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सोमवार, 16 मार्च 2015

कृषिप्रधान देश या किसानों की कब्रगाह?


  • कृष्णकांत 

सरकार ने 13 मार्च को संसद में जानकारी दी कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद डिवीजन में 2015 के शुरुआती 58 दिनों के भीतर 135 किसानों ने आत्महत्या कर ली. कृषि राज्यमंत्री मोहनभाई कुंडारिया ने बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 और 2013 में क्रमश: 13,754 और 11,772 किसानों ने आत्महत्या की. भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं. 1995 से लेकर अब तक 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. 

महाराष्ट्र लगातार 12वें साल महाराष्ट्र किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल है. यहां का सूखाग्रस्त विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह है. अकेले महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. बीती फरवरी में प्रधानमंत्री मोदी ने बारामती में शरद पवार के किसी ड्रीम प्रोजेक्ट कृषि विज्ञान केंद्र का उद्घाटन किया और दोनों नेताओं ने एक दूसरे को किसानों का हितैषी बताया. यह गौर करने की बात है कि 1995 से अब तक बीस साल में शरद पवार दस साल कृषि मंत्री रहे और सबसे ज्यादा किसान महाराष्ट्र में मरे. जब शरद पवार के  कथित ड्रीम प्रोजेक्ट का उद्घाटन हो रहा था, तब किसानों की इन मौतों का तो कोई जिक्र नहीं हुआ, कृषि को वैश्विक बाजार में तब्दील करने की घोषणा जरूर हुई. नई सरकार आने के बाद से अब तक इस सरकार ने एक बार भी किसानों को कोई सांत्वना नहीं दी है कि वे कर्ज और गरीबी के चलते आत्महत्या न करें, सरकार उनकी समस्याओं को सुलझाने के कुछ उपाय करेगी. 

चुनाव प्रचार के मोदी हर सभा में कहा करते थे कि देश के संसाधनों पर पहला हक गरीबों और किसानों का है. लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनते ही अडाणी को छह हजार करोड़ का सरकारी कर्ज दिलवाना उनकी शुरुआती बड़ी घोषणाओं में से एक थी. तब से वे दुनिया भर में घूम घूम कर पूंजीपतियों को भरोसा दे रहे हैं कि उनकी सरकार पूंजीपतियों को पूरी सुरक्षा देगी. अमेरिका से परमाणु समझौते के तहत आनन फानन में भारत सरकार ने अमेरिकी कंपनियों को दुर्घटना संबंधी जवाबदेही से मुक्त कर दिया और देश के खजाने से 1500 करोड़ का मुआवजा पूल गठित कर दिया. यदि पूंजीपतियों के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा सकता है तो क्या कर्ज से मरते किसानों की जान बचाने के लिए कुछ सौ करोड़ रुपए की योजनाएं नहीं शुरू की जा सकतीं? 

जब संसद में सरकार किसान आत्महत्यों की जानकारी दे रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्रा पर जा चुके थे. उन्होंने जाफना में श्रीलंकाई तमिलों को भारत की मदद से बने 27 हजार मकान सौंपे और इस परियोजना के दूसरे चरण में भारत के सहयोग से और 45 हजार मकान बनाए जाने की घोषणा की. मॉरीशस को  इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए 50 करोड़ डॉलर का रियायती कर्ज देने की पेशकश की. इसी तरह अनुदान और कर्ज के रूप में सेशेल्स को भी 7.50 करोड़ डालर की राशि दी गई. काश प्रधानमंत्री अपने देश में मर रहे किसानों पर कुछ करते नहीं तो कोई घोषणा ही करते. 
मोदी एक ऐसे देश के प्रधानमंत्री हैं जहां पांच करोड़ लोग बेघर हैं. इन बेघर लोगों के लिए मोदी सरकार ने कोई पहल की हो, ऐसा अभी सुनने में नहीं आया है. सरकार भूमि अधिग्रहण बिल के लिए जरूर पूरा जोर लगा चुकी है जिसके तहत किसानों की सहमति के बिना उनकी जमीनें लेकर कारपोरेट को सस्ते दाम में देने की योजना है.  
यह वही देश है जो स्मार्ट सिटी बनाने और बुलेट ट्रेन चलाने की बात करता है, लेकिन इस पर कोई बात नहीं करता कि पहले से चल रही खटारा ट्रेनों में पानी नहीं होते. इस पर बात नहीं होती कि ज्यादातर जनसंख्या को पीने के लिए शुद्ध पानी तक नहीं है. यहां इस पर कोई बात नहीं होती कि हर साल करीब साढ़े तेरह लाख बच्चे पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले मर जाते हैं. इसका कारण डायरिया और निमोनिया जैसी साधारण बीमारियां हैं. हम इन शर्मनाक आंकड़ों पर कभी शर्मिंदा नहीं होते.
जब प्रधानमंत्री उद्योगपतियों को विश्वास में लेने के लिए ताबड़तोड़ कॉरपोरेट हितैषी घोषणाएं कर रहे हैं और दुनिया भर में घूम घूम कर आर्थिक मदद बांट रहे हैं, उसी समय में स्वाइन फ्लू से अबतक 1600 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और करीब 50 हजार पर यह खतरा बना हुआ है. यदि स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी से इतनी मौतें अमेरिका या यूरोपीय देशों में ​होतीं तो क्या वहां ऐसी ही चैन की बंसी बज रही होती? 

चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने किसानों को लेकर बहुत बड़ी बड़ी बातें की थीं लेकिन अब किसान उनकी चिंताओं में नहीं हैं. भाजपा ने वादा किया था कि किसानों को उनकी लागत में 50 फ़ीसदी मुनाफ़ा जोड़कर फ़सलों का दाम दिलाया जाएगा. लेकिन सरकार बनाने के बाद मोदी एंड टीम का पूरा जोर कॉरपोरेट और मैन्यूफैक्चरिंग पर है. उनकी प्राथमिकता में कृषि और किसान कहीं नहीं हैं. सरकार मेक इन इंडिया के लिए तो मशक्कत कर रही है लेकिन कृषि के लिए उसके पास कोई योजना या सोच नहीं है. देश की करीब 60 प्रतशित जनसंख्या की आजीविका का आधार कृषि क्षेत्र है. लेकिन इस क्षेत्र को लेकर सरकार ने अब तक किसी बड़े नीतिगत बदलाव या घोषणा से परहेज ही किया है. जबकि कृषि पर गंभीर संकट मंडरा रहे हैं. चालू वित्त वर्ष (2014-15) में कृषि विकास दर सिर्फ़ 1.1 फ़ीसदी रहने का अनुमान है.

कृषि की दयनीय हालत के बावजूद अपने पहले बजट में मोदी सरकार ने कृषि आय की बात तो की, लेकिन कृषि बजट में कटौती कर दी.बजट में किसानों के लिए बजट में कुछ खास नहीं रहा. सरकार द्वारा जिस कृषि लोन की बात की जाती है, उसका फायदा किसानों से ज्यादा कृषि उद्योग से जुड़े लोगों को होता है. हालिया बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ऐलान किया कि कॉरपोरेट टैक्स को अगले चार सालों 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी किया जाएगा.

मोदी सरकार की अब तक की नीतियों और केंद्रीय बजट का साफ संदेश है कि किसानों को वह सांत्वना मात्र देने को तैयार नहीं हैं. यह कृषिप्रधान फिलहाल किसानों का कब्रगाह बना रहेगा. 

शुक्रवार, 15 जून 2012

अर्थ के अनर्थ की तहकीकात



जाने माने अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर गिरीश मिश्र की नई किताब बाज़ार-अतीत और वर्तमान’ की समयांतर में लिखी समीक्षा आप सब के लिए 



बाज़ार को लेकर साहित्य और समाज, दोनों में जितनी बहस आज है, शायद पहले कभी नहीं थी. नब्बे के दशक में भूमंडलीकरण और उदारीकरण की संरचनात्मक समायोजन वाली नई आर्थिक नीतियों के लागू  होने के बाद से जिस तरह से बाज़ार में नई-नई उपभोक्ता वस्तुओं का एकदम से आगमन हुआ और इस नई आर्थिक व्यवस्था के फलस्वरूप जन्में एक नए मध्यवर्ग के बीच उपभोक्तावाद ने जिस तरह से जड़ें पसारी, यह वैकल्पिक व्यवस्था का स्वप्न देखने वाले लोगों के लिए भौंचक कर देने वाली परिस्थितियाँ थीं. सोवियत रूस के विघटन के बाद पहले से ही अवसन्नता कि स्थिति में पड़े हुए बौद्धिक वर्ग के लिए यह परिघटना एक आघात से कम न थी. वैसे भी खासतौर पर हिन्दी के साहित्यिक वाम के एक बड़े हिस्से के बीच वामपंथ को लेकर जो समझदारी रही वह किसी वैज्ञानिक समझदारी की जगह वंचित-शोषित वर्ग के प्रति एक भावनात्मक लगाव और पक्षधरता के कारण ही थी, आज भी है. यह कोई अस्वाभाविक बात नहीं थी, एक हद तक इसके सकारात्मक पहलू भी हैं, लेकिन कई बार वामपंथ के औजारों की सही समझ के अभाव में केवल भावनात्मक पक्षधरता ऐसे सूत्रों में अनुदित होती है कि वह उन्हीं उद्देश्यों के विरुद्ध काम करने लगती है, जिनके साथ होने का वह दावा कर रही होती है.
बहुचर्चित कहानी बाज़ार में रामधन इसका एक बड़ा उदाहरण है. उदारीकरण की नई नीतियों को लेकर अक्सर ऐसी चीजें देखी जाती हैं. इन्हें आज़ादी के बाद लागू की गयी नीतियों और माडलों की तार्किक परिणिति की तरह देखने की जगह एक बिलकुल नई परिघटना की तरह देखा गया. नेहरूवादी समाजवाद को, जो अपने मूल में राजकीय पूंजीवाद का ही एक माडल था, शुरू से ही तमाम लोगों द्वारा समाजवादी माडल की तरह देखा गया, जिनमें खुद को वाम कहने वाले साहित्यकार ही नहीं राजनीतिक कार्यकर्ता और नेता भी शामिल थे. तो नब्बे के दशक के बाद के समय में उस पुराने राजकीय पूंजीवाद को एक तरह की नास्टेल्जिया से याद किया जाना (जो कमोबेश अब भी ज़ारी है) और प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे शत्रु बाज़ार के खिलाफ जंग का एलान कर दिया गया. बाज़ार के खिलाफ लिखी गयी कविताओं से लेकर कहानियों, उपन्यासों और लेखों का एक जखीरा आज हमारे सामने है. एक ऐसे शब्द बाजारवाद- के खिलाफ यह छायायुद्ध लगातार लड़ा जा रहा है, जो असल में कहीं है ही नहीं, जो असल में पूंजीवाद की जगह बड़ी चतुराई से पूँजीवाद के सिद्धांतकारों द्वारा पेश किये गए शब्द बाजार प्रणाली (market system) का भ्रष्ट अनुवाद है. इस शब्द की लोकप्रियता का यह आलम है कि एक आलेख में मेरे द्वारा लिखे गए बाज़ार की ताकतों को एक वरिष्ठ संपादक ने, जो एक वरिष्ठ साहित्यकार भी हैं, बाजारवाद में तब्दील कर पूरे वाक्य को हास्यास्पद बना दिया था. वरिष्ठ अर्थशास्त्री और विश्व साहित्य के गंभीर अध्येता प्रोफ़ेसर गिरीश मिश्र की सद्य-प्रकाशित पुस्तक बाज़ार-अतीत और वर्तमान ऐसे संभ्रम के माहौल में बहुत सारे धुंध और जाले साफ़ करती है. वह न केवल इस शब्द के पीछे छुपी साजिश को सामने लेकर आता है, बल्कि पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रस्तावित उपभोक्ता की सार्वभौमिकता के दावे को भी प्रश्नांकित करता है. साथ ही वह बाजार की उत्पति से लेकर उत्पादन संबंधों में बदलाव के साथ-साथ आई इसकी भूमिका की विस्तार से जांच-पड़ताल करते हैं.

