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शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

सोनी सोरी का कसूर क्या है?


सोनी सोरी प्रकरण – लोकतंत्र का बदनुमा चेहरा

                चित्र यहाँ से 
सोनी सोरी की कहानी अब कोई नई कहानी नहीं रही. न यह उस दिन शुरू हुई थी जब उन्हें पुलिस के दबाव में दंतेवाड़ा छोड़कर भागना पड़ा था, न उनके किसी अंजाम पर खत्म हो जायेगी. लोकतंत्र के आवरण तले चलने वाली दमन और उत्पीडन की यह कहानी अलग-अलग रूप में लगातार दुहराई गयी है और आज भी यह बदस्तूर जारी है. महानगरों के आरामदेह कमरों में बैठकर हम विकास को आंकड़ो की भाषा से पकडने की कोशिशें करते हुए नए-नए माल्स और उपभोक्ता वस्तुओं की चमक से चुंधियाई आँखों से सत्ताओं के बदलने और आभासी आन्दोलनों के घटाटोप के इतने आदी होते जा रहे हैं कि देश के एक बड़े हिस्से के लगातार यातना-गृह में तबदील होते जाने को देख ही नहीं पाते. विदर्भ और बुंदेलखंड सहित देश के तमाम हिस्सों में लगातार खुदकुशी करते किसान, फैक्ट्रियों में बिना किसी सामाजिक या आर्थिक सुरक्षा के सोलह-सोलह घंटे खटते मजदूर, निजी कंपनियों के जुए तले पिसते तथाकथित प्रोफेशनल्स, उत्तर-पूर्व में अमानवीय कानूनों का बोझ ढोते लोग और छत्तीसगढ़ के नक्सल-प्रभावित इलाकों में दोहरी-तिहरी मार झेलते आदिवासी हमारी इस समकालीन विकास की बहस से बाहर की चीज़ बनते चले जा रहे हैं. न टीवी चैनल्स के लिए इनके पास कोई ‘एक्सक्लूसिव बाईट’ है न ही अखबारों के तीसरे पेज़ के लिए खबरें या पहले पेज़ के लिए विज्ञापन. वरना यूँ न होता कि इस देश में किसी जगह एक महिला के साथ कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद वह अमानवीय उत्पीडन होता जो सोनी सोरी के साथ हुआ और इसके ज़िम्मेदार पुलिस वाले को सज़ा की जगह महामहिम पुरस्कार न देतीं, वरना कोई चुनी हुई सरकार किसी गाँधीवादी के आश्रम को यूँ ज़मीदोज न कर देती, वरना इतना सब हो जाने के बाद भी इस देश में इतनी चुप्पी न होती.   

सोनी सोरी कोई विशिष्ट महिला नहीं. दंतेवाड़ा के एक खाते-पीते आदिवासी परिवार में जन्मी एक मामूली औरत है जिसने शिक्षा हासिल की और इसके ज़रिये अपना और अपने लोगों का जीवन बेहतर बनाने का सपना देखा. उसका दोष शायद बस इतना है कि जिस दौर में वह यह सब करना चाहती थी, वह एक ऐसा दौर था जब दो विरोधी शक्तियों के बीच विभाजन रेखा कुछ इस कदर खिंची थी कि चयन के लिए इन दोनों के अलावा कोई और विकल्प नहीं था और वह इन दोनों से अलग कुछ करने के लिए मुतमइन थी. नतीजा यह कि उसने दोनों की दुश्मनी मोल ली. इस पूरी प्रक्रिया को समझने से पहले आइये उस पूरे घटनाक्रम पर एक नज़र डाल लेते हैं.

