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शुक्रवार, 25 मार्च 2016

रमा कंवर हत्या काण्ड की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट


 ग्राम पचलासा छोटा, जिला डूंगरपुर, राजस्थान में 4 मार्च , 2016 को सुश्री रमाकुंवर को बीच चौराहे पर भीड़ द्वारा जिंदा जला दिया गया. सुश्री रमाकुंवर का 'अपराध' यह था कि उन्होंने और प्रकाश सेवक ने सात वर्ष पहले अंतर्जातीय विवाह किया था. इज्जत के नाम पर हुआ यह निर्मम हत्याकांड देश के मीडिया में अपेक्षित जगह नहीं पा सका. पीयूसीएल, डूंगरपुर इकाई ने व्यापक छानबीन के बाद यह रिपोर्ट जारी की है
यहाँ से साभार 


रमा कँवर: 'इज्ज़तके नाम हुआ हत्याकाण्ड  

डूंगरपुर जिले के आसपुर तहसील के पचलासा छोटा गाँव की रिपोर्ट
द्वारा पीयूसीएल तथ्यान्वेषण दल
तारीख : 12मार्च 2016

 राजस्थान के डूंगरपुर जिले के आसपुर तहसील के गाँव पचलासा छोटा में 4 मार्च 2016, शुक्रवार की रात, रमा कँवर नाम की युवा महिला को गाँव के चौराहे पर उसके भाइयों तथा अन्य लोगों द्वारा केरोसिन डालकर जलाकर मार डालने और फिर रातोरात शमशान में अंतिम क्रिया किए जाने की खबर 6 मार्च 2016 को स्थानीय अखबारों में पढ़कर हम स्तब्ध हो गए. अखबारों से ज्ञात हुआ कि यह मामला मृतक रमा कँवर पिता विजयसिंह व प्रकाश पुत्र कचरू सेवक के 2007 में हुए अंतरजातीय विवाह से हुए विवाद से जुडा है. आसपुर के पुलिस थाना क्षेत्र में हुई इस घटना घटने के बाद पुलिस ने उसी रात गाँव पहुँचकर मृतका की सास कलावती की रीपोर्ट के आधार पर मामला दर्ज करवाया व कारवाही शुरू की. इस मामले में आसपुर पुलिस ने पचलासा निवासी लक्ष्मणसिंह पुत्र विजयसिंह, प्रवीणसिंह पुत्र वीरसिंह, कल्याणसिंह पुत्र गौतमसिंह, इश्वरसिंह पुत्र हमीरसिंह, महेंद्रसिंह पुत्र तखतसिंह , भूपालसिंह पुत्र विजयसिंह, गजेन्द्रसिंह उर्फ़ गजराज सिंह पुत्र किशोरीसिंह को गिरफ्तार किया. लगभग 35लोगों को नामज़द किया गया. इस रिपोर्ट के बनने तक 14 लोगों की गिरफ्तारियां हो चुकी है जो इस प्रकार है: लक्षमण सिंह पुत्र विजयसिंह, प्रवीणसिंह पुत्र वीरसिंह, कल्याणसिंह पुत्र गौतमसिंह, इश्वरसिंह पुत्र हमीरसिंह, महेंद्रसिंह पुत्र तख्तसिंह, भोपालसिंह पुत्र किशोरसिंह, गजेन्द्रसिंह पुत्र गज़राज सिंह, जयसिंह पुत्र नाहरसिंह, प्रतापकंवर पत्नी वीरसिंह, मोतीकंवर पत्नी दलपतसिंह, दलपतसिंह पुत्र किशोरीसिंह, हमीरसिंह पुत्र भवानीसिंह राजपूत. पुलिस ने आरोपित लोगों के खिलाफ निम्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है धारा 302(ह्त्या), 201 (साक्ष्य विलोपित करना), 364 ( ह्त्या की नियत से अपहरण), 458 (किसी को मारने अथवा घायल करने अथवा चोट पहुंचाने अथवा जबरदस्ती रोककर रखने के उद्देश्य से रात को किसी के घर में घुसना), 323 ( स्वेच्छा से किसी को चोट पहुंचाना), 149 (unlawful assembly guilty of offense committed in prosecution of common object), 147 (Negotiable Instruments), 143 (unlawful assembly) तथा 120B (Concealing Design to commit offense).

हम सभी इस पुरे मामले की क्रूरता को तथा राज्य तथा राष्ट्रीय महिला आयोग की इस प्रकरण में चुप्पी को देखकर स्तब्ध व क्षुब्ध हैं.

पीपुल्स यूनियन फॉर सीविल लिबर्टीज इस मानवाधिकार संगठन ने राजस्थान के डूंगरपुर जिले के आसपुर तहसील के गाँव पचलासा छोटा में 4 मार्च 2016, शुक्रवार की रात, रमा कँवर को ज़िंदा जलाकर की गयी ह्त्या का तथ्यान्वेषण कर यह रिपोर्ट तैयार की है. पीयूसीएल के तथ्यान्वेषी दल के सदस्य इस प्रकार थे: धुली बाई, छगन बाई, कमलेश शर्मा, धर्मराज गुर्जर, हेमंत खराड़ी, फेंसी, मधुलिका, कांतिलाल रोत, प्रज्ञा जोशी. तथ्यान्वेषी दल ने दो चरणों में यानी 7 मार्च 2016 व 9 मार्च 2016 को क्रमशः पचलासा छोटा तथा सागवाड़ा जाकर संबधित व्यक्तियों से मिलकर तथ्य जुटाने का प्रयास किया. यह दस्तावेज़ निम्न सूत्रों के आधार पर तैयार किया गया है: इस दल ने कलावती पत्नी कचरू सेवक, भावना पत्नी जितेन्द्र सेवक, पचलासा छोटा वर्तमान सरपंच जस्सू देवी मीणा, पूर्व सरपंच कालूभाई मीणा, नाहर सिंह (वर्तमान उपसरपंच तथा वार्ड 4 के वार्ड पञ्च ), दलपत सिंह, अमरसिंह (हेड कांस्टेबल, थाना आसपुर), रामलाल चंदेल (एएसपी, डूंगरपुर), लक्ष्मण डांगी (थानाधिकारी, आसपुर), ब्रजराज चारण (डि.वाय एस. पी., सागवाडा), डूंगरपुर  पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार जैन, पत्रकारतथा पचलासा छोटा के अन्य ग्रामीणों से इस मामले में प्रत्यक्ष की बातचीत, मोहनलाल यादव (पटवारी) व गोवर्धन सिंह चौहान (ग्राम सचिव) से हुई वार्ता, मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट. दल ने जिन अन्य ग्रामीणों से बात की उनके नाम उन लोगों की सुरक्षा के मद्देनज़र नहीं दिए हैं.

