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शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

भारतीय लोकतंत्र पर एक टिप्पणी - मदन कश्यप


भारतीय लोकतंत्र एक सामन्ती लोकतंत्र है 
·  मदन कश्यप 

दखल के लिए यह कोलाज भाई महेश वर्मा ने बना कर भेजा था..


ग्राम्शी ने कहा था कि एक बुर्जुआ लोकतंत्र में पूँजी जनता के सामूहिक विवेक को नियंत्रित करती है. आज भारत सहित सारी दुनिया में यह देखा जा सकता है. इन लोकतंत्रों में सारे निर्णयों और सारी गतिविधियों के केन्द्र में लोक नहीं पूंजीपति हैं. बड़े स्पष्ट तरीके से नीतियाँ इस प्रकार बनाई जा रही हैं कि वे पूंजीपतियों के वर्ग-हितों के अनुरूप हों. इस प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से समाज का बड़ा हिस्सा वंचना का शिकार होकर हासिये पर जा रहा है. किसान, मजदूर और आदिवासी अब सत्ता विमर्श के केन्द्र पर नहीं हैं. एक ऐसा विकास-विमर्श प्रचलित किया जा रहा है जिसमें पूंजीपतियों की समृद्धि को ही विकास का पर्याय बना दिया गया है. यह केन्द्र लगातार संकुचित हो रहा है और हाशिया बढ़ता जा रहा है.




इसके स्रोत सत्ता की बदली हुई शब्दावली में भी देखे जा सकते हैं. संविधान में कहीं केन्द्रशब्द का प्रयोग नहीं है. वहाँ संघीय शासनकी बात की गयी थी. लेकिन आप देखेंगे कि मीडिया से लेकर सत्ता तक की भाषा में केन्द्र सरकारका प्रचलन है. यह सिर्फ भाषा का खिलवाड नहीं. यह उस बदले हुए वैचारिक परिदृश्य को भी दिखाता है जिसमें सभी का प्रतिनिधित्व करने वाली और विभिन्न राष्ट्रीयताओं तथा समाजों के एक संघ की प्रतिनिधि सरकार एक सर्वाधिकारी केन्द्रीय सत्ता में तब्दील हो गयी है. यह सत्ता स्वाभाविक रूप से उन बड़े तथा प्रभावी समुदायों की सत्ता है जिनकी बहुसंख्या इस संख्या आधारित चुनाव प्रणाली को प्रभावित करती है. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे प्रदेशों का संघीय राजनीति में जिस तरह से दबदबा है वह इसी कारण से है. और ठीक यही कारण है जिसकी वज़ह से उत्तर पूर्व जैसे हिस्से लगातार उपेक्षा झेल रहे हैं. दिल्ली में होने वाले अन्ना के आंदोलन को तो राष्ट्रीय आंदोलन का दर्ज़ा मिल जाता है लेकिन इरोम शर्मिला का आंदोलन हासिये का आंदोलन बन कर रह जाता है. हालाँकि मैं यहाँ यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि अन्ना के आंदोलन की इतनी भूमिका मैं स्वीकार करता ही हूँ कि उसने लंबे समय बाद मध्य वर्ग के एक हिस्से को आंदोलित किया और उन्हें सड़क पर ले आया. इससे आगे का काम परिवर्तनकारी शक्तियों का है. यही नहीं इन राज्यों और समुदायों के भीतर के तमाम अल्पसंख्यक समाज भी लगातार हासिये पर बने रहते हैं. चूंकि वे संख्या में इतने बड़े नहीं होते कि किसी चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकें तो उनकी आवाज़ को भी कोई महत्व नहीं दिया जाता. यह लोकतंत्र की एक बड़ी सीमा है और इसके सबका राज्यहोने के मिथक पर एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है.

