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मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

यों ही लोकप्रिय नहीं थे ऊगो शावेज़!


ऊगो शावेज़ की मृत्यु पर वेनेजुएला में उमड़ी भीड़ सबने देखी. वह नए तरह के समाजवादी नेता थे. तानाशाह नहीं, पूरी तरह से जनता द्वारा चुने गए तथा उसके हित में काम करने वाले. पढ़िए वे पचास वजूहात जिन्होंने उन्हें अपने वक्त का सबसे लोकप्रिय नेता बनाया. अनुवाद भारत भूषण तिवारी का है. मूल लेखक हैं सलीम लामरानी.



1. लातिन अमेरिका के इतिहास में किसी भी राजनीतिक नेता की सत्ता को इस कदर निर्विवाद लोकतांत्रिक वैधानिकता हासिल नहीं रही. 1999 में चावेस के सत्ता में आने के बाद से वेनेज़ुएला में 16 चुनाव हुए हैं. 15 चुनावों में चावेस ने विजय हासिल की जिनमें अंतिम चुनाव 7 अक्टूबर 2012 को हुआ था. उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को 10-20 प्रतिशत अंकों के अंतर से पराजित किया.

2. यूरोपियन यूनियन से लेकर ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ अमेरिकन स्टेट्स तक और यूनियन ऑफ़ साऊथ अमेरिकन नेशन्स से लेकर कार्टर सेंटरतक सारी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ  मतगणना की पारदर्शिता स्वीकार करने को लेकर एकमत रहीं.

3. यूएस के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने वेनेज़ुएला की चुनाव व्यवस्था को "विश्व में सर्वोत्तम" बताया.

4. 1998 में लागू किए गए शिक्षा के सार्वभौमिक अधिकार के परिणाम आश्चर्यजनक रहे. साक्षरता मुहिम मिशन रॉबिन्सन प्रथम की बदौलत 15 लाख वेनेज़ुएलाइयों ने पढ़ना और लिखना सीखा.

5. दिसम्बर 2005 में यूनेस्को ने बताया कि वेनेज़ुएला ने निरक्षरता का उन्मूलन कर दिया है.

6. स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या 1998 में 60 लाख थी जो 2011 में बढ़कर 1 करोड़ 10 लाख हो गई और स्कूलों में नामजदगी की दर (एनरोलमेंट रेट) इस समय 93.2 फ़ीसदी है.

7. समूची आबादी को शिक्षा के माध्यमिक स्तर तक लाने के लिए मिशन रॉबिन्सन द्वितीय शुरू किया गया था. इस तरह माध्यमिक स्कूलों में नामजदगी की दर 2000 में 53.6 फ़ीसदी से बढ़कर 2011 में 73.3 फ़ीसदी हो गई.

8. मिशन रीबस और मिशन सूक्र की बदौलत दसियों हज़ार वयस्क छात्र विश्वविद्यालयीन शिक्षा हासिल कर पाए. नए विश्वविद्यालय शुरू किए जाने की वजह से विश्वविद्यालयीन छात्रों की संख्या 2000 में 8 लाख 95 हज़ार से बढ़कर 2011 में 20 लाख 30 हज़ार हो गई.

9. सभी वेनेज़ुएलाई नागरिकों को निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली खड़ी की गई. 2005 से 2012 के बीच वेनेज़ुएला में 7873 नए स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित किए गए.

10. 1999 में प्रति एक लाख लोगों पर डॉक्टरों की संख्या 20 थी जो 400 फ़ीसदी से बढ़कर 2010 में 80 डॉक्टर प्रति एक लाख व्यक्ति हो गई.

11. मिशन बारियो अदेंत्रो प्रथम ने 53 करोड़ 40 लाख चिकित्सकीय परामर्श उपलब्ध करवाए. लगभग 1 करोड़ 70 लाख लोगों को चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराई गई जबकि 1998 में केवल 30 लाख लोगों को स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध थीं. 2003 से 2011 के बीच 17 लाख जानें बचाई गईं.

12. बाल मृत्यु दर 1999 में 19.1 प्रति हज़ार थी जो 2012 में कम होकर 10 प्रति हज़ार हो गईयह 49 फ़ीसदी की कमी है.

13. औसत जीवनमान 1999 में 72.2 वर्ष था जो 2011 में बढ़कर 74.3 वर्ष हो गया.

14. 2004 में शुरू किए गए ऑपरेशन मिरेकल की बदौलत मोतियाबिंदु या अन्य नेत्ररोगों के शिकार 15 लाख वेनेज़ुएलाई लोगों की आँखों की रौशनी वापिस आई.

15. 1999 से 2011 के दौर में गरीबी की दर 42.8 फ़ीसदी से घटकर 26.5 फ़ीसदी हो गई और इसी दौर में भीषण गरीबी की दर 16.6 फ़ीसदी से घटकर 7 फ़ीसदी हो गई.

16. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के मानव विकास सूचकांक (ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स) की रेटिंग में वेनेज़ुएला 2000 में मिले 83 वें स्थान (0.656) से उछलकर 2011 में 73 वें (0.735) स्थान पर आ गया और उच्च एचडीआई वाले राष्ट्रों की श्रेणी में आ गया.

17. किसी देश में व्याप्त गैरबराबरी को  गिनी कोएफिशियंट से आँका जाता है- 1999 में यह 0.46 था जो 2011 में कम होकर 0.39 हो गया.

18. यूएनडीपी के अनुसार समूचे लातिन अमेरिका में वेनेज़ुएला का गिनी कोएफिशियंट सबसे कम है मतलब पूरे क्षेत्र में वहाँ सबसे कम गैरबराबरी है.

19. बाल कुपोषण 1999 के बाद से 40 फ़ीसदी कम हुआ है.

20. 1999 में 82 फ़ीसदी आबादी को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध थायह आँकड़ा अब 95 फ़ीसदी है.

21. राष्ट्रपति चावेस के शासनकाल में सामाजिक व्यय में 60.6 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई.

22. 1999 से पहले केवल 387,000 वृद्धों को पेंशन हासिल होती थी. अब यह संख्या 21 लाख है.

23. 1999 के बाद से वेनेज़ुएला में 7 लाख घर बनाए गए हैं.

24. 1999 के बाद से सरकार ने 10 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि आदिवासियों को मुहैया कराई या लौटाई.

25. भूमि सुधारों की वजह से दसियों हज़ार किसान ज़मीनों के मालिक बन पाए. कुल मिलाकर वेनेज़ुएला ने 30 
लाख हेक्टेयर भूमि का वितरण किया.

