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मंगलवार, 7 जून 2016

आधुनिकता-भावनात्मकता-प्रतिरोध - लाल्टू

वरिष्ठ कवि और चिन्तक लाल्टू जी ने यह लेख इस नोट के साथ  भेजा  था
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भोपाल से एक पत्रिका आती है 'गर्भनाल'।
उनके लिए बीच-बीच में लिखता रहा हूँ। मैंने देखा है कि बड़े-बड़े लोग लिखते हैं उनके लिए।
यह आलेख संपादक जी नहीं छाप सकते, उन्होंने बड़ी विनम्रता से लिखा है कि उन्हें पहले दो पैरा ठीक नहीं लग रहे। उनका निर्देश है कि मैं कोई पहले का उदाहरण लूँ। मैं उनकी दिक्कत समझता हूँ। बदकिस्मती मेरी है कि मेरा हाजमा पहले से ही काफी बिगड़ा हुआ है, उसे और बिगाड़ नहीं सकता।

                                                                                                                  -लाल्टू
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जे एन यू के छात्र उमर खालिद ने हाल में कोलकाता में भारतीय संघ के भवन में छत्तीसगढ़ की समस्याओं पर व्याख्यान दिया। सभागार के बाहर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ए बी वी पी के कार्यकर्त्ता विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इसकी वजह से ट्रैफिक में कुछ समस्याएँ हो रही थीं। एक बस में किसी सवारी ने पूछा, यहाँ क्या हो रहा है। किसी दूसरे ने जवाब दिया, अरे वह उमर खालिद है न, जिसने देशद्रोही नारे लगाए थे, वह आया हुआ है। किसी तीसरे ने कहा, अरे उसेे अभी तक गिरफ्तार नहीं किया। एक युवा स्त्री ने कहा कि आपलोग क्या कह रहे हैं, आपको पता नहीं कि यह सब झूठ है। जाली वीडियो दिखलाकर यह झूठ फैलाया गया था। तो कई लोग चिल्ला उठे कि इसे पीट कर गाड़ी से उतार दो।

इस घटना में एक तर्कशीलता है जो आधुनिक पूँजीवाद और सामंती समाज की गड्ड-मड्ड संस्कृति से निकलती है। कई लोग हैं जो इस बात के प्रति उदासीन हैं कि हमारे समाज में कई लोगों को या तो उमर खालिद से या उसके मुसलमान नाम से नफ़रत है, पर वे हम आप जैसे भले और सचेत भी दिखना चाहते हैं, तो वे कहेंगे कि यह सब आधुनिकता की वजह से, अंग्रेज़ों की वजह से, औपनिवेशिक शासन की वजह से है। यानी कि उस दिन उस वक्त बस में उस युवा स्त्री को एक बुज़ुर्ग ने सँभाल न लिया होता तो उसकी पिटाई और पता नहीं जो कुछ भी हो सकने की संभावना थी, उसे भूल जाएँ और अंग्रेज़ों को कोस लें तो सब ठीक दिखने लगेगा। जिस तर्कशीलता के साथ मैं अपने मित्रों की आलोचना कर रहा हूँ, यह भी आधुनिकता से ही आई है। ऐसी अलग-अलग युक्तियों में से हम कोई एक पक्ष चुनते हैं और उसे अपने तर्कों के साथ आगे बढ़ाते हैं। मित्रों को लगता है कि वे ठीक हैं, मुझे लगता है कि मैं ठीक हूँ। अक्सर दोनों पक्षों में से कोई एक ही सही होता है, पर यह ज़रूरी नहीं कि हमेशा ऐसा हो और अगर हो भी तो पूरी तरह यानी सौ फीसद सही हो। अपने पक्ष की सीमाओं को समझने में हमें लंबा समय लग सकता है और कभी-कभी तो हम उसे कभी नहीं समझ सकते।

कुछ साल पहले का एक उदाहरण लें। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एन सी ई आर टी) की 2006 में तैयार की गई ग्यारहवीं की राजनीति-शास्त्र की पाठ्य-पुस्तक में कोई तीस कार्टून डाले गए। इसके पीछे मासूम सा तर्क था कि बच्चे कार्टून का मजा लेते हुए पाठ के विषय-वस्तु में रुचि लेने लगेंगे। वैसे तो यह सही बात है और इस तरह के शैक्षणिक प्रयोग पिछली सदी के आखिरी दशकों में दुनिया भर में हुए हैं। किताब में एक अध्याय भारत के संविधान पर था और यह समझाने के लिए कि संविधान के लिखे जाने में तक़रीबन तीन साल लग गए, प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर का 1949 में छपा एक कार्टून डाला गया था। इसमें दिखलाया गया था कि भारत की जनता एक गोल चक्कर के बाहर अधीरता से इंतज़ार कर रही है कि संविधान जल्दी तैयार हो और अखाड़े में संविधान लिखने वाली समिति के अध्यक्ष आंबेडकर एक घोंघे पर बैठे हुए हैं। पीछे से उन दिनों की कार्यकारी सरकार के प्रमुख जवाहरलाल नेहरु एक चाबुक लेकर खड़े हैं कि घोंघे को जल्दी दौड़ाया जाए। जाहिर है इस कार्टून के पीछे अंग्रेज़ी का "स्नेल'स पेस" (घोंघे की चाल) वाला मुहावरा था, कि भई अब कामकाज की गति बढ़ाओ, कब तक लोग इंतज़ार करेंगे। इस कार्टून पर 2010 से पहले कुछ, और जल्दी ही बड़ी तादाद में, लोगों ने आपत्ति जतानी शुरु की। 2012 तक ऐसा लगने लगा कि भारतीय बौद्धिक समाज दलित और गैर-दलित, दो तबकों में बँट गया है। दलितों और गैर-दलितों के बीच बृहत्तर समाज में जो संकट का संबंध है, वह बौद्धिकों में तीखी बहस बन कर सामने आ गया। दलित और गैर-दलित चिंतकों के बीच ध्रुवीकरण बढ़ता चला। अखबारों में, टी वी चैनलों पर जम कर बहस हुई। एन सी ई आर टी की पाठ्य-पुस्तक समिति के सदस्य जागरुक और सचेत लोग थे, बाकी समाज के लिए पथ-प्रदर्शक थे, फिर भी बहस चली। इसके एक दशक पहले प्रेमचंद की कहानियों पर भी ऐसा ही विवाद काफी तीखे तेवरों के साथ हुआ था।

आखिर कार्टून में पाठ को बेहतर ढंग से पढ़ाए जाने के अलावा और क्या पक्ष हो सकता था? कल्पना कीजिए कि देश के एक आम स्कूल में यह पाठ पढ़ाया जा रहा है। अध्यापक पाठ के मुताबिक समझा रहे हैं कि देश का संविधान कैसे बना। बच्चे पाठ में बनी तस्वीरों की तरह शर्ट निकर के साथ टाई पहने हो भी सकते हैं। मान लें कि कक्षा में सवर्ण और दलित दोनों पृष्ठभूमि के बच्चे हैं। ईमानदारी से हम मौजूदा स्थिति के बारे में सोचें तो हम देख सकते हैं कि अांबेडकर का घोंघे पर सवार होना किसी सवर्ण बच्चे को हास्यास्पद लग सकता है। वह इस कार्टून का इस्तेमाल किसी दलित बच्चे को तंग करने के लिए कर सकता है। अांबेडकर के ठीक पीछे नेहरू का चाबुक लिए खड़े होना कार्टून को और भी जटिल बना देता है।

