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रविवार, 1 सितंबर 2013

इस मुरदा-घर में उम्मीद की किरणें कहाँ से आएँगी?


(यह आलेख कुछ दिनों पहले 'स्त्री मुक्ति' पत्रिका के लिए लिखा गया था. लेख की मूल चिंता तमाम हालिया घटनाओं में वंचित तबके के किशोरों/पुरुषों की भागीदारी के आड़ में शोभा डे जैसे लोगों का महानगरों को बिहारी/उत्तर प्रदेशी/बंगलादेशी/मज़दूरों से खाली कराने के आह्वान के मद्देनज़र इसके मूल कारणों की तलाश है. आज यह आलेख आप सबके लिए)

चित्र यहाँ से साभार 




कुछ दिनों पहले कवि और प्रकाशक अरुण चन्द्र राय ने एक वाकया सुनाया. दिल्ली के पास एक फैक्ट्री के सर्वे के समय उन्हें कुछ किशोर वय के मज़दूर लडके मिले. फैक्ट्री में उनके काम करने के घंटे दस से बारह थे. सब यमुना पार की झुग्गियों में बेहद अमानवीय परिस्थितियों में रहते थे, बिहार और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों से आये इन किशोरों की औसत आय रोज़ के सौ रुपये के आस-पास थी. इनके पास मनोरंजन का न तो कोई साधन था न ही कोई समय. बस एक चीज़ थी. चाइना के सस्ते मोबाइल और उन सबके मोबाइल पर पोर्न क्लिप्स भरे हुए थे. काम के बीच में थककर बीड़ी-तम्बाकू पीते हुए वे इन क्लिप्स को देखा करते थे. अमूमन कड़ाई से काम कराने वाले मालिक और सुपरवाइजर इस बात पर कोई एतराज़ नहीं करते थे. पूछने पर उन्होंने बताया कि इस से रिफ्रेश होकर लड़के फिर पूरे जोश से काम करते हैं’ ! हाँ एक और चीज़ थी उनके पास काम के बाद रिलेक्स होने के लिए – ड्रग्स और शराब!

बहुत पहले कहीं परसाई जी को पढ़ा था जहाँ उन्होंने एक घटना बयान की थी जिसमें एक ऐसे जवान लड़के का वाकया बयान किया गया था जिसने किसी शो रूम के शीशे में लगे एक महिला के बुत को गुस्से में तोड़ डाला था और वज़ह पूछने पर बताया कि साली बहुत सुन्दर लगाती थी’! इन दो घटनाओं को जोड़कर देखते हुए पिछले दिनों देश के अलग-अलग इलाकों में हुई बलात्कार की घटनाएं जेहन में घूम गयीं. ऐसा नहीं कि बलात्कार की ये घटनाएं ग़रीब और वंचित लोगों द्वारा ही घटित हुईं लेकिन इन घटनाओं में इस वर्ग के लोगों की संलिप्तता भी अनेक बार पाई गयी.  इसलिए इन्हें थोडा अलग से और थोड़ा सबके साथ जोड़कर देखे जाने की ज़रुरत है.