पचलासा छोटा गाँव :

राजस्थान के डूंगरपुर जिले की आसपुर तहसील से 12 किमी स्थित पचलासा छोटा गाँव लगभग6.5कि मी के दायरे में फैला है. यह लगभग 700 घरों की आबादी का गाँव है. इस गाँव में सबसे अधिक घर राजपूत समुदाय के हैं जो कि 250 के करीब हैं, लगभग 150 घर आदिवासी समुदाय के हैं तो सेवक समुदाय के घर 30-40 हैं.  गाँव में यादव, नाई, प्रजापत, नाथ, पांचाल, बुनकर, धोबी, मुस्लिम, तथा जैन समुदाय रहते हैं. संख्या और सामाजिक तौर पर राजपूत समुदाय का गाँव में वर्चस्व है.  गाँव में सिसोदिया, राठोड़, पंवर, तथा बोडना इन कुलों के राजपूत हैं. स्थानीय सूत्रों से पता चला कि इन्हें वागड़ीया राजपूत कहा जाता है. गाँव में विभिन्न गोत्रों के होने के कारण इस गाँव के ही परिवारों में वैवाहिक संबंध स्थापित होने का चलन रहा है. इस गाँव के अधिकतर पुरुष आजीविका हेतु बंबई और अहमदाबाद जैसे शहरों में रहते हैं.

रमा कँवर व प्रकाश सेवक के विवाह की पारिवारिक व सामाजिक पूर्वपीठिका :

2007 में पचलासा छोटा गाँव के वार्ड क्रमांक 4 की निवासी रमा कँवर पुत्री विजय सिंह सिसोदिया का विवाह गाँव के माधो सिंह के साथ हुआ परन्तु इस संबंध से नाखुश हो कर रमा कँवर लगभग छ: महीने पश्चात अपने पैतृक परिवार के साथ रहने लगी. इस दौरान पूर्व शादी के लगभग साल भर बाद रमा कँवर ने प्रकाश पुत्र कचरू सेवक जो उनके पड़ोसी थे, से अपनी मर्जी से विवाह किया. कलावती पत्नी कचरू सेवक के अनुसार दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली और वे बंबई में रहने लग गए. विभिन्न स्त्रोतों से पता चला कि प्रकाश की भी शादी पूर्व में हो चुकी थी. सागवाड़ा उपाधिक्षक ब्रजराज चारण ने बताया कि प्रकाश की पहली पत्नी नाते चली गयी थी. इस तरह राजपूत समुदाय की रमा कँवर की शादी सेवक समुदाय के प्रकाश से दोनों की परस्पर सम्मति से हुई थी. इस सबंध के कारण राजपूत समुदाय में तीव्र प्रतिक्रया उठी. आज की तारीख में रमा कँवर के पूर्व पति ने व प्रकाश सेवक की पूर्व पत्नी ने अपनी अपनी पृथक गृहस्थी बसा ली है व दोनों के अपने अपने दांपत्य व बच्चे हैं. रमा कँवर का पूर्व पति अहमदाबाद या इंदौर में होने के बारे में गाँव में जानकारी प्राप्त हुई. प्रकाश सेवक की पूर्व पत्नी के वर्त्तमान स्थान के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी. प्रकाश सेवक के परिवार में उसके पिता कचरू सेवक, माँ कलावती सेवक के अलावा दो भाई जितेन्द्र  और  सुरेश थे व तीन बहनें थी. परन्तु कलावती जी के अनुसार प्रकाश इस विवाह के बाद फिर कभी घर नहीं आया.

सामाजिक दबाव व बहिष्कार:

रमा कँवर व प्रकाश सेवक के विवाह के मसले को लेकर राजपूत समुदाय की बैठक पचलासा छोटा गाँव के लक्ष्मी-नारायण मंदिर के सामने के चौक में हुई. गाँव में काफी तनाव का माहौल था. पचलासा छोटा में राजपूत समुदाय के पारंपारिक पञ्च दलपत सिंह के अनुसार यह 52 गाँवों के चोखले (curcuit of caste panchaayat) की बैठक थी. ज्ञात हो कि इस बैठक का स्थान व रमा कँवर को जिस स्थान पर ज़िंदा जलाया गया एक ही है. इस बैठक के होने की पुष्टि तत्कालीन सरपंच कालू भाई मीणा तथा प्रकाश सेवक की माँ, कलावती सेवक ने भी की. इस बैठक में निम्न फरमान सुनाया गया था:

·इस बैठक ने रमा कँवर और प्रकाश सेवक को अपने समुदाय के बाहर के व्यक्ति से विवाह दोषी माना.
·रमा कँवर तथा प्रकाश सेवक के गाँव में लौटने को प्रतिबंधित किया गया.
·इस बैठक ने गाँव के बाशिंदों को स्पष्ट निर्देश दिए कि संबधित परिवार को कोई नमक तक नहीं देगा.

चोखले के फरमान की परिणति:

इस बैठक के पश्चात परिणाम यह हुआ कि इस सेवक परिवार से उनके अपने समाज ने भी संबध तोड़ लिए. आज जब पुलिस कहती है कि सेवक समुदाय से भी कोई इस परिवार के बारे में बोलने को तैयार नहीं है तो इस पृष्ठभूमि को देखना ज़रूरी हो जाता है. यह सामजिक दबाव रमा कँवर के पैतृक परिवार व प्रकाश सेवक के पैतृक परिवार पर बीते 8 सालों से लगातार हावी रहा है. इसका परिणाम यह रहा कि प्रकाश सेवक के पिता तथा दोनों भाइयों को आजीविका के लिए गाँव से पलायन कर बाहर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा. परिवार को जब जमीन के लिए पूछा गया तो कलावती जी ने बताया कि उनके पास मात्र वही ज़मीन है जिसमें उनका मकान बना हुआ है. मकान के अलावा खेत के तौर पर नाम मात्र ज़मीन थी और दल ने पाया कि यह ज़मीन जोती हुई नहीं थी. परिवार के पुरुष घर के बाहर रहते थे और कलावती जी अस्वास्थ्य के कारण खेती के  करने में अक्षम थी.

