डेय ने कहा कि आज अगर हम बिनायक सेन के समर्थन में साथ खड़े नहीं होंगे तो कल बहुत देर हो जायेगी। इंजी सुभाष शर्मा ने कहा कि ग्वालियर की यह सभा देश भर में चल रहे अभियान का हिस्सा है। ट्रेडयूनियन कर्मी विनोद रावत ने कहा कि भूमण्डलीकरण के नाम पर पूरे देश में सरकार जनता के दमन का अभियान चला रही है।

संस्कृतिकर्मी डा मधुमास खरे ने कहा कि एक तरफ़ भ्रष्टाचारी ख़ुलेआम घूम रहे हैं और दूसरी तरफ़ जनता के पक्ष में खड़े डा सेन जैसे लोगों कि राजद्रोही कहा जा रहा है। एटक के सतीश गोविला ने कहा कि सरकारें अब पूंजीपतियों के एजेंट की तरह काम कर रही हैं। इण्डियन लायर्स एसोशियेसन के नितिन शर्मा ने कहा कि यह पूरा मुक़दमा झूठे और भ्रामक सबूतों पर टिका है।

सभा की शुरुआत में ग्वालियर के नियान एक्स बैण्ड के गैरी, सिद्धार्थ और कौशल ने जनगीतों की प्रस्तुति की। सभा का संचालन इण्डियन लायर्स एसोशियेसन के का गुरुदत्त शर्मा ने किया तथा आभार प्रदर्शन डा एस के सिंह ने किया। सभा में दख़ल विचार मंच, समाजवादी पार्टी, संवाद, बीड़ी मज़दूर यूनियन,मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव यूनियन, संभव, संवाद सहित तमाम संगठनों के कार्यकर्ता उपस्थित थे।

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

लखनऊ के लेखकों व संस्कृतिकर्मियों का कहना है:


विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा जनप्रतिरोध की आवाज को कुचलना है

लखनऊ, 28 दिसम्बर। जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित सभा में लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक व राजनीतिक कार्यकताओं ने पी यू सी एल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ विनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाते हुए उन्हें दी गई उम्रकैद की सजा पर अपना पुरजोर विरोध प्रकट किया है। यह सभा अमीनाबाद इण्टर कॉलेज में हुई जिसमें इससे सम्बन्धित प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें कहा गया कि लोकतंत्र के सभी स्तम्भ आज पूँजी के मठ व गढ़ में बदल गये हैं जहाँ से जनता, उसके अधिकारों व लोकतांत्रिक मूल्यों पर गोलाबारी की जा रही है। इसने न्ययापालिका के चरित्र का पर्दाफाश कर दिया है। डॉ विनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाने व उन्हें उम्रकैद की सजा देने का एक मात्र उद्देश्य जनता के प्रतिरोध की आवाज को कुचल देना है तथा सरकार का विरोध करने वालों को यह संदेश देना है कि वे सावधान हो जायें और सरकार के लिए कोई संकट पैदा न करें।

इस घटना पर विरोध प्रकट करने वालों में लेखक अनिल सिन्हा, शकील सिद्दीकी, डॉ गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, कवि भगवान स्वरूप कटियार, कौशल किशोर, ब्रह्मनारायण गौड, श्याम अंकुरम़ व वीरेन्द्र सारंग, कवयित्री व पत्रकार प्रतिभा कटियार, कथाकार सुरेश पंजम व सुभाष चन्द्र कुशवाहा, नाटककार राजेश कुमार, ‘अलग दुनिया’ के के0 के0 वत्स, ‘कर्मश्री’ की सम्पादिका पूनम सिंह, एपवा की विमला किशोर, कलाकार मंजु प्रसाद, लेनिन पुस्तक केन्द्र के प्रबन्धक गंगा प्रसाद, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण खोटे, इंकलाबी नौजवान सभा के प्रादेशिक महामंत्री बालमुकुन्द धूरिया, भाकपा (माले) के शिवकुमार, लक्षमी नारायण एडवोकेट, ट्रेड यूनियन नेता के0 के0 शुक्ला, डॉ मलखान सिंह, जानकी प्रसाद गौड़ प्रमुख थे।

प्रस्ताव में माँग की गई है कि डॉ सेन को आरोप मुक्त कर उन्हें रिहा किया जाय। प्रस्ताव में आगे कहा गया है कि जिस छतीसगढ़ विशेष लोक सुरक्षा कानून 2005 और गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून 1967 के अन्तर्गत डॉ विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा दी गई है, ये कानून अपने चरित्र में दमनकारी हैं और ऐसे जनविरोधी कानून का इस्तेमाल यही दिखाता है कि देश में अघोषित इमरजेन्सी जैसी स्थिति है। जब भ्रष्टाचारी, अपराधी, माफिया व धनपशु सरकार को सुशोभित कर रहे हों, सम्मान पा रहे हों, वहाँ आदिवासियों, जनजातियों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना, जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना तथा सलवा जुडुम से लेकर सरकार के जनविरोधी कार्यों का विरोध करने वाले डॉ सेन पर दमनकारी कानून का सहारा लेकर आजीवन कारावास की सजा देने से यही बात सिद्ध होती है।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि सरकार द्वारा देशभक्ति का नया मानक गढ़ा जा रहा है जिसके द्वारा सच्चाई और तथ्यों का गला घोंटा जा रहा है। इस मानक में यदि आप फिट नहीं हैं तो आपको देशद्रोही घोषित किया जा सकता है और आपके विरूद्ध कार्रवाई की जा सकती है, आप गिरफ्तार किये जा सकते हैं आपको सजा दी जा सकती है और आप देश छोड़ने तक के लिए बाध्य किये जा सकते हैं। यही अरुंधती राय के साथ किया गया। उनके ऊपर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया है और डॉ विनायक सेन को देशद्रोही करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। इन घटनाओं ने हमारे इर्द-गिर्द फैले अंधेरे को गहरा किया है और समय की माँग है कि इनके विरूद्ध हम लामबन्द हों बकौल मुक्तिबोध ‘अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे/तोड़ने होंगे गढ़ और मठ सभी "

