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गुरुवार, 22 सितंबर 2011

इस नई किताब का स्वागत करें...


जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष गाताड़े की किताब 'गोडसेज चिल्ड्रेन - हिंदुत्वा टेरर इन इंडिया' फेरास से प्रकाशित हुई है. हम सब पिछले दो दशकों से सुभाष को साम्प्रदायिकता और ब्राह्मणवाद के खिलाफ लगातार लिखने और लड़ने वाले लेखक के रूप में जानते हैं. जनपक्ष पर भी उन्होंने लगातार कई मुद्दों पर लिखा है. 

देश में हिन्दुत्ववादी शक्तियों के आतंकी इरादों की झलक ब्राह्मणवादी-कारपोरेट मीडिया की नजरअंदाजी और कई सरकारों की मिली भगत के बावजूद अब सतह से ऊपर दिखने लगी है. सुभाष की यह किताब उसी का एक गहन उत्खनन करती है और बताती है कि किस तरह अपनी शुरुआत से ही आर एस एस समाजसेवा की आड़ में धार्मिक राष्ट्रवाद के नाम पर हिटलर की तर्ज़ पर 'मनु स्मृति' आधारित एक 'हिन्दू राष्ट्र' की स्थापना का प्रयास कर रहा है. अपने समय में गाँधी से लेकर अम्बेडकर तक ने इसकी पहचान की थी. गाँधी के आर एस एस के बारे में विचार यहाँ पढ़े जा सकते हैं.

किताब मात्र २७० रुपये में यहाँ उपलब्ध है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्दी ही इसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध होगा. जनपक्ष की ओर से साथी सुभाष को बधाई और बिरादराना सलाम.

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

मनोज रूपड़ा का कहानी संकलन - एक समीक्षा

 
(हमारे समय के विशिष्ट कथाकार मनोज रूपड़ा का कहानी संकलन 'टावर आफ साइलेंस' प्रतिलिपि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. इस अद्भुत संकलन की एक समीक्षा जो अभी कथन के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुई है.)

अपने समय की शिनाख्त करती कहानियाँ
·
       मनोज रूपड़ा हिन्दी के साहित्यजगत में अपनी तरह के कहानीकार हैं. बालीवुड से शब्द उधार लेकर कहूँ तो बिलकुल ‘हटके’. उनकी कहानियां न तो हिन्दी के चालू मुहावरे में कलावादी शिल्पकारी से निर्मित होती हैं और न ही कथ्य की सपाट प्रस्तुति से. सधी हुई संप्रेषणीय भाषा और बेहद कसे हुए महीन शिल्प के सहारे वह विषय के इर्द-गिर्द एक तनाव भरा वितान रचते हैं जो आपको न केवल अंतिम पन्ने तक बाँधे रखता है बल्कि उनके साथ अपने समय और समाज की यात्रा कराते हुए उस पूरी विडंबना से रु ब रु कराता है जिसने मनोज से कहानियाँ लिखवाई हैं. प्रतिलिपि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनके कहानी संग्रह ‘टावर आफ द साइलेंस’ में संकलित इन तीन कहानियों में नव उदारवादी समय में मनुष्य के सामने खडी चुनौतियाँ अपने तमाम आयामों के साथ उपस्थित हैं. अतीत और भविष्य के बीच उलझा संकटग्रस्त समाज है, बाज़ार के कामन सेन्स से कदम मिला पाने में नाकामयाब यथार्थ और आभासी जगत के बीच झूलता इंसान हैं और बाज़ार की सत्ता के आगे विवश और अवश समय है. देखा जाय तो बाज़ार इन तीनों कहानियों के केन्द्र में है, लेकिन ये कहानियाँ उसका एकरस या एकांगी प्रतिपक्ष ही प्रस्तुत नहीं करतीं बल्कि समकालीन समाज में उसके हस्तक्षेप को बड़े कौशल और आत्मविश्वास से रेशा-रेशा उभरती हैं. किसी कुशल सर्जन की तरह उसकी चीरफाड़ करती हैं और पाठक के सामने उस नग्न सत्य को पेश कर देती हैं जिससे रोज दो-चार होते हुए भी अंजान बने रहने की कोशिश में लोग लगातार इसके शिकार होते चले जा रहे हैं. यह मनोज का कौशल ही है कि अरुंधती राय, मेधा पाटेकर, वरवर राव और ग़दर जैसे वास्तविक चरित्र कहानी के पात्र बन जाते हैं और उसे पढते हुए आपको लगता ही नहीं कि कहानी से बाहर की कोई चीज़ है. नोम चाम्सकी से लेकर इन भारतीय चरित्रों को वह कहानी में ऐसे पिरोते हैं कि अपनी पक्षधरता और वैचारिक अवस्थिति के बारे में अलग से कुछ कहे बिना वह प्रतिरोध की धारा के साथ संबद्ध हो जाते हैं. यह महीन मार और चरित्रों की विश्वसनीयता मनोज की कहानियों की सबसे बड़ी ताकत है.

संकलन की पहली कहानी ‘टावर आफ सायलेंस’ का प्रमुख पात्र है टेम्पटन दस्तूर. टेम्पटन और उनके पिता रोमिंगटन दस्तूर के बहाने यह कहानी एक तरफ पारसी समाज की अंतर्कथा को उद्घाटित करती है तो दूसरी तरफ इसी के सामानांतर एक बंद हो चुकी मिल के बहाने नब्बे के दशक में नई आर्थिक नीतियों के नाम पर इस देश में लागू हुई नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के बहुआयामी दुष्प्रभावों को भी रेशा-रेशा खोलती जाती है. कहानी के शुरू में जिस तरह से पारसी घरों के बारे में लिखते हुए वह कहते हैं ‘ उन बरसों पुरानी पत्थर की इमारतों में लगभग सभी घरों में एक जैसे लकड़ी के जीने, एक जैसी शीशम की रेलिंग और एक सामान बड़ी-बड़ी बरोठेदार खिडकियाँ थीं और उन खिडकियों में से हर वक़्त कुछ बूढ़े झांकते हुए दिखाई देते. इतने स्थिर और शांत मानो उन्हें खिड़की के साथ ही मढ दिया गया हो....आपाधापी, उलझी हुई किचकिच, मचलती हुई महात्वाकांक्षाओं और अति व्यस्तता से लथपथ शहर से वे उतने ही तटस्थ थे, जितना शहर उनकी स्टिल इमेज से’ और फिर उन घरों में रखी ऎसी चीजों के बारे में विस्तार से बताते हैं ‘जिनकी उम्र उनसे कई गुना बड़ी थी’ तो दोनों मिलकर एक अजीब सी विडम्बना रचते हैं और उनके बीच टेम्पटन का यह सवाल कि ‘उपभोक्ता चीजों की बाढ और यूज एंड थ्रो के तेज प्रवाह में ये सब पुरानी चीजें और पुरानी जीवन शैलियाँ और उनका अंतर्मुखी समुदाय अभी तक डूबने से कैसे बचा हुआ है’...पूरी कहानी को एक महाकाव्यात्मक बिम्ब प्रदान करता है. रोमिंगटन का अपने किशोर बेटे को पारसी समुदाय के बारे में बताना और फिर अंत में टावर आफ सायलेन्स (दख्मे) तक ले जाना और फिर उसके ठीक बाद अपनी बंद हो चुकी इम्प्रेस मिल को लौट जाना एक अजीब सी व्यंजना रचता है. उस बंद हो चुकी मिल के पास से जब टेम्पटन उन्हें ढूंढ कर लाते हैं और वापस जाने को कहते हैं तब उनके पिता का यह जवाब ‘...मैं उस भट्ठी को बुझने नहीं दूंगा’...पारसी समुदाय की पवित्र अग्नि के विश्वास से मिलजुलकर मनुष्य की अदम्य जीजिविषा का एक नया पाठ रचता है. यह सवाल कि ‘मशीनें जब चलन से बाहर हो जाती हैं तो उनके कल-पुर्जे अलग कर दिए जाते हैं, उन्हें तपाकर गलाया जा सकता है. और कोई दूसरा रूप भी दिया जा सकता है. लेकिन मनुष्य और उसका जीवन?’ इस कहानी का मूल स्वर है. उस मिल के बंद होने के बहाने मनोज ने एक पूरे आर्थिक व्यवस्था के बदलाव के क्रम में उससे जुड़े मनुष्यों के जीवन पर पडने वाले प्रभाव की गहरी पडताल की है. शेयर मार्केट की उड़ान और तेंदुलकर के कीर्तिमान के बीच वह चिमनी के मलबे में ‘ईंट और चूने के पलस्तर के साथ एक मानव शरीर के कंकाल को भी देख पाते हैं.

इस कहानी में एक और प्रमुख पात्र हैं रोमिंगटन की प्रौढ़ अविवाहित बहन हक्कू फई. हक्कू फई का चरित्र जिस आत्मीयता और मस्ती के साथ मनोज ने गढा है, वह इस कहानी को एक और आयाम देता है. दो जुडवा भाइयों के साथ प्रेम करने वाली दबंग हक्कू फई का रेमिंगटन की मृत्यु के बाद हमेशा के लिए चुप हो जाना और उसके साथ यह कि ‘उन सबके वापस मुंबई लौटने के बाद मिल के भग्नावशेषों के बीच खडी उस अकेली और उदास चिमनी के ऊपर कुछ दिनों कौए मँडराते रहे. फिर सबकुछ शांत हो गया’...एक कविता सी गहरी और उदासी भारी अभिव्यंजना रचता है.