जिस पहली और सबसे ज़रूरी बात वह आरम्भ करते हैं वह यह कि बाज़ार न तो पूंजीवाद के दौर की पैदाइश हैं न ही पूंजीवाद के साथ समाप्त हो जायेंगे. बाज़ार का उद्भव नामक अध्याय में वह उन सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का विस्तार से वर्णन करते हैं. प्राक-आधुनिक समाजों में वस्तु-विनिमय (barter-system) की जगह मुद्रा के उदय की व्याख्या करते हुए वह मुर्गियों और बकरी के बीच के विनिमय की दिलचस्प दिक्कतों वर्णन करते हुए वह प्राक-मुद्रा के उदय के बारे में बताते हैं. पश्चिम के साथ भारत में बाज़ार के उदय और विकास का निर्धारण करने के लिए वह अथर्ववेद, पाणिनी और कौटिल्य अर्थशास्त्र के उद्धरण देते हुए सिद्ध करते हैं कि 500 ई.पूर्व में ही व्यापार न केवल स्थानीय अपितु आयात-निर्यात संबंधी व्यापक स्तर पर भी शुरू हो चुका था. सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के विकास के साथ-साथ व्यापार की पूरी व्यवस्था की संरचना और स्वरूप में भी बदलाव आया. बाणभट्ट की हर्षचरितम के उद्धरणों के सहारे वह बताते हैं कि - इस दौर तक व्यापार में मुनाफाखोरी जैसी प्रवृति भी आ गयी थी. इस दौर में वणिज तस्कर जैसे शब्द का प्रयोग मिलता है जिससे यह रेखांकित करने का प्रयास किया गया है कि चोर बने बिना धनवान वणिक होना मुश्किल है. साथ ही वह यह महत्वपूर्ण तथ्य भी रेखांकित करते हैं कि बाज़ार को राज्य द्वारा नियंत्रित रखने की परिघटना हजारों वर्ष पुरानी है. अगले अध्याय में वह पूंजीवाद के पहले भारत में विनिमय की विवेचना करते हुए वह तीन निष्कर्षों पर पहुँचते हैं, पहला बाज़ार निरंतर विकसित और विस्तृत होता रहा, दूसरा- उत्पादन का मूल उद्देश्य उपभोग को विविधतापूर्ण बनाना था न कि मुनाफ़ा कमाना और तीसरा बाज़ार सख्ती से ग्राम समुदाय और तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था के अधीन था, जहाँ कीमतों, वस्तुओं की गुणवत्ता और मापतौल पर राज्य या समाज की निगाह निरंतर बनी रहती थी. गडबडी करने वालों पर सख्त कार्यवाही होती थी. इसी दौर में योरप के बाजारों की संरचना की विवेचना करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सामंतवाद के पतन तक आई समस्त आर्थिक प्रणालियों के लिए यह प्रस्थापना सही थी कि पारस्परिकता, पुनर्वितरण और पारिवारिकता के सिद्धांत मूलाधार बने रहे. हालांकि वह इस तथ्य को रेखांकित नहीं कर पाए हैं कि इस दौर में खासतौर से भारत जैसे समाज में, जहाँ जाति जैसी उत्पीडक सामाजिक संरचना के कारण  स्वनिर्भर गाँवों में उत्पादक खुद अपने उत्पाद का उपभोग कर पाने के लिए आज़ाद नहीं था, बाज़ार ने एक हद तक मुक्तिदाता की भूमिका भी निभाई, यहाँ ग़ालिब का वह शेर याद किया जा सकता है और ले जायेंगे बाज़ार से गर टूट गया/ जाम-ए-जम से मेरा जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है.

बाज़ार का प्रभाव असल में पूंजीवाद के आगमन के साथ बढ़ता चला जाता है. इस दौर में बाज़ार समाज के कार्यकलाप में सहायक की भूमिका से आगे बढ़कर एक ऐसी सत्ता में तब्दील हो जाता है जो पूरी आर्थिक प्रणाली का नियंत्रण, नियमन और निर्देशन करने लगता है. लाभ इकलौता उद्देश्य बन जाता है और बाज़ार पर समाज का नियंत्रण धीरे-धीरे खत्म होता चला जाता है. यह स्वचालित तथा स्वनियमित बाज़ार मनुष्यता के समक्ष एक चुनौती की तरह आता है. उत्पाद आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए नहीं अपितु बाज़ार में बेचने के लिए आता है, जिसका उद्देश्य, जाहिर तौर पर मुनाफ़ा कामना होता है. यहाँ तक कि श्रम, भूमि और मुद्रा भी मुनाफे के उद्देश्य से माल में तब्दील हो जाते हैं. पोलान्यी का उद्धरण देते हुए वह बताते हैं कि श्रम, भूमि और मुद्रा को माल बनाकर उन्हें बाज़ार तंत्र के हवाले करने के परिणाम समाज के लिए विध्वंसकारी होंगे. आज हिन्दुस्तान सहित दुनिया भर में जारी जल-जंगल-जमीन की लूट और श्रम के बेतहाशा शोषण के साथ मुद्रा बाज़ार की उठापठक के चलते मानवता के सम्मुख उपस्थित अभूतपूर्व संकट के मद्देनजर इस भविष्यवाणी के महत्व को समझा जा सकता है. श्रम, भूमि और मुद्रा को माल बनाकर पूंजीवाद की हवस ने खुद स्वनियमित बाज़ार को भी संकट में डाल दिया है. इसका सीधा परिणाम बाज़ार और समाज में टकराव के रूप में सामने आता है. इसी शीर्षक के अगले अध्याय में वह पूंजीवाद के विकास के साथ पैदा हुई परिस्थितियों का विस्तार से वर्णन किया है. योरप में औद्योगीकरण की प्रक्रिया में हुए गाँवों के विघटन और वहाँ से पलायन पर मजबूर मजदूरों की नगरीय व्यवस्था से पैदा हुई घृणा को रेखांकित करते हुए वह इस असंतोष के कारणों की विस्तार से विवेचना करते हैं. साथ ही वह पूंजीवादी उत्पादन संबंधो के स्थापित होने के साथ-साथ उसके पक्ष में चलने वाली बौद्धिक कार्यवाहियों का ज़िक्र करते हैं. एडम स्मिथ के वेल्थ आफ नेशंस के साथ वह टामसन हाब्स और विलियम टाउनसेंड के उस निष्कर्ष का ज़िक्र करते हैं जिसमें यह साफ़ किया गया था कि मुक्त समाज में दो नस्लें होंगी, सम्पतिवानों की और मजदूरों की. मजदूरों की संख्या खाद्य पदार्थों की उपलब्धि पर निर्भर होगी ; और जब तक संपत्ति सुरक्षित रहेगी तब तक भूख मजदूरों को काम करने के लिए बाध्य करेगी. किसी मैजिस्ट्रेट की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि भूख अनुशासित करने का अच्छा तरीका है. ज़ाहिर है कि इस गैरबराबरी और संसाधनों की लूट के पक्ष में माल्थस या रिकार्डो जैसे सिद्धांतकार सामने आते हैं. पी बी से कहते हैं कि जो बना है वह सब बिक जाता है, एडम स्मिथ किसी अदृश्य हाथ द्वारा बाज़ार को हमेशा संतुलन में रखे जाने की बात करते हैं, माल्थस श्रमजीवी वर्ग की विपन्नता की जिम्मेवारी उनके द्वारा जनसंख्या बढाए जाने के सर थोप देते हैं. साहित्य से लेकर दर्शन तक में पूंजीवाद के निजी सम्पति के अधिकार और श्रम, जमीन और मुद्रा को माल में बदल देने के पक्ष में माहौल बनया जाता है. लेकिन इसी के साथ-साथ इस लूट का प्रतिरोध भी जन्म लेता है. गिरीश जी ने राबर्ट ओवेन का हवाला दिया है, जिसने अगर बाज़ार अर्थव्यस्था को अपने खुद के नियमों के अनुसार विकसित होने दिया गया तो वह बड़ी और स्थाई बुराइयों को जन्म देगी. इसी दौर में अंपटन सिंक्लेयर के जंगल जैसे उपन्यास लिखे गए, जो नई फैक्ट्रियों के भीतर श्रमिकों के भयावह शोषण और बाहर उनकी नारकीय जीवन स्थितियों का ज़िंदा दस्तावेज बना.

