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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

हम सब दाभोलकर ! सुभाष गाताडे


अंधश्रद्धा के खिलाफ संघर्षरत एक संग्रामी की शहादत




‘‘जिन्दगी जीने के दो ही तरीके मुमकिन हैं। पहला यही कि कोई भी चमत्कार नहीं। दूसरा, सबकुछ चमत्कार ही है’’
- अलबर्ट आइनस्टाइन

लब्जों की यह खासियत समझी जाती है कि वे पूरी चिकित्सकीय निर्लिप्तता के साथ ग्राही/ग्रहणकर्ता के पास पहुंचते हैं। यह ग्राही पर निर्भर करता है कि वह उनके मायने ढंूढने की कोशिश करे। बीस अगस्त की अलसुबह पुणे की सड़क पर अंधश्रद्धा विरोधी आन्दोलन के अग्रणी कार्यकर्ता डा नरेन्द्र दाभोलकर की हुई सुनियोजित हत्या की ख़बर से उपजे दुख एवं सदमे से उबरना उन तमाम लोगों के लिए अभीभी मुश्किल जान पड़ रहा है, जो अपने अपने स्तर पर प्रगति एवं न्याय के संघर्ष में मुब्तिला हैं।

पुणे के निवासियों के एक बड़े हिस्से के लिए मुला मुठा नदी के किनारे बना आंेकारेश्वर मंदिर वह जगह हुआ करती रही है जहां लोग अपने अन्तिम संस्कार के लिए ले लाए जाते रहे हैं। इसे विचित्रा संयोग कहा जाएगा कि उसी मन्दिर के ऊपर बने पूल से अल सुबह गुजरते हुए डा नरेन्द्र दाभोलकर ने अपनी झंझावाती जिन्दगी की चन्द आखरी सांसें लीं। एक जुम्बिश ठहर गयी, एक जुस्तजू अधबीच थम गयी। मोटरसाइकिल पर सवार हत्यारे नौजवानों द्वारा दागी गयी चार गोलियों में से दो उनके सिर के पिछले हिस्से में लगी थी और वह वहीं खून से लथपथ गिर गए थे।

अपनी मृत्यु के एक दिन पहले शाम के वक्त मराठी भाषा के सहयाद्री टीवी चैनल पर उपस्थित होकर वह जातिपंचायतों की भूमिका पर अपनी राय प्रगट कर रहे थे। उस वक्त किसे यह गुमान हो सकता था कि उन्हें सजीवअर्थात लाइव सुनने का यह आखरी अवसर होनेवाला है। यह पैनल चर्चा नासिक जिले की एक विचलित करनेवाली घटना की पृष्ठभूमि में आयोजित की गयी थी, जहां किसी कुम्हारकर नामक व्यक्ति द्वारा अपनी जाति पंचायत के आदेश पर अपनी बेटी का गला घोंटने की घटना सामने आयी थी। वजह थी उसका अपनी जाति से बाहर जाकर किसी युवक से प्रेमविवाह। चर्चा में हिस्सेदारी करते हुए डा दाभोलकर बता रहे थे कि किस तरह उन्होंने हाल के दिनों में अन्तरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए सम्मेलन का आयोजन किया था और इसी मसले पर घोषणापत्र भी तैयार किया था।

एक बहुआयामी व्यक्ति - प्रशिक्षण से डाक्टरी चिकित्सक, अपनी रूचि के हिसाब से देखें तो लेखक-सम्पादक एवं वक्ता और एक आवश्यकता की वजह से एक आन्दोलनकारी, यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पूरे मुल्क के तर्कशील आन्दोलन के लिए वह एक अद्भुत मिसाल थे और अपने संगठन एवं उसकी 200 से अधिक शाखाओं के जरिए सूबा महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं गोवा में जनजागृति के काम में लगे थे। बहुत कम लोग जानते थे कि अपने स्कूल-कालेज के दिनों में वह जानेमाने कब्बडी के खिलाड़ी थे, जिन्होंने भारतीय टीम के लिए मेडल भी जीते थे। हालांकि उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरूआत डाक्टरी प्रैक्टिस से की थी, मगर जल्द ही वह डा बाबा आढाव द्वारा संचालित एक गांव, एक जलाशय (पाणवठा)नामक मुहिम से जुड़ गए थे। विगत दो दशक से अधिक समय से वह अंधश्रद्धा के खिलाफ मुहिम में मुब्तिला थे।

डा दाभोलकर की प्रचण्ड लोकप्रियता का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके मौत की ख़बर सुनते ही महाराष्ट्र के तमाम हिस्सों में स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन हुएऔर उनके गृहनगर सातारा में तो जुलूस में शामिल हजारों की तादाद ने जिन्दगी के सत्तरवें बसन्त की तरफ बढ़ रहे अपने नगर के इस प्रिय एवं सम्मानित व्यक्ति को अपनी आदरांजलि दे दी। 21 अगस्त को पुणे शहर में सभी पार्टियों के संयुक्त आवाहन पर बन्द का आयोजन किया गया।

राजनेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक सभी ने डाॅक्टर दाभोलकर को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। उन्हें किस हद तक विरोध का सामना करना पड़ता था इस बात का अन्दाज़ा इस तरह लगाया जा सकता है कि विगत अठारह साल से महाराष्ट्र विधानसभा के सामने एक बिल लम्बित पड़ा रहा है जिसका फोकस जादूटोना करनेवाले या काला जादू करनेवाली ताकतों पर रोक लगाना है। रूढिवादी हिस्से के विरोध को देखते हुए इस बिल में आस्था क्या है या अंधआस्था किसे कहेंगे इसको परिभाषित करने से बचा गया था और सूबे में व्यापक पैमाने पर व्यवहार में रहनेवाली अंधश्रद्धाओं को निशाने पर रखा गया था। ऐसी गतिविधियां संज्ञेय एवं गैरजमानती अपराध के तौर पर दर्ज हों, ऐसे अपराधों की जांच के लिए या उन पर निगरानी रखने के लिए जांच अधिकारी नियुक्त करने की बात भी इसमें की गयी थी।

महाराष्ट्र प्रीवेन्शन एण्ड इरेडिकेशन आफ हयूमन सैक्रिफाइस एण्ड अदर इनहयूमन इविल प्रैक्टिसेस एण्ड ब्लैक मैजिकशीर्षक इस बिल का हिन्दु अतिवादी संगठनों ने लगातार विरोध किया है, पिछले दो साल से वारकरी समुदाय के लोगों ने भी विरोध के सुर में सुर मिलाया है। और इन्हीं का हवाला देते हुए इस अन्तराल में सूबे में सत्तासीन सरकारों ने इस बिल को पारित नहीं होने दिया है। आप इसे डा दाभोलकर की हत्या से उपजे जनाक्रोश का नतीजा कह सकते हैं या सरकार द्वारा अपनी झेंप मिटाने के लिए की गयी कार्रवाई कह सकते हैं कि कि इस दुखद घटना के महज एक दिन बाद महाराष्ट्र सरकार के कैबिनेट में इस बिल को लेकर एक अध्यादेश लाने का निर्णय लिया गया है।

निःस्सन्देह उनकी हत्या के पीछे एक सुनियोजित साजिश की बू आती है। आखिर किसने ऐसे शख्स की हत्या की होगी जिसने महाराष्ट्र की समाजसुधारकों की - ज्योतिबा फुले, महादेव गोविन्द रानडे या गोपाल हरि आगरकर - विस्मृत हो चली परम्परा को नवजीवन देने की कोशिश की थी ?

कई सारी सम्भावनाएं हैं। यह सही है कि उनके कोई निजी दुश्मन नहीं थे मगर अंधश्रद्धा के खिलाफ उनके अनवरत संघर्ष ने ऐसे तमाम लोगों को उनके खिलाफ खड़ा किया था, जिनको उन्होंने बेपर्द किया था। तयशुदा बात है कि ऐसे लोग कारस्तानियों में लगे होंगे। राजनीति में सक्रिय यथास्थितिवादी शक्तियों के लिए भी उनके काम से परेशानी थी। पुलिस ने कहा कि वह इन आरोपों की भी पड़ताल करेगी कि इसके पीछे सनातन संस्था और हिन्दू जनजागृति समिति जैसी अतिवादी संस्थाओं का हाथ तो नहीं है, जिसके सदस्य महाराष्ट्र एवं गोवा में आतंकी घटनाओं में शामिल पाए गए हैं। इस बात को रेखांकित करना ही होगा कि कई भाषाओं में प्रकाशित अपने अख़बार सनातन प्रभातके जरिए इन संस्थाओं ने डा दाभोलकर के खिलाफ जबरदस्त मुहिम चला रखी थी, इतनाही नहीं उन्होंने दाभोलकर के ऐसे फोटो भी प्रकाशित किए थे, जिसे लाल रंग से क्रास किया गया था, जिसमें उनकी सांकेतिक समाप्ति की तरफ इशारा था।

डा दाभोलकर को दी अपनी श्रद्धांजलि में लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक आनन्द तेलतुम्बडे लिखते हैं कि ((http://www.countercurrents.org/teltumbde230813.htm)
 ‘..दाभोलकर की हत्या के बाद भी सनातन संस्था ने उनके प्रति अपनी घृणा के भाव को छिपाया नहीं बल्कि अगले ही दिन जबकि पूरा राज्य दुख एवं सदमे में था, उन्होंने अपने मुखपत्रा में लिखा कि यह ईश्वर की कृपा थी कि दाभोलकर की मृत्यु ऐसे हुई। गीता को उदधृत करते हुए लिखा गया कि जो जनमा है, उसकी मृत्यु निश्चित है, जन्म एवं मृत्यु हरेक की नियति के हिसाब से होते हैं। हरेक को अपने कर्म का फल मिलता है। बिस्तर पर पड़े पड़े बीमारी से मरने के बजाय, डा दाभोलकर की जो मृत्यु हुई वह ईश्वर की ही कृपा थी।’..इतनाही नहीं इस हत्या से अपने सम्बन्ध से इन्कार करने के लिए बुलायी गयी प्रेस कान्फेरेन्स में उन्हें यह कहने में भी संकोच नहीं हुआ कि वह दाभोलकर की लाल रंग से क्राॅस की गयी तस्वीर की तरह कई अन्यों की तस्वीरें भी प्रकाशित करेंगे। कहने का तात्पर्य कि जो दाभोलकर की राह चलेगा उन्हें वह नष्ट करेंगे।

