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बुधवार, 13 जून 2012

जनसत्ता की बहस में समयांतर का दखल

(मंगलेश डबराल के एक संस्था में जाने और उसके बाद हम जैसों के विरोध के बाद उस पर खेद व्यक्त करने के प्रकरण को बहाना बनाकर जनसत्ता के यशस्वी संपादक आदरणीय श्री ओम थानवी जी ने जो 'बहस' चलाई, उससे आप लोग परिचित हैं. वह इस कदर 'लोकतांत्रिक' थी कि एक साहब ने यह लिखा कि 'योगी आदित्यनाथ साम्प्रदायिक हैं, लेकिन राष्ट्रभक्त हैं. उनके यहाँ जाने में क्या दिक्कत?". मैंने जो उत्तर दिया था उसे न छापने की वजह श्री थानवी जी ने उसका एक ब्लॉग पर प्रकाशित होना बताया, लेकिन अगले ही हफ्ते उसी ब्लॉग पर टिप्पणी के रूप में दर्ज एक पीस जनसत्ता के महान पन्नों पर प्रमुखता से छपा. और फिर झूठे तथ्यों और आरोपों से भरी अपनी एक टिप्पणी से उन्होंने इस 'बहस' को खत्म कर दिया. एक 'महान' अखबार का संपादक होने की यह सुविधा तो है उनके पास कि उसके पन्नों पर वह अपनी सुविधा के हिसाब से 'बहस' चलायें, लेकिन दुनिया जनसत्ता पर ही खत्म नहीं होती. समयांतर के ताजा अंक में 'दिल्ली मेल' स्तंभ के तहत  ओम थानवी जी और उनके चम्पूओं (शब्द जनसत्ता के एक चर्चित कालम से साभार) द्वारा चलाई गयी  उस बहस के तमाम मिथ्या आलापों-प्रलापों का जवाब देती यह टिप्पणी  यहाँ साभार प्रस्तुत है)


शीतयुद्ध के पुराने हथियार, नये प्रहार

पिछले पांच सप्ताह से जनसत्ता ने ऐसी बहस चला रखी है, जिसके लिए एब्सर्ड (बेहूदी, इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि हिंदी में बेहतर पर्यायवाची सूझ नहीं रहा है)सबसे उपयुक्त शब्द है। इसे जनसत्ता की सीमा कहें या हिंदी का दुर्भाग्य कि जब देश में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर इतनी जबर्दस्त हलचल हो और अखबार का संपादक या तो इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ रहा होता है या साहित्य के। क्या आपने इस संपादक को कभी किसी राजनीतिक विषय पर लिखते देखा है? अगर वह सामयिक होता है तो भी कुल मिलाकर साहित्यकारों की आवाजाही से आगे नहीं बढ़ पाता वरना तो आप जानते ही हैं कि वह 'मुअनजोदड़ो' पहुंच जाता है। इस पर हमें नवक्लासिकी अंग्रेजी कवि एलेक्जेंडर पोप की याद आ रही है जिन्होंने जुल्फों पर हुए एक विवाद पर 'रेप ऑफ द लॉक' नाम की लंबी कविता लिख मारी थी। वह कविता और कवि अंग्रेजी साहित्य के इतिहास में साहित्य के क्षुद्रताओं में फंस जाने के उदाहरण के तौर पर याद किया जाता है। 

इस एब्सर्डिटी का सबसे बड़ा कारण यह है कि यह पूरा लेख इंटरनेट के उन गैरजिम्मेदाराना और अधिकांशत: संदेहास्पद स्रोतों पर आधारित है जिनके चलानेवालों में से अधिकांश की विश्वसनीयता ही शंकास्पद है। यह अचानक नहीं है कि वे अराजकता व उच्छृंखलता के माहिर हैं। पर इससे क्या! ओम थानवी तो अपने लेख की शुरुआत ही इंटरनेट की आरती के साथ करते हैं। सवाल है क्या यह संजाली-प्रेम यों ही उमड़ पड़ा है? और क्या अब संपादक महोदय बुक नहीं सिर्फ फेसबुक में ही उलझे रहते हैं? ऐसा लगता नहीं है। अशोक वाजपेयी की शब्दावली में कहें तो वह ''चतुर-सुजान'' आदमी हैं। विवाद की शुरुआत 29 अप्रैल, 12 के अंक में थानवी के लिखे लेख से हुई जिससे ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है मानो वह साहित्य और बौद्धिक जगत में उदारता की वकालत कर रहे हों। इस में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? पर उदारता की आखिर सीमा क्या है या क्या होनी चाहिए इसकी बात वह नहीं करते।  असल में इस लेख का असली उद्देश्य वामपंथियों और उनके संगठनों को निशाना बनाना है। दक्षिण पंथ की यह सबसे बड़ी रणनीति रही है कि वह जिसे निशाना बनाता है उसे सबसे पहले अनुदार व कट्टर घोषित करता है और फिर आतंकवादी करार देता है।

फिलहाल लोकतंत्र और उदारता की बात करनेवाले पश्चिम द्वारा दुनिया के मुसलमानों के खिलाफ यही तरीका अपनाया जा रहा है। दूसरे महायुद्ध के बाद दुनिया भर में ठीक यही रणनीति कम्युनिस्टों के खिलाफ अपनायी गई थी। उसी दौरान कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम जैसी सीआईए पोषित संस्थाएं अस्तित्व में आईं और भारत में उससे ओम जी के आराध्य अज्ञेय व अन्य कलावादी और रेडिकल ह्यूमेनिस्ट जुड़े थे।इस पर याद आया कि थानवी के कम्युनिस्टों पर इस बार निशाना साधने का कारण निजी है। (यह बात और है कि वह नवउदारवादी नीतियों से मेल खा रहा है।) वह कम्युनिस्टों से इसलिए जले बैठे हैं कि उन्होंने थानवी के अज्ञेय महोत्सव को उस तरह सफल नहीं होने दिया जैसा वह चाहते थे। इसलिए मंगलेश डबराल तो सिर्फ बहाना हैं।

इसी तरह वह कहते हैं कि  ''पंकज बिष्ट देहरादून में रमाशंकर घिल्डियाल 'पहाड़ी' की जन्मशती पर भाजपाई कवि रमेश पोखरियाल निशंक के साथ मंच पर बैठे तो इसकी चर्चा भी तल्खी से हुई।'' यह बात भी तथ्यात्मक रूप से गलत है। पंकज बिष्ट मंच पर बैठे ही नहीं। वह सिर्फ अपनी बात कहने के लिए मंच पर चढ़े थे और उस के खत्म होने के साथ नीचे उतर गए।  वैसे भी वह मंच निशंक का नहीं था न ही वह अवसर किसी कलावादी या प्रतिक्रियावादी या सांप्रदायिक नेता की जन्मशती का था। बल्कि वह अवसर एक कम्युनिस्ट की जन्मशती का था। बिष्ट वहां क्यों गए और वहां उन्होंने क्या कहा वह सब (समयांतर दिसंबर, 11) उन्हीं के द्वारा लिखा जा चुका है। सच यह है कि आज तक किसी ने उस लिखे हुए को कहीं भी किसी तरह की कोई चुनौती नहीं दी है। यहां तक कि संजालियों-जंजालियों ने भी नहीं।  वामपंथियों ने कहीं भी इस बात पर आपत्ति नहीं की कि पंकज बिष्ट वहां क्यों गए। जहां और जिन लोगों ने शुरू में करने की कोशिश की उनसे ओम थानवी खासे परिचित हैं। वे वामपंथी नहीं हैं हां संजालिए जरूर हैं। उन्हें वामपंथी कहने के पीछे थानवी के निहित स्वार्थ हैं जो छिपे नहीं हैं।   

पर हम इस विवाद पर समय खराब करने की जगह उनके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों पर बात करने की कोशिश करते हैं। 

कोई कहां जाता है और क्यों जाता है यह मसला निजी विवेक और तात्कालिकता से जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए आपातकाल में वामपंथ और आरएसएस तक ने मिल कर काम किया था। या माना कल को नरेंद्र मोदी अहमदाबाद में कोई आयोजन वली दकनी पर करें तो कैसे कोई सेक्युलर कवि, बुद्धिजीवी या संस्था उसमें भाग लेने जा सकती है? या धर्मनिरपेक्षता पर ही कोई आयोजन करे तो कोई कैसे वहां जाएगा? अपने उत्तर में चंचल चौहान ने यह बात बड़े  तार्किक ढंग से रख दी है। उन्होंने थानवी के इस अरोप को भी बे-बुनियाद साबित कर दिया है कि वामपंथी लेखक संगठन अपने सदस्यों को आदेश देते हैं कि वे कहां जाएं और कहां न जाएं। उन्होंने उदय प्रकाश के जलेस से तथाकथित मोहभंग के झूठ को भी साफ कर दिया है: ''ओम थानवी ने उदय प्रकाश के जनवादी लेखक संघ से 'मोहभंग' के विचित्र कारण की शोधमयी पत्रकारिता करते हुए ऐसा आभास दिया जैसे जनवादी लेखक संघ 'अर्जुन सिंह की गोद में जा बैठा', और इस वजह से उदय प्रकाश जलेस से भाग गए, ऐसा विचित्र तर्क तो उदय प्रकाश भी संभवत: स्वीकार नहीं करेंगे, और जलेस से उन्होंने इस्तीफा दे दिया हो, ऐसा भी कोई सबूत नहीं है।'

पर थानवी के लेख में हिंदी साहित्य के परम पीडि़त लेखक उदय प्रकाश को लेकर कुछ बहुत ही मजेदार बातें कही गई हैं। उन पर आने से पहले हम याद दिलाना चाहेंगे कि जब अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उदय प्रकाश दौड़कर नौकरी के लिए भोपाल पहुंचे थे। वहां उन्हें किसने बुलाया था या वह कैसे गए थे इन पर विस्तार से बात करने का यह स्थान नहीं है। उन्होंने उदय प्रकाश के इंटरनेट के हाल के लेख को उद्धृत करते हुए कहा है कि वह 16 साल सीपीआई के पूर्णकालिक सदस्य थे, बाईस वर्ष सीपीएम से जुड़े जनवादी लेखक संघ में सक्रिय रहे। सात साल पहले उनका जनवादी लेखक संघ से मोहभंग हुआ है। 

अब जरा इस गणित को देखिये। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि उदय प्रकाश दिल्ली आने के बाद, और वह दिल्ली आपात काल के दौरान आ चुके थे, जनवादी लेखक संघ (जिसका जन्म ही 1982 में हुआ) से जुड़ गए थे। फिर सात साल पहले उनका जलेस से मोहभंग भी हो चुका है यानी इस तरह 36 वर्ष तो उन्हें दिल्ली में ही हो गए हैं। तब निश्चय ही उससे पहले वह सीपीआई में होंगे। क्या वह सीपीआई के सदस्य 12-13 वर्ष की अवस्था में हो गए थे? क्या उनके इलाके में सीपीआई ने 'बाल-भाकपा' बनाई हुई थी? 

