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बुधवार, 23 मार्च 2016

भगत सिंह : कितने दूर, कितने पास



यह लेख मैंने दखल विचार मंच द्वारा प्रकाशित भगत सिंह के धर्म एवं जाति सम्बन्धी लेखों की पुस्तिका "इन्क़लाब ज़िन्दाबाद" की भूमिका के रूप मे लिखा था। आज भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव की शहादत दिवस पर यह लेख देश मे बनते जा रहे भयानक सांप्रदायिक-फासीवादी माहौल के मद्देनज़र एक हस्तक्षेप के रूप मे 




भगत सिंह हमारी राष्ट्रीय चेतना में कितने गहरे बसे हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि धुर दक्षिणपंथी दलों से लेकर धुर वामपंथी दलों तक उन्हें अपना नायक बनाने और उनसे अपनी परम्परा जोड़ने का भरसक प्रयास करते हैं. उनके जन्मशताब्दी वर्ष में शायद ही देश की कोई ऐसी पत्रिका होगी जिसने उन पर विशेषांक नहीं निकाला या फिर विशेष सामग्री नहीं दी. गांधी के अलावा शायद ही ऐसा किसी अन्य के साथ होता हो. गांधी के सन्दर्भ में भी स्वरों में पर्याप्त अंतर होता है तथा अक्सर वाम तथा दक्षिण अलग अलग कारणों से उनके प्रति आलोचनात्मक रुख रखते हैं, भगत सिंह के सन्दर्भ में अनिवार्य रूप से सभी का स्वर प्रशंसा का ही होता है लेकिन यहाँ अपनी अपनी तस्वीरों में मढ के. जहाँ वामपंथी उन्हें कम्युनिस्ट बता कर उनके सपनों के भारत की बात करते हैं वहीँ संघ परिवार उन्हें कट्टर राष्ट्रवादी और देश की आन बाण शान पर अपने प्राणों की बलि देने वाला देशभक्त जवान बताकर अपने सपनों का भारतवर्ष बनाने की बात करता है. ज़ाहिर है जनता के बीच भगत सिंह की जो विश्वसनीयता और उन्हें लेकर जो श्रद्धा भाव है वह अद्वितीय है. लेकिन इन सबके बीच असली भगत सिंह कहाँ हैं? कौन हैं? क्या थे उनके स्वप्न और हम उनसे कितने दूर खड़े हैं या फिर कितने पास हैं? संयोग से अपने अन्य समकालीन क्रांतिकारियों से अलग भगत सिंह का लिखा पढ़ा आज भी उपलब्ध है और भगत सिंह की तलाश उन्हीं लेखों, पत्रों, टिप्पणियों और पर्चों के सहारे की जा सकती है. उनके कुछ प्रतिनिधि लेखों की यह पुस्तिका इसी दिशा में हमारी एक कोशिश है. ये सभी लेख अलग अलग जगहों पर संकलित हैं और हमने इन्हें वहाँ से साभार लिया है

सितम्बर 1987 में भगत सिंह के साथी रहे शिव वर्मा के सम्पादन में कानपुर के समाजवादी साहित्य सदन ने उनके कुछ लेख और पत्र “भगत सिंह की चुनी हुई कृतियाँ” नाम से प्रकाशित किए. मुख्य खंड में 29 दस्तावेजी लेख/पत्र तथा परिशिष्ट के अंतर्गत भगत सिंह के संगठन ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन’ के दस दस्तावेज़ इसमें शामिल थे, जिनके लिखने में निश्चित रूप से उनकी प्रमुख भूमिका रही होगी और जिनसे सहमति तो रही होगी. इन दस्तावेजों के साथ शिव वर्मा ने एक लम्बी भूमिका के रूप में “क्रांतिकारी आन्दोलन का वैचारिक इतिहास” लिखकर भगत सिंह की वैचारिक अवस्थिति साफ़ की थी. यहाँ यह याद कर लेना अप्रासंगिक नहीं होगा कि हिन्दुस्तानी प्रजातांत्रिक संगठन का नाम बदल उसमें “समाजवादी” शब्द जुड़वाने में भगत सिंह की प्रमुख भूमिका थी. एक मज़ेदार तथ्य यह कि जिन दो लोगों ने “समाजवादी” शब्द जोड़ने का विरोध किया था उन दोनों ने ही बाद में भगत सिंह और उनके साथियों के खिलाफ़ गवाही दी, खैर, इन लेखों और दस्तावेजों को पढ़ते हुए इतना तो बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि चाफेकर बंधुओं से ग़दर पार्टी तक के क्रांतिकारियों की जो पूरी परम्परा थी भगत सिंह उसके सबसे आधुनिक और विकसित प्रतिनिधि थे. भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में वह पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने धर्म, जाति और ऐसे तमाम मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी थी. 1928 में किरती में लिखे अपने आलेख “धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम” में वह लिखते हैं – “बात यह है कि क्या धर्म घर में रहते हुए भी लोगों के दिलों के भेदभाव नहीं बढ़ाता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? ... बच्चे से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है मनुष्य कुछ भी नहीं है, मिट्टी का पुतला है, बच्चे को हमेशा के लिए कमज़ोर बनाना है. उसके दिल की ताक़त और उसके आत्मविश्वास की भावना को नष्ट कर देना है.” अपने थोड़े बाद के लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” में वह कहते हैं, “तुम जाओ और किसी प्रचलित धर्म का विरोध करो, जाओ किसी हीरो की, महान व्यक्ति की, जिसके बारे में सामान्यतः यह विश्वास किया जाता है कि वह आलोचना से परे है क्योंकि वह ग़लती कर ही नहीं सकता, आलोचना करो तो तुम्हारे तर्क की शक्ति हज़ारों लोगों को तुम पर वृथाभिमानी का आक्षेप लगाने को मज़बूर कर देगी.” उस दौर में जब महाराष्ट्र में एक मज़बूत दलित आन्दोलन के बावजूद कांग्रेस सहित आज़ादी की लड़ाई के तमाम भागीदारों के बीच जाति प्रश्न को लेकर कोई दृढ़ चेतना दिखाई नहीं देती और संघ जैसे कट्टरपंथी संगठन तो वर्ण व्यवस्था को बनाए रखने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे थे, भगत सिंह का अछूत समस्या पर जून, 1928 को किरती में प्रकाशित लेख “अछूत समस्या” निश्चित रूप से क्रांतिकारी था. इस लेख में वह यह कहते हुए कि  “क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं। इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे। साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है। अब क्या हो सकता है?चुपचाप दिन गुजारो! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए। लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया। आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और अन्याय किया गया। आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है”, खुली अपील करते हैं कि “संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो... संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होनेवाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोए हुए शेरो! उठो और बगावत खड़ी कर दो।“ यह यों ही नहीं था कि उनकी शहादत के बाद महान दलित नेता रामास्वामी पेरियार ने अपने अखबार “कुडई आरसु” में श्रद्धांजलि लेख लिखा था. जिस तरह गांधी ने आंबेडकर को उस समय पूना पैक्ट करने पर मज़बूर किया और लगातार वर्ण व्यवस्था का समर्थन करते रहे और वाम आन्दोलन के भीतर जाति के सवाल को लगातार टाला गया उसमें भगत सिंह का जाति प्रश्न पर यह स्पष्ट और कड़ा स्टैंड निश्चित रूप से उनकी अग्रगामी चेतना और भारतीय समाज की बेहतर समझ का परिचायक था.