ऐसा नहीं था कि डा दाभोलकर को इस बात का अन्दाजा नहीं था कि ऐसी ताकतें किस हद तक जा सकती हैं। उनके परिवार के सदस्यों के मुताबिक उन्हें अक्सर धमकियां मिलती थीं, लेकिन उन्होंने पुलिस सुरक्षा लेने से हमेशा इन्कार किया। उनके बेटे हामिद ने कहा कि ‘‘वे कहते थे कि उनका संघर्ष अज्ञान की समाप्ति के लिए है और उससे लड़ने के लिए उन्हें हथियारों की जरूरत नहीं है।’’ उनके भाई ने अश्रुपूरित नयनों से बताया कि जब हम लोग उनसे पुलिस सुरक्षा लेने का आग्रह करते थे, तो वह कहते थे कि अगर मैंने सुरक्षा ली तो वे लोग मेरे साथियों पर हमला करेंगे। और यह मैं कभी बरदाश्त नहंीं कर सकता। जो होना है मेरे साथ हो।’’

विभिन्न बाबाओं के खिलाफ एवं साध्वियों के खिलाफ भी उन्होंने महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समितिके बैनरतले आन्दोलन चलाया था। एक किशोरी के साथ कथित बलात्कार के आरोपों के चलते इन दिनों सूर्खियां बटोर रहे आसाराम बापू ने पिछले दिनों होली के मौके पर नागपुर में अपने शिष्यों के साथ होली के कार्यक्रम का आयोजन किया था। काफी समय से सूखा झेल रहे महाराष्ट्र में इस कार्यक्रम के लिए लाखों लीटर पीने के पानी के टैंकरों का इन्तजाम किया गया था। समिति के बैनरतले डा दाभोलकर ने इस कार्यक्रम को चुनौती दी और अन्ततः यह कार्यक्रम नहीं हो सका। चर्चित निर्मल बाबा के खिलाफ भी डा दाभोलकर ने पिछले दिनों अपना मोर्चा खोला था। यू टयूब पर आप चाहें तो डा दाभोलकर के भाषण को सुन सकते हैं निर्मल बाबा: शोध आणि बोध। यह वही निर्मल बाबा हैं जिनका कार्यक्रम एक साथ 40 विभिन्न चैनलों पर चलता है जहां लोगों को उनकी समस्याओं के समाधान के नाम पर ईश्वरीय कृपा की सौगात दी जाती है। उनकी समागम बैठकों में 2000 रूपए के टिकट भी लगते हैं।

वर्ष 2008 में डा दाभोलकर एवं अभिनेता एवं समाजकर्मी डा श्रीराम लागू ने ज्योतिषियों के लिए एक प्रश्नमालिका तैयार की और कहा कि अगर उन्होंने तर्कशीलता की परीक्षा पास की तो उन्हें पुरस्कार मिल सकता है। अभी तक इस पर दांवा ठोकने के लिए कोई आगे नहीं आया। वर्ष 2000 में अपने संगठन की पहल पर उन्होंने राज्य के सैकड़ो महिलाओं की रैली अहमदनगर जिले के शनि शिंगणापुर मन्दिर तक निकाली जिसमें महिलाओं के लिए प्रवेश वर्जित था। न केवल रूढिवादी तत्वों ने बल्कि शिवसेना एवं भाजपा के कार्यकर्ताओं ने परम्परा एवं आस्था की दुहाई देते हुए महिलाओं के प्रवेश को रोकना चाहा, उनकी गिरफ्तारियां भी हुईं और फिर मामला मुंबई की उच्च अदालत पहुंचा और सुनने में आया है कि मामला पूरा होने के करीब है।


अपने एक आलेख रैशनेलिटी मिशन फार सक्सेस इन लाइफमें जिसमें उनका मकसद आवश्यक बदलाव के लिए लोगों को प्रेरित करना हैउन्होंने लिखा था:

'परम्पराओं, रस्मोरिवाज और मन को विस्मित कर देनेवाली प्रक्रियाओं से बनी युगों पुरानी अंधश्रद्धाओं की पूर्ति के लिए पैसा, श्रम और व्यक्ति एवं समाज का समय भी लगता है। आधुनिक समाज ऐसे मूल्यवान संसाधनों को बरबाद नहीं कर सकता। दरअसल अंधश्रद्धाएं इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि गरीब एवं वंचित लोग अपने हालात में यथावत बने रहें और उन्हें अपने विपन्न करनेवाले हालात से बाहर आने का मौका तक न मिले। आइए हम प्रतिज्ञा लें कि हम ऐसी किसी अंधश्रद्धा को स्थान नहीं देगें और अपने बहुमूल्य संसाधनों को बरबाद नहीं करेंगे। उत्सवों पर करदाताओं का पैसा बरबाद करनेवाली, कुम्भमेला से लेकर मंदिरों/मस्जिदों/गिरजाघरों के रखरखाव के लिए पैसा व्यय करनेवाली सरकारों का हम विरोध करेंगे और यह मांग करेंगे कि पानी, उर्जा, कम्युनिकेशन, यातायात, स्वास्थ्यसेवा, प्रायमरी शिक्षा और अन्य कल्याणकारी एवं विकाससम्बन्धी गतिविधियों के लिए वह इस फण्ड का आवण्टन करें।'

उनके जीवन की एक अन्य कम उल्लेखित उपलब्धि रही है, विगत अठारह साल से उन्होंने किया साधनानामक साप्ताहिक का सम्पादन, जिसने अपनी स्थापना के 65 साल हाल ही में पूरे किए। जानकार बताते हैं कि जब उन्होंने सम्पादक का जिम्म सम्भाला तो सानेगुरूजी जैसे स्वतंत्राता सेनानी एवं समाजसुधारक द्वारा स्थापित यह पत्रिका काफी कठिन दौर से गुजर रही थी, मगर उनके सम्पादन ने इस परिदृश्य को बदल दिया और आज भी यह पत्रिका तमाम परिवर्तनकामी ताकतों के विचारों के लिए मंच प्रदान करती है।

ठीक ही कहा गया है कि डा दाभोलकर की असामयिक मौत देश के तर्कवादी आन्दोलन के लिए गहरा झटका है। देश में दक्षिणपंथी ताकतों के उभार के चलते पहले से ही तमाम चुनौतियों का सामना कर रहे इस आन्दोलन ने अपने एक सेनानी को खोया है। मगर अतिवादी ताकतों के हाथ उनकी मौत दरअसल उन सभी के लिए एक झटका कही जा सकती है जो देश में एक प्रगतिशील बदलाव लाने की उम्मीद रखते हैं। अब यह देखना होगा कि उनकी मृत्यु से उपजे प्रचण्ड दुख एवं गुस्से को ऐसी तमाम ताकतें मिल कर किस तरह एक नयी संकल्पशक्ति में तब्दील कर पाती हैं ताकि अज्ञान, अतार्किकता एवं प्रतिक्रिया की जिन ताकतों के खिलाफ लड़ने में डा दाभोलकर ने मृत्यु का वरण किया, वह मशाल आगे भी जलती रहे।

प्रतिक्रियावादी तत्व भले ही डा दाभोलकर को मारने में सफल हुए हों, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह से उनकी हत्या हुई है उसने तमाम नए लोगों को भी दिमागी गुलामी के खिलाफ जारी इस व्यापक मुहिम से जोड़ा भी है। यह अकारण नहीं कि महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों पर हुई रैलियों में तमाम बैनरों, पोस्टरों में एक छोटेसे पोस्टर ने तमाम लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था जिस पर लिखा था आम्ही सगले दाभोलकर’ (हम सब दाभोलकर)।

  • जादू टोना विरोधी विधेयक में यह माना जाएगा अपराध
  • भूत भगाने के नाम पर किसी को मारना या पीटना, पर किसी तरह का मंत्र पढ़ने पर पाबन्दी नहीं होगी।
  • चमत्कार के नाम पर दूसरों को धोखा देना या पैसा लेना
  • किसी की जिन्दगी को खतरे में डाल कर अघोरी तरीके का इस्तेमाल करना
  • भानामती, करणी, जारणमरण, गुप्तधन के नाम से अमानवीय काम करना या नरबलि देना
  • दैवी शक्ति का दावा होने के नाम पर डर फैलाना
  • पिछले जन्म में पत्नी, प्रेमिका या प्रेमी होने का दावा कर या बच्चा होने का आश्वासन देकर संबंध बनाना
  • उंगली से आपरेशन का दावा करना
  • गर्भवती महिलाओं के लिंग परिवर्तन का दावा करना
  • भूत पिशाच का आवाहन करते हुए डर फैलाना
  • कुत्ता, बिच्छू, सांप काटने पर दवा देने से मना करके मंत्रा द्वारा ठीक करने का दावा करना
  • मतिमंद व्यक्ति में अलौकिक शक्ति का दावा कर उस व्यक्ति का इस्तेमाल धंधे या व्यवसाय के लिए करना

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सुभाष गाताडे 

जाने माने लेखक और प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता , अंग्रेजी में दो किताबें और हिन्दी में एक किताब प्रकाशित. कुछ अनुवाद भी. हिंदी, अंग्रेजी के अलावा मराठी में भी लेखन. 'न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव' से सम्बद्ध. 