कलावती जी से बात करके पता चला कि यह महिला सामाजिक दबाव का सामना करते हुए जीवनयापन करती रही. प्रकाश और रमा की शादी के पश्चात उसके परिवार में एक के बाद एक विपत्तियाँ आती रही. पर सामाजिक दबाव के चलते उसका बेटा प्रकाश कभी लौटकर नहीं आया. उन्होंने बताया कि उन्हें उनकी बेटी के सन्दर्भ में भी राजपूत समाज के कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा दबाव इससे पूर्व बनाया गया था.  उनकी बेटी, पति के मृत्यु के बाद उनके साथ रह रही थी. उसने अपनी मर्जी से अपने समुदाय के युवक के साथ संबंध बनाया पर गाँव के लोगों ने इस पर आपत्ति जताते हुए लड़की को ज़िंदा जला देने को कहा. पर कलावती नहीं मानी. उसने कहा कि वैसे भी गाँव उसके साथ संबंध तोड़ चुका है इससे बुरा और क्या हो सकता है. लड़की ने इस संबंध से भी बाहर आकर फिर अपने समुदाय के युवक के साथ घर बसाया व आज उसके बच्चे भी है. कलावती व कचरू सेवक का सबसे छोटे बेटे सुरेश की बंबई में टीबी से मौत हुई. उसकी अंतिम क्रिया वहीं की गयी. हालांकि कलावती जी कहती हैं कि इन्फेक्शन फ़ैलने का अंदेशे के चलते ऐसा किया  गया पर यह सोचा जा सकता है कि सामाजिक तौर पर बहिष्कृत परिवार गाँव के सहयोग के बिना बेटे का अंतिम संस्कार कैसे करता. इस घटना के बाद कलावती जी के पति कचरू सेवक की भी मौत हुई. इस तनाव से वे बीमार रहने लगे व कुछ समय बाद वे गुज़र गए. अब कलावती अपने बेटे जितेन्द्र की पत्नी भावना के साथ रहती हैं. भावना व जितेन्द्र ने भी दो माह पूर्व कोर्ट में शादी की. इन सभी मौकों पर प्रकाश परिवार के किसी भी कार्य में सहभागी नहीं हुआ या कहें कि नहीं हो पाया.

जिस गाँव में लगभग 80 प्रतिशत घर दबंग जाति के हो वहाँ सामजिक तौर पर उनकी हुकूमत को इस तरह के फरमानों से समझा जा सकता है कि इस तरह के फरमान सामाजिक बहिष्कार को स्थापित करते हैं जो असंवैधानिक है और अतः लोकंतंत्र की धज्जियां उड़ाते हैं.

रमा कँवर की हत्या:

पिछले लगभग 8 साल से अपने विवाह के बाद रमा कँवर और प्रकाश दोनों ही अपने गाँव परिजनों से मिलने तक नहीं आए थे. उनके गाँव में प्रवेश पर पाबंदी थी. ऐसी स्थितियों में 3 मार्च 2016 को रमा कँवर अपनी व प्रकाश की बेटी (आयु 3 साल) को लेकर प्रकाश के बिना ही पचलासा छोटा आयी. रमा अपने ससुराल यानी प्रकाश के घर गयी. कलावती व प्रकाश के छोटे भाई जितेन्द्र की पत्नी भावना घर पर थे. कलावती जी ने बताया कि रमा के गाँव लौटने पर उन्हें डर था कि जिस गाँव में वे प्रकाश-रमा के विवाहोपरांत से बहिष्कार झेल रही थी वह गाँव उन्हें रमा के आने पर ज़िंदा नहीं रहने देगा. उन्होंने अपने डर को रमा से साझा किया तब रमा ने उन्हें बताया कि उसके गाँव लौटने की सूचना उसके पीहर में थी. कलावती और भावना दोनों के अनुसार रमा जब घर लौटी तब वह 4-5 महीने की गर्भवती थी. इन परिस्थितियों में रमा का अचानक अपने गाँव अपने ससुराल में लौटना कई तरह के संदेह उत्पन्न करता है. ऐसे में अब केवल प्रकाश ही इस पर कुछ रौशनी डाल सकता है.  भावना ने बताया कि रमा अधिक सामान नहीं लेकर आयी थी. उसके सामान में सब से अधिक सामान उसकी बेटी के कपडे थे.

4 मार्च को शाम के समय लगभग 7.30 बजे से 8.00 बजे तक बिजली अप्रत्याशित रूप से गायब रही. इसकी पुष्टि गाँव के विभिन्न बस्तियों के बाशिंदों से हुई. कुछ लोगों का यह मानना था कि यह गाँव के दबंग लोगों द्वारा की गयी हरकत थी. आम तौर पर गाँव में दहशत फैलाने के उद्देश्य से ऐसी हरकत की जाती है. यह एक तरह से गाँव के लोगों को घर से बाहर न निकलने की दी गयी चेतावनी थी. कुछ लोगों के अनुसार रमा के भाई और राजपूत समुदाय के लोगों ने अनौपचारिक बैठक इसी दौरान की व घटना को अंजाम देने के लिए आवश्यक सामग्री जुटाई गयी. जब वे रात रमा के ससुराल घुसे तो वे हिंसा की नीयत से ही घुसे थे.

कलावती जी के अनुसार शाम को 8.00 से 8.30 के दरम्यान रमा के भाई और अन्य रिश्तेदार घर में जबरदस्ती घुस आएं. वे रमा तथा प्रकाश को ढूंढ रहे थे. रमा उस वक़्त बाथरूम में बंद थी. उसे बाहर निकाला गया. उसके भाई तथा रिश्तेदार उसे लगातार पीटते रहे. कलावती व भावना ने मध्यस्थता कर रमा को बचाने की कोशिश की तो उन्हें भी मारा गया. कलावती जी को इतने जोर से मारा कि वे बेहोश हो गयी. भावना ने बताया कि रमा के भाई रमा को खींचकर बाहर ले जाने लगे. वे रमा की तीन साल की बेटी नन्ही को भी ले जाना चाहते थे. भावना को उनके इरादे ठीक नहीं लगे तो उसने खींचकर बच्ची को अपने साथ रखा.

ज्ञात हो कि रमा का पीहर और ससुराल के मकाने लगभग आमने सामने हैं. गाँव के प्रमुख चौराहे के पीछे की गली में दोनों मकान स्थित है. ऐसे में रमा को खींचकर मारते हुए भरे चौक में लाया गया व् उसके ऊपर केरोसीन डाल कर उसे ज़िंदा ज़लाया गया. ज़ाहिर है इस दौरान रमा ने बचाव के लिए खूब आवाज़ लगाई होगी परन्तु उसका बचाव नहीं किया गया. सार्वजनिक रूप से उसे जलाया गया. जिस स्थान पर उसके खिलाफ 52 गाँवों के चोखले ने फरमान सुनाया था उसी चौक में उसे जलाया गया. किसी ने उसे नहीं बचाया. बड़ी तादात में भीड़ होने के बावजूद रमा कँवर को बचाया नहीं जा सका यह ह्रदयविदारक सत्य है. रात 8.30 से 9.00 के दरम्यान यह घटना हुई. रमा के जले शरीर को शमशान ले जाकर उसका अंतिम संस्कार किया गया.

जवाबदेही किसकी?