थोड़ा पीछे जाकर देखें तो इस देश में योरप की तरह कभी कोई बड़ी सामाजिक क्रान्ति नहीं हुई. सामंती शासन व्यवस्था से सत्ता छीन कर जो औपनिवेशिक व्यवस्था यहाँ आई उसका मूल उद्देश्य अपने पितृदेश के लिए अधिकतम संभव मुनाफ़ा कमाना था. 1857 के बाद से तो अंग्रेज़ी शासन ने किसी सामाजिक सुधार की जगह पूरी तरह से यहाँ की उत्पीड़क सामाजिक संस्थाओं का दोहन अपने पक्ष में करना शुरू कर दिया. यह समाज को धार्मिक तथा जातीय आधारों पर बाँटे रहने का सबसे मुफ़ीद तरीक़ा था. आप देखेंगे कि जहां पूरे योरप के साथ-साथ इंग्लैण्ड में उस दौर में सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिवर्तनों की बयार चल रही थी, भारत में अंग्रेज़ी शासन के अंतर्गत ऐसी कोई बड़ी पहल इस दौर में संभव नहीं हुई. सती प्रथा विरोध जैसे जो कुछ समाज-सुधार आन्दोलन 1857 के पहले थे भी वे बाद के दौर में नहीं दीखते. सामाजिक संरचना पूरी तरह से सामंती मूल्य-मान्यताओं पर आधारित रही. देश में पूंजीवाद आया भी तो औपनिवेशिक शासक के हितों के अनुरूप कमज़ोर और बीमार. यह किसी सक्रिय क्रान्ति की उपज नहीं था जो अपने साथ सामाजिक संरचना को भी उथल-पुथल कर देती. दक्षिण में रामास्वामी पेरियार के नेतृत्व में और फिर फुले तथा अम्बेडकर के नेतृत्व में जातिगत भेदभाव विरोधी आन्दोलन चले भी लेकिन जेंडर को लेकर कोई बहुत मज़बूत पहल कहीं दिखाई नहीं दी. आप देखेंगे कि उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की मुख्यधारा में शामिल अधिकाँश लोगों के भाषणों, आचार-व्यवहार और नीतिगत निर्णयों में पितृसत्तात्मक तथा ब्राह्मणवादी नज़रिया साफ़-साफ़ झलकता है. कांग्रेस के सबसे प्रमुख नेताओं मोहनदास करमचंद गाँधी, बाल गंगाधर तिलक, राजेन्द्र प्रसाद से लेकर हिंदूवादी नेताओं जैसे मदन मोहन मालवीय तक में यह स्वर कभी अस्पष्ट तो कभी मुखर रूप से दिखाई देता है.  इस दौरान पनपे हिन्दू तथा मुस्लिम दक्षिणपंथी संगठनों में तो यह स्वाभाविक ही था कि महिलाओं को लेकर बेहद संकीर्ण दृष्टि अपनाई जाती. उदाहरण के लिए आर एस एस के दूसरे सरसंघचालक गोलवरकर आर्गेनाइज़र के 2 जनवरी 1961 के अंक के पेज़ 5 पर कहते हैं आजकल संकर प्रजाति के प्रयोग केवल जानवरों पर किये जाते हैं। लेकिन मानवों पर ऐसे प्रयोग करने की हिम्मत आज के तथाकथित आधुनिक विद्वानों में भी नहीं है। अगर कुछ लोगों में यह देखा भी जा रहा है तो यह किसी वैज्ञानिक प्रयोग का नहीं अपितु दैहिक वासना का परिणाम है। आइये अब हम यह देखते हैं कि हमारे पुरखों ने इस क्षेत्र में क्या प्रयोग किये।मानव नस्लों को क्रास ब्रीडिंग द्वारा बेहतर बनाने के लिये उत्तर के नंबूदरी ब्राह्मणों को केरल में बसाया गया और एक नियम बनाया गया कि नंबूदरी परिवार का सबसे बड़ा लड़का केवल केरल की वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र लड़की से शादी कर सकता है। एक और इससे भी अधिक साहसी नियम यह था कि किसी भी जाति की विवाहित महिला की पहली संतान नंबूदरी ब्राह्मण से होनी चाहिये और उसके बाद ही वह अपने पति से संतानोत्पति कर सकती है। आज इस प्रयोग को व्याभिचार कहा जायेगा, पर ऐसा नहीं है क्योंकि यह तो पहली संतान तक ही सीमित है.ब्राह्मणवाद और पितृसत्तात्मक सोच का इससे क्रूर उदाहरण क्या हो सकता है? फिर इस बात पर क्या आश्चर्य किया जाय कि ऐसे गुरु के शिष्य आज भी बलात्कार की वजूहात स्त्रियों के पहनावे से लेकर उनके आचार-व्यवहार, नौकरी और सौन्दर्य तक में तलाश करते हैं? खैर, इस तरह आज़ादी की पूरी लड़ाई मर्दों की लड़ाई बनी रही. औरतों की बेहद मानीखेज़ भागीदारी के बावजूद उनके मुद्दे हमारे नेतृत्वकारी निकाय के सामने कभी बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं रहे. नतीजतन सामाजिक संरचना मोटे तौर पर सामंती बनी रही और विद्यालयों से लेकर परिवारों तक में पितृसत्तात्मक मूल्य आदर्श की तरह स्थापित किये जाते रहे.