26. 1999 में वेनेज़ुएला उपभुक्त खाद्य पदार्थों का 51 फ़ीसदी उत्पादन ही कर पा रहा था. 2012 में यह 71 फ़ीसदी हो गया जबकि इस दौर में खाद्य पदार्थों के उपभोग में भी 81 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई. अगर 2012 में उपभोग 1999 जितना ही होतातो उत्पादन उपभोग का 140 फ़ीसदी होता.

27. 1999 के बाद से वेनेज़ुएलाई लोगों के औसत कैलोरी उपभोग में 50 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई. इसका श्रेय जाता है फ़ूड मिशन को जिसके तहत 22,000 खाद्य स्टोरों की शृंखला तैयार की गई जिनमें उत्पादों पर 30 फ़ीसदी तक की सब्सिडी मिलती है. 1999 के बाद से गोश्त के उपभोग में 70 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई.

28. स्कूल फीडिंग प्रोग्राम के तहत अब 50 लाख बच्चों को भोजन मिलता है. 1999 में यह संख्या ढाई लाख थी.

29. कुपोषण दर 1998 में 21 फ़ीसदी थी जो 2012 में 3 फ़ीसदी से भी कम हो गई.

30. फ़ूड एण्ड एग्रिकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन के अनुसार लातिन अमेरिका और कैरिबियाई क्षेत्र में भूख के उन्मूलन में वेनेजुएला सबसे अग्रवर्ती देश है.

31. 2003 में तेल कंपनी पीडीवीएसए के राष्ट्रीयकरण से वेनेज़ुएला अपनी ऊर्जा प्रभुसत्ता पुनः हासिल कर पाया.

32. विद्युत एवं दूरसंचार सेक्टरों के राष्ट्रीयकरण (सीएएनटीवी और इलेक्ट्रीसीदाद दी कराकस) ने निजी एकाधिकार  खत्म किये और इन सेवाओं की सार्वत्रिक उपलब्धता सुनिश्चित करवाई.

33. 1999 के बाद से अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में 50000 से ज़्यादा सहकारी संस्थाएँ खड़ी की गईं.

34. बेरोज़गारी दर 1998 में 15.2 फ़ीसदी थी जो 2012 में 6.4 फ़ीसदी हो गई और 40 लाख नौकरियाँ तैयार हुईं.

35. 1998 में न्यूनतम मज़दूरी 100 बोलिवार (16 डॉलर) प्रति माह थी जो 2012 में बढ़कर 2047.52 बोलिवार (330 डॉलर) प्रति माह हो गईये बढ़त 2000 फ़ीसदी की है. पूरे लातिन अमेरिका में यह सर्वाधिक है.

36. 1999 में 65 फ़ीसदी श्रमिक न्यूनतम मज़दूरी पाते थे. 2012 में केवल 21 फ़ीसदी इस स्तर की मजदूरी पाते हैं.

37. निश्चित उम्र वाले ऐसे वयस्कों कोजिन्होंने कभी काम नहीं कियाभी न्यूनतम मज़दूरी के 60 फ़ीसदी के बराबर आय प्राप्त होती है.

38. बिना आय वाली महिलाओं को और विकलांगों को न्यूनतम मज़दूरी के 80 फ़ीसदी के बराबर प्रेंशन मिलती है.

39. बिना तनख्वाह में कटौती किए काम के घन्टे कम करके 6 घन्टे प्रतिदिन और 36 घन्टे प्रति सप्ताह किए गए.

40. राष्ट्रीय क़र्ज़ 1998 में सकल घरेलू उत्पाद का 45 फ़ीसदी था जो घटकर 2012 में 20 फ़ीसदी रह गया. अपना सारा क़र्ज़ समय से पहले चुका कर वेनेज़ुएला अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से अलग हो गया.

41. 2012 में वेनेज़ुएला की विकास दर 5.5 फ़ीसदी थी जो दुनिया भर के उच्चतम आँकड़ों में एक है.

42. प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 1999 में 4100 डॉलर थी जो 2011 में बढ़कर 10,810 डॉलर हो गई.

43. वार्षिक वर्ल्ड हैपीनेस 2012 के अनुसार लातिन अमेरिका के खुशहाल देशों में कोस्टारिका के बाद वेनेजुएला का स्थान दूसरा है. दुनिया भर में उसका स्थान 19 वां है जो जर्मनी और स्पेन से ऊपर है.

44. यूएसए के मुकाबले वेनेज़ुएला अमेरिकी महाद्वीप को अधिक प्रत्यक्ष सहायता देता है. 2007 में अनुदानोंऋणों और ऊर्जा सहायता की मद में चावेस ने 880 करोड डॉलर खर्च किए जबकि बुश प्रशासन  का इस मद में व्यय 300 करोड डॉलर था.

45. अपने समूचे इतिहास में पहली बार वेनेज़ुएला के पास स्वयं के उपग्रह (बोलिवार और मिरांडा) हैं और वह अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में स्वायत्त है. इंटरनेट और दूरसंचार का फैलाव पूरे देश में है.

46. 2005 में पेट्रोकैरिबे के गठन से लातिन अमेरिका और कैरिबियन के 18 देशों या 9 करोड लोगों के लिए 40 से 60 फ़ीसदी की तेल सब्सिडी द्वारा ऊर्जा आपूर्ति प्राप्त करना संभव हो पाया.

47. सब्सिडी की दरों में ईंधन मुहैया करवाकर वेनेज़ुएला यूएसए के सुविधाहीन समुदायों की सहायता भी करता है.

48. 2004 में क्यूबा और वेनेज़ुएला के बीच बोलीवारियन अलायंस फॉर दि पीपल ऑफ अवर अमेरिका (एएलबीए) के गठन ने सहकार और पारस्परिकता के आधार पर बने संयुक्त गठबंधन की नींव रखी. इस गठबंधन के अब आठ सदस्य देश हैं जो सामाजिक परियोजना के केन्द्र में मनुष्यमात्र को रखकर गरीबी और सामाजिक बहिष्करण का सामना करने का उद्धेश्य रखता है.

49. पहली बार यूएसए और कैनडा के संरक्षण से मुक्ति पाकर लातिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र के 33 राष्ट्रों को साथ लाकर 2011 में बने कम्युनिटी ऑफ लैटिन अमेरिकन एण्ड कैरिबियन स्टेट्स (सीईएलएसी) के निर्माण में ऊगो चावेस की केंद्रीय भूमिका थी.

50. कोलंबिया की शांति प्रक्रिया में ऊगो चावेस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. राष्ट्रपति हुआन मानुएल सांतोस के अनुसार, "अगर हम एक ठोस शान्ति परियोजना में शामिल होते हैंजिसकी प्रगति ठोस और स्पष्ट हैएफ़एआरसी से बातचीत में पहले से कहीं ज्यादा प्रगति,तो वह भी ऊगो चावेस और वेनेज़ुएला की सरकार के समर्पण और प्रतिबद्धता के फलस्वरूप है."