साथ ही मैं भारतीय लोकतंत्र को एक सामंती लोकतंत्रभी कहना चाहूँगा. इसमें जाति, धर्म और क्षेत्रीयता जैसी संरंचनाएँ बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. पश्चिमी देशों में जहाँ लोकतंत्र बुर्जुआ प्रकृति का है, वहाँ अपनी सीमाओं के बावजूद मनुष्य की अस्मिता तथा जीवन का सम्मान है. उदाहरण के लिए वहाँ दवा या खाने-पीने के चीजों में मिलावट संभव नहीं. इसके लिए बेहद कड़ी सज़ाएँ हैं, लेकिन भारत में ये अपराध आम हैं. यहाँ का लोकतंत्र अभी मनुष्य की अस्मिता के सम्मान का प्राथमिक गुण भी नहीं सीख पाया है. औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के बाद जिस तरह किसी बड़े और व्यापक आमूलचूल परिवर्तन की जगह सामंती वर्ग ही सत्ता वर्ग में तबदील हुआ, उसमें यह स्वाभाविक था. ऊँची जातियों के पूर्व सामंतों का समाज के भीतर दबदबा रहा. जाति और धर्म की उत्पीडक संरंचनाओं को तोड़ने के कोई गंभीर प्रयास नहीं किये गए. बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया को जाति/क्षेत्र/धर्म के आधार पर तय किया गया. लोकसभा से लेकर ग्रामसभा तक जातियाँ चुनावी नतीजों और नीतियों के केन्द्र में रहीं और जातिमुक्त समाज का स्वप्न हासिये पर. आरक्षण ने एक धीमी प्रक्रिया के तहत वंचित जातियों से एक हिस्से को मुख्यधारा में लाने में निश्चित रूप से सकारात्मक भूमिका निभाई है लेकिन जाति और धर्म के भारतीय लोकतंत्र से अविभाज्य रिश्ते को वह भी प्रभावित नहीं कर पाया है. ज़ाहिर है कि इस सामंती लोकतंत्रमें केन्द्र और हासिये का विभाजन प्रभावशाली तथा वंचित जातियों, बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक धर्मों और संपन्न तथा उपेक्षित क्षेत्रों में होता ही है.

इस केन्द्र और हासिये के विभाजन का असर भी शुरू से ही साफ़ दिखाई देने लगा था. कश्मीर, पूर्वोत्तर ही नहीं देश के तमाम हिस्सों सहित लगभग हर राज्य में इस द्वंद्व का प्रतिफलन हिंसक/अहिंसक संघर्षों में हुआ है. सुविधाप्राप्त तथा वंचितों के बीच बढ़ती खाई ने भारत ही नहीं दुनिया भर में एक ऎसी स्थिति बनाई है जिसमें लोगों का गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा है. अरब देशों से लगाए यूरोप और अमेरिका तक में जारी जनता के विरोध प्रदर्शन पूंजीवादी लोकतंत्र की इसी विफलता के स्वाभाविक परिणाम हैं. यहाँ बड़ी भूमिका निभाने में क्रांतिकारी शक्तियों की अक्षमता ही पूंजीवाद को अब तक ज़िंदा रखे है. ऐसा क्यों है, इस पर गंभीर विचार की ज़रूरत है.  

दखल विचार मंच के कार्यक्रम में दिए गए व्याख्यान के आधार पर 
प्रस्तुति - फिरोज खान

रविवार, 30 मई 2010

कचरे से बीनी एक ज़िंदगी

( कचरा बीनने वाली एक महिला की यह केस स्टडी हमें देवास से फैज ने भेजी है। अगर आप के पास भी विकास की विसंगतियों से जुड़ी ऐसी कोई बात है तो जनपक्ष के लिये भेजिये ashokk34@gmail.com पर)

तस्वीर यहां से
कचरे और झूठन से चलता जीवन - एक तस्वीर
  • फैज


‘जूली बाई’ महाराष्ट्र के भूसावल गांव से आकर पिछले 20-22 सालों से भोपाल में अपने परिवार के साथ रह रही हैं । रेल्वे स्टे्शन के निर्माण के चलते इनकी बसाहट को बाग मुगालिया विस्थापित किया गया । उस समय मुगालिया जाना आना एक मुष्किल भरा काम होता था क्योंकि धंधे पर आने-जाने मे 15 से 20 रू. खर्चा होते थे। अपने रहने के लिये जगह ना होना और आर्थिक अक्षमता के कारण सरगम टाकिज के बाजू में ये नाले के किनारे एक झोपड़ी बनाकर रहने लगी , इनसे पहले यहां सिर्फ एक झोपड़ी हुआ करती थी । झोपड़ी ऐसी की जिसमें 6’4 की जगह,बक्सा पेटी की लकड़ी के नाम मात्र के दरवाजे , बांस-बल्ली और पुट्ठे की दिवार तथा पन्नी की आधी ढ़ंकी छत। घर में क्या हो रहा है ये अन्दर से बाहर और बाहर से अन्दर साफ दिखता है । 