इसी के साथ उस दौर की औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों से जिस तरह आर्थिक और क्षेत्रीय विषमताओं में वृद्धि हुई वह आज़ादी के बाद भी बदस्तूर चलती रही. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उडीसा जैसे पिछड़े क्षेत्रों के भयानक वंचना के शिकार लोग विस्थापित होकर महानगरों में आने को मज़बूर हुए जहाँ की चकाचौंध वे देख तो सकते थे लेकिन उसमें प्रवेश वर्जित था. इन महानगरों में उन्हें मिली नारकीय झुग्गी-झोपड़ियों की रिहाइश, अमानवीय रोज़गार स्थितियाँ और दोयम दर्जे की नागरिकता जहाँ उन्हें कोई भी अपमानित कर सकता था, प्रताड़ित कर सकता था. अपराधी मानसिकता के फलने-फूलने में ये परिस्थितियाँ कैसी भूमिका निभाती हैं इसे अस्सी के दशक में लिखे गए जगदम्बा प्रसाद दीक्षित के उपन्यास ‘मुरदा घर’ में तो हाल में आये अरविन्द अडिगा के उपन्यास ‘द व्हाईट टाइगर’ में देखा जा सकता है. नब्बे के दशक के बाद ये प्रक्रिया और बढ़ी. आर्थिक असमानता की खाई तो चौड़ी हुई ही साथ में सामाजिक सुरक्षा के नाम पर जो थोड़ी-बहुत इमदाद मिलती थी वह भी बंद हो गयी. आवारा पूंजी से भरे बाज़ार ने एक तरफ चकाचौंध को कई गुना बढ़ा दिया तो दूसरी तरह मज़दूरों को मिलने वाली सुरक्षा धीरे-धीरे ख़त्म की जाने लगी. खेती नष्ट हुई और गाँवों से रोज़गार की संभावनाएं भी. नतीजतन गाँवों और छोटे कस्बों से शहरों की तरफ पलायन बढ़ा और बड़ी संख्या में लोग उन्हीं परिस्थितियों में रहने और काम करने को मज़बूर हुए जिसका ज़िक्र मैंने पहले वाकये में किया है.     

इसके बरक्स दूसरी दुनिया में समृद्धि ही नहीं आई बल्कि पूरा सांस्कृतिक परिवेश भी बदल गया. उदाहरण के लिए फिल्मों को देखें. आदर्श वे कभी नहीं रहीं. लेकिन आवारा पूंजी के बेरोकटोक आगमन के बाद उनके चरित्र में बहुत बदलाव आया. अश्लीलता और नारी देह के कमोडीफिकेशन को एक मूल्य की तरह स्थापित किया गया. आइटम सांग के रूप में जिन बोलों के साथ बेहद अश्लील नृत्य प्रस्तुत किये जाते हैं उनकी लोकेशंस को जरा गौर से देखिये. अक्सर आपको वह पैसे लुटाते लोगों के सामने खुद को प्रस्तुत करती स्त्री का है. साथ में है भव्य विदेशी लोकेशंस पर उच्च-मध्यवर्गीय या फिर उच्च-वर्गीय जीवन का स्वप्नजगत जो ललचाता है, सपने जगाता है और सीख देता है कि पैसे से कुछ भी ख़रीदा जा सकता है और पैसे कमाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है. स्त्री यहाँ कोई सकर्मक रोल अदा करने की जगह एक ऐसे लक्ष्य की तरह है जिसे या तो पैसे या फिर ताक़त की तरह प्राप्त किया जा सकता है और उसे ऐसा बनाया जाता है मानों वह खुद को प्रस्तुत करने के लिए सदा तैयार है, बस पात्र के भीतर इन दोनों में से कोई एक योग्यता हो. याद कीजिए डियो का वह विज्ञापन जिसमें लडकियाँ बैगपाइपर के पीछे भागते चूहों की जगह ले लेती हैं. और इस सांकेतिकता के बरक्स अधिक फैला हुआ संसार है पोर्न फिल्मों और वीडियो क्लिप्स का. इंटरनेट ऐसी सामग्री से भरा पडा है. हमने उस वाकये में देखा कि किस तरह वह इस अशिक्षित, विस्थापित, वंचित और शोषित समूह के लिए अफीम का काम करता है. लेकिन यहाँ यह ध्यान देना ज़रूरी होगा कि ऐसा सिर्फ उनके साथ नहीं है. संपन्न घरों के मित्र और लक्ष्य विहीन बच्चों से लेकर बड़ों तक यह असर साफ़ दिखाई देता है. एक तरफ सामंती पारिवारिक संरचना जिसमें स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है तो दूसरी तरफ ऐसा सांस्कृतिक परिवेश जिसमें स्त्री को सिर्फ देह, वह भी किसी भी तरह पाई जा सकने वाली देह बनाकर पेश किया जाता है. यह सब मिलकर स्त्री के प्रति एक हिंसक मानसिकता को जन्म देता है जिसका परिणाम हम कभी खाप पंचायत के रूप में देखते हैं, कभी बलात्कारों के रूप में तो कभी कश्मीर से उत्तर पूर्व तक के ‘डिस्टर्ब’ क्षेत्रों में लोगों के आत्मसम्मान को कुचलने के लिए सैनिकों द्वारा महिलाओं पर किये गए अत्याचार के रूप में.  और इन सबके बीच होती है अपनी रोज़ाना की जद्दोजेहद में लगी औरत.  घर से निकलती हुई, अपने हकूक के लिए ही नहीं सर्वाइवल के लिए भी जद्दोजेहद करती, इस बाज़ार में अपने लिए काम तलाशती, इस थोड़ी सी आज़ादी को सेलीब्रेट करती और इस सारी प्रक्रिया में पुरुष के साथ प्रतियोगिता में उतरती तो घर के भीतर अपनी पारम्परिक भूमिका के साथ कभी एडजस्ट तो कभी विरोध करती तथा रोज़ ब रोज़ इस मानसिकता की आँखों में काँटा बनती!  मुक्ति की तलाश में नौकरी से लेकर प्रेम तक वह जहाँ भी जाती है उसे अक्सर इसी मानसिकता का सामना करना पड़ता है.