मंगलवार, 12 मार्च 2013

पूँजीवादी विकास की अंतर्कथा


क्या विकास पूरा हो चुका है?

--लूई प्रोयेक्ट 


पूँजीवाद के संकट का सवाल विश्व के प्रमुख औद्योगिक राष्ट्रों के सम्मुख जिस तरह खड़ा है वैसा 1930 के दशक के बाद कभी नहीं हुआ था। जहाँ एक ओर बहुत से लोग मानते हैं कि मंदी की विकटता अपने चरम पर है, वहीं यह मानने वाली प्रवृत्ति भी चली आई है कि पूँजीवाद अब व्यवसाय चक्र (बिज़नेस साइकल) के दुरुस्त होने के चरण में है। मसलन, सं. रा. अमेरिका में अब बेरोज़गारी की दर 7.7 फ़ीसदी है जो पिछले चार सालों में सबसे कम है। इस सुधार के बावजूद यूरोप का बहुत सा हिस्सा अब भी यूरोज़ोन संकट में डूबा हुआ है।

वामपंथ के सामने खड़े अहम सवालों में से एक है पूँजीवादी व्यवस्था की दीर्घकालिक व्यवहारिकता (लॉन्गटर्म वाएबिलिटी) । और अगर आप इस सिद्धांत को आधार मान कर चलते हैं कि यह व्यवस्था तेजी और मंदी के चक्रों से संचालित होती है, तो एक तार्किक निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि बेरोज़गारी की स्थिति में सुधार होने के साथ ही मुकम्मल लड़ाई छेड़ने का मौका हमारे हाथों से निकल गया है। इसमें अगर ऑक्युपाई आन्दोलन के कमज़ोर पड़ने की बात जोड़ दी जाए तो ऐसा आभास होता है कि इस व्यवस्था ने अपने आप को फिलवक्त स्थिर कर लिया है।

पूँजीवादी विचारधारा के खेमे के भीतर से एक बेमेल सी मगर पते की बात निकल कर आई है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमन ने, जो 'वैश्वीकरण' को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स के अपने साथी स्तंभकार थॉमस फ्रीडमन जितने ही प्रतिबद्ध हैं, पंचकोटि महामनी वाला सवाल हाल ही में पूछा है: क्या प्रौद्योगिक उन्नति से नई नौकरियाँ तैयार होती हैं? यह शूमपेटर के सृजनात्मक विध्वंस (क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन) वाले सिद्धांत - जिसे कैपिटल के दूसरे खंड में वर्णित पूँजी संचयन चक्र (कैपिटल एक्युमुलेशन साइकल) का अश्लीलीकरण (वल्गराइजेशन) कहा जा सकता है - की मूल कल्पना है।

दिसंबर 2012 को अपने एक स्तम्भ में क्रुगमन ने अपना ध्यान सजीव श्रम के स्थान पर मशीनरी के उपयोग की तरफ मोड़ा, जिसे उन्होंने "पुराने अंदाज़ वाली लगभग मार्क्सवादी किस्म की बहस" करार दिया:

हाल ही में आई एक पुस्तक 'रेस अगेंस्ट दि मशीनमें एमआईटी के एरिक ब्रिंजल्फ़्सन और एंड्रयू मैकाफी तर्क देते हैं बहुत से क्षेत्रों की यही दास्ताँ है और इनमें अनुवाद और वैधानिक अनुसंधान (लीगल रिसर्च) जैसी सेवाएँ भी शामिल हैं। उनके द्वारा दिए गए उदाहरणों के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि बहुत सारे पेशे जो ख़त्म हो रहे हैं वे उच्च कौशल वाले और ऊँची तनख्वाहों वाले हैं; प्रौद्योगिकी का नकारात्मक असर केवल निचले दर्जे का काम करने वालों तक ही सीमित नहीं है।
फिर भी, क्या नवप्रवर्तन (इनोवेशन) और प्रगति से सचमुच ज़्यादातर मजदूरों का, या व्यापक रूप से सभी मजदूरों का नुकसान होता है? अक्सर ऐसे दावे सुनाई पड़ते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता। मगर हकीकत यह है कि ऐसा हो सकता है और गंभीर अर्थशास्त्री इस संभावना से पिछली दो सदियों से वाकिफ हैं।

27 दिसंबर को 'इस ग्रोथ ओवरशीर्षक वाले अपने एक कॉलम में  क्रुगमन ने पूँजीवादी कट्टरपंथियों के समक्ष एक और गंभीर चुनौती पेश की। इसमें रॉबर्ट गॉर्डन नाम के एक अर्थशास्त्री के शोध का ज़िक्र किया गया है।

हाल ही में नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के रॉबर्ट गॉर्डन के इस तर्क से सनसनी फैल गई कि आर्थिक विकास के तेज़ी से धीमे पड़ते जाने की सम्भावना है- हो सकता है कि विकास का युग जिसकी इब्तिदा अठारहवीं सदी में हुई थी वह सचमुच ख़त्म होने वाला है। गॉर्डन ध्यान दिलाते हैं कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास एक स्थिर और नियमित प्रक्रिया नहीं रही है; और वह कई सारी अलग-अलग "औद्योगिक क्रांतियों' से चालित रहा है जिनमें से हरेक किसी विशेष प्रौद्योगिकी समुच्चय (सेट ऑफ़ टेक्नॉलॉजीज़) पर आधारित थी। पहली औद्योगिक क्रान्ति ने, जो मुख्य रूप से भाप के इंजन पर आधारित थी, अठारहवीं सदी के आखिरी और उन्नीसवीं सदी के शुरूआती दौर में विकास को गति प्रदान की। मुख्यतः विद्युतीकरण, आतंरिक दहन (इन्टरनल कम्ब'शन) और रासायनिक इंजीनियरिंग जैसी प्रौद्योगिकियों में विज्ञान की प्रयुक्ति से मुमकिन हो पाई दूसरी औद्योगिक क्रान्ति 1870 के आसपास शुरू हुई और उसने 1960 के दशक तक विकास को गति दी। तीसरी औद्योगिक क्रान्ति, जो सूचना प्रौद्योगिकी पर केन्द्रित है, हमारे वर्तमान युग का निर्धारण करती है।

अगर यह सच है तो मार्क्सवाद के समक्ष अभूतपूर्व परिस्थितियाँ खड़ी हैं। जब कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो लिखा गया था तब पूँजीवाद हरसू उत्पादन के साधनों में इंकलाब ला रहा था।