यही नहीं जो लोग उन्हें “मरने के लिए मरे जा रहे” रूमानी क्रांतिकारी के रूप में देखते हैं उन्हें युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के नाम लिखा उनका पत्र पढ़ना चाहिए जिसमें वे उन्हें गाँवों और फैक्ट्रियों में जाकर लोगों को संगठित कर एक नयी सामाजिक व्यवस्था के निर्माण की अपील करते हैं. इसी पत्र में वह लिखते हैं कि “इससे क्या फर्क पड़ता है कि भारतीय सरकार के प्रमुख लार्ड इरविन हों या सर पुरुषोत्तम ठाकुर दास. एक किसान को इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि लार्ड इरविन की जगह सर तेज बहादुर सप्रू गद्दी पर बैठे हैं.” ज़ाहिर है कि उनकी देशभक्ति गोरे अंग्रेजों को सत्ता से हटाने भर तक सीमित नहीं थी बल्कि वह देश के मज़दूर, किसानों और वंचित जन के हाथ में सत्ता पहुँचाने की उस लड़ाई में मुब्तिला थे जिसकी तलाश में वह समाजवाद के सिद्धांत तक पहुँचे थे. “इन्कलाब जिंदाबाद से हमारा अभिप्राय क्या है” नामक लेख में वह इसका मज़ाक उड़ाने वाले सम्पादक को जवाब ही नहीं देते बल्कि क्रांति के अपने स्वप्न को भी स्पष्ट करते हैं, “क्रान्ति शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना और आकांक्षा है.” इस प्रगति को लेकर उनका नज़रिया तमाम जगहों पर बहुत स्पष्ट रूप से सामने आता है. यह कोई वायवीय रोमांटिक स्वप्न नहीं है. अपने समकालीन क्रांतिकारी लाला रामशरण दास की किताब “ड्रीमलैंड” की भूमिका में वह रूमानी इन्कलाब और अपने उद्देश्यों का ज़िक्र करते हैं. लेखक की स्वप्नजीविता की कड़ी आलोचना करते हैं और साफ़ साफ़ अपनी विचारधारा “भौतिकवाद” घोषित करते हैं. यह भूमिका दरअसल पुस्तक की समीक्षा ही है और इस रूप में राजनीतिक आलोचना का एक उत्कृष्ट उदहारण है. इस भूमिका के अंत में वह कहते हैं कि “मैं अपने नौजवानों के लिए ख़ास तौर पर इस पुस्तक की सिफारिश करता हूँ, लेकिन एक चेतावनी के साथ. कृपया आँख मूंदकर इस पर अमल करने के लिए या इसमें जो कुछ लिखा है उसे वैसा ही मान लेने के लिए इसे न पढ़ें. इसे पढ़ें, इसकी आलोचना करें, इस पर सोचें और इसकी सहायता से स्वयं अपनी समझदारी बनाएँ.” भगत सिंह की यह चेतावनी किसी भी समय किसी भी रचना के पाठक के लिए समीचीन है. 

भगत सिंह को समझने के लिए उनके दिए नारे भी बेहद महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं. उन्होंने ‘वन्दे मातरम’ या ‘भारत माता की जय’ की जगह जो नया नारा उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन को दिया वह था – इन्कलाब जिंदाबाद. इन्कलाब से उनका अभिप्राय क्या था यह हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं. अराजकतावाद से आगे बढ़ते हुए समाजवादी विचारों को आत्मसात करने की प्रक्रिया में उन्होंने यह साफतौर पर कहा कि ‘हथियार और गोला बारूद क्रांति के लिए कभी कभी आवश्यक हो सकते हैं लेकिन इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है. यानि इस क्रान्ति को वैचारिक तैयारी के बिना अंजाम देना संभव नहीं था. भगत खुद भी दीवानावार किताबें पढ़ते थे. उनकी जेल डायरी के नोट्स देखें जांय तो मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन से लेकर गैरीबाल्डी और मैजिनी तक को वह पढ़ रहे थे और इन्हीं किताबों से उनके सम्मुख क्रान्ति का स्वप्न आकार ले रहा था. यह यों ही नहीं था कि उन्होंने कोर्ट में अपनी पेशी के दौरान लेनिन के निर्वाण दिवस पर तीसरी कम्युनिस्ट इंटर्नेशनल को पत्र लिखा था. इस पत्र में  एक और नारा है – साम्राज्यवाद मुर्दाबाद. ज़ाहिर है वह अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ सिर्फ़ इसलिए नहीं थे कि यह एक विदेशी हुकूमत थी. वह साम्राज्यवाद के खिलाफ थे और इसके विकल्प के रूप में समाजवाद के समर्थक. यह यों ही नहीं है कि ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसी के प्रमुख ने अपनी रपट में गांधी से अधिक ख़तरा भगत सिंह जैसे “कम्यूनिस्ट” क्रांतिकारियों से बताया था. भगत सिंह निश्चित तौर पर भारत की आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टियों का हिस्सा नहीं थे, लेकिन अपने विचारों में वह वैज्ञानिक समाजवाद के बेहद करीब थे. आज़ाद हिन्दुस्तान को लेकर उनके स्वप्न एक शोषण विहीन और समानता आधारित समाज के थे जिसमें सत्ता का संचालन कामगार वर्ग के हाथ में हो.


और उस स्वप्न के आईने में जब हम अपना समय देखते हैं तो निश्चित रूप से यह उनके जितने पास लगता है उससे कहीं अधिक दूर. वह लड़ाई उपनिवेशवाद की मुक्ति तक तो पहुंची लेकिन उसके आगे जाकर वंचित जनों के हाथ में सत्ता देकर एक समतावादी समाज की स्थापना अब भी एक स्वप्न ही है. हमने जो आर्थिक व्यवस्था चुनी वह समतावादी होने की जगह लगातार विषमता बढ़ाने वाली साबित हुई और आज आज़ादी के सात दशकों बाद भी हम अपनी जनता के बड़े हिस्से को ज़रूरी सुविधाएं भी मुहैया नहीं करा पा रहे. सामाजिक ताना बाना भी बुरी तरह उलझा और ध्वस्त हुआ है. एक अपेक्षाकृत बराबरी वाला संविधान अपनाने के बावजूद समाज के भीतर जातीय, धार्मिक और इलाकाई भेदभाव लगातार बढ़ता गया है. बाबरी विध्वंस के बाद से देश में दक्षिणपंथी ताक़तें मज़बूत हुई हैं और धर्म का स्पेस राजनीति में घटने की जगह भयावह रूप से विस्तारित होता चला जा रहा है. कश्मीर और उत्तर पूर्व में जिस तरह उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के प्रतिरोध और दमन देखे जा रहे हैं वह देश के रूप में हमारी परिकल्पना को ही प्रश्नांकित कर रहे हैं. ऐसे में भगत सिंह को याद करना उपनिवेशवादी आन्दोलन की क्रांतिकारी तथा जनपक्षधर धारा को याद करना है. यह सवाल सिर्फ एक महान क्रांतिकारी शहीद की स्मृति को ज़िंदा रखने का नहीं बल्कि उस विचार और स्वप्न को जीवित रखने का है और इसे आगे ले जाने की जिम्मेवारी उनकी है जो खुद को भगत सिंह का वारिस कहते हैं.

शनिवार, 22 मार्च 2014

भगत सिंह : कितने दूर, कितने पास

भगत सिंह के शहादत दिवस पर २३ मार्च, २०१४ को गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में दख़ल विचार मंच द्वारा आयोजित होने वाली परिचर्चा का आधार पत्र 


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भगत सिंह हमारी राष्ट्रीय चेतना में कितने गहरे बसे हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि धुर दक्षिणपंथी दलों से लेकर धुर वामपंथी दलों तक उन्हें अपना नायक बनाने और उनसे अपनी परम्परा जोड़ने का भरसक प्रयास करते हैं. उनके जन्मशताब्दी वर्ष में शायद ही देश की कोई ऐसी पत्रिका होगी जिसने उन पर विशेषांक नहीं निकाला या फिर विशेष सामग्री नहीं दी. गांधी के अलावा शायद ही ऐसा किसी अन्य के साथ होता हो. गांधी के सन्दर्भ में भी स्वरों में पर्याप्त अंतर होता है तथा अक्सर वाम तथा दक्षिण अलग अलग कारणों से उनके प्रति आलोचनात्मक रुख रखते हैं, भगत सिंह के सन्दर्भ में अनिवार्य रूप से सभी का स्वर प्रशंसा का ही होता है लेकिन यहाँ अपनी अपनी तस्वीरों में मढ के. जहाँ वामपंथी उन्हें कम्युनिस्ट बता कर उनके सपनों के भारत की बात करते हैं वहीँ संघ परिवार उन्हें कट्टर राष्ट्रवादी और देश की आन बाण शान पर अपने प्राणों की बलि देने वाला देशभक्त जवान बताकर अपने सपनों का भारतवर्ष बनाने की बात करता है. ज़ाहिर है जनता के बीच भगत सिंह की जो विश्वसनीयता और उन्हें लेकर जो श्रद्धा भाव है वह अद्वितीय है. लेकिन इन सबके बीच असली भगत सिंह कहाँ हैं? कौन हैं? क्या थे उनके स्वप्न और हम उनसे कितने दूर खड़े हैं या फिर कितने पास हैं? संयोग से अपने अन्य समकालीन क्रांतिकारियों से अलग भगत सिंह का लिखा पढ़ा आज भी उपलब्ध है और भगत सिंह की तलाश उन्हीं लेखों, पत्रों, टिप्पणियों और पर्चों के सहारे की जा सकती है.