अब दूसरी बात लीजिए। थानवी लिखते हैं, ''तीन साल पहले गोरखपुर में उदय के फुफेरे भाई का निधन हो गया। वे जिस कॉलेज के प्राचार्य थे, वहां उनकी बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में कॉलेज की कार्यकारिणी के अध्यक्ष और विवादास्पद सांसद योगी आदित्यनाथ ने उदय प्रकाश को उनके भाई की स्मृति में स्थापित पुरस्कार दिया।... उदय बार-बार कहते हैं उन्हें खबर नहीं थी, न अंदाज कि उनके और भाई की स्मृति के बीच योगी आदित्यनाथ आ जाएंगे।''

पहली बात तो यह है कि आदित्यनाथ का साहित्य या पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं है। वह उस कालेज की कार्यकारिणी के अध्यक्ष हो सकते हैं जो उनका मठ चलाता है पर उनका अकादमिक जगत से भी कोई संबंध नहीं है। यहां उनके और राकेश सिन्हा के बीच के अंतर को समझा जा सकता है। राकेश सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिविज्ञान के प्राध्यापक हैं और लेखक हैं। यह ठीक है कि उन्होंने हेडगेवार पर किताब लिखी है इस पर भी वह हैंतो लेखक ही। उनसे असहमति और बातचीत की गुंजाइश बनी रहती है पर आदित्यनाथ और एक लेखक के बीच कौन- सा ऐसा बिंदु है जो किसी तरह के संबंध या संवाद की गुंजाइश छोड़ता है? भारत नीति प्रतिष्ठान संघियों का गढ़ हो सकता है पर वह स्वामियों का अखाड़ा तो नहीं ही है। इसलिए उसे लेकर जिस तरह से विवाद खड़ा किया  गया है वह पूरी तरह शंकास्पद है। फिर आदित्यनाथ मात्र विवादास्पद नहीं हैंबल्कि घोर सांप्रदायिक और जातिवादी हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई सांप्रदायिक दंगों से उनका संबंध रहा है और 'उत्तर प्रदेश को गुजरात बना देना है' जैसे आह्वान वह समय-समय पर करते रहे हैं। यही कारण है कि लेखकों ने उदय प्रकाश के आदित्यनाथ के हाथ से 'कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह स्मृति सम्मान' लेने की आलोचना करते हुए कहा था: 'हम अपने लेखकों से एक जिम्मेदार नैतिक आचरण की अपेक्षा रखते हैं...।'  (उस समारोह के निमंत्रण पत्र में बतलाया जाता है कि उदय प्रकाश का नाम कुंवर उदय प्रकाश सिंह छपा था। क्या यह संयोग मात्र था?) यहां याद करना जरूरी है कि लेखक कोई तटस्थ व्यक्ति नहीं होता है। यह देश सांप्रदायिकता के कारण विभाजन जैसी त्रासदी से गुजर चुका है और आज भी इस समस्या से पार नहीं पा सका है। नरेंद्र मोदी और आदित्यनाथ इस समाज के लिए कलंक हैं। हर रचनात्मक कर्म का संबंध गहरी नैतिक चेतना और दायित्व बोध से होता है। अगर ऐसा नहीं होता तो लेखक होने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। यही कारण है कि उदय प्रकाश और मंगलेश डबराल आदि की द्विजदेव पुरस्कार लेने के लिए आलोचना की गई थी। द्विजदेव ने 1857 में  अंग्रेजों का साथ दिया था और स्वतंत्रता सेनानियों के दमन के पुरस्कार स्वरूप उन्हें अयोध्या की जागीर मिली थी।  

पर इन सब बातों को छोडि़ए। तत्काल कई  सवाल हैं जिनके जवाब उदय प्रकाश को (और उनके पब्लिसिस्ट ओम थानवी को भी) देने चाहिए। पहला, उनके फुफेरे भाई के नाम पर शुरू किया गया वह पुरस्कार क्या सिर्फ परिवार के ही लोगों के लिए था या औरों के लिए भी था? अगर औरों के लिए भी था तो क्या शालीनता के लिए उदय प्रकाश को यह नहीं कहना चाहिए था कि इस पुरस्कार को कम से कम पहली बार परिवार से बाहर के किसी और लेखक को दिया जाए, मैं बाद में ले लूंगा? यह किसी से छिपा नहीं है कि उदय प्रकाश हिंदी के सबसे ज्यादा अलंकृत लेखकों में से हैं। अगर वह एक पुरस्कार के लिए थोड़ा रुक ही जाते तो क्या उनकी प्रतिष्ठा घट जाती? 

क्या थानवी बताएंगे कि इस शृंखला का दूसरा, तीसरा या चौथा पुरस्कार किस-किस को मिला है? तब क्या यह सिर्फ उदय प्रकाश को देने के लिए आयोजित किया गया था? कहीं ऐसा तो नहीं है कि स्वर्गीय भाई की स्मृति को सिर्फ आड़ के रूप में इस्तेमाल किया गया हो? ऐसा तो नहीं है कि इस आयोजन के पीछे उद्देश्य  कुछ और ही रहा हो, जिसमें आदित्यनाथ महत्त्वपूर्ण घटक था? 

इंटरनेट पर ही एक और लेख इस बीच आया है जो सुना है प्रकाशन के लिए पहले जनसत्ता को भेजा गया था पर संपादक महोदय ने उसे छापने से इंकार कर दिया। वह है अशोक कुमार पाण्डेय का। इस लेख में दावा किया गया है कि आदित्यनाथ ने अमर उजाला को दिए अपने साक्षात्कार में विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि मैंने तो उदय प्रकाश को पहले ही कह दिया था कि मुझे न बुलवाएं विवाद हो जाएगा। यह बात 5 अगस्त, 2009 को इंडिया टुडे हिंदी ने अपने उत्तर प्रदेश संस्करण में भी छापी थी। हफ्तों से चल रहे विवाद में, जिसमें अब तक दर्जन भर लेख छप चुके हैं, जनसत्ता के पास अशोक कुमार पाण्डेय का लेख छापने की जगह नहीं है। इसलिए कि सारा अभियान निश्चित रणनीति के तहत चलाया जा रहा है इसलिए सिर्फ चुनिंदा लेख छप रहे हैं। जो लेख जरा भी असुविधाजनक साबित हो रहे हैं उनका जवाब प्रायोजित तरीके से अगले सप्ताह दिया जा रहा है।

संयोग देखिए, साल के अंदर ही उदय प्रकाश को मोहन दास कहानी (उर्फ उपन्यास?) पर साहित्य अकादेमी मिला।

संयोग और भी बहुत से हैं। जैसे कि साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी उसी गोरखपुर के हैं जहां आदित्यनाथ का लट्ठ पुजता है। (जनवरी, 2011 के दिल्ली मेल में लिखा गया था, ''हिंदी भाषा के संयोजक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हैं। इस पर याद आया कि पिछले वर्ष किसी प्रसंग में समयांतर में ही लिखा गया था कि आजकल अकादेमी का एक रास्ता वाया गोरखपुर होकर भी जाता है, जो स्वामी आदित्यनाथ का कार्य और संसदीय क्षेत्र है।'')

इसी तरह उदय प्रकाश का जलेस से मोहभंग उसी दौरान होता है जब दिल्ली में एनडीए की सरकार आ जाती है। वह थानवी को बतलाते हैं कि उन्होंने जलेस छोड़ दिया है पर संगठन से नहीं कहते कि वह जलेस छोड़ रहे हैं।  न ही इतने बड़े नैतिक स्टैंड (?) की सार्वजनिक घोषणा करते हैं या जलेस की अर्जुन सिंह की गोद में बैठ जाने के लिए आलोचना करते हैं। (निर्बाध आवाजाही के लिए?) इसी दौरान उनका पांचजन्य में साक्षात्कार छपता है। वहां भी तर्क यही है कि मुझे नहीं पता था कि यह साक्षात्कार पांचजन्य के लिए लिया जा रहा है। इस पर उदय प्रकाश की जो छीछालेदर उनकी पुरानी सहयोगी ने की वह पाखी (मई, 2011)के पन्नों में दर्ज है।

यह प्रसन्नता की बात है कि उदय अमेरिका में हैं। वह जिस परंपरा से जुड़ गए हैं वह भी कम भव्य नहीं है: अज्ञेय, कैलाश वाजपेयी, निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद और अशोक वाजपेयी। इनमें कुछ भारतीय दर्शन, संस्कृति और राष्ट्रीयता के अग्रदूत हैं तो कुछ रूपवाद के। पर ओम थानवी यह बताएं कि अगर उदय सीपीआई में होते या सीपीएम में होते तो वर्जीनिया विश्वविद्यालय उन्हें बुलाता? या फिर क्या किसी घोषित कम्युनिस्ट लेखक को आज तक किसी अमेरिकी विश्वविद्यालय ने बुलाया है?

ओम थानवी ने उदय प्रकाश के ब्लॉग में प्रकाशित लेख का उद्धरण विस्तार से छापा है जिसमें उदय ने त्रिलोचन शास्त्री और शैलेश मटियानी के संदर्भ से वामपंथी लेखक संगठनों पर हमला बोला है। उनके अनुसार:  '' क्या हम हिंदी के अप्रतिम कवि - और प्रगतिशील कविता वृहत्रयी में से एक - त्रिलोचन को याद करें, जो पहले स्वयं वामपंथी संगठन से निकाले गए, फिर दिल्ली से उनको शहर बदर करके हिंदू तीर्थ-स्थल हरिद्वार भेज दिया गया। अत्यंत विषम परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई ...। क्या हम शैलेश मटियानी को याद करें, जिन्हें जिंदा रहने और अपना परिवार पालने के लिए कसाई (चिकवा-गीरी) का काम करना पड़ा, ढाबों में बर्तन मांजने पड़े?...।'
   
जिस तरह से ये प्रसंग उठाए गए हैं वे लेखकीय मंशा को पूरी तरह उजागर कर देते हैं। त्रिलोचन शास्त्री को कितनी उम्र में जसम से हटाया गया? उन्हें किसने हरिद्वार भेजा? क्यों भेजा? क्या उनके परिवार में कोई नहीं था? वहां वह किसके साथ रहते थे? उनके दो बेटे कहां हैं? वह अंतिम दिनों में वृद्धावस्था के कारण होनेवाले सेनाइल सिंड्रोम या एलजेमियर से पीडि़त नहीं थे? उनकी मृत्यु भरी-पूरी उम्र में बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के कारण हुई, क्या यह सच नहीं है?

मटियानी को कसाई का काम अपनी पारिवारिक दुकान में करना पड़ा था। इसमें क्या बुराई है? काम तो काम है! उदय प्रकाश जिस ब्राह्मणवाद की कब्र खोदने में लगे हैं क्या वह स्वयं उसी के शिकार नहीं नजर आते हैं? वैसे क्या लेखक दलाई लामा होता है कि पैदा होने के साथ ही उसमें ऐसे चिह्न होते हों कि उसे तुरंत पहचान लिया जाए कि बेटा नामी कथाकार होने वाला है? एक बार लेखक बन जाने के बाद मटियानी ने सिवा लेखन के क्या कोई और काम किया? नौकरी न करना उनका अपना निर्णय था। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें नौकरियां मिलती ही नहीं या मिल ही नहीं रही थीं।

मटियानी, शास्त्री आदि के नाम का इस्तेमाल करना आसान है, उनके डंडे से दूसरों को पीटना तो और भी आसान। पर क्या उदय प्रकाश बतलाएंगे कि जब मटियानी दिल्ली के मानसिक रोग चिकित्सालय में भर्ती थे वह उनसे एक बार भी मिलने गए थे? यह अस्पताल उदय प्रकाश के घर से चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर ही है। उनके पास तो कार भी कई वर्षों से है। क्या उन्होंने कभी मटियानी की कहानियों पर या उनके जीवन संघर्ष पर कहीं एक पैरा भी लिखा है? उन्हें कहीं श्रद्धांजलि ही दी हो? वह तो हिंदी में पीएचडी हैं। इतना तो कर ही सकते थे। त्रिलोचन शास्त्री के लिए उन्होंने क्या किया, जो बीमारी के दौरान अंतिम दिनों में उनके घर के बगल में ही रहते थे? उदय प्रकाश और थानवी को भी याद दिलाना जरूरी है कि शास्त्री जी के उपचार व मदद के लिए दिल्ली की मुख्य मंत्री के पास जो प्रतिनिधि मंडल गया था उसमें कई वामपंथी लेखक निजी तौर पर और उनके तीनों संगठन के प्रतिनिधि शामिल थे पर जो रिपोर्ट जनसत्ता में इस संबंध में छपी थी, क्या उसमें उदय प्रकाश का नाम था? वैसे यह बतलाना जरूरी है कि दिल्ली सरकार ने शास्त्री जी की भरसक मदद की थी। इसी तरह भाजपा सरकार ने शैलेश मटियानी की।