सोनी सोरी का नाम सबसे पहले तब मीडिया में आया जब पिछले साल ९ सितम्बर को पालनार बाज़ार में उसके भतीजे लिंगा को कथित रूप से एस्सार ग्रुप से जुड़े लाला से पैसे लेते हुए गिरफ्तार किया गया. इस केस में सोनी को भगोड़ा घोषित किया गया. पुलिस द्वारा कहा गया कि एस्सार ग्रुप ने अपनी पाइपलाइन बिछाने में व्यवधान न उत्पन्न करने के लिए नक्सलियों को पैसे दिए और लिंगा एक नक्सली प्रतिनिधि के रूप में उनसे पैसे ले रहा था तथा सोनी उसकी मददगार थी. इसके बाद से सोनी वहाँ से जान बचाकर निकल आई और किसी तरह बचते-बचाते दिल्ली पहुँची. दिल्ली पहुंचकर उन्होंने तहलका के दफ्तर में अपनी पूरी आपबीती सुनाई जिससे पुलिस का सुनाया पूरा किस्सा ही सिर के बल खड़ा हो गया.

सोनी के मुताबिक़ इस घटना के एक दिन पहले किरंदुल पुलिस स्टेशन में पदस्थ मांकड़ नाम का का एक कांस्टेबल उसके घर आया और उसने उससे लिंगा को पुलिस का सहयोगी बनने के लिए मनाने का आग्रह किया. उसका प्रस्ताव था कि लिंगा माओवादी बनकर जाए और लाला से लिए पैसे पुलिस को सौंप दे. मांकड़ ने उसे ऐसा करने पर तमाम फर्जी केसों से मुक्त कराने का आश्वासन भी दिलाया. सोनी के मुताबिक़ उसने ऐसा करने से मना कर दिया. इस पर मांकड़ ने उससे फोन लेकर खुद ही लाला को फोन लगाकर स्वयं को स्थानीय माओवादी बताते हुए पैसों की मांग की. उसके अगले ही दिन एक कार में सादे कपड़ों में कुछ लोग आये और उसके पिता के घर से लिंगा को उठा ले गए. सोनी ने तमाम लोगों से जानकारी हासिल करनी चाही लेकिन उसे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. किरंदुल पुलिस स्टेशन के प्रभारी ने भी इस बारे में अनभिज्ञता प्रकट कर दी (जबकि उसी दिन उन्होंने लाला और लिंगा के खिलाफ एफ आई आर दर्ज की थी). अगले दिन अखबारों में उसने लिंगा की एस्सार मामले में गिरफ्तारी हो गयी है और उन्हें फरार घोषित कर दिया गया है. वह समझ गयीं कि उन्हें किसी भी पल गिरफ्तार किया जा सकता है और वह वहाँ से दिल्ली आ गयीं. यह सफर इस पंक्ति के लिखे जाने जितना आसान नहीं था.

और सोनी ने अपनी सच्चाई साबित भी की. उसने दिल्ली से ही तहलका कार्यालय से मांकड़ को फोन लगाया और उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यूँ किया? क्या यह सच नहीं कि लिंगा को फंसाया गया है? आश्चर्य यह कि मांकड़ ने फोन पर इन सारी बातों को स्वीकार कर लिया जिसके टेप तहलका के पास हैं. उसने साफ़-साफ़ बताया कि पैसे लाला के घर से बरामद किये गए थे. उसने यह भी कहा कि पुलिस के पास सबूतों के नाम पर कुछ नहीं है और वह जल्दी ही छूट जायेगी, साथ ही उन्हें दिल्ली में ही रहने की सलाह दी.