ज़रा उस वर्ग के लिहाज से इन सब चीजों को एक साथ रखकर देखें जिसपर मैं यह लेख केन्द्रित करना चाहता हूँ. एक तरफ़ निजी जीवन में सौन्दर्य का पूर्ण अभाव बल्कि कहें तो कुरूपता का वर्चस्व. गंदे घर, पहनने को अच्छे कपडे नहीं, कारखानों, होटलों, बंगलों और दुकानों में हाड़तोड़ मेहनत और अपमान वाला नारकीय जीवन, विस्थापन और दारिद्र्य तो दूसरी तरफ चारों ओर फ़िल्मों और विज्ञापनों के बिलबोर्डों पर बिखरा, उन्हीं कारखानों के मालिकों और बड़े कारकूनों के यहाँ दिखता, सड़क पर मंहगी कारों और दुकानों तथा होटलों में मुक्त भाव से पैसे लुटाता और घरों में ऐश्वर्य के सारे साधन जुटाता सौन्दर्य. इन सबके साथ मुक्तिदाता मनोरंजन के रूप में उपलब्ध पोर्न और नशा. क्या यह सब उस सौन्दर्य के प्रति नफरत पैदा कर देने के लिए काफ़ी नहीं? क्या यह सब उन्हें अमानवीय बना देने के लिए काफ़ी नहीं? इस अमानवीयता के परिणाम के रूप में उनका एक रूप बलात्कारी की तरह नज़र आता है तो इसमें आश्चर्य कैसा? अगर यह अमानवीयता मध्यवर्गीय निर्भया से लेकर उन्हीं झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाली मासूम लड़कियों के साथ ऐसे अत्याचार के रूप में आ रहा है तो क्या सिर्फ दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा देकर इस पर पाबंदी लगाई जा सकती है? ज़ाहिर है कि इसका इलाज़ पट्टियाँ और टहनियां कतरने में नहीं जड़ पर प्रहार करने में है. उन अमानवीय स्थितियों को दूर करने में है.

लेकिन दिक्कत यह है कि इनकी जड़ें बहुत गहरे इस व्यवस्था के समृद्ध और प्रभावी लोगों से जुडी हैं जिनके व्यापारिक तथा सांस्कृतिक हित नशे और पोर्न के व्यापार से तथा ऐसी फ़िल्मों और ग़ैरबराबरी की ऐसी व्यवस्था से जुड़े हैं. यह सब मिलकर उनके मुनाफ़े को बढ़ाते हैं तथा उनके वर्चस्व को बनाए रखते है. इसलिए वे कभी नहीं चाहेंगे कि इन जड़ों पर सवाल उठे. तो वे एक तरफ ज़ोर-शोर से ‘फांसी दो’ का उन्माद पैदा करते हैं तो दूसरी तरफ बिहारियों-उत्तर प्रदेशियों के ख़िलाफ़ इसे एक क्षेत्रीय मुद्दा बनाकर उन्हें निकाले जाने की मांग करते हैं. इस आड़ में वह मूल समस्या को तो धुंधला करते ही हैं साथ में अमीरजादों की ऐसी ही हरकतों या फिर परिवार के भीतर हो रही ऐसी घटनाओं पर भी पर्दा डालने की कोशिश करते हैं. बलात्कार कोई भी करे या किसी के साथ भी हो, एक भयावह रूप से संगीन घटना है और इसके अपराधी को सज़ा मिलनी चाहिए, इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है? लेकिन यह हद से हद फौरी उपाय हो सकता है. यह याद रखना होगा कि बलात्कार केवल एक यौन अपराध नहीं है. इसके सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक पक्ष भी हैं. इसीलिए इसका कोई भी दीर्घकालिक तथा स्थाई निराकरण समाज के भीतर से अमानवीकरण के लिए जिम्मेदार परिस्थितियों तथा स्त्रीविरोधी पितृसत्तात्मक मानसिकता से एक फैसलाकुन जंग लड़े बिना मुमकिन नहीं है.    




