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रविवार, 25 अगस्त 2013

शास्त्र सम्मत नहीं है अयोध्या की चौरासी कोस की परिक्रमा

(अरुण जी का यह लेख आज आगरा से निकलने वाले दैनिक कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ है. यह लेख धर्म के अपने टूल्स से हालिया घटनाक्रम की विवेचना कर स्पष्ट बताता है कि किस तरह इस कथित धार्मिक यात्रा का उपयोग आगामी लोकसभा चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है)






अरुण कुमार त्रिपाठी



 विश्व हिंदू परिषद की तरफ से प्रस्तावित अयोध्या की चौरासी कोस की परिक्रमा न तो शास्त्र सम्मत है न ही वह 18 वीं सदी  में शुरू हुई परंपरा के अनुरूप।  उसका मकसद गलत समय पर गलत परंपरा डालना है और आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर राजनीतिक ध्रुवीकरण करना है। इसलिए यह परंपरा के नाम पर एक नया विवाद खड़ा करने की कोशिश  है।  यह बात  धर्माचार्यों  और राजनीतिज्ञों ने महसूस की है। 

ब्रजाचार्य पीठाधीश गोस्वामी स्वामी दीपकराज भट्ट का मानना है कि अयोध्या के चौरासी कोस की परिक्रमा की परंपरा न तो प्राचीन है न ही शास्त्र सम्मत।  इसे 18 वीं सदी में रामानंद संप्रदाय के लोगों ने शुरू किया। जब से कुंभ में नागा साधुओं के स्नान की परंपरा शुरू हुई और अयोध्या में हनुमान गढ़ी की स्थापना हुई लगभग उसी से जुड़ कर निकली अयोध्या के चौरासी कोस की परिक्रमा।  ब्रज उद्धारक नारायण भट्ट की 18 वीं पीढ़ी के आचार्य दीपक राज जी का कहना है कि  रामनंदियों और रामानुजों ने न सिर्फ अयोध्या की चौरासी कोस की परिक्रमा शुरू करवाई बल्कि मिथिला की में भी इसी तरह की परिक्रमा शुरू की।  आज लोकजीवन में किसी को इसका स्मरण भीनहीं है।  अयोध्या की भी परिक्रमा को भी किसी धर्माचार्य की मान्यता नहीं है।  नारायण भट्ट जी, माधवाचार्य जी और बल्लभाचार्य जी किसी ने भी इसे मान्यता नहीं दी है।  दरअसल चौरासी कोस परिक्रमा की परंपरा ब्रज में रही है।  वही प्राचीन है और वही शास्त्र सम्मत है। इसका जिक्र ग्राउस, ग्रियर्सन और गिलक्राइस्ट ने भी किया है।  तवारीखे फिरोजशाही में भी इसका वर्णन है। यह परंपरा कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाथ ने शुरू की थी।  दीपक राज भट्ट जी का मानना है कि राम नाम का महत्व तो  प्राचीन समय से रहा है लेकिन अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम को भगवान की मान्यता बहुत बाद में मिली है।  चौरासी कोस की यह परिक्रमा उसी राम के ईश्वरीय महत्व को स्थापित करने का प्रयास था।  अयोध्या की इस परिक्रमा का महत्व उसी तरह का नहीं बन नहीं पाया जैसे तमाम साईं हुए लेकिन सिरडी वाले के अलावा सभी का वैसा महत्व नहीं बना।  पहले तो यह महज पांच कोस की होती थी और बाद में सात फिर चौदह कोस की हो गई।  यह सब धर्मांधता बढ़ने और धर्म में राजमनीति का घालमेल होने से हुआ। जबकि अयोध्या नए घाट के निवासी धर्माचार्य रघुनाथ दास त्रिपाठी का कहना है कि अयोध्या की चौरासी कोस परिक्रमा का जिक्र अयोध्या महात्म्य में है।  यह अनादिकाल से भगवान राम से जुड़ी है।  श्री त्रिपाठी का कहना है कि वह परंपरा तो अक्षय तृतीया से जानकी नवमी के बीच होती है।  वह इस साल 25 अप्रैल से 20 मई के बीच  संपन्न हो चुकी है।  यह परिक्रमा फैजाबाद, बस्ती, गोंडा से गुजरती है। इसकी शुरुआत बस्ती जिले के मखौड़ा नामक स्थान  से होती है और रास्ते में परशुरामपुर और  विक्रमजोत वगैरह इसके पड़ाव हैं।  इसमें व्यापक तौर पर संत समाज शामिल होता है और थोड़े बहुत गृहस्थ भी।  विहिप अभी जिस परिक्रमा की बात कर रही थी उसका मकसद अलग है। राज्यमंत्री और अयोध्या के पूर्व विधायक जयशंकर पांडे का कहना है कि विहिप की इस प्रस्तावित परिक्रमा पर रोक लगाकर ठीक किया गया, क्योंकि यह धार्मिक नहीं, राजनीतिक यात्रा थी।  यह भारतीय दर्शन और परंपरा को छोड़कर नई परंपरा शुरू करने का प्रयास था। बल्कि विहिप के ज्ञापन में ही लिखा था कि वे राम मंदिर निर्माण के लिए जनजागरण के मकसद से यह करना चाहते हैं।  उनका प्रयास इस इलाके में पड़ने वाले फैजाबाद, गोंडा, बस्ती आंबेडकर नगर समेत चार-पांच लोकसभा क्षेत्रों को प्रभावित करने का है।  पर यह तो बड़बोलापन है। आखिर कोई काम शास्त्र सम्मत ही किया जाएगा ? अब कार्तिक पूर्णिमा अमावस्या के दिन तो नहीं पड़ेगी।  रामनवमी कृष्ण जन्माष्टमी के दिन नहीं पड़ेगी।  चौदह कोसी परिक्रमा संत समाज की  है उसमें गृहस्थ नहीं जाते रहे हैं।  अब उसे आम जनता से जोड़ने का उद्देश्य कुछ और है।  सवाल उठता है कि जब भाजपा की सरकार थी, तब विहिप ने क्यों नहीं की यह परिक्रमा। दूसरी तरफ शहीद शोध संस्थान फैजाबाद के प्रबंध निदेशक सूर्यकांत पांडे का कहना है कि मुलायम सिंह और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक तो विहिप के नेता अशोक सिंघल से मिलकर गलती की और फिर इस परिक्रमा पर पाबंदी लगाकर।  अब रोक लगाने से विहिप अपने  मकसद  में कामयाब हो गई है।  सपा को इस काम में अपने कार्यकर्ताओं को लगा देना था। इसके विहिप विफल हो जाती।  उनका कहना है कि यह परिक्रमा उस समय से हो रही है जब भगवान राम का जन्म होने वाला था और संतों को उसका अहसास हो गया था, लेकिन इसमें आम जन नहीं जाता।  इसकी खत्म होने की तारीख तय है, इसलिए इसे हर समय नहीं किया जा सकता। जाहिर है विहिप का उद्देश्य मंदिर आंदोलन को फिर से गरमाना है।