सभी उत्पादन उपकरणों में तीव्र सुधार और अत्यंत सुगम बनाए गए संचार-साधनों के ज़रिये बुर्जुआ वर्ग सभी, यहाँ तक कि बर्बर से बर्बर राष्ट्रों को भी सभ्यता की परिधि में खींच लाता है। उसके जिंसों के सस्ते दाम से, जो उसके लिए एक भारी तोपखाना है जिसकी मदद से वह सभी चीन की दीवारों को ढहा देता है और विदेशियों के प्रति बर्बर जातियों की अत्यंत अदम्य घृणा को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देता है। वह प्रत्येक राष्ट्र को, अन्यथा विलुप्त हो जाने के भय से, बुर्जुआ उत्पादन प्रणाली अपनाने के लिए मजबूर करता है; वह उन्हें मजबूर करता है कि वे अपने बीच उस चीज़ को दाखिल करें जिसे वह सभ्यता कहता है, अर्थात खूद बुर्जुआ बन जाएँ। संक्षेप में, वह अपने ही साँचे में ढली दुनिया का निर्माण करता है।

लेकिन अगर यह "भारी तोपखाना" महज एक फूँकनी में तब्दील हो गया हो तो? जो अपनी बढ़ती आबादी (खासकर विकासशील देशों में) की ज़रूरतों का और विस्तार नहीं कर सकती ऐसी सामाजिक व्यवस्था के राजनीतिक परिणाम क्या हैं? वामपंथी केन्सवादी अर्थशास्त्री जोअन रॉबिन्सन ने एक बार लिखा था,"...पूँजीपतियों द्वारा शोषण किए जाने का दर्द उस दर्द के आगे कुछ भी नहीं जो शोषण बिलकुल न होने से उपजता है।" अगर मेहनतकश लोग वेतन दास (वेज स्लेव) होने की आशा नहीं कर सकते, तो जिस सामाजिक व्यवस्था के साथ उन्होंने सदियों से समझौता कर रखा है उसके साथ मुकाबला करने के अलावा उनके पास और क्या विकल्प हैं? अरब बसंत को निरंकुश सत्ताओं के खिलाफ खड़े हुए आन्दोलन के तौर पर देखने की तमाम (और दुरुस्त) प्रवृत्तियों के बीच जीवन की बुनियादी ज़रूरतें मुहैया कराने में पूँजीवाद की मूलभूत विफलता ने ही विद्रोह को हवा दी है। जब ट्यूनीशिया में सड़क पर ठेला लगाने वाले शख्स ने आत्मदाह किया तो यह उसका तरीका था यह कहने का कि यह व्यवस्था उसके लिए कारगर नहीं रही है। जब एक यूनानी पेंशनभोगी आदमी ने पिछले साल संसद भवन के सामने अपनी जान दी, तो वह ऐसा ही वक्तव्य दे रहा था।

एक ऐसे दौर में जब 1930 के दशक के बाद पहली बार वर्गभेद और तीक्ष्ण होते जा रहे हैं, मार्क्सवादी वाम को अपनी सलाहियत साबित करनी होगी। ह्यूगो शावेज़ की अगुवाई में लातिन अमेरिकी वामपंथियों द्वारा रखी गई इक्कीसवीं सदी के समाजवाद (ट्वेंटी-फर्स्ट सेंचुरी सोशलिज्म) की माँग को ध्यान में रखकर हमें गौर करना होगा कि अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन या फ्रांस जैसे देशों के क्रांतिकारियों के लिए इस बात के क्या मायने हैं। हालाँकि इन देशों में मेहनतकश तबका तुलनात्मकरूप से निष्क्रिय बना हुआ है (जो मुख्यतः उस विऔद्योगिकरण का नतीजा है जिसको लेकर क्रुगमन चिंतित हैं), मगर इसमें शुबहा नहीं कि संघर्ष जारी रहेंगे भले ही वे वह भूमिका न अख्तियार करें  जो उन्होंने 1930 के दशक में की थी। इसका पहला संकेत क्युपाई आन्दोलन था और हमें इसके आगामी आविर्भावों को लेकर सचेत रहना होगा। शासक वर्ग हमको लेकर तैयार है और आगामी महत्त्वपूर्ण लड़ाइयों के लिए हमारा उतना ही तैयार रहना लाजिमी है।
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(न्यूयॉर्क में रहने वाले लूई प्रोयेक्ट जाने-माने वामपंथी विचारक-लेखक, एक्टिविस्ट और ब्लॉगर हैं। वे दुनिया भर के वामपंथियों में लोकप्रिय ईमेल समूह 'मार्क्समेल' के मॉडरेटर भी हैं। यह आलेख उन्होंने हमारे आग्रह पर ख़ास समयांतर के लिए लिखा है।- भारत भूषण तिवारी, अनुवादक

*समयांतर  के वामपंथ  केन्द्रित विशेषांक से साभार 

गुरुवार, 24 मार्च 2011

उम्मीद

कार्य-कारण यह मानकर चलते हैं कि इतिहास आगे बढ़ता ही जाता है, मगर इतिहास कोई सेना नहीं. इतिहास है तिरछा दौड़ता केकड़ा, इतिहास है शीतल जल की वह टपकन जो पत्थर को गला डाले, सदियों के तनाव को तोड़ डाले ऐसा ज़लज़ला है इतिहास. कभी कभी एक शख्स किसी आन्दोलन को प्रेरित कर देता है, या दसियों साल बाद उसके शब्द ऐसा करते हैं, कभी कभी चंद धुनी लोग दुनिया बदल देते हैं, कभी कभी वे जन आन्दोलन शुरू कर देते हैं और लाखों लोग दुनिया बदलते हैं, कभी कभी वे लाखों लोग उसी रोष या उसी आदर्श से उत्तेजित हो उठते हैं और मौसम के बदलने की तरह हमारी जिंदगियों में परिवर्तन आ जाता है . इन सारे बदलावों में जो बात एक सी है वह यह कि सबकी शुरुआत कल्पना से, उम्मीद से हुई. उम्मीद करना मतलब बाज़ी लगाना है. उम्मीद करना मतलब दांव लगाना- भविष्य पर, अपनी चाहतों पर, और उस संभावना पर कि हताशा और सलामती से बेहतर है खुला दिल और अनिश्चितता. उम्मीद करना खतरे से खाली नहीं, मगर फिर भी यह भय के विपरीत है, क्योंकि जीना मतलब जोखिम उठाना है.