थानवी ने लिखा है: ''एक लेखक के किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के विरोध में इतनी बड़ी तादाद में हिंदी लेखक न कभी पहले एकजुट हुए, न बाद में।' निश्चय ही यह सही है पर इस के साथ यह भी सही है कि इस दर्जे की अवसरवादिता न कभी पहले देखने को मिली और न ही बाद में। पर ऐसा भी नहीं है कि हिंदी लेखक समय-समय पर उन बातों का विरोध न करते रहे हों जिनसे समाज और साहित्य का सरोकार हो। स्वयं जनसत्ता के सती प्रथा का महिमा मंडन करनेवाले एक संपादकीय का विरोध करने में पूरे सौ लेखक शामिल थे। इसलिए लेखकों का विरोध न कोई नई बात है और न ही आश्चर्य की। समझने की बात यह है कि वह किसी एक कारण तक सीमित नहीं होता और न ही भविष्य में होगा।

जो भी हो यह कितना दुखद है कि उदय प्रकाश निजी स्कोर सैटल करने के लिए दो दिवंगतों का इस्तेमाल इतनी अशालीनता और हृदयहीनता से करने में जरा भी झिझक नहीं महसूस कर रहे हैं और थानवी भी उसी हथियार से वामपंथियों के आखेट का आनंद ले रहे हैं।

2 - पर उपदेश कुशल बहुतेरे

समयांतर और पंकज बिष्ट ओम थानवी का किस तरह से पीछा (हांट) करते हैं उसका उदाहरण इधर तहलका पाक्षिक में छपा उनका साक्षात्कार है। यह साक्षात्कार कई तरह की गलत बयानियों से भरा है और स्वयं उनके दोहरे चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है।

साक्षात्कार पर आने से पहले थानवी के इन आप्त वाक्यों को देखें: ''लेकिन क्या ये प्रसंग सचमुच ऐसे हैं, जिन्हें लेकर इतना हल्ला होना चाहिए? क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं, जिसमें उन्हीं के बीच संवाद हो जो हमारे मत के हों? विरोधी लोगों के बीच जाना और अपनी बात कहना क्यों आपत्तिजनक होना चाहिए? क्या अलग संगत में हमें अपनी विचारधारा बदल जाने का भय है? क्या स्वस्थ संवाद में दोनों पक्षों का लाभ नहीं होता? यह बोध किस आधार पर कि हमारा विचार श्रेष्ठ है, दूसरे का इतना पतित कि लगभग  अछूत है! पतित है तो उस पर संवाद बेहतर होगा या पलायन?... दुर्भाव और असहिष्णुता का यह आलम हमें स्वतंत्र भारत का अहसास दिलाता है या स्तालिनकालीन रूस का? 'आवाजाही के हक में' जनसत्ता, 29 अप्रैल, 2012।

कितनी उत्तम बातें हैं! कैसे उदात्त विचार और कैसी सदाशयता है! क्या बात है!

अब देखिये थानवी 15 दिन बाद ही  तहलका (15 से 31 मई) के  साक्षात्कार में क्या कहते हैं: ''पंकज बिष्ट ने अपनी पत्रिका समयांतर में लिखा कि वामपंथियों को अज्ञेय की जन्मशती का विरोध करना चाहिए। उन्होंने तीन पेज की रिपोर्ट लिखी। उसमें अपील की कि लेखकों को कार्यक्रम में शिरकत नहीं करनी चाहिए। हम लोगों ने पंकज बिष्ट जी को आमंत्रित किया और वे कलकत्ता चले आए। आप देख सकते हैं कि इनकी कथनी और करनी में कितना अंतर है।''

निश्चय ही किसी कथनी और करनी में अंतर है, पर जानने की बात यह है कि किसकी?

जनसत्ता, 29 अप्रैल, 2012 में लिखे अपने लेख 'आवाजाही के हक में' के अनुसार तो उन्हें प्रसन्न होना चाहिए था कि पंकज बिष्ट उन के आमंत्रण को स्वीकार कर अपने-अपने अज्ञेय के दूसरे विमोचन, जो उपराष्ट्रपति द्वारा किया जा रहा था, और संगोष्ठी में भाग लेने कोलकाता 'चले आए' थे। 'आवाजाही' की उनकी वकालत का इससे अच्छा प्रमाण क्या हो सकता था। पर तब उन्हें वामपंथियों को कोसने का मौका कैसे मिलता! साफ है कि हाथी के दांत खाने के और हैं और दिखाने के और। इस वक्तव्य में और भी कुछ छिपा है, जो छोटेपन या कहें उनकी अनुदारता का प्रमाण है। उनको पंकज बिष्ट का कोलकाता आना अच्छा नहीं लगा। क्यों कि बिष्ट ने कोलकाता पहुंचकर भी उस अखंड कीर्तन में अपना स्वर नहीं मिलाया जिसमें शेष आमंत्रित शामिल थे। वह पंकज बिष्ट का 'भंडाफोड़'  इसलिए करना चाहते हैं कि उन्होंने वहां भी अज्ञेय के बारे में कई ऐसी बातें कही थीं जो थानवी को रास नहीं आईं। कहां गई उनकी वह उदारता जो वह अपने जनसत्ता वाले लेख में मंगलेश डबराल को पीटने के लिए इस्तेमाल करते हैं? कोलकाता से लौट कर बिष्ट ने जो लिखा वह ओम थानवी के लिए किस तरह से असुविधाजनक साबित हुआ वह भी देखने लायक है। थानवी ने अपने साक्षात्कार में कहा है: ''एक अखबार ने लिखा कि अज्ञेय आयोजन में हिंदी के लोग कम बंगाल के लोग ज्यादा शामिल थे...। '' उन्होंने बतलाया नहीं कि वह कौन-सा अखबार था? वह था समयांतर जिसने लिखा था, वहां जो बंगाली भद्रलोक इकठ्ठा हुआ फिर चाहे उसमें शंको घोष हों, सौमित्र चटर्जी हों या अन्य छोटे-बड़े अभिनेता-अभिनेत्री, वे सब उपराष्ट्रपति के कारण ही शामिल हुए थे क्योंकि कोलकाता में उपराष्ट्रपति का आना बड़ी बात थी। उस रिपोर्ट में और भी कई ऐसी बातें थीं जो निश्चित है कि अज्ञेय भक्तों को रास नहीं आई होंगी। (देखें: 'सरोकार निजी बनाम सामाजिक', समयांतर, मार्च, 2012)

आप तहलका के इस साक्षात्कार की भाषा को नोट कीजिए 'चले आए'।  यानी बिष्ट बैठे हुए थे कि उन्हें कोई कोलकाता बुलाए। बेचारे ने कोलकाता कभी देखा नहीं था या हवाई यात्रा नहीं की थी, विशेषकर फ्री फंड की, जो पत्रकारों को अक्सर ही उपलब्ध रहती है।  इसलिए वह मरे जा रहे थे। पर वह वहां कैसे गए चूंकि ये बातें समयांतर की रिपोर्ट में बताना जरूरी नहीं था इसलिए उस पर बात ही नहीं की। पर चूंकि थानवी ने इस छोटी बात को उठा दिया है तो अब यह भी बता ही दिया जाना चाहिए। क्या ओम थानवी ने उस पंकज बिष्ट को, जो अज्ञेय को अंग्रेजों का एजेंट बताता रहा हो, उसी उदारता के चलते बुलाया था जिसकी वकालत उन्होंने जनसत्ता के अपने लेख में की है? या क्या वह बिष्ट को जानते नहीं थे? या थानवी उन्हें कोलकाता की यात्रा की घूस देकर अपने पक्ष में कर लेना चाहते थे? उन्हें सबसे बड़ा दुख इस बात का होगा कि समयांतर ने ही इस बात को रेखांकित किया था कि थानवी अपनी किताब का तीन बार विमोचन करवा चुके हैं। यहां तक कि उपराष्ट्रपति को भी इस बात का पता नहीं था कि अपने-अपने अज्ञेय का उनसे पहले भी लोकार्पण किया जा चुका है।

इस परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है कि उन्हें पंकज बिष्ट के कोलकाता आने से क्यों कष्ट हुआ होगा। ऐसे में वह बिष्ट को क्यों बुलाते और उन्होंने बुलाया भी नहीं।  वह यह बतलाने से झिझक क्यों रहे हैं कि पंकज बिष्ट उन पर लादे गए थे। पंकज बिष्ट को निमंत्रण प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से उनके ही आदमी द्वारा मिला था। यह दो दिन तक कोलकाता रहने का था, पर बिष्ट उस दौरान इतने व्यस्त थे कि उन्होंने मेजबानों से कहा कि उनके लिए एक रात से ज्यादा कोलकाता ठहरना संभव नहीं है और इसीलिए वह अगले ही दिन, यानी गोष्ठी खत्म होने से एक दिन पहले, चले आए थे। उनके लौटने का प्रबंध प्रभा फाउंडेशन ने यथानुसार कर दिया था। बिष्ट को प्रभा खेतान फाउंडेशन ने इसलिए बुलाया था क्योंकि वह प्रभा खेतान के मित्रों में रहे हैं। वह भी वहां प्रभा खेतान के सम्मान के कारण गए थे। यह पहली बार भी नहीं था कि वह प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा आयोजित किसी समारोह में कोलकाता गए हों। इससे पहले फरवरी, 2010 में भी वह फाउंडेशन के समारोह में वहां जा चुके थे। संयोग से उसमें भी ओम थानवी उपस्थित थे पर उस आयोजन में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।

ओम थानवी बताएं कि उनकी किताब के विमोचन के इस आयोजन में किस संस्था ने क्या और कितना आर्थिक सहयोग किया था? असल में आयोजन का सारा खर्च प्रभा खेतान फाउंडेशन ने ही उठाया था, जिसमें डेढ़ हजार रुपए कीमत की अपने अपने अज्ञेय की सौ प्रतियां खरीदना भी शामिल था, बाकी संस्थाओं की भूमिका मात्र प्रतीकात्मक थी।

ओम थानवी अपने तथ्यों में कितने दुरुस्त हैं इसके सिर्फ दो प्रमाण प्रस्तुत हैं:

एक : ओम थानवी ने तहलका  में कहा है कि ''पंकज बिष्ट ने अपनी पत्रिका समयांतर में लिखा कि वामपंथियों को अज्ञेय की जन्मशती का विरोध करना चाहिए। उन्होंने तीन पेज की रिपोर्ट लिखी। उसमें अपील की कि लेखकों को कार्यक्रम में शिरकत नहीं करनी चाहिए। वामपंथियों को अज्ञेय की जन्मशती का विरोध करना चाहिए?'' हम थानवी और तहलका, दोनों को चुनौती देते हैं कि वे बतलाएं कि पंकज बिष्ट ने समयांतर के कौन से अंक में यह लिखा? इससे ज्यादा गैरजिम्मेदाराना कोई बात हो ही नहीं सकती। 

हां उनके द्वारा संपादित पत्रिका में एक लेख में यह जरूर कहा गया था कि वाम पंथियों को अज्ञेय की शताब्दी नहीं मनानी चाहिए।  उस में भी ''जन्मशती का विरोध'' जैसी कोई बात नहीं थी। बल्कि यह कहा गया था कि जो मनाना चाहते हैं मनायें। दोनों बातों में कितना अंतर है, पाठक समझ सकते हैं। स्वयं गत वर्ष अपने लेख 'अज्ञेय के दिल जले' को अगर थानवी देखें तो उन्हें मिल जाएगा कि यह बात अजय सिंह ने लिखी थी। क्या थानवी और तहलका अपनी गलती सुधारेंगे?