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समयांतर के सितम्बर-२०१३ अंक से साभार 





शुक्रवार, 31 मई 2013

सी आई ए का भूत, वर्तमान और एक ‘सु’कवि को सम्पादक का साथ : आभासी दुनिया की एक वास्तविक बहस

  
·         यह लेख समयांतर के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुआ है. पूरी बहस आपने जनपक्ष पर पहले पढ़ी ही है. इस बीच अर्चना वर्मा का भी एक आलेख इस मुद्दे पर कथादेश में छपा है. मजेदार बात यह है कि इस लेख में कमलेश जी की वह आप्त पंक्ति जिस पर सारी बहस केन्द्रित थी ( ‘शीतयुद्ध के दौरान इस सत्य का सहधर्मी साहित्य धीरे-धीरे उपलब्ध होने लगा. यह सब शीतयुद्ध के दौरान अपने कारणों से अमेरिका और सी आई ए ने उपलब्ध कराया. इसके लिए मानव जाति अमेरिका और सी आई ए की ऋणी है.) गायब कर दी है या फिर यों कहें कि तीन बिन्दुओं (...) की 'सांकेतिक' भाषा में व्यक्त की है. उनका सारा ज़ोर इस बात पर था कि 'कम्युनिस्ट विरोधियों को इस विरोध का हक होना चाहिए', उनसे यह पूछा जा सकता है कि आखिर 'कम्युनिस्टों को अपने विरोधियों का जवाब देने का हक है या नहीं? खैर यह लेख ज़ाहिर तौर पर एक स्वतन्त्र आलेख है और इसे उसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए.
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पिछला महीना फेसबुक के साहित्यिक समुदाय के बीच काफ़ी हंगामाखेज़ रहा. यों तो इस आभासी दुनिया में गर्मागर्म और मीठी बहसें लगातार चलती रहती हैं और इस रूप में यह कस्बाई नुक्कड़ में तब्दील होता जा रहा है लेकिन यह हंगामा अब तक कि तमाम बहसों से अलग इसलिए कहा जा सकता है कि इसने लम्बे अरसे बाद वामपंथी और वामपंथ विरोधियों को एकदम स्पष्ट दो खेमों में बाँट दिया. एक तरफ मंगलेश डबराल, वीरेन्द्र यादव, आशुतोष कुमार, शिरीष कुमार मैरी, गिरिराज किराडू और इन पंक्तियों के लेखक सहित वाम-लिबरल धारा के तमाम लोग तो दूसरी तरफ की कमान मुख्यतः ओम थानवी ने संभाली तथा उनके साथ ओम निश्चल, अख़लाक़ उस्मानी जैसे लोग रहे. मुआमला शुरू हुआ गिरिराज किराडू के एक स्टेट्स से जिसमें उन्होंने लिखा “भंतेयह साहित्य के विश्व इतिहास में उल्लेखनीय है. वह कौनसा प्रसिद्ध लेखक है जिसने कहा है कि मानवता को सी.आई.ए.का ऋणी होना चाहिए. क्लू यह है कि कारनामा एक वरिष्ठ हिंदी लेखक के किया हुआ है.”


ज़ाहिर है यह ‘कारनामा’ स्तब्ध करने वाला था. भारत में शीतयुद्ध काल में सी आई ए द्वारा वित्तपोषित ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ की उपस्थिति और उसमें अज्ञेय और उनके अनुयायियों की सक्रिय भागीदारी से परिचित हिंदी समाज भी अमेरिका की कुख्यात जासूसी संस्था सी आई ए के खुले समर्थन की इस मुद्रा से अब तक अपरिचित था. इसका अंदाज़ा उस पोस्ट के बाद आये कमेंट्स से लग जाता था जिसमें कवि आशुतोष दुबे से लेकर आशीष त्रिपाठी सहित तमाम लोग इस सूचना पर अविश्वास से भरी टिप्पणियाँ करते हुए उस महानुभाव का नाम पूछ रहे थे. वह महानुभाव थे कवि कमलेश! समास पत्रिका में दिए गए अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ‘मानव जाति को सी आई ए का ऋणी होना चाहिए.’ कारण बताया उस संस्था की ‘बुक वेंडर’ की भूमिका जिसके तहत उसने शीत युद्ध काल में तमाम मार्क्सवाद विरोधी पुस्तकें उपलब्ध कराईं. समास -5 के पेज 6 पर जनाब फरमाते हैं ‘शीतयुद्ध के दौरान इस सत्य का सहधर्मी साहित्य धीरे-धीरे उपलब्ध होने लगा. यह सब शीतयुद्ध के दौरान अपने कारणों से अमेरिका और सी आई ए ने उपलब्ध कराया. इसके लिए मानव जाति अमेरिका और सी आई ए की ऋणी है.’ इसके बाद इस लम्बे साक्षात्कार में कम्युनिस्ट विरोधी चिर-परिचित विषवमन है. अमेरिका और सी आई के इस पुण्य काम के पीछे के ‘कारणों’ पर न कोई बात है, न उसके दूसरे मानव जाति विरोधी कारनामों की कोई चर्चा. अभी हाल में विकीलीक्स के एक खुलासे में सी आई ए से कांग्रेस सरकार पलटने में मदद माँगने वाले पूर्व समाजवादी , अज्ञेय के प्रसंशक और इन दिनों अशोक वाजपेयी खेमे के ‘सेलीब्रेटेड’ कवि (हाल में न केवल उनकी दो किताबें आईं बल्कि उनका विमोचन अशोक वाजपेयी रज़ा फाउंडेशन में किया, फिर यह लंबा साक्षात्कार छापने वाली समास तो उनकी पत्रिका है ही)  के कमलेश का यह साक्षात्कार शीत युद्ध काल में लोहियावाद के करीब रहे कुछ साहित्यकारों के सी आई ए के उन दिनों चल रहे वाम-विरोधी अभियान के हाथों संचालित होने की पुरानी आशंका को पुष्ट करने वाला है. खैर, इसके बावजूद अज्ञेय जैसे कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम के करीब रहे लोगों ने भी कभी इस तरह खुल्लमखुल्ला सी आई ए का अहसान नहीं जताया था. ज़ाहिर है कि इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई. लेकिन ऐसी परिस्थिति में उनकी रक्षा के लिए आगे आये जनसत्ता संपादक और इन दिनों साहित्य-सत्ता के खेल में संलग्न ओम थानवी!


यों भी ओम थानवी जनसत्ता के पन्नों से लेकर आभासी जगत तक में इन दिनों वाम विरोधी साहित्यिक समूह के सबसे वाचाल प्रवक्ता के रूप में उभरे हैं. पाठकों को याद होगा कि मंगलेश डबराल के सन्दर्भ में उठे एक विवाद में वह फेसबुक की बहस को न केवल जनसत्ता के पन्नों पर ले गए बल्कि इसका प्रयोग वामपंथ पर धूल फेंकने  तथा उदय प्रकाश के आदित्यनाथ के हाथों पुरस्कृत होने की घटना पर  धूल-गर्द डालने के लिए किया. जब उनके उस असत्य तथा अर्धसत्य पर आधारित एकतरफा लेख का जवाब दिया गया तो उन्होंने उसे जनसत्ता में छापने से इंकार कर दिया. साहित्य के कुछ अफसरान और मठाधीशों को अपनी पत्रकार वाली हैसियत से उपकृत करते रहने ( अभी कुछ दिनों पहले फेसबुक पर बहुत इमोशनल होते हुए उदयप्रकाश ने लिखा था कि ओम थानवी के सहयोग से उन्हें अपने बड़े बेटे की शादी के लिए इंडिया इंटरनेशल सेंटर बहुत सस्ते दामों पर मिल गया जिससे वह शादी ‘अभिजात भव्यता’ के साथ संपन्न हुई. साथ ही उन्होंने इसके लिए थानवी जी के प्रति अपने पूरे परिवार की ‘आभार’ भावना का ज़िक्र किया है. मजेदार बात यह है कि इसके तुरत बाद उन्होंने अपने द्वारा साहित्य अकादमी के एक समारोह में अज्ञेय को वामपंथी कवि बताये जाने और उससे अभिभूत होकर थानवी जी द्वारा उनके खीसे में अपनी कलम खोंस दिए जाने का ज़िक्र किया है. गोया इन दिनों वह अपने नहीं थानवी जी के ‘कलम’ से ही लिख रहे हैं) के अलावा ओम थानवी का हिंदी में कुल जमा योगदान एक लघु यात्रा वृत्तांत और अज्ञेय वंदना की सारी हदें पार कर लेने का ही रहा है. अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष में दिल्ली से कोलकाता तक उन्होंने जो ‘अभिजात भव्यता’ वाले आयोजन कराये, अपने अखबार (जिसमें इन दिनों जन की नहीं अभिजन साहित्य की चर्चा ही अधिक होती है) के पन्ने भर डाले, उन पर संस्मरणों की भारी-भरकम पोथी तैयार कर दी उसके बावज़ूद साहित्य जगत में अज्ञेय को लेकर किसी सकारात्मक हलचल की अनुपस्थिति ने उनमें कुंठा का एक भाव पैदा किया हो तो किमाश्चर्यम? आखिर छोटे शहरों, कस्बों और महानगरों तक में नागार्जुन, शमशेर और केदार नाथ अग्रवाल पर अक्सर संस्थाओं की मदद के बिना सामूहिक पहलों से जो कार्यक्रम हुए, पत्रिकाओं के अंक निकले, उनकी कविताओं के पुनर्पाठ हुए, अशोक वाजपेयी और थानवी जी के भरपूर प्रयास के बावजूद वह अज्ञेय को कहाँ नसीब हुआ?