यहाँ रुककर एक मिनट यह सोचना होगा कि किसी बम्बईया फिल्म के दृश्य सा यह घटनाक्रम आज़ाद हिन्दुस्तान के एक हिस्से में संविधान की शपथ खाने वाली विधायिका और कार्यपालिका के देख-रेख में हुआ. इस साजिश को उस थाने में अंजाम दिया गया जहाँ अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी की तस्वीर लगी रहती है. यह उस पुलिस का चेहरा है जिससे सहयोग करने का फ़र्ज़ हर जिम्मेदार नागरिक को घुट्टी की तरह पिलाया जाता है. और ज़ाहिर तौर पर न यह पहली बार हुआ न अंतिम बार. लिंगा के साथ तो इसी थाने में वह हुआ था जिसकी एक सभ्य समाज में कल्पना तक नहीं की जा सकती. उसे चालीस दिनों तक बिना किसी आरोप या सज़ा के थाने के शौचालय में गिरफ्तार रखा गया क्योंकि उसने सलवा जुडूम का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था. बाद में सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार और सोनी तथा दूसरे घरवालों के प्रयास और कोर्ट के हस्तक्षेप से ही उसे आज़ाद कराया जा सका. उसे एक कांग्रेसी ठेकेदार के घर हुए नक्सली हमले का आरोपी तब बनाया गया जब वह दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था. बाद में जब शोर मचा तो तत्कालीन पुलिस प्रमुख और खगेन्द्र ठाकुर सहित हिन्दी के कुछ “जनपक्षधर” साहित्यकारों के प्रिय विश्वरंजन जी ने ‘बयान की चूक’ स्वीकारते हुए उसका नाम हटाया. इस हमले में सोनी और उसके पति को भी आरोपी बनाया गया. सोनी का पति तो इसी मामले में डेढ़ साल से हिरासत में है. इस मामले में जो “सबूत” दिए गए हैं उन्हें पढकर छत्तीसगढ़ पुलिस की न्यायप्रियता का कोई भी कायल हो सकता है. (विस्तार के लिए देखें तहलका
   

खैर, दिल्ली में छुपती-छुपाती सोनी को अंततः छत्तीसगढ़ पुलिस ने दिल्ली पुलिस की सहायता से गिरफ्तार किया और उन्हें साकेत कोर्ट में पेश किया गया. सोनी ने वहाँ खुद को छत्तीसगढ़ पुलिस को न सौंपने की अपील की. दिल्ली हाईकोर्ट में भी एक याचिका लगाकर उनके खिलाफ दिल्ली में ही केस चलाने की मांग की गयी और कहा गया कि अब तक जिस तरह यह साफ़ है कि उन्हें फर्जी मुकदमों में फंसाया गया है, इस बात की पूरी संभावना है कि छत्तीसगढ़ में उन्हें न्याय न मिले. लेकिन कोर्ट ने उन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया. दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को बस एक निर्देश दे दिया कि पुलिस एक सप्ताह बाद उसकी स्थिती के बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करे. लेकिन संविधान से बंधी, न्यायालय का सम्मान करने वाली छत्तीसगढ़ पुलिस ने सोनी के साथ जो किया उसे लिखते भी हाथ कांपते हैं. उसी दिन रात को उन्हें बिजली के झटके दिए गए, नग्न कर के उत्पीडन किया गया और दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए उनके गुप्तांगों में पत्थर के टुकड़े डाल दिए. उसी हालत में उन्हें कोर्ट में पेश किया  गया, जेल भेज दिया गया. हालत खराब होने पर कोलकाता में इलाज के लिए ले जाया गया. वहाँ मेडिकल जाँच में इस आरोप की पुष्टि हुई. उनकी योनि और गुदा से पत्थरों के टुकड़े मिले. उस अमानवीय अत्याचार के सफे रात के अंधेरों की तरह अखबारों में बिखर गए. उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम लिखी उनकी चिट्ठियों में  यह सवाल एक फांस की तरह चुभ रहा है कि इस न्याय व्यवस्था, इस संविधान आधारित लोकतंत्र में एक आदिवासी महिला के साथ हो रहा व्यवहार इस देश की जनता और इसके जागरूक तबके के लिए एक मुसलसल बेचैनी का सबब क्यूँ नहीं है? क्यूँ इसके खिलाफ कोई बड़ी आवाज़ नहीं उठती? क्यूँ हर सूं एक शमशानी चुप्पी है? वह कौन सा मंजर है जिसमें नक्सलियों द्वारा स्कूल में पन्द्रह अगस्त को लाल झंडा फहराए जाने का विरोध कर तिरंगा फहराने वाली वह और लिंगा इस हाल में है, उसका पति डेढ़ साल से जेल में है, उसके पिता को इन्फार्मर होने के शक में नक्सलियों द्वारा पैरों में गोली की मार झेलकर अस्पताल में लाचार पड़ा रहना पड़ रहा है, घर-बार लूट लिया गया है, तीन बच्चे यहाँ-वहाँ पड़े हैं! आखिर दोष क्या है इनका?