संकलन की दूसरी कहानी ‘दूसरा जीवन’ एक ऐसे आदर्शवादी नाकाम प्रोफेशनल की कहानी है जो यथार्थ से तालमेल न बिठा पाने के कारण एक आभासी दुनिया में सुख तलाशता है. वह आभासी दुनिया जहाँ ‘ पतन और विनाश को कोई नहीं पहचानता और वर्जनाओं का प्रवेश भी वर्जित है...रिश्ते इतने तरल और पारदर्शी हैं कि उन्हें परिभाषित भी नहीं किया जा सकता....निरर्थकता और विसंगति को कोई जगह नहीं मिलाती क्योंकि गहन से गहनतर कामनाओं को भी स्वर मिल जाते हैं...इस अनूठे संसार में अगर कोई कमी है, तो सिर्फ सच की’ लेकिन लैपटाप और इंटरनेट से निकली इस ‘सेकण्ड लाइफ’ में भी यथार्थ घुस ही आता है और वह उसकी इस आभासी दुनिया की शान्ति और संतोष को भंग कर देता है. कहानी का नायक (?) अपने लिए जो शीर्षक तय करता है वह है ‘महाविकास के थपेडों में भटकता अकेलापन’! सेकण्ड लाइफ की वेबसाईट में भटकते इस अकेलेपन को जो वर्चुअल दुनिया मिलती है उसमें एक ‘मदर यूनिवर्स’ है जिसके गर्भ में संयुक्त राज्य के योजना विभाग के मुख्य सलाहकार मोजेज के बच्चे हैं...चार सौ यहूदी बच्चों के लिए थियेटर चलाने वाले एक चेकोस्लोवाई कामेडियन के, एक नीग्रो पायलट के , एक अफगानी शायर के जिसने तालिबानियों के हवस की शिकार बनाई गई लडकियों के लिए एक गैर धार्मिक मदरसा खोल रखा है और अनेक न्यायधीशों, प्रोफेसरों, वैज्ञानिकों आदि के बच्चे हैं. मदर यूनिवर्स सिर्फ उन्हें पैदा करती है जो मार दिए गए, जिनके साथ अन्याय हुआ. वह बताती है कि ‘मृत्यु एक समतावादी तथ्य नहीं है. मरने के बाद भी असमानता पीछा नहीं छोडती. हर मौत में एक गुणात्मक अंतर होता है. कौन मरा और किसने मारा यह जानना बहुत ज़रूरी है.’ वह उस युवा के बच्चों की माँ बनने से इंकार कर देती है क्योंकि ‘उसके पास कोई विजन नहीं है’...उसे लेफ्टिस्ट कार्नर में ‘कार्ल मार्क्स की समाधि के पास बच्चों को जन्म देना है’! नौकरी से निकाला गया वह युवा इस वर्चुअल दुनिया में सेज के खिलाफ एक एंटी इकानामिक जोन बना लेना चाहता है. वह दुनिया भर के छापामारों को पैदा करना चाहता है लेकिन जब वह अपने इस विजन के साथ मदर यूनिवर्स से संपर्क करता है तो वह कहती है ‘तुम पहले प्यार करना सीखो और फिर अपने आप तुम्हें सब मिल जाएगा जो तुम चाहते हो’...बिना आंच के रोटी नहीं पकती और बिना ऊष्मा के जीवन...तुम्हें अपने हर काम को एक धडकती हुई गर्मजोशी के साथ संपन्न करना चाहिए’... इसे पढते हुए चे ग्वेरा के इस कथन की याद आना स्वाभाविक ही है कि ‘हर क्रांतिकारी प्रेम की तीव्र भावना से संचालित होता है। ऐसे सच्चे क्रांतिकारी की कल्पना करना असंभव है जिसमें इस गुण का अभाव हो। किसी नेतृत्वकर्ता के सामने सबसे बडी चुनौती यही होती है कि उसे उत्साहसिक्त भावनाओं को शांत मष्तिष्क के साथ संयोजित करना होता है और चूके बिना सही निर्णय लेने होते हैं।‘

इसके समानांतर उसका यथार्थ है जहाँ उसके साथ उसे बेइंतिहा प्रेम करने वाली उसकी लिव इन रीना है...काम के प्रति उसकी जिद और समर्पण को अपने हित में उपयोग करता बाज़ार है और उसकी असफलताएं हैं. लैंड सर्वे की उसकी सारी मेहनत जब किसानों के जमीनों के कब्ज़े में काम आती है तो उसका आदर्शवादी मन विद्रोह करता है और नतीजा उसकी अपनी बेदखली. यथार्थ और आभासी जगत के इस द्वंद्व में उसे प्रेम और सर्जना के लिए आवश्यक उष्मा यथार्थ से ही मिलती है, लेकिन उस उष्मा को झेल पाने भर की कुव्वत उसमें नहीं. इस कहानी की व्यंजना बहुत दूर तक जाती है.

संकलन की तीसरी कहानी ‘रद्दोबदल’ एक तरह की फैंटेसी की शैली में लिखी गयी है. इस फैंटेसी में मनुष्य तथा राष्ट्र के पूरे अस्तित्व पर कब्ज़ा जमाते जा रहे बाज़ार की तमाम तरतीब ओ तरकीब पर मनोज पूरे ब्यौरे के साथ नज़र डालते हैं. वह देख पाते हैं कि जहाँ एक और मुल्क में सब कुछ सामान्य था वहीं ‘ इस खामोशी, खैरियत और इत्मीनान की ऊपरी परतों के नीचे एक अनजानी सी बदशागुनी चक्कर काट रही थी और चारों तरफ कुछ ऎसी बद्सरिश्त कारगुजारियाँ चल रही थीं, जो पहले कभी देखने में नहीं आई थीं...इनसे ‘ ऊंचे और निचले तबके को कोई खास फर्क महसूस नहीं हुआ लेकिन बीच वाले बेहद परेशान हो उठे क्योंकि वे ऎसी कारगुजारियाँ थीं, जिसका कोई आभासी चेहरा न था’.

लेकिन इनमें बारी-बारी से सबको आना था. तो इकरारनामों और चेकबुकों पर निचले तबके से लेकर ऊपरी तबकों और अफसरों के साथ प्राइवेट कंपनियों के मुलाजिमों से दुकानदारों तक सबको दस्तखत करने ही थे. बाज़ार हर किसी को अपनी गिरफ्त में लेता जाता है. जो आसानी से नहीं मानता उसे जबरदस्ती. चाहे वह कोई अखबारनवीस हो या शायर. वैसे भी उसे शायरी की कोई ज़रूरत नहीं. वह सारे समाज को अपने हिसाब से ढाल लेता है. सारी परम्पराएं, स्थानीयताएं और सामूहिकताएं उसकी शिकार होती हैं और वह विविधता को एक कास्मेटिक एकता में तबदील कर देता है अपने उत्पादों के सहारे. कोई ईश्वर उस बाज़ार के बिलौटे से अधिक मज़बूत नहीं. वह शहर से गाँव तक बेरोकटोक अपना अभियान चलाता है और विरोध की हर आवाज़ को कुचल देता है.

इस फैंटेसी के माध्यम से मनोज ने जिस कुशलता से इस कहानी को गढा है वह रोंगटे खड़ा कर देने वाला है. इसे पढ़ते हुए यह सब हमारे इर्द-गिर्द घटता हुआ दिखाई देता है. श्रीमती लिबर्टी की देख रेख में दुनिया भर में बाज़ार का अश्वमेध, विरोध के महत्वपूर्ण स्वरों को खत्म करने के लिए उनकी हत्या की जगह उन्हें इतनी ऊँचाई पर पहुंचा देना की उनका अपने जन से कोई जुड़ाव ही न रह जाए और सारे समाज से उसकी स्मृतियाँ और परम्पराएं छीनकर उसे एक उपभोक्ता मात्र में तबदील कर देना क्या सच में हमारे सामने रोज ब रोज नहीं घट रहा? और यह सब पूरी जम्हूरियत सर झुकाए देख रही है क्योंकि ‘अवाम को भी पेप्सी, कोक या पेस्ट्री या बर्गर में कोई ऎसी दवा दी गयी थी जो हर चीज़ को चुपचाप सह लेने की क्षमता बढ़ा देती है’.

इस कहानी में शायर का उस खाली जगह से मुखातिब होकर, जहाँ कभी उसकी किताबें और लिखने-पढने की मेज हुआ करती थी, यह कहना कि ‘यह दुनिया चाहे कितनी भी क्यूँ न बदल जाए मैं दुनिया को टूटे आइनों के टुकड़ों में बने अक्सों की शक्ल में पेश करने को मज़बूर हूँ. बेशक कुछ टुकड़े लाजिमी तौर पर गायब हो जायेंगे और मुझे उन गायब हो चुके अक्सों के तसव्वुर को ज़िंदा रखना होगा क्योंकि मेरा यह फ़र्ज़ है कि मैं इस बदली हुई दुनिया पर अपना ख़्वाब लादता रहूँ और इस गडबडाए हुए करिश्मे को अपने ख़्वाबों ख्यालों से नई तर्ज़ दूं और बहुत बेमानी उम्मीद के साथ एक पुरानी कहावत को दुहराता रहूँ कि ढहना तमाम तानाशाहियों की फितरत में है जैसे बढ़ना एक नामुराद बेल की और खिलना एक नामुराद फूल की किस्मत में है’... इस अँधेरे समय में साहित्य की पूरी भूमिका को रेखांकित करता है.

रस्म तो किसी न किसी तरीके से किताब में से कुछ दोष निकाल लेने की ही है, और तुल ही जाएँ तो यह ऐसा मुश्किल काम भी नहीं. लेकिन मैं इस रस्म की निबाह की जगह आपसे इस किताब को बड़े धैर्य और आत्मीयता से पढने की सलाह देना बेहतर समझता हूँ. मनोज रूपड़ा का यह संकलन हमारे समय का एक बेहद विश्वसनीय दस्तावेज़ है और आने वाले समय की तैयारी के लिए एक महत्वपूर्ण औज़ार.


शनिवार, 18 सितंबर 2010

एक नई किताब…जैसे पेड़ पर एक नई कोंपल

एक नई किताब का आना पेड़ पर एक नई कोंपल के आने जैसा लगता है मुझे…संभावनाओं की सूचना देती एक नई चीज़…अब वह कोंपल एक नई शाखा बन पेड़ को नवजीवन देगी या वक़्त की मार के आगे कुम्हला जायेगी यह तो उसकी ताक़त के साथ-साथ कई दूसरी चीज़ों पर भी निर्भर है। अभि दो दिन पहले डाक से देवास के भाई बहादुर पटेल का पहला काव्य संकलन 'बूंदों के बीच प्यास' मिला। बहादुर से परिचय पुराना है और उनकी कविताओं से भी…लेकिन उन्हें एक साथ इतने सुन्दर धज में देखना बहुत अच्छा लगा। किताब का फ्लैप भाई एकान्त श्रीवास्तव ने लिखा है और प्रकाशित किया है बया प्रकाशन वाले भाई गौरीनाथ जी ने। आप अगर पढ़ना चाहें तो antika56@gmail.com पर उनसे मेल संपर्क कर सकते हैं। यहां प्रस्तुत हैं इसी संकलन से कुछ कवितायें…



दृश्य


मैंने पेड़ को देखा
मैं पेड़ की तरह हरा हो गया
पास से बह रही नदी को देखा
मैं बहने लगा नदी के साथ
हवा ने मुझे छुआ
मंै हवा के साथ उड़ने लगा असमान में
मंैने असमान को देखा
मेरे भीतर भी था एक आसमान
मैंने सुबह को देखा
ताज़ा हो गया
मैंने हर उस चीज को देखा
जो मुझे मिली थी विरासत में
या उससे भी पहले