प्रताड़ित जन की प्रतिक्रिया कैसी होती है, विश्व इतिहास में इसके बेशुमार उदाहरण हैं। साठ के दशक में, जब अमेरिका में काली चमड़ी के लोगों को बराबरी का नागरिक अधिकार देने का आंदोलन शिखर पर था, जिसमें कई गोरे लोग भी शामिल थेप्रसिद्ध अफ्रो-अमेरिकी कवि इमामु अमीरी बराका (मूल ईसाई नामः लीरॉय जोन्स) ने लिखाः- 'ब्लैक डाडा निहिलिसमुस। रेप द ह्वाइट गर्ल्स। रेप देयर फादर्स। कट द मदर्स थ्रोट्स।' कोई भी इस हिंसक कविता को सभ्य अभिव्यक्ति नहीं कहेगा। सिर्फ जाति नहीं, आर्थिक वर्ग आधारित निपीड़न भी हिंसक प्रतिक्रिया पैदा करता है। अभी हाल तक कोलकाता शहर में दीवारों पर सुकांतो भट्टाचार्य की ये पंक्तियाँ पढ़ी जा सकती थीं - 'आदिम हिंस्र मानविकतार आमि यदि केऊ होई, स्वजन हारानो श्मशाने तोदेर चिता आमि तूलबोई।' बराका की हिंसात्मक अभिव्यक्ति आज भी यू ट्यूब पर संगीत के साथ सुनी जा सकती है। गोरे लोगों के समाज ने इसका विरोध किया या नहीं, इसका कोई दस्तावेज नहीं है, पर अफ्रो-अमेरिकी स्त्रियों ने प्रतिवाद किया, यह इतिहास है। एलिस वाकर ने तो इस पर कहानी, उपन्यास तक लिखे - उनके उपन्यास 'मिरीडियन' में यह दिखलाया गया है कि किस तरह काले लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने आई एक गोरी लड़की का एक काला युवक ग़लत फायदा उठाता है।

बहरहाल हमें गैरतार्किक लगती स्थितियों तक कोई कैसे पहुँचता है, इस पर बेशुमार साहित्य लिखा गया है। 1949 में ही एक अफ्रो-अमेरिकी कवि लैंग्स्टन ह्यूज़ ने लिखा थाः- ह्वाट हैपेन्स टू अ ड्रीम डिफर्ड? दरकिनार किए गए सपने का क्या हश्र होता है? / क्या वह किसमिस के दाने की तरह धूप में सूख जाता है? / या वह घाव बन पकता रहता है? / क्या उसमें सड़े माँस जैसी बदबू आ जाती है?/ या वह मीठा कुरकुरा बन जाता है....?  शायद उसमें गीलापन आ जाता है और वह भारी होता जाता है / या फिर वह विस्फोट बन फूटता है?

प्रसिद्ध इतिहास लेखक हावर्ड ज़िन ने अपनी किताब में एक अमेरिकी कहावत का ज़िक्र किया है, 'ग़रीब की आह हमेशा न्याय-संगत हो, यह ज़रूरी नहीं; पर अगर तुम उसे सुनोगे नहीं, तो तुम जान ही नहीं पाओगे कि न्याय क्या है।'

तो हम कैसे तय करें कि सही और ग़लत क्या है। सच यह है कि हममें से बहुत सारे लोग कभी नहीं जान पाएँगे कि दो विरोधी धारणाओं में से सही क्या हो सकता है। जीवन की तमाम प्रताड़नाएँ और असुरक्षाएँ हमारी इंसानियत को थोड़ा-थोड़ा कर खाती रहती हैं, और हममें से कई इसे इस हद तक खो बैठते हैं कि हम वापस पूरे इंसान नहीं बन सकते हैं। अच्छी बात यह है कि हममें से अधिकतर लोग इस बीमारी से निदान पा सकते हैं। वक्त के साथ इंसान में सहनशीलता और विरोधी धारणाओं के साथ जीने की क्षमता बढ़ी है। पिछली सदी के बीच के दशकों तक यह माना जाता था कि तर्कशीलता ही हमें सही राह पर ले जा सकती है। पर यह स्पष्ट होता गया कि विरोधी धारणाओं के अपने-अपने तर्क होते हैं और तर्कशील सोच हमें सही या ग़लत दोनों तरह के निष्कर्षों पर ले जा सकती है। मेरी अपनी तर्कशीलता मुझे बतलाती है कि राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता या इंसान को इंसान से बाँटने वाले सिद्धांत मानसिक बीमारियाँ हैं। पर औरों की तर्कशीलता उन्हें यह नहीं, बल्कि इसके विपरीत भी बतला सकती है। बीसवीं सदी के आखिर में यह दिखने लगा कि सिर्फ तर्कशीलता नहीं, बल्कि भावनात्मकता भी सत्य की ओर जाने का एक रास्ता है। जाहिर है कि भावनात्मक होना भी अक्सर हमें ग़लत दिशा में भी धकेलता है, पर कम से कम इतना तो कहा जा सकता है कि भावनात्मकता के साथ हम विरोधी विचारों के लोगों के साथ इंसानी रिश्ते बनाने के काबिल हो सकते हैं और उनकी सोच को जगह देने के काबिल होते हैं और मिलजुलकर आगे बढ़ने की कोशिश कर सकते हैं। असमंजस की स्थिति में समझदारी यह है कि हम उसकी सुनें जो उत्पीड़ित है। बाद में यह निर्णय ग़लत भी निकले तो उससे घबराना नहीं चाहिए, आज तक सामाजिक-राजनैतिक अखाड़ों में जिन निर्णयों को सही माना जाता रहा है, उनमें से अधिकतर बाद में ग़लत साबित हुए हैं।

जिसे आम तौर पर आधुनिकता कहा जाता है, सत्रहवीं सदी के बाद से यूरोप में प्रबोधन-काल (इनलाइटेनमेंट) से आए वैचारिक बदलावों के उस समूह में आधुनिक वैज्ञानिक तर्कशीलता पर जोर बढ़ता रहा। आधुनिक विज्ञान की यह ताकत भी है और कमजोरी भी कि इसमें सिद्धांतत: भावनात्मकता के लिए कोई जगह नहीं है। पर वैज्ञानिक तो आखिर इंसान है, इंसान सामाजिक प्राणी है, इसलिए विज्ञान के पेशे में वे सारे पूर्वग्रह मौजूद हैं, जो वर्ग, जाति, लिंग आदि आधारित भेदभावों से भरे बृहत्तर समाज में है। इसलिए अगर हमारी सोच सिर्फ वैज्ञानिक तर्कशीलता पर आधारित हो और हम भावनात्मक रुप से विज्ञान के पेशे की सीमाओं को नहीं पहचान पाते, तो हम सामाजिक पूर्वग्रहों से कभी मुक्त नहीं हो पाएँगे। यह विरोधाभास सा लगता है, क्योंकि भावनात्मकता से रहित विज्ञान से यह अपेक्षा होती है कि वह हमें सामाजिक पूर्वग्रहों से ऊपर ले जाए, पर ऐसा होता नहीं है। दरअस्ल बौद्धिक कर्म करने वालों की अलग-अलग जमातों में वैज्ञानिक ही संभवत: सबसे अधिक संरक्षणशील होते हैं। इसलिए दुनिया भर में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि उच्च-स्तर पर विज्ञान और तकनीकी शिक्षा लेने वालों को जहाँ तक हो सके समाज-शास्त्र और मानविकी (अदब समेत) भी पढ़ाया जाए। बगैर पर्याप्त भावनात्मक विकास के एक वैज्ञानिक महज एक मशीन है।

यूरोपी आधुनिकता और इसकी तर्कशीलता से जो और बातें आई है, उनमें आधुनिक 'राष्ट्र' की धारणा प्रमुख है। यह एक ऐसी अजीब धारणा है, जो हमें अपने ही अंदर दुश्मन ढूँढने को कहती है। जो भी मुख्यधारा की भाषा, संस्कृति, मजहब का नहीं है, वह मेरा दुश्मन है। राष्ट्र की यह धारणा हमारी इंसानियत को बड़ी तेजी से खत्म करती है। यह कहा जा सकता है कि आज समूची दुनिया में हर मुल्क के लोग इस आधुनिक बीमारी से ग्रस्त हैं। इसलिए एक मुल्क का नागरिक दूसरे मुल्क के नागरिकों के साथ भावनात्मक रुप से नहीं जुड़ पाता, यहाँ तक कि अपने ही मुल्क में अल्पसंख्यकों से हम भावनात्मक रुप से नहीं जुड़ पाते। एक दूसरे को मार कर अपने मृत को शहीद और दूसरे को दुश्मन कहते हैं, जबकि सच यह है कि मरने वाले तो मर जाते हैं, उनके बच्चे अनाथ हो जाते हैं। लगता ऐसा है कि लोग भावनात्मकता में बह जा रहे हैं, पर दरअस्ल होता यह है कि राष्ट्र आधारित तर्कशीलता हमारे भावनात्मक अस्तित्व को खा चुकी होती है। इसका फायदा उठाकर मुनाफाखोर पूँजीपति और फिरकापरस्त राजनैतिक गुटबंदियाँ अपना स्वार्थ सिद्ध करती हैं। सरकारें जनता को भूखी और ग़रीबी की हालत में रखे अरबों-खरबों के शस्त्र खरीद कर जंग की तैयारी और दमन-तंत्र को मजबूत करती हैं।