सितम्बर 1987 में भगत सिंह के साथी रहे शिव वर्मा के सम्पादन में कानपुर के समाजवादी साहित्य सदन ने उनके कुछ लेख और पत्र “भगत सिंह की चुनी हुई कृतियाँ” नाम से प्रकाशित किए. मुख्य खंड में 29 दस्तावेजी लेख/पत्र तथा परिशिष्ट के अंतर्गत भगत सिंह के संगठन ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन’ के दस दस्तावेज़ इसमें शामिल थे, जिनके लिखने में निश्चित रूप से उनकी प्रमुख भूमिका रही होगी और जिनसे सहमति तो रही होगी. इन दस्तावेजों के साथ शिव वर्मा ने एक लम्बी भूमिका के रूप में “क्रांतिकारी आन्दोलन का वैचारिक इतिहास” लिखकर भगत सिंह की वैचारिक अवस्थिति साफ़ की थी. यहाँ यह याद कर लेना अप्रासंगिक नहीं होगा कि हिन्दुस्तानी प्रजातांत्रिक संगठन का नाम बदल उसमें “समाजवादी” शब्द जुड़वाने में भगत सिंह की प्रमुख भूमिका थी. एक मज़ेदार तथ्य यह कि जिन दो लोगों ने “समाजवादी” शब्द जोड़ने का विरोध किया था उन दोनों ने ही बाद में भगत सिंह और उनके साथियों के खिलाफ़ गवाही दी, खैर, इन लेखों और दस्तावेजों को पढ़ते हुए इतना तो बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि चाफेकर बंधुओं से ग़दर पार्टी तक के क्रांतिकारियों की जो पूरी परम्परा थी भगत सिंह उसके सबसे आधुनिक और विकसित प्रतिनिधि थे. भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में वह पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने धर्म, जाति और ऐसे तमाम मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी थी. 1928 में किरती में लिखे अपने आलेख “धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम” में वह लिखते हैं – “बात यह है कि क्या धर्म घर में रहते हुए भी लोगों के दिलों के भेदभाव नहीं बढ़ाता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? ... बच्चे से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है मनुष्य कुछ भी नहीं है, मिट्टी का पुतला है, बच्चे को हमेशा के लिए कमज़ोर बनाना है. उसके दिल की ताक़त और उसके आत्मविश्वास की भावना को नष्ट कर देना है.” अपने थोड़े बाद के लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” में वह कहते हैं, “तुम जाओ और किसी प्रचलित धर्म का विरोध करो, जाओ किसी हीरो की, महान व्यक्ति की, जिसके बारे में सामान्यतः यह विश्वास किया जाता है कि वह आलोचना से परे है क्योंकि वह ग़लती कर ही नहीं सकता, आलोचना करो तो तुम्हारे तर्क की शक्ति हज़ारों लोगों को तुम पर वृथाभिमानी का आक्षेप लगाने को मज़बूर कर देगी.” उस दौर में जब महाराष्ट्र में एक मज़बूत दलित आन्दोलन के बावजूद कांग्रेस सहित आज़ादी की लड़ाई के तमाम भागीदारों के बीच जाति प्रश्न को लेकर कोई दृढ़ चेतना दिखाई नहीं देती और संघ जैसे कट्टरपंथी संगठन तो वर्ण व्यवस्था को बनाए रखने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे थे, भगत सिंह का अछूत समस्या पर जून, 1928 को किरती में प्रकाशित लेख “अछूत समस्या” निश्चित रूप से क्रांतिकारी था. इस लेख में वह यह कहते हुए कि  “क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं। इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे। साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है। अब क्या हो सकता है?चुपचाप दिन गुजारो! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए। लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया। आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और अन्याय किया गया। आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है”, खुली अपील करते हैं कि “संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो... संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होनेवाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोए हुए शेरो! उठो और बगावत खड़ी कर दो।“ यह यों ही नहीं था कि उनकी शहादत के बाद महान दलित नेता रामास्वामी पेरियार ने अपने अखबार “कुडई आरसु” में श्रद्धांजलि लेख लिखा था. जिस तरह गांधी ने आंबेडकर को उस समय पूना पैक्ट करने पर मज़बूर किया और लगातार वर्ण व्यवस्था का समर्थन करते रहे और वाम आन्दोलन के भीतर जाति के सवाल को लगातार टाला गया उसमें भगत सिंह का जाति प्रश्न पर यह स्पष्ट और कड़ा स्टैंड निश्चित रूप से उनकी अग्रगामी चेतना और भारतीय समाज की बेहतर समझ का परिचायक था.


यही नहीं जो लोग उन्हें “मरने के लिए मरे जा रहे” रूमानी क्रांतिकारी के रूप में देखते हैं उन्हें युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के नाम लिखा उनका पत्र पढ़ना चाहिए जिसमें वे उन्हें गाँवों और फैक्ट्रियों में जाकर लोगों को संगठित कर एक नयी सामाजिक व्यवस्था के निर्माण की अपील करते हैं. इसी पत्र में वह लिखते हैं कि “इससे क्या फर्क पड़ता है कि भारतीय सरकार के प्रमुख लार्ड इरविन हों या सर पुरुषोत्तम ठाकुर दास. एक किसान को इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि लार्ड इरविन की जगह सर तेज बहादुर सप्रू गद्दी पर बैठे हैं.” ज़ाहिर है कि उनकी देशभक्ति गोरे अंग्रेजों को सत्ता से हटाने भर तक सीमित नहीं थी बल्कि वह देश के मज़दूर, किसानों और वंचित जन के हाथ में सत्ता पहुँचाने की उस लड़ाई में मुब्तिला थे जिसकी तलाश में वह समाजवाद के सिद्धांत तक पहुँचे थे. “इन्कलाब जिंदाबाद से हमारा अभिप्राय क्या है” नामक लेख में वह इसका मज़ाक उड़ाने वाले सम्पादक को जवाब ही नहीं देते बल्कि क्रांति के अपने स्वप्न को भी स्पष्ट करते हैं, “क्रान्ति शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना और आकांक्षा है.” इस प्रगति को लेकर उनका नज़रिया तमाम जगहों पर बहुत स्पष्ट रूप से सामने आता है. यह कोई वायवीय रोमांटिक स्वप्न नहीं है. अपने समकालीन क्रांतिकारी लाला रामशरण दास की किताब “ड्रीमलैंड” की भूमिका में वह रूमानी इन्कलाब और अपने उद्देश्यों का ज़िक्र करते हैं. लेखक की स्वप्नजीविता की कड़ी आलोचना करते हैं और साफ़ साफ़ अपनी विचारधारा “भौतिकवाद” घोषित करते हैं. यह भूमिका दरअसल पुस्तक की समीक्षा ही है और इस रूप में राजनीतिक आलोचना का एक उत्कृष्ट उदहारण है. इस भूमिका के अंत में वह कहते हैं कि “मैं अपने नौजवानों के लिए ख़ास तौर पर इस पुस्तक की सिफारिश करता हूँ, लेकिन एक चेतावनी के साथ. कृपया आँख मूंदकर इस पर अमल करने के लिए या इसमें जो कुछ लिखा है उसे वैसा ही मान लेने के लिए इसे न पढ़ें. इसे पढ़ें, इसकी आलोचना करें, इस पर सोचें और इसकी सहायता से स्वयं अपनी समझदारी बनाएँ.” भगत सिंह की यह चेतावनी किसी भी समय किसी भी रचना के पाठक के लिए समीचीन है.  