यह सब मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि उम्मीद कोई लॉटरी का टिकट नहीं जिसे आप अपनी मुट्ठी में जकड़े सोफे पर बैठे-बैठे अपने भाग्य पर इतराएँ. ऐसा मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि उम्मीद वह कुल्हाड़ी है जिससे आपद काल में दरवाज़े को तोड़ गिराया जाता है, क्योंकि उम्मीद का काम है आपको दरवाजे से सुरक्षित बाहर ठेल देना, क्योंकि उम्मीद भविष्य को अंतहीन जंग से, धरती की सम्पदा के खात्मे से, और गरीब और हाशिये के लोगों के शोषण से परे ले जाने के लिए सब कुछ करेगी. उम्मीद का मतलब सिर्फ इतना है कि दूसरी दुनिया मुमकिन हो सकती है, पर न उसका कोई वादा है और न गारंटी. उम्मीद कार्रवाई की मांग करती है; उम्मीद के बिना कार्रवाई नामुमकिन है. तीस के दशक में उम्मीद पर किये अपने भारी-भरकम शोध प्रबंध की शुरुआत में ही जर्मन विचारक एर्न्स्ट ब्लोक ने लिखा है, " इस भावना के कारोबार को दरकार है उन लोगों की जो अपने आप को सक्रिय तौर पर झोंक दें उसमें जो तैयार हो रहा है, और जिस से खुद उनका भी सरोकार है." उम्मीद करने का मतलब है अपने आप को भविष्य को सौंप देना, और भविष्य के प्रति यह प्रतिबद्धता ही वर्तमान को रहने लायक बनाती है.

-अमेरिकी एक्टिविस्ट-लेखिका रेबेका सॉलनिट अपनी पुस्तक होप इन दि डार्क: अनटोल्ड हिस्ट्रीज़,वाइल्ड पॉसिबिलिटीज़ में

शनिवार, 28 अगस्त 2010

अमेरिका में शिवसेना!


अमरीकी सेनेट ने सीमा सुरक्षा विधेयक (बॉर्डर सिक्योरिटी बिल) को मंज़ूरी क्या दी, हमारे देश में हो-हल्ला मच गया. बहुत संभव है कि इस विधेयक की ओर भारत में किसी का ध्यान भी नहीं जाता अगर इसके अनुषंग से सेनेट ने एच-1बी और एल-1 वीज़ा के शुल्क में भारी बढ़ोतरी की घोषणा न की होती. किसी ने इस कदम को 'डिस्क्रिमिनेटरी' कहा तो किसी ने 'प्रोटेक्शनिस्ट' बताया. जैसा कि कहा जा रहा है भारतीय आईटी कंपनियों के संयुक्त मुनाफे पर बीस से पच्चीस करोड़ डॉलर वार्षिक तक का असर पड़ने की संभावना है. यह भी उम्मीद है कि भारत सरकार इसके खिलाफ विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू टी ओ) में शिकायत करे.

इस हो-हल्ले से परे एक नज़र अमरीका की राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर डालें तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है. इक्कीसवीं सदी का पहला दशक 'अमेरिकन ड्रीम' के लिए बड़ा उथल-पुथल भरा रहा; 'नाइन-इलेवन', गले की हड्डी बन चुके दो सामरिक अभियान (अफगानिस्तान और इराक),'दि ग्रेट रिसेशन' और पहले काले राष्ट्रपति का चुनाव जैसी घटनाएँ इसी दशक में हुईं. महामंदी के चलते व्यापक बेरोज़गारी, गृह-ऋण की किश्तें न चुका पाने के कारण हुई लाखों बेदखलियों के कारण फैले असंतोष और दो गैरज़रूरी लड़ाइयों के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश इत्यादि कारणों से गुज़रे दशक की तुलना कई बार साठ के दशक से की गई जब अमरीका में कुछ कुछ ऐसा ही माहौल था.

इस में कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रपति चुनावों में बराक ओबामा की सफलता के पीछे अफ्रीकी-अमरीकी समाज,श्रम संगठनों और अन्य प्रगतिशील हलकों का बहुत बड़ा हाथ है. इसके अलावा अमरीका के लैटिनो मतदाताओं की बदौलत नेवाडा, कोलोराडो, न्यू मेक्सिको, नॉर्थ कैरोलिना जैसे राज्यों में ओबामा को जॉन मै'केन के खिलाफ निर्णायक बढ़त प्राप्त हुई. पर पिछले डेढ़ साल के अपने कार्यकाल में राष्ट्रपति ओबामा से लगाई गई उम्मीदें पूरी नहीं हुईं. विदेश नीति के मामले में तो राष्ट्रपति ओबामा अपने पूर्ववर्ती की परंपरा का ही निर्वाह कर रहे हैं. इतना ही नहीं स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार (हेल्थ केयर रिफ़ॉर्म बिल) जैसे  अत्यंत महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर भी जनहित के आगे कॉर्पोरेट जगत के हितों को तरजीह दी गई. 

अनुमान है कि बराक ओबामा के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से नफरत फ़ैलाने वाले समूहों की संख्या (हेट ग्रुप्स) की संख्या अमेरिका में दोगुनी हो गईटी पार्टी मूवमेंट नाम का एक राजनीतिक आन्दोलन भी पिछले साल ही अस्तित्व में आया. अपने नाम के अनुसार तो यह आन्दोलन अमरीकी क्रांति की एक प्रमुख घटना 'बॉस्टन टी पार्टी' से प्रभावित  है जिसका उद्देश्य करों में बढ़ोतरी का विरोध करना है, पर इसका चरित्र घोर दक्षिणपंथी है. और यह आन्दोलन बड़ी तेज़ी से सारे अमरीका में फ़ैल रहा है. इन हालातों के मद्देनज़र ही प्रसिद्ध अमरीकी विचारक नोम चोमस्की ने हाल ही में कहा था कि उन्हें अमरीका में फासीवाद की आहटें सुनाई दे रही हैं. इस सिलसिले में एरिज़ोना राज्य द्वारा अप्रैल माह में पारित क़ानून एसबी 1070 दृष्टव्य है. बहुत सी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का दोष शरणार्थियों,प्रवासियों और बाहरी समझे जाने वाले लोगों के मत्थे मढ़ना एक आम बात है. सीमा पार कर भारत आने वाले बांग्लादेशियों और मुंबई पहुँचने वाले उत्तर प्रदेश-बिहार के लोगों को लेकर हल्ला हमारे यहाँ भी मचता ही रहता है. एरिज़ोना राज्य का यह कानून राज्य पुलिस को अवैध आप्रवासन से निबटने के लिए असीमित अधिकार देता है. इसके बहुतेरे प्रावधानों में से एक के तहत पुलिस केवल शक़ के आधार पर आप्रवासियों को रोक कर उनसे पूछ-ताछ कर सकती है और कागज़ात तलब कर सकती है. सत्रह अन्य राज्य भी इसी तरह के  नस्ली पूर्वग्रह से ग्रस्त क़ानून बनाने के लिए अपने सदनों में विधेयक पेश कर चुके हैं.