इतना तो कहा ही जा सकता है कि सामाजिक सह-अस्तित्व का मनोविज्ञान जटिल है। इस जटिलता में हमारी भागीदारी क्या और कितनी है, हम यह समझ लें तो गैर-बराबरी की इस दुनिया में हम अपनी मुक्ति की ओर बढ़ सकते हैं। और दूसरी ओर जो विस्फोट हैं, उनको झेलने की ताकत हममें हो, इसकी कोशिश हम कर सकते हैं। अपनी मुक्ति के बिना किसी और की मुक्ति का सपना कोई अर्थ नहीं रखता। इसलिए आधुनिकता के उन पक्षों को जो हमें सत्ता और समाज पर सवाल खड़े करने की ताकत देते हैं, उनको पहचानने, जानने और अपनाने की ज़रूरत है। इस प्रतिरोधी प्रवृत्ति का भी एक भावनात्मक पक्ष हैजिसे हमें मजबूत करना होगा। उमर खालिद इसी प्रतिरोधी प्रवृत्ति का नायक है, और बस में भरी भीड़ की हिंसक मानसिकता के खिलाफ खड़ी होती युवा स्त्री भी।
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लाल्टू 
संपर्क : laltu10@gmail.com

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

निनाद : नई सरकार, अच्छे दिन और मुगालते

(कुलदीप कुमार पिछले कोई चार दशकों से सक्रिय हमारे समय के अत्यंत महत्त्वपूर्ण पत्रकार हैं. डा हिन्दू और जनसत्ता सहित तमाम जगहों पर नियमित लिखने वाले कुलदीप जी समसामयिक मुद्दों के साथ इतिहास पर अधिकार के साथ लिखते हैं. पाठकों को समयांतर में की गयी उनकी बहस याद होगी. हमारे अनुरोध पर उन्होंने अपने कालम नियमित रूप से हमारे ब्लॉग को उपलब्ध कराना स्वीकार किया है. इसके लिए जनपक्ष उनका आभारी है.)







जिन लोगों को यह मुगालता था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े अनेक संगठन हाशिये पर चले जाएंगे क्योंकि मोदी को पता है कि आर्थिक विकास तभी संभव है जब समाज में शांति हो, अब उनका यह मुगालता दूर हो जाना चाहिए। अरुण शौरी और मधु किश्वार जैसे मोदी के प्रशंसकों का कुछ अन्य कारणों से मोहभंग हो रहा है और मोदीनामा लिखकर और मोदी के पक्ष में धुआंधार प्रचार करके (कु)ख्याति अर्जित करने वाली मधु किश्वार को अब यह संदेह होने लगा है कि मोदी पर काला जादू कर दिया गया है। जब विकासशील समाज अध्ययन केंद्र जैसे प्रतिष्ठित शोध संस्थान में प्रोफेसर के पद पर आसीन व्यक्ति काले जादू की बात करे तो स्वाभाविक तौर पर आश्चर्य तो होता ही है।

इस समय मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी में ज़िम्मेदारी के पदों पर बैठे लोग रोज जिस तरह के बयान दे रहे हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सद्भाव की बातें करने वाले इन लोगों के असली उद्देश्य इनसे ठीक उल्टे हैं। अगर देश की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित कराना चाहती हैं और कह रही हैं कि इस बारे में केवल औपचारिक घोषणा होना ही बाकी है, तो इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि आज भी देश में संविधान का शासन है और संविधान भारत को एक प्रभुसत्तासंपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के रूप में परिभाषित करता है। भले ही आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद का लक्ष्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है, लेकिन अभी वह बना नहीं है। संविधान का पालन करने की शपथ लेकर मंत्री बनने वालों को इस बुनियादी सचाई को भूलना नहीं चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि पिछली मई में सत्ता में आने के बाद से भारतीय जनता पार्टी के नेता और समर्थक कुछ इस तरह का बर्ताव कर रहे हैं जैसे इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत मिला हो। इन दिनों नरेंद्र मोदी की आलोचना करने को प्रधानमंत्री पद का अपमान बताया जाता है। ये लोग भूल जाते हैं कि भारतीय संसदीय लोकतन्त्र के इतिहास में जैसा जनादेश राजीव गांधी को मिला था, वैसा आज तक किसी को नहीं मिला। लेकिन जब भाजपा नेता संसद में और संसद के बाहर गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है के नारे लगाते थे, तब किसी को यह ख्याल नहीं आया कि यह प्रधानमंत्री पद का अपमान है। न तब जब लालकृष्ण आडवाणी मनमोहन सिंह को देश का सबसे निकम्मा प्रधानमंत्री बताया करते थे।

बहरहाल
, संविधान के अनुसार देश के सभी नागरिक समान हैं चाहे उनके धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग और समुदाय कुछ भी क्यों न हों। अस्पृश्यता कानूनन अपराध है क्योंकि उसका आधार जन्म के आधार पर किसी जातिविशेष को नीच और अछूत मानना है। इसी तरह लिंग के आधार पर भी किसी को श्रेष्ठ या हीन नहीं माना जा सकता। लेकिन गीता में कृष्ण अर्जुन से क्या कहते हैं? “मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।। (हे अर्जुन, मेरा आश्रय करके स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र अथवा अंत्यज आदि जो पापयोनि वाले हैं, वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।) यह कहने से पहले वे अर्जुन को यह बता चुके होते हैं:  "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः" (गुण कर्म के विभाग से मैंने ही चारों वर्णों को उत्पन्न  किया है). तो क्या हम अब मान लें कि  वर्णव्यवस्था ईश्वरीय विधान है और स्त्रियां, वैश्य एवं शूद्र पापयोनि में जन्मे हीन  लोग हैं?

भारत का राष्ट्रीय ग्रन्थ उसका संविधान है, किसी अन्य ग्रन्थ को उसकी जगह लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। शब्दछल का सहारा लेने में माहिर भाजपा के नेता अब यह दावा भी कर रहे हैं कि गीता किसी एक धर्म से जुड़ी पुस्तक नहीं है। वह तो सार्वजनीन है और दर्शन एवं कर्मयोग का ग्रंथ है। सुषमा स्वराज तो उसके जरिये अनेक मानसिक परेशानियों का इलाज करने की वकालत भी करती हैं। लेकिन क्या कोई बताएगा कि यदि गीता हिन्दू धर्म से जुड़ा ग्रंथ नहीं है तो फिर अदालतों में सिर्फ हिन्दू ही उस पर हाथ रख कर कसम क्यों खाते हैं, किसी और धर्म के अनुयायी क्यों नहीं?

शब्दछल के सहारे का एक और उदाहरण है धर्मपरिवर्तन को पुरखों के घर वापसी का नाम देना। एक समय था जब विश्व हिन्दू परिषद इसे परावर्तन कहा करती थी। आरएसएस के इस संगठन की भारत के अलावा लगभग नब्बे देशों में शाखाएँ हैं। संघ की तरह ही इसका अंतिम लक्ष्य भी भारत को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करना है। आगरा में जिस तरह से स्लम में रहने वाले गरीब मुसलमानों को लोभ-लालच देकर उनकी घर वापसी का नाटक किया गया, वह उन सभी नाटकों की एक कड़ी भर है जो पिछले दो साल से उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़ और अलीगढ़ जैसे अनेक जिलों में खेले जा रहे हैं। इन सबका उद्देश्य विधानसभा चुनाव के पहले राज्य में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण है। वरना ईसाइयों के पवित्र त्यौहार क्रिसमस के दिन अलीगढ़ जैसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर में बड़े पैमाने पर मुसलमानों के सामूहिक धर्मपरिवर्तन का कार्यक्रम बनाने का मतलब क्या है?