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लेखक जाने माने पत्रकार हैं और लोहियावादी विचारक. सम्प्रति कल्पतरु एक्सप्रेस के सम्पादक हैं.

संपर्क - tripathiarunk@gmail.com

सोमवार, 1 नवंबर 2010

मुझे नहीं लगता कि हिंदी लेखकों में पुनरुत्थानवाद की कोई लहर चल रही है। -राजेन्द्र यादव

बाबरी मस्ज़िद पर आये फ़ैसले को लेकर धीरेश सैनी ने हिन्दी के कुछ प्रमुख लेखकों से बात की है, जो समयान्तर के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुई है…इसी परिचर्चा से राजेन्द्र यादव का बयान

राजेंद्र यादव



बौद्ध धर्म की सारी किताबें, मूर्तियां और स्मारक शंकराचार्य के अनुयायियों ने नष्ट कर डाले थे। यहां तक कि बुद्ध की जो भी मूर्तियां मिलती हैं, वे अफगानिस्तान, नेपाल, तिब्बत, रंगून आदि में तो मिलती हैं लेकिन हिंदुस्तान में बुद्ध की एक भी ऐसी मूर्ति नहीं मिलती जो खंडित न हो। इस तरह हम देखते हैं कि हिंदू कम कट्टर नहीं हैं। उन्होंने बाबरी मस्जिद को भी बाकायदा योजनाबद्ध ढंग से ढहा दिया था। कुछ हिंदुत्ववादी नेता भीड़ को रोकने के नाम पर मस्जिद से बाहर खड़े रहे थे और षडयंत्र के तहत महज आधा घंटे में उसे जमींदोज कर दिया गया था। उमा भारती उल्लास में मुरली मनोहर जोशी के कंधे पर बैठकर तस्वीरें खिंचवा रही थीं। उमा भारती और ऋ तंभरा के आग उगलते हुए भाषण बाकायदा रिकॉर्ड हैं। हाई कोर्ट के फैसले में इसका कोई जिक्र नहीं है। यह मानकर चला गया है कि जहां बीच का गुंबद था, वहीं नीचे राम का जन्म हुआ था। कोर्ट ने जिस तरह जमीन का बंटवारा किया है, उसमें बीच में रामलला का मंदिर है, एक तरफ राम चबूतरा है और एक तरफ सीता रसोई। कोर्ट द्वारा मुसलमानों को दिए गए हिस्से में मस्जिद बनाई भी जाती है तो वह राम चबूतरे और सीता रसोई के बीच में होगी। जाहिर है, रोज दंगे होंगे। एक तरह से यह जान-बूझकर किया गया लगता है कि बहुसंख्यक आतंक में दबकर मुसलमान खुद ही कहें कि भैया इस जगह को भी आप ही ले लें। यह फैसला निश्चय ही अन्यायपूर्ण, अवैध और अतार्किक है। यह तर्क और कानून के ऊपर आस्था की विजय है
आखिर कोर्ट ने यह कैसे तय कर लिया कि राम कहां पैदा हुए थे? अयोध्या में ही राम के करीब 10 मंदिर ऐसे हैं जहां राम का जन्मस्थान होने का दावा किया जाता है। कोर्ट ने कानून पर आस्था को तरजीह दे दी है तो हर कहीं आस्था और अंधविश्वास को वैधता मिल जाएगी। सती, नर बलि आदि को भी परंपरा और आस्था के नाम पर सही ठहराया जा सकता है। फिर तो खाप-पंचायतें भी प्रेमी-प्रेमिकाओं के गले काटने को अपनी आस्था और परंपरा के आधार पर अपना अधिकार मानेंगी। ओझे, सयाने, झाड़-फूंक करने वाले औरतों को डायन बताकर क्यों नहीं पीटेंगे?