शायद यही कि इन्होने नक्सलियों या पुलिस के हाथों का खिलौना बनने से इंकार किया. शायद यही कि इन्होने अपनी पढ़ाई-लिखाई को अपने तथा अपने लोगों की बेहतरी में इस्तेमाल करने का गुनाह किया. शायद यह कि वे आदिवासी होते हुए इस या उस पक्ष के मूक समर्थक बने. शायद यह कि उन्होंने अंधेरों के बीच रौशनी की किरणे खोजने का अजीम गुनाह किया. एस्सार के पूरे किस्से ने वह हकीक़त सामने ला दी है कि कैसे पुलिस और नक्सलियों के बीच जो खेल चल रहा है उसमें पैसे की भूमिका बढती चली गयी है और आदिवासियों को दोनों ही पक्ष शेर के शिकार में बकरे की तरह उपयोग कर रहे हैं. सोनी और लिंगा का दोष शायद यही था कि उन्होंने बकरे की भूमिका निभाने से इंकार कर दिया.

खैर मामला न्यायालय में है. कौन जाने की कभी न्याय मिल ही जाए. लेकिन तब तक दुनिया-जहान में अन्याय की मुखालफत का दावा करने वाले हम लोग क्या करेंगे? सिर्फ इंतज़ार?        


  

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

अरुंधती ने भेजा जवाब, नहीं जाएँगी हंस के सालाना जलसे में

(यह महत्वपूर्ण पोस्ट जनज्वार  से आभार)


पिछला किस्सा
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प्रिय भाइयों, 

हंस ने जो अगले सालाना आयोजन कि रूप रेखा प्रचारित की थी उसमें सब को यह आभास दिया था कि इस बार वे पुलिस अधिकारी विश्व रंजन और अरुंधती राय को एक ही मंच पर लायेंगे.लोगों में इस पर बड़ा आक्रोश था. मैंने दो-तीन दिन पहले हंस कार्यालय में राजेंद्र जी से पूछा तो उन्हों भी तस्दीक की. लेकिन जब मैं ने अरुंधती से पूछा तो उन्हों ने साफ़ कहा कि वे ऐसे कार्यक्रम में नहीं जा रहीं हैं. उनका जवाब संलग्न है

नीलाभ 

अरुंधती का जवाब- 

Dear Neelabh 

Thanks for alerting me about a meeting I had no idea about! Rajendra Yadav did call a few weeks ago and ask whether I could come to a Hans event in July. I was travelling at the time and said I'd speak to him later. And now you tell me that without my ever having agreed, it's being billed as a debate between me and the notorious policeman Mr Vishwaranjan! I had no idea about all this. I have no intention of being there. Not after my recent experience with PTI and the rubbish that is being put out by the Chhattisgarh police and headlined in the Indian Express. You say a bunch of youngsters are putting together a petition asking me not to go...please tell them that I don't need a petition to persuade me! I never agreed to go in the first place. And now it's beginning to look like a set up . You can circulate this to anyone who is worried that I might walk into this trap. (translate it if it will help?) I think there are better ways of having debates in which co-opted media people controlled by the police cannot misquote you.

All the best
Arundhati

शनिवार, 10 जुलाई 2010

हत्यारों की गवाहियां अभी बाकी हैं राजेंद्र बाबू?