यहाँ यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि जनवरी 1989 में हुए धर्म संसद के अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में विस्तार से उन कदमों की चर्चा की गई थी जो भारत में हिन्दू राष्ट्र की पुनर्स्थापनाके लिए उठाए जाने आवश्यक हैं। इस प्रस्ताव का अंतिम बिन्दु था: “राष्ट्रीय शिक्षा नीति में नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत और योग की अनिवार्य शिक्षा और प्रशिक्षण शामिल किए जाएँ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाव पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया है। इस  पर किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन यह संयोगवश नहीं है कि इसी के साथ-साथ केन्द्रीय विद्यालयों से जर्मन हटाकर संस्कृत को ले आया गया है।

यह भी अकारण नहीं है कि मोदी सरकार की एक मंत्री  उन लोगों के लिए गाली का प्रयोग करती हैं जो रामजादोंके श्रेणी में नहीं आते। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज अपने दिल की बात जुबान पर ले आते हैं और महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को राष्ट्रभक्तबताते हैं। आज संघ कुछ भी कहे, वह अपने उस इतिहास को मिटा नहीं सकता जो महात्मा गांधी के प्रति घृणा से भरा हुआ है। यह भी अकारण नहीं है कि भाजपा की उत्तर प्रदेश राज्य इकाई के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन लक्ष्मीकांत वाजपेयी ताजमहल को हिन्दू राजा का महल बताते हैं और वही (कु)तर्क दुहराते हैं जो लगभग छह दशक पहले पुरुषोत्तम नागेश ओक ने दिये थे और जिन्हें हिंदुत्ववादियों के अलावा दुनिया में कोई नहीं मानता। ओक अपने नाम के साथ प्रोफेसर लगाया करते थे और अपना परिचय विश्व इतिहास पुनर्लेखन संस्थान के अध्यक्ष के रूप में देते थे। उनके अनुसार कुतुब मीनार विष्णुध्वज है और लालकिला एवं जामा मस्जिद जैसी सभी इमारतें हिंदुओं द्वारा बनवाई हुई हैं।


इन अच्छे दिनों में जब देश का प्रधानमंत्री स्वयं प्राचीन भारत में आज से भी अधिक उन्नत विज्ञान और चिकित्सा होने का दावा कर रहा है, जब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का अध्यक्ष कह रहा है कि रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों में वर्णित सभी घटनाएँ वास्तव में ठीक वैसे ही घटी थीं, तब यदि ओक की मान्यताओं को एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता साम्प्रादायिक राजनीति करने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है तो इसमें आश्चर्य कैसा?

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

आप का उभार और वाम दल

दिल्ली के चुनावों में अप्रत्याशित सफलता और चुनाव के बाद के समीकरणों के सहारे सत्ता तक पहुँचने के बाद आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविन्द केजरीवाल को लेकर चर्चाएँ  स्वाभाविक रूप से ज़ारी हैं. भ्रष्टाचार के विरोध तथा जन लोकपाल के समर्थन में शुरु हुए आन्दोलन से लेकर राजनीतिक दल के रूप में मुख्यधारा की पार्टियों के एक विकल्प के रूप में उनके उभार ने आगामी लोकसभा चुनावों के समीकरणों को बुरी तरह से प्रभावित किया है. एक ओर दस साल से सत्ताशीन कांग्रेस पार्टी की उम्मीदों को हालिया विधानसभा चुनावों ने बड़ा धक्का लगाया है तो दूसरी तरफ लकड़ी के लाल किले से असली वाले तक के सफ़र के लिए बेक़रार नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भी इस नए उभार के असर को पूरी तरह से समझ नहीं पा रही और कभी कांग्रेस के खिलाफ़ लगने वाले इस आन्दोलन का सहयोग और समर्थन करने वाला संघ गिरोह अब इसे कभी एन जी ओ वादी से लेकर माओवादी बता रहा है तो कभी कांग्रेस से अंदरखाने के गठबंधन का आरोप लगा रहा है. क्षेत्रीय छत्रप अभी भी विभ्रम की सी स्थिति में हैं. यह संकट वाम दलों के भीतर भी है. एक तरफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात इसे गैर बीजेपी-गैर कांग्रेस दलों का हिस्सा बताते हुए तीसरे मोर्चे के लिए ज़रूरी बता रहे हैं तो दूसरी तरफ वाम बुद्धिजीवियों का एक बड़ा हिस्सा इनकी जबरदस्त आलोचना में लगा है. इसके अलावा खासतौर पर वाम दलों के हमदर्द लोगों का एक बड़ा हिस्सा इस उभार को इस रूप में सकारात्मक मान रहा है कि इन्कलाब तो जब होगा तब होगा, अभी कम से कम साम्प्रदायिक भाजपा और भ्रष्ट कांग्रेस का एक विकल्प तो मिला जो अपने आउटलुक में जनपक्षधर और आम आदमी जैसा दिखता है.यही नहीं तमाम लोगों को ऐसा लग रहा है कि केजरीवाल मोदी के उस रथ को रोकने में सक्षम हो सकते हैं जो कर पाना अभी अनुपस्थित तीसरे मोर्चे या कांग्रेस के लिए मुश्किल लग रहा था.

देखा जाय तो जिस दौर में जन लोकपाल का आन्दोलन अन्ना के नेतृत्व में शुरू हुआ था, उस समय कमोबेश सभी संसदीय  वाम दलों ने इस आन्दोलन का समर्थन किया था और माले तथा इसकी छात्र इकाई आइसा ने तो इसमें सक्रिय हिस्सेदारी भी की थी और इस पूरे आन्दोलन में हुए इकलौते लाठीचार्ज को इसी संगठन के साथियों ने झेला था. जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण ने उस दौर में लिखे अपने एक लेख में (जो तीन क़िस्तों में मृत्युबोध नामक ब्लॉग और जसम की पत्रिका समकालीन जनमतमें प्रकाशित हुआ) लिखा था– “अमेरिका से बेहतर कोई नही जानता कि यह आन्दोलन महज़ लोकतंत्र के किसी बाहरी आवरण तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें एक साम्राज्यवाद विरोधी संभावना है...आईडेंटिटी पालिटिक्स के दूसरे भी कई अलंबरदार इस आन्दोलन को ख़ास जाति समूहों का आन्दोलन बता रहे हैं. पहले अनशन के समय रघुवंश प्रसाद सिंह के करीबी कुछ पत्रकार इसे वाणी दे रहे थे. अभी कल हमारे मित्र चंद्रभान प्रसाद इसे सवर्ण आन्दोलन बता रहे थे एक चैनल पर. यह वही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने आज की बसपाई राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग यानी ब्राह्मण-दलित गठजोड़ का सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत करते हुए काफी पहले ही यह प्रतिपादित किया था कि पिछड़ा वर्ग आक्रामक है, लिहाजा रक्षात्मक हो रहे सवर्णों के साथ दलितों की एकता स्वाभाविक है.  यह यही चंद्रभान जी हैं जिन्होंने गुजरात जनसंहार में पिछड़ों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार बताते हुए इन्हें हूणों का वंशज बताया था. अब सवर्णों के साथ दलित एकता के इस 'महान' प्रवर्तक को यह आन्दोलन कैसे नकारात्मक अर्थों में महज सवर्ण दिख रहा हैवफ़ा सरकार और कांग्रेस के प्रति जरूर निभाएं चंद्रभान, लेकिन इस विडम्बना का क्या करेंगें कि मायावती ने अन्ना का समर्थन कर डाला है.”  आश्चर्यजनक तौर पर बाद के दौर में जब किरण बेदी, जेनरल वी के सिंह और रामदेव जैसे लोग अरविन्द केजरीवाल से दूर हो गए और उन्होंने राजनीतिक दल बनाने के बाद न केवल कांग्रेस और भाजपा दोनों पर सामान रूप से हमला बोला बल्कि अपने घोषणापत्र में आरक्षण के समर्थन में स्पष्ट घोषणा की तो धीरे धीरे माले न इस मुद्दे पर एक चुप्पी सी बना ली. जबकि  सबसे स्वाभाविक तो यह होता कि अपनी नीति को ज़ारी रखते हुए ये दल आप के सक्रीय सहभागी की तरह सामने आते और चुनाव में भी गठबंधन करते. खैर, इसकी वज़ह क्या रही यह बता पाना मुश्किल है.