ज़ाहिर है कि इस दक्षिणपंथी उभार के बीच ओबामा की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरता जा रहा है. फिर अमरीकी सेनेट और कांग्रेस के लिए मध्यावधि चुनाव नवम्बर में होने वाले हैं. इस सीमा सुरक्षा विधेयक (और उससे जुड़ी वीजा शुल्क में बढ़ोतरी) को इन दो बातों के आलोक में देखा जाना चाहिए. इस संवेदनशील मुद्दे पर बनी द्विपक्षीय सहमति भी देखते ही बनती है (यह प्रस्ताव ध्वनि-मत से पारित हुआ है). इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि एच-1बी और एल-1 श्रमिक अमरीका की कुल श्रमिक आबादी का एक हजारवां हिस्सा भी नहीं है. 

वीज़ा शुल्क में बढ़ोतरी से होने वाली अतिरिक्त आय का उपयोग अवैध आप्रवासन पर रोक लगाने के लिए अमरीका की दक्षिणी सीमा पर सुरक्षा मज़बूत करने के लिए किया जाने वाला है. उम्मीद की जा रही है  कि इस विधेयक के द्वारा ओबामा के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार लम्बे समय से अटके पड़े आप्रवासन सुधार विधेयक (इमिग्रेशन रिफ़ॉर्म बिल) के लिए ज़मीन तैयार कर रही है और यही इस कदम का सबसे सकारात्मक पहलू भी है.  मध्य और दक्षिण अमरीका के गरीब देशों से बेहतर ज़िन्दगी की उम्मीद लिए बहुतेरे लोग चोरी-छुपे 'लैंड ऑफ़ अपॉर्चुनिटीज़' पहुँचते हैं. मगर  वैध नागरिकता के अभाव में यहाँ कदम कदम पर शोषण का शिकार होते हैं. वे  कमरतोड़ मेहनत करते हैं, बिना किसी सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य बीमा के एक निहायत असुरक्षित जीवन बिताते हैं  और नस्ली भेदभाव का सामना  भी करते हैं. अमरीका में रह रहे ऐसे लाखों लोगों को आप्रवासन सुधार विधेयक के अंतर्गत नागरिकता प्रदान किये जाने की योजना है. अगर सचमुच ऐसा हुआ तो इन लाखों जिंदगियों में रौशनी लाने में सहायक होने के लिए भारतीय आईटी कम्पनियाँ अपनी पीठ थपथपा सकती हैं. 'कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी' का दायरा सिर्फ अपने देश तक ही सीमित तो नहीं होता!


इसी से जुड़ी एक और पोस्ट यहां देखें…


फिलहाल अमेरिका में रह रहे भारत भूषण तिवारी का यह आलेख 14 अगस्त को दिल्ली के दैनिक भास्कर में 'वीज़ा शुल्क का सामाजिक पक्ष' के शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। जनपक्ष के पाठक उनसे अच्छी तरह परिचित हैं।


सोमवार, 23 अगस्त 2010

टाय स्टोरी 3 की एक मार्क्सवादी समीक्षा

मुझे पता नहीं कि टॉय स्टोरी ३ आप लोगों ने देखी है या नहीं,पता नहीं यह फिल्म भारत में अब तक रिलीज़ भी हुई है या नहीं. इसके बावजूद इस फिल्म की यह (मार्क्सवादी)समीक्षा आप लोगों से साझा करने का लोभ-संवरण नहीं कर पा रहा हूँ. याद नहीं कि इस से अच्छी समीक्षा मैंने पहले कभी पढ़ी हो. http://leninology.blogspot.com/ इसी लेखक का ब्लॉग है- भारत भूषण तिवारी
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People say the most unlikely things about films. They say Toy Story 3 is a miraculous film. They say it's a marxist parable about exploitation and authority. Or a treatise on Stalinism, or the Nazi holocaust. Neither Walt Disney nor its Pixar subsidiary will comment to make it clear which of the various interpretations is accurate. John Lasseter, whose long apprenticeship as a writer in the CGI end of the business has culminated in the Toy Story franchise, won't speak up either. This is poor customer service. Someone, somewhere, has to break the silence and let us the consumers know what the commodity does, forchristsake. Well, here's a thought.

Toy Story 3 is a story of how freedom is achieved through commodification, and how "the consent of the governed" roughly equals the willing embrace of bondage. You only have to bear in mind that the main characters are themselves commodities. It's a jocular, mocking, morality story about toys, their particular role in pedagogy and socialisation, the pseudo-history<http://www.thirdworldtraveler.com/Pilger_John/Have_Nice_War_DV.html> and televisual cliches they condense. Toys are a micro-cosm of the adult universe, produced so that the child doesn't have to invent the mainsprings of her future life, but can instead go about constructing her ego-ideal around these always-already present objects. They come laden with meanings which naturalise the myths of adult life, meanings that the franchise knowingly smirks about but doesn't really explore or problematise. They allow for the minimum of creative input and construction from the child.

In the franchise, the toys inexplicably have personalities, aspirations and purposiveness remarkably like those of their human masters. In fact, in the CGI universe, their level of reality is no different from that of their owners (who are, in their different ways, also commodities). But their ultimate fulfilment is in being owned, being put to work, "being there for" Andy. That this "being there for" involves being totally placid, pliable, silent and impersonal does not detract from their, er, humanity. That is the required performance. Everyone, and everything, has its place in the Toy Story scheme of things. That scheme is a hierarchy of commodities with toys near the bottom, subordinate and devoted to their owners. And ultimately, their devotion is reciprocated as, when the time comes for Andy to go to college, he emotes more about parting with his toys than he does about parting with his relatives.

Any attempt to break free of such mastery is illusory, merely a search for another master who will be even more tyrannical. When, after years of neglecting them, Andy appears to leave most of his toys out for garbage collection before heading off to college, the toys respond by sneaking into another box of toys destined for donation to the Sunnyside Day Centre. They refuse to heed Woody's pleas that Andy didn't mean for them to be sent to the incinerator, and instead revel in what appears to be a toy utopia, "without owners". But utopia is soon revealed as a totalitarian nightmare run by an embittered big boss toy named Lotso. The toys are forced to stay in a room where they are smashed up by crazy, dysfunctional kids who don't know how to play with toys. Buzz Lightyear, brainwashed (re-programmed to factory settings) by Lotso and his henchmen, is chosen to guard the prisoners. (Worth saying, this is the first scene in which any black characters appear at all. It is also the scene where the usual Toy Story ritual of sado-comical limb amputating, beheading and eye-gouging is repeated with maximum gusto.)