बाबरी मस्जिद तोड़ी गई थी तो हिंदुओं ने पाकिस्तान और बांग्लादेश में मंदिर तोड़े जाने का रोना रोया था। तरुण विजय आज भी गिनाते रहते हैं कि पाकिस्तान में कितनी मस्जिदें तोड़ी गईं और मुंबई में ब्लॉस्ट हुए। एक बात बताइए कि आप तो खुलेआम मस्जिद तोड़ दें और फिर चाहें कि दूसरा पक्ष कुछ भी न करे। हिंदुस्तान में हिंदुत्व की राजनीति करने वाले यह भी भूल जाते हैं कि उनकी वजह से पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू कितने असुरक्षित हो जाते हैं। बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के उत्पीडऩ को आधार बनाकर तस्लीमा नसरीन ने लज्जा उपन्यास लिखा था तो पांचजन्य ने कहा था कि देखिए, मुसलमान कितने अत्याचारी हैं। लेकिन, हिंदुस्तान में भी बहुसंख्यकों के आतंक का ही नतीजा है कि बाबरी मस्जिद के ऐसे फैसले को लेकर मुसलमान चुप हैं। कुछ बूढ़े-बुजुर्ग जो लंबे समय से इस मसले में लगे हैं, सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं पर सच कहूं तो मुझे सुप्रीम कोर्ट से भी कोई बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है। लेकिन क्या वाकई इस तरह मसले का निपटारा हो सकता है? हाई कोर्ट के फैसले ने भी शांति स्थापित करने के बजाय भीतर आग लगा दी है जो फिर भड़क सकती है।
एक बात यह भी कि बाबर के एक जनरल मीर बाक़ी ने जो मस्जिद बनवाई थी, वह तो आपने तोड़ दी लेकिन देश में आप क्या-क्या तोड़ेंगे? राम पर एक बहस में हिस्सा लेते हुए मैंने कहा कि राम ने लंका पर आक्रमण किया, रावण की बहन की नाक काटी। नाक काटने के मुहावरे का सीधा अर्थ है इज़्जत लेना। बाबर भी 1,800 सैनिकों के साथ हिंदुस्तान आया था। उसने भी यहां के लोगों को मिलाकर अपना साम्राज्य स्थापित किया। फिर राम और बाबर में अंतर क्या है, जो राम का इतना महत्व गाते रहते हैं? हालांकि राम सिर्फ मिथकीय चरित्र है और उसका कोई पौराणिक महत्व भी नहीं है। वाल्मीकि से पहले राम का कहीं जिक्र शायद ही मिलता हो।
हमारी राजनीति ने सांप्रदायिक समस्याओं को इतना दूषित और जटिल बना दिया है कि कोई गुजांइश नजरही नहीं आती है। लगता नहीं है कि हम लोगों की जिंदगी शांति से गुजर पाएगी। अशांति रहेगी, आतंकवादी विस्फोट होंगे। हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को इससे कोई मतलब नहीं है, उन्हें लाशों का ढेर लगाकर दिल्ली के सिंहासन पर बैठना है। हिंदुत्व की राजनीति संगठित है और हिंदू वोटों के लालच में यूपीए सरकार का रवैया भी नर्म है। कांग्रेस कोर्ट के फैसले का समर्थन ही कर रही है। रामभक्त कोर्ट में हो सकते हैं तो कांग्रेस में क्यों नहीं?
हिंदी लेखकों ने इस मसले पर जो कुछ भी लिखा, इस फैसले को आस्था और अंधविश्वास की विजय ही बताया है। भगवान सिंह, कृष्णदत्त पालीवाल जैसे कुछ लोगों को छोड़ दीजिए जिन्होंने हिंदुत्व की बात कही है। कुछ लेखकों का स्वर नर्म हो सकता है पर अधिकांश लेखक अपने स्टेंड पर कायम हैं। मुझे नहीं लगता कि हिंदी लेखकों में पुनरुत्थानवाद की कोई लहर चल रही है।