खैर, बात हो रही थी सी आई ए के सम्बन्ध में कमलेश जी के बयान की. ओम थानवी ने इस बहस में भागीदारी करते हुए कहा कमलेश के ‘अच्छे कवि’ होने की बात की और कहा कि हमें उनकी कविता पर बात करनी चाहिए, न कि उनके विचारों पर क्योंकि वह मूलतः विचारक नहीं कवि हैं. यहाँ तक कि अगर वे सी आई ए के समर्थन में भी कविता लिख दें तो मैं देखूँगा कि वह कैसी कविता है. ज़ाहिर है उनकी किसी बात की तरह यह बात भी ‘राग अज्ञेय’ के बिना पूरी कैसे हो सकती थी, तो उन्होंने अज्ञेय जन्मशताब्दी वर्ष में शिरकत करने वालों का नाम भी गिनाया और मार्क्सवादियों की आलोचना का धर्म भी निभाते हुए लोकतंत्र और आवाजाही के कुछ सबक दिए. यहाँ तक कि अपनी बात में वज़न डालने के लिए विजयदेव नारायण साही का वह वक्तव्य भी दुहराया कि मैं नीत्शे की किताब जरथुस्त्र उवाच को समाज विरोधी मानता हूँ लेकिन साहित्य के दृष्टि से महान रचना मानता हूँ और उसकी एक प्रति अपने पास रखता हूँ. बार-बार पूछे जाने पर पहले तो वह सी आई एक पर कुछ बोलने को तैयार न होते हुए उसे एक गौण मुद्दा बताने पर तुले रहे और फिर कहा “उनका यह कहना गलत नहीं कि एक दौर में सीआइए ने अनेक महान लेखकों को (प्रताड़ित रूसी लेखकों पास्तरनाक, सोल्जेनित्सीन, जोजेफ ब्रोड्स्की आदि के अनेक नाम तो जगजाहिर हैं) मदद की. और सीआइए ने दुनिया का महान साहित्य (नोबल रचनाओं सहित) भी सस्ती दरों पर दुनिया में उपलब्ध करवाया. मगर यह काम तो केजीबी भी तो करती थी. चेखव-तोल्स्तोय सस्ते में उपलब्ध कराते-कराते कौड़ियों के मोल स्तालिन के विचार भी सुन्दर जिल्दों में परोस दिए जाते थे! ....बहरहाल, मेरे इस बहस में पड़ने का एक ही सबब है कि कमलेशजी ने क्या कहा उस पर इतना कुढेंगे तो एक वक्त के बाद उनकी कविता का आनंद कभी नहीं ले पाएंगे जो सचमुच अच्छा काव्य है. एक रचनाकार के मामले में वही महत्त्वपूर्ण है. वे सीआइए की नौकरी करने लगें तब भी मैं यह बात इसी तरह कहूँगा... मेरा तो इतना निवेदन ही था की कमलेश जी मूलतः कवि हैं, विचारक या दार्शनिक आदि नहीं. तो उनकी रचना से ही उन्हें नापा जाना चाहिए, विचारों से नहीं. ” 

ज़ाहिर है यह बहस दो व्यक्तियों या समूहों भर की नहीं रह गयी थी. यह उस पुरानी बहस की पुनरावृत्ति थी जिसमें एक पक्ष जीवन और रचना के बीच में गहरे अंतर्संबंध की बात को स्वीकार करता है तो दूसरा पक्ष वास्तविक जीवन में ली गयी पक्षधरताओं को दरकिनार कर रचना को उसके विशुद्ध सौंदर्यवादी नज़रिए से प्राप्त निकष के आधार पर देखने को कहता है. ये स्पष्ट रूप से दो भिन्न विश्व दृष्टियों का सवाल है. कविता को उसके सौन्दर्य के आधार पर देखने की इस ज़िद के पीछे भी आलोचना का कितना स्वीकार था यह तब समझ में आ गया जब मंगलेश डबराल ने कमलेश के कवि रूप पर केन्द्रित होते हुए कहा कि  कमलेश जी कुल मिलाकर एक रूमानी कवि हैं, जिनकी कविता पर विदेशी कवियों का बहुत साफ़ असर रहा है. उनका प्रारम्भिक दौर काफी अच्छा था और उत्तर छायावादी, रोमांचक भाषा और विन्यास उन्होंने विकसित किया था. एक भाषाई सवर्णात्मकता , जो कुछ रोमांचित करती थी. लेकिन परवर्ती कमलेश बेहद निराशाजनक हैं. मार्क्सवाद के बारे में उनका सोच और उनकी समझ, दोनों बहुत पिछड़े हुए हैं और शीतयुद्धकालीन हैं, उनका आज के पूंजीवाद और मार्क्सवाद की वैचारिकी में आये बदलावों से कोई दूर का भी रिश्ता नहीं. अब उन्हें कोई महाकवि कहे या महा विचारक,इससे कविता और विचार, दोनों पर आज कोई फर्क नहीं पडता, हाँ कुछ तात्कालिक चर्चा वगैरह तो हो सकती है. या कुछ धुंधलका फ़ैल सकता है, जैसे भगवान सिंह की किताब के बहाने डी डी कोशाम्बी पर उनके बचकाने और अतार्किक प्रहार या कुलदीप कुमार को दिए गए कुंठित जवाब से चंद लम्हों के लिए फैली. (२) पोलिश कवि मिलोश के अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित चयन का नाम 'खुला घर' है तो कमलेश जी के संग्रह का नाम 'खुले में आवास' है, और फिर अगला कमज़ोर संग्रह है 'बसाव'. और ये सभी नाम सचमुच के महाकवि पाब्लो नेरुदा के 'रेसीडेन्स आन अर्थ' --- रेसिदेंसिया एन ला तियेरा - के फालआउट्स हैं, तो हिंदी में यह सब चलता है तात्कालिक और क्षणिक महानताओं के नाम पर.”  इसे एक स्वस्थ आलोचना की तरह लेने या फिर उनकी कविताओं के आधार पर इसका सम्यक प्रतिउत्तर देने की जगह इसे  विचारधारा से इतर कवि को खारिज़ करने की साजिश की तरह प्रसारित किया गया. ज़ाहिर है कि ओम थानवी की आवाजाही और उनके  लोकतंत्र का एकमात्र अर्थ उनके कहे का अप्रश्नेय स्वीकार है.  इसका सबसे बड़ा उदाहरण फेसबुक का ही है जहाँ अज्ञेय पर ज़ारी बहस में असहमति के कारण उन्होंने वीरेन्द्र यादव, हिमांशु पंड्या और प्रियंकर पालीवाल जैसे लोगों को उन्होंने ब्लाक कर दिया तो भाषा सम्बन्धी के विवाद में अपना झूठ पकडे जाने पर (आशुतोष कुमार का प्रतिवाद न छापने के लिए ओम थानवी ने सफाई दी थी कि वह तय शब्द सीमा से अधिक का है, जबकि कम्प्युटर से गिने जाने पर वह तय शब्द सीमा में ही निकला और अंततः एक आधे-अधूरे जवाब के साथ उसी स्पेस में प्रकाशित हुआ) उन्होंने गिरिराज किराडू, अमलेंदु उपाध्याय, आशुतोष कुमार और मुझ सहित अनेक लोगों को ब्लाक कर दिया.