When the toys orchestrate the standard great escape from the prison camp, it is foiled by Lotso and his henchmen. There follows a cliched scene wherein the bad guy tries to break the defiance of the good guys with a demoralising patter about how the world works, and how they'd best try to fit in. Among the toys, Barbie suddenly erupts with the indignant cri de coeur: "Government should be based on the consent of the governed, not the threat of force!" It is immediately ironised, because such earnest expostulations don't really fit in with the tone of the film. But the writers will certainly have been aware of the long tradition of Disney films regurgitating tropes from liberal political theory, albeit slightly more subtly than this. Not only that, but they will be aware that the first CGI Barbie movie, adapted from the Nutcracker, was based around precisely this struggle between liberalism and tyranny. (I watched it with my nieces one day.) This is merely one example of the constant self-referential ironizing that regurgitates these tropes in a knowing way without really problematising them. And of course, the "consent of the governed" that is referred to here is the commodity's enjoyment in bondage, her revelling in being used and owned by a master, her sense of freedom in such subjection.

The story is thus an ironic, potted re-telling of American mythologies, as related by commodites, especially through the medium of television. Woody and Buzz Lightyear, the main characters, are traditional models of upright American masculinity, Woody a fifties prototype of the overland frontiersman, Buzz Lightyear a sixties prototype of the space frontiersman. The female characters exist principally as helpmeets and romantic encounters for the toy boys, highlighting their natural heteronormativity, confirming their dominant status, reinforcing a gendered dichotomy that, as everyone knows, real toys themselves do a great deal to produce. The toys exist as a community of sorts, a community of heroes, living the strenuous life, their shared pain and sacrifice bonding them together, the mortal peril elevating them to new planes of existence - all of this struggle so that they can continue to be the willing bonded serfs of rich, white yanqui scum. The narrative confirms that commodities are the most important things in life, real friends, closer friends than anyone you'll ever meet, and that to be a commodity is the most rewarding mode of existence. The latter claim is hardly unique to Hollywood films, but in drawing out and embracing the servitude implicit in commodification. Toy Story takes it a step farther than others.

The extravagant praise for the Toy Story franchise therefore demands some sort of explanation. It is a crashingly dull series, manipulative and predatory toward child consumers, tedious in its little nudge-nudge gestures to adult consumers, punctuated with aesthetic cliches that don't really qualify as ironic (oh the weather's taken a bad turn, so there must be trouble afoot), etc. I suppose the terms "feel good" and "life-affirming" must apply here. The films leave a warm little glow in the heart, reminding you that your alienated, commodified relationships are perfectly normal, human, desirable and moreover actually protected as human rights in the advanced capitalist states - it's in the constitution, dammit. There's also, though, a calculated element of Rorschach, wherein elements and motifs from history and ideology are scavenged and re-deployed, so that you can retrospectively read into the movie - whose effects you have just involuntarily responded to at a basic physical level - whatever rationalisation for so responding that makes you good with it. Indeed, there is marxism in the film, and the American revolution, and Stalinism, and the Nazi holocaust, and freedom, and sacrifice, and family values, and so on... because the film proves that all such aspects of experience are susceptible to being broken up and rearticulated in the commodity form. It is capital's highest tribute to itself, to its mode of production, distribution and exchange, its ability to convert all materials into some exchangeable, fungible base. In the furnace of capitalist culture, all of human existence is silly putty or play doh, malleable, protean, and saleable. That too is the basic message of the Toy Story franchise.

बुधवार, 23 जून 2010

इस पीड़ा को अगर मैं व्यक्त नहीं कर सकती… मैं ज़रूर उस पीड़ा से मर जाउंगी.


यह पीस हमें जनपक्ष के नियमित लेखक साथी  भारत भूषण तिवारी  ने भेजी है। कला के प्रतिरोध के एक प्रभावी हथियार के रूप में भूमिका को स्पष्ट करता यह गद्य शायद हिन्दी साहित्य में बढ़ते कलावादी रुझान के माहौल में एक प्रभावी हस्तक्षेप है।

प्रतिरोध को मैं हमारी ज़िंदगियों की विभीषिकाओं, विसंगतियों को महसूस करने हेतु किसी को उत्साहित करने वाले जेनुइन साधन के तौर पर देखती हूँ. सामाजिक प्रतिरोध कहता है कि जिस तरह हम जी रहे हैं, हमेशा उस तरह जीना ज़रूरी नहीं है. अगर हम खुद शिद्दत से महसूस करते हैं, और शिद्दत से महसूस करने के लिए खुद को और औरों को उत्साहित करते हैं, तो बदलाव लाने के हमारे उत्तरों का बीज हमें मिल जाएगा. क्योंकि जब आप जान जाते हैं कि जिसे आप महसूस कर रहे हैं वह क्या है, जब आप जान जाते हैं तो आप शिद्दत से महसूस कर सकते हैं, शिद्दत से प्यार कर सकते हैं, ख़ुशी महसूस कर सकते हैं, और फिर हम मांग करेंगे कि हमारी ज़िंदगियों के सभी हिस्से वैसी ख़ुशी पैदा करें. और अगर ऐसा नहीं होगा तो हम पूछेंगे,"ऐसा क्यों नहीं हो रहा है?" और यह पूछना ही अनिवार्यतः हमें बदलाव की तरफ ले जाएगा.




इसलिए सामाजिक प्रतिरोध और कला मेरे लिए अभिन्न हैं. मेरे लिए ला के लिए कला का वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है. 'ईदर' कला 'ऑर' प्रतिरोध जैसी कोई बात नहीं है. मैंने जिस बात को गलत पाया, मुझे उसके खिलाफ बोलना ही था. मैं कविता से प्यार करती थी, मैं शब्दों से प्यार करती थी. पर जो सुन्दर था उसे मेरी ज़िन्दगी को बदलने का मकसद पूरा करना था, वरना मैं मर जाती. इस पीड़ा को अगर मैं व्यक्त नहीं कर सकती और उसे बदल नहीं सकती, तो मैं ज़रूर उस पीड़ा से मर जाउंगी. और यही सामाजिक प्रतिरोध का आग़ाज़ है.





"ऑड्री लॉर्ड", ब्लैक वूमन राइटर्स एट वर्क . संपा: क्लॉडिया टेट.  न्यू योंर्क: कॉन्टिनम, 1983,पृ. 100-106.