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

बिनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लोकतंत्र की अवमानना- JUCS

न्यायपालिका ध्वस्त कर रही है लोकतांत्रिक ढांचा- JUCS
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) के राष्‍ट्रीय उपाध्यक्ष बिनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैरलोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी(JUCS) मानती है कि विनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढ़ांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिका की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं।

जो काम सत्ता के सहारे पूंजीवादी ताकतें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से कराती थीं उसे अब न्यायपालिका कर रही है। पिछले दिनों विकिलिक्स ने हमारी पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी की वह किस तरह देश की महत्वपूर्ण जानकारियों को अमेरिका जैसे देशों से चोरी-छिपे बताती है, और उसके दबाव में जनविरोधी नीतियों को लागू करती है। पिछले साल नक्सलवाद उन्मूलन के नाम पर चलाया गया आपरेशन ग्रीन हंट भी इसी का हिस्सा था। पिछले दिनों राष्ट् मंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्ट्म जैसे बड़े घोटाले क्या देशद्रोह नहीं थे जो उनसे जुड़े सफेदपोशों को बचाने की हर संभव मदद सरकार कर रही है।

बिनायक सेन को आजीवन कारावास देकर न्यायालय ने वंचित तबके के प्रतिरोध को खामोश रहने की चेतावनी दी है, जो अब तक न्याय के अंतिम विकल्प के रुप में न्यायपालिका में उम्मीद लगाया था। हिंदुस्तान में न्यायालयों द्वारा पिछले दिनों जिस तरह से संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य जिनके तहत आदमी और आदमी के बीच धर्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था को खंडित किया जा रहा है, यह पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को फासीवादी व्यवस्था में तब्दील करने की साजिश है।

छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून जिसके तहत बिनायक सेन को देशद्रोही कहा गया वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। बिनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा0 सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010 को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया। न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांडपर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।

हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि देश में हो रही आतंकी घटनाओं के लिए न्यायालय भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं, जिनसे न्याय न मिलने की हताशा से कुछ लोग आतंकवाद के प्रति अग्रसर हो रहे हैं। क्या न्यायपालिका बार-बार आंतकी संगठनों की इस बात की कि वह, बाबरी विध्वंस, 2002 गुजरात दंगा या फिर अयोध्या फैसले से आहत होकर ऐसा कर रहे हैं के सवाल को हल करने की कोशिश की। क्योंकि यह सवाल उसके न्याय के समीकरण से जुड़ा है, जो फासीवादी ताकतों को मजबूत कर रहा है। तो वहीं नक्सलवाद जो खुद को एक व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन कहता है, को जनता लोकतंत्र में न्याय न मिलने की वजह से एक नई व्यवस्था के रुप में अपना रही है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था में सबसे ज्यादा जिम्मेदार न्यायपालिका ही है। जो अपने नागरिकों को उनके जीवन से जुडे़ मौलिक अधिकारों को भी नहीं दिलवा पा रही है।

ऐसे में हम इस बात को कहना चाहेंगे कि जो न्यायालय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की अवमानना कर रहे हैं, उनकी अवमानना करने का पूरा अधिकार लोकतांत्रिक जनता को है। क्योंकि बिनायक सेन जनता के लिए, जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार बिनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोंपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और बिनायक सेन को रिहा करे।

जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (JUCS) द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम, राजीव यादव, विजय प्रताप, शाह आलम, ऋषि सिंह, अवनीश राय, राघवेंद्र प्रताप सिंह, लक्ष्मण प्रसाद, नवीन कुमार, प्रबुद्ध, रवि राव, अरुण उरांव, विवके मिश्रा, देवाशीष प्रसून, दिलीप, पंकज उपाध्याय, विनय जायसवाल, अंशु माला सिंह, शालिनी बाजपेई, शिवदास, राकेश कुमार, तारिक शफीक, प्रत्यूश प्रशांत, मसीहुद्दीन संजरी, संदीप दूबे, महेश यादव, हरेराम मिश्रा।

कार्यालय- 631/13, शंकरपुरी कलोनी, कमता चिनहट, लखनउ उ0प्र0
संपर्क- 09452800752, 09415254919, 09015898445