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

यह फ़ैसला बेतुका है!

राम जन्मभूमि विवाद महज एक धार्मिक मसला नहीं है मगर पिछले दो दशकों से यह भारत के राजनीतिक मानसपटल पर काबिज है। इस फैसले को आप किस तरह देखते हैं?

इस फैसले का सार दो शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है: अपराध कथा। 1992 में एक अपराध हुआ था. बारी मस्जिद गिराई गई थी. मगर फ़र्ज़ करिए कि अपराध न हुआ होता और मामला अदालत में चला जाता. क्या आपको लगता है कि फिर किसी भी सूरत में अदालत के लिए भूमि के बँटवारे का फैसला देना संभव होता? साफ़ साफ़ कहें तो संगठित हिंदुत्व के मुद्दई जिस आधार पर ज़मीन मांगने पहुंचे थे, तब क्षतिपूर्ति की बिना पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए था. देखिये बाबरी मस्जिद वहाँ सोलहवीं सदी से थी. और उन्होंने मुक़दमा (ऐतिहासिक कालखंडों के हिसाब से) अभी अभी दाखिल किया.परिसीमन कानून कहता है कि मुकदमा विवाद की तारीख से लेकर बारह वर्षों तक दायर किया जा सकता है.

अगर बाबरी मस्जिद बनाने के लिए मंदिर तोड़ा गया था तब भी, कानूनी तौर पर, संघ परिवार का कोई हक नहीं बनता क्योंकि मस्जिद परिसीमन की अवधि से पहले मौजूद थी.