सी आई एक वाले मुद्दे पर बहस आगे चली. लगभग डेढ़ महीने चली यह पूरी बहस जनपक्ष ब्लॉग पर है और हू-ब-हू पुनर्प्रस्तुत करना स्थानाभाव में संभव न होगा. किताबें छापने की सी आई ए की भूमिका पर दिगंबर ओझा ने पद्मा सचदेव द्वारा संकलित इब्ने इंशा के लेखों की किताब ‘दरवाज़ा खुला रखना’ के हवाले से लिखा, ‘"बेऐब ज़ात तो खुदा की है, लेकिन अफसानातराजी कोई हमारे मगरबी मुसन्निफों से सीखे. चीन के मुतल्लिक अकेले अमरीका में इतनी किताबें छप चुकी हैं कि ऊपर-तले रखें तो पहाड़ बन जाए. लेकिन अक्सर उनमें से वासिंगटन और न्यू यार्क में बैठ कर लिखी गयी हैं. वहाँ ऐसे रिसर्च के अदारे हैं, ज्यादातर सी.आई.ऐ. के ख्वाने-नेमत से खोशा चीनी करनेवाले जो आपकी तरफ से वाहिद मुतकल्लिम में चश्मदीद हालात लिखकर देने को तैयार हैं. आप फकत इस पर अपना नाम दे दीजिए. बाज़ पब्लिशिंग हाउस (मसलन प्रायगर) तो चलते ही सी.आई.ए. के पैसे से हैं. मशहूर रिसाला एनकाउण्टर भी इन्हीं इदारों से सांठ-गाँठ रखता है. कीमत इसकी ढाई-तीन रूपए है लेकिन कराची के बुकस्टालों पर एक रुपए में मिल जाता है. मालूम हुआ कि पाकिस्तान में इल्म का नूर फ़ैलाने के लिए इसकी कीमत खास तौर पर रखी गयी है. हम चाहते हैं कि चीजें सस्ती हों लेकिन ऐसा भी नहीं कि कलकलाँ अफीम सस्ती हो जाए तो खाना शुरू कर दें और जहर की कीमत चौथाई रह जाए तो मौका से फायदा उठाकर ख़ुदकुशी कर लें. आठ-आठ दस-दस आने की किताबों का सैलाब भी आया और बराबर आ रहा है. जिनको स्टूडेंट एडिशन का नाम दिया जाता है. प्रोपेगंडे की किताबों में चंद किताबें बेजरर किस्म की भी डाल दी जाती हैं कि देखिये हमारा मकसद तो फकत इसाअते तालीम है.’  आशुतोष कुमार ने ओम थानवी के एक सवाल के जवाब में कहा कि ‘ कमलेशजी मानवजाति की ओर से जिस सी आइ ए के ऋणी हैं , अच्छा होता कि पिछली सदियों में , एशिया -अफ्रीका से ले कर - लातीनी अमरीका में -- दुनिया भर में-- लोकतांत्रिक समाजवादी सरकारों को पलटने , नेताओं और लेखकों को खरीदने , उनकी हत्या कराने , से ले कर खूनी सैनिक क्रांतियां /जनसंहार कराने तक की उस की करतूतों के बारे में भी दो शब्द कह देते . सोवियत विकृतियों की आलोचना की सुदृढ़ परम्परा खुद कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर ट्रोट्स्की से ले कर माओ और उस के बाद तक मौजूद रही है . सोवियत संघ के और दुनिया भर के स्वतंत्र मार्क्सवादी/ नव-मार्क्सवादी लेखकों ने लिखा है . सी आइ ए की सुनियोजित प्रचार सामग्री इस लिहाज से कतई भरोसे लायक नहीं हो सकती . उसके प्रति कृतज्ञता केवल वे लोग महसूस कर सकते हैं , जिन्हें कम्युनिस्ट विरोधी साहित्य की सख्त जरूत थी . वो चाहे जहां से मिले , जैसी मिले . वे जो यों तो किसी विचार के 'पश्चिमी' होने मात्र से आशंकित हो जाते हैं , और भारत पर उस का प्रभाव पड़ते देख पीड़ित , लेकिन हर उस पश्चिमी लेखक के मुरीद हो जाते हैं , जो कम्युनिस्ट विरोधी हो . इन पन्नों को पढ़ कर तो यही लगता है कि कमलेश जी की कृतज्ञता ज्ञान के विस्तार के कारण नहीं , बल्कि कम्युनिस्ट -विरोध के कारण है . उन्हें अपनी कृतज्ञता जाहिर करने से कौन रोक सकता है , लेकिन उसे '' मानवजाति की कृतज्ञता '' के रूप में स्थापित करने की कोशिश पाखंडपूर्ण तो है ही , हास्यास्पद भी है .” लेकिन इन सवालों का कोई जवाब देने की जगह पूरी बहस को पटरी से उतारने , कम्युनिस्टों को लोकतंत्र के खिलाफ कहने, एजरा पाउंड तथा ज्यां जेने के बहाने लेखन और जीवन को दो लग-अलग खांचों में देखने की वक़ालत की गयी. जब मंगलेश डबराल, गिरिराज किराडू और वीरेन्द्र यादव ने एजरा पाउंड को महान बताने वालों पर सवाल उठाये और खुद एजरा के फासीवाद समर्थन को लेकर अपराधबोध से ग्रस्त होने की बात की तो ज़ाहिर है जवाब इसका भी नहीं था. गिरिराज किराडू का यह सवाल कि ‘एक फासिस्ट को महत्वपूर्ण लेखक कौन और कैसे मानता है,मनवाता है इसे समझे बिना, एजरा पाउंड को एक बड़ा लेखक न मानने की लम्बी अकादमिक और वैचारिक परंपरा को समझे बिना (पाउंड के फासिज्म पर अब तक लगातार अध्ययन हो रहे है और उनके जितना पहले समझा जाता था उससे कहीं ज्यादा संगीन फासिस्ट और रेसिस्ट - एंटी-सेमेटिक, यहूदी-विद्वेषी - होने के प्रमाण सामने आये हैं,उनकी बेटी अभी दो साल पहले यह लड़ाई लड़ रही थी कि पाउंड के नाम से ही एक नवफासीवादी समूह ने अपना नाम रख लिया है) एक नजीर की तरह उनके मामले को उद्धृत करना जानकारी व अध्य्यन की कमी के साथ समझ का भी कुछ पता देता है. ज्यां जने जिनके अपराधों में चोरी, बदलचलनी, हेराफेरी के साथ साथ समलैंगिकता भी शामिल थी को सार्त्र द्वारा कैननाईज (दोनों अर्थों में) करने का मामला पाउंड के मामले से अलग है और दोनों को मिलाना एक गैर-डायलेक्टिकल समझ का ही प्रमाण है . जेल से छुड़ा लिये जाने के बाद जने कभी अपराध की तरफ नहीं गये. डाकू से लेखक बनना स्वीकार्य है अपने यहाँ भी. और पत्रकार से लेखक बनना भी.”  औरमंगलेश डबराल का यह सवाल एजरा पाउंड ने करीब ७० वर्ष पहले मुसोलिनी के रेडिओ से प्रसारण किये थे. क्या हम इतिहास के अँधेरे से कुछ नहीं सीख पाए, जो आज मानवता के शत्रुओं के ऋणीहो रहे हैं ? पाउंड के कुकृत्य के कारण भी परिचित हैं - एक, अर्थशास्त्री डगलस के विचारों का प्रभाव जो सूदखोरी और वित्तीय पूँजी को अपराध की जड़ मानता था. पाउंड बैंक्स के विरोधी थे और मानते थे कि इंग्लैण्ड की डेमोक्रेसी बैंक और सूदखोरी पर प्रभुत्व रखने वाले ज्यूज के हाथ में है. लेकिन क्या हम भूल जाते हैं कि पाउंड के 'anti-antisemitism' का कितना तीखा, उग्र विरोध हुआ, पाउंड खुद पागल होकर जेल, हास्पीटल में वर्षों तक रहे और अंत में भयानक पश्चाताप में गले. उनके कुछ जाने-माने वाक्य हैं --'i was stupid, suburban anti-semaiic,.. i spoiled everything i touched.. i've always blundered..i was not a lunatic, but a moron." इस विलाप को देखते हुए पाउंड के काम को आज के किसी वक्तव्य को उचित ठहराने के लिए कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है? जब पाउंड जैसी प्रतिभा की निंदा हुई तो कमलेश जी की थोड़ी सी आलोचना उनका वध करार दी जायेगी? किस तर्क से? अनुत्तरित ही रहा. इसके बदले में इस पूरी बहस को चरित्र हनन बताने का शोर मचता रहा.    
     
 सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी वजूहात हैं कि आज शीत युद्ध के इतने वर्षों बाद कमलेश जैसा व्यक्ति सी आई ए के प्रति समर्थन जताता है और ओम थानवी जैसे अज्ञेय भक्त उसके बचाव में सारी सीमाएं पार करते हैं? शीत युद्ध के दौरान सी आई ए की सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रियता अब सर्वज्ञात तथ्य है. कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम के साथ साम्यवाद विरोधी लेखकों की एक टोली अज्ञेय के नेतृत्व में सक्रिय थी ही. उसी के एक सदस्य के हवाले से लिखा शंकर शरण का कुत्सा प्रचार का अनमोल नमूना ओम थानवी जनसत्ता के सम्पादकीय पन्नों पर पेश कर ही चुके हैं. ज़ाहिर है कि अपने उस पुराने आका के प्रति कृतज्ञता का भाव बार-बार सामने आता ही है. बहुत संभव यह भी है कि दुनिया भर में छाये आर्थिक संकटों और योरप सहित अलग-अलग जगहों पर सामने आये जन उभारों के मद्देनज़र सी आई ए को एक बार फिर अपने पुराने झंडाबरदारों की ज़रुरत महसूस हो रही हो. व्यक्तिगत तौर पर देखें तो ओम थानवी अपनी इकलौती साहित्यिक ‘उपलब्धि’ अज्ञेय वंदना को लेकर सी आई ए का नाम आने भर से असुरक्षित महसूस कर रहे हों तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं. आखिर बरास्ता  कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम सी आई ए का भूत अज्ञेय वन्दकों को सताता तो होगा ही न?        

   

मंगलवार, 12 मार्च 2013

पूँजीवादी विकास की अंतर्कथा


क्या विकास पूरा हो चुका है?

--लूई प्रोयेक्ट 


पूँजीवाद के संकट का सवाल विश्व के प्रमुख औद्योगिक राष्ट्रों के सम्मुख जिस तरह खड़ा है वैसा 1930 के दशक के बाद कभी नहीं हुआ था। जहाँ एक ओर बहुत से लोग मानते हैं कि मंदी की विकटता अपने चरम पर है, वहीं यह मानने वाली प्रवृत्ति भी चली आई है कि पूँजीवाद अब व्यवसाय चक्र (बिज़नेस साइकल) के दुरुस्त होने के चरण में है। मसलन, सं. रा. अमेरिका में अब बेरोज़गारी की दर 7.7 फ़ीसदी है जो पिछले चार सालों में सबसे कम है। इस सुधार के बावजूद यूरोप का बहुत सा हिस्सा अब भी यूरोज़ोन संकट में डूबा हुआ है।

वामपंथ के सामने खड़े अहम सवालों में से एक है पूँजीवादी व्यवस्था की दीर्घकालिक व्यवहारिकता (लॉन्गटर्म वाएबिलिटी) । और अगर आप इस सिद्धांत को आधार मान कर चलते हैं कि यह व्यवस्था तेजी और मंदी के चक्रों से संचालित होती है, तो एक तार्किक निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि बेरोज़गारी की स्थिति में सुधार होने के साथ ही मुकम्मल लड़ाई छेड़ने का मौका हमारे हाथों से निकल गया है। इसमें अगर ऑक्युपाई आन्दोलन के कमज़ोर पड़ने की बात जोड़ दी जाए तो ऐसा आभास होता है कि इस व्यवस्था ने अपने आप को फिलवक्त स्थिर कर लिया है।

पूँजीवादी विचारधारा के खेमे के भीतर से एक बेमेल सी मगर पते की बात निकल कर आई है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमन ने, जो 'वैश्वीकरण' को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स के अपने साथी स्तंभकार थॉमस फ्रीडमन जितने ही प्रतिबद्ध हैं, पंचकोटि महामनी वाला सवाल हाल ही में पूछा है: क्या प्रौद्योगिक उन्नति से नई नौकरियाँ तैयार होती हैं? यह शूमपेटर के सृजनात्मक विध्वंस (क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन) वाले सिद्धांत - जिसे कैपिटल के दूसरे खंड में वर्णित पूँजी संचयन चक्र (कैपिटल एक्युमुलेशन साइकल) का अश्लीलीकरण (वल्गराइजेशन) कहा जा सकता है - की मूल कल्पना है।

दिसंबर 2012 को अपने एक स्तम्भ में क्रुगमन ने अपना ध्यान सजीव श्रम के स्थान पर मशीनरी के उपयोग की तरफ मोड़ा, जिसे उन्होंने "पुराने अंदाज़ वाली लगभग मार्क्सवादी किस्म की बहस" करार दिया:

हाल ही में आई एक पुस्तक 'रेस अगेंस्ट दि मशीनमें एमआईटी के एरिक ब्रिंजल्फ़्सन और एंड्रयू मैकाफी तर्क देते हैं बहुत से क्षेत्रों की यही दास्ताँ है और इनमें अनुवाद और वैधानिक अनुसंधान (लीगल रिसर्च) जैसी सेवाएँ भी शामिल हैं। उनके द्वारा दिए गए उदाहरणों के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि बहुत सारे पेशे जो ख़त्म हो रहे हैं वे उच्च कौशल वाले और ऊँची तनख्वाहों वाले हैं; प्रौद्योगिकी का नकारात्मक असर केवल निचले दर्जे का काम करने वालों तक ही सीमित नहीं है।
फिर भी, क्या नवप्रवर्तन (इनोवेशन) और प्रगति से सचमुच ज़्यादातर मजदूरों का, या व्यापक रूप से सभी मजदूरों का नुकसान होता है? अक्सर ऐसे दावे सुनाई पड़ते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता। मगर हकीकत यह है कि ऐसा हो सकता है और गंभीर अर्थशास्त्री इस संभावना से पिछली दो सदियों से वाकिफ हैं।