देश के मध्य हिस्से में माओवादियों और सरकार के बीच चल रहे संघर्ष का शीर्षक रखने में,राजेंद्र बाबू उतना भी साहस नहीं दिखा पाये जितना कि शरीर के मध्य हिस्से के छिद्रान्वेषण पर वे लगातार दिखाते रहे हैं।


तमाशे के फ़िराक में राजेंद्र बाबू
इसे सनसनी माने या सच,मगर कार्यक्रम तय है कि इस बार साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’के सालाना जलसे में लेखिका अरुंधति राय और सलवा जुडूम अभियान के मुखिया छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन आमने-सामने होंगे। यह जानकारी सबसे पहले हिंदी समाज के जनपक्षधर लोगों में पढ़ी जाने वाली मासिक पत्रिका ‘समयांतर’के माध्यम से जनज्वार तक पहुंची, जिसकी पुष्टि अब ‘हंस‘ भी कर चुका है। ‘हंस’से मिली जानकारी के मुताबिक इन दो मुख्य वक्ताओं के अलावा अन्य वक्ता भी होंगे।
हर वर्ष 31जुलाई को होने वाले इस कार्यक्रम का महत्व इस बार इसलिए भी अधिक है कि ‘हंस’ अपने प्रकाशन के पच्चीसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। ऐसे में पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव की कोशिश होगी कि धमाकेदार ढंग से पत्रिका की सिल्वर-जुबली का मजा लिया जाये। मजा लेने के शगल में पक्के अपने राजेंद्र बाबू ने माओवाद के मसले पर बहस का विषय रखा है, ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति।’

‘हंस’ ऐसे किसी ज्वलंत मसले को लेकर ऐसा संस्कृतनिष्ठ और घुमावदार शीर्षक रखेगा, हतप्रभ करने वाला है। खासकर तब जबकि पत्रिका के तौर पर ‘हंस’और संपादक के बतौर राजेंद्र यादव खुल्लमखुल्ला, खुलेआमी के हमेशा अंधपक्षधर रहे हों। वैसे में देश के मध्य हिस्से में चल रहे माओवादियों और सरकार के बीच संघर्ष का शीर्षक रखने में राजेंद्र बाबू उतना भी साहस नहीं दिखा पाये हैं,जितना कि शरीर के मध्य हिस्से के छिद्रान्वेषण पर वे लगातार दिखाते रहे हैं।

हिंदी में प्रतिष्ठित कही जाने वाली इस पत्रिका के संपादक का यह शीर्षक चिंता का विषय है और अनुभव का भी। अनुभव का इसलिए कि एक कार्यक्रम के दौरान एक दूसरे राजनीतिक मसले पर श्रोता उनके इस रूप से रू-ब-रू हुए थे। संसद हमले मामले पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दोषी करार दिये जाने के बाद फांसी की सजा पाये अफजल गुरु को लेकर ‘जनहस्तक्षेप’दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक कार्यक्रम किया था जिसमें अन्य वक्ताओं के साथ राजेंद्र यादव भी आमंत्रित थे।

बोलने की बारी आने पर संचालक ने जब इनका नाम उदघोषित किया तो अपने राजेंद्र बाबू ने मामले को कानूनी बताते हुए वकील कमलेश जैन को बोलने के लिए कहा। कमलेश जैन ने अफजल गुरु को लेकर वही बातें कहीं जो कि सरकार का पक्ष है। कमलेश सरकारी पक्ष को इस तरह पेश करने लगीं कि मजबूरन श्रोताओं ने हूटिंग की और आयोजकों को शर्मशार होना पड़ा। जबकि हम सब जानते हैं कि अफजल का केस लड़ रहे वकील,सामाजिक कार्यकर्ता और जन पक्षधर बुद्धिजीवी इस मामले में फेयर ट्रायल की मांग करते रहे हैं। कारण कि सर्वोच्च न्यायालय ने अफजल को फांसी की सजा ‘कंसेंट आफ नेशन’ के आधार पर मुकर्रर की थी।