शुक्रवार, 4 जून 2010

मास्को,बीजिंग और मार्क्सवाद

( अंतर्राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट आंदोलन के इतिहास में चीन और रूस दृष्टिकोणों का आपसी मतभेद बेहद रोचक अध्याय है…उस दौर को समझने के लिये भी और आगे के रास्ते की तलाश के लिये भी। इसी विषय पर (विजय प्रसाद की पुस्तक 'दि डार्कर नेशन्स : अ पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ़ दि थर्ड वर्ल्ड' के एक अध्याय बाली: डेथ ऑफ़ दि कम्युनिस्ट्स का अंश यहां प्रस्तुत है जिसे उपलब्ध कराया है हमारे नियमित लेखक भाई भारतभूषण तिवारी जी ने)




गठबन्धनों और क्रांति के सवाल पर मॉस्को और बीजिंग के बीच सैद्धांतिक एकमत बिलकुल न था. विवाद कई मुद्दों पर छिड़ते थे.  एक विचार पद्धति के अनुसार हर समाज के लिए यह ज़रूरी था कि वह पहले अपने घरेलू उद्योग का विकास करे, और उसके बाद अर्थात उत्पादन के साधन सुस्थापित हो जाने पर ही नैतिक रूप से जड़ हो चुके बुर्जुआ वर्ग पर सर्वहारा काबू पा सकता है. इस दृष्टिकोण का मानना था कि इतिहास को अवस्थाओं में आगे बढ़ना होगा, किसी समाज के सामंती अवस्था से पूंजीवादी अवस्था में प्रवेश कर जाने पर ही समाजवाद की ओर अवस्थांतर संभव होगा. एक अन्य विरोधी विचार का कहना था कि जिस प्रकार सांवले राष्ट्रों को स्थायी परवशता की अवस्था में रखा गया था, पूंजीवादी समाजों के तौर पर विकसित हो पाना उनके लिए असंभव होगा. विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय बुर्जुआ पूंजीवादी समाज विकसित करने में सक्षम होगा ऐसी उम्मीद करना अव्यवहारिक है. इसलिए साम्यवादियों को सत्ता हथिया कर, नए राज्य को अंतर्राष्ट्रीय पूँजी से अलग रखकर, देश को प्रयत्नपूर्वक इन अवस्थाओं से ले जाना होगा. चीन में लू शाओ-ची ने जहाँ 'अवस्थावादी' (stagist) नज़रिया सामने रखा, वहीं लिन बियाओ ने 'अबाधित क्रांति' का दृष्टिकोण अपनाया. मॉस्को में और अन्यत्र भी ऐसे मतभेद प्रकट हुए.


इन बहसों से परे, साठ के दशक तक मॉस्को और बीजिंग दोनों ने ऐसे सिद्धांत प्रस्तुत किये जिन्होंने बुर्जुआ लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ साम्यवादी गठबन्धनों पर स्वीकृति की मुहर लगा दी. 1960 में सोवियत संघ ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक राज्य की अवधारणा सामने रखी जिसका तात्पर्य तीसरी दुनिया के अंतर्गत उभरे गैर-साम्यवादी राष्ट्रीय मुक्ति राज्यों से था. ये राज्य समाजवाद के अपने अलग -अलग संस्करणों (अरब समाजवाद, अफ़्रीकी समाजवाद, नासकोम) के आधार पर शासन करते थे. बीजिंग ने नव लोकतंत्र का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसमें साम्राज्यवाद के विरुद्ध चार वर्गों (सर्वहारा, खेतिहर, निम्न-मध्य वर्ग अर्थात Petty Bourgeoisie और घरेलू पूंजीपति) का गठजोड़ खड़ा होकर समाजवाद की दिशा में देश का विकास करेगा. इन वर्गों की अगुवाई कम्युनिस्ट पार्टी करेगी जो विकास दर बढाने के लिए पूंजीवाद का विकास और समाजवाद की ओर अवस्थांतर करेंगे. इसलिए मॉस्को और बीजिंग दोनों ने सांवले राष्ट्रों के साम्यवादियों को राष्ट्रीय बुर्जुआ के लिए गुंजाइश रखने का निर्देश दिया; अर्थात उन्हें 'राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चों' में काम करके भविष्य के समाजवादी अवस्थांतर के लिए ज़मीन तैयार करनी होगी. 

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक राज्य एवं नव लोकतंत्र की संकल्पनाओं से मॉस्को और बीजिंग को गैर-साम्यवादी शासन व्यवस्थाओं और राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों को गैर-औद्योगिक विश्व के लिए पर्याप्त मान लेने  का अवसर मिला. मॉस्को और बीजिंग के बीच के टकराव की वजह से गठबंधन तैयार करने में विवेक की कमी को और बल मिला. राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चों को बढ़ावा देने के आगे साम्यवाद का विकास लगभग गौण हो गया था. सामाजिक उत्पादन का आधार बदलने हेतु शोषित और अन्य वर्गों को संगठित करने वाली उभरती हुई कम्युनिस्ट पार्टियों के मुकाबले  समाजवाद की माला जपने वाले और राज्य पर नियंत्रण वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक नेताओं को इस विश्लेषण पद्धति के आधार पर सोवियत संघ और चीन ने शायद ज्यादा समर्थन दिया. नासिर का मिस्र, क़ासिम का इराक़, बूमदियन का अल्जीरिया, इंदिरा गाँधी का भारत, ने विन का बर्मा, सेकू तूरे का गिनी, अयूब खान का पाकिस्तान और मोदिबो केईता का माली, सोवियत संघ और चीन के कृपापात्र बन गए बावजूदसके कि इनमें से अधिकतर नेताओं ने अपनी स्थानीय कम्युनिस्ट पार्टियों का दमन किया.

साठ के दशक की शुरुआत तक एशिया, अफ्रीका और अरब देशों में (किसी गैर-साम्यवादी राज्य में स्थित) तीन सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियाँ थीं क्रमशः इंडोनेशिया की पीकेआई, सूडान की अल-शुयुई अल-सूडानी (एससीपी) और इराक़ी कम्युनिस्ट पार्टी (आईसीपी). इन पार्टियों को अपने-अपने समाजों के बड़े हिस्से का सम्मान और आदर प्राप्त था और ट्रेड यूनियनों, महिला संघों और युवा संगठनों जैसे महत्त्वपूर्ण जन-संगठनों पर भी उनका नियंत्रण था. उसके बाद एक और दशक पूरा होते होते ये कम्युनिस्ट पार्टियाँ बर्बाद हो गईं जब राष्ट्रीय बुर्जुआ ने (अमेरिका  से मिली सहायता के साथ-साथ बीजिंग और मॉस्को के इस तरफ से आँखें मूँद लेने से) उनका उन्मूलन करने हेतु सेना को बैरकों से बाहर निकाला. सोवियत संघ और चीन ने इनमें से किसी एक भी अवसर पर कठोर रुख अपनाया होता तो इस बात से अन्य जगहों के साम्यवादियों को अपना काम जारी रखने का हौसला मिलता. ऐसा होने की बजाय इस चुप्पी से डरकर साम्यवादियों ने उन्हीं राजनीतिक शक्तियों से गठबंधन किया जो उनका इस्तेमाल करके उन्हें नष्ट कर देना चाहती थीं.