मैं 2003 से लिखता रहा हूँ कि इस मुकदमे के लिए एक नज़ीर मौजूद है. (अपने एक शोध-पात्र से उद्धृत करते हैं), "1940 में प्रिवी कौंसिल ने फैसला किया लाहौर में शहीद गंज नाम की मस्जिद थी.उस मुक़दमे में, वहां 1722 से सचमुच मस्जिद मौजूद थी. मगर 1762 के आते आते, वह इमारत महाराजा रणजीत सिंह के सिख शासन के अधीन हो गई और गुरूद्वारे के तौर पर इस्तेमाल की जाने लगी. 1935 में जाकर मुकदमा दायर किया गया कि जिसमें वह इमारत जो एक मस्जिद थी उसे मुसलमानों को लौटा दिया जाए. प्रिवी कौंसिल ने, यह मानते हुए कि 'उनकी बादशाहत धार्मिक भावना के प्रति हर वह संवेदना रखती है जो किसी उपासना स्थल को पवित्रता और अनुल्लंघनीयता प्रदान करती है, वह परिसीमन कानून के अंतर्गत यह दावा नहीं स्वीकार कर सकती कि ऐसी इमारत का इसके प्रतिकूल रूप में कब्ज़ा नहीं रखा जा सकता' यह फैसला दिया कि 'वक्फ और उसके अंतर्गत आने वाले सभी हितों के विपरीत विवादित संपत्ति पर सिखों का बारह सालों से अधिक समय से कब्ज़ा होने से, परिसीमन कानून के अनुसार वक्फ के प्रयोजन से मुतवली का अधिकार समाप्त होता है'".

उस समय अदालत ने माना था कि वह स्थल बेशक एक गुरुद्वारा था. वह विध्वंस का सवाल नहीं था. बाबरी मस्जिद उस से कहीं अधिक राजनीतिक और संवेदनशील स्थल है जैसा कि उसे बना दिया गया.

अगर मान भी लें कि वहां चार सौ सालों पहले मस्जिद की इमारत की जगह मंदिर था, तब भी तर्क के हिसाब से विश्व हिन्दू परिषद और अन्यों के कानूनी मुक़दमे को हारना चाहिए. पर इसके विपरीत अदालत ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की याचिका खारिज कर दी जो परिसीमन कानून के अंतर्गत वैध थी.

फिर एक दूसरा पहलू है. ऐसा कोई स्पष्ट शोध नहीं हुआ है कि मस्जिद के नीचे किसी मंदिर का अस्तित्व था. कई लोगों ने बताया है कि वहाँ किसी मंदिर के अवशेष हो सकते हैं. देश की राज्यव्यवस्था का दायरा पांच हज़ार वर्षों का है. हिन्दू मंदिरों और मस्जिदों को बनाने के लिए कई बौद्ध मंदिरों को तोड़ा गया था. हिन्दू राजाओं द्वारा कुछ मस्जिदें भी तोड़ी गई थीं. किसी धार्मिक निमित्त से नहीं बल्कि उस समय की राजनीतिक विशेषताओं के चलते ऐसा किया गया.क्या इसका मतलब यह है विध्वंस और वापिस मांग कर उन सबका शुद्धीकरण किया जाएगा?

बाबरी मस्जिद के मामले में कई इतिहासकारों का परस्पर विरोधी मत है की वहाँ कभी कोई मंदिर नहीं था. किसी विवाद का फैसला अदालत इस हिन्दू आस्था के आधार पर कैसे कर सकती है कि वह राम का जन्मस्थान है? अदालत में आस्था के लिए कोई जगह नहीं है.

फिर एक तीसरा पहलू भी है. मुसलमान मस्जिद बनाते हैं या नहीं यह एकदम अलग प्रश्न है. वह मुसलमानों का चुनाव है. पर चूंकि मस्जिद तोड़ी गई थी, ज़मीन मुसलमानों को लौटाई जानी चाहिए थी. कई नौजवान निराश हैं. कई मुसलमानों ने कहा कि वे उस स्थान पर एक स्कूल बनाते या सभी समुदायों के लिए कोई अस्पताल बना देते पर ज़मीन का बंटवारा नहीं किया जाना चाहिए था. ज़मीन मुसलमानों के पास वापिस नहीं जानी चाहिए यह तर्क समझ से परे है. कहा जाता है कि कुरान में तक यह कहा गया है कि राम और कृष्ण पैगम्बर थे और मुहम्मद साहब आखिरी पैगम्बर. यह कई मुस्लिम विद्वानों का निष्कर्ष है.