आप के उभार को एक तरफ़ यह साफ़ हो गया है कि जनता तथाकथित मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का विकल्प चाहती है तो दूसरी तरफ यह भी कि नब्बे के दशक के बाद लागू नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणाम अब जब सामने आने लगे हैं तो विकास के बड़े बड़े दावों के बीच जनता की असली ज़रूरतें अब भी वही हैं. साफ़ पानी, सस्ती बिज़ली, रहने को घर और सस्ता अनाज जैसी चीजें मुहैया कराने में असफल रहा विकास जनता नकार रही है यह कहना तो अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है इनके बिना वह किसी विकास माडल को स्वीकार करने को तैयार नहीं. आप जैसी पार्टी ने एक ओर तो बड़ी पार्टियों के दम्भ और हर चुनाव में दुहराए जाने वाले बासी वायदों के समक्ष आम आदमी वाली छवि सामने रखी तो दूसरी तरफ सबको प्रभावित करने वाले भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को सामने रख जनता को ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का जो वादा किया वह जनता के लिए अधिक विश्वसनीय और आश्वस्तिकारक था. हालाँकि विचारधाराहीनता की जो नीति उन्होंने अपनाई है उसको तुरत तो जनता ने तवज्जो नहीं दिया है लेकिन सस्ती बिज़ली जैसी नीतियाँ लागू करते समय कार्पोरेट्स के हितों से जो स्पष्ट टकराव होगा उस समय ‘आप’ के लिए तटस्थता की यह नीति अपना पाना मुमकिन न होगा और देखना होगा कि वह अपना पक्ष कैसे चुनती है.


यहाँ यह सवाल भी बार बार उठाया जा रहा है कि वाम दल, जिनकी जनपक्षधरता असंदिग्ध है और जो जनता के पक्ष में कारपोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ़ लगातार संघर्ष करते रहे हैं, वे जनता के समक्ष खुद को विकल्प के रूप में प्रस्तुत क्यों नहीं कर पाए? आज तमाम लोग न केवल यह सवाल कर रहे हैं बल्कि आप के उदाहरण से भारत के संसदीय वाम की आलोचना भी कर रहे हैं.  

तात्कालिकता से प्रभावित हो कोई अंतिम सत्य कहने के भ्रम पालने से बेहतर होगा कि इस पर थोड़ी देर रुक कर सोचा जाए. क्या आप जैसी कार्यवाही वाम दल कर सकते थे और वैसी ही सफलता हासिल कर सकते थे? क्या आप वाम दलों जैसा ही दल है? क्या आप की यह सफलता हर हाल में दीर्घजीवी है?

उदाहरण के लिए आप के आन्दोलन की मीडिया कवरेज़ को लिया जा सकता है. अखबारों और चैनलों की दुनिया से परिचित लोग जानते हैं कि वाम दलों से जुड़ी ख़बरों को बाक़ायदा ब्लैक आउट करने के निर्देश वाले चैनलों और अखबारों ने किस तरह पहले दिन से इस आन्दोलन को बढ़ा चढ़ा के कवर किया था. कारण स्पष्ट है. जहाँ वाम दल उन नीतियों का ही विरोध करते हैं जो कार्पोरेट्स की लूट को संवैधानिक स्वीकृति देते हैं, अन्ना का आन्दोलन या फिर अब केजरीवाल की पार्टी संविधान द्वारा स्वीकृत नीतियों को ही पूरी ईमानदारी से लागू कराने की बात करते हैं. इनमें किसी आमूलचूल परिवर्तन की कोई बात होने की जगह इसी व्यवस्था को थोड़ा और सहनीय बनाने की कोशिश है जो अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में जनता को ही नहीं कार्पोरेट्स के एक बड़े हिस्से को भी बेहतर लगती हैं. ईमानदार सरकारी तंत्र और कारपोरेट सहयोगी सरकारी नीतियों का जोड़ा लूट के तंत्र को बनाए रखने का सबसे सहज तरीक़ा है जिसके तहत बाक़ायदा सरकारी पुलिस हड़ताली मज़दूरों को गिरफ्तार करती है और मालिकान को सुरक्षा देती है तथा न्यायालय हड़ताल को ग़ैरकानूनी घोषित करते हैं. ज़ाहिर है उन्हीं मज़दूरों को नेतृत्व देने वाले दल न मालिकान की पसंद हो सकते हैं न ही उनके अखबारों या चैनलों के तो जो इमेज बिल्डिंग का पूरा तंत्र है वह उन्हें कभी वह जगह नहीं दे सकता है जो आप या ऐसे किसी अन्य दल को.

ऐसे में आप या उसकी कार्यविधि से वाम दलों की तुलना उचित नहीं होगी. लेकिन सारा ठीकरा कार्पोरेट्स के सर फोड़कर निकल लेना जनता की चेतना के ऊपर अविश्वास तो है ही साथ ही अपनी कमियों को नज़रअन्दाज़ करना भी है. आख़िर जिन कार्पोरेट्स के खिलाफ़ वाम दल आवाज़ उठाते रहे हैं, उनसे सहयोग की उम्मीद भी कैसे और क्यों की जानी चाहिए? उन्हें तो अपना रास्ता ख़ुद बनाना होगा और यदि नहीं बना पा रहे तो यह सही समय है जब अपनी नीतियों और तरीकों पर गंभीर पुनर्विचार करना होगा. वाम दल गिमिक्स के भरोसे सत्ता में नहीं आ सकते. उनका इकलौता सहारा वह जनता है जिसकी रहनुमाई का वे दावा कर सकते हैं. यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि उस जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता लगातार कम हुई है और उपस्थिति भी. जिन इंडस्ट्रीज़ से ट्रेड यूनियनें आती थी अर्थव्यवस्था के भीतर उनका प्रभाव कम होने के साथ साथ वे ट्रेड यूनियनें, जो पहले ही अर्थवाद में फंस कर अपनी वैचारिक धार खो चुकी थीं, अब लगभग निष्क्रिय और निष्प्रभावी हो चुकीं हैं. नब्बे के बाद प्रभावी हुए उद्योगों में यूनियने बनाना बेहद मुश्किल हुआ है और वहाँ वाम दलों की यूनियनें लगभग अनुपस्थित हैं. छात्र मोर्चे पर भी एस ऍफ़ आई और ए आई एस ऍफ़ जैसे संगठन ज़्यादातर जगहों पर अनुपस्थित हैं तो आइसा की उपस्थिति भी सीमित ही है. यहाँ भी जिन नए तरह के शैक्षणिक संस्थानों (प्रबंधन, इंजीनियरिंग आदि) में बहुतायत छात्र जा रहे हैं, वहाँ छात्र राजनीति की कार्यवाहियाँ नामुमकिन हैं. शोषण के सबसे प्रमुख केंद्र बन चुके गाँवों में वाम दलों के संगठन दिखाई नहीं देते तो कम से कम उत्तर भारत के कस्बों और छोटे शहरों में भी उनकी उपस्थिति हद से हद नाममात्र की है. ऐसे में उनकी किसी आमूलचूल परिवर्तनकारी भूमिका में उभरने की संभावना कहाँ दिखाई देती है? आप जैसा मध्यवर्गीय तथा ‘विचारधाराहीन’ दल अपने लोक लुभावन नारों के साथ दिल्ली में उभर कर देश भर में चर्चित हो सकता है. वह ‘ऊपर से नीचे’ की यात्रा कर सकता है. लेकिन मज़दूरों, ग़रीबों, गावों और परिवर्तन की बात करने वाले वाम दलों के लिए यह संभव नहीं, उन्हें हर हाल में नीचे से ऊपर की यात्रा करनी होगी. जो कहीं अधिक मुश्किल भी है और कहीं अधिक काँटों से भरी भी. वह धारा के विपरीत तैरने जैसा है, लेकिन उसका कोई विकल्प भी नहीं. जनता किसी के पास उसका मैनिफेस्टो पढ़कर नहीं आती, उस वटवृक्ष को हिलाने की ताक़त परिवर्तनकामी शक्तियों को खुद जुटानी होती है और आमूलचूल परिवर्तनों का कोई शार्टकट नहीं होता.