दूसरा: थानवी के अनुसार, ''शमशेर बहादुर सिंह और केदारनाथ उनके पहले सप्तक तार सप्तक में शामिल थे।'' यह बात तथ्यात्मक रूप से गलत है। 'उनके पहले सप्तक' का क्या अर्थ है वही जानें? पर तार सप्तक का मतलब ही पहला सप्तक है। सच यह है कि तार सप्तक में न तो शमशेर शामिल थे और न ही केदारनाथ, फिर चाहे वह अग्रवाल हों या सिंह। केदारनाथ अग्रवाल तो किसी भी सप्तक में शामिल नहीं थे। हां, केदारनाथ सिंह जरूर तीसरे सप्तक में शामिल हैं।

अगर थानवी के इस साक्षात्कार को देखा जाए तो, जो बात उभर कर सामने आती है, और जिसे कोई अंधा भी देख सकता है वह यह है कि संकीर्णता वामपंथी नहीं वह दिखला रहे हैं बल्कि वह स्वयं वैचारिक संकीर्णता और जबर्दस्त छोटेपन के शिकार हैं। अगर वामपंथी लेखक संगठन अपने लेखकों को अन्य जगह जाने से रोकते तो फिर नामवर सिंह (प्रलेस) और मैनेजर पाण्डेय (जसम) अज्ञेय के जन्मशती समारोहों में कैसे पहुंचते? पंकज बिष्ट कैसे पहुंचते? और प्रणय कृष्ण कैसे अज्ञेय पर मुग्ध भाव से लिखते? पर लेखक संगठन और स्वयं सामाजिक रूप से सजग लेखक अपने साथियों से यह अवश्य चाहते हैं कि वे जहां भी जाएं देख-भाल कर जाएं। अगर कोई इरादतन कुछ करता है और फिर अपने पापों को ढकने के लिए उसे दूसरों के सर मढ़ता है तो इसका क्या किया जा सकता है?

समयांतर में जब कोलकाता (मार्च) और उसके बाद दिल्ली (अप्रैल) समारोहों की रिपोर्टें छपीं तो निश्चित था कि इन्हें इतनी आसानी से सहन नहीं किया जाएगा। हम तैयार थे पर यह जवाबी कार्रवाही इतनी  बचकानी होगी इसकी हमें उम्मीद नहीं थी। पर मजे की बात यह है कि उन्होंने जो बातें अपने लेखक में कही हैं जैसे कि पंकज बिष्ट निशंक के साथ बैठे या फिर कोलकाता हमारे बुलाने पर गए ये दोनों ही बातें उनके प्रिय ब्लॉगों में से एक में लिखी गईं थीं। आखिर ओम थानवी से पहले यह बात उस ब्लॉग में कैसे लिखी गई जिसे बाद में उन्होंने उद्धृत किया है? संभव है, और इस अतार्किकता के माहौल में तो कुछ भी संभव है, कि कभी ब्लॉग के जंजाली थानवी से प्रेरणा लेते हों और फिर थानवी ब्लॉगों से।

गुरुवार, 19 मई 2011

अज्ञेय प्रसंग - भाग २


(समयांतर मंगाने के लिए ९८७१४०३८४३ पर संपर्क करें. वार्षिक चन्दा - १५० रु, छात्रों के लिए  १०० रु.)


(समयांतर में छपे पंकज बिष्ट के लेख अज्ञेय की विधवाएं और उनका क्रंदन का पहला भाग आप यहाँ पढ चुके हैं...ब्लॉग के आंकड़े बताते हैं कि इसे पढ़ा लगभग पांचेक सौ सुधि जनों ने लेकिन शायद कुछ कहना उचित नहीं समझा. वैसे फेसबुक पर मनीषा कुलश्रेष्ठ, विमल कुमार और हिमांशु पांड्या ने लेख को तो अच्छा बताया लेकिन शीर्षक पर आपत्ति की. हिमांशु ने लिखा 'लेख तो अच्छा है पर शीर्षक काफी असंवेदनशील है विधवाओं की समाज में स्थिति के प्रतिबहरहाल इससे लेख का महत्त्व कम नहीं हो जाता .जब भले लोग आई.सी.एस.एस.आर. की राजनीति से मुहं चुराना चाहते हैं और प्रत्येक आलोचना को 'कीचड उछाल ' की शब्दावली में बाँध रहे हैं और जब एक अखबार अपनी तमाम वस्तुनिष्ठता छोड़कर संपादक के व्यक्तिगत आस्थाओं का भोंपू बन गया है और जब तमाम वाम विरोधी अपनी तमाम नयी पुराणी कुंठाओं का वमन एक साथ कर रहे हों , ऐसे लेख का महत्त्व असंदिग्ध है. पंकज बिष्ट इसी साहस के लिए जाने जाते हैं.' लेख का दूसरा हिस्सा पेश है. अगली कड़ी में अज्ञेय का इंटरव्यू भी)


जहां तक कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम का सवाल है यह सदा से ही स्पष्ट था कि यह कम्युनिस्ट विरोधी विचारधारा से प्रचालित है। उसे सीआईए का पैसा मिलता था, यह दीगर बात है। इसका खुलासा 1967 में अमेरिकी पत्रिका रैंपार्ट ने किया था जिसके बाद दुनिया भर में बवाल मच गया। सवाल यह नहीं है कि उससे जुड़े सारे लोगों को पैसा मिलता था, पर यह निश्चित है कि उससे जुड़े चुनिंदा लोगों को अवश्य पैसा मिलता था। इसका एक उदाहरण लंदन से निकलनेवाली पत्रिका एनकाउंटर है, जिसका उन दिनों बौद्धिक जगत में जबर्दस्त बोलबाला था और उसके संपादक प्रसिद्ध ब्रितानवी कवि स्टिफे न स्पैंडर थे। जैसे ही यह खुलासा हुआ कि एनकाउंटर सीआईए पोषित पत्रिका है, स्पैंडर ने इस्तीफा दे दिया और वह मुंह छिपाने आस्ट्रेलिया भाग गए। साफ है कि सीआईए डीएमके या अण्णा डीएमके की तरह हर किसी को नोट नहीं बांटता था, न बांटता है। वह अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करता है अपने विश्वस्त एजेंटों के माध्यम से, इसमें कला और संस्कृति की संस्थाओं के अलावा, विश्वविद्यालय और फोर्ड फाउंडेशन जैसी स्वयंसेवी संस्थाओं का भी इस्तेमाल होता है। एनकाउंटर के अलावा पार्टीजन रिव्यू, कामेंट्री, सिवान रिव्यू  को भी सीआईए का पैसा मिलता था। बदले में ये पत्रिकाएं लेखकों से अच्छा पारिश्रमिक देकर मनचाहे लेख लिखवातीं थीं।

यह कैसे होता था, इस बारे में एडवर्ड सईद ने बतलाया है: ''... दूसरे विश्वयुद्ध के शुरुआती सालों में कुछ मुखिया होते थे जिनके हाथ में सूत्र होते थे, वे बुद्धिजीवियों को काम में लगाते थे, पैसा बांटते थे या सम्मेलनों और यात्राओं की व्यवस्था करते थे...सेंडर्स ने लिखा है कि दूसरे विश्वयुद्ध के कई जासूसों, जैसे कि मैकाले, आर्थर श्लींजर, कॉस कैन फील्ड, मैल्कम मैगरिज, विक्टर रॉथ्सचाइल्ड आदि का जमावड़ा मिल-जुल कर काम किया करता था। ...सेंडर्स का अनुमान है कि अमेरिका का समर्थन करने के लिए बुद्धिजीवियों को जहां तक संभव हुआ खरीदने, अमेरिका और उसकी नीतियों की आलोचना करनेवाले स्वरों को हल्का करने, इस देश के मूल्यों को फैलाने और साथ ही साथ सोवियत संघ को बदनाम करने में बीस करोड़ डालर खर्च किए गए।'' (विस्तृत जानकारी के लिए देखें समयांतर, जनवरी, 2000)

स्पैंडर को आलीशान तनख्वाह और अन्य सुविधाएं दी जाती थीं। इसी तरह औरों को भी दी जातीं थीं, अच्छा पारिश्रमिक, पार्टियों और यात्राओं के तौर पर। इसलिए मात्र इस बात से कि कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम से, ''जयप्रकाश नारायण, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, जैनेंद्र कुमार, सुमित्रानंदन पंत, जी. शंकर कुरुप्प, के.एम मुंशी, रायकृष्ण दास, रामवृक्ष बेनीपुरी'' आदि  कई जाने-माने नाम जुड़े थे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि इस संगठन को सीआइए का पैसा नहीं मिलता था और यह उसे आगे बांटने का काम नहीं करता था। निश्चय ही इनमें से कई लोग इस संगठन से इसलिए जुड़े होंगे कि वे परंपरावादी, रूढि़वादी, धार्मिक और गांधीवादी थे और मार्क्सवाद उन्हें रास नहीं आता था। पर रैंपार्ट के खुलासे के बाद बड़े पैमाने पर लोगों ने कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम से नाता तोड़ लिया था। इसके बाद भी जो उससे जुड़े रहे उन्हें क्या कहा जाएगा? एक सवाल और है, इस दौरान अमेरिका की यात्राओं और वहां विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने के लिए हजारी प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, जैनेंद्र कुमार, सुमित्रानंदन पंत, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि में से कौन-कौन गया था?

जहां तक दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले सप्ताहिक थॉट का सवाल है उसके बारे में लगातार शंकाएं रही हैं। अज्ञेय उसके साहित्य संपादक थे। यही नहीं वह इस पत्रिका के मालिक संपादक राम सिंह द्वारा दिल्ली से निकाले जानेवाले अंग्रेजी दैनिक के सहायक भी होनेवाले थे पर वह योजना पूरी नहीं हो पाई। पहले क्वेस्ट और फिर न्यू क्वेस्ट से अज्ञेय संपादक के तौर पर नहीं बल्कि लेखक और ए.बी शाह के सहयोगी के तौर पर जुड़े थे। जहां तक क्वेस्ट और न्यू क्वेस्ट का सवाल है ये पत्रिकाएं एनकाउंटर की 'ट्रू कॉपीÓ थीं, अपनी विषय वस्तु में ही नहीं साज-सज्जा में भी।

इधर वरिष्ठ लेखक मुद्राराक्षस ने अपने साप्ताहिक स्तंभ में अज्ञेय विवाद पर टिप्पणी की है जो अज्ञेय के कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के संबंधों की पुष्टि के साथ उनकी रामभक्ति पर भी प्रकाश डालती है। मुद्राराक्षस के अनुसार, ''... अज्ञेय जितने के हकदार हैं उससे ज्यादा ही उन्हें मिला है और पश्चिम के वामपंथ विरोधी संगठन कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के में शरीक हो जाने के बाद सुखों का तो जिक्र ही क्या। एक बार खुद डा. लोहिया (राममनोहर) ने मेरे अज्ञेय विरोध पर सवाल किया था - 'क्या तुम अज्ञेय को विदेशी यानी अमेरिकी एजेंट मानते हो?' मैंने कहा- 'अज्ञेय जब कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के लिए काम करते हैं तो और क्या हो सकते हैं?''