सोमवार, 31 दिसंबर 2012

औरतों को लेकर मिथक : थोड़ी हकीकत ज्यादा फसाना

युवा पत्रकार पूजा सिंह का यह लेख 'तहलका' के ताज़ा 'महिला विशेषांक' में है. स्त्रियों को लेकर जिस तरह के पूर्वाग्रह और सहजबोध (common sense) समाज में बनाए जाते हैं उनका मुहतोड़ जवाब देता यह लेख एक आधुनिक महिला के जीवन के प्रति दृष्टिकोण से भी परिचित कराता है.






औरत व आदमी भले ही एक दूसरे के पूरक हों लेकिन उनके स्वभाव में विरोधाभासों की कोई कमी नहीं है। शायद उनके स्वभाव के अंतर को देखकर ही यह कहा गया होगा कि मेन आर फ्राम मार्स एंड वुमेन आर फ्राम वीनस। यही वजह है कि उनके बीच एक दूसरे को लेकर मिथक भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। आइए जानते हैं पांच ऐसी ही बातों को जो महिलाओं के बारे में सच होने का भ्रम फैलाती हैं लेकिन दरअसल हकीकत से कोसों दूर हैं



घोड़े पर आएगा बांका राजकुमार


बेड़ा गर्क हो इन हिंदी फिल्मों का जिन्होंने लोगों के मन में यह मुगालता डाल दिया है कि बचपन से ही हम घोड़े पर सवार होकर हमें लेने आने वाले राजकुमार के हसीं खयालों में खो जाती हैं. नहीं जी नहीं दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं है.
अव्वल तो पैदा होते ही शादी के सपने नहीं बुनने लगतीं हमारे जिम्मे और भी तो काम हैं करने को. पता नहीं ऐसी कहावतें किस वक्त जन्मीं होंगी. उस दौर में शायद लड़कियों के पास सज संवर का विवाह की प्रतीक्षा करने के अलावा दूसरा कोई काम होता ही नहीं होगा. लेकिन अब तो दूसरा वक्त है. हम ओलंपिक्स से लेकर स्पेस तक अपने झंडे गाड़ रहे हैं. ऐसे में यह बात कुछ उटडेटेड सी लगती है. इसलिए हे लड़कों प्लीज, बनठन के टशन में हमारे आगे पीछे घूमना बंद करो यार.

एक और बात हां, हम चाहती हैं कि हमारा साथी बांका छबीला हो लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वह हर जगह हमारी कमर के इर्दगिर्द हाथ डालकर हमें प्रोटेक्ट करता फिरे. कसम से बहुत इरिटेटिंग लगता है ऐसा बिहैवियर. अगर वह अपने अपोनेंट का ताकत से नहीं बल्कि अपने विट और ह्यूमर से हरा दे तो यह हमारे लिए ज्यादा खुशी की बात होगी.


माफ कीजिए यह सोशल सर्विस नहीं है


सजना है मुझे सजना के लिए...सौदागर फिल्म के इस गाने ने तो जीना मुहाल कर रखा है. नहीं नहीं वैसे गाना अच्छा है, हम भी अक्सर गुनगुनाते हैं लेकिन इसे सुनते सुनते लोगों को ऐसा लगने लगा है मानों हमारे सजने संवरने का बस एक ही मकसद है- अपने सो कॉल्ड प्रियतम को रिझाना. अरे जनाब और भी गम हैं जमाने में सजने संवरने के सिवा! रवींद्र जैन साहब आपने न जाने कौन से जन्म की दुश्मनी निकाली है यह गीत लिखकर? आपको इसे लिखने की प्रेरणा कहां से मिली ये तो पता नहीं लेकिन यह जरूर बता दें कि हमारे बारे में यह धारणा एकदम गलत है. नो डाउट हमें सजना और संवरना अच्छा लगता है लेकिन यह किसी दूसरे के लिए नहीं होता बल्कि हमारी अपनी खुशी के लिए होता है. आपके मन में यह सवाल नहीं आता कभी कि लड़के किसलिए सजते हैं? जी हां हम भी ठीक उसी वजह से सजते-संवरते हैं यानी खुद अच्छा महसूस करने और अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए. हां अगर कोई सजने-संवरने की तारीफ करे तो हमें अच्छा लगता है. लेकिन वह तो सबको अच्छा लगता है न फिर चाहे वह लड़का हो या लड़की, बूढ़ा हो या जवान? तो भगवान के लिए आपलोग हमारे सजने को सोशल सर्विस समझना बंद कर दीजिए.