भगत सिंह को समझने के लिए उनके दिए नारे भी बेहद महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं. उन्होंने ‘वन्दे मातरम’ या ‘भारत माता की जय’ की जगह जो नया नारा उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन को दिया वह था – इन्कलाब जिंदाबाद. इन्कलाब से उनका अभिप्राय क्या था यह हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं. अराजकतावाद से आगे बढ़ते हुए समाजवादी विचारों को आत्मसात करने की प्रक्रिया में उन्होंने यह साफतौर पर कहा कि ‘हथियार और गोला बारूद क्रांति के लिए कभी कभी आवश्यक हो सकते हैं लेकिन इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है. यानि इस क्रान्ति को वैचारिक तैयारी के बिना अंजाम देना संभव नहीं था. भगत खुद भी दीवानावार किताबें पढ़ते थे. उनकी जेल डायरी के नोट्स देखें जांय तो मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन से लेकर गैरीबाल्डी और मैजिनी तक को वह पढ़ रहे थे और इन्हीं किताबों से उनके सम्मुख क्रान्ति का स्वप्न आकार ले रहा था. यह यों ही नहीं था कि उन्होंने कोर्ट में अपनी पेशी के दौरान लेनिन के निर्वाण दिवस पर तीसरी कम्युनिस्ट इंटर्नेशनल को पत्र लिखा था. इस पत्र में  एक और नारा है – साम्राज्यवाद मुर्दाबाद. ज़ाहिर है वह अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ सिर्फ़ इसलिए नहीं थे कि यह एक विदेशी हुकूमत थी. वह साम्राज्यवाद के खिलाफ थे और इसके विकल्प के रूप में समाजवाद के समर्थक. यह यों ही नहीं है कि ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसी के प्रमुख ने अपनी रपट में गांधी से अधिक ख़तरा भगत सिंह जैसे “कम्यूनिस्ट” क्रांतिकारियों से बताया था. भगत सिंह निश्चित तौर पर भारत की आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टियों का हिस्सा नहीं थे, लेकिन अपने विचारों में वह वैज्ञानिक समाजवाद के बेहद करीब थे. आज़ाद हिन्दुस्तान को लेकर उनके स्वप्न एक शोषण विहीन और समानता आधारित समाज के थे जिसमें सत्ता का संचालन कामगार वर्ग के हाथ में हो.

और उस स्वप्न के आईने में जब हम अपना समय देखते हैं तो निश्चित रूप से यह उनके जितने पास लगता है उससे कहीं अधिक दूर. वह लड़ाई उपनिवेशवाद की मुक्ति तक तो पहुंची लेकिन उसके आगे जाकर वंचित जनों के हाथ में सत्ता देकर एक समतावादी समाज की स्थापना अब भी एक स्वप्न ही है. हमने जो आर्थिक व्यवस्था चुनी वह समतावादी होने की जगह लगातार विषमता बढ़ाने वाली साबित हुई और आज आज़ादी के सात दशकों बाद भी हम अपनी जनता के बड़े हिस्से को ज़रूरी सुविधाएं भी मुहैया नहीं करा पा रहे. सामाजिक ताना बाना भी बुरी तरह उलझा और ध्वस्त हुआ है. एक अपेक्षाकृत बराबरी वाला संविधान अपनाने के बावजूद समाज के भीतर जातीय, धार्मिक और इलाकाई भेदभाव लगातार बढ़ता गया है. बाबरी विध्वंस के बाद से देश में दक्षिणपंथी ताक़तें मज़बूत हुई हैं और धर्म का स्पेस राजनीति में घटने की जगह भयावह रूप से विस्तारित होता चला जा रहा है. कश्मीर और उत्तर पूर्व में जिस तरह उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के प्रतिरोध और दमन देखे जा रहे हैं वह देश के रूप में हमारी परिकल्पना को ही प्रश्नांकित कर रहे हैं. ऐसे में भगत सिंह को याद करना उपनिवेशवादी आन्दोलन की क्रांतिकारी तथा जनपक्षधर धारा को याद करना है. यह सवाल सिर्फ एक महान क्रांतिकारी शहीद की स्मृति को ज़िंदा रखने का नहीं बल्कि उस विचार और स्वप्न को जीवित रखने का है और इसे आगे ले जाने की जिम्मेवारी उनकी है जो खुद को भगत सिंह का वारिस कहते हैं.
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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

भगत सिंह के जन्मदिवस पर उनके नाम प्रो लाल बहादुर वर्मा का एक ख़त




प्यारे दुलारे भगत,

ख़त में एक दूरी तो है पर यह ख़त हम तुम्हारे मार्फ़त खुद को लिख रहे हैं- तुम से जुड़कर तुम्हे अपने से जोड़ रहे हैं ..

तुमे हम क्या कहकर पुकारे यह तय करना बाकी है , क्योकि तुमसे जन्म का रिश्ता तो है नहीं कर्म का रिश्ता है और तुम्हे जो करना था कर गए , हमें जो करना है वह कितना कर पाते है यह इसे भी तय होगा की हम तुम्हे कैसे याद करते हैं .बहरहाल इतना तो तय ही है की तुम्हें ''शहीदे आज़म'' कहना छोड़ दिया है . इसमें जो दूरी , जो परायापन था वह पास आने से रोकता रहा है . तुम्हें अनूठा ,असाधारण ,निराला बनाकर हम बचते रहे की तुम जैसा और कोई हो ही नहीं सकता . आखिर क्यों नहीं हो सकता? आखिर तुमने ऐसा क्या किया है जो दूसरा नहीं कर सकता ? तुमने देश से प्रेम किया , समाज को बदलना चाहा . घर परिवार को समाज का अंग मान समाज को आज़ाद और बेहतर बनाना चाहा , आखिर तभी तो घर परिवार आज़ाद और बेहतर हो सकते थे ..तुमने अनुभव और अध्ययन से जाना और लोगों को बताया कि शोषण और जुल्म करने वालों में देशी-विदेशी का अंतर बेमानी होता है , तुमने कितनी आसानी से समझा दिया कि तुम नास्तिक क्यों हो गए थे ? तुमने कुर्बानी दी पर कुर्बानी देने वालों की तो कभी कमी नहीं रही है .आज भी कुर्बानी देने वाले हैं . हाँ तुम्हारी चेतना का विकास और व्यापक पहुँच असाधारण थी,पर कोई करने आमादा हो जाय तो ये सब मुश्किल भले ही हो पर असंभव तो नहीं होना चाहिए!

पर हाँ , तुम्हारी तरह लगातार अपने साथ आगे बढ़ते जाने का जज्बा और कोशिश तो चाहिए ही . 

तुमने जब अपने वक्त को और उसी से जोड़कर अपने को जाना पहचाना . तो हिन्दुस्तान पर बर्तानिया के हुक्मरानों की हुकूमत बेलौस और बेलगाम हो चुकी थी . आज अमरीकी निजाम उसी रास्ते पर है , वह ज्यादा ताकतवर, ज्यादा बेहया और ज्यादा बेगैरत है . उसे हर हाल में अपनी जरूरतें पूरी करनी हैं .पर दूसरी तरफ दुनिया तो पहले से ज्यादा जागी हुई है . खुद अमेरिका में ही लाखों लोग अपने ही देश में अमन और तहजीबो-तमददुन के दुश्मनों के खिलाफ बगावत पर आमादा हैं . यह सच है की दुनिया को भरमाने और तरह तरह के लालचों के जाल में फसाकर न घर न घाट का कुता बना देने के ढेरों औजार और चकाचौध पैदा करने वाली फितरतें हैं हुक्मरानों के पास . लोगों को तरह तरह से बाट कर रखने के उपाय हैं पर आम लोग भी तो पहले की तरह भेड़ बकरी नहीं रहे .आज ठीक है कि ज्यादातर लोग सम्मान पूर्वक रोटी दाल भी नहीं खा रहे और पढ़े लिखे लोग रोटी पर तरह तरह के मक्खन और चीज चुपड़ने में ही मरे जा रहे हैं पर यह भी तो सच है कि ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जो जानने समझने लगे है कि जो कुछ उनका है वह उन्हें क्यों नहीं मिल पा रहा है ? आज आदमी के हक़ छीने जा रहे हैं यहाँ तक की हवा पानी के हक़ भी .. जो कुदरत ने हर किसी को दे रखा है . पर हकों की पहचान भी तो बढ़ रही है . आज इन्साफ की उम्मीद नहीं रही . पर इन्साफ के लिए खुदा नहीं ,इंसान को जिम्मेदार ठहराने की तरकीबें बढ़ रही हैं . इंसान धरती सागर ही नहीं अन्तरिक्ष को भी रौंद रहा है पर उसकी इंसानियत खोती जा रही है . पर साथ ही बढ़ रहा है हैवानियत से शर्म का अहसास , बढ़ रहे हैं भारी पैमाने पर लालच बेहयाई और बर्बरता ..पर क्या गुस्सा नहीं बढ़ रहा?

तो भगत ! हम तुम्हारे अनुयायी नहीं ,तुमसा बनना चाहते हैं बल्कि तुमसे आगे जाना चाहते हैं .क्योकि तुमसा बनने से भी काम नहीं चलेगा . तुम रूमानियत से उबरते जा रहे थे ,पर क्या पूरी तरह ? आज के हालात में भी रूमानियत जरूरी है पर दाल में नमक भर ...

दुखी मत होना यह जानकर कि अब तो सफल होने में जुटे लोगों के लिए तुम प्रासंगिक नहीं रहे . आज़ादी के फ़ौरन बाद शैलेन्द्र ने लिखा था कि ''भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की ,देश भक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की'' .
 