यह संदर्भ 1960 से 1967 के बीच का होना चाहिए।

मुद्राराक्षस ने उनकी रामभक्ति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, ''डाक्टर लोहिया के घर साप्ताहिक जन गोष्ठी (जन लोहिया संपादित मासिक पत्रिका थी - सं.) में अज्ञेय कभी नहीं बुलाए गए थे। लेकिन अज्ञेय की देवपूजा करनेवाला हिंदी समाज रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के साथ ही जानकी यात्रा करता है, इसको सामने क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? उनकी कविताओं और उपन्यासों के साथ इस बात की चर्चा भी क्यों नहीं होनी चाहिए कि जानकी यात्रा पर संपादित उनकी पुस्तक में उन्होंने  जो लिखा है वह कितने बड़े अंधविश्वास को ठीक विहिप की भाषा में दुहराता है? एकाध उदाहरण ही सिद्ध करने के लिए काफी होंगे - 'जिसके अंत में विष्णु स्वरूप राम एक प्रभादीप्त तेजोमंडल में आत्मस्थ हो जाते हैं। ... इसी के साथ सब देव-देवता, यक्ष-नाग, ॠषि, सिद्ध और मानुष मात्र हैं जो ऐसे अवसरों पर अगत्या उपस्थित होते हैं और सम्मोहित से ताकते रह जाते हैं। ... राम और सीता ऐसे ही अवतारी सनातन चरित्र हैं जिनका जीवन नियति का निर्धारण करने वाले क्षणों की सतत परंपरा है।'' (राष्ट्रीय सहारा, 24 अप्रैल) 

अज्ञेय पर बड़ी पूंजी मेहरबान रही इसका उदाहरण मात्र ज्ञानपीठ नहीं है बल्कि दिनमान, नवभारत टाइम्स और एवरीमैन्स भी है। पर असली मसला उनके वत्सल निधि की स्थापना करने से जुड़ा है। जहां तक ज्ञानपीठ की राशि का अपनी जेब में नहीं रखने का सवाल है हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वत्सल निधि वास्तव में अज्ञेय जी के अपने ही नाम पर बनाई गई संस्था थी।  वत्सल उन्हीं का बचपन का नाम है। दूसरे शब्दों में यह निधि स्वयं को उसी तरह अमर करने के लिए बनाई गई थी जिस तरह से हिंदुस्तान टाइम्स के मालिक ने अपने जीते जी अपने नाम पर केके बिड़ला फाउंडेशन बनाया। अज्ञेय ने ज्ञानपीठ पुरस्कार का पैसा किसी दूसरी सामाजिक संस्था या जरूरतमंद लोगों को नहीं दिया था। और हां, पैसा कहां से आया इसका एक मजेदार जवाब अज्ञेय ने अपने साक्षात्कार में दिया है जो मुद्राराक्षस की बात की ही पुष्टि करता है।

रघुवीर सहाय ने उनकी यात्राओं विशेष कर 'जानकी-यात्राÓ के बारे में प्रश्न किया था। इस लंबे जवाब के अंत में उन्होंने कहा है, '' ... पहली यात्रा जानकी जीवन से जोड़ी गई इसलिए भी मैंने सोचा कि बाहर से सहयोग इस यात्रा को अपेक्षया अधिक मिल सकेगा और यह विश्वास सही साबित हुआ। बहुत उत्साह से लोगों ने इस यात्रा में तरह-तरह की सहायता की।'' यानी अपनी योजनाओं और महत्वाकांक्षाओं के कार्यान्वयन केलिए संसाधन जुटाने के लिए धार्मिक भावनाओं को भुनाने में भी उन्हें कोई उज्र नहीं था। अगर अजय सिंह ने इस यात्रा को लेकर प्रश्न किया है कि   ''इस यात्रा का मकसद क्या था, यह क्यों निकाली गई, और इसके लिए धन कहां से और कैसे जुटा?'' तो गलत क्या है?

यहां यह बतलाना भी गलत नहीं होगा कि साहित्य को लेकर वह कितने महत्वाकांक्षी थे। खुशवंत सिंह ने आठवें दशक में दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार में, संभवत: स्टेट्समैन , साहित्य के नोबेल पुरस्कारों के संदर्भ में अज्ञेय से संबंधित एक प्रसंग लिखा है। सन 1966 में इजराइली लेखक सेमुअल एगनान को साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई। एगनान नाम से परिचित न होने के कारण किसी उत्साही उपसंपादक के कारण एक अंग्रेजी अखबार ने यह छाप दिया कि हिंदी कवि अज्ञेय को इस बार का पुरस्कार दिया गया है। इससे हल्ला मच गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद किसी भारतीय को मिलनेवाला साहित्य का यह दूसरा नोबेल पुरस्कार होता। खुशवंत सिंह का कहना था कि अज्ञेय ने जानबूझ कर इसका खंडन नहीं किया और गलत-फहमी को बनाए रखा। अगले दिन जाकर मामला साफ हुआ। इसलिए यह कहना भी कठिन है कि वास्तव में कभी अज्ञेय का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए गया था। पर इससे यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि नोबेल अनिवार्य रूप से उत्कृष्टतम रचनाओं के लिए ही मिलता है। इसी तरह उन दिनों एक और अफवाह भी उड़ा करती थी कि साहित्य अकादमी के अंग्रेजी के एक संकलन या पत्रिका के लिए अज्ञेय पर एस.एच. वात्स्यायन ने लेख लिखा था।  

अंत में, मेरे विचार में किसी व्यक्ति, विशेषकर लेखक, का मूल्यांकन अंतत: इस बात से नहीं हो सकता कि उसने शुरू में क्या किया? किस विचारधारा को समर्पित रहा और क्या लिखा, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उसने अपनी गलतियों से क्या सीखा? माना यशपाल ने औपनिवेशिक सरकार के लिए जासूसी का काम किया था, माना फैज फासीवाद का विरोध करने के लिए अंग्रेजी सेना में शामिल हुए पर सवाल यह है कि उन्होंने उस गलती को किस तरह सुधारा और उनका बाद का उनका लेखन किस तरह से जनता का पक्ष लेता है?

इसके एक पैमाने के तौर पर भारत विभाजन को लिया जा सकता है। अज्ञेय, यशपाल और फैज तीनों ही इसके गवाह थे और तीनों ही उस पंजाब क्षेत्र से थे जिसने विभाजन की विभीषिका देखी। तीनों का ही लेखकीय व्यक्तित्व आजादी के बाद निखरा। अज्ञेय के लेखन में भारत विभाजन हाशिये पर है। न ही उनका उस जनता के प्रति कोई सरोकार नजर आता है जो दो सौ वर्षों से अंग्रेजी औपपनिवेशिक शोषण से ध्वस्त हो चुकी थी। यशपाल ने भारत विभाजन और सांप्रदायिकता पर हिंदी का सबसे बड़ा उपन्यास झूठा सच लिखा है। उनका पूरा लेखन कुल मिला कर समाजोन्मुख है। फैज का लेखन भी सामाजिक बदलाव, तानाशाही और सांप्रदायिकता विरोधी है। जब कि अज्ञेय के लेखन में व्यक्ति महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा भी है, ''स्वाधीन समाज और कम स्वाधीन समाज में अंतर यही है कि एक में व्यक्तित्व के समग्र विकास की गुंजाइश होती है और दूसरे में नहीं होती। ÓÓ साफ है कि यह पूंजीवादी विचारधारा हैऔर आजादी के बहाने शोषण को सही ठहराती है। यह समझ यह नहीं देखती कि समाज में गहरी असमानता हैऔर इस असमानता को खत्म किए बगैर स्वतंत्रता जैसी कोई चीज नहीं आ सकती। क्योंकि समता के बिना समाज के एक बड़े हिस्से का न तो आर्थिव व सामाजिक विकास हो पाता है और न ही व्यक्तित्व का। हर समाज में आदमी अपनी प्रतिभा में 19-20 के अंतर का ही होता है। एक आदमी जो डाक्टर है वह पढऩे का अवसर न मिलने पर चपरासी या मजदूर हो सकता है और एक मजदूर अवसर मिलने पर डाक्टर या इंजीनियर या अध्यापक हो सकता है। यहां तक कि कोई लोक गायक अवसर मिलने पर किसी बड़े कवि या लेखक में बदल सकता है। असल में व्यक्तित्व का विकास एक छद्म धारणा है जो समाज के एक बड़े हिस्से को बेहतर जीवन की संभावना से बाहर कर देती है। कुछ लोगों के हाथ में पूंजी के केंद्रीयकरण को ही सही नहीं ठहराती है बल्कि शोषण और गरीबी को जस्टिफाई करती है। क्या यह अजीब नहीं है कि जो व्यक्ति योरोप के फासीवाद से उद्वेलित हो अंग्रेजी सेना में सेवा के लिए स्वयं को प्रस्तुत कर देता हो वह विभाजन की विभीषिका से न के बराबर प्रभावित हो। तब उसकी मानवता कहां गई? उनके उपन्यास चाहे शेखर एक जीवनी हो, अपने अपने अजनबी हो या नदी के द्वीप उन में तात्कालिक समय की उथल-पुथल क्यों नजर नहीं आती है। हां, व्यक्ति की निजी पीड़ा की ये रचनाएं इलैक्ट्रोग्राफ जरूर हैं

इसलिए समयांतर के लेखक और हमारे मित्र अजय सिंह के इस प्रश्न से हमारी पूरी सहमति है कि आखिर अज्ञेय की जन्मशती को वामपंथी क्यों मनाएं? न तो वामपंथी संगठन सरकारी हैं और न ही वामपंथी सरकारी कर्मचारी कि हर तरह के लेखक की जन्मशती मनाने की रस्मअदायगी करना उनकी मजबूरी हो। विवेक का इस्तेमाल करना फासिवाद नहीं है विवेक को दरकिनार करना जरूर अवसरवाद है। 
जिन्हें मनाना चाहिए वे मना ही रहे हैं।

इस विवाद का सबसे ज्यादा जुगुप्सा पैदा करनेवाला प्रसंग है लक्ष्मीधर मालवीय नाम के सज्जन का लेख। मात्र इसलिए नहीं कि उन्होंने हमारी मखौल उड़ाने की कोशिश की है बल्कि वृहत्तर संदर्भ में यह बुद्धिजीवीय बेईमानी का भी निकृष्टतम उदाहरण है। उन्होंने लिखा है, ''समयांतर पता नहीं क्या चीज है, जबकि मैं इस शब्द का अर्थ ही नहीं बूझ पाता।'' लगता है मालवीय जी सिर्फ उन्हीं शब्दों के अर्थ बूझ पाते हैं जिनसे उन्हें कुछ सधता नजर आता है। उनका भी दोष नहीं है। बेचारे जिस उम्र में हैं स्मृति लोप से पीडि़त हो जाना बहुत संभव है। पर उनकी यह स्मृति लोप की बीमारी अवसरानुकूल है, जिसे अंग्रेजीवाले कहते हैं 'सलैक्टिव एमनेशिया',पर है पुरानी यानी 'क्रॉनिक'। जो व्यक्ति अपना परिवार ही भूल जाए अगर वह समयांतर भूल गया हो तो क्षम्य है। समयांतर में उनके लेखों को छपे हुए हो भी तो दशक  गया है। कहीं उनके 'एमनेशिया' का कारण यह तो नहीं है कि बाद में समयांतर ने उन के प्रलापों को छापने लायक नहीं पाया। अपने को लेखक कहनेवाले इस आदमी की अमानवीयता का सबसे खराब उदाहरण यह है कि यह ऐसे समय जापान में है जब वह देश अपने इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी झेल रहा है और यह लालबुझक्कड़ ढींग मार रहा है कि मैंने अज्ञेय को जापान बुलाया था? क्या उन्होंने अपनी जब से टिकट दिया था? इस झूठी आत्म प्रशंसा और बड़बोलेपन से क्या यह बेहतर नहीं होता कि वह उस देश की पीड़ा पर हिंदी अखबारों के लिए दो शब्द ही लिख कर अपना ॠण चुकाने की कोशिश करते, जिसकी (घी चुपड़ी) रोटी इन्होंने आजीवन खाई है और जिसके बारे में वह लिखते हैं कि उस देश में इन्होंने सड़क पर पड़ी किसी लाश को नहीं देखा। पर महोदय आज तो पूरा जापान 20 हजार लाशों से पट गया है। अब तो लिख सकते थे। भारत को तो चलो वह 45 साल पहले ही छोड़ गए थे।