इस अध्याय में गिरीश जी, सामंतवाद के दौर से निकलकर पूंजीवाद के दौर में आने पर सामाजिक संरचनाओं में हुए बदलाव का ज़िक्र करते हैं. ज़ाहिर तौर पर पूंजीवाद सामंतवाद की तुलना में एक आगे बढ़ी हुई सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था थी, जहाँ मनुष्य की अस्मिता और आजादी के लिए सम्मान था. आर्थिक गैरबराबरी तो खैर पूंजीवाद की लाक्षणिकता है ही, लेकिन सामंतवाद के सामाजिक गैरबराबरी वाले ढांचे में दरार तो इसने लगाई ही. गिरीश जी के शब्दों में जाति-बिरादरी, छुआछूत और धर्म-सम्प्रदाय के बंधनों से मुक्त तो कर दिया मगर भूख और सामाजिक असुरक्षा का हर्निश भय पैदा कर दिया. हालांकि, भारत में अपनी स्वाभाविक विकास प्रक्रिया से गुजरे बिना जिस तरह से औपनिवेशिक शासन द्वारा बीमार और सतमासा पूंजीवाद आया, गिरीश जी  का यह कथन और अधिक विवेचना की मांग करता है कि ब्राह्मण-शूद्र, हिन्दू-मुसलमान, ऊंच-नीच के भेद मिट गए और वे सब एक ही नई बिरादरी-मजदूर वर्ग- के सदस्य हो गए. असल में, भारत में इस तरह के जाति-धर्म विहीन मजदूर वर्ग के उदय की बात सरलीकरण सी लगती है. यहाँ ये सामाजिक विभेद लंबे समय तक अधिरचना में उपस्थित रहे और आधार में आज भी इनकी गहरी उपस्थिति दिखाई देती है. इस सन्दर्भ में थोड़ी और विवेचना और खास तौर पर उस दौर के फुले-पेरियार-अम्बेडकर जैसे आन्दोलनों के महत्व के रेखांकन की आवश्यकता थी, जिसे लेखक चुके हैं. साथ ही पूरी किताब में महिलाओं के सन्दर्भ में कोई बातचीत न होना भी खटकता है. पूंजीवाद महिलाओं को भी एक हद तक आजादी देता है, लेकिन साथ ही वह न तो उन्हें चूल्हे-चौके से मुक्ति दिलाता है और न ही लैंगिक असमानता को पूरी तरह खत्म करता है. साथ ही वह नारी देह को एक वस्तु के रूप में तब्दील कर देता और महिलाओं के श्रमिक के रूप में तब्दील हो जाने के बाद भी उन्हें पुरुषों की तुलना में दोयम दर्जे की मजदूरी और कार्य परिस्थितियाँ मिलती हैं. अभी हाल में आई जयति घोष की किताब नेवर डन एंड पुअरली पेड और इन्द्रानी मजूमदार की किताब विमेन वर्कर्स एंड ग्लोबलाइजेशन बताती हैं कि किस तरह आरंभिक पूंजीवादी बाज़ार में ही नहीं, बल्कि भूमंडलीकृत बाज़ार में महिला श्रम के साथ दोयम व्यवहार जारी है.

आगे के दो अध्यायों पाश्चात्य चिंतन में बाज़ार : एक और पाश्चात्य चिंतन में बाज़ार :दो में गिरीश जी बाजार के प्रति पश्चिमी समाजशास्त्रियों, दार्शनिकों तथा शासन व्यवस्था के बदलते नजरिये का विस्तार से जिक्र करते हैं. किताब पढ़ते हुए इन अध्यायों में बदलती सामाजिक व्यवस्थाओं के साथ बाजार के असर और उसके समर्थन के बदलते माहौल का ज़िक्र तो मिलता है, लेकिन यहाँ एक तरह का दोहराव भी लगता है और किताब के क्रम में एक व्यवधान सा आता भी दिखता है. ये दोनों अध्याय अगर बाजार और समाज में टकराव के पहले होते तो शायद बेहतर होता. जहाँ पहले अध्याय में उन्होंने अरस्तू और ईसाई धर्मगुरुओं की धन कमाने की बेलगाम प्रवृति के राजनीतिक सद्गुण और व्यक्ति के कल्याण के लिए घातक होने की मान्यता के साथ शुरुआत कर अठारहवीं सदी आते-आते पूंजीवाद के प्रमुख विचारक वाल्तेयर के इस निषकर्ष कि धार्मिक सहिष्णुता और बाजार के बीच घनिष्ठ संबंध होता है और फिर उनके इस स्टैंड कि धर्मगुरु, योद्धा और सामंत, खलनायक और व्यापारी नायक और बुद्धिजीवी होते हैं के बहाने पहले कही बात को ही और स्पष्ट किया है. बाद में वह पूंजीवादी विचारों के विकास और इसी के बरक्स समाजवाद के विचार के विकास का विस्तार से विवेचन करते हुए हीगेल, मार्क्स और शुम्पीटर जैसे विचारकों पर चर्चा करते हैं. यहाँ भी शुम्पीटर के बाद सीधे केन्स का आना थोड़ा खलता है. यहाँ विषय विस्तार माँगता था. पूंजीवादी संतुलन के अदृश्य हाथों या से के सिद्धांत के असफल होने के कारणों की विवेचना और उन स्थितियों के विवरण जिसके कारण महामंदी आई और केन्स उसके तारणहार बने, के बिना यह आम पाठक के लिए मुश्किलात पैदा करता है. हालांकि केन्स के बाद के विकास को जरूरी तवज्जो दी गयी है, जिसमें एक बार फिर से शासकीय नियंत्रण को समाप्त कर मुकरत बाज़ार विचारधारा की वापसी की बात की गयी है. हाँ, यहाँ अगर भारतीय संदर्भ में नेहरूवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था के तत्कालीन पूंजीवादी विश्व की मजबूरियों और सहूलियतों तथा समाजवादी ब्लाक की मजबूत उपस्थिति के बरक्स चर्चा की गयी होती तो पाठक के लिए इसके असली चरित्र को समझना और नेहरूवादी समाजवाद के पूंजीवादी रंग को पहचानना आसान हो जाता. साथ ही वह यह रेखांकित करने में भी स्पष्ट नहीं हैं कि बाज़ार नहीं बल्कि मुनाफे की हवस में डूबा अनियंत्रित पूंजीवाद हमारे समय के लिए घातक है, जिसके चलते उत्पादन आवश्यकता की पूर्ती की जगह माल के उपभोग को केन्द्र में रखकर किया जाता है. दिक्कत बाजार से नहीं, उस पर पूंजीवादी नियंत्रण से है, जिसमें सारा अधिशेष पूंजीपतियों की जेब में चला जाता है और इस प्रकार सामाजिक सम्पति व्यक्तिगत सम्पति में तब्दील होती जाती अहि और असमानता की खाई और गहरी होती जाती है. जिस सरलीकरण के खिलाफ उन्होंने शुरू में बात की थी, कई बार बाज़ार के खिलाफ जैसे टर्म्स का उपयोग कर वह खुद उसके शिकार होते हैं. यह विषय अलग से एक अध्याय की मांग करता है. इसके आगे मुद्रा बाजार की विवेचना है, जो अर्थशास्त्र न जानने वाले पाठकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
                
इस पुस्तक की एक विशिष्ट उपलब्धि है इसका अंतिम अध्याय ईश्वर मंडी और बाज़ार. वाल्तेयर बाजार की उपस्थिति में जिस धार्मिक सहिष्णुता की बात कर रहे थे, उसे तो खैर उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के इतिहास ने गलत साबित किया ही साथ ही मुनाफे की हवस ने धर्म को ही एक बाजार में तब्दील कर दिया. अक्सर हम सोचते हैं कि ऐसा हिन्दुस्तान में ही हुआ. लेकिन गिरीश जी एमिल जोला की किताब लुर्द के हवाले से बताते हैं कि किस तरह डेढ़ सौ साल पहले एक असामान्य दृष्टि वाली चौदह साल की बच्ची द्वारा कुमारी मेरी के तथाकथित दर्शन के किस्से का वाणिज्यिक उपयोग कर पोप की संस्तुति से एक स्थल को तीर्थस्थल और उसके पास के झरने को चमत्कारी घोषित कर वहाँ न केवल एक भव्य गिरिजाघर बनाया गया बल्कि उसे एक सफल वाणिज्यिक केन्द्र में तब्दील कर दिया गया. एक ऐसे दौर में जब औद्योगिक क्रान्ति के प्रभाव में चारों ओर वैज्ञानिकता का बोलबाला था, यह परिघटना रहस्यात्मकता के प्रति लोगों के असीम आकर्षण और पूंजीवादी बाज़ार द्वारा हर चीज को माल में तब्दील कर लेने को स्पष्ट रेखांकित करता है. भारत में तो ऐसे तमाम किस्सों से हम परिचित हैं ही.

कुल मिलाकर गिरीश जी की यह किताब हिन्दी में अर्थशास्त्र पर उपस्थित गैर पाठ्य-पुस्तकीय पुस्तकों की कमी को एक हद तक पूरा करने वाली ही नहीं बल्कि एक नई बहस को शुरू करने वाली भी है जो आम पाठक को चीजों को देखने की एक ताज़ा अंतर्दृष्टि देती है. हालांकि 174 पृष्ठों की इस किताब का 350/- रुपये का मूल्य पाठक  और किताब के बीच एक दूरी पैदा करता ही है, लेकिन यह भी साबित करता है कि पूंजीवादी बाज़ार ने किसी को नहीं छोड़ा है, यहाँ तक कि अपने विरोधियों को भी नहीं. 

समीक्षित पुस्तक बाज़ार अतीत और वर्तमान

लेखक गिरीश मिश्र

प्रकाशक ग्रन्थ शिल्पी

पृष्ठ संख्या 174 (हार्डबाऊंड)
मूल्य रु 350/- 
   

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

इस बज़ट से किसको उम्मीद है?