रमा को जब सार्वजनिक तौर पर ज़िंदा जलाया गया तो निश्चित रूप से बड़ी तादात में लोग उपस्थित थे पर आज बोलने के लिए कोई भी तैयार नहीं है. जिस स्थान पर रमा को जलाया वहाँ ना केवल मंदिर, बाज़ार की दुकाने हैं वहीं पास में आंगनवाडी भी है. टीम के सदस्यों ने ग्राम सचिव गोवर्धन सिंह चौहान तथा पटवारी मोहनलाल यादव से बात की परन्तु उनके अनुसार वे उस समय गाँव में थे नहीं. गाँव की विभिन्न बस्तियों में हमें बताया गया कि उन्हें अगले दिन सबेरे खबर मिली. घटनाक्रम को देखते हुए इसकी संभावना कम लगती है कि इस घटना के दौरान गाव की प्रमुख बस्तियों में इसकी खबर ना चली हो. यह सोचसमझकर साधी हुई चुप्पी है. ऐसे में जवाबदेही निर्धारित करना ज़रूरी है. पुलिस को खबर देर से की गयी . पुलिस के अनुसार रात्रि देर रात को लैंड लाईन फोन पर पचलासा छोटा में रमा कँवर को ज़िंदा ज़लाने की सूचना दी गयी थी. उसके अनुसार उन्होंने मौक़ा मुआइना कर  रिपोर्ट दर्ज कराई व तपतीश कर  रमा के भाई तथा अन्य को गिरफ्तार किया. पुलिस के अनुसार जब तक वे पहुंचे रमा का शव  राख में तब्दील हो चुका था.

पीयूसीएल के सवाल तथा मांगें: 

·पुलिस प्रशासन ने अपनी सक्रिय तत्परता से कार्रवाई कर आरोपितों को गिरफ्तार कर एक प्रशंसनीय पहल की है. अब आवश्यकता इस बात की है कि गाँव में छाये दहशत के माहौल को दूर कर प्रशासन आम ग्रामवासी के मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास को पुनर्बहाल करे. इस विश्वास के अभाव में गवाह आगे नहीं आयेंगे और ऐसे में अपराधी आखिरकार छूट जायेंगे. ऐसी किसी निर्मम घटना की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए भी इस हत्या के दोषियों को समुचित दंड मिलना आवश्यक है. हमारी मांग है कि सभी नामजद अभियुक्तों की अनिवार्य रूप से गिरफ्तारी हो और उन्हें सामान्य परिश्तितियों में बेल न मिले.

·अगर  यह परिवार सामजिक दबाव के डर से पचलासा छोटा में पुनर्वासित होने में कतराए तो यह प्रशासन का अपयश होगा कि वह इस परिवार के रिहाईश के अनुकूल वातावरण गाँव में तैयार करने में नाकाम रहा. ऐसे में परिवार के इच्छा अनुरूप परिवार को घर उपलब्ध कराना प्रशासन की ज़िम्मेदारी है. पता करने  पर ज्ञात हुआ कि कलावती को विधवा पेंशन मिल रही थी. उस परिवार का नाम गरीबीरेखा से नीचे की सूची में शामिल है परन्तु सभी विकास योजनाओं का लाभ इस परिवार को मिले यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेवारी है.

·रमा व प्रकाश की 3 वर्षीय बेटी नन्ही को पालनहार योजना के साथ जोड़ा जाए.

·सामजिक बहिष्कार का बीते 8 साल से सामना करनेवाली कलावती जी पर आज प्रकाश व् रमा कँवर की बेटी के परवरिश की ज़िम्मेदारी आन पडी है. बीते समय में जो उनके अधिकारों का हनन हुआ है उसे ध्यान में रखते हुए उन्हें 20 लाख रुपये का मुवावज़ा दिया जाए. साथ ही नन्ही के परवरिश के हेतु 10 लाख रुपये प्रदान किए जाए.

·पीड़ित सेवक परिवार को आज अपने घर से दूर अज्ञात स्थान पर रहना पड़ रहा है जिसमें पुलिस द्वारा उन्हें सहयोग और संरक्षण प्रदान किया गया है. हालात जितनी जल्दी सामान्य होंगे, इस परिवार को अज्ञातवास छोड़कर अपने घर लौटना संभव होगा. इसके लिए यथासंभव प्रयास किये जाने चाहिए. इसके लिए आवश्यक होगा कि इस परिवार के पक्ष में गाँव में सकारात्मक जनमत को तैयार किया जाए. आशा है कि पुलिस व प्रशासन इस सन्दर्भ में उचित कार्यवाही करेंगे. पुलिस विभाग के अलावा प्रशासनिक स्तर का कोई अधिकारी गाँव नहीं गया व पीड़ित सेवक परिवार से नहीं मिला ये अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण है. यह भी विडम्बनापूर्ण है कि ग्राम स्तर पर कार्यरत प्रशासनिक कर्मियों यथा ग्राम सेवक, पटवारी, आंगनबाड़ी प्रबंधक आदि द्वारा ग्राम में घटित इस क्रूर घटना का कोई संज्ञान नहीं लिया गया और न ही ऐसी कोई जानकारी है कि जिले के उच्च अधिकारियों द्वारा उनसे कोई रिपोर्ट माँगी गयी.

·प्रकाश जहां कहीं भी है, उसकी ज़िंदगी पर खतरा बरक़रार है. उसकी खोज खबर एवं कुशलता को सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है.

·इस निर्मम हत्याकांड को 15 दिन बीत जाने के बाद भी राज्य महिला आयोग द्वारा इसका संज्ञान भी न लिया जाना शर्म की बात है. यदि राज्य महिला आयोग ने इस पर सख्त कदम उठाते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग को स्पष्ट शब्दों में रखा होता और घटना स्थल पर जाकर पीड़ित सेवक परिवार का साथ दिया होता तो अपराधियों के हौसले पस्त होते और आम जनता में विश्वास का संचार होता.

·रमा के जल जाने से सामने आया कि उसकी मौत सामाजिक बहिष्कार की परिणति थी. बीते 8 साल से जिस दहशत में गाँव का परिवार जी रहा था उसकी जवाबदेही किसकी मानी जाएगी? इस तरह का सामाजिक बहिष्कार 8 साल तक गाँव में कैसे बना रहा और इस संबंध में किसी भी सरकारी नुमाइंदे ने शिकायत क्यों दर्ज नहीं कराई? इस परिवार के संबंध में यह तथ्य क्यों छुपाया गया कि यह परिवार सामाजिक बहिष्कार को झेल रहा था. इसी सामाजिक बहिष्कार के डर से आज इस अमानवीय घटना के बाद भी लोगों के मुंह पर ताले पड़े हुए है. कहना न होगा कि इस प्रकार के सामाजिक बहिष्कार का फरमान देने वाले चोखले की बैठक खाप का ही एक प्रांतीय संस्करण है और इस पर तुरंत रूप से प्रतिबन्ध लगाता क़ानून आवश्यक है. पिछली केंद्र सरकार ने खाप पंचायतों के ऐसे फैसलों के खिलाफ तथाकथित सम्मान एवं परम्परा के नाम पर होने वाले अपराधों की रोकथाम संबंधी विधेयक का प्रस्ताव रखा था लेकिन वह ठन्डे बस्ते में चला गया. वर्तमान केंद्र सरकार ने भी इस सम्बन्ध में विधि आयोग की रिपोर्ट पर राज्य सरकारों से राय माँगी थी. लगभग सभी राज्य सरकारों की इसके समर्थन में राय आ भी चुकी है, पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई. वर्तमान तथा इससे पूर्व की दोनों केंद्र सरकारों ने अपने बयानों में इन खाप पंचायतों को न्याय और संविधान के खिलाफ माना है. पर दंड संहिता में समुचित बदलाव न होना इनके इरादों के ठोस होने में संदेह पैदा करता है. यदि यह विधेयक जल्दी आता है तो इन हत्याओं के सामूहिक चरित्र की पहचान और दंड का प्रावधान संभव हो पायेगा.