मैं जानता हूँ, तुम्हें इतिहास से कितना प्रेम था .इत्मीनान रखना कि अनगिनत लोग तुमसे यानी अपने इतिहास से प्रेम करते हैं . वे इतिहासबोध से लैस हो रहे हैं . तुम्हारी मदद से,इतिहास की मदद से वे दुनिया बदलने पर आमादा हैं .हम पुराने हथियारों पर लगी जंग छुडा उन्हें और धारदार बनायेंगे और लगातार नए नए हथियार भी ढूढते जायेंगे .दोस्त दुश्मन की पहचान तेज करेंगे , हम समझने की कोशिश कर रहे हैं कि तुम आज होते तो क्या क्या करते ? हमें तुम्हारे बाद पैदा होने का फायदा भी तो मिल सकता है . एक भगत सिंह से काम नहीं चलने वाला , हमसब को 'तुम' भी बनना होगा 

यह सब लिख पाना भी आसान काम नहीं था , बरसों लग गए यह ख़त लिखने में , जो कुछ लिखा है उसे कर पाने में तो और भी ना जाने कितना वक्त लगे ....!

तुम्हारा , लाल बहादुर 
इतिहासबोध
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शनिवार, 23 मार्च 2013

शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह

तेईस मार्च भारतीय क्रांतिकारी मनीषा के प्रतीक शहीद भगत सिंह और उनके साथियों राजगुरु तथा सुखदेव का शहादत दिवस है तो उसके कोई आधी सदी बाद उसी दिन पंजाबी के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश भी शहीद हुए थे. इस बार हत्यारे देश के भीतर के थे. वही धार्मिक कट्टरपंथ, जिसकी शिनाख्त और तीव्रतम आलोचना भगत सिंह ने अपने समय में की थी छप्पन सालों बाद उन्हें आदर्श मानने वाले पाश का हत्यारा बना. आज जब देश के भीतर धार्मिक कट्टरपंथी अलग-अलग रूपों में सर उठा रहे हैं और पूरा देश उन्माद के गिरफ्त में है तो उन्हें याद करना इसके ख़िलाफ़ होना भी है. आज इस अवसर पर पाश की कुछ कवितायें...पहली कविता उन्होंने शहीद भगत सिंह के लिए लिखी है..उनकी शहादत के लिए. इससे अधिक गौरवशाली क्या होगा कि उसी दिन वह भी वैसी ही महान शहादत को हासिल कर सके...

चित्र यहाँ से साभार 

23 मार्च 
उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग 
किसी दृश्य की तरह बचे 
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाँकी की 
देश सारा बच रहा बाक़ी

उसके चले जाने के बाद 
उसकी शहादत के बाद 
अपने भीतर खुलती खिडकी में 
लोगों की आवाज़ें जम गयीं 

उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने 
अपने चेहरे से आँसू नहीं, नाक पोंछी 
गला साफ़ कर बोलने की 
बोलते ही जाने की मशक की 

उससे सम्बन्धित अपनी उस शहादत के बाद 
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया 

शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था

मैं पूछता हूँ 

मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क्या वक्त इसी का नाम है
कि घटनाए कुचलती चली जाए
मस्त हाथी की तरह 
एक पुरे मनुष्य की चेतना?
कि हर प्रश्न 
काम में लगे जिस्म की गलती ही हो?

क्यूं सुना दिया जाता है हर बार 
पुराना चुटकूला 
क्यूं कहा जाता है कि हम जिन्दा है
जरा सोचो -
कि हममे से कितनो का नाता है 
जींदगी जैसी किसी वस्तु के साथ!

रब की वो कैसी रहमत है 
जो कनक बोते फटे हुए हाथो-
और मंडी बिच के तख्तपोश पर फैली हुई मास की 
उस पिलपली ढेरी पर,
एक ही समय होती है?

आखिर क्यों 
बैलो की घंटियाँ
और पानी निकालते ईजंन के शोर अंदर 
घिरे हुए चेहरो पर जम गई है
एक चीखतीं ख़ामोशी?

कोन खा जाता है तल कर 
मशीन मे चारा डाल रहे 
कुतरे हुए अरमानो वाले डोलो की मछलिया?
क्यों गीड़गड़ाता है 
मेरे गाव का किसान 
एक मामूली से पुलिसऐ के आगे?
कियो किसी दरड़े जाते आदमी के चीकने को 
हर वार
कवीता कह दिया जाता है?
मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क़ैद करोगे अन्धकार में?



क्या-क्या नहीं है मेरे पास
शाम की रिमझिम
नूर में चमकती ज़िंदगी
लेकिन मैं हूं
घिरा हुआ अपनों से
क्या झपट लेगा कोई मुझ से
रात में क्या किसी अनजान में
अंधकार में क़ैद कर देंगे
मसल देंगे क्या
जीवन से जीवन
अपनों में से मुझ को क्या कर देंगे अलहदा
और अपनों में से ही मुझे बाहर छिटका देंगे
छिटकी इस पोटली में क़ैद है आपकी मौत का इंतज़ाम
अकूत हूँ सब कुछ हैं मेरे पास
जिसे देखकर तुम समझते हो कुछ नहीं उसमें
अनुवाद : प्रमोद कौंसवाल

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

भगत सिंह पर विनोद मिश्र



भगत सिंह के आलेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' पर यह भूमिका कामरेड विनोद मिश्र ने समकालीन प्रकाशन द्वारा इसी नाम से प्रकाशित पुस्तिका में की है, जो न केवल इस किताब, बल्कि भगत सिंह के वैचारिक विकास को समझने में भी मदद करती है. पूरी पुस्तिका हमने ई-बुक के रूप में तैयार कर दी है, और आप उसे यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

मैं नास्तिक क्यों हूँ - ई बुक 


नौजवानों के क्रांतिकारी मानस के प्रकाश स्तम्भ

मृत्यु के समय भगत सिंह सिर्फ २३ वर्ष के थे. इस छोटे से कार्यकाल में और इतनी कम उम्र में राष्ट्रीय गतिविधियां  संगठित करने के साथ-साथ उन्होंने तमाम विषयों पर इतना कुछ पढ़ा व लिखा कि सोचकर अचम्भा होता है.

क्रूर अँगरेज़ शासकों ने इस प्रखर मस्तिष्क को, जिसकी लोकप्रियता उस समय आसमान छू रही थी, ख़त्म कर देने में ही अपनी खैरियत समझी और इतिहास गवाह है कि गाँधी-इरविन समझौते में जनमत को ठुकराते हुए गाँधी ने भगत सिंह की फाँसी रद्द करवाने को पूर्व शर्त बनाने से इनकार कर दिया.

भगत सिंह की लोकप्रियता गाँधी के नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती बन कर उभर रही थी. अधिकृत कांग्रेस का इतिहास खुद बताता है. इससे भी महत्वपूर्ण बात थी भगत सिंह का क्रांतिकारी से मार्क्सवादी बनने की ओर संक्रमण. अंग्रेजों व् कांग्रेसी नेतृत्व के बीच भगत सिंह की फांसी को लेकर मौन सहमति का यही मूल आधार था.

क्रांतिकारी आतंकवादी धारा, जिस पर आरम्भ में तीव्र हिन्दू धार्मिक भावनाओं का असर था, क्रमशः मार्क्सवाद में परिवर्तित हो गई, भगत सिंह इस संक्रमण के प्रतीक पुरुष थे और उन्हीं के साथ यह धारा भी ख़त्म हो गई.


अराजकतावाद से मार्क्सवाद की ओर

भगत सिंह ने पश्चिम से आने वाले तमाम प्रगतिशील विचारों का गहन अध्ययन किया. भारतीय समाज की तमाम समस्याओं पर, चाहे वह अछूतों के प्रति ब्राह्मणवाद का नजरिया हो, सांप्रदायिकता का रुझान हो या भारतीय संघ का स्वरूप, भगत सिंह ने अपने विचार प्रकट किये थे. शुरूआती दिनों में उन पर अराजकतावादी दर्शन व् उसके सिरमौर बाकुनिन का गहरा असर नज़र आता है, मई १९२८ से ‘किरती’ नामक पंजाबी पत्रिका में भगत सिंह ने अराजकतावाद पर एक लेखमाला शुरू की जो अगस्त तक चलती रही. इसमें धर्म व ईश्वर, राज्य व निजी संपत्ति को दुनिया से पूरी तरह ख़त्म कर देने की अराजकतावादी घोषणाओं से भगत सिंह काफी प्रभावित नज़र आते हैं.