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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बहुप्रतीक्षित प्रेसवार्ता के बाद पत्रकार दिलीप मण्डल ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा  कि इस पूरी प्रेसवार्ता में सिर्फ़ दो बार ग़रीब शब्द का उपयोग किया गया और एक प्रमुख चैनल की संवाददाता ने सिर्फ़ दो सवाल पूछे – दोनों क्रिकेट के बारे में थे! यह पूरा घटनाक्रम न केवल सरकार बल्कि मीडिया की भी प्रतिबद्धताओं और पक्षधरताओं को उजागर करता है। ऐसे माहौल में आगामी 28 तारीख़ को आने वाले बज़ट से क्या उम्मीद की जा सकती है?
दरअसल, योजनाबद्ध विकास के नेहरुवादी ढांचे के विघटन के बाद से ही नव उदारवादी आर्थिक प्रणाली के युग में बज़ट धीरे-धीरे अप्रासंगिक होता चला गया है। कभी धीरे और कभी पूरी गति से सुधारवादी एजेण्डे को लागू करने के हथियार के रूप में ही इसका उपयोग विभिन्न सरकारें करती रही हैं। इसीलिये चाहे एन डी ए की सरकार रही हो चाहे अब यू पी ए की, आर्थिक नीतियाँ लगभग निर्बाध और अपरिवर्तित रूप में अमेरिका द्वारा निर्देशित निजीकरण-भूमण्डलीकरण की राह पर ही चलती रही हैं। हर पाँच साल पर होने वाले चुनाव कभी-कभी इसकी गति पर थोड़ा-बहुत अंकुश ज़रूर लगाते हैं लेकिन इसकी दिशा बदल पाने की हैसियत उनकी भी नहीं। ‘आर्थिक विकास’ के परचम तले ये नीतियां देश की एक छोटी सी आबादी के हित में बहुसंख्यक ग़रीब और वंचित आबादी का जीवन लगातार मुश्किल करती जा रही हैं। मिस्र और ट्यूनीशिया का ज़िक्र यहां विषयान्तर न होगा, जहां इन नीतियों ने जनता में वह असंतोष पैदा किया जिसने बरसों पुरानी सत्तायें पलट दीं। पूरे नव उदारवादी विमर्श की विकास नीतियां रिसाव सिद्धांत (ड्रेन थियरी) पर टिकी होती हैं जिसके अनुसार अगर पूंजीपतियों के पास पर्याप्त मात्रा में धन पहुंचा दिया जाये तो अपने-आप उसमें से कुछ हिस्सा निचले संस्तरों पर पहुंच जायेगा, इसीलिये ग़रीबों के लिये दिये गये सरकारी विकास को नव उदारवादी सिद्धांतकार सरकारी धन की बर्बादी या लीकेज कहते हैं। पिछले वर्षों में शिक्षा, स्वास्थय जैसी बुनियादी सुविधाओं में कटौती और कृषि जैसे क्षेत्रों में सब्सीडियों की कटौती के पीछे यही तर्क है।

इस साल अगले कुछ महीनों में होने वाले चुनावों तथा मंहगाई और भ्रष्टाचार के कारण आमजन में व्यापत भयावह असंतोष के कारण संभव है कि बजट में आर्थिक सुधारों को गति देने के नाम पर उस तरह सब्सीडियों आदि में कटौती न की जाय और बहुत संभव है कि मनरेगा, शिक्षा के अधिकार तथा खाद्य सुरक्षा जैसे मदों में राशि आवंटन में वृद्धि की जाये। लेकिन लोगों की क्रयशक्ति बढ़ाने के लिये  सुरक्षित तथा नियमित रोज़गारों में वृद्धि जैसे सबसे ज़रूरी मुद्दे पर कोई महत्वपूर्ण क़दम उठाये जाने की कोई उम्मीद नहीं है। पिछले दरवाज़े से खुदरा जैसे क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रवेश दिये जाने के बाद इस बज़ट में उम्मीद की जा रही है कि इस क्षेत्र में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति दे दी जाय। इसका सीधा प्रभाव होगा कि इस क्षेत्र के नब्बे फीसदी से अधिक असंगठित छोटे दुकानदारों के रोज़गार ख़तरे में पड़ जायेंगे। यहां यह बता देना उचित होगा कि पिछले दस सालों में संगठित क्षेत्र में रोज़गारों में 15 फीसदी से अधिक की कमी आई ही है, असंगठित क्षेत्र में भी रोज़गार की सालान वृद्धि दर पिछले दशक के 2.03 प्रतिशत से घटकर 1.85 प्रतिशत ही रह गयी है।

अगर इस बज़ट से पूर्व की स्थितियों का आकलन करें तो सरकार के तमाम दावों के बावज़ूद राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ते हुए सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 5.5 फीसदी के स्तर पर है। मज़ेदार बात यह है कि आर्थिक सुधारों के समय सबसे बड़ी दलील इसी घाटे को नियंत्रण में रखने की थी लेकिन उदारीकरण के लगभग दो दशक बीत जाने के बाद भी यह घाटा घटने की जगह सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता ही जा रहा है। साथ ही सरकार की कुल उधारी को पिछले बज़ट में थ्री जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से प्राप्त एकमुश्त रक़म के कारण 3.5 ख़रब रुपये पर सीमित रखा जा सका था इस वर्ष इसके 4 करब रुपये तक पहुंचने की संभावना है। इस साल ऐसी किसी सुविधा के अभाव में यह देखना होगा कि सरकार इस घाटे और उधारी से कैसे निपटती है? इसके अलावा लंबे समय से चली आ रही कर-सुधार की मांगो पर भी सरकार के निर्णय की प्रतीक्षा रहेगी। कारपोरेट क्षेत्रों में इस बात को लेकर काफी चिन्ता जताई जा रही है कि कहीं खाद्य असुरक्षा क़ानून के चलते इस मद में सरकार भारी ख़र्च न कर दे। एक अनुमान के मुताबिक इस मद में सरकार वर्तमान में किये जा रहे 56,700 करोड़ को बढ़ा कर एक लाख करोड़ कर सकती है। यहां यह बता देना उचित होगा कि यही पूंजीपति सरकार से मंदी से निपटने के नाम पर 4 लाख करोड़ से अधिक की रक़म सबसीडियों तथा दूसरे नामों से वसूल चुके हैं! यह उम्मीद की जा रही है कि इस घाटे से उबरने के लिये सरकार कुछ बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश का क़दम उठा सकती है। पिछली सरकार में वामपंथियों के दबाव मेंनवरत्नोंके विनिवेश में असफल रही सरकार इस बार इनमें से कुछ की बड़ी हिस्सेदारी निजी कंपनियों को बेच कर एक तरफ़ इस घाटे की भरपाई कर सकती है तो दूसरी तरफ़ कार्पोरेट सेक्टर की पुरानी मांग को भी पूरा कर सकती है।

सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या मंहगाई से निपटने की है। रिजर्व बैंक भी अपनी रिपोर्ट में स्वीकार कर चुका है कि मंहगाई की समस्या अब ढांचागत समस्या बन चुकी है। पिछले साल भर से सब्ज़ियों, खाद्यान्नों तथा दूसरी ज़रूरी चीज़ों की क़ीमतें लगातार बढ़ रही हैं और तमाम दावों के बावज़ूद उन पर कोई प्रभावी नियंत्रण लगता नहीं दिख रहा है। मंहगाई में वृद्धि एक तरफ़ मध्यवर्ग की आय का बड़ा हिस्सा चट कर जाती है तो दूसरी तरफ़ यह ग़रीबों को धीरे-धीरे बाज़ार से बाहर कर दो जून की रोटी तक सीमित कर देती है। भारत में मंहगाई बढ़ने का मुख्य कारण कृषि क्षेत्र की पूर्ण अनदेखी है। इसका एक उदाहरण खाद में दी जाने वाली सबसीडी है जिसे 2009-2010 के 53 हज़ार करोड़ से घटा कर 50 हज़ार करोड़ कर दिया गया, जिससे यूरिया के दामों में दस फीसदी की बढ़ोत्तरी हो गयी है। इस साल भी इस सब्सीडी के और कम किये जाने की उम्मीद है। असंवेदनशीलता का आलम यह है कि विदर्भ से लेकर बुंदेलखण्ड तक किसानों की आत्महत्या के बावज़ूद सरकारें कृषि के लिये आधारभूत सुविधायें उपलब्ध कराने में असफल रही हैं। देखना होगा कि इस बज़ट में सरकार कृषि के विकास के लिये क्या ठोस क़दम उठाती है। वैसे इसकी उम्मीद तो शायद ही किसी को हो। उम्मीद तो इस बात की ही है कि भारत निर्माण जैसे कार्यक्रमों के नाम पर पूंजीगत उत्पादों के लिये ख़र्च पर और अधिक बढ़ोत्तरी की जायेगी। उद्योगपतियों की सुविधा के लिये आधारभूत संसाधनों के नाम पर इन क्षेत्रों में होने वाले सरकारी ख़र्च में इन क्षेत्रों में सरकारें पहले ही अपार धनराशि ख़र्च कर रही हैं। साथ ही मंदी की मार से अब तक उबरने में असफल निर्माण क्षेत्र भी इस बज़ट से अपने लिये और अधिक सुविधाओं की उम्मीद लगाये है।
शिक्षा के क्षेत्र में बहु-प्रतीक्षितशिक्षा के अधिकारके क़ानून के नाम पर जो आधी-अधूरी नीतियां लाई गयीं हैं उनके बाद इस क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद के छह फीसदी ख़र्च किये जाने की मांग के पूरे होने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। एक अनुमान के मुताबिक 1995 से 2025 के बीच शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले आम आदमी के ख़र्च में 12 गुने से अधिक की बढ़ोत्तरी होगी। इसका सीधा कारण शिक्षा के क्षेत्र से सरकार का पलायन है। जहां प्राइमरी शिक्षा के क्षेत्र में पैरा शिक्षकों की नियुक्ति तथा सरकारी ख़र्च में अपर्याप्त वृद्धि ने इन विद्यालयों के शैक्षणिक स्तरों को गर्त में पहुंचा दिया है वहीं उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी उपेक्षा ने डिग्री कालेजों को बस डिग्री डिस्ट्रीब्यूशन सेन्टर्स में तब्दील कर दिया है। इन पर ध्यान देने की जगह उम्मीद यही है कि इस बज़ट में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी विश्विविद्यालयों को प्रवेश की छूट देकर शिक्षा के इस बाज़ार को और बड़ा तथाखुलाकरने में सरकार अपनीअपेक्षितभूमिका ही निभायेगी।