·भावना और कलावती दोनों ने स्पष्ट बताया कि रमा ने उन्हें बताया था कि उसके गाँव वापिस आने की खबर उसके पीहर में थी.  ऐसे में साफ़ है कि यह एक सोची समझी साजिश के तहत अंजाम दी घटना थी. इन हालातों में पुलिस गाँव से साक्ष्य जुटाकर आरोपियों को सज़ा तक कैसे पहुंचाएगी यह सवाल बारबार उठता है. यह निहायत ज़रूरी है कि आरोपियों को बेल ना मिले क्योंकि वे  साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकते है और गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं.

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पीयूसीएल के तथ्यान्वेषी दल के सदस्य इस प्रकार थे धुली बाई (एकल नारी शक्ति संगठन), छगन बाई (एकल नारी शक्ति संगठन), कमलेश शर्मा (पीयूसीएल) धर्मराज गुर्जर (पीयूसीएल), हेमंत खराड़ी (राजस्थान शिक्षक संघ, शेखावत), फेंसी (विकल्प संस्थान, उदयपुर), मधुलिका (पीयूसीएल), कांतिलाल रोत (पीयूसीएल तथा आदीवासी संघर्ष समिति), प्रज्ञा जोशी (पीयूसीएल). जाँच दल ने कई जगह पर व्यक्तियों के नाम उन लोगों की सुरक्षा के मद्देनज़र नहीं दिए हैं.
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नोट/अपडेट  : 22.03.16 को पीयूसीएल, जयपुर एवं नगर के प्रमुख महिला संगठनों के प्रतिनिधि राज्य की महिला एवं बाल मंत्री सुश्री अनीता भदेल तथा राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुश्री सुमन शर्मा से मिले, यह रिपोर्ट प्रस्तुत की तथा अपनी मांगें रखीं. मंत्री महोदया ने इस घटना के प्रति अपनी अनभिज्ञता जाहिर की परन्तु अब इस मामले में ध्यान देने का आश्वासन दिया.

राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुश्री सुमन शर्मा ने आश्वासन दिया कि वे सम्बन्षित विभागों को तलब कर इस विषय में की गयी कार्रवाई की रिपोर्ट लेंगी तथा व्यक्तिशः 1 से 4 अप्रैल के अपने दक्षिण राजस्थान के दौरे के अंतर्गत विशेष रूप से पचलासा छोटा जायेंगी.

                                                                                                                                                                                                                                                                 


शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

सोनी सोरी का कसूर क्या है?


सोनी सोरी प्रकरण – लोकतंत्र का बदनुमा चेहरा

                चित्र यहाँ से 
सोनी सोरी की कहानी अब कोई नई कहानी नहीं रही. न यह उस दिन शुरू हुई थी जब उन्हें पुलिस के दबाव में दंतेवाड़ा छोड़कर भागना पड़ा था, न उनके किसी अंजाम पर खत्म हो जायेगी. लोकतंत्र के आवरण तले चलने वाली दमन और उत्पीडन की यह कहानी अलग-अलग रूप में लगातार दुहराई गयी है और आज भी यह बदस्तूर जारी है. महानगरों के आरामदेह कमरों में बैठकर हम विकास को आंकड़ो की भाषा से पकडने की कोशिशें करते हुए नए-नए माल्स और उपभोक्ता वस्तुओं की चमक से चुंधियाई आँखों से सत्ताओं के बदलने और आभासी आन्दोलनों के घटाटोप के इतने आदी होते जा रहे हैं कि देश के एक बड़े हिस्से के लगातार यातना-गृह में तबदील होते जाने को देख ही नहीं पाते. विदर्भ और बुंदेलखंड सहित देश के तमाम हिस्सों में लगातार खुदकुशी करते किसान, फैक्ट्रियों में बिना किसी सामाजिक या आर्थिक सुरक्षा के सोलह-सोलह घंटे खटते मजदूर, निजी कंपनियों के जुए तले पिसते तथाकथित प्रोफेशनल्स, उत्तर-पूर्व में अमानवीय कानूनों का बोझ ढोते लोग और छत्तीसगढ़ के नक्सल-प्रभावित इलाकों में दोहरी-तिहरी मार झेलते आदिवासी हमारी इस समकालीन विकास की बहस से बाहर की चीज़ बनते चले जा रहे हैं. न टीवी चैनल्स के लिए इनके पास कोई ‘एक्सक्लूसिव बाईट’ है न ही अखबारों के तीसरे पेज़ के लिए खबरें या पहले पेज़ के लिए विज्ञापन. वरना यूँ न होता कि इस देश में किसी जगह एक महिला के साथ कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद वह अमानवीय उत्पीडन होता जो सोनी सोरी के साथ हुआ और इसके ज़िम्मेदार पुलिस वाले को सज़ा की जगह महामहिम पुरस्कार न देतीं, वरना कोई चुनी हुई सरकार किसी गाँधीवादी के आश्रम को यूँ ज़मीदोज न कर देती, वरना इतना सब हो जाने के बाद भी इस देश में इतनी चुप्पी न होती.   

सोनी सोरी कोई विशिष्ट महिला नहीं. दंतेवाड़ा के एक खाते-पीते आदिवासी परिवार में जन्मी एक मामूली औरत है जिसने शिक्षा हासिल की और इसके ज़रिये अपना और अपने लोगों का जीवन बेहतर बनाने का सपना देखा. उसका दोष शायद बस इतना है कि जिस दौर में वह यह सब करना चाहती थी, वह एक ऐसा दौर था जब दो विरोधी शक्तियों के बीच विभाजन रेखा कुछ इस कदर खिंची थी कि चयन के लिए इन दोनों के अलावा कोई और विकल्प नहीं था और वह इन दोनों से अलग कुछ करने के लिए मुतमइन थी. नतीजा यह कि उसने दोनों की दुश्मनी मोल ली. इस पूरी प्रक्रिया को समझने से पहले आइये उस पूरे घटनाक्रम पर एक नज़र डाल लेते हैं.