देखता हूं आज के दृश्य
दृश्य में विद्यमान बहुत सी चीजें
पुराने दृश्यों से मिलती जुलती

कुछ चीजें ऐसी हैं कि
आज के समय को करती हैं अलग
यह दृश्यों को विचारों के साथ देखना है।



पिता की मृत्यु पर बेटी का रुदन
(जब भी कोई मरता है, सबसे पहले दिये गये दुःख फैलते हैं आसपास)


आप पेड़ थे और छांव नहीं थी मेरे जीवन में
पत्ते की तरह गिरी आपकी देह से पीलापन लिये
देखो झांककर मेरी आत्मा का रंग हो गया है गहरा नीला
कभी पलटकर देखा नहीं आपने
नहीं किया याद
आप मुझसे लड़ते रहे समाज से लड़ने के बजाय
मैं धरती के किनारे खड़ी क्या कहती आपसे
धकेल दी गई मैं, ऐसी जगह गिरी
जहां मां की कोख जितनी जगह भी नहीं मिली

आप थे इस दुनिया में
तब भी मेरे लिए नहीं थी धरती
और मां से धरती होने का हक छीन लिया गया है कब से
छटपटा रही थी हवा में
देह की खोह में सन्नाटा रौंद रहा था मुझे
और अपनी मिट्टी किसे कहूं , किसे देश
कोई नहीं आया था मुझे थामने

जीवन इतना जटिल
कितने छिलके निकालेंगे दुःखों के
उसके बाद सुख का क्या भरोसा
कौन से छिलके की परत कब आंसुओं में डुबो दे
हमारी सिसकियों से अपने ही कान के पर्दे फट जायें
हृदय का पारा कब नाभि में उतर आये

प्रेम दुश्मन है सबका
मौत आपकी नहीं मेरी हुई है
हुई है तमाम स्त्रियों की
यह आपकी बेटी विलाप कर रही है निर्जीव देह पर

चीत्कार पहुंच रही है ब्रह्मांड में
जहां पहले से मौजूद है कई बेटियों का हाहाकार
और कोई सुन नहीं पा रहा है.



समय मेरी गिरफ़्त से बाहर था

दिन के कुछ टुकडे़ लेकर निकला
खर्चता रहा उन्हें
वे टुकडे़ जुड़ते गये
कम होते गये जीवन से
और समय हाथ से जाता रहा

जुड़ता रहा उम्र में
खर्च किया समय पूंजी की तरह
जुड़ता रहा सफलता, असफलता के रूप में

समय कभी -कभी तो
पानी की तरह बहाए पैसों सा
बह गया मेरे पास से
सीने में फेफड़ों को कुचलता हुआ समय
चमड़ी को खींचता
लटकाता चला गया

समय चिपका रहा चुम्बकीय ध्रुवों-सा
मैं ज्यों पास गया वह छिटक कर दूर होता गया

समय का बढ़ना एक तरह से घटना है
और घटना बढ़ना
समय कमर की तरह झुकता रहा
कोई लाठी रोक नहीं पायी

कुछ टुकड़े बचाकर जेब में रखना चाहे
अपने बुढ़ापे के लिए
मैं उन्हें सिक्कों की तरह
खनकते हुए सुनना चाहता था
वे शरीर के फटे हिस्से से
गिरते गये एक-एक कर
मैं जीता रहा उनके
अपने पास होने के मुगालते में
समय मेरी गिरफ़्त से बाहर था



परिचय
बहादुर पटेल
जन्म- 17 सितंबर, 1968 को लोहार पीपल्या गांव (देवास , मध्य प्रदेश में)
शिक्षा- एम ए (हिंदी) में
संपर्क- 12-13 मार्तंडबाग़, ताराणी कालोनी, देवास - 455001
ई-मेल- bahadur.patel@gmail.com

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

वेरा निकोलाई की कैद से निकल भागी है...

(प्रतिभा कटियार का यह आलेख एक ब्लाग पर अपने संक्षिप्त रूप में प्रकाशित हुआ था। तब भी इसने मुझे गहरे प्रभावित किया था और अब जब उन्होंने इसे मुझे अपने मूल रूप में भेजा तो जनपक्ष के पाठकों से शेयर करने का लोभ कैसे संवरित होता। असल में यह लेख निकोलाई चेर्निशेव्य्स्की के प्रसिद्ध उपन्यास 'क्या करें' की नायिका वेरा के बहाने न केवल स्त्री की मुक्ति के आख्यान में सकारात्मक हस्तक्षेप करता है अपितु कुछ साल पहले आये आलोक श्रीवास्तव के कविता संग्रह 'वेरा उन सपनों की कथा कहो' के रास्ते उसकी समकालीन व्याख्या भी करता है। न तो आप इसे समीक्षा कहकर टाल सकते हैं न किसी विमर्श का ठप्पा लगाकर ख़ारिज़ कर सकते हैं)

वेरा अब समय, काल, इतिहास की कैद से मुक्त हो चुकी है. वेरा निकोलाई की कैद से निकल भागी है. निकोलाई चेर्नीवेश्की जिसने उसे अपने उपन्यास की नायिका बनाया. हालांकि वेरा निकोलाई के भी साधे सधी नहीं. वो उपन्यासकार को अपने ही इशारों पर नचाती रही, जबकि जिंदगी उसे. बहरहाल, वेरा उस काल खंड को पार कर, देशकाल को पार कर पूरी दुनिया में विचरण कर रही है. दिल्ली, मुंबई की सड़कों पर वेरा भागती-फिरती है. कहीं टैक्सी पकड़ती कहीं, सिटी बस तो कहीं मेट्रो ट्रेन. 8 फरवरी 1863 को एक बंद लिफाफे से शुरू हुई वेरा की दास्तां यूं तो निकोलाई के उपन्यास में सिमट गयी लेकिन उसके सपनों का विस्तार किन्हीं भी पन्नों में सिमटने वाला नहीं था. वेरा ने अपनी पहचान का सपना देखा. खुद को महसूस किया. अपने भीतर के आंदोलन को समझा. व्यैक्तिक स्वतंत्रता, समानता के अर्थ उसके लिए बड़े थे. तब भी जब उसने अपने लिए मुट्ठी भर अस्तित्व भी नहीं गढ़ा था. गरीबी, कुंठा, निराशा से भरे बचपन में भी उसकी आंखों में मुक्त व्यक्तित्व का सपना लगातार पलता रहा. उसने वक्त आने पर गलत का पुरजोर विरोध किया.
वेरा को पढ़ते हुए महसूस होता है एक चेतन व्यक्तित्व का होना क्या होता है. हिम्मत क्या होती है और सपनों का अर्थ क्या होता है. प्रेम क्या होता है, संघर्ष क्या होता है. नैतिकता, परंपरा, वर्जना जैसे शब्द वेरा के विराट व्यक्तित्व के आगे बेहद बौने नजर आते हैं. वेरा हर बंधन से आजाद स्त्री मुक्ति का सपना है. वेरा प्रेम का विस्तार है. प्रेम की नई, खुली हुई परिभाषाओं का निर्माण करती वह स्त्री युगों-युगों तक के लिए स्त्रियों को संदेश देती है कि खुद को समझो. अपना समय, अपना देश और अपना मन सबका कितना महत्व है. विवाह का अर्थ उसके लिए व्यक्तित्व का विकास है न कि बंधन. प्रेम को समझने के प्रयास में वेरा यह नि:संकोच मानती है कि किसी की मदद, सहयोग, पारस्परिक समझ, सहानुभूति, मित्रता का मिलाजुला रूप, जिसे हम प्रेम समझ लेते हैं असल में वह पे्रम नहीं होता. प्रेम तो इन सारे तत्वों से बहुत दूर कहीं होता है. तारों की छांव में...दूर तक फैले सरसों के खेतों में...अमराइयों में...बच्चों की खिलखिलाहट में. किसी की एक बूंद आवाज में भी हो सकता है प्रेम. किसी के तिरस्कार में भी. किसी की जिद में, किसी से हार में. वेरा वेदना के तंतुओं से गुंथी है लेकिन फिर भी सुख में,जीवन में, उसकी अटूट आस्था है. दु:ख को लेकर वह विचलित नहीं होती बल्कि उसे पार कर उससे शक्ति लेती है. वह सच्ची है अपनी भावनाओं को लेकर. इतनी सच्ची कि कई बार उसकी बेबाक बयानी यह भ्रम भी देती है कि कहीं वह घमंडी तो नहीं. लेकिन नहीं, वेरा झूठ को चिपकाये रहकर उसके साथ जीते जाने और परंपराओं का पालन करते जाने से बेहतर मानती है झूठ से मुक्ति पाना. वह सच से साक्षात्कार करने को कभी भी तैयार रहती है.

निकोलाई की वेरा से साक्षात्कार करते समय महसूस होता है कि वेरा सिर्फ वो नहीं जो किरदार में है उसके भीतर की वेरा ज्यादा महत्वपूर्ण है. उसकी जीवन को जीने की उत्कट इच्छा उसे आम से खास बनाती है. वह न तो सौंदर्य की देवी है न ऐसी कि एक बार में किसी का मन मोह ले. लेकिन जैसे-जैसे हम उसके करीब जाते हैं, उसका मन खुलता है, उसका दिमाग खुलता है, हमें वेरा से प्यार होने लगता है. एक समय के बाद वेरा का नशा छाने लगता है. कहीं भी वेरा अपने स्त्री होने के कारण, सौंदर्य के कारण, कमनीयता के कारण, स्त्रियोचित आकर्षण के कारण नहीं खींचती. उसका सोचने का ढंग ही उसे खास बनाता है. निकोलाई की वेरा उस दौर में विवाह के बाद भी अपनी स्वतंत्रता की पक्षधर है और आर्थिक आत्मनिर्भरता की भी. इसके लिए वह कैसा भी और कितना भी संघर्ष करने को तैयार रहती है.