अफजल से ही जुड़ा एक दूसरा मसला ‘हंस’ में लेख प्रकाशित करने को लेकर हुआ। जाने माने पत्रकार और कश्मीर मामलों के जानकार एवं ‘हंस’ के सहयोगी गौतम नौलखा ने कहा कि, ‘अफजल मामले की सच्चाई हिंदी के प्रबुद्ध पाठकों तक पहुंचे इसके लिए जरूरी है कि ‘हंस’ में इस मसले पर लेख छपे।’ गौतम के इस सुझाव पर राजेंद्र यादव ने लेख आमंत्रित किया। लेख उन तक पहुंचा। उन्होंने तत्काल पढ़ा और लेख के बहुत अच्छा होने का वास्ता देकर अगले अंक में छापने की बात कही। मगर बात आयी-गयी और वह लेख नहीं छपा।


अब सवाल यह है कि पिछले छह वर्षों से सलवा जुडूम अभियान के तमाशबीन बने रहे राजेंद्र यादव कहीं इस तमाशायी उपक्रम के जरिये अपने होने का प्रमाण देने की तो कोशिश में नहीं लगे हैं। तमाशायी कार्यक्रम इसलिए कि लेखिका अरुंधति राय सलवा जुडूम अभियान, माओवादियों और सरकार के रवैये पर क्या सोचती हैं,उनके लेखन के जरिये हम सभी जान चुके हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के प्रिय डीजीपी विश्वरंजन ‘सलवा जुडूम’को एक जन अभियान मानते हैं,यह छुपी हुई बात नहीं है। याद होगा कि पिछले वर्ष दर्जनों जनपक्षधर बुद्धिजीवियों ने रायपुर में विश्वरंजन के इंतजाम से हो रहे ‘प्रमोद वर्मा स्मृति’कार्यक्रम में इसी आधार पर जाने से मना कर दिया था। इस बाबत विरोध में पहला पत्र विश्वरंजन के नाम कवि पंकज चतुर्वेदी ने लिखा था। विरोध का मजमून हिंदी पाक्षिक पत्रिका ‘द पब्लिक एजेंडा’में छपे विश्वरंजन के एक साक्षात्कार के आधार पर कवि ने लिखा था जिसमें डीजीपी ने सलवा जुडूम को जनता का अभियान बताया था।

ऐसे में फिर बाकी क्या है जिसके लिए राजेंद्र बाबू अरुंधति-विश्वरंजन मिलाप कराने को लेकर इतने उत्साहित हैं। क्या हजारों आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन से उजाड़े जाने, माओवादियों के सफाये के बहाने आदिवासियों को विस्थापित किये जाने की साजिशों से राजेंद्र बाबू वाकिफ नहीं हैं। राजेंद्र बाबू क्या आप माओवाद प्रभावित इलाकों में सैकड़ों हत्याएं,बलात्कार आदि मामलों से अनभिज्ञ हैं जो आपने विश्वरंजन को आत्मस्विकारोक्ति के लिए दिल्ली आने का बुलावा भेज दिया है। रही बात उन भले मानुषों की सोच का जो यह मानते हैं कि इस बहाने माओवाद के मसले पर बहस होगी और राष्ट्रीय मसला बनेगा फिर तो राजेंद्र बाबू आप ऐसे सेमीनारों की झड़ी लगा सकते हैं।

जैसे अभी विश्वरंजन को बुलाने की बजाय भोपाल गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी एंडरसन को बुलाइये जिससे राष्ट्र के सामने वह अपना पक्ष रख सके कि उसने त्रासदी बुलायी थी या आयी थी। इसी तरह सिख दंगों के मुख्य आरोपियों और गुजरात मसले पर गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को भी दंगे,हत्याओं और बलात्कारों की मजबूरियां गिनाने के लिए एक चांस आप ‘ऐवाने गालिब सभागार’में जरूर दीजिए। समय बचे तो निठारी हत्याकांड के सरगना पंधेर और कोली को बुलावा भिजवा दीजिए जिससे कि उसके साथ अन्याय न हो,कोई गलत राय न बनाये। राजेंद्र बाबू आप ऐसा नहीं करेंगे और मुझे अहमक कहेंगे क्योंकि इन सभी पर राज्य ने अपराधी होने या संदेह का ठप्पा लगा दिया है। तब हम पूछते हैं राजेंद्र बाबू आपसे कि जिसको जनता ने अपराधी मुकर्रर किया है,उसकी गवाहियों में मुंसिफ बनने की अनैतिकता आप कैसे कर सकते हैं?