यही स्थिति स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी है। सरकारी अस्पतालों की बदहाली ने जनता को पूरी तरह निजी क्षेत्र के रहमोकरम पर छोड़ दिया है। दवाओं के दामों पर किसी तरह का नियंत्रण न होने से हुई भयावह वृद्धि ने कोढ़ में खाज का ही काम किया है। लेकिन आम जनता को कोई राहत देने की जगह उम्मीद यही है कि इन निजी दवा कंपनियों को दिया गया पांच साला टैक्स हालिडे थोड़ा और बढ़ा दिया जायेगा। वैसे ये कंपनियां लंबे समय से आधारभूत उद्योग का दर्ज़ा दिये जाने की मांग कर रही हैं। देखना होगा कि सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है।

अन्य चीज़ों पर ग़ौर करें तो इस बज़ट में वस्तु एवं सेवा कर (जी एस टी) तथा प्रत्यक्ष कर कोड (डीटीसी) लागू किये जाने की भी उम्मीद की जा रही है। साथ ही सेवा कर के दायरे में और अधिक सेवाओं को लाने की उम्मीद है। सरकार की कोशिश कर की वर्तमान दरों से अधिक छेड़छाड़ करने की जगह आय में वृद्धि के लिये कर के आधार को विस्तृत करने की है। ज़ाहिर है इन अप्रत्यक्ष करों की अंतिम मार उपभोक्ता पर ही पड़नी है। वहीं आयकर के क्षेत्र में इसकी न्यूनतम सीमा में मामूली वृद्धि की उम्मीद की जा रही है, जो मुख्यतः उच्च मध्यम वर्ग के वाचाल उपभोक्ता को शांत रखने के उद्देश्य से है। और हां सबसे निश्चित रूप से जिस चीज़ की उम्मीद की जा सकती है वह है सिगरेट और बीड़ी की क़ीमतों में वृद्धि। तो हम जैसे लोगों के पास बज़ट से नाराज़ होने का एक और कारण है ही!

असल में नये रूप में होने के बावज़ूद इस बज़ट से किसी वास्तविक नवाचार की कोई उम्मीद नहीं है। यही कारण है कि जनता या उद्योग जगत में इसे लेकर कोई विशेष उत्साह दिखाई नहीं देता। लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि मीठी हो या तीखी, छुरी उन्हीं की जेबों पर चलनी है। उदारीकरण के दो दशकों मेंउदार’, ‘विकासऔर नयेजैसे शब्दों के अर्थ बदल गये हैं। जनता को इनसे कोई उम्मीद नहीं बची है। तकनीकी शब्दावली में रचे गये प्रपंच की जगह उसे सस्ती और अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधायें, रोज़गार और एक सुरक्षित भविष्य का आश्वासन चाहिये जो दुर्भाग्य से किसी सरकार के पास नहीं।

सोमवार, 31 जनवरी 2011

किस्सा काले धन का ·



वैसे तो भारत में काले धन का मुद्दा कोई नया नहीं है लेकिन पिछले चुनावों में जिस तरह भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया और उसके बाद स्वामी रामदेव से लेकर तमाम लोगों ने इस बारे में दावे-प्रतिदावे करने शुरु किये उसके बाद से यह एक बार फिर बहस में आया। हालांकि स्वाभाविक तौर चुनाव के बाद राजनीतिक दलों ने इसे ठंढे बस्ते में डाल दिया और अख़बारों के पन्नों से भी यह मुद्दा ग़ायब हो गया। परंतु पहले विकीलीक्स के ख़ुलासों और फिर पूर्व क़ानून मंत्री श्री राम जेठमलानी तथा अन्य लोगों द्वारा इस संबंध में दायर की गयी याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछली 19 जनवरी को न्यायधीश बी सुदर्शन रेड्डी और जस्टिस एस एस निज्जर की खंडपीठ ने जिस तरह कड़ाई से काले धन के मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया उसने इस मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया। न केवल प्रधानमंत्री को इस पर कैबिनेट में चर्चा करनी पड़ी बल्कि 25 जनवरी को दिये अपने एक बयान में वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी को भी स्वीकार करना पड़ा कि 460 बिलियन डालर से लेकर 1.6 ट्रिलियन डालर तक का धन दुनिया के तमाम ऐसे देशों के बैंकों में जमा है जिन्हेंटैक्स हैवेनकहा जाता है। अगर रुपयों में बात करें तो बीस लाख करोड़ रुपये से लेकर 51 लाख करोड़ रुपये तक! लेकिन जिनके नाम से यह धन जमा है, उन्होंने उन व्यक्तियों के नाम बताने में उन देशों के साथ हुई संधियों का हवाला देते हुए असमर्थता जताई । 27 जनवरी को इसकी अगली सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पूछा किजब आपको उस धन का स्रोत पता चल गया तो आपने क्या किया? हम उन अज्ञात नामों की बात नहीं कर रहे जिन्हें अब आप जानते हैं। हम जानना चाहते हैं कि आपने क्या कदम उठाये।ज्ञातव्य है कि इन देशों में से एक लिक्टेन्स्टीन के बैंकों में जिन 26 लोगों का काला धन जमा है सरकार को उनके नाम पता हैं और वह इसे न्यायालय को भी बता चुकी है, लेकिन जर्मनी के साथ इस मामले में हुई अपनी संधि के प्रावधानों तथा इन लोगों के ख़िलाफ़ चल रही कार्यवाही के बाधित होने की बिना पर वह इन नामों को सार्वजनिक नहीं कर रही।

दरअसल, भारत के विदेशी बैंकों में जमा काले धन की मात्रा के बारे में पहला हालिया ख़ुलासा ग्लोबल फाइनेंसियल इंटिग्रिटी स्टडी के दौरान हुआ। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व अर्थशास्त्री डा देव कार और डेवन कार्टराइट द्वारा 2002-2006 के बीच किये गये इस अध्ययन कीविकासशील देशों में अवैध वित्तीय बहिर्गमनशीर्षक रिपोर्ट ने ग़ैरक़ानूनी तरीकों, भ्रष्टाचार, आपराधिक कार्यवाहियों आदि द्वारा देश से बाहर गये धन के बारे में चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत किये। इस अध्ययन के अनुसार 1948 से 2008 के बीच भारत से कुल 462 बिलियन डालर ( यानि बीस लाख करोड़ रुपये) का काला धन विदेशी बैंकों में पहुंचा है। अगर देखा जाय तो यह धनराशि भारत के वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद की 40 फीसदी है और 2 जी स्पेक्ट्रम में सरकार को हुए कुल अनुमानित नुक्सान की बीस गुनी! इस अवैध धन के बाहर जाने की गति में औसतन 11.5 प्रतिशत की वृद्धि प्रतिवर्ष हुई है। यहाँ यह बता देना भी उचित होगा कि यह अनुमान रुपये की डालर के तुलना में अभी की क़ीमत के हिसाब से हैं। अगर इसमें इस तथ्य को शामिल कर लिया जाये कि प्रारंभिक वर्षों में रुपये की स्थिति बेहतर रही है तो यह राशि और अधिक बढ़ जाती है। डा कार का यह भी आकलन है कि वैसे तो काले धन का बाहर जाना आज़ादी के बाद से ही ज़ारी रहा है लेकिन नब्बे के दशक में लागू सुधारों के बाद इसकी गति और अधिक बढ़ गयी है। इस पूरी राशि का लगभग आधा हिस्सा 2000 से 2008 के बीच देश से बाहर गया है। नवंबर 2010 में पेश इस रिपोर्ट के अनुसार न केवल स्विटजरलैण्ड बल्कि ऐसे तकरीबन 70 देशों में यह काला धन जमा किया गया है।

वैसे स्विटजरलैण्ड के बैंको के एक संगठन स्विस बैंकिंग एसोसियेशनने 2006 में पेश अपनी एक रिपोर्ट में स्विटजरलैण्ड के विभिन्न बैंकों में विदेशियों द्वारा रखे गये धन की जो सूचना दी थी वह भी इस ओर पर्याप्त इशारा करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार स्विट्जरलैण्ड में धन जमा करने वालों में भारत का स्थान सबसे ऊपर है और भारतीय नागरिकों के 1,456 बिलियन डालर वहाँ जमा हैं। इसके बाद रूस, इंगलैण्ड, यूक्रेन और चीन का नंबर आता है। यहां यह बता देना ज़रूरी होगा कि इस रिपोर्ट के अनुसार स्विस बैंकों में भारतीयों द्वारा जमा की गयी राशि दुनिया के बाकी सभी देशों के नागरिकों द्वारा जमा की गयी कुल राशि से भी ज़्यादा है! स्विट्जरलैण्ड के बैंकों से भारतीयों का लगाव कितना है यह इस तथ्य से ही जाना जा सकता है कि भारत से हर साल लगभग अस्सी हज़ार लोग स्विट्जरलैण्ड जाते हैं और उसमें से 25 हज़ार लोग साल में एक से अधिक बार जाते हैं। अब स्विट्जरलैण्ड की ख़ूबसूरती ही इसकी इकलौती वज़ह तो नहीं हो सकती!