निकोलाई की इस वेरा से दुनिया भर के न जाने कितने नवयुवकों ने प्रेम किया होगा. न जाने कितनी लड़कियों ने वेरा के सपनों में अपना दिल भी धड़कते हुए महसूस किया होगा. भाषा, संस्कृति और भौगोलिक सीमाओं से परे वेरा हर दिल की धड़कन बन गई. हर उस दिल की जो वेरा के करीब से होकर गुजरा और जो नहीं गुजरा वो वेरा जैसी किसी की तमन्ना को दिल में दबाये अपनी अनजानी तलाश को अंजाम देने को बेताब फिरता रहा सदियों तक. आलोक श्रीवास्तव ने भी वेरा में अपने सारे सपने, सारी भावनाएं तिरोहित करते हुए एक ऐसे समय ऐसी दुनिया का स्वप्न देखा जहां सिर्फ और सिर्फ प्रेम का साम्राज्य हो. जहां दुख, प्रेम पर विश्वास की अग्नि में तपकर पिघल जाये. जहां देह का अर्थ बहुत पीछे छूट जाये और बेहद आसान हो जाए आत्माओं को देख पाना, जैसे कोई देखता है अपनी खिड़की से सामने जाने वाली सड़क को. अपने पहले कविता संग्रह में आलोक वेरा की आंखों से न जाने कितने सपने देखते हैं. शोषण से मुक्त समाज का सपना, धरती पर छाई हरियाली का सपना. स्त्री को उसके सर्वस्व के साथ महसूस करने का सपना. उनके ढेर सारे सपने इस देश, समाज और प्रेम के वास्ते देखे गये, वेरा की खूबसूरत आंखों से. वेरा को प्रेम करना अपने अस्तित्व को प्रेम करना है, अपने अस्तित्व से सारी अकराहटों-टकराहटों को उठाकर फेंक देना है. आत्मा के संगीत को प्रवाह देना है, उसे महसूस करना है. 1996 में आया आलोक का संग्रह वेरा उन सपनों की कथा कहो के बाद आलोक के दो संग्रह और आये. जब वसंत के फूल खिले और यह धरती तुम्हारा ही स्वप्न है. लेकिन चाहते न चाहते उनकी हर कविता में कहीं न कहीं कम या ज्यादा वेरा झांकती रही. इस संग्रह की कविताओं को पढऩे को देते समय वे जानबूझकर कहते हैं, ये कविताएं वेरा से अलग हैं. मानो वे खुद को बता रहे हों कि वेरा से मुक्त होने की कोशिश है. लेकिन पहला प्रेम क्या इतनी आसानी से हाथ छोड़ता है. जिसका वजूद धड़कनों में शामिल हो, उससे किनारा करने की कोशिश में भी बेपनाह प्यार ही तो होता है. हर पल दूर जाते कदम और करीब ले जाते हैं. शब्द अपने अर्थ बदलने लगते हैं. दूर जाने में पास आने का अर्थ दिखने लगता है. होता भी यही है. दूर होने की हर कोशिश प्यार के समंदर में एक और डुबकी सी मालूम होती है. पाब्लो नेरूदा का पहला प्रेम हो या चेखव का सब यही सच उजागर करते हैं कि जिससे लागे मन की लगन उसे क्या बुझायेगी चिता की अगन. मुस्कुराहटों में या आंसुओं में, इंतजार में या मिलन में, प्रेम में या आक्रोश में बात वही है बस प्यार...

वेरा शब्द ही प्रेम का पर्याय है जो आलोक के पहले कविता संग्रह में हर शब्द में समाहित है. यूं वेरा को उसके समग्र में वैसे का वैसा समझ पाना भी कोई बहुत आसान काम नहीं है. इस दृष्टिकोण से निकोलाई की वेरा और आलोक की वेरा दोनों ही खुशकिस्मत रहीं. उन्हें हर उस वक्त वो व्यक्ति मिले जो उसे उसकी उत्कट आकांक्षाओं, समझ, विचार समेत स्वीकार करे. उसकी मन की गिरहों को न सिर्फ खोलता चले बल्कि उसका वैचारिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यैक्तिक विकास भी करता चले. उसके प्रेम के इनकार को भी जो प्रेमी सिर आंखों पर सहेज ले. दखल न दे उसकी अंदर की दुनिया में. उसे ठीक वक्त पर एक ऐसी दोस्त मिले जो उसे ताकीद करे कि बिना प्रेम के एक चुंबन भी किसी को मत देना. इससे बेहतर होगा मर जाना. भले ही यह ताकीद देने वाली वेरा की यह दोस्त एक वेश्या ही क्यों न हो. लेकिन प्रेम की प्रग्राढ़ता का कैसा अनमोल संदेश मिलता है वेरा को कदम कदम पर. कभी अपने भीतर से तो कभी बाहर से.

वेरा पाव्लोवेना को अपने पहले प्रेम को लेकर भले ही भ्रम हुआ लेकिन यह रिश्ता कमजोर नहीं था. तभी तो समझ और सच्चाई से सींचा गया रिश्ता मुझे तुमसे प्रेम नहीं है जैसी साफगोई को भी आसानी से स्वीकार कर लेता है. कहीं कोई हाय-हाय किच किच नहीं. वेरा के सपने में उसे पता चलता है कि जिस सद्भाभावना, दया, मदद, वैचाारिक परिपक्वता को वह प्रेम समझ बैठी असल में वह तो प्रेम था ही नहीं. प्रेम की जगह खाली थी और कोई ढेर सारे मौसम, सूरज की किरनें, चांदनी, खिलखिलाहटें, नर्माहटें, गर्माहटें लेकर आया और उस खाली जगह पर उसका अधिकार हो गया. लगा कि प्रेम पूरा हो गया. ऐसा ही तो होता है. ऐसा ही तो होता रहा है. लेकिन नहीं, ऐसा ही नहीं होता हमेशा. वेरा को समझ में आया. जिसने उसकी मदद की उसी से उसे प्रेम हो जाये यह कोई जरूरी नहीं है. प्रेम को लेकर सबसे पहले हमें भ्रम ही तो होता है. किशोर वय में (या किसी भी उम्र में) जब हम दु:खों में आकंठ डूबे हों, जब निराशाओं का समंदर लहरा रहा हो, जब अंधेरा स्थाई हो चुका हो, जब जीवन से विश्वास उठ चुका हो ऐसे में जो हाथ मदद को बढ़ता है, जो अंधेरे को चीरने में मदद करता है, जो जीवन को उम्मीदों की सौगात देता है, जो निर्जन मन की दुनिया को आशाओं के फूलों से पाट देता है, उसे ही प्रेम समझ बैठने का भ्रम भला किसके हिस्से नहीं आया होगा. लेकिन प्रेम ऐसे नहीं आता. ढेर सारी परिभाषाओं, इच्छाओं, सद्भाावनाओं को रौंदता हुआ, सौंदर्य के उपमानों को भंग करता हुआ बेफिक्री, बेलौसी और ढिठाई के साथ आता है एक रोज. पकड़ता है हाथ और चल पड़ता है हमें साथ लेकर...सारी जद्दोजेहद, बचने की हजारों कोशिशें सब बेकार.

वेरा की जिंदगी में भी ऐसे ही प्रेम दाखिल होता है. पहले भ्रम बनकर फिर सच बनकर. वेरा के करीब जाकर जिंदगी खुलती है पर्त दर पर्त. आलोक की वेरा समझ से गढ़ी गई वेरा है. उससे भी ज्यादा समझ से गढ़ी गयीं हैं कविताएं. मासूम भी परिपक्व भी. समझ भी, नासमझ भी. हर कविता प्रेम का इसरार है. इंतजार है. समर्पण है लेकिन कोई घनी अपेक्षा नहीं है नायिका से. कविताएं प्रेम को अपने भीतर जज्ब करते हुए प्रेम को कैनवास को लगातार बड़ा करती चलती हैं. कई बार ये सामाजिक कविताएं, क्रांतिकारी कविताएं बन जाती हैं प्रेम कविताएं नहीं रहतीं. लेकिन यहीं हम भ्रमित होते हैं. प्रेम से बड़ी क्रांति और चेतना का कोई और स्वर है संसार में. सांसारिक चलन से दूर अपनी अलग ही दुनिया के दिवास्वप्न देखती वेरा के प्रेम में डूबी कविताएं पूरे देशकाल को नये सिरे से गढऩा चाहती है. वेरा के लिए. जहां शोषण का नामोनिशां न रहे. जहां अवचेतन में भी दु:ख का ख्याल तक न आये. पहले संग्रह में कवि वेरा के प्रेम में निमग्न है जबकि वेरा लगभग निर्विकार है. लेकिन चौथे संग्रह तक आते-आते वेरा निर्विकार नहीं रही. दु:ख से उबर चुकी वेरा अधिक परिपक्व हो चली है. वो मुक्ति की नई इबारतें गढ़ रही है. कवि न जाने कितने मौसम, न जाने कितने शब्द, न जाने कितने पहाड़, नदियां, सेहरा लिये उसका इंतजार कर रहा है, कई बार उसके साथ चल रहा है. कहीं कोई आकांक्षा नहीं मिलन की, बस साथ चलने की तमन्ना. बस साथ-साथ सफर को काटने की इच्छा. एक साथ दुनिया से दु:खों को मिटाने की जिजीविषा...उसे एकटक देखते जाने की इच्छा भी कभी-कभी. कविताओं में उसके मन को (जो न जाने किसकी प्रतीक्षा में कबसे उदास है) बस हौले से सहला देने की भोली सी इच्छा दिखती है. लेकिन कोई भी वेरा (स्त्री) किसी भी पुरुष को नहीं सौंपती अपना दु:ख. मुस्कुराहटें वो सबसे आसानी से सौंपती है. दु:ख को गहरे छुपाकर रखती है. तभी तो जीवन भर साथ होकर भी कोई पुरुष नहीं ही पहुंच पाता अपनी स्त्री के पास. उसके दु:खों को ग्रहण करने की योग्यता ही प्रेम की योग्यता है. दिखना तुम सांझ तारे को...संग्रह की कविताओं को पढऩे से पहले आलोक की ताकीद कि ये वेरा से अलग हैं मुझे अब तक याद है. सचमुच हर कविता यह सोचकर पढ़ती गई कि ये वेरा से अलग हैं लेकिन हैं क्या...संग्रह पाठकों के हाथ में है...निर्णय भी उन्हीं का.

प्रतिभा कटियार
मुझे तो बस वेरा का लहराता आंचल दिख रहा है जो 1863 से, रूस से, निकोलाई के उपन्यास से निकलकर सरहदों की तमाम सीमाओं को पारकर, धर्म, जाति, संप्रदाय, नस्ल, रंग, भाषा, संस्कृति के तमाम बंधनों को तोड़कर हर स्त्री का आंचल बन गया है. लहरा रहा है यहां से वहां तक. वो स्त्री जो देख रही है ढेर सारे स्वप्न और दरवाजे की ओट में आंसुओं को सुखाते हुए चांद में अपने दु:ख छुपा रही है..