इसीलिए ‘आप’ के उभार को लेकर उसके अति-उत्साहपूर्ण स्वागत या फिर उतनी ही तीव्रता से आलोचना की जगह वाम ताक़तों को अब पूरी गंभीरता से विकल्पहीनता की इस स्थिति में, जहाँ पर आप जैसे भ्रम भी जनता को बहुत दिनों तक बहला नहीं पायेंगे या फिर जनता के पक्ष में खड़े हुए तो शनैः शनैः वाम के करीब आएँगे, उन्हें नीचे से ऊपर की तरफ उठते हुए मज़लूम जनता को गोलबंद कर लम्बी और फैसलाकुन लड़ाई में उतरना चाहिए. शार्टकट तो इसका नहीं होगा लेकिन जनता उस दीर्घ काल तक भी प्रतीक्षा नहीं करेगी जिसके बारे में स्मिथ ने कहा था कि ‘दीर्घ काल में हम सब मर जाते हैं.’  


  


शनिवार, 21 सितंबर 2013

अनंतमूर्ति का बयान और उसके विरोधों के निहितार्थ

फासीवाद की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि वह अफवाह फैलाता है. जैसा कि संघ परिवार ने मेरे साथ किया. एक कन्नड़ अखबार है 'कन्नड़ प्रबाह' जिसने मेरे बारे में अफवाहें और गन्दी चीजें प्रकाशित कीं. ऐसी चीजें कि मुझे मर जाना चाहिए. यही हिटलर के समय में हुआ था. मेरा शोध इसी पर है. 
अनंतमूर्ति, एक साक्षात्कार में 




वरिष्ठ कन्नड़ लेखक अनंतमूर्ति के  बयान के बाद सोशल मीडिया सहित तमाम जगहों पर बवाल मचा है . ज़ाहिर है कि मोदी को लकड़ी के लाल किले से असली वाले लाल किले तक पहुँचाने की कोशिश में लगे संघ गिरोह और उसके समर्थकों को यह बुरा लगता. ज़ाहिर है कि वे उन्हें देश से चले जाने की सलाहें देने भर से संतुष्ट नहीं होते और उनकी ह्त्या तक की बात करते, लेकिन जो लोग मोदी के समर्थक नहीं हैं वे भी इस बयान से खासे नाराज़ ही नहीं नज़र आ रहे बल्कि उन्हें भगोड़ा और कायर भी कह रहे हैं. रवीश कुमार जैसे समझदार और उदार समझे जाने वाले पत्रकार भी इस मुद्दे पर जिस तरह ‘जनमत’ के नाम पर उनके प्रति अपमानजनक टिप्पणियाँ कर रहे हैं वह सच में हैरान करने वाला है. यहाँ यह भी समझने की ज़रुरत है कि उनकी प्रयुक्त शब्दावली थी, 'आई डीड ना वांट टू लिव इन अ कंट्री रुल्ड बाई मोदी'. लिव रहना ही नहीं होता, जीना भी होता है. उन्होंने कहीं विदेश जाने की बात नहीं की हैं. वह कह रहे हैं कि ऐसे देश में वह जीना नहीं चाहेंगे जिसका प्रधानमंत्री मोदी हो. वह कह रहे हैं कि वह इस धक्के से मर जाएँगे. (मूल बयान यहाँ पढ़ा जा सकता है)

 फिर भी चलिए मान लेते हैं कि वह विदेश जाने की ही बात कर रहे हैं. तो भी एक अस्सी साल के लेखक के प्रति जिस तरह की असहिष्णुता दिखाई जा रही है, वह यह तो बिलकुल साफ़ करती है कि कम से कम भारत में लेखकों को लेकर न्यूनतम सम्मान वाली स्थिति भी नहीं है, वरना शायद इस शोरगुल का एक हिस्सा अनंतमूर्ति की उस चिंता के लिए भी होता जो उस वक्तव्य में उन्होंने एक फासिस्ट सरकार आने की दशा में भारत के सेकुलर और सहिष्णु ताने बाने को लेकर जताई है. एक ऐसे देश में जहाँ मध्यवर्ग का सबसे बड़ा सपना अपने बच्चों या मुमकिन हो तो खुद अपने लिए अमेरिका या किसी अन्य पश्चिमी देश में एक अदद नौकरी हासिल कर लेना हो, मोदी जिस प्रदेश से आते हैं वहां तो अमेरिका और कनाडा जाने के लिए क़ानूनी-ग़ैरक़ानूनी तरीक़े अपनाना एकदम रोजमर्रा की बात है, एक ऐसे देश में जहाँ ‘इम्पोर्टेड’ अब भी एक पवित्र शब्द हो वहां एक लेखक के इस बयान पर इतना शोर! 



न जाने क्यों मुझे ऐसे में गुजरात के उस मुसलमान युवक की याद आ रही है जिसका दंगाइयों के सामने हाथ जोड़े फ़ोटो उस दौर में गुजरात दंगों की त्रासदी का प्रतीक बन गया था. वह गुजरात से कोलकाता चला गया था! एक प्रोफ़ेसर बंदूकवाला थे जो एक नयी और आधुनिक रिहाइश में अपने हिन्दू दोस्तों के बीच रहने चले आये थे उन दंगों के पहले और फिर उन्हें वहाँ दंगों के दौरान इतना परेशान किया गया कि वह लौटकर पुरानी मुस्लिम बस्ती में चले गए. विभाजन के समय यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ आये लोगों का क़िस्सा तो पुराना हुआ अभी मुजफ्फरनग
र दंगों के बाद कितने लोग अपना गाँव छोड़कर किसी और सुरक्षित ठिकाने पर चले गए! देश न छोड़ सके तो देस छुडा दिया गया. हिटलर के राज में , जिससे अनंतमूर्ति सहित तमाम लोग नरेंद्र मोदी की तुलना करते हैं,  ब्रेख्त सहित कितने लोगों को देश छोड़ना पड़ा और सी आई ए ने किस तरह चार्ली चैपलिन को देश छोड़ने पर मज़बूर किया ये किस्से इतने भी पुराने नहीं (चाहें तो इसमें सोवियत संघ से देश छोड़ने वाले, कश्मीर से देश छोड़ने वाले, पाकिस्तान और इरान से देश छोड़ने वाले, फलस्तीन से देश छोड़ने वाले तमाम जाने अनजाने लोगों को जोड़ लें, मैं बख्श किसी को नहीं रहा, सिर्फ उदाहरणों की भीड़ लगाने की जगह प्रतिनिधि उदाहरण प्रस्तुत कर दे रहा हूँ). क्या कहेंगे आप इन सब लोगों को? भगोड़ा? कायर? देशद्रोही? कह लीजिये कि अभी आप ऐसे हालात से नहीं गुज़रे.

अनंतमूर्ति . कर्नाटक में रहकर कन्नड़ में लिखते हैं. उस कर्नाटक में जहाँ दक्षिणी राज्यों में पहली बार बी जे पी सत्ता में आई और श्रीराम सेने के उत्पातों के रूप में शिवसेना और बजरंग दल के उत्पातों का प्रयोग हुआ. जहाँ उनका मशहूर उपन्यास ‘संस्कारम’ लगातार विवाद में रहा. जो उन्हें जानते हैं वह शायद यह भी जानते होंगे कि एक लेखक की तरह सिर्फ लिखकर ही नहीं एक कार्यकर्ता की तरह सड़क पर आकर भी उन्होंने साम्प्रदायिक शक्तियों की मुखालिफत की. इमरजेंसी के खिलाफ स्टैंड लिया. चौरासी के दंगों पर तीखी प्रतिक्रिया दी और २००४ का लोकसभा चुनाव इस घोषणा के साथ लड़ने का मन बनाया कि वह ‘ भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ लड़ने के मुख्य वैचारिक उद्देश्य से ही चुनाव लड़ रहे हैं’. यही नहीं उन्होंने चुनाव में देवेगौडा का दिया टिकट तब ठुकरा दिया जब देवेगौड़ा ने बीजेपी के साथ समझौता कर लिया. वह वामपंथी भी नहीं हैं. लोग जानते ही हैं कि बेंगलोर को बेंगलुरु नाम देने के आन्दोलन में वह बेहद सक्रीय रहे हैं. असल में वह एक ओर ब्राह्मणवादी संस्कारों और विचारों के कट्टर विरोधी रहे हैं तो साथ में देशज आधुनिकता के समर्थक हैं. इस रूप में वह शब्दवीर भर नहीं कि उन्हें शोशेबाज़ी का शौक हो. वह सक्रिय राजनैतिक लेखक रहे हैं जिन्होंने ऐसी ताक़तों के खिलाफ लगातार लड़ाई लड़ी है. वह राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, शान्तावेरी गोपाल गौड़ा जैसे समाजवादी नेताओं के साथ नजदीकी से जुड़े रहे हैं.  ऐसे में अगर वह मोदी के आने के बाद देश छोड़ने की बात कह रहे हैं तो उसे समझा जाना चाहिए. एक सक्रिय वयोवृद्ध लेखक  यह कह भर नहीं रहे हैं, यह कहते हुए कर्नाटक में ‘धुंडी’ पर लगे प्रतिबंध और उसके लेखक योगेश मास्टर की गिरफ्तारी के खिलाफ सक्रिय हैं. तो यह पलायन नहीं है. इस उम्र में वह अपने शरीर और अपने हौसलों की सीमा जानते हैं. वह जानते हैं कि देश में साम्प्रदायिक शक्तियों के हाथ में ताक़त आने के बाद उन जैसे लेखकों के विरोध का अधिकार किस तरह छीना जाने वाला है. उम्र भर जिन ताक़तों के ख़िलाफ़ एक लेखक खड़ा रहा उनके ताक़तवर होते जाने से एक हताशा भी पैदा होती है, निराशा भी, खीझ भी. बहुत दिन नहीं हुए जब मराठी के ख्यात नाटककार विजय तेंदुलकर ने कहा था कि 'मेरे पास पिस्तौल हो तो मैं सबसे पहले मोदी को गोली मार दूँगा'. यह कोई हिंसक कोशिश नहीं थी, एक लेखक की हताशा थी. इस हताशा में हत्याएं तो नहीं लेकिन तमाम लेखकों की आत्महत्याएं हमने देखी हैं.