भूख, कुपोषण और ग़रीबी के आंकड़ों में दुनिया के अग्रणी होने के बाद काले धन के मामले में भी सबसे ऊपर बैठा देश अपने विकास की गाथा ख़ुद कह रहा है। जिस देश में अस्सी फ़ीसदी लोग 20 रुपये रोज़ से कम में गुज़ारा करते हैं, सरकार सबको पर्याप्त अनाज उपलब्ध करा पाने में असमर्थता ज़ाहिर करती है और पैसे की कमी का रोना रोकर स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे क्षेत्रों के ख़र्च में कटौती की जाती है, वहां यह अकूत धनराशि काले धन के रूप में चुपचाप हर साल बाहर जा रही है और सरकारें बस मूक दर्शक की तरह तमाशा देख रही हैं।

काले धन की उत्पति और इसके विदेशी बैंको तक पहुंचने के तमाम कारण हैं। इस धन में भ्रष्टाचार से कमाई गयी संपत्ति, कर छूट वाले सरकारी नियमों का लाभ उठाकर उससे बचाये हुए धन को बाहर भेज देना, हथियार तथा दूसरे सौदों में मिली दलाली को विदेशी बैंकों में सुरक्षित रखना, हवाला के ज़रिये हुए लेन-देन की राशि को बाहर भेज देना तथा खिलाड़ियों व कलाकारों द्वारा विदेशों में मिली धनराशि को टैक्स बचाने के लिये इन जगहों पर जमा करना शामिल है। कुछ वर्षों पहले हवाला के संदर्भ में जिस तरह कांग्रेस और बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं का नाम सामने आया था उसकी रौशनी में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इन बैंकों में जमा धन का एक बड़ा हिस्सा हमारे राजनेताओं का भी हो सकता है। अभी कुछ दिनों पहले जब सत्यम घोटाला सामने आया था तो वहां भी सरकार द्वारा निर्यात पर दी गयी छूट का फ़ायदा उठाने के लिये निर्यात बिलों को फ़र्ज़ी तरीके से बढ़ा कर दिखाया गया था। औद्योगिक घरानों में यह आम बात है और इस प्रकार जिस राशि पर कर बचाया जाता है वह विभिन्न तरीकों से उन देशों के बैंकों में जमा कर दिया जाता है। इसके अलावा हमारे बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के भ्रष्टाचार से कमाई पूंजी के भी इन बैंकों में जमा होने से इंकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन इस पूरी परिघटना का एक पक्ष और है। येटैक्स हैवेन्सविकासशील तथा ग़रीब देशों की पूंजी को विकसित पश्चिमी देशों में पहुंचाने का एक बड़ा और सुनियोजित षड़यंत्र हैं। इन देशों में जमा धन विकसित देशों में निवेश किया जाता है और पहले से ही पूंजी की कमी से जूझ रहे देश और ग़रीब होते जाते हैं। मार्च 2005 मेंटैक्स जस्टिस नेटवर्कके एक शोध में पाया गया कि ऐसे ग़रीब और विकासशील देशों के रईसों की साढ़े ग्यारह ट्रिलियन डालर की व्यक्तिगत संपत्ति अमीर पश्चिमी देशों में निवेश के लिये उपयोग की गयी। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए रेमंड बेकर ने अपनी हालिया प्रकाशित चर्चित किताबकैपिटलिज्म्स एचिलेज़ हील : डर्टी मनी एन्ड हाऊ टू रिन्यू द फ्री मार्केट सिस्टममें बताते हैं कि 1970 के मध्य से अब तक दुनिया भर में 5 ट्रिलियन डालर से अधिक की धनराशि इन गरीब देशों से पश्चिमी देशों में मारिशस, सिसली, मकाऊ, लिक्टेन्स्टीन सहित सत्तर से अधिक टैक्स हैवेन कहे जाने वाले देशों में जमा काले धन के रूप में पहुंच चुका है। इसी किताब में वह आगे लिखते हैं कि इन देशों में जमा काले धन के आधार पर कहा जा सकता है कि दुनिया की एक फीसदी आबादी के पास कुल भूमण्डलीय आबादी की संपत्ति का 57 फ़ीसदी है। अब अगर स्विस बैंक एसोसियेशन द्वारा दिये गये आंकड़ों के साथ इसे मिलाकर देखें तो इस बात का अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं है कि इसमें से भारतीयों का हिस्सा कितना है।

साफ़ है कि यह समस्या अब एक ऐसा दैत्याकार रूप ले चुकी है कि सत्तर के दशक में जिस समानान्तर अर्थव्यवस्था की बात की जाती थी अब वह एक भयावह सत्य बन कर हमारे सामने उपस्थित है। पूंजीवाद की कोख से पैदा हुआ काला धन हमारी अर्थव्यवस्था को घुन की तरह खाये जा रहा है। नब्बे के दशक में लागू हुई उदारवादी आर्थिक व्यवस्था ने इस प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया है तथा जनता की सुविधायें छीनकर उनकी गाढ़ी कमाई का पैसा देश के बाहर भेजा जा रहा है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारी सरकारें इस समस्या से जूझने के लिये आवश्यक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं कर रहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद भारत सरकार ने काले धन का वास्तविक परिमाण जानने के लियेनेशनल इंस्टीच्यूट आफ़ पब्लिक फ़ाइनेंस एन्ड पालिसीको जिम्मेदारी सौंपी है। लेकिन संस्थान के निदेशक एम गोविंद राव का कहना है कि उन्होंने अभी इस संदर्भ में फैसला नहीं लिया है। उनका कहना है किइस विषय का अध्ययन एक बड़ी चुनौती है क्योंकि हमें अनेक क्षेत्रों से आने वाली भारी धनराशि की जानकारी पाने की बड़ी समस्या से जूझना है।ज़ाहिर है कि जैसा कि प्रकाश करात कहते हैं किसभी इस समस्या की गंभीरता से परिचित हैं लेकिन सरकार इस धन को वापस लाने के लिये आवश्यक राजनैतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं कर रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बेहद कड़े रुख के बावज़ूद संबंधित देशों से की गयी संधियों के गोपनीयता संबंधी प्रावधानों के चलते दोषियों के नाम सार्वजनिक किये जाने की कोई संभावना नहीं दिखती। काले धन के सबसे बड़े अड्डे स्विट्जरलैण्ड से हुई संधि पर तो अभी वहां की संसद में मुहर लगने में ही साल भर से अधिक का समय लग जायेगा। ऐसे में तमाम जबानी जमाखर्च के बावज़ूद देश के धन को बाहर ले जाने वाले अपराधियों पर कोई कार्यवाही कब हो पायेगी यह कह पाना मुश्किल है। न्यायालय के दबाव के साथ-साथ अगर जनता की ताक़तों का भी दबाव बन सके तो शायद जनता की गाढ़ी कमाई फिर से देश में लाया जा सके। इस दबाव के बिना तो बस हम सब एक शर्मनाक नूराकुश्ती देखने के लिये ही अभिशप्त रहेंगे।

  • दिल्ली से निकलने वाले दैनिक आज समाज के 31/01/2011 अंक में प्रकाशित

सोमवार, 28 जून 2010

हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे

चित्र यहां से

लगभग एक बरस से सारी दुनिया मंदी की चपेट में है। हम भी उसके चंगुल में हैं। इस बीच मंदी को समझने और उससे उबरने की कई कोशिशें हुई हैं। पर आम आदमी की समझ में यह मर्ज अभी भी पूरी तरह नहीं आई है। इस, बार हमने आमुख कथा में इसी विषय को चुना है और यह लेख तापोश चक्रवर्ती ने लिखा है। मूल रूप से अंग्रेजी में उनके ब्लॉग पर है। मूल रूप से कवि तापोश विज्ञान, अर्थशास्त्र, पूंजी और वित्त के जानकार हैं। दो दशकों से अधिक समय तक आईडीबाई से जुड़े रहे हैं। तापोश ने ज्ञान विज्ञान समिति के साथ हिमाचल में बहुत काम किया है और समिति के लिए कई पुस्तकें तैयार करवाई हैं। इस लेख का हिंदी अनुवाद अनूप सेठी और रमेश राजहंस ने किया है



पिछले साल नवंबर में जब अमरीका के नागरिक नया राष्ट्रपति चुनने की तैयारी कर रहे थे, तो हवा में ये खबरें तैर रही थीं -

खबर नंबर 1. 1930 से भी बड़ी मंदी में किसी तरह प्राण पूंँकना। आला दर्जे के निवेश बैंकों के नवीनतम 'सम्पत्ति प्रबंधन' के बावजूद सन् 2008 में अमेरिकी शेयर और डेरिवेटिव बाजार औंधे मुंह गिरे। ये बड़े बड़े बैंक चाहे वे गोल्डमैन एंड साश हों, मॉर्गन एंड स्टैनली हो, लेहमान ब्रदर्ज हों, मैरिल लिंच हो या बीयर स्टर्न हो; एआई जी जैसी बीमा कंपनी हो या कंट्रीवाइड फाइनैंशियल, हो या, अमरीका के उद्योग धंधों की जमात हो या खुदरा मार्केटिंग की महाकंपनिया, ये सब लगभग सारे अमरीका को ही ले डूबे। अमरीकी सरकार ने घोषणा की थी कि वह सरकार की तरफ से 800 बिलियन डॉलर (लगभग चालीस लाख करोड़ रुपए) खर्च करेगी। 1960 के बाद अमरीका में और ''विकसित विश्व'' में ऐसा सुना नहीं गया था। सरकारी खर्च को शाप से कम नहीं माना जाता था।

खबर नं. 2. ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रतिष्ठित लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में यह पूछने जाती हैं कि सन् 2008 की इस मंदी की वजह से, 200 मिलियन पौंड के उनके निवेश में से 20 मिलियन घर कैसे गया है?