27 दिसंबर को 'इस ग्रोथ ओवरशीर्षक वाले अपने एक कॉलम में  क्रुगमन ने पूँजीवादी कट्टरपंथियों के समक्ष एक और गंभीर चुनौती पेश की। इसमें रॉबर्ट गॉर्डन नाम के एक अर्थशास्त्री के शोध का ज़िक्र किया गया है।

हाल ही में नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के रॉबर्ट गॉर्डन के इस तर्क से सनसनी फैल गई कि आर्थिक विकास के तेज़ी से धीमे पड़ते जाने की सम्भावना है- हो सकता है कि विकास का युग जिसकी इब्तिदा अठारहवीं सदी में हुई थी वह सचमुच ख़त्म होने वाला है। गॉर्डन ध्यान दिलाते हैं कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास एक स्थिर और नियमित प्रक्रिया नहीं रही है; और वह कई सारी अलग-अलग "औद्योगिक क्रांतियों' से चालित रहा है जिनमें से हरेक किसी विशेष प्रौद्योगिकी समुच्चय (सेट ऑफ़ टेक्नॉलॉजीज़) पर आधारित थी। पहली औद्योगिक क्रान्ति ने, जो मुख्य रूप से भाप के इंजन पर आधारित थी, अठारहवीं सदी के आखिरी और उन्नीसवीं सदी के शुरूआती दौर में विकास को गति प्रदान की। मुख्यतः विद्युतीकरण, आतंरिक दहन (इन्टरनल कम्ब'शन) और रासायनिक इंजीनियरिंग जैसी प्रौद्योगिकियों में विज्ञान की प्रयुक्ति से मुमकिन हो पाई दूसरी औद्योगिक क्रान्ति 1870 के आसपास शुरू हुई और उसने 1960 के दशक तक विकास को गति दी। तीसरी औद्योगिक क्रान्ति, जो सूचना प्रौद्योगिकी पर केन्द्रित है, हमारे वर्तमान युग का निर्धारण करती है।

अगर यह सच है तो मार्क्सवाद के समक्ष अभूतपूर्व परिस्थितियाँ खड़ी हैं। जब कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो लिखा गया था तब पूँजीवाद हरसू उत्पादन के साधनों में इंकलाब ला रहा था।

सभी उत्पादन उपकरणों में तीव्र सुधार और अत्यंत सुगम बनाए गए संचार-साधनों के ज़रिये बुर्जुआ वर्ग सभी, यहाँ तक कि बर्बर से बर्बर राष्ट्रों को भी सभ्यता की परिधि में खींच लाता है। उसके जिंसों के सस्ते दाम से, जो उसके लिए एक भारी तोपखाना है जिसकी मदद से वह सभी चीन की दीवारों को ढहा देता है और विदेशियों के प्रति बर्बर जातियों की अत्यंत अदम्य घृणा को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देता है। वह प्रत्येक राष्ट्र को, अन्यथा विलुप्त हो जाने के भय से, बुर्जुआ उत्पादन प्रणाली अपनाने के लिए मजबूर करता है; वह उन्हें मजबूर करता है कि वे अपने बीच उस चीज़ को दाखिल करें जिसे वह सभ्यता कहता है, अर्थात खूद बुर्जुआ बन जाएँ। संक्षेप में, वह अपने ही साँचे में ढली दुनिया का निर्माण करता है।

लेकिन अगर यह "भारी तोपखाना" महज एक फूँकनी में तब्दील हो गया हो तो? जो अपनी बढ़ती आबादी (खासकर विकासशील देशों में) की ज़रूरतों का और विस्तार नहीं कर सकती ऐसी सामाजिक व्यवस्था के राजनीतिक परिणाम क्या हैं? वामपंथी केन्सवादी अर्थशास्त्री जोअन रॉबिन्सन ने एक बार लिखा था,"...पूँजीपतियों द्वारा शोषण किए जाने का दर्द उस दर्द के आगे कुछ भी नहीं जो शोषण बिलकुल न होने से उपजता है।" अगर मेहनतकश लोग वेतन दास (वेज स्लेव) होने की आशा नहीं कर सकते, तो जिस सामाजिक व्यवस्था के साथ उन्होंने सदियों से समझौता कर रखा है उसके साथ मुकाबला करने के अलावा उनके पास और क्या विकल्प हैं? अरब बसंत को निरंकुश सत्ताओं के खिलाफ खड़े हुए आन्दोलन के तौर पर देखने की तमाम (और दुरुस्त) प्रवृत्तियों के बीच जीवन की बुनियादी ज़रूरतें मुहैया कराने में पूँजीवाद की मूलभूत विफलता ने ही विद्रोह को हवा दी है। जब ट्यूनीशिया में सड़क पर ठेला लगाने वाले शख्स ने आत्मदाह किया तो यह उसका तरीका था यह कहने का कि यह व्यवस्था उसके लिए कारगर नहीं रही है। जब एक यूनानी पेंशनभोगी आदमी ने पिछले साल संसद भवन के सामने अपनी जान दी, तो वह ऐसा ही वक्तव्य दे रहा था।

एक ऐसे दौर में जब 1930 के दशक के बाद पहली बार वर्गभेद और तीक्ष्ण होते जा रहे हैं, मार्क्सवादी वाम को अपनी सलाहियत साबित करनी होगी। ह्यूगो शावेज़ की अगुवाई में लातिन अमेरिकी वामपंथियों द्वारा रखी गई इक्कीसवीं सदी के समाजवाद (ट्वेंटी-फर्स्ट सेंचुरी सोशलिज्म) की माँग को ध्यान में रखकर हमें गौर करना होगा कि अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन या फ्रांस जैसे देशों के क्रांतिकारियों के लिए इस बात के क्या मायने हैं। हालाँकि इन देशों में मेहनतकश तबका तुलनात्मकरूप से निष्क्रिय बना हुआ है (जो मुख्यतः उस विऔद्योगिकरण का नतीजा है जिसको लेकर क्रुगमन चिंतित हैं), मगर इसमें शुबहा नहीं कि संघर्ष जारी रहेंगे भले ही वे वह भूमिका न अख्तियार करें  जो उन्होंने 1930 के दशक में की थी। इसका पहला संकेत क्युपाई आन्दोलन था और हमें इसके आगामी आविर्भावों को लेकर सचेत रहना होगा। शासक वर्ग हमको लेकर तैयार है और आगामी महत्त्वपूर्ण लड़ाइयों के लिए हमारा उतना ही तैयार रहना लाजिमी है।
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(न्यूयॉर्क में रहने वाले लूई प्रोयेक्ट जाने-माने वामपंथी विचारक-लेखक, एक्टिविस्ट और ब्लॉगर हैं। वे दुनिया भर के वामपंथियों में लोकप्रिय ईमेल समूह 'मार्क्समेल' के मॉडरेटर भी हैं। यह आलेख उन्होंने हमारे आग्रह पर ख़ास समयांतर के लिए लिखा है।- भारत भूषण तिवारी, अनुवादक

*समयांतर  के वामपंथ  केन्द्रित विशेषांक से साभार 

शुक्रवार, 15 जून 2012

अर्थ के अनर्थ की तहकीकात



जाने माने अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर गिरीश मिश्र की नई किताब बाज़ार-अतीत और वर्तमान’ की समयांतर में लिखी समीक्षा आप सब के लिए 



बाज़ार को लेकर साहित्य और समाज, दोनों में जितनी बहस आज है, शायद पहले कभी नहीं थी. नब्बे के दशक में भूमंडलीकरण और उदारीकरण की संरचनात्मक समायोजन वाली नई आर्थिक नीतियों के लागू  होने के बाद से जिस तरह से बाज़ार में नई-नई उपभोक्ता वस्तुओं का एकदम से आगमन हुआ और इस नई आर्थिक व्यवस्था के फलस्वरूप जन्में एक नए मध्यवर्ग के बीच उपभोक्तावाद ने जिस तरह से जड़ें पसारी, यह वैकल्पिक व्यवस्था का स्वप्न देखने वाले लोगों के लिए भौंचक कर देने वाली परिस्थितियाँ थीं. सोवियत रूस के विघटन के बाद पहले से ही अवसन्नता कि स्थिति में पड़े हुए बौद्धिक वर्ग के लिए यह परिघटना एक आघात से कम न थी. वैसे भी खासतौर पर हिन्दी के साहित्यिक वाम के एक बड़े हिस्से के बीच वामपंथ को लेकर जो समझदारी रही वह किसी वैज्ञानिक समझदारी की जगह वंचित-शोषित वर्ग के प्रति एक भावनात्मक लगाव और पक्षधरता के कारण ही थी, आज भी है. यह कोई अस्वाभाविक बात नहीं थी, एक हद तक इसके सकारात्मक पहलू भी हैं, लेकिन कई बार वामपंथ के औजारों की सही समझ के अभाव में केवल भावनात्मक पक्षधरता ऐसे सूत्रों में अनुदित होती है कि वह उन्हीं उद्देश्यों के विरुद्ध काम करने लगती है, जिनके साथ होने का वह दावा कर रही होती है.
बहुचर्चित कहानी बाज़ार में रामधन इसका एक बड़ा उदाहरण है. उदारीकरण की नई नीतियों को लेकर अक्सर ऐसी चीजें देखी जाती हैं. इन्हें आज़ादी के बाद लागू की गयी नीतियों और माडलों की तार्किक परिणिति की तरह देखने की जगह एक बिलकुल नई परिघटना की तरह देखा गया. नेहरूवादी समाजवाद को, जो अपने मूल में राजकीय पूंजीवाद का ही एक माडल था, शुरू से ही तमाम लोगों द्वारा समाजवादी माडल की तरह देखा गया, जिनमें खुद को वाम कहने वाले साहित्यकार ही नहीं राजनीतिक कार्यकर्ता और नेता भी शामिल थे. तो नब्बे के दशक के बाद के समय में उस पुराने राजकीय पूंजीवाद को एक तरह की नास्टेल्जिया से याद किया जाना (जो कमोबेश अब भी ज़ारी है) और प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे शत्रु बाज़ार के खिलाफ जंग का एलान कर दिया गया. बाज़ार के खिलाफ लिखी गयी कविताओं से लेकर कहानियों, उपन्यासों और लेखों का एक जखीरा आज हमारे सामने है. एक ऐसे शब्द बाजारवाद- के खिलाफ यह छायायुद्ध लगातार लड़ा जा रहा है, जो असल में कहीं है ही नहीं, जो असल में पूंजीवाद की जगह बड़ी चतुराई से पूँजीवाद के सिद्धांतकारों द्वारा पेश किये गए शब्द बाजार प्रणाली (market system) का भ्रष्ट अनुवाद है. इस शब्द की लोकप्रियता का यह आलम है कि एक आलेख में मेरे द्वारा लिखे गए बाज़ार की ताकतों को एक वरिष्ठ संपादक ने, जो एक वरिष्ठ साहित्यकार भी हैं, बाजारवाद में तब्दील कर पूरे वाक्य को हास्यास्पद बना दिया था. वरिष्ठ अर्थशास्त्री और विश्व साहित्य के गंभीर अध्येता प्रोफ़ेसर गिरीश मिश्र की सद्य-प्रकाशित पुस्तक बाज़ार-अतीत और वर्तमान ऐसे संभ्रम के माहौल में बहुत सारे धुंध और जाले साफ़ करती है. वह न केवल इस शब्द के पीछे छुपी साजिश को सामने लेकर आता है, बल्कि पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रस्तावित उपभोक्ता की सार्वभौमिकता के दावे को भी प्रश्नांकित करता है. साथ ही वह बाजार की उत्पति से लेकर उत्पादन संबंधों में बदलाव के साथ-साथ आई इसकी भूमिका की विस्तार से जांच-पड़ताल करते हैं.