इस दौर में वे धर्म और भगवान को मनुष्य की अज्ञानता, भय व आत्मविश्वास के अभाव की उपज मानते हैं. और बाकुनिन की किताब ‘ईश्वर और राज्य’, जिसमें ईश्वर को जम कर लताड़ा गया है, की काफी प्रशंसा करते हैं. लेकिन ५-६ अक्टूबर १९३० के उनके लेख ‘मैं नास्तिक क्यूं हूँ’ में धर्म और ईश्वर के बारे में उनकी सोच पर मार्क्सवाद की मज़बूत झलक दिखाई देती है.

धर्म को जिन अर्थों में मार्क्स ने ‘जनता की अफीम’ कहा था, उसका सारतत्व हम यहाँ भगत सिंह में पाते हैं. भगत सिंह कहते हैं – “जब मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करने लगे तथा यथार्थवादी बन जाए तो उसे ईश्वरीय श्रद्धा को एक तरफ फेंक देना चाहिए और ऐसे सभी कष्टों, परेशानियों का पौरुष के साथ सामना करना चाहिए जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं”, और भौतिकवादी दर्शन पर इसी अविचल आस्था के साथ वे हँसते-हँसते फाँसी चढ़ जाते हैं.

राजसत्ता के विषय में अराजकतावादियों व साम्यवादियों के बीच मतभेद के सवाल से भगत सिंह अनभिग्य न थे. अराजकतावाद पर अपने लेख में वे इस बात का ज़िक्र करते हैं कि साम्यवाद का अंतिम आदर्श भी राजसत्ता का विलोप है. फिर भी उनकी सहानूभूति हर तरह की राजसत्ता को खारिज़ करने की अराजकतावादी विचारधारा की ओर है. अराजकतावादियों का विचार था कि राजसत्ता की धारणा ख़त्म होने पर ही मनुष्य की मुक्ति का कोई मतलब हो सकता है. बाद के दिनों में भगत सिंह सर्वहारा की प्रभुसत्ता के पक्ष में खड़े होते हैं. निचली अदालत में क्रान्ति के बारे में अपने विचार स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा “क्रान्ति से हमारा अभिप्राय अंततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसको इस प्रकार के घातक खतरों का सामना न करना पड़े और जिसमें सर्वहारा वर्ग की प्रभुसत्ता को मान्यता हो तथा एक विश्व संघ मानव जाति को पूंजीवाद के बंधन से और साम्राज्यवादी युद्धों में उत्पन्न होने वाली बर्बादी से बचा सके.”
निजी सम्पति के विलोप से की अराजकतावादी अवधारणा से मुक्त होकर वे यह भी समझने लगे थे कि सर्वहारा क्रांति और समाजवाद के रास्ते से ही निजी मिल्कियत का विलोप संभव होगा.

असेंबली पर बम फेंकने की प्रेरणा भगत सिंह को वस्तुतः अराजकतावादियों से ही मिली, विश्व भर के अराजकतावादियों का ज़िक्र करते हुए वे लिखते हैं, “इधर यूरोप में भी अंधेर चल रहा था, पुलिस और सरकार के साथ इन अराजकतावादियों का झगड़ा बढ़ गया, अंत में एक दिन कैलेंट नाम के नवयुवक ने असेंबली में बम फेंक दिया – उसने बड़ी बुलंद आवाज़ में स्पष्टीकरण देते हुए कहा, “बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रुरत होती है”. एक वर्ष बाद, ८ अप्रैल १९२९ को भगत सिंह ने इसी घटना की भारत में पुनरावृति की. लेकिन जहाँ कैलेंट के लिए वह सिर्फ प्रतिशोधात्मक कार्यवाही थी, वहीँ भगत सिंह के यह राजनीतिक प्रतिवाद था.         

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

अलविदा ‘पाश’ ...तुम सदा हमारे दिलों में हो और रहोगे


आज शहीद ए आज़म भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव के साथ पाश के भी शहादत का दिन है 


  • राम जी तिवारी 


 आज अवतार सिंह संधू उर्फ ‘पाश’ की 24 वीं पुण्य तिथि है | 23 मार्च 1988 को आज ही के दिन इस क्रांतिकारी जन-कवि की आतंकवादियों ने उनके अपने ही गांव में गोली मारकर हत्या कर दी थी | पंजाब के जालंधर जिले में सन 1950 में जन्में ‘पाश’ का जीवन कई मायनों में अनोखा रहा | पहला तो यही कि “साहित्य के जरिये भी आतताईयों के चेहरे पर वार किया जा सकता है और वह वार इतना तिलमिला देने वाला हो सकता है कि वे आपकी जान भी ले लें” | हालाकि अपनी लेखनी के लिए जीवन को कुर्बान करने वाले साहित्यकारों में ‘पाश’ अकेले नहीं हैं , वरन उनमे से एक हैं जो कुछ लोगों के इन शातिराना सवालों का , कि ‘लिखने मात्र से क्या होता है?’ , माकूल उत्तर छोड़ जाते हैं, कि व्यवस्थाओं की गोद में बैठकर तमगे लूटने वालों से इतर भी देखने पढ़ने की कोशिश होनी चाहिए , जहाँ कवि कहता है कि ‘ तुम मुझे एक चाकू दो / मैं अपनी रगें काटकर दिखा सकता हूँ / कि कविता कहाँ है ” |(सर्वेश्वर)|  दूसरा यह कि “जीवन को मापने का तरीका हमेशा से गुड़वत्ता ही हुआ करता है , उसकी मात्रात्मकता नहीं” | ‘पाश’ के 37 वर्षीय जीवन की लम्बाई और सौ – सवा सौ कविताओं की संख्या उन तमाम लोगों के जीवन और पुस्तकों पर इक्कीस बैठती है , जिन्हें आठ-नौ दशकों का भरा-पूरा जीवन नसीब हुआ और जिनकी किताबों की सूचियाँ इस व्यवस्था की विडंबनाओं जितनी ही लंबी हैं |

 एक तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण अनोखापन यह देखा जा सकता है कि न तो ‘पाश’ को न ही उनके चाहने वालों को,  तब या अब,  किसी भी कटघरे में खड़े होकर जबाब देना पड़ा है, या पड़ता है कि इन कविताओं का आशय वह नहीं वरन यह था | न तो उनके पास कोई ‘महामौन’ की ‘गुफा-कन्दरा’ है और न ही शब्दों की ओट में खेली गयी बाजीगरी , वरन वे तो सीधे-सीधे स्वीकार करते हैं कि “ मैं शायरी में क्या समझा जाता हूँ / जैसे किसी उत्तेजित मुजरे में / कोई आवारा कुत्ता आ घुसे |” , ठीक उसी तरह जैसे की आलोक धन्वा स्वीकार करते है कि “मेरा कविता में इस तरह से आना / उन्हें एक अश्लील उत्पाद लगा ” | तो एक तरफ ऐसी स्वीकारोक्तियां साहित्य के प्रचलित  प्रतिमानों के खोखलेपन को दर्शाती हैं और दूसरी तरफ इन ‘इन आवारा कुत्तों’ और  ‘अश्लील उत्पादों’ के साथ आने वालो को मिलने वाली पाठकीय स्वीकारोक्ति नए प्रतिमानों को रचती नजर आती हैं |

                            
हम जानते हैं कि “पाश” की किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी लेकिन सत्ता और उनके खिलाफ लड़ रहे आतंकवादी - दोनों पक्षों – को उनकी क्रांतिकारी कवितायेँ इतनी अखरने लगीं कि उन्होंने “पंजाब के लोर्का” माने जाने वाले इस जनवादी कवि की असमय बलि ले ली | यह कवितायें हीं थीं , जिन्होंने एक तरफ तो उन्हें अवाम में अमर कर दिया, वहीँ दूसरी तरफ 37 वर्ष की अल्पायु में उनकी हत्या का कारण भी बनीं | कहा तो यह भी जाता है कि यह महज एक संयोग था कि “धर्म दीक्षा के लिए विनयपत्र” वालों की ट्रिगर पर तैनात तर्जनी पहले हरकत में आ गयी ,और “बेदखली के लिए विनयपत्र” वालों का माथा कलंक के लगने वाले टीके से साफ़ बच गया |
                
 “पाश” की काव्य-यात्रा 15 वर्ष की उम्र से ही आरम्भ हो गयी थी और 20 वर्ष के होते-होते जब उनका पहला संकलन ‘लौह कथा’ छपा था , तब वे पंजाबी के एक प्रतिष्ठित कवि बन गए थे | पाश के कुल चार कविता संग्रह मूल पंजाबी में प्रकाशित है , और ये हैं “लौह कथा”(1970) , “उडडदे बाँजा मगर”(1974), “साडे समियाँ विच”(1978) और “लड़ान्गे साथी”(1988) | और हिंदी में अनूदित दो संग्रह “बीच का रास्ता नहीं होता” और “समय ओ भाई समय” भी प्रकाशित हुए हैं |  इस प्रतिभाशाली युवक ने उसी अल्पवयस्क उम्र में लिखा था ...
               
