मौत से लड़ते हुए आख़िर हार गये कमाण्डर…
इतने दिनों से बीमार थे लेकिन जब भी बात होती लगता कि इस बीमारी की औकात उन्हें हराने की नहीं…बस एक दिन आ बैठेंगे हमारे बीच और अपने उसी नियंत्रित अंदाज़ में कहेंगे…'आगे की योजना बनाईये भाई'!
लेकिन अब वह बैठक कभी नहीं होगी। कमला जी से मेरे संबंध कोई बहुत पुराने नहीं रहे…पाँचेक साल पहले डा संतोष भदौरिया के घर पर पहली मुलाक़ात हुई फिर फोन पर कभी-कभार बात होती रही। अक्सर असहमतियाँ ही केन्द्र में रहीं। लेकिन इतनी असहमतियों और तर्क-वितर्कों के बाद भी वह कभी कटु नहीं हुए…
स्मृतियाँ तमाम हैं लेकिन अभी बस श्रद्धांजलि देने भर की ही चेतना है।