जिस पहली और सबसे ज़रूरी बात वह आरम्भ करते हैं वह यह कि बाज़ार न तो पूंजीवाद के दौर की पैदाइश हैं न ही पूंजीवाद के साथ समाप्त हो जायेंगे. बाज़ार का उद्भव नामक अध्याय में वह उन सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का विस्तार से वर्णन करते हैं. प्राक-आधुनिक समाजों में वस्तु-विनिमय (barter-system) की जगह मुद्रा के उदय की व्याख्या करते हुए वह मुर्गियों और बकरी के बीच के विनिमय की दिलचस्प दिक्कतों वर्णन करते हुए वह प्राक-मुद्रा के उदय के बारे में बताते हैं. पश्चिम के साथ भारत में बाज़ार के उदय और विकास का निर्धारण करने के लिए वह अथर्ववेद, पाणिनी और कौटिल्य अर्थशास्त्र के उद्धरण देते हुए सिद्ध करते हैं कि 500 ई.पूर्व में ही व्यापार न केवल स्थानीय अपितु आयात-निर्यात संबंधी व्यापक स्तर पर भी शुरू हो चुका था. सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के विकास के साथ-साथ व्यापार की पूरी व्यवस्था की संरचना और स्वरूप में भी बदलाव आया. बाणभट्ट की हर्षचरितम के उद्धरणों के सहारे वह बताते हैं कि - इस दौर तक व्यापार में मुनाफाखोरी जैसी प्रवृति भी आ गयी थी. इस दौर में वणिज तस्कर जैसे शब्द का प्रयोग मिलता है जिससे यह रेखांकित करने का प्रयास किया गया है कि चोर बने बिना धनवान वणिक होना मुश्किल है. साथ ही वह यह महत्वपूर्ण तथ्य भी रेखांकित करते हैं कि बाज़ार को राज्य द्वारा नियंत्रित रखने की परिघटना हजारों वर्ष पुरानी है. अगले अध्याय में वह पूंजीवाद के पहले भारत में विनिमय की विवेचना करते हुए वह तीन निष्कर्षों पर पहुँचते हैं, पहला बाज़ार निरंतर विकसित और विस्तृत होता रहा, दूसरा- उत्पादन का मूल उद्देश्य उपभोग को विविधतापूर्ण बनाना था न कि मुनाफ़ा कमाना और तीसरा बाज़ार सख्ती से ग्राम समुदाय और तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था के अधीन था, जहाँ कीमतों, वस्तुओं की गुणवत्ता और मापतौल पर राज्य या समाज की निगाह निरंतर बनी रहती थी. गडबडी करने वालों पर सख्त कार्यवाही होती थी. इसी दौर में योरप के बाजारों की संरचना की विवेचना करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सामंतवाद के पतन तक आई समस्त आर्थिक प्रणालियों के लिए यह प्रस्थापना सही थी कि पारस्परिकता, पुनर्वितरण और पारिवारिकता के सिद्धांत मूलाधार बने रहे. हालांकि वह इस तथ्य को रेखांकित नहीं कर पाए हैं कि इस दौर में खासतौर से भारत जैसे समाज में, जहाँ जाति जैसी उत्पीडक सामाजिक संरचना के कारण  स्वनिर्भर गाँवों में उत्पादक खुद अपने उत्पाद का उपभोग कर पाने के लिए आज़ाद नहीं था, बाज़ार ने एक हद तक मुक्तिदाता की भूमिका भी निभाई, यहाँ ग़ालिब का वह शेर याद किया जा सकता है और ले जायेंगे बाज़ार से गर टूट गया/ जाम-ए-जम से मेरा जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है.

बाज़ार का प्रभाव असल में पूंजीवाद के आगमन के साथ बढ़ता चला जाता है. इस दौर में बाज़ार समाज के कार्यकलाप में सहायक की भूमिका से आगे बढ़कर एक ऐसी सत्ता में तब्दील हो जाता है जो पूरी आर्थिक प्रणाली का नियंत्रण, नियमन और निर्देशन करने लगता है. लाभ इकलौता उद्देश्य बन जाता है और बाज़ार पर समाज का नियंत्रण धीरे-धीरे खत्म होता चला जाता है. यह स्वचालित तथा स्वनियमित बाज़ार मनुष्यता के समक्ष एक चुनौती की तरह आता है. उत्पाद आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए नहीं अपितु बाज़ार में बेचने के लिए आता है, जिसका उद्देश्य, जाहिर तौर पर मुनाफ़ा कामना होता है. यहाँ तक कि श्रम, भूमि और मुद्रा भी मुनाफे के उद्देश्य से माल में तब्दील हो जाते हैं. पोलान्यी का उद्धरण देते हुए वह बताते हैं कि श्रम, भूमि और मुद्रा को माल बनाकर उन्हें बाज़ार तंत्र के हवाले करने के परिणाम समाज के लिए विध्वंसकारी होंगे. आज हिन्दुस्तान सहित दुनिया भर में जारी जल-जंगल-जमीन की लूट और श्रम के बेतहाशा शोषण के साथ मुद्रा बाज़ार की उठापठक के चलते मानवता के सम्मुख उपस्थित अभूतपूर्व संकट के मद्देनजर इस भविष्यवाणी के महत्व को समझा जा सकता है. श्रम, भूमि और मुद्रा को माल बनाकर पूंजीवाद की हवस ने खुद स्वनियमित बाज़ार को भी संकट में डाल दिया है. इसका सीधा परिणाम बाज़ार और समाज में टकराव के रूप में सामने आता है. इसी शीर्षक के अगले अध्याय में वह पूंजीवाद के विकास के साथ पैदा हुई परिस्थितियों का विस्तार से वर्णन किया है. योरप में औद्योगीकरण की प्रक्रिया में हुए गाँवों के विघटन और वहाँ से पलायन पर मजबूर मजदूरों की नगरीय व्यवस्था से पैदा हुई घृणा को रेखांकित करते हुए वह इस असंतोष के कारणों की विस्तार से विवेचना करते हैं. साथ ही वह पूंजीवादी उत्पादन संबंधो के स्थापित होने के साथ-साथ उसके पक्ष में चलने वाली बौद्धिक कार्यवाहियों का ज़िक्र करते हैं. एडम स्मिथ के वेल्थ आफ नेशंस के साथ वह टामसन हाब्स और विलियम टाउनसेंड के उस निष्कर्ष का ज़िक्र करते हैं जिसमें यह साफ़ किया गया था कि मुक्त समाज में दो नस्लें होंगी, सम्पतिवानों की और मजदूरों की. मजदूरों की संख्या खाद्य पदार्थों की उपलब्धि पर निर्भर होगी ; और जब तक संपत्ति सुरक्षित रहेगी तब तक भूख मजदूरों को काम करने के लिए बाध्य करेगी. किसी मैजिस्ट्रेट की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि भूख अनुशासित करने का अच्छा तरीका है. ज़ाहिर है कि इस गैरबराबरी और संसाधनों की लूट के पक्ष में माल्थस या रिकार्डो जैसे सिद्धांतकार सामने आते हैं. पी बी से कहते हैं कि जो बना है वह सब बिक जाता है, एडम स्मिथ किसी अदृश्य हाथ द्वारा बाज़ार को हमेशा संतुलन में रखे जाने की बात करते हैं, माल्थस श्रमजीवी वर्ग की विपन्नता की जिम्मेवारी उनके द्वारा जनसंख्या बढाए जाने के सर थोप देते हैं. साहित्य से लेकर दर्शन तक में पूंजीवाद के निजी सम्पति के अधिकार और श्रम, जमीन और मुद्रा को माल में बदल देने के पक्ष में माहौल बनया जाता है. लेकिन इसी के साथ-साथ इस लूट का प्रतिरोध भी जन्म लेता है. गिरीश जी ने राबर्ट ओवेन का हवाला दिया है, जिसने अगर बाज़ार अर्थव्यस्था को अपने खुद के नियमों के अनुसार विकसित होने दिया गया तो वह बड़ी और स्थाई बुराइयों को जन्म देगी. इसी दौर में अंपटन सिंक्लेयर के जंगल जैसे उपन्यास लिखे गए, जो नई फैक्ट्रियों के भीतर श्रमिकों के भयावह शोषण और बाहर उनकी नारकीय जीवन स्थितियों का ज़िंदा दस्तावेज बना.