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

सीढ़ियां तलाशता कवि - राजू रंजन प्रसाद

छुटपन में जब गांव में था तो अग्रज मित्रों से सुना करता था कि भूत-प्रेत आदि का डर लगे तो ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करना चाहिए। मेरा मन कभी इसे मानने को तैयार न होता और सहज ही हंसी फूट पड़ती। बालमन को तब यह कहां पता था कि कुछ ‘बुद्धिमान’ लोग भी इसे अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना चुके हैं और रह-रहकर कविता की शक्ल में पुनर्सृजन करेंगे। संजय कुंदन का काव्य-संग्रह ‘चुप्पी का शोर’ पढ़ते हुए लग रहा है, मानो बगल में बैठा मित्र बचपन का वही रटा-रटाया चालीसा बक रहा हो।

चुप्पी वैसे कई बार महत्वपूर्ण और अर्थवान होती है। बेढंगा बोलेंगे तो बेवजह शोर पैदा करेंगे आप! फिर भारतीय दर्शन में मौन की बड़ी महिमा है। बहुतेरे मौनी लोग अपनी ‘आत्मा’ तक के साथ ‘संवाद’ स्थापित कर लेते हैं। नामवर सिंह की ऊंचाई अगर मुझे मिली होती तो झट इसे ‘आत्मालोचना’ घोषित कर डालता। अर्थात् आत्मा के साथ चलनेवाला अंतहीन संवाद आत्मालोचना है। अलबत्ता, संवाद के बहाने अगर ‘संभावना’ और ‘समझौते’ के सूत्र तलाशे जा रहे हों तो चुप्पी ही भली!

धूमिल के यहां जाना था कि मोची के लिए प्रत्येक आदमी एक जोडा जूता है। मोची और जूते का बिंब फिर भी हमें श्रम की दुनिया से बाहर निकलने नहीं देता। ऐसा इसलिए भी संभव हुआ कि धूमिल ग्रामीण परिवेश से गहरे जुड़े थे। ‘दिल्ली’ की राह न पकड़ी थी, जहां कवि के अनुसार आदमी ‘जूते’ न रहकर ‘सीढ़ियों’ में तब्दील हो चुका है और प्रत्येक आदमी को अपने-अपने तरीके से सीढ़ियों की तलाश है। मेरे इस विश्वास के लिए कि कवि शायद इसमें शामिल न हो, कोई आधार नहीं मिलता। कवि ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी खुद ही मारी है। सीढ़ियां चढ़ना कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि सीढ़ियां भी तो कोई साधारण नहीं हैं! बिल्कुल सर्कस की सीढ़ियां हैं, जिस पर कुशल नट ही चढ़ सकता है। ऊंचा चढ़ने के लिए अपना ‘वजन’ कम करना होता है, गुरुत्व-बल की दिशा ठीक करनी होती है। ‘दिमाग’ का साथ छोड़ना होता है। जरूरत पड़ने पर स्मृतियों तक से पीछा छुड़ाना पड़ सकता है। किंतु भारत की सामाजिक संरचना ही कुछ ऐसी है कि ‘द्विज’ अथवा ‘ब्राह्मण’ होने की बात दिमाग के किसी-न-किसी कोने में रह ही जाती है। कवि का यह अपराध क्षम्य है, क्योंकि ब्राह्मणत्व का भूत उसे सिर्फ बहन की शादी के समय सताता है। फिर धूत कहौं, अवधूत कहौ का मंत्रोच्चार करनेवाले तुलसी का मन जब इसके पार नहीं जा सका तो अपनी पीढ़ी के कवि से ऐसी अपेक्षा रखना ‘सामाजिक न्याय’ के सिद्धांत के विरुद्ध है।

कवि ने अपने समय की एक भयावह किंतु कल्पित तस्वीर प्रस्तुत की है। यह भयावहता सिर्फ चेतना के स्तर पर है और इसीलिए इसकी संरचना में एक अद्भुत कृत्रिमता है। कवि के अनुसार,
‘अब शहर में
सबसे सुरक्षित थे हत्यारे
इसलिए लोग चाहते थे हत्यारों की तरह दिखें
पर जब किसी को मार न पाया तो सोचा सबसे आसान है
अपने-आपको मार डालना
और उसने ऐसा ही किया
सुरक्षित होने के लिए।’

ऐसी कौन-सी हत्यारी संस्कृति है जिसमें हत्यारा किसी की हत्या करने की बजाय आत्महत्या पर उतर आता है ? क्या यही है आलोक धन्वा की ‘कुलीन हिंसा’ ? दरअसल यह मध्यवर्ग की असुरक्षा की चेतना है जिससे कवि कई तरह की मानसिक दुर्बलताओं का शिकार होता है। वह अपने पात्र इसी वर्ग से उठाता है। टी.वी. पर हत्या की खबरों को देख-सुनकर खुद के मारे जाने की कल्पना कर लेता है और विलाप करती हुई स्त्री पत्नी लगती है। जिसे रात की नींद के लिए शराब और दवा की जरूरत है। जरा गौर करें-

‘टीवी पर समाचार देखते हुए
उसने ड्रिंक्स बनाकर पी
फिर गहरी नींद में सो गया।’

संजय कुंदन का भय समय और समाज से कटे हुए आदमी का भय है और उसका दुख एक अकेले आदमी का असहाय प्रलाप है। मध्यवर्गीय कवि प्रतिपक्ष रचना नहीं चाहता, व्यवस्था के विरुद्ध वह नहीं जा सकता क्योंकि ऐसा करने से पहचान का संकट पैदा हो सकता है। कवि की पंक्तियां हैं-

‘वह घबराया
उसे पहली बार अहसास हुआ
कि उसकी आवाज अनसुनी भी की जा सकती है
उसे पहचानने से इंकार किया जा सकता है।’
यह जवाब है कवि केदारनाथ सिंह के उस सवाल का-‘वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा ?’ संजय कुंदन को डर है कि अगर कहीं उसे अपना होना प्रमाणित करना पड़ा तो सिर्फ उसका ईश्वर ही उसके पक्ष में बयान दे सकता है, क्योंकि महानगरों की सोसायटी महज एक अपार्टमेंट की आबादी के बूते बनती है। उस अकेले अपार्टमेंट के लोगों का आपसी सरोकार भी किस स्तर का होता है, कवि उससे अनजान नहीं है। इसी संग्रह की एक कविता है-‘पड़ोसी’, जो व्यक्तिकेंद्रित जीवन जी रहे लोगों की त्रासदी बयान करती है।
ठीक ऊपर की मंजिल पर रह रहे व्यक्ति का कवि के साथ कोई सीधा संवाद स्थापित नहीं होता या कहें कि कवि की अपनी जो विशिष्टता है, वह उसे लोगों से हिलने-मिलने, मिलने-जुलने से रोक देती है;
‘कोई बेचैन चक्कर लगा रहा है कमरे में
उसकी बेचैनी एक दीवार से छन-छन कर
आ रही मुझतक
बस एक मंजिल ऊपर चल रहा
अलग तरह से जीवन
जिसकी आहट दखल देती रहती
मेरे जीवन में भी।’
पड़ोसी का कवि के जीवन में दखल महज इतना भर है कि देर रात तक जब कवि सो नहीं पाता, तो नल चलने की तेज आवाज सुनायी पड़ती है या फिर कुकर की तेज सीटी। कभी तेज पुरुष-स्वर तो कभी एक स्त्री की सिसकी। कवि को लगता है जैसे
‘यहां इस फ्लैट की हर कोठरी में
एक न एक आदमी झेल रहा है
किसी न किसी तरह की यातना।’
यह अकेले पड़ चुके आदमी की यातना है। यह पीड़ा की अभिव्यक्ति भी नहीं, क्योंकि पीड़ा की सच्ची अभिव्यक्ति पीड़ा से मुक्ति के लिए प्रयास में है। केवल तभी पीड़ा साहित्यिक मूल्य बन पाती है।

प्रकाशन: प्रभात खबर, दिल्ली, 19 मार्च, 2005.

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

आदमी होना कविता लिखे जाने की पहली और अनिवार्य शर्त है...राजूरंजन प्रसाद


अपनी पीढ़ी के एक कवि की चर्चा धूमिल की पंक्ति से शुरू करने के लिए विज्ञजन से क्षमा की आशा रखता हूं। ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।’ मैं इसे थोड़ा सुधारकर कहना चाहता हूं कि ‘आदमी’ होना कविता लिखे जाने की पहली और अनिवार्य शर्त है। व्यक्तित्व के फ्रॉड से ‘बड़ी’ कविता नहीं लिखी जा सकती। बड़ी कविता से मेरा मतलब महान कविता से कतई नहीं है। बड़ी कविता अपनी संपूर्ण रचना-प्रक्रिया में ‘जेनुइन’ होती है। यहां रचना-प्रक्रिया का उल्लेख अकारण नहीं है। समीक्ष्य काव्य-संग्रह ‘परिदृश्य के भीतर’ के कवि को मैंने पूरे एक दशक तक (यह क्रम अब भी जारी है) जाना और ‘झेला’ है। एक ईमानदार और मुखर आदमी को ‘झेलना’ सहज और आसान नहीं होता। इस कवि को मैंने जब भी अपने पास पाया-उसे बोलता-बड़बड़ाता हुआ ही पाया। इतने दिनों तक चप्पलें साथ चटखाने (घसीटने) के बाद मैंने यही महसूस किया कि ‘चुप्पी उसके लिए मौत से भी ज्यादा त्रासद और भयावह है।’

‘परिदृश्य के भीतर’ में सन् 1988 से 99 तक की कुल इक्यानवे कविताएं शामिल हैं। इन तमाम कविताओं का प्रथम पाठक/श्रोता होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। इसलिए इन कविताओं की रचना-प्रक्रिया में आनेवाली एक-एक चीज से परिचित हूं। कइयों के तो मुझे दृश्य तक याद हैं कि किन परिस्थितियों में वह कविता जन्म ले रही थी। कहना होगा कि कुमार मुकुल की कविताओं का क्षितिज काफी विस्तृत है। घर-परिवार और आस-पास की चीज से लेकर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य तक इनकी कविताओं में सहज भाव से शामिल होते हैं। इनकी कविता सोमालिया की दैन्य स्थिति से शुरू होती है और पहाड़, पत्नी से होती हुई महानगरीय जीवन से पलायन करती संवेदना तक को अपना निशाना बनाती है। प्रकृति पर इनके पास सबसे अधिक कविताएं हैं मानो वह उनकी मुट्ठी में हो।

‘सोमालिया’ संग्रह की सबसे छोटी कविता है, लेकिन इस छोटी-सी कविता के माध्यम से कवि विश्वव्यापी ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का सबसे अधिक प्रत्याख्यान करती है। पूंजीवाद के भ्रष्टतम रूप ने पूरी मानवीय संवेदना को किस हद तक अमानवीय बना डाला है,उसके पूरे अर्थशास्त्र को इन दो पंक्तियों की कविता से जाना जा सकता है। कविता की पूरी विकास-यात्रा को समझने के लिए इसको उद्धृत करना अत्यंत अनिवार्य है;