शनिवार, 14 मई 2011

अज्ञेय, यशपाल वाया ओम थानवी....वगैरह-वगैरह

प्रतियों के लिए संपर्क करें 09871403843, सदस्यता (वार्षिक) - रु 150, छात्रों के लिए रु 100


पंकज बिष्ट का यह आलेख समयांतर के ताज़ा अंक में छापा है. अज्ञेय कों लेकर जिस तरह जनसत्ता में व्यक्तिपूजा के जोश में कुतर्कों और अर्धसत्यों के सहारे एक 'बहस' चलाई गयी, उसके बरक्स यह लेख अज्ञेय की साम्राज्यवादी तथा साम्प्रदायिक भूमिका की पडताल करता है. हम इस बहस में सभी पक्षों के सार्थक हस्तक्षेप का सवागत करते हैं. अज्ञेय पर कुछ और आलेख यहाँ देखे जा सकते हैं .इस लेख में अज्ञेय के रघुवीर सहाय द्वारा लिए गए जिस साक्षात्कार का ज़िक्र किया गया है, उसे अगली किश्तों के क्रम में ही प्रकाशित किया जाएगा.

अज्ञेय की विधवाएं और उनका क्रंदन (भाग-१)

इस टिप्पणी को, जो वास्तव में जवाब है, जनसत्ता में भेजा जाना चाहिए था। पर चूंकि मैं नवें दशक के अंत में हुए रूपकुंवर सती कांड में जनसत्ता द्वारा सती प्रथा का समर्थन करने के विरोध में और तब तक, जब तक कि जनसत्ता इसके लिए माफी न मांगे, वहां न लिखने का फैसला करनेवाले सौ लेखकों में से एक था, पिछले दो दशकों से वहां लिखता नहीं हूं, इसलिए इसे समयांतर में छापने की मजबूरी है।

समयांतर के अधिसंख्य पाठकों को, जिन्होंने जनसत्ता नहीं देखा होगा, यह बतलाना जरूरी है कि अखबार के संपादक ओम थानवी ने 27 मार्च के संस्करण में 'अज्ञेय के दिलजले' शीर्षक से एक लंबा लेख लिखा था। यह लेख अजय सिंह के समयांतर के मार्च अंक में प्रकाशित लेख 'अज्ञेय जन्मशती: कुछ सवाल' के खिलाफ था। अगले ही रविवार को अखबार ने थानवी के पक्ष में और समयांतर व अजय सिंह की खिल्ली उड़ानेवाला लेख छापा, जो जापान से लक्ष्मीधर मालवीय का था। यह देखना मजेदार था कि जो जनसत्ता दिल्ली महानगर में ठीक से नहीं मिलता, वह जापान कैसे पहुंच गया? संभव है इधर उसका जापानी अंतरराष्ट्रीय संस्करण निकलने लगा हो! खैर, जहां तक अजय सिंह का सवाल है उन्होंने अपना जवाब दे दिया है और यह 17 अप्रैल के जनसत्ता में प्रकाशित हो चुका है। पर अभी भी कुछ ऐसी बातें हैं जिनका संबंध समयांतर और मुझ से तो है ही, साहित्य, साहित्यकारों की भूमिका और उनकी प्रतिबद्धता जैसे सवालों से भी है,रह गई हैं,इसलिए उनका स्पष्टीकरण जरूरी लगता है।

मुद्दे पर आने से पहले मैं इतना अच्छा चरित्र प्रमाण पत्र देने के लिए कि ''वे (पंकज बिष्ट) भले आदमी हैं...' जनसत्ता संपादक ओम थानवी का आभार प्रकट करना चाहूंगा। इसके बाद उनके मुझे ''...ठीक से कभी न समझ पाने'' और ''...पेचीदा संपादक।'' घोषित करने को ज्यादा तूल नहीं देना चाहता। ऐसे दौर में जब कि कोई आदमी हिंदी के महारथियों, संस्थानों और ओहदेदारों के बीच 'पर्सोना नॉन ग्राटा' बन चुका हो, उसके लिए तारीफ के तीन शब्द भी, वह भी इतने प्रतिष्ठित अखबार के संपादक द्वारा, क्या तीन ग्रंथों से कम माने जाएंगे? इसलिए यह तो स्वयं सिद्ध है कि ओम थानवी मुझ से ज्यादा भले सज्जन हैं।

पर असली मसला उन की आपत्तियों का है। इनमें पहली है कि मैं समयांतर में दो-तीन साल तक लगातार जनसत्ता की निंदा करते हुए यह ऐलान करता रहा कि अखबार बंद होने के कगार पर है।

निश्चय ही हम यह करते रहे, पर क्यों करते रहे यह बतलाया जाना भी जरूरी था, जो ओम थानवी ने नहीं किया। उस दौरान अखबार के दो संस्करण बंद हुए, एक मुंबई का और दूसरा चंडीगढ़ का। (गोकि इस बीच दो फ्रंचाइजी संस्करण और निकले हैं, पर उससे स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता ) इसके अलावा दिल्ली संस्करण के कई वरिष्ठ लोगों को निकाला गया। इस बात को भी दोहराने की जरूरत नहीं है कि अखबार के दिल्ली और कोलकाता संस्करण की स्थिति ऐसी बन गई कि अखबार कितना बिकता है यह अनुमान लगाने का मसला हो गया था। आज भी, कोलकाता की बात जाने दें, दिल्ली तक में यह अखबार आसानी से नहीं मिलता। न ही इसके प्रसार की कोई कोशिश नजर आती है। यानी इसे बस निकालने के लिए निकाला जाता है। हालत यह है कि मालिकों ने अखबार के दिल्ली कार्यालय को बहादुर शाह जफर मार्ग की बिल्डिंग से उठा कर नोएडा में पटक दिया है और एक्सप्रेस बिल्डिंग की उस जगह को नवभारत टाइम्स को किराए पर दिया हुआ है। साफ है कि मालिकों के लिए अखबार (हिंदी का?) नहीं बल्कि किराया ज्यादा अहमियत रखता हैऔर यह उनकी पुरानी आदत है। पर सत्य तो यह है कि आज भी स्वयं पूरे इंडियन एक्सप्रेस समूह को लेकर बाजार में रह-रह कर अफवाहें उड़ती रहती हैं कि संस्थान न जाने कब बिक जाए और किस को बिक जाए वगैरह-वगैरह।

और तब भी हमारी मंशा, वहां हो रही असामान्य उथल-पुथल को बताने के अलावा, यह कभी नहीं रही कि जनसत्ता बंद हो, बल्कि यह थी कि बंद न हो और इसका कोई भी कर्मचारी उस तरह न निकाला जाए जिस तरह उस दौरान 20-25 साल पुराने, जाने-माने पत्रकारों को निकाल कर सड़क पर खड़ा कर दिया गया। हमारी यह भी इच्छा रही है कि हिंदी के अखबार कम से कम भारतीय अंग्रेजी अखबारों की तुलना में तो कमतर न साबित हों और 'भारतीय रेल ल्हासा जाएगी' या 'पृथ्वी चंद्रमा के चारों ओर घूमती है' जैसी गलतियां न करें और करें भी तो कम से कम उसे सुधारने की शालीनता दिखाएं! हमारी घोषित नीति अच्छे अखबारों का ही समर्थन नहीं है बल्कि कर्मचारियों, विशेष कर पत्रकारों - जिसमें संपादक भी शामिल है - की नौकरी की सुरक्षा और काम करने की आजादी का भी समर्थन है, इसे पत्रिका के पुनप्र्रकाशन के पिछले 11 वर्ष के किसी भी अंक से देखा जा सकता है। इस दायरे में हम अखबारी संस्थानों की आलोचना और समर्थन, जरूरत के हिसाब से करते हैं। इस पर भी हम जनसत्ता का समर्थन विशेषकर दो कारणों से करते हैं। एक, इसका संपादक पेशेवर है यानी वह मालिकों के परिवार से नहीं है, उसके सर पर कोई ब्रांड मैनेजर नहीं है यानी वह स्वतंत्रता पूर्वक एक संपादक की तरह काम करता है। दूसरा, यह साहित्य, विशेषकर हिंदी और कलाओं को महत्व देता है।

उपरोक्त पैरे में ही थानवी ने लिखा है ''... मेरा ही इंटरव्यू प्रकाशित करेंगे (साथ में नोम चोम्स्की का!) और इज्जत बख्शेंगे।'' उनका इशारा समयांतर के फरवरी अंक की ओर है। मैं, पेचीदा ही सही, एक संपादक के रूप में कहना चाहता हूं कि जिस भी लेखक को हम, चाहे जिस भी रूप में हो, प्रकाशित करते हैं वह हमारे लिए सम्माननीय होता है। यानी इसमें अतिरिक्त सम्मान या अपमान जैसी कोई बात नहीं है। इसके अलावा पाठकों के प्रति अपने दायित्व को निभाते हुए मुझे समयांतर में किसी भी व्यक्ति को छापने में कभी कोई आपत्ति नहीं है। हमारी कोशिश रहती है कि उन लोगों को, जिनसे हम सहमत नहीं हैं या जो पत्रिका की घोषित नीति के खिलाफ हैं, जरूरत पड़ी तो छापने में कोताही न हो। यह उदारता नहीं कर्तव्य निर्वाह है। इसलिए मैं सविनय कहना चाहूंगा कि हमने ओम थानवी का साक्षात्कार यूं ही नहीं लिया - संबंध बनाने या बिगाडऩे के लिए - बल्कि एक योजना के तहत, मीडिया विशेषांक के लिए हिंदी के एक विशिष्ट अखबार का संपादक होने के नाते, लिया था। मैं यह भी रेखांकित करने की इजाजत चाहूंगा कि यह साक्षात्कार नोम चोम्स्की के बरक्स नहीं बल्कि श्रवण कुमार गर्ग और शीतला प्रसाद सिंह के साथ हिंदी की दैनिक पत्रकारिता के संदर्भ में था। यह महज इत्तफाक है कि उनका साक्षात्कार चोम्स्की और शीतला प्रसाद सिंह के बीच में छपा है।

यह सब कहने के बाद मेरे लिए यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि आखिर ओम थानवी ने अज्ञेय संबंधी विवाद में जनसत्ता को क्यों झोंक दिया? क्या अज्ञेय और जनसत्ता एक-दूसरे का पर्याय बन चुके हैं? समयांतर बनाम जनसत्ता विवाद में वह पहले ही स्वयं विस्तार से समयांतर में ही लिख चुके हैं। उनकी वकालत में हंस संपादक राजेन्द्र यादव भी उपस्थित थे। क्या ये दो अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं? क्या मात्र इसलिए कि अज्ञेय-भक्त ओम थानवी जनसत्ता के संपादक हैं इसलिए दोनों के अंतर को खत्म माना जाए? क्या किसी को अज्ञेय का, ओम थानवी की राय से अलग, मूल्यांकन करने का अधिकार नहीं है? आखिर ओम थानवी अज्ञेय को लेकर अपना आपा इस तरह क्यों खो बैठे कि दूसरों को 'कूढ़मगज' कहने तक पर उतर आए?

एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक के संपादक होने के नाते अगर वह समयांतर की बातों से सहमत नहीं थे तो, उनसे अपेक्षा थी कि वह अपने किसी रिपोर्टर को राष्ट्रीय अभिलेखागार भेजकर पता लगाते कि आखिर उस दौर के कागजात क्या कहते हैं? उनके पास संसाधनों की कमी नहीं है। पर दुर्भाग्य से उन्होंने अज्ञेय को लेकर जिस तरह की गैरजिम्मेदाराना मनोवृत्ति और भावुकता का प्रदर्शन किया वह गैरपेशेवराना तो है ही चकित करनेवाली भी है। थानवी लिखते हैं, ''उन्हें (यानी अज्ञेय को) जो लोग पढ़ते नहीं वे इला डालमिया को पढ़ बैठे हैं।'' खुद वह जो भी उद्धृत करते हैं वह आकाशवाणी के लिए रघुवीर सहाय और गोपाल दास द्वारा 1984 में किए गए लंबे साक्षात्कार से है। इस रेडियो जीवनी को प्रकाशन विभाग ने 1991-92 में छापा था। थानवी इस साक्षात्कार को परम सत्य मान कर चलते हैं। पर इला डालमिया ने 1998 में लिखे अपने लेख 'अज्ञेय की याद में' जो कहा है उसे लगभग यथावत अज्ञेय अपने बारे में पुस्तक में देखा जा सकता है। इस साक्षात्कार में अज्ञेय ने अपने बारे में कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं जो उनकी जीवनी, जिसके बारे में बहुत कम लिखा गया है, और मानसिकता को समझने के लिए महत्वपूर्ण साधन है।

पर स्वयं अज्ञेय इसमें कई बातें नहीं कहते या फिर अधूरी छोड़ देते हैं। यह सायास है या अनायास, कहा नहीं जा सकता। पर संदर्भ महत्वपूर्ण है। जैसे कि अज्ञेय यह नहीं बतलाते कि वह भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण जेल काटने के बाद सीधे आल इंडिया रेडियो में लगे थे तो कैसे लगे थे। यह बतलाती हैं इला डालमिया, '' जब वत्सल को जेल से छुट्टी मिली तो उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की चर्चा इतनी फैल गई थी कि कॉलेजवालों ने कॉलेज में दाखिला देने से इंकार कर दिया। पर जेल से छूटने पर उनको ऑल इंडिया रेडियो का एक पत्र मिला। वहां से काम का आमंत्रण था। पंजाब के इंटेलिजेंस ब्यूरो के मुखिया जेनकिंस की सिफारिश पर ऑल इंडिया (रेडियो) ने यह कदम उठाया था। जेनकिंस के मन में इस साहसी युवक की सच्चाई के चरित्र की छाप पड़ चुकी थी।...'' (देखें:'अज्ञेय की याद में' इला डालमिया, इला पृ. 122, राजकमल प्रकाशन )।

अज्ञेय इस गुप्तचर अधिकारी से कितना अभिभूत थे इसे इला डालमिया की इस बात से समझा जा सकता है, ''वत्सल (अज्ञेय) ने मुझसे कहा कि यही व्यक्ति, जेनकिंस हिंदुस्तानी होता तो क्या होता?''

अज्ञेय ने अपनी जीवनी नहीं लिखी। जीवनी के बारे में उनका यह कहना कम महत्वपूर्ण नहीं है कि ''...आत्मकथा लिखना कभी आसान नहीं होता, उपन्यास लिखना कम कठिन होता है।'' एक अन्य प्रश्र के जवाब में उन्होंने इसी पैरा में आगे कहा है, ''जिन लोगों ने मुझ से कहा उनमें ऐसे भी लोग थे जो कि ज्यादा लंबे समय तक इनके साथ रहे, जिनमें विमल प्रसाद भी एक हैं और दुर्गा भाभी यानी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी। उन्होंने कहलवाया था कि मैं क्यों नहीं लिखता हूं। तो मैंने उनसे पूछा कि 'आप क्यों नहीं लिखती हैं, आपका तो ज्ञान इसका मुझसे ज्यादा है, आपका अनुभव ज्यादा है। आप लिखें और तब कोई मुझसे पूछे तब मैं जो उत्तर दूंगा, उसकी स्थिति कुछ और होगी। और आप सब लोग चुप रहें और मैं लिखूं, तब तो उस पर विश्वास होने की संभावना कम होगी। इसलिए कि मैं ही सबसे ज्यादा वेध्य स्थिति में हूंगा इस मामले में।''

प्रश्न यह है कि आखिर अज्ञेय इन सारी बातों को लिखने से डरते क्यों थे? वह लेखक थे, न की दुर्गा भाभी। और लेखक भी कम प्रतिष्ठित नहीं थे। अगर लेखक का काम सच को सामने लाना नहीं है तो फिर क्या है? वह क्यों 'सेफ प्ले' करना चाहते थे क्या इसलिए कि जब दूसरे लिखें और कोई ऐसी बात हो जो उनके अनुकूल न हो तब ही वह बोलें अन्यथा चुप रहें? तथ्यों या कहना चाहिए सत्य के प्रति उनकी यह उदासीनता या अर्थ भरी चुप्पी, हैरान करनेवाली नहीं है? उपन्यास गल्प के माध्यम से सच का अनुसंधान है पर अगर कोई इसे सच को गल्प में बदलने के लिए इस्तेमाल करता है तो उसकी मंशा पर शंका करना नाजायज नहीं कहा जाएगा। आज कुल मिला कर स्थिति यह है कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी पर कोई भी आधिकारिक काम नहीं है। जिसकी मर्जी में जो आता है वह उस तरह से तथ्यों को व्याख्यायित करता है। इस संदर्भ में इस लेख के लेखक को भी अपवाद नहीं माना जा सकता।
'
'इला डालमिया के लेख से एक बात तो स्पष्ट है कि यह सारी जानकारी उन्हें अज्ञेय जी ने स्वयं दी होगी। क्या इससे साफ यह नहीं नजर आता कि जेनकिंस ने अज्ञेय को तोड़ लिया था अन्यथा रेडियो की ओर से उन्हें बुलाया जाना और फिर सीधे सेना में भर्ती करना, जहां वह तीन वर्ष रहे, अपने आप में अजूबा नहीं है? ये बातें मात्र अज्ञेय के संदर्भ में अकादमिक महत्व या रुचि की नहीं हैं बल्कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के बारे में और प्रकारांतर से स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी इतिहास को समझने के लिए भी लाभप्रद साबित होंगी। यह अपने आप में आश्चर्य की बात है कि अभी तक किसी भी शोधार्थी ने अज्ञेय के इस पक्ष की पड़ताल नहीं की है। मेरे विचार में कम से कम अब तो राष्ट्रीय अभिलेखागार में उस दौर के दस्तावेज अवलोकनार्थ उपलब्ध होंगे। उन्हें देख कर जेनकिंस की भूमिका और अज्ञेय के सेना में जाने के सारे संदर्भों को समझा जा सकता है। इसके अलावा यशपाल को लेकर जो शंकाएं हैं उन्हें भी स्पष्ट करने में मदद मिलेगी।'' (देखें: 'अज्ञेय छवि और प्रतिछवि', पंकज बिष्ट,समयांतर, जून, 2010)

अज्ञेय ने अपने सेना में जाने के प्रसंग को जिस तरह से 'कैमोफ्लाज' किया है उसका एक और उदाहरण। सेना में भर्ती होने के लिए उन्होंने स्वयं आवेदन किया था और यह आवेदन इस विश्वास पर किया था कि ''अगर भारत की सीमा पर संकट आता है या शत्रु के इसमें प्रवेश करने की संभावना होती है, तो मैं उसकी रक्षा के लिए लडऩा चाहूंगा...।'' सेना ने उनके आवेदन की जांच के लिए उस पत्र को सीआईडी को भेजा। ''...सीआईडी के जो तत्कालीन अधिकारी थे, जिन्होंने हमारे केस की भी पड़ताल की थी, उन्होंने उनको (सैनिक हाई कमांड को - सं.) यही जवाब दिया था - बाद में उन्होंने स्वयं मुझे बताया कि हमने यह जवाब दे दिया था - कि हमारी स्थिति (औपनिवेशिक सरकार की -सं.) बहुत बुरी है, लेकिन इतनी खराब नहीं है कि इस तरह का जोखिम मोल लिया जाए, ऐसे आदमी को सेना में बुलाने का।'' (अज्ञेय अपने बारे मे, पृ.130)

यह अधिकारी कौन था?

इला डालमिया ने अपने संस्मरण में इस प्रसंग को इस तरह लिखा है: ''कुछ बरस बाद वत्सल भारतीय सेना में शामिल होना चाहते थे, तो इन्हीं जेनकिंस ने वात्स्यायन के बारे में कहा था कि यह युवक चरित्रवान है विश्वसनीय है। पर साथ ही यह भी पूछा था कि क्या अंग्रेज सरकार की हालत इतनी बिगड़ गई है कि उसे अपने विद्रोहियों के सहयोग की जरूरत पड़ रही है। जेनकिंस ने यह बात वत्सल को भी बतला दी थी। इस बात के आधार पर उस समय भारतीय सेना में वत्सल को स्थान नहीं मिला था।''

इस पैरे से ठीक पहले पैरे में इला डालमिया ने लिखा है, ''... जेल से छूटने पर उनको ऑल इंडिया रेडियो का एक पत्र मिला। वहां से काम का आमंत्रण था। पंजाब के इंटेलिजेंस ब्यूरो के मुखिया जेनकिंस की सिफारिश पर ऑल इंडिया (रेडियो) ने यह कदम उठाया था।'' (देखें इला, पृष्ठ 122)

यह क्या कुछ असामान्य नहीं है कि अज्ञेय के साथ इस गुप्तचर अधिकारी के (''जिन्होंने हमारे केस की पड़ताल की थी'') संबंध लगातार बने रहे। वैसे जेल के दौरान मृत्युदंड की संभावना की तलवार का लगातार सर पर मंडराना एक बड़ा घटक नहीं रहा होगा जिसके चलते अज्ञेय ने आत्मकथात्मक उपन्यास शेखर एक जीवनी लिखना शुरू किया था? क्या यह कहना गलत होगा कि अज्ञेय अपनी चिंतन प्रणाली में यथा-स्थितिवादी पहले से थे ही इसलिए उन्हें बाद में भी बुर्जुआ चिंतन प्रणाली से तालमेल बैठाने में और उन मूल्यों के प्रति समर्पित होने में कठिनाई नहीं हुई।
इस साक्षात्कार से एक और बात भी उभरती है कि कई अंग्रेज अधिकारियों से अज्ञेय के इस दौरान संबंध थे जैसे कि कर्नल शौर्ट, जो सेना में जाने से पहले क्रिप्स (क्रिप्स मिशन वाले -सं.) का प्राइवेट सक्रेटरी था। (अंदाज लगाईये उसके महत्व का! उसे सीधे पीए से कर्नल बनाया गया।) यह संबंध कैसे बने इस बारे में इस साक्षात्कार में कुछ नहीं कहा गया है और न ही इला डालमिया ने कुछ लिखा है। अज्ञेय ने इस प्रसंग में जो कहा है वह कुछ इस प्रकार है। इस सीआईडी अधिकारी के मिलने के 15दिन बाद उन्हें एक फोन आया जो एक सैनिक अधिकारी का था। उसके अनुसार इस बार सेना में भर्ती करने के लिए अज्ञेय की सिफारिश एक नये ही अंग्रेज अधिकारी यानी शौर्ट ने की थी? क्या यह माना जा सकता है कि सैनिक हाई कमांड ने सीआईडी की रिपोर्ट को इतनी आसानी से दरकिनार कर दिया होगा? या फिर यह उसी गुप्तचर अधिकारी जेनकिंस का कमाल था जिसके लिए ''यह युवक चरित्रवान'' और ''विश्वसनीय'' था?