यह फैसला बेतुका है। चलिए एएसआई की विवादास्पद रिपोर्ट को मान लेते हैं कि वहाँ मंदिर था. मुसलमान भी उसे मान लेते. वे वहाँ मस्जिद न बनाने का निर्णय ले सकते थे मगर ज़मीन उन्हें दी जानी चाहिए थी. वे वहाँ कुछ भी बनवाते. यह उनका मानवीय और सामुदायिक अधिकार है. अगर मंदिर तोड़ा गया था तब भी एक पांच सौ साल पुरानी इबादतगाह से मुसलमानों को हटाने में भला क्या तुक है? अदालत ऐतिहासिक घटनाओं का आकलन करने में अदालत असमर्थ है.

यही तो मैं कह रहा था. उनका निष्कर्ष यह है कि हिन्दू ऐसा मानते हैं कि विवादित स्थल राम का जन्मस्थान था. और इस जतन में उन्होंने दक्षिणपंथी इतिहास को वैध साबित कर दिया जो ऐतिहासिक पौलेमिक्स के बारे में अत्यंत विवादग्रस्त रहा है.

धार्मिक आस्था का लिहाज करें तब भी इतिहास को दुरुस्त करने के लिए आप कितना पीछे जा सकते हैं? हमारे जैसे सेकुलर देश में इसकी बिलकुल इजाज़त नहीं दी जा सकती। मैं कठोर शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता पर यह सियासी बेईमानी है. हमारी सियासी पार्टियों ने स्टैंड लेने से इनकार कर दिया. अगर सरकार ने स्टैंड लिया होता तो (मस्जिद का) विध्वंस होता ही नहीं. अब हरेक पार्टी कह रही है कि अदालत फैसला करे. यह सियासी मुद्दा है. सियासी पार्टियाँ कहती हैं कि शासन के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अदालत दखलअंदाज़ी न करे. पर अब हर पार्टी के लिए यह कह देने में सुभीता है कि अदालत फैसला कर सकती है. सियासी पार्टियों को स्टैंड लेना होगा. आखिरकार यह सेकुलर भारत है. अदालत मुक़दमे की सुनवाई करेगी, और निष्कर्ष देगी. पर इस मामले में न तो क़ानूनी नज़ीरों को और न ही सामान्य विधि (common law) पर ध्यान दिया गया है. इन्साफ करने की बजाय न्यायाधीशों ने निगहबानों जैसा बर्ताव किया है.

संघ परिवार ने इशारा किया है कि वह राम जन्मभूमि आन्दोलन को पुनरुज्जीवित करेगा. इस से धार्मिक समुदायों का ध्रुवीकरण हो सकता है.क्या इस निर्णय ने न्यायिक तटस्थता और वस्तुनिष्ठ तार्किकता के सिद्धांत को चोट पहुँचाई है?

बिलाशक यह फैसला बहुसंख्यावादी (majoritarian) दृष्टिकोण की ओर झुका हुआ और राम जन्मभूमि के पक्ष में है। संघ परिवार इसमें अपनी जीत महसूस कर रहा है. मगर समूची न्यायपालिका को इस तरह बुरा-भला कहना ठीक न होगा. इससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर आंच तो आई है. सच्चाई यह है कि रामलला की मूर्तियाँ वहां 1949 में रखी गई थीं. यह चोरी का मामला था. मुसलमान वहां लम्बे समय से इबादत करते रहे थे. वह एक मस्जिद थी. जब एक हिन्दू मूर्ति स्थापित की गई तो मुसलमानों के लिए यह स्वाभाविक था कि वे वहां इबादत न करें क्योंकि मूर्तिपूजा उनके मज़हब के खिलाफ है. इसलिए उन्होंने बाबरी मस्जिद में जाना छोड़ दिया. इसका यह मतलब नहीं कि वहां उनका अधिकार नहीं रहा. 1949 में अदालत ने वहां किसी भी प्रकार के पूजापाठ पर रोक लगाई थी. मगर अब उसने फैसला दिया है कि 1528 में एक मंदिर तोड़ा गया था और इस तरह एएसआई की विवादास्पद रिपोर्ट को वैध ठहराया है. अगर मंदिर तोड़ा गया था तब भी यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मस्जिद अवैध थी.