सोनी सोरी का नाम सबसे पहले तब मीडिया में आया जब पिछले साल ९ सितम्बर को पालनार बाज़ार में उसके भतीजे लिंगा को कथित रूप से एस्सार ग्रुप से जुड़े लाला से पैसे लेते हुए गिरफ्तार किया गया. इस केस में सोनी को भगोड़ा घोषित किया गया. पुलिस द्वारा कहा गया कि एस्सार ग्रुप ने अपनी पाइपलाइन बिछाने में व्यवधान न उत्पन्न करने के लिए नक्सलियों को पैसे दिए और लिंगा एक नक्सली प्रतिनिधि के रूप में उनसे पैसे ले रहा था तथा सोनी उसकी मददगार थी. इसके बाद से सोनी वहाँ से जान बचाकर निकल आई और किसी तरह बचते-बचाते दिल्ली पहुँची. दिल्ली पहुंचकर उन्होंने तहलका के दफ्तर में अपनी पूरी आपबीती सुनाई जिससे पुलिस का सुनाया पूरा किस्सा ही सिर के बल खड़ा हो गया.

सोनी के मुताबिक़ इस घटना के एक दिन पहले किरंदुल पुलिस स्टेशन में पदस्थ मांकड़ नाम का का एक कांस्टेबल उसके घर आया और उसने उससे लिंगा को पुलिस का सहयोगी बनने के लिए मनाने का आग्रह किया. उसका प्रस्ताव था कि लिंगा माओवादी बनकर जाए और लाला से लिए पैसे पुलिस को सौंप दे. मांकड़ ने उसे ऐसा करने पर तमाम फर्जी केसों से मुक्त कराने का आश्वासन भी दिलाया. सोनी के मुताबिक़ उसने ऐसा करने से मना कर दिया. इस पर मांकड़ ने उससे फोन लेकर खुद ही लाला को फोन लगाकर स्वयं को स्थानीय माओवादी बताते हुए पैसों की मांग की. उसके अगले ही दिन एक कार में सादे कपड़ों में कुछ लोग आये और उसके पिता के घर से लिंगा को उठा ले गए. सोनी ने तमाम लोगों से जानकारी हासिल करनी चाही लेकिन उसे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. किरंदुल पुलिस स्टेशन के प्रभारी ने भी इस बारे में अनभिज्ञता प्रकट कर दी (जबकि उसी दिन उन्होंने लाला और लिंगा के खिलाफ एफ आई आर दर्ज की थी). अगले दिन अखबारों में उसने लिंगा की एस्सार मामले में गिरफ्तारी हो गयी है और उन्हें फरार घोषित कर दिया गया है. वह समझ गयीं कि उन्हें किसी भी पल गिरफ्तार किया जा सकता है और वह वहाँ से दिल्ली आ गयीं. यह सफर इस पंक्ति के लिखे जाने जितना आसान नहीं था.

और सोनी ने अपनी सच्चाई साबित भी की. उसने दिल्ली से ही तहलका कार्यालय से मांकड़ को फोन लगाया और उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यूँ किया? क्या यह सच नहीं कि लिंगा को फंसाया गया है? आश्चर्य यह कि मांकड़ ने फोन पर इन सारी बातों को स्वीकार कर लिया जिसके टेप तहलका के पास हैं. उसने साफ़-साफ़ बताया कि पैसे लाला के घर से बरामद किये गए थे. उसने यह भी कहा कि पुलिस के पास सबूतों के नाम पर कुछ नहीं है और वह जल्दी ही छूट जायेगी, साथ ही उन्हें दिल्ली में ही रहने की सलाह दी.

यहाँ रुककर एक मिनट यह सोचना होगा कि किसी बम्बईया फिल्म के दृश्य सा यह घटनाक्रम आज़ाद हिन्दुस्तान के एक हिस्से में संविधान की शपथ खाने वाली विधायिका और कार्यपालिका के देख-रेख में हुआ. इस साजिश को उस थाने में अंजाम दिया गया जहाँ अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी की तस्वीर लगी रहती है. यह उस पुलिस का चेहरा है जिससे सहयोग करने का फ़र्ज़ हर जिम्मेदार नागरिक को घुट्टी की तरह पिलाया जाता है. और ज़ाहिर तौर पर न यह पहली बार हुआ न अंतिम बार. लिंगा के साथ तो इसी थाने में वह हुआ था जिसकी एक सभ्य समाज में कल्पना तक नहीं की जा सकती. उसे चालीस दिनों तक बिना किसी आरोप या सज़ा के थाने के शौचालय में गिरफ्तार रखा गया क्योंकि उसने सलवा जुडूम का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था. बाद में सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार और सोनी तथा दूसरे घरवालों के प्रयास और कोर्ट के हस्तक्षेप से ही उसे आज़ाद कराया जा सका. उसे एक कांग्रेसी ठेकेदार के घर हुए नक्सली हमले का आरोपी तब बनाया गया जब वह दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था. बाद में जब शोर मचा तो तत्कालीन पुलिस प्रमुख और खगेन्द्र ठाकुर सहित हिन्दी के कुछ “जनपक्षधर” साहित्यकारों के प्रिय विश्वरंजन जी ने ‘बयान की चूक’ स्वीकारते हुए उसका नाम हटाया. इस हमले में सोनी और उसके पति को भी आरोपी बनाया गया. सोनी का पति तो इसी मामले में डेढ़ साल से हिरासत में है. इस मामले में जो “सबूत” दिए गए हैं उन्हें पढकर छत्तीसगढ़ पुलिस की न्यायप्रियता का कोई भी कायल हो सकता है. (विस्तार के लिए देखें तहलका
   