वैसे तो को-एड संस्थान हमारे व्यक्तित्व के विकास में बहुत मायने रखते हैं लेकिन मुसीबतें यहां भी पीछा नहीं छोड़तीं. लड़कों को यह बात समझाना कितना मुश्किल है कि उनसे दो मिनट हंस कर बात कर लेने का यह मतलब नहीं है कि हम उनमें इंटरेस्टेड हैं या उनकी तरफ आकर्षित हैं. उनका भी कुसूर नहीं है कुसूर तो हमारी सोसाइटी का है जो बचपन से ही लड़कों के जेहन में यह बात डाल देती है कि लड़की हंसी तो फंसी. अमां यार, हम भी तुम्हारी तरह इंसान ही हैं. कोई बात अच्छी लगती है तो हंस देते हैं, बुरी लगती है तो दुखी होते हैं या रोकर मन हल्का कर लेते हैं. आपको ऐसा क्यों लगता है कि हम फंसने के लिए तैयार बैठे हैं.

टॉप जॉब के लिए परफेक्ट हैं हम

यह मिथक पूरी तरह पुरुषों द्वारा अपने पक्ष में गढ़ा गया है कि महिलाएं नर्म स्वभाव और कम आक्रामकता के चलते किसी भी संस्थान में शीर्ष पद को नहीं संभाल सकती हैं क्योंकि वहां तमाम तरह के साम, दाम, दंड भेद और आक्रामकता की आवश्यकता होती है. यह कहने में भी गुरेज नहीं किया जाना चाहिए कि यह एक तरह से लैंगिक भेदभाव भरी टिप्पणी है. एक के बाद एक विभिन्न शोधों से यह बात सामने आ चुकी है कि महिलाएं शीर्ष पद संभालने के मामले में पुरुषों से कतई कमतर नहीं होती हैं. बल्कि बचपन से ही घरेलू जिम्मेदारियां संभाल रही महिलाओं में प्रबंधन की क्षमता पुरुषों के मुकाबले अधिक होती है. नैसर्गिक रूप से मौजूद विनम्रता उनको अपने सहयोगियों और कर्मचारियों का भरोसा जीतने में मदद करती हैं और वे उनको साथ लेकर आगे बढ़ती हैं. प्राय: ऐसे उदाहरण दिए जाते हैं कि चूंकि महिलाओं को परिवार और करियर के दो मोर्चो पर जूझना पड़ता है इसलिए वे करियर को लेकर गंभीर नहीं होती हैं. लेकिन ऐसा हरगिज नहीं है. इस बात को एक दूसरे पहलू से देखें तो तस्वीर ज्यादा साफ नजर आती है. अगर कोई महिला पारिवारिक जिम्मेदारियां संभालते हुए भी अपने करियर को आगे बढ़ा रही है तो इससे साफ जाहिर होता है कि वे करियर को लेकर गंभीर होने के कारण ही दोहरी मेहनत कर रही हैं. इन औरतों की करियर को लेकर प्रतिबद्घता पर भला कैसे शक किया जा सकता है? क्या इंदिरा नूई, चंदा कोचर, मेग व्हिटमैन और ऐसे ही तमाम उदाहरण इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि महिलाएं करियर को बहुत सधे हुए तरीके से आगे बढ़ा सकती है.