जूली के पति राजेन्द्र लोखंडे 1992 के दंगो के पहले न्यू मार्केट में हकीम होटल पर  खाना बनाने का काम करते थे , जहां गुजर बसर के लिए अच्छा पैसा मिल जाता था । किसी तरह के विवाद के चलते इन्हें वहां का काम छोड़ना पड़ा । बस यहीं से जूली बाई के एक नये संघर्ष की कहानी आरंभ होती है । राजेन्द्र ने सरगम टाकिज के पास ठेकेदारों के पास बेलदारी का काम आरंभ किया उस समय बेलदारी के 25 रूप्ये मिलते थे । कम पैसो में गुजारा ना होने के कारण सड़क निर्माण का काम करने लगे उस समय बाइपास का काम चल रहा था और दिहाड़ी पर काम करके वे 150-200 रूप्ये प्रति दिन कमाने लगे । बायपास निर्माण काम बंद हाने पर ये काम बंद हो गया । इसके बाद पलटू उर्फ राजेन्द्र ने हम्माली करना शुरू किया । आज भी पलटु कभी कभी हम्माली करता है । 
अपनी रोज की ज़रूरतो को पूरी न कर पाने और अन्य काम ना मिल पाने के कारण जूली बाई ने कचरा चुनना आरंभ किया । इस काम को आरंभ करते समय इनकेा शर्म आती थी जिसके चलते ये मुंह अंधेरे लगभग सुबह 4 बजे बीनने चली जाती और सूरज निकलने के पहले वापस लौट आती । इस काम में जूली के साथ सकारात्मक यह था कि इसका कोई परिचित या परिवार वाला यहां नहीं रहता था । धीरे-धीरे ज़रूरतों और साहस के चलते यह काम जूली बाई का मुख्य काम हो गया । वर्तमान में जूली बाई को यह काम करते हुए लगभग 15 साल हो गये हैं । ये आज भी अपने परिवार के साथ उसी जगह अपनी उसी झोपड़ी में रहती हैं । कचरा चुनकर संघर्ष पूर्ण जीवन चलाती हैं ।
जूली बाई के 6 बच्चे हैं । अनिता 19,संगीता 18,सुनिता 17,बीरजू 14,तनू 12,संजू 6 वर्ष । इनकी तीनो लड़कियों ने अपनी अपनी पसंद के लड़कों से शादी की है और यही बस्ती में रहते हैं। इनके दो लड़के बीनने का काम करते हैं और अपनी दैनिक खर्चों को पूरा करते हैं । पति हम्माली करते और ना करते तब भी दारू पीते हैं और गाना गाते रहते हैं। इनके पति स्वयं को पति साबित करने के चक्कर में अक्सर इन्हें पीटा करते थे,  बात करने पर अक्सर पिटाई का जस्टीफिके्शन भी दिया करते थे किन्तु जब से जूली ने इनकी पिटाई की है और दारू के पैसे देने बन्द किये हैं तब से इन्हें अपने को पति साबित करते नहीं देखा गया। जूली बाई भी दारू पीती है, कहती है ‘भैया कमाती हुं तो पीती हूं किसी के बाप का थोड़ी पीती हूं ।
जूली बाई कभी स्कूल नहीं गई, पर अपने सारे बच्चों को स्कूल भेजती थी। संगीता, सुनिता, को संजय गांधी स्कूल (पड़ौस का सरकारी स्कूल) में भर्ती कराया था पर स्कूल ने इन्हें कभी स्वीकार नहीं किया। गंदे आते हो , गाली बकते हो ,लड़ते हो इत्यादी सम्बोधन देकर इस तंत्र ने सारे बच्चों को बाहर कर दिया, उनकी परिस्थिति को भी समझने का प्रयास नहीं किया। अब जूली बाई का कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता । सबसे छोटी लडकी संगीता कक्षा तीसरी तक पढ़ाई कर पाई है वह भी पांच सालों में । इसमें एक बड़ा तथ्य यह की ये सारे बच्चे पहली पीढी के सीखने वाले है । स्कूल इनकी ज़रूरतों को देख और समझ भी नहीं पाया । 

परिस्थिती ऐसी है कि एक जोड़ कपड़े में सारा साल गुजार देते हैं सिर्फ लड़कियों के पास साझा रूप में 2 जोड़ अतिरिक्त कपड़े हैं, जो बस्ती के किसी कार्यक्रम में कोई भी पहन लेती है । कभी किसी ने पुराने कपड़े दिये तो दूसरा कपड़ा मिला नही ंतो उसी को कभी साफ करके पहन लिया । त्योहारों पर तो ज़रूर नये कपड़े खरीदते हैं ।