इस अध्याय में गिरीश जी, सामंतवाद के दौर से निकलकर पूंजीवाद के दौर में आने पर सामाजिक संरचनाओं में हुए बदलाव का ज़िक्र करते हैं. ज़ाहिर तौर पर पूंजीवाद सामंतवाद की तुलना में एक आगे बढ़ी हुई सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था थी, जहाँ मनुष्य की अस्मिता और आजादी के लिए सम्मान था. आर्थिक गैरबराबरी तो खैर पूंजीवाद की लाक्षणिकता है ही, लेकिन सामंतवाद के सामाजिक गैरबराबरी वाले ढांचे में दरार तो इसने लगाई ही. गिरीश जी के शब्दों में जाति-बिरादरी, छुआछूत और धर्म-सम्प्रदाय के बंधनों से मुक्त तो कर दिया मगर भूख और सामाजिक असुरक्षा का हर्निश भय पैदा कर दिया. हालांकि, भारत में अपनी स्वाभाविक विकास प्रक्रिया से गुजरे बिना जिस तरह से औपनिवेशिक शासन द्वारा बीमार और सतमासा पूंजीवाद आया, गिरीश जी  का यह कथन और अधिक विवेचना की मांग करता है कि ब्राह्मण-शूद्र, हिन्दू-मुसलमान, ऊंच-नीच के भेद मिट गए और वे सब एक ही नई बिरादरी-मजदूर वर्ग- के सदस्य हो गए. असल में, भारत में इस तरह के जाति-धर्म विहीन मजदूर वर्ग के उदय की बात सरलीकरण सी लगती है. यहाँ ये सामाजिक विभेद लंबे समय तक अधिरचना में उपस्थित रहे और आधार में आज भी इनकी गहरी उपस्थिति दिखाई देती है. इस सन्दर्भ में थोड़ी और विवेचना और खास तौर पर उस दौर के फुले-पेरियार-अम्बेडकर जैसे आन्दोलनों के महत्व के रेखांकन की आवश्यकता थी, जिसे लेखक चुके हैं. साथ ही पूरी किताब में महिलाओं के सन्दर्भ में कोई बातचीत न होना भी खटकता है. पूंजीवाद महिलाओं को भी एक हद तक आजादी देता है, लेकिन साथ ही वह न तो उन्हें चूल्हे-चौके से मुक्ति दिलाता है और न ही लैंगिक असमानता को पूरी तरह खत्म करता है. साथ ही वह नारी देह को एक वस्तु के रूप में तब्दील कर देता और महिलाओं के श्रमिक के रूप में तब्दील हो जाने के बाद भी उन्हें पुरुषों की तुलना में दोयम दर्जे की मजदूरी और कार्य परिस्थितियाँ मिलती हैं. अभी हाल में आई जयति घोष की किताब नेवर डन एंड पुअरली पेड और इन्द्रानी मजूमदार की किताब विमेन वर्कर्स एंड ग्लोबलाइजेशन बताती हैं कि किस तरह आरंभिक पूंजीवादी बाज़ार में ही नहीं, बल्कि भूमंडलीकृत बाज़ार में महिला श्रम के साथ दोयम व्यवहार जारी है.

आगे के दो अध्यायों पाश्चात्य चिंतन में बाज़ार : एक और पाश्चात्य चिंतन में बाज़ार :दो में गिरीश जी बाजार के प्रति पश्चिमी समाजशास्त्रियों, दार्शनिकों तथा शासन व्यवस्था के बदलते नजरिये का विस्तार से जिक्र करते हैं. किताब पढ़ते हुए इन अध्यायों में बदलती सामाजिक व्यवस्थाओं के साथ बाजार के असर और उसके समर्थन के बदलते माहौल का ज़िक्र तो मिलता है, लेकिन यहाँ एक तरह का दोहराव भी लगता है और किताब के क्रम में एक व्यवधान सा आता भी दिखता है. ये दोनों अध्याय अगर बाजार और समाज में टकराव के पहले होते तो शायद बेहतर होता. जहाँ पहले अध्याय में उन्होंने अरस्तू और ईसाई धर्मगुरुओं की धन कमाने की बेलगाम प्रवृति के राजनीतिक सद्गुण और व्यक्ति के कल्याण के लिए घातक होने की मान्यता के साथ शुरुआत कर अठारहवीं सदी आते-आते पूंजीवाद के प्रमुख विचारक वाल्तेयर के इस निषकर्ष कि धार्मिक सहिष्णुता और बाजार के बीच घनिष्ठ संबंध होता है और फिर उनके इस स्टैंड कि धर्मगुरु, योद्धा और सामंत, खलनायक और व्यापारी नायक और बुद्धिजीवी होते हैं के बहाने पहले कही बात को ही और स्पष्ट किया है. बाद में वह पूंजीवादी विचारों के विकास और इसी के बरक्स समाजवाद के विचार के विकास का विस्तार से विवेचन करते हुए हीगेल, मार्क्स और शुम्पीटर जैसे विचारकों पर चर्चा करते हैं. यहाँ भी शुम्पीटर के बाद सीधे केन्स का आना थोड़ा खलता है. यहाँ विषय विस्तार माँगता था. पूंजीवादी संतुलन के अदृश्य हाथों या से के सिद्धांत के असफल होने के कारणों की विवेचना और उन स्थितियों के विवरण जिसके कारण महामंदी आई और केन्स उसके तारणहार बने, के बिना यह आम पाठक के लिए मुश्किलात पैदा करता है. हालांकि केन्स के बाद के विकास को जरूरी तवज्जो दी गयी है, जिसमें एक बार फिर से शासकीय नियंत्रण को समाप्त कर मुकरत बाज़ार विचारधारा की वापसी की बात की गयी है. हाँ, यहाँ अगर भारतीय संदर्भ में नेहरूवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था के तत्कालीन पूंजीवादी विश्व की मजबूरियों और सहूलियतों तथा समाजवादी ब्लाक की मजबूत उपस्थिति के बरक्स चर्चा की गयी होती तो पाठक के लिए इसके असली चरित्र को समझना और नेहरूवादी समाजवाद के पूंजीवादी रंग को पहचानना आसान हो जाता. साथ ही वह यह रेखांकित करने में भी स्पष्ट नहीं हैं कि बाज़ार नहीं बल्कि मुनाफे की हवस में डूबा अनियंत्रित पूंजीवाद हमारे समय के लिए घातक है, जिसके चलते उत्पादन आवश्यकता की पूर्ती की जगह माल के उपभोग को केन्द्र में रखकर किया जाता है. दिक्कत बाजार से नहीं, उस पर पूंजीवादी नियंत्रण से है, जिसमें सारा अधिशेष पूंजीपतियों की जेब में चला जाता है और इस प्रकार सामाजिक सम्पति व्यक्तिगत सम्पति में तब्दील होती जाती अहि और असमानता की खाई और गहरी होती जाती है. जिस सरलीकरण के खिलाफ उन्होंने शुरू में बात की थी, कई बार बाज़ार के खिलाफ जैसे टर्म्स का उपयोग कर वह खुद उसके शिकार होते हैं. यह विषय अलग से एक अध्याय की मांग करता है. इसके आगे मुद्रा बाजार की विवेचना है, जो अर्थशास्त्र न जानने वाले पाठकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
                
इस पुस्तक की एक विशिष्ट उपलब्धि है इसका अंतिम अध्याय ईश्वर मंडी और बाज़ार. वाल्तेयर बाजार की उपस्थिति में जिस धार्मिक सहिष्णुता की बात कर रहे थे, उसे तो खैर उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के इतिहास ने गलत साबित किया ही साथ ही मुनाफे की हवस ने धर्म को ही एक बाजार में तब्दील कर दिया. अक्सर हम सोचते हैं कि ऐसा हिन्दुस्तान में ही हुआ. लेकिन गिरीश जी एमिल जोला की किताब लुर्द के हवाले से बताते हैं कि किस तरह डेढ़ सौ साल पहले एक असामान्य दृष्टि वाली चौदह साल की बच्ची द्वारा कुमारी मेरी के तथाकथित दर्शन के किस्से का वाणिज्यिक उपयोग कर पोप की संस्तुति से एक स्थल को तीर्थस्थल और उसके पास के झरने को चमत्कारी घोषित कर वहाँ न केवल एक भव्य गिरिजाघर बनाया गया बल्कि उसे एक सफल वाणिज्यिक केन्द्र में तब्दील कर दिया गया. एक ऐसे दौर में जब औद्योगिक क्रान्ति के प्रभाव में चारों ओर वैज्ञानिकता का बोलबाला था, यह परिघटना रहस्यात्मकता के प्रति लोगों के असीम आकर्षण और पूंजीवादी बाज़ार द्वारा हर चीज को माल में तब्दील कर लेने को स्पष्ट रेखांकित करता है. भारत में तो ऐसे तमाम किस्सों से हम परिचित हैं ही.

कुल मिलाकर गिरीश जी की यह किताब हिन्दी में अर्थशास्त्र पर उपस्थित गैर पाठ्य-पुस्तकीय पुस्तकों की कमी को एक हद तक पूरा करने वाली ही नहीं बल्कि एक नई बहस को शुरू करने वाली भी है जो आम पाठक को चीजों को देखने की एक ताज़ा अंतर्दृष्टि देती है. हालांकि 174 पृष्ठों की इस किताब का 350/- रुपये का मूल्य पाठक  और किताब के बीच एक दूरी पैदा करता ही है, लेकिन यह भी साबित करता है कि पूंजीवादी बाज़ार ने किसी को नहीं छोड़ा है, यहाँ तक कि अपने विरोधियों को भी नहीं. 

समीक्षित पुस्तक बाज़ार अतीत और वर्तमान

लेखक गिरीश मिश्र

प्रकाशक ग्रन्थ शिल्पी

पृष्ठ संख्या 174 (हार्डबाऊंड)
मूल्य रु 350/-