यहां इस बात पर भी बात होनी ही चाहिए कि आखिर अज्ञेय ने, जो उससे कुछ पहले तक ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता को सशस्त्र क्रांति के माध्यम से उखाड़ फें कना चाहते थे, उस सत्ता को भारत का रक्षक कैसे मान लिया? वैसे भी उस दौरान राजनेताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा था, गांधी जिसका नेतृत्व कर रहे थे (यानी मुख्यधारा की राजनीति),जो मानता था कि अंग्रेजों को पहले भारत से निकल जाना चाहिए फिर वह फासीवाद के खतरे के बारे में सोचेंगे। क्या यह अकारण था? ब्रिटेन उस समय दुनिया की सबसे बड़ी औपनिवेशिक ताकत था और भारत के सर पर सवार था। जापान तो उसके सामने पिद्दी था। इसलिए कांग्रेस का यह तर्क था कि अंग्रेज उन्हें विश्वास में लिए बगैर युद्ध में कूदे हैं इसलिए वे जानें उनका काम जाने। वैसे भी पहले विश्वयुद्ध के दौरान ब्रितानवी औपनिवेशिक सत्ता का समर्थन करने का गांधी और देश का अनुभव कोई बहुत पुराना नहीं था। उधर सुभाष बोस भी जर्मन और जापान के साथ थे ही, जिनका सम्मान आज भी बरकरार है। इससे भी बड़ी बात यह है कि अंग्रेज लड़ाई में अपना देश और साम्राज्य बचाने की मंशा से कूदे थे न कि भारत को जापानी आक्रमण से बचाने के लिए।

जहां तक कम्युनिस्टों का सवाल है उन की वैश्विक मामलों की समझ और निर्णय की अज्ञेय के निर्णय से तुलना नहीं हो सकती। वह गलत हो सकती है, उससे असहमति भी हो सकती है, पर उनके अपने तर्क तो थे ही। पहला, यह किसी एक व्यक्ति का निर्णय न हो कर पार्टी का और विश्वव्यापी स्तर पर कम्युनिस्टों का निर्णय था। दूसरा, उनके लिए फासीवाद को हराना वैचारिक प्रतिबद्धता के अलावा वैश्विक साम्यवादी एकता को बचाने के लिए भी जरूरी था। दुनिया के पहले साम्यवादी देश पर हमला हुआ था और इससे पूरे कम्युनिस्ट आंदोलन का अस्तित्व दांव पर था। सबसे बड़ी बात यह निर्णय पूरी तरह अत्यंत तात्कालिक और रणनीतिगत था। दूसरा महायुद्ध समाप्त होते-होते पश्चिमी पूंजीवादी-साम्राज्यवादी देश व दुनिया भर के कम्युनिस्ट पहले की तरह ही एक-दूसरे के दुश्मन हो गए थे। अगले लगभग पांच दशक पूंजीवादी देशों ने सिर्फ साम्यवादी व्यवस्थाओं को उखाडऩे में लगाए थे, जो आज भी,उतनी प्रचंड न हो, पर जारी है। अज्ञेय भी कम्युनिस्टों के खिलाफ चली इस मुहिम में, जो आर्थिक,सांस्कृतिक और सामरिक हर मोर्चे पर चली और आज भी चल रही है, निज की स्वायत्तता, इयत्ता तथा स्वतंत्रता जैसे मसलों को आधार बना कर, अंतिम क्षण तक शामिल रहे।

गोकि यशपाल को लेकर जो बातें कही जाती हैं उन का उल्लेख यहां गैरजरूरी है, इसके अलावा उनके खिलाफ लगे आरोपों का खंडन करने का भी हमारा कोई इरादा नहीं है। पर रह-रह कर अज्ञेय के संदर्भ में यशपाल को इरादतन सामने लाया जाता है, उन लोगों का मुंह बंद करने के लिए, जो अपनी मार्क्सवादी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। जनसत्ता संपादक द्वारा जापान में बैठे लक्ष्मीधर मालवीय को अपना प्रकाशित लेख ही नहीं भेजना बल्कि समयांतर के मार्च अंक में छपा अजय सिंह का लेख भी भेजना, विशेष आग्रह कर के लेख मंगवाना ( ''प्रिय थानवी जी, मेरी आपसे प्रत्यक्ष भेंट न कभी हुई, और न भविष्य में होने की आशंका है, फिर आप क्यों मुझे लाल चादर दिखलाने की तरह कुछ न कुछ छपे हुए चिरकुट भेज दिया करते हैं।'' 'विष कहां पाया', लक्ष्मीधर मालवीय, जनसत्ता, 3 अप्रैल) और उसके साथ अपनी ओर से एक पुराने पत्र की प्रति छापना, जिसके अनुसार यशपाल ने मुखबरी की थी, इसका उदाहरण है। यहां ओम थानवी से पूछा जा सकता है कि अगर यशपाल औपनिवेशिक सत्ता की पुलिस के इतना नजदीक और उपयोगी थे तो फिर पुलिस वालों ने यशपाल को स्थापित करने में उस तरह की मदद क्यों नहीं की जिस तरह की उन्होंने अज्ञेय की की थी। (''जेल से छूटने पर उनको ऑल इंडिया रेडियो का एक पत्र मिला। वहां से काम का आमंत्रण था। '') कैसे उन्हें जेल से छूटते ही सीधे ब्रिटिश रेडियो में ले लिया गया? ऐसा तो आज भी नहीं होता। क्या भारत सरकार शौकत गुरू को जेल से छूटते ही सीधे आकाश वाणी श्रीनगर में कश्मीरी युनिट में लगा सकती है?

दो बातें इस तथाकथित पत्र के बारे में भी। यह पत्र, जहां तक पढऩे में आ रहा है, मार्च, 1947 का है। यानी तब का जब अंग्रेजों का बोरिया-बिस्तर लगभग बंध चुका था। चार महीने बाद अगस्त में तो वे चले ही गए। ऐसे में वह कौन अधिकारी रहा होगा जो एक ऐसे आंदोलन के मुखबिर को संभालने की बात कर रहा था, जो कब का खत्म हो चुका था? क्या ये पुलिस अधिकारी निपट मूर्ख थे या फिर आजाद भारत की सरकार को कम्युनिस्टों से बचाना चाहते थे या स्वयं भारत सरकार की सेवा करना चाहते थे?

अज्ञेय ने अपने साक्षात्कार में यशपाल प्रसंग पर कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। जैसे उन्होंने कहा है कि यशपाल को इसलिए हटा देने का फैसला लिया गया था क्योंकि वह पार्टी की उस लाइन से सहमत नहीं थे जिसके अंतर्गत भगत सिंह व उनके साथियों को जेल से झुड़वाने की कार्रवाही का प्रस्ताव था। इसी के चलते उनके साथ मतभेद बढ़े और उन पर कई तरह के शक किए जाने लगे। (देखें उद्धरण) पर चूंकि किसी साथी से यशपाल को पता चल गया की उन्हें 'लिक्विडेट' कर दिए जाने का आदेश है तो वह भाग निकले। खैर इस पर हुआ यह कि अंतत: उन्हें एक ऐसे राज्य सिंध का कमांडर इन चीफ बना दिया गया जहां पार्टी का कोई असर ही नहीं था। इस तरह उन्हें मुख्यधारा से अलग कर दिया गया और संगठन के लोगों से संबंध न रखने के आदेश दे दिए गए। सवाल है ऐसे में यशपाल पार्टी की केंद्रीय कमेटी में कैसे हो सकते हैं और उन्हें महत्वपूर्ण गतिविधियों की जानकारी कहां तक रही होगी? अगर नहीं रही होगी तो क्या उन्हें कोई और सूचित करता रहा होगा?

एक बात जरूर लगती है कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी का संगठन न तो कोई बहुत व्यापक था,न ही उसमें कोई बहुत समन्वय था। पूरा संगठन कुछ युवाओं के देश को जल्दी से जल्दी आजाद कराने की उत्कट इच्छाओं और गुलामी से मुक्त होने के आवेश से प्रेरित था। इसका कोई विचारधारात्मक मजबूत आधार भी नहीं था। यही कारण है कि आपसी असहमतियां और अहं के टकराव अक्सर ही पैदा होते रहे। स्वयं अज्ञेय एक छोटे गुट के साथ इस में शामिल हुए थे। यह बातें उनके साक्षात्कार से स्पष्ट हो जाती हैं। एक जगह उन्होंने कहा है, ''...अभी ऐसा लिखकर प्रकाशित करने का एक परिणाम यह भी होगा कि जो पाठक वर्ग है वह कहेगा कि जिन लोगों को हम आदर्श पुरुष मानते रहे, ये सब लोग ऐसे ही थे। आपस में भी इस तरह लड़ते थे, कोई किसी का सम्मान नहीं करता, किसी को किसी पर विश्वास नहीं और इस लपेटे में ऐसे लोग भी आ जाएंगे जिनकी अभी तक प्रतिष्ठा बनी हुई है,उदाहरण के लिए चंद्रशेखर आजाद या भगत सिंह वगैरह।''

पर अज्ञेय ने यशपाल पर निशाना साधने में कसर नहीं छोड़ी। वह यशपाल के लेखन पर तो छींटाकशी करते ही हैं, दिनमान के दौरान उन्होंने वैशंपायन और धर्मेंद्र गौड़ के इस आशय के लेख छापे थे पर जब यशपाल ने उन्हें कानूनी कार्रवाही की धमकी दी तो उन्हें यशपाल का पक्ष भी यथावत छाप कर विवाद को बंद करना पड़ा था। यही नहीं अपने साक्षात्कार में भी वह चंद्रशेखर के मारे जाने के प्रसंग में सुखदेव राज का नाम तो लेते हैं पर यशपाल का नाम लेने से बचते हैं इसलिए कि तब तक प्रकाशवती जीवित थीं और उन्हें डर था कि उन पर मुकदमा कर दिया जाएगा। वैसे प्रकाशवती भी दल में शामिल थीं और कई बातें जानती थीं। पर बेचारे सुखदेव राज से उन्हें कोई डर नहीं था। अंत में अज्ञेय ने यह भी जोड़ दिया है, ''...ये सब बातें उस समय भी ऐसी स्थिति में थीं कि कोई अंतिम रूप से प्रमाणित उन्हें नहीं किया जा सकता, संदेह के लिए गुंजाइश बनी रहती, अब भी वैसा ही है। ''

अज्ञेय यशपाल पर क्यों रह-रह कर निशाना साधते हैं, दूसरे के कंधे की बंदूक से, यह अपने आप में विचारणीय है। उनमें स्वयं इतनी हिम्मत नजर नहीं आती कि सच बात कहते। वह साफ तौर पर इस बात को लेकर सजग हैं कि अगर वह कोई ऐसी-वैसी बात कह देते हैं तो उन पर आक्रमण होंगे और जवाब देना भारी पड़ जाएगा। तो क्या यह मात्र उन दोनों - अज्ञेय और यशपाल - के बीच लेखक और उस पर उपन्यासकार होने की आपसी ईष्र्या और प्रतिद्वंद्विता के कारण था, या फिर स्वयं अज्ञेय पर दक्षिणपंथी होने के कम्युनिस्टों के आरोपों और आक्रमण के गुस्से के कारण?

जारी...................