न औरतों से दुश्मनी न शॉपिंग से प्रेम


अगर आपको भी लगता है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है तो मेरी आपसे विनम्र प्रार्थना है कि प्लीज एकता कपूर के सीरियल्स देखना बंद कर दीजिए.
दूसरी बात यह मानना बंद कीजिए ही तमाम महिलाएं शॉपिंग की दीवानी होती हैं। आपको सच जानना हो तो टीवी सीरियल्स की दुनिया से बाहर निकल उस समाज के बंद दरवाजों के पीछे झांकिए जहां कदम कदम पर मर्दवादी ताले पड़े हुए हैं. आपको जाने कितनी औरतें चहारदीवारी में बंद एक दूसरे का सहारा बनती नजर आएंगी. ईष्र्या, द्वेष और षडयंत्र की जिस दुनिया की कल्पना हम महिलाओं के आपसी रिश्तों में करते हैं वह दुनिया महिला या पुरुष से इतर हर किसी के लिए एक समान विद्यमान है. कृपया इसे औरतों के लिए सीमित न करें. लोगों को लगता है कि शॉपिंग करके हमें जीवन की तमाम खुशियों मिल जाती हैं लेकिन हकीकत ऐसी नहीं है. हां, यह टाइम पास करने का जरिया हो सकता है लेकिन यह हमारी खुशियों की चाबी नहीं है. पुरुषों की तरह हमें भी नई जगहों पर जाना, एडवेंचरस कामों में हिस्सा लेना, जीवन में नए प्रयोग करना पसंद है लेकिन पता नहीं कब और कैसे यह बात फैक्ट की तरह स्थापित हो गई कि हमें केवल शॉपिंग करना ही भाता है, वह दरअसल शौक नहीं हमारी मजबूरी है. आखिर कितने ऐसे पुरुष हैं जिनको यह पता होगा कि उनके घर में कौन सी चीज घटी हुई है. किराने से लेकर पति के कपड़ों तक ज्यादातर चीजें खरीदने का जिम्मा जब वाइफ पर होगा तो यह उसका शौक हुआ या मजबूरी? हां यह जरूर है कि जब मजबूरी में इतना कुछ करेंगे तो थोड़ा बहुत तो अपने शौक के लिए भी करना बनता है.



न पैसे से प्यार न ही बातूनी हैं हम...


यह बात एकदम बकवास है कि हम लड़कियां बहुत कैलकुलेटिव होती हैं. और उसी लड़के से शादी करना पसंद करती हैं, जिसकी इनकम अच्छी खासी हो. अगर मेरा होने वाला पति मुझसे ऐसा कुछ कहता है तो मेरा जवाब यही होगा कि देखो यार, मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि तुम कितना कमाते हो, या हमारी पहली डेट पर तुमने कितनी महंगी कमीज या घड़ी पहन रखी थी. एक बात साफ-साफ समझ लो यह जो तुम रोज रोज मेरे सामने पैसे के किस्से उछालते रहते हो न कि यह प्रॉपर्टी इतने की है, वह गाड़ी या मोबाइल उतने का है. जब तुम रुपये-पैसे के आंकड़ों का जिक्र करते हो न तो मेरे सिर पर वे कंकड़ की तरह बरसते हैं. मेरे लिए इतना काफी है कि हम दोनों वक्त अच्छा खाना खाएं, ठीकठाक कपड़े पहनें और एक दूसरे के साथ थोड़ा क्वालिटी टाइम बिताएं. अगर हमारे बीच स्नेह नहीं होगा, एक दूसरे को लेकर चिंता और फिक्र नहीं होगी, आपसी सम्मान नहीं होगा तो ये रुपये पैसे भला किस काम आएंगे पार्टनर?

मजाक में ही सही लेकिन बोलने के मामले में अक्सर महिलाओं की तुलना टेप रिकॉर्डर से कर दी जाती है. कहा जाता है कि वे एक बार बोलना शुरू कर देती हैं तो फिर बंद ही नहीं होतीं. लेकिन आपने कभी यह सोचा है हमें इतना अधिक बोलना क्यों पड़ता है? क्योंकि आप हमें सुनना ही नहीं चाहते. ईमानदारी से जरा दिल पर हाथ रखकर कहिए न आखिरी बार कब आपने हमारी बात को तवज्जो देकर सुना था और उस पर अपनी राय दी थी. नहीं आपके पास उसके लिए वक्त नहीं है, आप दिन भर ऑफिस में या काम पर व्यस्त रहते हैं और लौटने पर अगर हम दिल की कोई भी बात शेयर करना चाहें तो आपके पास रेडीमेड जवाब होता है-यार काम से थक कर आया हूं दिमाग मत चाटो. अब आप ही बताइए ऐसे में हमारे पास किसी तरह अपनी बात कहने के अलावा क्या दूसरा कोई चारा बचता है? नहीं.


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पूजा सिंह 

भोपाल से पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद दैनिक भास्कर, नेटवर्क-१८, इंडो-एशियन न्यूज सर्विस में काम किया.  इन दिनों तहलका में वरिष्ठ उप सम्पादक.