जूली बाई और इनके बच्चे भी बीमार होतें है , किसी अन्य व्यक्ति की तरह मेडीकल स्टोर से दवाई खरीदी और खा कर अपनी बीमारी का इलाज कर लिया । सरकारी अस्पताल में डाक्टर भी हाथ पकड़ कर जांच नहीं करता । यहां कहते है ‘8-10 बच्चे पैदा कर लेते हैं बीमार नहीं होगें तो क्या ? बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखतें । इस पर जूली बाई कहती है - ये अपना काम करें नौकरी भी तो हमारी करते हैं, इनके भरोसे पैदा थोड़े किये हैं 9 महीने पेट में लेके घुमी हूं तब जाकर पैदा हुए हैं । जूली बाई को करिश्मा हास्पिटल का डाक्टर पसंद है क्योंकि वह हाथ पकड़ कर देखता है, बात करता है और इंजेक्शन भी लगाता है । इसके बदले 50 रू; लेता है तो क्या ?

जूली बाई को अक्सर पुलिस वाले भी परेशान करते हैं । आस पड़ोस में चोरी होने पर इनकी तलाशी लेनेे मे कहीं भी हाथ लगाते  है और थाने भी बैठा देते है । इनके या पति के साथ मारपीट होने पर रिर्पोट भी नहीं लिखते । भगा देते हैं - कहते हैं दारू पीकर झगड़ते हो और आ जाते हो रिर्पोट लिखाने, अभी लड़ लेगे और फिर एक हो जाएगे , एफ आइ आर लिख दी तो हमको कोरट कचेरी करना होगी । जूली अनुभव की इतनी पक्की हैं बताती हैं किसी काम में पुलिस को 100-500 रू दो तो वो किसी को भी थाने में बंद कर देगी और अपन को पकड़े तो 100-500 दे दो ।
ये जूली बाई के जीवन के वे आयाम हैं जिनसे जूली बाई प्रतिदिन गुजरती हैं । ये बहुत बोलने वाली , खुश मिजाज़,नीडर और जुझारू महिला हैं । अपने बीनने के काम के बाद खाना बनाना ,बच्चों की देखभाल और घर से जुड़े अन्य काम प्रतिदिन करती हैं, इसमें पति का खर्चा चलाना भी शामिल है। इन सबके बदले में पति से मार भी खाती है। अपने हर बच्चे को 2-10 रूपया रोज देती हैं।

आज से 4 साल पहले बीनते समय ज्योति टाकिज के पास ये ‘सौरभ ’ नाम के व्यक्ति से मिली । सौरभ एक स्वयं सेवी संस्था का कार्यकर्ता था वह वहां पार्किग लार्ड में बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाता था। ये उससे जिद्द करके अपनी बस्ती लाईं । जब बस्ती में 14 झोपड़ी हुआ करती थीं, आज बस्ती में 31 झोपड़ीयां है जिसमें 34 परिवार रहते है। बस्ती दिखाने के बाद सौरभ से कहने लगी -यहां भी बच्चे हैं इनको भी पढाया करा कोइ भी स्कूल नहीं जाता। कुछ समय बाद संस्था ने अपना एक अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र बस्ती में आरंभ किया। यहां की षिक्षिका ने पहली बार जूली बाई की 2 लड़कीयो और बस्ती की एक अन्य लड़की को पास के सरकारी स्कूल में भर्ती कराया। वर्तमान में बस्ती के पांच बच्चे सरकारी स्कूल में जाते हैं। बाकी 20 बच्चे संस्था के अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र पर पढने जाते हैं। पिछले वर्ष तक बस्ती की 5 लड़कियों ने 5वीं की परीक्षा दी जिनमें से 3 लड़कियां पास हुई ।

जूली बाई कभी लिखने पढने की प्रक्रिया में शामिल नहीं हुई मगर बस्ती की अन्य महिलाओं के पढने बैठने पर उनके साथ बैठती ज़रूर थी उस समय 6 महिलाएं केन्द्र पर कभी कभी पढने बैठती थी। ये अपने बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र पर जाने के लिये हमेशा बोलती और उनके ना मानने पर पिटाई भी कर देती थीं। वर्तमान में जूली बाई का 1 बच्चा अ.शि.केन्द्र पर पढने जाता है। मगर इनके कारण बस्ती के लगभग सभी बच्चे शिक्षण की प्रक्रिया में कहीं न कहीं शामिल हैं ।