खबर नं. 3. भारत सरकार के काबीना मंत्री बैठक करते हैं और फैसला लेते हैं कि अब तक ज्यादातर सरकारी क्षेत्र में चले आ रहे बीमा उद्योग को निजी और विदेशी 'खिलाड़ियों' के लिए, 49% इक्विटी देकर खोल दिया जाए। यह सच में अनोखी घटनाएं हैं। तमाशा युग आरंभ हो चुका है और जड़ जमा चुका है। आइए देखें कैसे।

अमरीका ने की मंदी की अगुआई

पहले देखा जाए कि विकसित देशों में सर्वाधिक आर्थिक ताकतवर पहलवान अमरीका अचानक कैसे फिसला। मोटे तौर पर वहां ये कुछ हुआ -
1. अमरीका के वाणिज्यिक बैंक अपना कारोबार बढ़ाना चाहते थे। मकान खरीदने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को कर्ज देना चाहते थे। दुनिया सारे बैंक कारोबार बढ़ाने की इसी इच्छा के वशीभूत होते हैं।
2. अब यह तो जगजाहिर बात है कि कर्ज देते समय कोई भी महाजन या बैंक कर्जदार की हैसियत को  तो परखता ही है। यानी कि वह अपनी आमदनी से कर्ज और उसका ब्याज चुका भी सकता है या नहीं। सही बात है। लेकिन ऐसी हैसियत वाले नागरिकों की संख्या अमरीका में भी तो सीमित ही होती है। जबकि मुनाफे की राक्षसी भूख के कारण बैंकों पर कारोबार बढ़ाने का लगातार ऐसा दबाव है कि थमने का नाम ही नहीं लेता। इसके कारण बैंक मकान खरीदने के लिए ऐसे लोगों को भी कर्ज देने लग गए, जिनकी कर्ज चुकाने की हैसियत कम थी या बिल्कुल नहीं थी।
3. ऑटोमोबाइल उद्योग की तरह आवास उद्योग का भी अर्थव्यवस्था पर कई गुणा प्रभाव पड़ता है। मतलब यह कि ज्यादा मकान बनेंगे तो सीमेंट, स्टील, ईंट-गारे, शीशे-लकड़ी, नल-टूटी, चौके चूल्हे की चीजें, बाग-बगीचों, फोन, टीवी, कार और उनका बीमा, न जाने किस-किस चीज की जरूरत पड़ेगी। नतीजा यह कि ये सारे उद्योग भी फले फूलेंगे। अमरीका की अर्थव्यवस्था पिछले 20 साल से इस आवास-उद्योग के घोड़े पर सवार थी किताबी मुनाफे का मजा ले रही थी।
4. लेकिन बैंकों की लेखा-बहियों में कर्ज न चुका सकने वाले कर्जदारों की संख्या बढ़ती जा रही थी। असल में ये कर्जे सब-प्राइम थे। इसका मतलब यह है कि अमरीका का आवास उद्योग और उससे नत्थी हुए सारे उद्योग ऐसे लोगों को दिए गए कर्जों पर निर्भर थे, जिनकी कर्जा चुकाने की हैसियत थी ही नहीं। मतलब अमरीकी अर्थव्यवस्था दरअसल काठ के झूलन घोड़े पर सवार तेज रफ्तार से हवा में भाग रही थी।
5. यह तो वस्तुस्थिति थी। अब जरा समस्या में गहरे उतरा जाए। हरेक बैंक में निगरानी की व्यवस्था होती है जो समय रहते चेतावनी देती है कि ये लोग सब-प्राइम हैं और लोन देना बंद करो। सारी दुनिया के बैंक ऐसा करते हैं। लेकिन बैलेंस शीट में कर्जे ही कर्जे दिखाने की भूख ने खतरे की घंटी बजने ही नहीं दी।
दूसरे, अमरीका के सारे बैंकों की निगरानी वहां का रिज़र्व बैंक यानी फैडरल रिजर्व करता है,। इसकी जिम्मेदारी थी कि सब प्राइम कर्जों का पता लगाता, मूल्यांकन करता और खतरे को रोकता। दुनिया के सभी देशों के केंद्रीय बैंक यह काम रूटीन की तरह करते हैं। अमरीका के रिजर्व बैंक ने यह रूटीन काम भी नहीं किया। अगर दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक साम्राज्य का रिज़र्व बैंक अपान रूटीन काम भी यानी नहीं नहीं करता, तो करता क्या है? आप को दाल में कुछ काला नहीं लगता?
तीसरे, अमरीका के बैंक कंपनियों की तरह हैं। कंपनी कानून के तहत आडिटर नियुक्त करना जरूरी होता है जो कंपनी की आर्थिक हालत का पता लगाने के लिए लेखा-बहियों की जांच करता है। आडिट रिपोर्ट से भी सब प्राइम कर्जों का पता चल जाता है। आडिट फर्में सही आडिट करने की वजह से ही जानी जाती हैं और इसी वजह से बाजार में उनकी साख होती है। ये बड़े-बड़े साख वाले आडिटर भी अमरीका के सब-प्राइम कर्जों का पता नहीं लगा पाये।
चौथे, अमरीका के बैंक पब्लिक कंपनियों के रूप में वहां के स्टाक एक्सचेंजों में पंजीकृत होते हैं। इन बैंकों के शेयरों के कारोबार की निगरानी यूएस सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन करता है, जैसे हमारे यहां सेबी करता है। इस कमीशन का काम है कि यह शेयरों के मूल्य की जांच करता रहे और बताता रहे ताकि निवेशक के हाथ खराब शेयर न पड़ जाएं। पुरानी, पेशेवर और अपनी प्रतिष्ठिा के प्रति सचेत कंपनियां कमीशन के लिए शेयरों के ऐसे मूल्यांकन का काम करती हैं। पर देखिये अमरीका का स्टाक एक्सचेंज कमीशन और मूल्यांकन करने वाली कंपनियां भी सब-प्राइम लफड़े का पता नहीं लगा पाईं ! सब के सब फेल !
6. इन तथ्यों का निचोड़ यह निकला कि जिस किसी को भी सत्य पर अडिग रहने और लोक सेवा का काम सौंपा गया था, वह या तो अपने कर्तव्य में असफल रहा, या अमरीकी बैंकों के सब-प्राइमों कर्जों में उनकी मिलीभगत रही।
7. पांच साल पहले इनमें से कुछ बातें सामने आई थीं, तो लेकिन सभी जिम्मेदार पक्षों ने इन बातों को छुपा दिया। जहां पहले बूंद-बूंद पानी रिस रहा था, वहां अब परनाले बहने लग गए। बैंकों के कर्जे डूब गए।बैंकों के लाभ गायब हो गए, बैलेंस शीटें जवाब दे गईं। पहले तो आवास उद्योग का भट्ठा बैठा। इसका असर इससे जुड़े उद्योग पर पड़ना ही था। उनके भी शटर बंद हुए। इसी के बरक्स, बैंकों और उससे जुड़ी कंपनियों के शेयरों ने डुबकी लगा दी।
8. आखिरकार जो चहेते निवेश बैंक इन कंपनियों के शेयरों और डेरिवेटिवों का कारोबार संभाल रहे थे, उनका पर्दाफाश हो गया क्योंकि अब उनके पास ऐसे पोर्टफोलियो थे, जिनकी हवा निकल चुकी थी। ताजातरीन अमरीकी बुलबुला फूट चुका था।
9. अब अमरीकी सरकार और बराक ओबामा जनता के पैसे से नैया पार लगाने की कोशिश कर रहे हैं। तो इस महान अमरीकी सपने से हम क्या नतीजा निकालें? लेकिन रुकिए, जरा सुनें तो कि ब्रिटेन की महारानी क्या कह रही हैं।