इस इंटरव्यू के बाद उठे विवाद की रौशनी में दिए गए एक इंटरव्यू में वह कहते हैं,
मैं नेहरू और इंदिरा के प्रति आलोचनात्मक हो गया. मैं आपातकाल के खिलाफ़ था. इसके लिए मेरी आलोचना हुई मुझे ऐसे गालियाँ कभी नहीं दी गयीं जैसी आज दी जा रही हैं. इस आदमी के पीछे कारपोरेट जगत की ताकत है और अधिकाँश मीडिया की भी. और इसके सभी प्रसंशक एक साहित्यिक आदमी की टिप्पणी से परेशान हो गए. आखिरकार मैं वही हूँ, एक लेखक. . यहाँ तक कि मैं अंग्रेजी में भी नहीं लिखता. यह दिखाता है कि साहित्य में अब भी ताक़त है. जब एक सर्वसत्तावादी सत्ता में आता है तो जो आज चुप हैं वे और चुप हो जायेंगे. इसलिए मैं एक ऐसी दुनिया में नहीं रहना चाहता जहाँ मोदी प्रधानमंत्री हो. गौर कीजिए वह यहाँ ‘देश’ नहीं ‘दुनिया’ कह रहे हैं. साहित्य की भाषा से परिचित लोग जानते हैं कि दुनिया का मतलब वह दुनिया ही नहीं होता जिसका राजा आज अमेरिका है. दुनिया भावभूमि के रूप में प्रयुक्त होती है, जैसे लेखकों की दुनिया, कवियों की दुनिया, कलाकारों की दुनिया. तो देश भी सिर्फ भौगोलिक सीमा नहीं होता, वह मानसिक और वैचारिक निर्मिति भी होता है. इस भारत कहे जाने वाले भौगोलिक देश में एक मोदी की दुनिया रहती है जहाँ विरोध के लिए कोई जगह नहीं, जहाँ सहिष्णुता कोई जीवन मूल्य नहीं, जहाँ संविधान की कोई क़ीमत नहीं, जहाँ लेखक का पर्यायवाची चारण है. चाहें तो दो साल पहले हुए गुजरात साहित्य अकादमी के उर्दू कवि के साथ व्यवहार को याद कर लें. चाहें तो सरूप ध्रुव जैसी गुजराती लेखिका से पूछ लें. जो होशियार हैं वे चुप हैं, आहिस्ता आहिस्ता जबानें बदल रहे हैं जो नहीं हैं वे अनंतमूर्ति की तरह साफ़ बोल रहे हैं और गालियाँ सुन रहे हैं. उनकी दिक्कत यह है कि वह अपनी वैचारिक नागरिकता के प्रति प्रतिबद्ध हैं, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी भौगोलिक नागरिकता त्यागनी पड़े.

लेकिन लोग इसे समझना नहीं चाहते. वे अस्सी साल के लेखक से, जो आज भी सड़क पर खड़ा है अपने एक साथी की किताब पर प्रतिबंध लगाए जाने के ख़िलाफ़, ‘वीरता’ के उच्चतम मानदंडों की उम्मीद करते हैं लेकिन ख़ुद उसकी चिंताओं पर सोचने को भी तैयार नहीं. वे उन हालात को रोकने के लिए लड़ाई में उतरने को तैयार नहीं. उनके पास अनंतमूर्ति को देने के लिए यह आश्वासन नहीं कि आपको कहीं नहीं जाना पड़ेगा, हम हिटलर के इस अवतार को सत्ता में आने ही नहीं देंगे. वे उनके ‘पलायन’ को प्रश्नांकित करते हैं और इस तरह उनके संघर्षों और उनकी चिंताओं को परदे के पीछे भेज दिए जाने में मदद करते हैं. मुझे डर है कि वे अपनी भौगोलिक नागरिकता बचाने के लिए अपनी वैचारिक नागरिकता त्यागने की तैयारियाँ मुकम्मिल करने में लगे हैं. अगर नहीं तो उन्हें समझना चाहिए कि यह एक लेखक की कातर पुकार नहीं चुनौती है अपने नागरिकों के प्रति.

रविवार, 15 सितंबर 2013

जनसत्ता के झूठ और चंचल चौहान का जवाब


अपनी वाम विरोधी और अब तो कहा जा सकता है कि दक्षिण समर्थक मुहिम में जनसत्ता नामक अखबार के महत्त्वाकांक्षी, दम्भी और अलोकतांत्रिक सम्पादक ने पत्रकारिता के तमाम मानक बिसरा दिए हैं. वह बिना ठोस सबूतों के घटिया और व्यक्तिगत हमले करते हैं और फिर जवाब छापने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. ऐसा पिछले कुछ महीनों में कई बार हुआ है. शंकर शरण को दिया नन्द किशोर नीलम का जवाब नहीं छापा गया, झूठे आरोपों की धज्जीयाँ उड़ाता गिरिराज किराडू का ज़वाब नहीं छापा गया, मेरा खुद का जवाब मिलने पर उसे 'चार सौ शब्दों' में संक्षिप्त करने की मांग की गयी (जबकि उनका खुद का लेख आधे पन्ने का था) और कुछ अन्य मित्रों के साथ भी यही हुआ. ज़ाहिर है कि उनकी रूचि बहस में नहीं सिर्फ अपने आकाओं की नज़र में कुछ प्वाइंट्स हासिल कर लेने में है जिसका फ़ायदा उस पार्टी के सत्ता में आने पर लिया जा सके जिसके पक्ष में थोड़ा माहौल फेसबुक जैसी साइट्स पर बनता देख सम्पादक महोदय ने अपने धर्मनिरपेक्षता के दावों को ताक पर रख दिया है. कुछ छपास की बीमारी और कुछ दूसरे स्वार्थों से अंधे खुद के वाम होने का दावा करने वाले और अब तक बिला शक़ धर्मनिरपेक्ष रहे लोग भी उनकी इस मुहिम में जाने-अनजाने शामिल ही नहीं हो रहे बल्कि उसे खाद पानी भी उपलब्ध करा रहे हैं.

खैर, जनपक्ष ने लगातार इस मुहिम की मुखालिफ़त की है. पहले के प्रतिवाद आप यहाँ पढ़ सकते हैं. आज इसी क्रम में जनवादी लेखक संघ के महासचिव चंचल चौहान जी का प्रतिवाद.