              “ भारत –
               मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द 
               जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए 
               बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते है 
               इस शब्द के अर्थ 
               खेतों के उन बेटों में हैं 
               जो आज भी बृक्षों की परछाइयों से 
               वक्त मापते हैं 
               और वह भूख लगने पर
               अपने अंग भी चबा सकते हैं 
               ....................................
               .................................
               कि भारत के अर्थ 
               किसी दुष्यंत से सम्बंधित नहीं 
               वरन खेतों में दायर हैं 
               जहाँ अन्न उगता है 
               जहाँ सेंध लगती है |”
                            
पाश की कविता हमारी क्रांतिकारी काव्य-परंपरा की अत्यंत प्रभावी और सार्थक अभिव्यक्ति है | मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर आधारित व्यवस्था के नाश और एक वर्ग विहीन समाज की स्थापना के लिए जारी जन-संघर्षों में इसकी पक्षधरता स्पष्ट है | नामवर सिंह ठीक ही कहते है कि “ पाश की कविता की यह ताकत है जो अनुवाद में भी इतना असर रखती है | मूल पंजाबी में वह कैसी होगी इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है |” बिलकुल ...जैसे कि यह ---
               
               “हाथ यदि हों तो 
                जोड़ने के लिए ही नहीं होते 
                न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं 
               यह गर्दनें मरोडने के लिए भी होते हैं 
               हाथ यदि हों तो 
               हीर के हाथ से छुरी पकड़ने के लिए ही नहीं होते 
               सैदे की बारात रोकने के लिए भी होते है 
               कैदो की कमर तोड़ने के लिए भी होते हैं
               हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते 
               शोषक के हाथो को तोडने के लिए भी होते हैं |”

(हीर- प्रसिद्द लोक गायिका ),  (सैदे-हीर का अनचाहा पति)  , (कैदो-हीर के प्यार का दुश्मन चाचा ) 

  ‘पाश’ को समझने के लिए किसी खास कविता का चयन करना आवश्यक नहीं है , आप कही से भी उठाकर उन्हें उद्धरित कर सकते है | आपको वही ‘पाश’ मिलेंगे , जिसे आप पढते और समझते आये थे | ध्यान रहे कि यह ‘पाश’ की एकरसता या दोहराव नहीं है , वरन उनकी प्रतिबद्धता और जन-पक्षधरता है , जो आईने की तरह साफ़ और स्पष्ट है और यही स्पष्टता उनकी कविता की विशेषता और बड़ी ताकत है | उनकी कविताओं के संग्रहकर्ता और अनुवादक चमन लाल ठीक ही कहते है कि “ ‘पाश’ हमारे समाज के जिस वस्तुगत यथार्थ को विश्लेषित करना चाहते हैं , उसके लिए वे अपनी भाषा , मुहावरे और बिम्बों-प्रतीकों का चुनाव ठेठ ग्रामीण जीवन से करते हैं | वे तमाम लोग जो अपनी तरह से एक बेहतर मानवीय समाज की आकांशा रखते हैं , बार-बार इन कविताओं में आते हैं |” जिस ट्रेडमार्क कविता ‘सबसे खतरनाक’ के लिए उन्हें याद किया जाता है , ध्यान रहे कि वह उनकी एक अधूरी कविता है | अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यदि यह पुरी हुई होती तो कैसी होती , बल्कि सच तो यह है कि हम और आप यह अंदाजा भी नहीं लगा सकते | न ही हम यह बता सकते हैं कि नाजिम हिकमत , पाब्लो नेरुदा और मुक्तिबोध के कैम्प का यह आदमी किन अनलिखी कविताओं के साथ इस दुनिया से कूच कर गया | वह हमें और किन खतरनाक चीजों से आगाह करना चाहते थे  , मसलन .... 

                मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
                पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती 
                गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती 
                ....................................................................
                ....सबसे खतरनाक होता है 
                मुर्दा शांति से भर जाना 
                न होना तड़प का सब सहन कर जाना 
                घर से निकलकर काम पर 
                और काम से लौटकर घर जाना 
                सबसे खतरनाक होता है 
                हमारे सपनों का मर जाना |

रवि कुमार स्वर्णकार का कविता पोस्टर 
चमन लाल को यहाँ पुनः उद्दृत करना चाहूँगा कि “लोक जीवन से उर्जा ग्रहण करती हुई ‘पाश’ की कविताये प्रतिगामी आस्थाओं और विश्वासों की स्पष्टतः शिनाख्त करती हैं |वे हमें हर उस मोड़ पर सचेत करती हैं , जहाँ प्रतिगामिता के खतरे मौजूद हों और ऐसा करते हुए ये कविताएं प्रत्येक उस आदमी से संवाद बनाये रखती हैं , जो देर-सबेर जनता के पक्ष में खड़ा होगा | यही खूबी ‘पाश’ को एक विलक्षण कवि का दर्जा प्रदान करती है |  समाज की प्रत्येक जकड़नों , प्रतिगामिताओं और यथास्थितियों को खुली चुनौती देते हुए वे स्वतंत्रता , प्रगतिशीलता और वास्तविक जनतंत्र के विकल्प का मार्ग सुझाते हैं | धर्म , व्यवस्था , राजनीति और समाज को लेकर उनकी स्पष्ट राय है | कहीं कोई दुराव नहीं , कहीं कोई छिपाव नहीं | बिलकुल स्पष्ट ....तभी तो “सब कुछ ईश्वर की मर्जी से होता है” , जैसे जुमले को ख़ारिज करते हुए वे सवाल करते हैं कि 

               “रब की यह कैसी रहमत है 
               जो गेंहूँ गोड़ते फटे हाथों 
               और मंडी के तख्तपोश पर बैठे                            
               मांस के उस पिलपिले ढेर पर
                                                                               एक साथ ही होती है |”

‘भारत’, ‘समय कोई कुत्ता नहीं’ , ‘तूफ़ान कभी मात नहीं खाते’ , ‘कांटे का जख्म’  ‘अंत में’ , ‘उड़ते हुए बाजो के पीछे’ , ‘हम लड़ेंगे साथी’ , ‘हमारे समयों में’ , ‘मैं अब विदा लेता हूँ’ , ‘कामरेड से बातचीत’ (पुरी श्रृंखला) , ‘धर्म दीक्षा के लिए विनयपत्र’, ‘बेदखली के लिए विनयपत्र’ और ‘सबसे खतरनाक’ जैसी अनेक कविताओं को पढते हुए पाठक को यह समझाने की जरुरत नहीं होती कि ‘पाश’ की कविताएं किस पक्ष के साथ और किसके खिलाफ खड़ी हैं | जीवन में सबको साधने वाले और कविताओं में मुलायमियत टटोलने वाले लोगों के लिए ऐसी पक्षधरता और स्पष्टता एक ऐसे आईने का कार्य करती है , जिसमे ऐसे लोगों को उनका अपना नंगापन साफ़ साफ़ दिखाई दे सके | ऐसे आदमी ‘पाश’ को यदि सत्ता परेशान करती है , अपनी लेखनी के लिए जेल की सजा भुगतनी पड़ती है , उसके पीछे आतंकवादी पड़ जाते हैं , तो कैसा आश्चर्य ..? आश्चर्य तो यह है कि जिस अंत को “पाश’ ने दस साल पहले भांप लिया था , वह दस साल तक मौन कैसे रहा..?  एक सच्चे क्रांतिकारी की तरह , जो अपना जीवन दूसरों के लिए छोड़ जाता है “पाश” ने गहन संवेदना के साथ लिखा था ---- 

               मैं अब विदा लेता हूँ 
               मेरी दोस्त 
               .......................
               प्यार करना और लड़ सकना 
               जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त , यही होता है 
               धूप की तरह धरती पर खिल जाना 
               और फिर आलिंगन में सिमट जाना 
               बारूद की तरह भड़क उठना 
               और चारों दिशाओं में गूँज जाना 
               जीने का यही सलीका होता है मेरी दोस्त 
               .....................................................
और फिर प्यार में बिताए खूबसूरत क्षणों को जीते हुए कविता के अंत में इस सबको भूलकर सिर्फ यह याद दिलाते हैं , 
               