बुधवार, 4 अगस्त 2010

वी एन राय की यह करतूत माफी के लायक नहीं है-अल्पना मिश्र

यह पुलिसिया रवैया बर्दाश्त नहीं है

संदर्भ - पुलिस अधिकारी एवं कुलपति वी एन राय के द्वारा नया ज्ञानोदय पत्रिका के साक्षात्कार में महिला लेखिकाओं पर की गयी अपमानजनक टिप्पणी

शर्मनाक और दुखद है कि हिंदी साहित्य में अपने को प्रचारित करने के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति जैसे जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति सस्ता प्रचार पाने के लिए किसी भी प्रकार की अमर्यादित भाषा अर्थात गाली की भाषा का प्रयोग करता है और लेखिकाओं को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का दुस्साहस करता है।हिंदी में चली आयी इस प्रवृत्ति पर तुरंत लगाम कसने की जरूरत है, क्योंकि यह वही सामंती मानसिकता है जो हमेशा ही स्त्री को गुलाम के रूप में देखने की आदी रही है। ये सामंती मनोरोग के शिकार लोग अपनी सत्ता के मद में इतने चूर हैं कि देख ही नहीे सकते कि स्त्रियों ने साहित्य स ेले कर सभी क्षेत्रों में अपनी जगह बनाने के लिए लम्बा संघर्ष और कड़ी मेहनत की है और यह भी कि उन्हें इस तरह सार्वजनिक मंच से गाली दे कर आसानी से अब नहीं निकला जा सकता है।
हैरत होती है कि यह हमारे पढ़े लिखे समाज से आए लोग हैं जो पत्रिका की बिक्री बढ़ाने के लिए ऐसे चटपटे साक्षात्कार छापते हंै और लेखिकाओं को अपमानित करने वाली टिप्पणी को संपादित करना भूल जाते हंै और उनके साथ सामंतवाद के ये प्रतिनिधि हैं, शिक्षा और साहित्य से जिन्होंने कुछ भी नहीं सीखा। वी एन राय जैसे लोगों को यह नागवार गुजर रहा है कि महिलाएं साहित्यकार कहला रही हैं। उनकी अपनी पहचान है और हिंदी का बड़ा पाठक वर्ग उनके लिखे को पढ़ता है। राय जी की इस कुंठा ने उन्हें इस सार्वजनिक अभद्रता की स्थिति तक पॅहुचा दिया है और उनके व्यक्तित्व की कलई खोल दिया है।

यह और भी हास्यास्पद लगता है जब वी एन राय टी वी चैनलों पर अपने वक्तव्य के गाली वाले शब्दों की निर्लज्ज व्याख्या करते हुए अपने बचाव की कोशिश करते दिखते हैं। तिस पर उनका रूतबा इतना है िकवे टी वी के एक चैनल पर यह भी कह डालते हैं कि उनकी यह टिप्पणी विवाद नहीं बहस का विषय है। इसी समाज में बहुत संभव है कि कुछ महापुरूष उनका मनोबल बढ़ाएं और पीठ पीछे उन्हीं पर हॅसें।

यह घोर यशलिप्सा का वीभत्स उदाहरण है कि किसी भी हाल में निचले दर्जे की सस्ती लोकप्रियता हासिल की जाए, ऐसा ही कुछ वी एन राय की इस प्रायोजित कुचर्चा का भी लक्ष्य है और वह उन्हें मिल भी गयी है। कम से कम अब उनकी पहचान इस प्रसंग के बिना अधूरी होगी। उन्हें यह पता होना चाहिए कि न फिल्मों में गाॅसिप से कोई बड़ा कलाकार बनता है और न साहित्य में गाली बकने से कोई साहित्यकार बन सकता है।

उनके दुस्साहस का दूसरा अद्भुत नजारा स्टार न्यूज पर माफी मांगते हुए दिखता है, जब वे नाटकीय अंदाज के साथ यह कहते हैं कि ‘ वे महिला लेखिकाओं से माफी मांगते हैं, क्योंकि बहुत सी लेखिकाएं उनकी मित्र हैं।’ चोरी पर सीनाजोरी जैसी माफी है यह। जो लेखिकाएं उनकी मित्र होंगी, इस तमाशे और फिर इस माफीनामे से उन सबका सिर शर्म से जरूर झुक गया होगा।

मुझे उम्मीद है कि वी एन राय के इस कारनामे के बाद कोई भी महिला लेखिका उनके द्वारा आयोजित किसी भी कार्यक्रम में नहीं जाएगी, जो उनकी मित्र हैं, यदि उनमें भी जरा आत्मसम्मान होगा तो वे भी नहीं जाएंगी। वी एन राय की यह करतूत माफी के लायक नहीं है। मुझे उम्मीद यह भी है कि पूरे देश के महिला संगठन इस पर चुप नहीं बैठेंगे और न लेखिकाएं ही इसे सहन करेंगी। यह लड़ाई केवल मैत्रेयी पुष्पा की लड़ाई नहीं, उनके साथ हम सब की लड़ाई है।

- अल्पना मिश्र
दिल्ली

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