यह भूस्वामित्व विवाद का एक दीवानी मामला था. मगर मुद्दा राजनीतिक तौर पर इतना संवेदनशील है कि यह फैसला अप्रत्यक्ष रूप से बाबरी मस्जिद विध्वंस को, जो एक आपराधिक कृत्य था, उचित ठहराता है. इस बारे में आपका क्या कहना है?

हाँ, इस फैसले ने कई चीज़ों को नुकसान पहुँचाया है और भारत के सेकुलर नीतिशास्त्र को चोट पहुँचाई है. यह तो ऐसा हुआ कि कहा जाए: मस्जिद तोड़ो और हिन्दुओं को दे दो. असलियत में ज़मीन का दो-तिहाई हिस्सा हिन्दुओं को ही मिल रहा है. न्यायालय में किसी निर्णय पर पहुँचने का आधार आस्था नहीं हो सकती.

मीडिया लोगों से 'मूव ऑन' करने को कह रहा है। किधर 'मूव' करें? किसकी ओर 'मूव' करें? किसी अपराध को भुलाया नहीं जा सकता. यह न्यायालय की ज़िम्मेदारी है कि अपराध करने के बाद दोषी बच न जाए. मुसलमानों का संपत्ति के प्रति अधिकार छीना जा रहा है. कॉमन लॉ के अनुसार अगर पुत्र पिता की हत्या करता है तो वह पिता की संपत्ति का अधिकारी नहीं रहता. मगर यहाँ जिन गुंडों ने मस्जिद गिराई उन्हें वह मिल गया जो वे चाहते थे.

सच्चर कमिटी रिपोर्ट के लेखक के तौर पर आपने मुसलमानों की गरीब हालत को दर्ज किया है. इस तरह के फैसले से अल्पसंख्यक समुदाय को क्या सन्देश जाएगा?

यह बेशक एक बहुत खतरनाक सन्देश होगा. यह सेकुलर पार्टियों के स्टैंड लेने वक़्त है. 1946 में बिहार जल रहा था. हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़के हुए थे. पं. नेहरू ने एक सार्वजनिक पत्र लिखकर कहा था कि अगर दंगे नहीं रुके तो वे दिल्ली के दंगाइयों पर बम बरसाएंगे. बिहार मुस्लिम लीग का संसदीय क्षेत्र था और लीग दंगा भड़का रही थी. मगर राजनीतिक पार्टियों की वृहत्तर विज़न ने बहुत ज्यादा गड़बड़ी न होने दी. राज्य को स्टैंड लेना पड़ा और संविधान द्वारा प्रद्दत सेकुलर एथिक्स की पुनःपुष्टि करनी पड़ी. मगर मुसलमानों के संगठित मत की दुरुस्त एप्रोच देखकर अच्छा लगा. पर जैसा कि मीडिया कह रहा है उस तरह उनसे सब कुछ भुलाने को नहीं कहा जा सकता. यह भारत की कार्यप्रणाली और राज्यव्यवस्था में एक समुदाय के भरोसे का मामला है. यह अच्छी बात है कि उनकी प्रतिक्रिया बेहद संयत रही है. मुसलमानों से ही 'मूव ऑन' करने को क्यों कहा जा रहा है? यही सवाल संघ परिवार के समक्ष भी रखा जा सकता है. वे क्यों नहीं 'मूव ऑन' करते? इस फैसले से वे विजयी तो महसूस कर रहे हैं पर संतुष्ट नहीं. वहाँ की समूची ज़मीन पर वे राम मंदिर बनाना चाहते हैं. अगर यह हिन्दू पवित्रता का मामला है तो क्या ये मुस्लिम पवित्रता का मामला भी नहीं? मेरे लिए तो यह फैसला उग्र सांप्रदायिक भावनाओं के समक्ष समर्पण है.

अयोध्या की इस गड़बड़ स्थिति के लिए सिर्फ एक ही चीज़ ज़िम्मेदार है- राजनीतिक इच्छाशक्ति का कमज़ोर होना.
(दि हिन्दू और फ्रंटलाइन से साभार)
हिंदी में अनुवाद - भारत भूषण तिवारी