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प्रेमचंद पर एक और झूठमिश्रित टिप्पणी


चंचल चौहान



जनसत्ता के 25 अगस्त 2013 के दिल्ली संस्करण में एक धुरदक्षिणपंथी सांप्रदायिक फासीवादी विचारधारा के भगवे रंग में रंगे लेखक की झूठमिश्रित टिप्पणी के साथ प्रेमचंद के एक बहुत ही यथार्थपरक लेख, "राज्यवाद और साम्राज्यवाद" की पुनर्प्रस्तुति कुछ इस तरह की गयी थी गोया प्रेमचंद उन्हीं की तरह घोर कम्युनिस्ट- विरोधी रचनाकार थे। मैंने जब झूठ का पर्दाफाश करते हुए अपनी टिप्पणी ओम थानवी के पास ईमेल से भेजी तो उन्होंने उसे छापना उचित नहीं समझा, संपादक भी ‘सांच कहौ तो मारन धावै’, इसलिए उस टिप्पणी को मैंने 1 सितंबर को अपने ब्लाग पर डाल दिया। 8 सितंबर को एक और झूठमिश्रित टिप्पणी एक लोहियावादी पत्रकार की लिखी छपी। ये महाशय तो कम्युनिस्टविरोध की मुहिम में उस संघी लेखक से भी दो कदम आगे निकल गये। उन्होंने मुक्तिबोध को भी प्रेमचंद वाली बहस में घसीट लिया और पाठकों को यह बताया कि मुक्तिबोध ने एक पत्र अंग्रेजी में ई एम एस नंबूदिरीपाद को लिखा था जिसका जवाब उन्हें नहीं मिला। इस 'मुदियापे' को क्या कहा जाये। मुक्तिबोध का लिखा यह पत्र कहां है, मिस्टर खोजीपत्रकार? उनकी रचनावाली के खंड 6 में एक पत्र अंग्रेजी में लिखा भारत भूषण अग्रवाल के नाम से छपा है, एक पत्र अमृतपाद डांगे के नाम है जिसमें हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर सटीक टिप्पणी और नयी कविता के रचनाकारों के प्रति कुछ मार्क्सवादी आलोचको के संकीर्णतावादी रवैये की ओर उनका ध्यान दिलाया गया है, और कुछ प्रलेस के बारे में रचनात्मक सुझाव दिये गये हैं, कहीं भी उसमें वह सब नहीं है जिसे इस खोजीपत्रकार ने झूठ का सहारा लेकर दिखाने की कोशिश की है। ये पत्रकार महोदय कहते हैं कि प्रेमचंद अगर कम्युनिस्ट होते तो मुक्तिबोध की तरह अपनी पार्टी से पूछते 'कि कामरेड आपकी पालिटक्स क्या है'। मुक्तिबोध ने यह सवाल पार्टी से नहीं, उन तमाम मध्यवर्गीय अवसरवादी रचनाकारों से पूछा था जो उस दौर में तय नहीं कर पा रहे थे कि "पथ कौन सा है"। आज की ही तरह उस समय भी बहुत से लेखक सर्वनिषेधवादी विचारों की जकड़बंदी में फंसे थे, जो ‘कोउ नृप होउ हमहिं का हानी’ की मंथर बुद्धि के शिकार थे। 

इसके बाद इस खोजी पत्रकार के झूठ को देखिए, वे फरमाते हैं : ' कुछ इसी विह्वलता से मुक्तिबोध ने उस समय के उच्चतम कम्युनिस्ट नेता ईएमएस नंबूदरीपाट को एक सुदीर्घ पत्र लिखा था - अंग्रेजी में, ताकि वे समझ सकें।----' क्या समझ सकें, यह बताना वे भूल गये या उन्हें उस पत्र में कहीं मिला नहीं। शरारतन हरकिशन सिंह सुरजीत का नाम भी घसीट लिया है जिसका लेख से कोई ताल्लुक नहीं है। क्या खोजीपत्रकार महोदय ईएमएस नंबूदिरिपाद के नाम लिखे उस पत्र की फोटोकापी हम पाठकों को दिखा सकते हैं, मूल तो वे भला कहां से लायेंगे, या अपने झूठ पर शर्मशार हो कर पाठकों से माफी मांगेंगे कि उन्हें खामख्वाह गुमराह किया। हम जानते हैं कि ऐसी हिम्मत ओछे और बोदे जिगरे में नहीं होती। कायराना हमले करना ऐसे दिमागों की फितरत ही होती है। ईएमएस और सुरजीत, दोनों मार्क्सवादी पार्टी के नेता जरूर थे, उनके प्रति इस तरह का रवैया दिखाने और उन्हें इस बहस में घसीट लेने के पीछे क्या मंशा है? लेख के शुरू में खोजी पत्रकार महोदय ने “कम्युनिस्ट नैतिकता” के बरक्स जो उपदेश पाठक को दिया कि ‘हम व्यक्तियों से घृणा नहीं करते, उनकी विकृतियों से जरूर घृणा करते हैं,’ पैराग्राफ के अंत तक झूठ पर आधारित व्यक्तिगत घृणा पर ही खुद उतर आते हैं। नसीहत दूसरों के लिए, अपने आचरण के लिए नहीं।

लेख के अंत तक इस खोजीपत्रकार ने अपना छिपा एजेंडा जाहिर कर दिया, 25 अगस्त के संघी लेखक के झूठ को ज्यों का त्यों उधार ले कर इन महाशय ने भी लिख दिया कि प्रेमचंद ने “बोल्शेविक उसूलों'” के कायल होने की बात बाद में ‘एक बार भी नहीं दुहरायी, बल्कि कम्युनिस्टों की आलोचना ही की।‘ हे खोजी पत्रकार महोदय, यह ‘कम्युनिस्टों की आलोचना’ आपने प्रेमचंद के लेखन में कहां पढ़ ली, प्रेमचंद के लेखन में से कोई मनगढंत सबूत ही पेश कर देते तो आपके इस झूठ पर पाठक विश्वास कर भी लेते, जैसे ईएमएस के नाम लिखे पत्र का झूठ गढ़ लिया, आप क्या नहीं कर सकते, कवि हुए बगैर भी वहां पहुंच सकते हैं जहां न पहुंचे रवि। धन्य हैं आप, आपको धिक्कार है, सब जान गये हैं आपको झूठ पर आश्रित “महाजनी सभ्यता” से ही प्यार है।

मुंशी प्रेमचंद के समय में भारत के कम्युनिस्ट एक पार्टी के रूप में संगठित हो ही रहे थे, मजदूरवर्ग की उभरती हिरावल राजनीतिक शक्ति बनते ही 1920 से 1925 के दौर में उसने मजदूरों के बीच काम करना शुरू किया कि तभी ब्रिटिश हुकूमत ने मेरठ षड्यंत्र केस के नाम से पार्टी के नेतृत्वकारी साथियों को जेल में डाल दिया जो 1929 से 1933 तक सजा भुगतते रहे, उसके बाद पूरे देश मे वामपंथ की लहर दौड़ गयी, मजदूरों से ले कर किसान, महिलाएं, युवक, छात्र, कवि, रचनाकार, कलाकार,सभी संगठित होने लगे। सज्जाद जहीर तथा मुल्कराज आनंद ने लेखकों को संगठित करने की जो पहल की, उसका स्वागत प्रेमचंद ने किया, उन्होंने उनके दस्तावेज प्रलेस के गठन से पहले ही हंस में छापे। रेखा अवस्थी की पुस्तक, "प्रगतिवाद और समानांतर साहित्य" में मुंशी प्रेमचंद के सहयोग के तमाम सबूत मौजूद हैं जिन्हें पढ़ कर कोई भी इस झूठ को पहचान सकता है कि "प्रेमचंद ने कम्युनिस्टों की आलोचना ही की"। सच्चाई यह है कि उस दौर मे कम्युनिस्टों की आलोचना केवल ब्रिटिश सरकार के फरमानों में ही दर्ज है, जो उपलब्ध हैं, किसी भारतीय लेखक की कलम से लिखी हुई नहीं मिलेगी, तो यह आलोचना प्रेमचंद के किस लेखन में इस खोजी पत्रकार को मिल गयी। सन् 1930 से 1936 तक का दौर तो पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट विचारों के प्रसार और वैचारिक सैलाब का दौर था, इसी उभार ने संसार को महानतम उपन्यासकार, कवि, लेखक, आलोचक, कलाकार, नाटककार दिये। मगर जब झूठ ही प्रसारित करना हो, तो इस सब को देखने जानने की जरूरत ही कहां रह जाती है।
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चंचल चौहान 

जाने माने आलोचक और जलेस के राष्ट्रीय महासचिव. 'नया पथ' का संपादन 

यह लेख उनके ब्लॉग से साभार.