‘मुट्ठी भर
अन्न के लिए
गोलियां
मुट्ठी भर
और सभ्यता के कगार पर
आ पहुंचे हम।’

इसे उद्धृत करने का एकमात्र कारण यह नहीं है कि यह छोटी है और ऐसा करना मितव्ययी होना अथवा सुविधाजनक है, बल्कि यह संग्रह की कविता एवं कुमार मुकुल की चेतना का प्रस्थान-बिंदु है। यहां से मुकुल की कविता के कैनवास खुलते हैं।

इस ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का रक्तबीज है महान औद्योगिक क्रांति के गर्भ से उपजी बाजार की फासीवादी संस्कृति। उपभोक्तावाद ने हमारी तमाम संवेदना को ग्रस रखा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शक्ल में नव-फासीवादी ताकतें हमारे बीच फिर से पसरने लगी हैं। एक ईमानदार और संवेदनशील कवि भला इस अमानवीय, त्रासद स्थिति को अपनी नियति मानकर चुप कैसे बैठा रह सकता है। उसके पास इतने तफसील हैं इसके कि वह पूरी विनाशलीला को बगैर किसी धुंध के साफ-साफ देख रहा है। संग्रह की दूसरी कविता ‘कउआ’ इसी सत्य को उद्घाटित करती है। कउए को शायद पता नहीं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कितना खाद्य-अखाद्य बना डाला है। किसी को अलग से बताने की जरूरत शायद ही अब शेष हो कि प्रति-वर्ष लाखों की संख्या में गायों का निधन पॉलिथीन खाने से हो रहा है और हमारी अत्यंत ‘सहनशील’ हिंदू सभ्यता कुछ भी कर पाने में असमर्थ साबित हो रही है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन को आये दिन सरकारी वक्तव्यों में जिस तरह पेश किया जा रहा है,लगता है, यह कोई महान् उपलब्धि हो। पचास वर्षों से अधिक के आजाद भारत के इतिहास में गुलामी की याद अब भी ताजा है और कवि की सचेत आंखें उसके फैलते जाल को अपनी पराधीनता का तंबू मान रही हैं। कहना होगा कि भारत में अंग्रेजों का आगमन एक विशुद्ध व्यापारिक कंपनी के रूप् में हुआ था लेकिन धीरे-धीरे देशी निजामों की अदूरदर्शिता और सामान्य जन की ‘कोउ नृप होहिं हमें का हानि’ वाली मुद्रा की वजह से शासक बन बैठे थे। आज स्थिति उससे दो कदम आगे तक जा चुकी है जब हम खुद उसके आने का जश्न मना रहे हैं और सारी दुनिया के सामने दांतें निपोरकर अपना अहोभाग्य बता रहे हैं। सूत्र रूप में यह कहना होगा कि कवि अपने दैनिक जीवन में गांधीवादी शैली से काम चलाते हैं। अपने आस-पास अभावों की एक दुनिया सृजित कर।

कुमार मुकुल से असहमति की गुंजाइश तब होती है जब वे कहते हैं,

‘संस्कृतियों के
इतने रंग-बिरंगे टीलों को छोड़
गंगा की ओर मुंह किए
कहां भागा जा रहा है कउवा।’


हमारे प्यारे कवि के लिए शहर संस्कृति के रंग-बिरंगे टीले से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ‘कउवा’ मुकुल की अकेली कविता नहीं है जिसमें शहर के प्रति उपेक्षा का भाव है बल्कि संगह की जिस किसी कविता में भी शहर आता है,वह हीनता-बोध और अपराध-बोध की भावना से ग्रस्त होता है और कवि की कुपित संवेदना का शिकार होता है। इस प्रसंग में कवि की भिन्न-भिन्न कविताओं से चुनी गई पंक्तियों को यहां रखने की अनुमति चाहूंगा। ‘मर्यादाएं हम तोड़ेंगे’ कविता की अंतिम पंक्तियां कुछ इस तरह की हैं,

‘बंदरों-भालुओं से अंटी अयोध्या को
पीटेंगे बांधकर

इसी कंकरीट के जंगल में।’

ऐसा कहते हुए कवि अयोध्या की संपूर्ण ऐतिहासिक गरिमा और उससे जुड़ी हमारी जातीय स्मृतियों को एक गैर-जरूरी चीज साबित कर डालता है। एक और कविता है जिसका शीर्षक है-‘प्यार में’। कविता यों शुरू होती हैः

‘प्यार में महानगरों को छोड़ा हमने
और कस्बों की राह ली
अमावस को मिले हम और
आंखों के तारों की रोशनी में
नाद के चबूतरे पर बैठे हमने
दूज के चांद का इंतजार किया
और भैंस की सींग के बीच से
पश्चिमी कोने पर डूबते चांद को देखा।’

इससे पहले कि मैं कुछ कहूं कवि अपनी ‘पुतैये’ कविता का स्मरण करे। क्या शहर इतना अमानवीय है कि प्यार करने के लिए अब किसी को कस्बों की राह थामनी होगी ? कवि स्वयं लिखता है;

‘महानगर में अब भी तीखा है महुआ
अब भी सुंदर हैं लड़कियां यहां।’

कवि को शायद इस बात का अंदाजा हो कि कस्बों में जो प्रेम-संबंध हैं, जीवन का जो माधुर्य है, उसकी रक्षा के लिए लाखों मजदूर और भिन्न-भिन्न पेशों की चाह लिए नौजवान प्रति-वर्ष किसी-न-किसी शहर को अपना गंतव्य बनाते हैं। यहां उनके हाथों को काम और गांवों में चल रहे/पल रहे प्रेम-संबंधों को खुराक की नमी मिलती है।
शहर के प्रति कवि का जो नजरिया है वह ऐतिहासिक विकास की गलत समझ से बना लगता है। बाजार-संस्कृति का विरोध करने का यह मतलब कतई नहीं होता कि आप प्रगति ही के महत्व को नकार दें। शहर सिर्फ विषैला सर्प नहीं है जो हमेशा फन काढ़े बैठा हो कि कब आदमी आये और उसे डंस लें। अज्ञेय के यहां शहरों के लिए तिरस्कार का भाव है और गांवों का चित्रण ऐसा करते हैं मानों वहां हमेशा ‘ढोल और मादल’ बजते हों। कवि केदारनाथ सिंह के लिए शहर वैसी जगह है जहां इच्छाएं पलती हैं। अब इस सवाल का जवाब तो कुमार मुकुल ही देंगे कि क्या शहरों में स्वयं इसका विरोध करनेवाले कवि और लेखक नहीं बसते ? आपके पास आंकड़ों की कमी नहीं, और आप बता सकते हैं कि शहरों से गांवों के लिए दया की भीख मांगनेवाले कितने गंवई कवि हैं जिन्हें हम भी जानते हों। क्या हम इस बात को कहने का साहस कर सकते हैं कि कविता के जन्म लेने से पाठकों तक लाने का सारा कारोबार इन्हीं नगरों-महानगरों में अंजाम पाता है। हमारे ज्ञान को दुरुस्त करनेवाली कौन-सी किताब और ‘कठिन वक्त की कविता’ की कौन-सी पत्रिका है जिसके कारखाने गांव में हैं ?

शहरों का इतिहास हमारी प्रगति की कहानी कहता है जिसमें लाखों-करोड़ों मजदूरों का श्रम लगा है। संस्कृति के इन टीलों को निर्मित करने में हमारे फौलादी हाथ काम आये हैं। इन्हीं टीलों में किताबों से अंटे तंग से तंग कमरे में अरुण कमल जैसे सुकवि की आत्मा बसती है। उसके एक कोने में सूर्य की तरह उद्भाषित होता पितरिया लोटा भी होता है।

इसी प्रसंग से संबंधित ‘चबूतरा’ शीर्षक की दो कविताएं भी चर्चा की खासतौर से अपेक्षा रखती हैं। इसमें भी कुएं के माध्यम से गांव और शहर (माफ कीजिए, कवि इसे महानगर कहता है) की आत्मा का हमें फर्क बताया गया है। एक कुआं कवि के गांव में है जिसके

‘चबूतरे के पास ही
मेंहदी लगी थी
जो आज तक हरी है
दिन में जिस पर लंगोट सूखते हैं
और रात में उगते हैं सफेद सपने।’

आगे
‘एक कुआं है
महानगर में भी
बिना चबूतरे के
उसके निकट जाने पर ही
पता चलता है कि कुआं है।’


और ऐसा शायद इसलिए है कि ‘महानगर’ के कुएं के लिए कवि की कोई स्मृति नहीं है। इस कुएं के पास कवि ने शाम भी न गुजारी होगी, रात की कौन पूछे। इसीलिए कवि और उनके वर्ग के लोगों के लिए इसका महातम साल में केवल एक बार छठ के अवसर पर जगता है। लेकिन चाय की गुमटीवाला ऐसा नहीं सोचता जिसकी चाय के लिए पानी इसी कुएं से जाता है। सुबह-सुबह कुछ दूधिए भी अपना गेरू वहीं धोते हैं। भिखमंगे भी भरी दोपहरी में वहीं नहाते हैं। कवि को शायद यह मालूम हो कि यह मुहल्ला शहर का वह हिस्सा है जिसका शहरीकरण होना अभी बाकी है। पड़ोस के कई भूखंड अब भी खाली पड़े हैं जिनमे बिल्लियां चूहों के साथ बेखौफ खेलती हैं। जैसे ही अगहन में धान पकते हैं कि उसकी एक लरछी अपनी चोंच में दबाए गौरैया कवि के घर में दाखिल हो जाती है। लेकिन कवि हैं कि

‘कंक्रीट के इस जंगल में
मौसम की निर्जनता
मुझे ही नहीं
इस घरेलू चिड़िया को भी खलेगी।’


कविता का पैरा अभी खत्म भी न होने पाया कि कवि की राय महानगर को लेकर बदल जाती है। वे लिखते हैं, ‘इस नये बसते शहर के पड़ोस में धान की फसल कटेगी।’ शहर के गिर्द फसल की हरियाली हो तो कवि को भला क्या उज्र!