राजेंद्र बाबू अगर आप कुछ बहस की मंशा रखते ही हैं तो गृहमंत्री पी.चिदंबरम को बुलवाने का जुगाड़ लगाइये। मगर शर्त यह रहेगी कि 5 मई को जेएनयू में जिस तरह की डेमोक्रेसी वहां के छात्रों को झेलनी पड़ी, जिसे वहां के छात्रों ने चिदंबरी डेमोक्रेसी कहा, इस बार उनके आगमन पर माहौल वैसा न हो। गर यह संभव नहीं है तो विश्वरंजन से क्या बहस करेंगे, वह कोई कानून बनाते हैं?

राजेंद्र बाबू आप बड़े साहित्यकार हैं। सुना है आपने दलितों-स्त्रियों को साहित्य में जगह दी है। इस भले काम के लिए मैं तहेदिल से आपको बधाई देता हूं। साथ ही सुझाव देता हूं कि साहित्य में पूरा जीवन लगा देने के बावजूद गर आप दण्डकारण्य को एक आदिवासी साहित्यकार नहीं दे सके तो,आदिवासियों के हत्यारों की जमात से आये प्रतिनिधियों को साहित्यकार बनाने का तो पाप मत ही कीजिए।

राजेंद्र बाबू आप भी जानते हैं कि साहित्यकारों की संवेदनशीलता और संघर्ष से इतिहास भरा पड़ा है। आज बाजार का रोगन चढ़ा है, मगर ऐसा भी नहीं है सब अपना पिछवाड़ा उघाड़े खडे़ हैं और फिर हमारे युवा मन का तो ख्याल कीजिए। हो सकता है उम्र के इस पड़ाव पर आप डीजीपी कवि की कविताओं को सुनने में ही सक्षम हों,मगर हमारी निगाहें तो उन खून से सने लथपथ हाथों को देखते ही ताड़ जायेंगी। एक बात कहें राजेंद्र बाबू, एक दिन आप अपने नाती-पोतों को वह हाथ दिखाइये, अच्छा ठीक है किस्सों में अहसास ही कराइये। यकीन मानिये आप बुद्धना, मंगरू, शुकू, सोमू, बुद्धिया को अपने घरों में पायेंगे जो पिछले छह वर्षों से दण्डकारण्य क्षेत्र में तबाह-बर्बाद हो रहे हैं। इन जैसे हजारों लोग जो आज मध्य भारत में युद्ध की चपेट में हैं, आपको एक झटके में पड़ोसी लगने लगेंगे और आप साहित्य के वितण्डावादी आयोजन की जगह एक सार्थक पहल को लेकर आगे बढ़ेंगे।

महोदय कवि हैं ?

उम्मीद है कि अर्जी पर आप गौर करेंगे। गौर नहीं करने की स्थिति में हमें मजबूरन अरुंधति राय से अपील करनी पड़ेगी। फिर वही बात होगी कि देखो हिंदी से बड़ी अंग्रेजी है और न चाहते हुए भी सारा क्रेडिट अरुंधति के हिस्से जायेगा। हिंदीवालों की पोल खुलेगी सो अलग। इसलिए राजेंद्र बाबू घर की इज्जत घर में ही रखते हैं। कोशिश करते हैं कि हमारी भाषा में जनपक्षधरता को गहराई मिले। कम-से-कम अपने किये पर समाज के सबसे कमजोर तबके (आदिवासियों)के सामने तो शर्मसार न होना पड़े। खासकर तब जबकि उस तबके ने हमारे समाज और सरकार से सिवाय अपनी आजादी के किसी और चीज की उम्मीद ही न की हो।

अजय प्रकाश