खैर, दिल्ली में छुपती-छुपाती सोनी को अंततः छत्तीसगढ़ पुलिस ने दिल्ली पुलिस की सहायता से गिरफ्तार किया और उन्हें साकेत कोर्ट में पेश किया गया. सोनी ने वहाँ खुद को छत्तीसगढ़ पुलिस को न सौंपने की अपील की. दिल्ली हाईकोर्ट में भी एक याचिका लगाकर उनके खिलाफ दिल्ली में ही केस चलाने की मांग की गयी और कहा गया कि अब तक जिस तरह यह साफ़ है कि उन्हें फर्जी मुकदमों में फंसाया गया है, इस बात की पूरी संभावना है कि छत्तीसगढ़ में उन्हें न्याय न मिले. लेकिन कोर्ट ने उन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया. दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को बस एक निर्देश दे दिया कि पुलिस एक सप्ताह बाद उसकी स्थिती के बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करे. लेकिन संविधान से बंधी, न्यायालय का सम्मान करने वाली छत्तीसगढ़ पुलिस ने सोनी के साथ जो किया उसे लिखते भी हाथ कांपते हैं. उसी दिन रात को उन्हें बिजली के झटके दिए गए, नग्न कर के उत्पीडन किया गया और दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए उनके गुप्तांगों में पत्थर के टुकड़े डाल दिए. उसी हालत में उन्हें कोर्ट में पेश किया  गया, जेल भेज दिया गया. हालत खराब होने पर कोलकाता में इलाज के लिए ले जाया गया. वहाँ मेडिकल जाँच में इस आरोप की पुष्टि हुई. उनकी योनि और गुदा से पत्थरों के टुकड़े मिले. उस अमानवीय अत्याचार के सफे रात के अंधेरों की तरह अखबारों में बिखर गए. उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम लिखी उनकी चिट्ठियों में  यह सवाल एक फांस की तरह चुभ रहा है कि इस न्याय व्यवस्था, इस संविधान आधारित लोकतंत्र में एक आदिवासी महिला के साथ हो रहा व्यवहार इस देश की जनता और इसके जागरूक तबके के लिए एक मुसलसल बेचैनी का सबब क्यूँ नहीं है? क्यूँ इसके खिलाफ कोई बड़ी आवाज़ नहीं उठती? क्यूँ हर सूं एक शमशानी चुप्पी है? वह कौन सा मंजर है जिसमें नक्सलियों द्वारा स्कूल में पन्द्रह अगस्त को लाल झंडा फहराए जाने का विरोध कर तिरंगा फहराने वाली वह और लिंगा इस हाल में है, उसका पति डेढ़ साल से जेल में है, उसके पिता को इन्फार्मर होने के शक में नक्सलियों द्वारा पैरों में गोली की मार झेलकर अस्पताल में लाचार पड़ा रहना पड़ रहा है, घर-बार लूट लिया गया है, तीन बच्चे यहाँ-वहाँ पड़े हैं! आखिर दोष क्या है इनका?

शायद यही कि इन्होने नक्सलियों या पुलिस के हाथों का खिलौना बनने से इंकार किया. शायद यही कि इन्होने अपनी पढ़ाई-लिखाई को अपने तथा अपने लोगों की बेहतरी में इस्तेमाल करने का गुनाह किया. शायद यह कि वे आदिवासी होते हुए इस या उस पक्ष के मूक समर्थक बने. शायद यह कि उन्होंने अंधेरों के बीच रौशनी की किरणे खोजने का अजीम गुनाह किया. एस्सार के पूरे किस्से ने वह हकीक़त सामने ला दी है कि कैसे पुलिस और नक्सलियों के बीच जो खेल चल रहा है उसमें पैसे की भूमिका बढती चली गयी है और आदिवासियों को दोनों ही पक्ष शेर के शिकार में बकरे की तरह उपयोग कर रहे हैं. सोनी और लिंगा का दोष शायद यही था कि उन्होंने बकरे की भूमिका निभाने से इंकार कर दिया.

खैर मामला न्यायालय में है. कौन जाने की कभी न्याय मिल ही जाए. लेकिन तब तक दुनिया-जहान में अन्याय की मुखालफत का दावा करने वाले हम लोग क्या करेंगे? सिर्फ इंतज़ार?        


  

रविवार, 30 मई 2010

कचरे से बीनी एक ज़िंदगी

( कचरा बीनने वाली एक महिला की यह केस स्टडी हमें देवास से फैज ने भेजी है। अगर आप के पास भी विकास की विसंगतियों से जुड़ी ऐसी कोई बात है तो जनपक्ष के लिये भेजिये ashokk34@gmail.com पर)

तस्वीर यहां से
कचरे और झूठन से चलता जीवन - एक तस्वीर
  • फैज


‘जूली बाई’ महाराष्ट्र के भूसावल गांव से आकर पिछले 20-22 सालों से भोपाल में अपने परिवार के साथ रह रही हैं । रेल्वे स्टे्शन के निर्माण के चलते इनकी बसाहट को बाग मुगालिया विस्थापित किया गया । उस समय मुगालिया जाना आना एक मुष्किल भरा काम होता था क्योंकि धंधे पर आने-जाने मे 15 से 20 रू. खर्चा होते थे। अपने रहने के लिये जगह ना होना और आर्थिक अक्षमता के कारण सरगम टाकिज के बाजू में ये नाले के किनारे एक झोपड़ी बनाकर रहने लगी , इनसे पहले यहां सिर्फ एक झोपड़ी हुआ करती थी । झोपड़ी ऐसी की जिसमें 6’4 की जगह,बक्सा पेटी की लकड़ी के नाम मात्र के दरवाजे , बांस-बल्ली और पुट्ठे की दिवार तथा पन्नी की आधी ढ़ंकी छत। घर में क्या हो रहा है ये अन्दर से बाहर और बाहर से अन्दर साफ दिखता है । 

जूली के पति राजेन्द्र लोखंडे 1992 के दंगो के पहले न्यू मार्केट में हकीम होटल पर  खाना बनाने का काम करते थे , जहां गुजर बसर के लिए अच्छा पैसा मिल जाता था । किसी तरह के विवाद के चलते इन्हें वहां का काम छोड़ना पड़ा । बस यहीं से जूली बाई के एक नये संघर्ष की कहानी आरंभ होती है । राजेन्द्र ने सरगम टाकिज के पास ठेकेदारों के पास बेलदारी का काम आरंभ किया उस समय बेलदारी के 25 रूप्ये मिलते थे । कम पैसो में गुजारा ना होने के कारण सड़क निर्माण का काम करने लगे उस समय बाइपास का काम चल रहा था और दिहाड़ी पर काम करके वे 150-200 रूप्ये प्रति दिन कमाने लगे । बायपास निर्माण काम बंद हाने पर ये काम बंद हो गया । इसके बाद पलटू उर्फ राजेन्द्र ने हम्माली करना शुरू किया । आज भी पलटु कभी कभी हम्माली करता है । 
अपनी रोज की ज़रूरतो को पूरी न कर पाने और अन्य काम ना मिल पाने के कारण जूली बाई ने कचरा चुनना आरंभ किया । इस काम को आरंभ करते समय इनकेा शर्म आती थी जिसके चलते ये मुंह अंधेरे लगभग सुबह 4 बजे बीनने चली जाती और सूरज निकलने के पहले वापस लौट आती । इस काम में जूली के साथ सकारात्मक यह था कि इसका कोई परिचित या परिवार वाला यहां नहीं रहता था । धीरे-धीरे ज़रूरतों और साहस के चलते यह काम जूली बाई का मुख्य काम हो गया । वर्तमान में जूली बाई को यह काम करते हुए लगभग 15 साल हो गये हैं । ये आज भी अपने परिवार के साथ उसी जगह अपनी उसी झोपड़ी में रहती हैं । कचरा चुनकर संघर्ष पूर्ण जीवन चलाती हैं ।
जूली बाई के 6 बच्चे हैं । अनिता 19,संगीता 18,सुनिता 17,बीरजू 14,तनू 12,संजू 6 वर्ष । इनकी तीनो लड़कियों ने अपनी अपनी पसंद के लड़कों से शादी की है और यही बस्ती में रहते हैं। इनके दो लड़के बीनने का काम करते हैं और अपनी दैनिक खर्चों को पूरा करते हैं । पति हम्माली करते और ना करते तब भी दारू पीते हैं और गाना गाते रहते हैं। इनके पति स्वयं को पति साबित करने के चक्कर में अक्सर इन्हें पीटा करते थे,  बात करने पर अक्सर पिटाई का जस्टीफिके्शन भी दिया करते थे किन्तु जब से जूली ने इनकी पिटाई की है और दारू के पैसे देने बन्द किये हैं तब से इन्हें अपने को पति साबित करते नहीं देखा गया। जूली बाई भी दारू पीती है, कहती है ‘भैया कमाती हुं तो पीती हूं किसी के बाप का थोड़ी पीती हूं ।
जूली बाई कभी स्कूल नहीं गई, पर अपने सारे बच्चों को स्कूल भेजती थी। संगीता, सुनिता, को संजय गांधी स्कूल (पड़ौस का सरकारी स्कूल) में भर्ती कराया था पर स्कूल ने इन्हें कभी स्वीकार नहीं किया। गंदे आते हो , गाली बकते हो ,लड़ते हो इत्यादी सम्बोधन देकर इस तंत्र ने सारे बच्चों को बाहर कर दिया, उनकी परिस्थिति को भी समझने का प्रयास नहीं किया। अब जूली बाई का कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता । सबसे छोटी लडकी संगीता कक्षा तीसरी तक पढ़ाई कर पाई है वह भी पांच सालों में । इसमें एक बड़ा तथ्य यह की ये सारे बच्चे पहली पीढी के सीखने वाले है । स्कूल इनकी ज़रूरतों को देख और समझ भी नहीं पाया । 