कुमार मुकुल की कविता की विशेषता इस बात में है कि बड़ी-से-बड़ी बात को कम-से-कम शब्दों में कह डालती है। इस लिहाज से संग्रह में कई ऐसी कविताएं हैं जिनमें स्थितियों का ऐसा जबर्दस्त चित्रण है कि एक साथ भाव के कई स्तर खुलते हैं। सामंती व्यवस्था और मानसिकता के विरुद्ध चल रहे नक्सलबाड़ी आन्दोलन को कवि दृश्य-चित्रण प्रस्तुत कर शब्दों की कितनी मितव्ययिता प्रदर्शित करता है-इसका बेहतर नमूना पेश करती है ‘पुतैये’ कविता। कविता की पंक्तियां कुछ इस तरह हैं;

‘यूं चरमराया तो था बांस की चांचर का दरवाजा
प्रतिरोध किया था जस्ते के लोटे ने
ढनमनाया था जोर से
चूल्हे पर पड़ा काला तावा भी
खड़का था
नीचे गिरते हुए।’


कितने कम शब्द और कहने के लिए कितनी बड़ी बात। कविता की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मुझे अनायास शमशेर की ‘उषा’ कविता की याद हो आई। अद्भुत चित्रात्मकता इन दोनों कविताओं की जान है। ऐसे ही विरल अवसर के लिए एंगेल्स ने कभी लिखा था कि विचार जितने ही छिपे हों लेखक के लिए उतना ही अच्छा है। क्या इन कविताओं में विचार छिप सके हैं ? एंगेल्स की इस उलटबांसी( ?) का कई जनवादी आलोचक तक ने अर्थ लगाया कि विचार कविता के लिए उपयुक्त नहीं है!

कवि जब अपनी दैनिक जिंदगी में बातचीत या बहसों में होता है तो सीधे हमला करता है लेकिन कविताओं में कई बार प्रकारांतर से चीजों को बे-पर्द करता है। एक कविता ‘बाई जी’ शीर्षक से है जो दरअसल पत्नी को संबोधित करके लिखी गई है। इस कविता के माध्यम से कवि ने घर के सामंती ढांचे की विद्रूपताओं को दिखाने की कोशिश की है। यह घर जिसे हमने सभ्यता-संस्कृति के विकास की एक खास अवस्था में गढ़ा था,आज इस बीसवीं शती के अंतिम दौर में भी एक स्त्री के अस्तित्व को लील जाना चाहता है। संस्कृति की सुरक्षा में खड़ी की गईं ये दीवारें एक स्त्री के गुनगुनाने मात्र से कैसे बेतरह कांपने लगती हैं। जिस भयावह स्थिति की ओर कुमार मुकुल ने ईशारा किया है, उसी भयावहता को दूर तक तानते हुए आलोक ने लिखा है घर की जंजीरें कितनी बड़ी दिखायी देती हैं जब कोई लड़की घर से भागती है। यहां नाटकीयता थोड़ी ज्यादा है।

मुकुल जी का संग्रह इस कारण से भी महत्वपूर्ण है कि वह श्रम की महत्ता को सीधे-सीधे स्थापित करता है। पूरा संग्रह ऐसी पंक्तियों से भरा है जो श्रम की दुनिया से कवि के जुड़ाव को प्रदर्शित करती है। निम्न मध्यवर्ग का वह तबका जो महान श्रम से जुड़ा नहीं होता शीघ्र ही अवसाद के गहरे अंधेरे में चला जाता है। बारी-बारी से तमाम चीजों की अर्थवत्ता समाप्त होने लगती है। श्रम हमें ऐसे अवसाद से बचाता है और व्यक्तित्व को एक दृढ़ आधार प्रदान करता है। इसीलिए हमारे कवि के जीवन में अवसाद पल-दो-पल की चीज है। उदासी डरावनी नहीं है बल्कि एक ‘धारदार हीरा’ है। कवि गहरे आत्मविश्वास से कहता है,

उदासी आंखों में पैठ गयी तो
सोचता हूं दौड़ूं और उदासी को
पीछे छोड़ दूं।’


ऐसा वही कह सकता है जिसमें काम करने की अदम्य लालसा हो। मुझे नेहरु की याद आती है जब वे कहते हैं, ‘शायद मुझे एक उड़ाका होना चाहिए था-इसलिए कि जब जिन्दगी का धीमापन और उदासी मुझ पर छाये, तो मैं उड़कर बादलों के कोलाहल में समा जाता।’ विज्ञजन कहेंगे, यह तो एक तरह का रोमान है। सही है; किन्तु यह जीवन और श्रम के महान उद्येश्यों से पैदा हुआ है। मुकुल की कविताएं श्रम की गांठ से उपजी कविताएं हैं।

यह कविता संकलन रश्मिप्रिया प्रकाशन पटना से आया था

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

आत्मलीनता के खिलाफ


आत्मलीनता (आटिज्म) के नाना रूप है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में आत्मलीनता एक बड़ी बीमारी है। वास्तविक चिंतन से सर्वथा भिन्न एक ऐसी विचार प्रक्रिया जिसका घटनाओं और वस्तुओं की वास्तविक प्रकृति से कोई संबंध नहीं होता, पूरी तरह से व्यक्ति की अपनी इच्छाआकांक्षाओं द्वारा नियंत्रित होती है। इसमें कोई तर्क, कोई व्यवहारिक तकाजा नहीं होता। बीमारी होने के नाते ही यह किसी से भी करुणा की अपेक्षा रखती है। मजे की बात यह है कि साहित्य, संस्कृति और विचारधारा के क्षेत्र में, जहां पाठों से पाठों की, शास्त्रों से शास्त्रों की और विचारों से विचारों की श्रंखलाओं को तैयार करने का लंबा सिलसिला चला आरहा है, वहां यही आत्मलीनता पांडित्य, विद्वता और परम निष्ठा की मर्यादा पाती है। लेकिन गहराई से देखे तो साहित्य, संस्कृति और विचारधारा के पूरे क्षेत्र में पसरी हुई यह आत्मलीनता ही सांस्कृतिक जीवन की तमाम प्रकार की अहम्मन्यताओं, जड़ताओं और  करताओं के मूल में होती है और इसीलिये ऐसी आत्मलीनता करुणा की नहीं, समझौताविहीन निर्ममता की अपेक्षा रखती है। प्रश्नविहीन अंधआस्था आत्मलीनता का ही एक बड़ा लक्षण है।

21वीं सदी के प्रारंभ के साथ ही सन् 2000 के जून महीने में फ्रांस के विश्वविद्यालयों के अर्थशास्त्र के कुछ छात्रों ने अर्थशास्त्र की चालू शिक्षा पद्धति के खिलाफ सरकार और शिक्षा अधिकारियों के पास एक अर्जी पेश की थी, जिसमें उन्होंने तत्कालीन शिक्षा पद्धति पर यह आरोप लगाया गया था कि यह कत्तई यथार्थपरक नहीं है। गणित के अनियंत्रित प्रयोग के चलते गणितीय आंकड़ें ही इसके लक्ष्य बन कर रह गये है, जिसने इसे एक आत्मलीन विज्ञान में तब्दील कर दिया है। यहां पढ़ाये जाने वाला अर्थशास्त्र अपनी काल्पनिक दुनियाओं में खोया हुआ है। विश्वविद्यालयों के अर्थशास्त्र के पाठ्यक्रम पर नवशास्त्रीय सिद्धांतों और उससे पैदा होने वाले दृष्टिकोणों की दमनकारी जकड़बंदी है। अर्थशास्त्र के पठनपाठन की इस जड़ीभूत पद्धति में आलोचनात्मक और वस्तुनिष्ठ चिंतन के लिये कोई स्थान नहीं है। इसीलिये इन फ्रांसि‍सी छात्रों की मांग थी कि अर्थशास्त्र ठोस यथार्थ के साथ शुद्ध अनुभववादी ढंग से टकरायें, विज्ञानवाद के बजाय विज्ञान को प्राथमिकता प्रदान करें, आर्थिक विषयों की जटिलता और अधिकांश बड़े आर्थिक सवालों और सिद्धांतों को घेर कर खड़ी अनिश्चयताओं के मद्देनजर बहुलतावादी दृष्टिकोण अपनायें। समग्रत:, उनके अध्यापक अर्थशास्त्र के पठनपाठन को उसकी आत्मलीनता और सामाजिक गैरजिम्मेदारी की दशा से निकालने के लिये जरूरी सुधार करें।

फ्रांस के अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों की इस अर्जी को वहां के अनेक नामीगिरामी और स्थापित अर्थशास्त्रियों और अध्यापकों का समर्थन मिला।  इस अर्जी पर सहमति की मोहर लगाने वालों में अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों की तुलना में कहीं ज्यादा, भारी अकादमिक प्रतिष्ठा वाले फ्रांस के ग्रोन्द एकोलकी तरह के मंच भी शामिल थे। वहां के प्रमुख अखबार ल मोंदने कई दिनों तक इस विषय को सुर्खियों पर रखा और देखते ही देखते छात्रों की मांग ने पूरे फ्रांस में एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया। तभी से आत्मलीनोत्तर अर्थशास्त्रके नाम से एक पत्रिका के जरिये जो अभियान शुरू हुआ वह वहां आज भी समान रूप से जारी है और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में हर नयेपुराने सिद्धांत को यथार्थ की ठोस जमीन से विश्लेषित करके उसकी सत्यता को परखने की एक सृदृढ़ परंपरा बना रहा है।

आत्मलीनता और आत्मलीनोत्तर अर्थशास्त्र की ये तमाम बातें हमारे दिमाग में हमारे विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों की आम दुर्दशा के खयाल से पैदा नहीं हुई है। इन विभागों की सचाई लंबे काल से इतनी प्रकट है कि अब उनके प्रति असंतोष से किसी नयी बात के उद्रेक की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। दरअसल, हमारे दिमाग में यह समूची बहस तब कौंधी जब मात्र साल भर पहले प्रकाशित प्रभात पटनायक की किताब वैल्यू आफ मनी’ (द्रव्य का मूल्य) को पढ़ना शुरू किया। यह पुस्तक प्रभात पटनायक के उन चंद लेखों का संकलन है जिन्हें उन्होंने 1995 में लिखना शुरू किया था और तभी अर्थशास्त्र के अकादमिक क्षेत्र में ये लेख काफी लोकप्रिय हो गये थे। इनकी लोकप्रियता को देख कर प्रभात ने इस विषय पर अलग से एक पूरी किताब ही लिखने की योजना बनायी थी, लेकिन अंतत: सभी लेखों को जोड़ने वाली पृष्ठभूमि को एक भूमिका में लिख कर ही काम चला लेना उनके लिये संभव हुआ।