               तुम यह सभी कुछ भूल जाना मेरी दोस्त ,
               सिवाय इसके 
               कि मुझे जीने की बहुत लोचा (लालसा) थी 
               कि मैं गले तक जिंदगी में डूबना चाहता था 
               मेरे भी हिस्से का जी लेना , मेरी दोस्त 
               मेरे हिस्से का भी जी लेना ....|”
                               
‘पाश’  की इस लंबी कविता को पढते हुए आँखे नम हो जाती हैं और इस दुनिया को जी भरकर कोसने की ईच्छा होती है , जिसमें “पाश” जैसों के जीने के लिए कोई जगह नहीं है |इसे यहाँ फिर दोहराना उचित होगा कि पंजाबी से हिंदी में अनूदित होने के बाद भी उनमे इतनी आग बची है , कि आज भी जन-पक्षधर लोगों को उनसे उर्जा मिलती रहे | “कामरेड से बातचीत” श्रृंखला की कविताओं में “पाश” एक विलक्षण साम्यवादी विचारक के रूप में हमारे सामने आते है और यह अनायास नहीं है कि इस श्रृंखला को उनके रचनात्मक जीवन यात्रा का उत्कर्ष भी माना जाता  हैं |

 23 मार्च 1988 को “पाश” भी अपने जीवन के प्रिय आदर्श , शहीद-ए-आजम के रास्ते पर चले गए | याद हो कि 57 वर्ष पूर्व इसी दिन भगत सिंह भी अपने साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ देश के स्वतंत्रता-आंदोलन की बलिवेदी पर चढ़े थे | यह अदभुत संगम इस तारीख को न सिर्फ अमर बनाता है , वरन चमन लाल के शब्दों में , “हमें यह भी सिखाता है कि राजनीतिक कार्यकर्ता और संस्कृतिकर्मी को मानव-मूल्यों की रक्षा के संघर्ष में अलगाया नहीं जा सकता |”  ‘पाश’ पर लिखते समय लेख के अंत का ख्याल अंदर तक कचोटने वाला होता है | उँगलियाँ की-बोर्ड पर आंसुओं को दर्ज तो करना चाहती हैं , कि तभी “पाश” का यह सन्देश आँखों में चमक उठता है ..........
                   “हम लड़ेंगे साथी जब तक 
                   दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है 
                   जब बन्दूक न हुई , तब तलवार होगी 
                   जब तलवार न हुई , लड़ने की लगन होगी 
                   लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरुरत होगी 
                   और हम लड़ेंगे साथी.......
                   हम लड़ेंगे  
                   कि लड़ने के बगैर कुछ भी नहीं मिलता 
                   हम लड़ेंगे 
                   कि अभी तक लड़े क्यों नहीं 
                   हम लड़ेंगे 
                   अपनी सजा कबूलने के लिए 
                   लड़ते हुए मर जाने वालों 
                   की याद जिन्दा रखने के लिए 
                   हम लड़ेंगे साथी ........हम लड़ेंगे साथी.........

          
अलविदा ‘पाश’ ...तुम सदा हमारे दिलों में हो और रहोगे .......
                                                   
                                                                                                       हम सबका क्रांतिकारी लाल सलाम .....


                                               

             
             
                

         

                                 

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

भगत सिंह पर रामास्वामी पेरियार

भगत सिंह की फाँसी के बाद रामास्वामी पेरियार ने अपने अखबार 'कुडई आरसु' में जो सम्पादकीय लिखा था उसका हिस्सा...



जिस दिन गाँधी जी यह कहा कि भगवान उनका मार्गदर्शन करता है, संसार को चलाने के लिए वर्णाश्रम एक श्रेष्ठ व्यवस्था है और जो कुछ होता है भगवान की इच्छा से होता है, उसी दिन हम इस निर्णय पर पहुँच गए थे कि गांधीवाद और ब्राह्मणवाद में कोई फर्क नहीं है. हमने यह भी निष्कर्ष निकाला था कि देश का भला तब तक हो सकता जब तक कांग्रेस पार्टी जो इस दर्शन और सिद्धांत पर चलती है, समाप्त न हो जाएँ. लेकिन अब यह तथ्य कम से कम कुछ लोग मानने लगे हैं, उनके पास ज्ञान और साहस आ गया है कि वे गांधीवाद के पतन के लिए प्रयास कर सकें. यह हमारे उद्देश्य की महान सफलता है. यदि भगत सिंह को फांसी न दी गयी होती तो इतने लोकप्रिय ढंग इस विजय के आधार न होते. बल्कि हम तो यह बात कहने का जोखिम उठाते हैं कि यदि भगत सिंह को फांसी न हुई होती तो गांधीवाद को और ज़मीन मिली होती.


भगत सिंह बीमार पड़कर नहीं मरे, जैसा आम तौर पर लोगों के साथ होता है. उन्होंने न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व को वास्तविक समानता और शान्ति का मार्ग दिखाने के महान उद्देश्य के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया. भगत सिंह एक ऎसी ऊंचाई पर पहुँच गए हैं जहाँ सामान्यतया कोई नहीं पहुँच पाया. हमें उनकी शहादत पर हृदय से गर्व है. साथ ही साथ हम सरकार में बैठे लोगों से यह प्रार्थना करते हैं कि वे हर सूबे में चार भगतसिंह जैसे सच्चे आदमी ढूंढें और फाँसी पर चढ़ा दें.


साभार - जनसत्ता, २५ मार्च, २००७ 

रविवार, 26 सितंबर 2010

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले…


27 सितंबर को शहीदे आज़म भगत सिंह का जन्मदिन है…भारतीय मुक्ति आंदोलन के सबसे आधुनिक और क्रांतिकारी मानस और भारतीय युवा की क्रांतिकारी चेतना के प्रतीक भगत सिंह को जनपक्ष का लाल सलाम…यहां प्रस्तुत है उनके आलेख का एक हिस्सा जो इंक़लाब की ज़रूरत को रेखांकित करता है


जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं । इस जड़ता और नि्ष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत होती है , अन्यथा पतन और बरबादी का वातावरण छा जाता है । लोगों को गुमराह करनेवाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं । इससे इंसान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है । इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताजा की जाय , ताकि इंसानियत की रूह में हरकत पैदा हो ।
… इंक़लाब तौरे ज़िंदगी है।

भगत सिंह पर एक कविता यहां

मंगलवार, 23 मार्च 2010

शहीदों की चिताओं पर…

शहीद भगत सिंह
(27 सितंबर 1907- 23 मार्च 1931)

अवतार सिंह पाश
(9 सितंबर 1950 से 23 मार्च 1988)




भगत सिंह ने कहा…

बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन हो सकते हैं…। विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता। यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का परिणाम क्रांति हो। क्रांति शब्द का अर्थ प्रगति के लिये परिवर्तन की भावना एव आकांक्षा है। यह ज़रूरी है कि पुरानी व्यवस्था हमेशा न रहे और वह एक नई व्यवस्था के लिये जगह ख़ाली करती रहे, जिससे कि एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके।
'इंक़लाब ज़िन्दाबाद क्या है' से
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धर्म का रास्ता अकर्मण्यता का रास्ता है, सब कुछ भगवान के सहारे छोड़कर भगवान के सहारे हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाने का रास्ता है। वह कभी मेरा रास्ता नहीं बन सकता। जो लोग इस जगत को मिथ्या समझते हैं, वे कभी दुनिया की भलाई और इस देश की आज़ादी के लिये ईमानदारी से नहीं लड़ सकते। धर्म का रास्ता श्रमजीवी जनता के शोषण का हिंसक रास्ता है
1928 में अवैद्यनाथ घोष से बहस में
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अवतार सिंह पाश की कविता


घास

मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा
बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर
बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर
मुझे क्‍या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊंगा
बंगे को ढेर कर दो
संगरूर मिटा डालो
धूल में मिला दो लुधियाना ज़िला
मेरी हरियाली अपना काम करेगी...
दो साल... दस साल बाद
सवारियाँ फिर किसी कंडक्‍टर से पूछेंगी
यह कौन-सी जगह है
मुझे बरनाला उतार देना
जहाँ हरे घास का जंगल है
मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूंगा
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा
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शहीदी दिवस पर जनपक्ष परिवार की ओर से राजगुरु,सुखदेव, भगत सिंह और पाश को सलाम तथा आप सबका क्रांतिकारी अभिनंदन!