परिस्थिती ऐसी है कि एक जोड़ कपड़े में सारा साल गुजार देते हैं सिर्फ लड़कियों के पास साझा रूप में 2 जोड़ अतिरिक्त कपड़े हैं, जो बस्ती के किसी कार्यक्रम में कोई भी पहन लेती है । कभी किसी ने पुराने कपड़े दिये तो दूसरा कपड़ा मिला नही ंतो उसी को कभी साफ करके पहन लिया । त्योहारों पर तो ज़रूर नये कपड़े खरीदते हैं ।

जूली बाई और इनके बच्चे भी बीमार होतें है , किसी अन्य व्यक्ति की तरह मेडीकल स्टोर से दवाई खरीदी और खा कर अपनी बीमारी का इलाज कर लिया । सरकारी अस्पताल में डाक्टर भी हाथ पकड़ कर जांच नहीं करता । यहां कहते है ‘8-10 बच्चे पैदा कर लेते हैं बीमार नहीं होगें तो क्या ? बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखतें । इस पर जूली बाई कहती है - ये अपना काम करें नौकरी भी तो हमारी करते हैं, इनके भरोसे पैदा थोड़े किये हैं 9 महीने पेट में लेके घुमी हूं तब जाकर पैदा हुए हैं । जूली बाई को करिश्मा हास्पिटल का डाक्टर पसंद है क्योंकि वह हाथ पकड़ कर देखता है, बात करता है और इंजेक्शन भी लगाता है । इसके बदले 50 रू; लेता है तो क्या ?

जूली बाई को अक्सर पुलिस वाले भी परेशान करते हैं । आस पड़ोस में चोरी होने पर इनकी तलाशी लेनेे मे कहीं भी हाथ लगाते  है और थाने भी बैठा देते है । इनके या पति के साथ मारपीट होने पर रिर्पोट भी नहीं लिखते । भगा देते हैं - कहते हैं दारू पीकर झगड़ते हो और आ जाते हो रिर्पोट लिखाने, अभी लड़ लेगे और फिर एक हो जाएगे , एफ आइ आर लिख दी तो हमको कोरट कचेरी करना होगी । जूली अनुभव की इतनी पक्की हैं बताती हैं किसी काम में पुलिस को 100-500 रू दो तो वो किसी को भी थाने में बंद कर देगी और अपन को पकड़े तो 100-500 दे दो ।
ये जूली बाई के जीवन के वे आयाम हैं जिनसे जूली बाई प्रतिदिन गुजरती हैं । ये बहुत बोलने वाली , खुश मिजाज़,नीडर और जुझारू महिला हैं । अपने बीनने के काम के बाद खाना बनाना ,बच्चों की देखभाल और घर से जुड़े अन्य काम प्रतिदिन करती हैं, इसमें पति का खर्चा चलाना भी शामिल है। इन सबके बदले में पति से मार भी खाती है। अपने हर बच्चे को 2-10 रूपया रोज देती हैं।

आज से 4 साल पहले बीनते समय ज्योति टाकिज के पास ये ‘सौरभ ’ नाम के व्यक्ति से मिली । सौरभ एक स्वयं सेवी संस्था का कार्यकर्ता था वह वहां पार्किग लार्ड में बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाता था। ये उससे जिद्द करके अपनी बस्ती लाईं । जब बस्ती में 14 झोपड़ी हुआ करती थीं, आज बस्ती में 31 झोपड़ीयां है जिसमें 34 परिवार रहते है। बस्ती दिखाने के बाद सौरभ से कहने लगी -यहां भी बच्चे हैं इनको भी पढाया करा कोइ भी स्कूल नहीं जाता। कुछ समय बाद संस्था ने अपना एक अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र बस्ती में आरंभ किया। यहां की षिक्षिका ने पहली बार जूली बाई की 2 लड़कीयो और बस्ती की एक अन्य लड़की को पास के सरकारी स्कूल में भर्ती कराया। वर्तमान में बस्ती के पांच बच्चे सरकारी स्कूल में जाते हैं। बाकी 20 बच्चे संस्था के अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र पर पढने जाते हैं। पिछले वर्ष तक बस्ती की 5 लड़कियों ने 5वीं की परीक्षा दी जिनमें से 3 लड़कियां पास हुई ।

जूली बाई कभी लिखने पढने की प्रक्रिया में शामिल नहीं हुई मगर बस्ती की अन्य महिलाओं के पढने बैठने पर उनके साथ बैठती ज़रूर थी उस समय 6 महिलाएं केन्द्र पर कभी कभी पढने बैठती थी। ये अपने बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र पर जाने के लिये हमेशा बोलती और उनके ना मानने पर पिटाई भी कर देती थीं। वर्तमान में जूली बाई का 1 बच्चा अ.शि.केन्द्र पर पढने जाता है। मगर इनके कारण बस्ती के लगभग सभी बच्चे शिक्षण की प्रक्रिया में कहीं न कहीं शामिल हैं ।