सभी जानते हैं कि प्रभात पटनायक एक अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मार्क्‍सवादी बुद्धिजीवी, अर्थशास्त्री और अध्यापक है। द्रव्य पूंजी, द्रव्य का मूल्य और समग्र सामाजिक तानेबाने में द्रव्य की भूमिका के बारे में मार्क्‍स ने पूंजीके तीसरे खंड में कुछ विस्तार से विवेचन किया है। एक ऐसे शास्त्रीय किस्म के विषय पर प्रभात पटनायक की तरह के प्रतिबद्ध मार्क्‍सवादी अर्थशास्त्री ने नया क्या लिखा होगा, इसे किस हद तक आज के समय के पूंजीवाद के विश्लेषण से जोड़ा होगा, यही जानने के लिये बड़े आग्रह के साथ हमने इस किताब को शुरू किया था। और, यह देख कर सचमुच एक सुखद आश्चर्य हुआ कि प्रभात द्रव्य पूंजी से जुड़े इस शास्त्रीय विषय पर माक्र्स की कही बातों की पुनरावृत्ति के लिये नहीं, बल्कि कई नये अभिप्रायों और प्रेरणाओं के साथ प्रवृत्त हुए हैं और इस उपक्रम में उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था के समग्र ढांचे के बारे में कुछ नयी उद्भावनाओं को भी पेश करने की कोशिश की है। अपनी इस पुस्तक में उनका आह्वान है कि दुनिया में लंबे समय से चल रहे धीमे विकास, प्रमुख पूंजीवादी ताकतों पर लगातार बढ़ता हुआ कर्ज का बोझ, तेलडालर मानक तथा अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था पर मंडराते हुए अनिश्चय के बादल और इसके साथ ही तीसरी दुनिया के बाजारों के खुलने, वैश्विक वित्त के अबाध प्रवाह, बहुराष्ट्रीय निगमों की निर्बंध क्रियाशीलता, तेल संपदा वाले देशों पर राजनीतिक अधिकार की कोशिशों, और साम्राज्यवादी लोलुपता से उत्पन्न तथा उसीको वैद्यता प्रदान करने वाले विनाशकारी आतंकवाद के आज के इस जटिल मुकाम की गुत्थी को सुलझाने के लिये जरूरी है कि हम अपनी आंखों पर पड़ी मुख्यधाराके अर्थशास्त्र के अंधेरे की पट़टी से खुद को मुक्त करें।

प्रभात शुरू करते हैं इस सवाल से कि आखिर वह कौन सा सामाजिक तानाबाना है जिसकी बदौलत रुपया (द्रव्य) कहलाने वाला कागज का टुकड़ा एक मूल्य ग्रहण करके उपयोगी सामग्रियों के विनिमय का माध्यम बन जाता है। जाहिर है कि यह तानाबाना पूंजीवादी व्यवस्था का तानाबाना है। और इसीलिये प्रभात का मानना है कि पूंजीके बजाय यदि हम द्रव्य के अध्ययन से इस व्यवस्था की पड़ताल शुरू करें तो इससे पूंजीवाद के जिस महत्वपूर्ण पहलू को और ज्यादा मूर्त और स्पष्ट किया जा सकेगा वह यह कि पूंजीवाद कभी भी एक बंद और आत्मकेंद्रित प्रणाली के तौर पर अलगथलग रूप में अस्तित्व में न रहा है और न रह सकता है, जैसा कि आम तौर पर आर्थिक विश्लेषणों की सुविधा के लिये मान लिया जाता है।

इस सवाल पर कि कौन सी चीज द्रव्य का, वह भले कागज का हो या धातु का, मूल्य निर्धारित करती है, प्रभात बताते हैं कि अर्थशास्त्र के पास इसके दो प्रकार के बुनियादी जवाब हैं। एक द्रव्यवादी और दूसरा संपत्तिवादी। प्रभात मुख्यधारा के अर्थशास्त्र को द्रव्यवादी धारा की श्रेणी में रखते हैं और यह मानते हैं कि वह किसी भी चीज के मूल्य के कारक संबंधी विवेचन में बाजार के माध्यम से मांग और आपूर्ति के संतुलन की अपनी जिस अवधारणा से प्रतिबद्ध है, वह अवधारणा अन्य मामलों की तरह ही द्रव्य के मूल्य के मामले में भी तर्क की कसौटी पर जरा भी खरी नहीं उतरती। यह कुछ ऐसी खयाली अवधारणा है जिसमें माना जाता है कि कंपनियां ज्यादा से ज्यादा मुनाफा करती रहेगी और व्यक्ति अधिक से अधिक सुविधाएं पाते रहेंगे। मुख्यधारा की संतुलनकी अवधारणा तार्किक रूप में सिर्फ उस संसार में टिक सकती है जहां द्रव्य नाम की कोई चीज न हो। ऐसा द्रव्यविहीन समाज पूंजीवाद नहीं हो सकता। इसीलिये पूंजीवाद के संदर्भ में मुख्यधारा के अर्थशास्त्र के द्रव्य संबंधी विवेचन का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यही वजह है कि वह अंतत: द्रव्य को मुख्य रूप से परिचलन का माध्यमर मानने की जिद पर अड़ जाता है। जबकि सचाई यह है कि द्रव्य तभी परिचलन के माध्यमकी भूमिका अदा कर सकता है जब वह खुद संपत्ति का भी एक रूप होता है।

द्रव्य के मूल्य के बारे में द्रव्यवादीसोच से भिन्न प्रभात मार्क्स को संपत्तिवादीधारा का एक प्रमुख प्रतिनिधि मानते हुए कहते हैं कि मार्क्‍स ने द्रव्य के संपत्ति को धारण करने के गुण को पहचाना था, इसीलिये वे पूंजीवादी समाज में अतिउत्पादन की संभावना की व्याख्या भी कर पाये थे। प्रभात के अनुसार मार्क्‍स के अनुयायियों ने उनके इस बुनियादी योगदान पर अधिक ध्यान नहीं दिया, वे अतिरिक्त मूल्यके सिद्धांत वाली खोज पर ही बल देते रहे। यह काम माक्र्स के बाद, लगभग 75 वर्ष गुजर जाने के उपरांत कालेस्की और केन्स के माध्यम से संपन्न हुआ। प्रभात कहते हैं कि मार्क्स ने द्रव्य के मूल्य के निर्धारण में मूल्य के श्रम सिद्धांतका प्रयोग किया और केन्स का भी मानना था कि तमाम जिंसों के बरक्स द्रव्य का मूल्य एक जिंस, श्रम शक्ति के बरक्स तय किये गये द्रव्य के मूल्य से निर्धारित होता है। 

प्रभात द्रव्यवादियों की तुलना में संपत्तिवादियों की परंपरा को कहीं ज्यादा यथार्थपरक और तर्क के लिहाज से पुष्ट मानते हैं, तथापि अपनी प्रस्थापना के लिये इस संपत्तिवादी नजरिये को अधूरेपन का दोषी भी बताते हैं

इसी बिंदु पर जरा थम कर, हम यह कहना चाहेंगे कि प्रभात पटनायक मूल्य के श्रम सिद्धांतकी जिस बात को मार्क्‍स के मत्थे मढ़ कर उनके संपत्तिवादीनजरिये के अधूरेपन की बात करते हैं, दरअसल, वह नजरिया मार्क्स का नहीं, उस क्लासिकल अर्थशास्त्र का है जिसकी आलोचना के आधार पर ही मार्क्स के आ​‍र्थि‍क सिद्धांतों का पूरा महल खड़ा है।

श्रम ही सारी संपदा का श्रोत है, क्लासिकल अर्थशास्त्र की इस बात का खंडन करते हुए जोरदार शब्दों में मार्क्स ने कहा था कि सारी संपदा का स्रोत श्रम ही नहीं है। प्रकृति को भी उपयोग मूल्यों का (भौतिक संपदा में और है भी क्या!) श्रम जितना ही स्रोत कहा जा सकता है।...और क्योंकि आदमी आरंभ से ही प्रकृति के प्रति, जो श्रम की सभी वस्तुओं और साधनों का आदिस्रोत है, स्वामी जैसा रवैया रखता है, उसके साथ अपनी संपत्ति जैसा व्यवहार करता है, इसलिये उसका श्रम उपयोग मूल्यों का, और इस कारण संपदा का भी सा्रेत बन जाता है। पूंजीपति अगर झूठे ही श्रम पर अलौकिक सृजन शक्ति का आरोप करते है तो वे ऐसा सकारण करते है, क्योंकि ठीक इसी बात से कि श्रम प्रकृति पर निर्भर करता है, यह बात पैदा होती है कि जिस मनुष्य के पास अपनी श्रमशक्ति के अलावा और कोई संपत्ति नहीं है, उसे समाज और संस्कृति की सभी अवस्थाओं में दूसरे मनुष्यों का दास होना पड़ेगा, जिन्होंने अपने को श्रम की भौतिक परिस्थितियों का मालिक बना लिया है। वह केवल उनकी आज्ञा से ही काम कर सकता है, इसलिये जी भी वह उनकी आज्ञा से ही सकता है।

फ्रेडरिक एंगेल्स ने अपने लेख वानर से नर बनने की प्रक्रिया में श्रम की भूमिकाका प्रारंभ इन पंक्तियों से किया है: अर्थशास्त्रियों का दावा है कि श्रम समस्त सम्पदा का स्रोत है। वास्तव में वह स्रोत ही है, लेकिन प्रकृति के बाद

कहना न होगा कि मार्क्स श्रम पूजाकी किसी एकांगी दृष्टि के आधेअधूरेपन से मुक्त थे और तभी पूंजीवाद की एक समग्र आलोचना का मुकम्मल दृष्टिकोण विकसित कर पाये थे। मार्क्‍स को केन्स और कोलेस्की की श्रेणी में रखना वर्गीकरण के सरल अध्यापकीय रास्ते की फांद में फंसने का परिणाम है।

प्रभात ने पूंजीवाद को मांगसंकुचन वाली जो व्यवस्था कहा है, वह अतिउत्पादन की महामारी से एकबारगी बर्बरता के युग में पहुंचा दिये गये समाज के बारे में मार्क्स के विश्लेषण से अलग नहीं है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र कहता है कि पूंजीवाद अपने इन संकटों से उबरने के लिये उत्पादक शक्तियों के एक बड़े भाग को जबर्दस्ती नष्ट करता है और नयेनये बाजारों को अपने में समाविष्ट करता है। पूंजीवाद को जीवित रखने की ये चतुर्दिक कोशिशें ही इस बात को भी साबित करती है कि पूंजीवाद कभी किसी बंद, आत्मकेंद्रित प्रणाली के रूप में न कभी अस्तित्व में रहा है और न रह सकेगा

  • अरुण माहेश्वरी