ब्रिटेन की महारानी की कहानी
एक बड़े तथ्य की ज्यादा चर्चा नहीं हुई है कि दूसरे महायुध्द के बाद जो मार्शल एड प्लान शुरु हुआ उससे यूरोप की अर्थव्यवस्था येन केन प्रकारण अमरीकी अर्थव्यवस्था  के अधीन रही है। यूरोपीय यूनियन इस शिकंजे से निकलने के लिए कसमसा रहा है।
यूरोप के बैंक लंबी ऐतिहासिक स्मृतियों में खोए रहे हैं, इसलिए उनमें अमरीकी बैंकों जैसा जोश नहीं है। लेकिन यूरोप का ज्यादातर निवेश या तो अमरीकी कंपनियों में था या अमरीकी म्यूचुयल फंडों के जरिए अमरीकी स्टॉक एक्सचेंजों में था या ''सम्पत्ति प्रबंधन'' के लिए अमरीकी निवेश बैंकरों के हाथ में था। तो जैसे ही अमरीकी बुलबुला फूटा, ब्रिटिश, जर्मन, फ्रेंच और बाकी देश भी अपनी कंपनियों और शेयर बाजारों को गिरते हुए देखते रह गए।
महारानी एलिजाबेथ एक बड़ी आसानी हैं। वे निवेश बैंकों की चहेती हैं। यानी निवेश बैंकों के लुभावने मुनाफे के जाल वे भी फंसी थीं। बुलबुला फटने से पहले उनकी दौलत कोई 200 मिलियन पौंड थी, जो बुलबुला फटने के बाद में 20 मिलियन पौंड घट गई। यानी एक बुलबुले में 20 मिलियन पौंड छूमंतर। बेचारी ने अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों के मक्का लंदन स्कूल ऑफ इक्नॉमिक्स से पूछा, भई ऐसा क्यों हुआ? तो उन्हें जो कहानी सुनाई गई, उसका लब्बोलुवाव यँ है -
महारानी ने पूछा, ''ऐसा क्यों होने दिया गया?'' विशेष्-अज्ञों ने समझाया कि किसी एक आदमी की गलती नहीं है। एक दूसरे की जांच करने वाली संस्थाएं थीं, लेकिन उनमें तालमेल नहीं था। मतलब? थोड़े में समझिए कि यह ''सिस्टम'' की अंदरूनी प्राब्लम थी। ''इसका मतलब है हर कोई किसी दूसरे के भरोसे था'' महारानी समझ चुकी थीं। भली महारानी का निशाना सही था।
बीमारी कहाँ? देशों में या संस्थाओं में अगर नमक नमकीन न एाू तो? इसमें नमक कहां डलवाया जाए?
इंसान की कमजोरियों पर बात करते हुए पवित्र बाइबल में एक जगह कहा गया है कि अगर पुलिस नकारा हो जाए तो चोर को पकड़ने के लिए चोर को काम पर लगाया जा सकता है। लेकिन चोर-चोर मौसेरे भाई निकल आएं तो? क्या इलाज है? पर ऐसा होता कैसे है? आइए देखें।
जब अमरीकी बैंकों की शाखाएं सब प्राइम कर्जों का डाटा अपने-अपने प्रधान कार्यालयों को भेज रही थीं, तो शुरु में प्रबंधक यह जानकारी छुपा गए, लेकिन बाद में जब घबराहट बढ़ने लगी तो असली आंकड़े सामने आने लगे। इस पर प्रधान कार्यालय यानी प्रबंधन ने क्या किया? शुरु में तो जैसा अक्सर होता है, उन्होंने उम्मीद  लगाई कि समस्या सुलझ जाएगी, हालत सुधर जाएंगे, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें चूक स्वीकार करनी पड़ी। इससे उनकी फजीहत ही हुई। लेकिन उन्होंने गोलमाल किया। बाद में पाप की हंडिया बढ़ती गई, यानी हर रोज, हफ्ते, महीने, तिमाही, छमाही और हर साल नकली लेखा-बहियां फलती-फूलती रहीं, इतनी कि सच्चे आंकड़े ढूंढना मुश्किल हो गया।
लेखा-बही को सही रखने का नया तरीका ईजाद किया गया। कर्जे के कागजात को प्रतिभूति (सिक्योरिटी) के तौर पर इस्तेमाल करके खरीद-फरोख्त की गई। यह कागजी जमानत चल पड़ी। इस तरह की प्रतिभूति का खरीदार और कारोबारी कौन था? अमरीका के महान निवेश बैंक। क्योंकि इस प्रतिभूति की कीमत बढ़ रही थी या बढ़ाई जा रही थी क्योंकि आवास क्षेत्र में उछाल था। लेकिन बुनियादी सब-प्राइम कर्जे के जोखिम का क्या हुआ? इस बारे में यह माना गया कि बाजार में परस्पर एक दूसरे से अपेक्षाएं जोखिम से बचाव करेंगी और किसी का नुकसान नहीं होगा। यह बात गणित की दृष्टि से ठीक थी। निवेश बैंकों ने नोबल विजेता गणितज्ञ भी इस काम में लगा दिए। लेकिन याद रखें कि धोखेबाज हमेशा गणित का ही इस्तेमाल करते हैं, उल्टे या सीधे।
अमरीका में निगरानीबाजों यानी नजर रखने वालों की भरमार है। बैंकों, फैडरल बैंक और एक्सचेंज कमीशन सभी ने आडिट कंपनियां काम पर लगाईं थीं। अगर वे ठीक से काम करतीं, जैसा कि वे कभी-कभी कर लेती हैं तो बचाव हो जाता, लेकिन पहले तो वे असफल रहीं और बाद में धोखाधड़ी में सह-अपराधी बन गईं।
फेडरल रिज़र्व, सिक्योरिटीज एक्सचेंज कमीशन, अमरीका के खजाना सचिव का दफ्तर जैसी प्रतिष्ठित संस्थाएं और निगहबानी करने वाली दूसरी वित्तीय संस्थाएं धोखाधड़ी में लिप्त हो गईं, जब कि अखबारें, वेबसाइटें और ब्लॉग चिल्ला-चिल्ला कर चेतावनी दे रहे थे।
इन संस्थाओं को बनाने का मकसद एक दूसरे का पूरक बनना था। जनता के भरोसे को बनाए रखने के लिए इनका गठन हुआ था। और ध्यान देने की बात है कि यहां अमरीका की बात हो रही है -  मानव इतिहास का महानतम लोकतंत्र। यह भारत जैसे उपनिवेश से निकले लोकतंत्र या किसी ऐरे गैरे गणराज्य का मामला नहीं है। तथ्य यह है कि अमरीकी लोकतंत्र के रखवाले नरभक्षी बन गए। इसकी क्या वजह थी?
जाहिर है - लाभ कमाने का अंधापन। बैंकों के प्रबंधन, आडिट कंपनियां, फेडरल रिजर्व, सिक्योरिटीज एक्सचेंज सब के सब - अपने-अपने फायदे के पुजारी थे। कोई भी अपने पास या अपनी फाइलों में घाटा उठाने वाली बैंकिंग कंपनी नहीं रखना चाहता था। ठीक भी है। लाभ कमाने की इच्छा स्वाभाविक और स्वस्थ भावना है। लेकिन नकली फायदा, वह भी सच की कीमत पर? माना कि चूक स्वाभाविक है, पर यह तो विकृति है। जान बूझ कर झूठमूठ का लाभ दिखाना जैसे कि कल आएगा ही नहीं। यह है फायदा-अतिरेकवाद (profit fundamentalism)। एक तरह की रुग्णता और दुष्टता।
और यह कहां है? मानव इतिहास के महानतम लोकतंत्र के हृदय में। जैसा कि महारानी ने कहा, हर कोई, किसी दूसरे के भरोसे फायदा कमाना चाहता है। और जनता की बेहतरी के लिए खड़े होने की चिंता किसी को नहीं।

कायदे कानून का मिथ
1930 की महामंदी से भी बड़ी इस मंदी ने एक मिथ तोड़ दिया है। यह मिथ है कानून कायदे का मिथ। और कायदा क्या था - हरेक को निजी लाभ में लगे रहने दो, लेकिन नियम-विनियम का विधि-विधान बना दो। बस, फिर फिक्र की कोई बात नहीं।
यहूदी - ईसाई धर्मों वाला यूरोपीय समाज शताब्दियों तक एक तरफ चर्च और दूसरी तरफ सनकी सामंतों और राजतंत्र की बेड़ियां तोड़कर औद्योगिक पूंजीवाद में आया। बीसवीं सदी की यूरो-अमरीकी आर्थिक नीतियों के गर्भ में दोहरी इच्छाएं काम करती रही हैं - व्यक्तिगत आजादी और जायज फायदा। दोनों ! कैसे? जबकि ये दोनों दो विपरीत ध्रुवों की तरह हैं। निजी फायदा और नियम-विनियम का छत्तीस का संबंध है। सब जानते थे पर सोचते थे कि इनके आपसी वैर को सुलझाया जा सकता है। या मैनेज कर लेंगे। इसी विश्वास ने तो बीसवीं सदी की नई और पुरस्कृत कला या विज्ञान को जन्म दिया है - जिसके हम सब दीवाने हैं यानी - बिजनेस मैनेजमेंट।
1930 की मंदी के बाद कई नई संस्थाएं और प्राधिकरण बनाए गए थे जैसे एक्सचेंज कमीशन, ग्लास स्टेगल कानून और ऐसे ही कई दूसरे कानून। लेकिन धीरे-धीरे, 2008 तक आते-आते इनमें ढील या छूट दी गई या कहें इन्हें ''उदार'' बनाया गया। 2008 से पहले यह सोचा जा रहा था कि इतिहास का अंत समय आ गया है और अच्छा है कि पुरानी व्यवस्था खत्म हो गई है। बस कुछ बरस पहले एलन ग्रीन स्पैन (जिसे या तो नोबल पुरस्कार मिल गया था या मिलने वाला था) और फैडरल रिजर्व के पिछले अध्यक्ष का कहना था कि ''समग्रता में वित्तीय व्यवस्था अधिक लचीली बन गई है''। लोगों ने इस टिप्पणी पर भरोसा भी कर लिया।
ग्रीन स्पैन और मडोफ एक साथ यह बात कर रहे थे और विनियामक संस्थाएं और अधिकारी बेशुमार सार्वजनिक धोखाधड़ियों की ढक-पलेट कर रहे थे। अमरीका की जटिल कानून व्यवस्था और विनियामक संस्थाएं सही में सुगठित हैं और आधुनिक विश्व में बेहतरीन हैं। दिमाग चकरा जाता है।
जो भी आदमी छोटे या बड़े किसी भी कारपोरेट के आंतरिक कामकाज के तरीके से वाकिफ है, वह जानता है कि इन कंपनियों की एकमात्र धुन होती है अधिक से अधिक मुनाफे के लिए प्रत्येक कानून की आत्मा को पटखनी दो, नजरअंदाज करो या तोड़ दो। आम जनता या अकादमिक प्रोफेसर कंपनियों के इस रवैये को नहीं समझते। यह इनकी रुटीन का हिस्सा है।  सबसे तेज तर्रार और सबसे शातिर वकील और अकाउटेंट पीढ़ी दर पीढ़ी अपने इसी कौशल से अंधाधुंध पैसा पीटते हैं और ख्याति लूटते हैं। यह दुनिया के सब लोकतांत्रिक देशों में होता है, अमरीका इनका लीडर है। यह कायदे कानून को नष्ट-भ्रष्ट करने की अनूठी कला का नेतृत्व करता है।
सन् 2008 के संकट के असली अपराधी लोग ''नियम-कानून'' की असफलता की ओट में अपना बचाव कर रहे हैं, और भारत में इनके पिच्छलग्गू इनकी वकालत कर रहे हैं। बेचेहरा अकाउटेंटों के मत्थे दोष मढ़ने से बेहतर और क्या होगा!
भारत इस खेल में हाल में शामिल  हुआ जब दिल्ली की सरकारी क्षेत्र की बिजली वितरण व्यवस्था को दो बड़ी निजी कंपनियों को सौंपा गया। बिजली के हाल तो वही के वही हैं, पर जनता को और पैसा देना पड़ता है। ऊपर से दिल्ली सरकार इन कंपनियों को हर साल करोड़ों की सब्सिडी दे रही है।....
कारोबार के सार्वजनिक नियंत्रण के औजार के रूप में नियम-कायदा का भ्रम अब टूट चुका है। और वह भी दुनिया के सबसे बेहतर कानून-कायदे वाले देश में।
इसका क्या अर्थ निकलता है? अमरीकी बैंकों ने साफ आवाज में खतरे की घंटियां बजाईं लेकिन अमरीका की लोकतांत्रिक संस्थाएं आंखें मूंदे बैठी रहीं और बाजार की किसी काल्पनिक स्व-नियमित व्यवस्था पर भरोसा किए रहीं। माना कि सोवियत संघ और उसके भस्मासुरी सिस्टम ने राष्ट्रवादी और स्वयं-संतुष्ट बाजार की मान्यता को जन्म दिया, माना कि रीगन-थैचर के जमाने में फला-फूला विजयी भाव सतत बढ़ते शेयर बाजारों में निर्दोष मालूम पड़ता है, लेकिन लोक-भावना से ओतप्रोत अमरीका की विशाल और समर्थ संस्थाओं को और वहां के लोगों को अपने पुराने यंकी (सैनिक भावना वाले) अंदाज में दूध का दूध पानी का पानी करना चाहिए था। लेकिन हाय! उन्होंने ऐसा नहीं किया।
अमरीकी लोगों और संस्थाओं की लोकतांत्रिक सच्चाई पर हमें संदेह नहीं है, हालांकि वहां मार्केट मैक्रेचिज्म लंबे समय तक मौजूद रहा है अमरीका में कई गलत कामों को सुलझाया भी गया है।
तब सवाल उठता है कि फिर अमरीकी-बाजार-चरमपंथियों के लोकतांत्रिक संस्थाओं और भावना को सफाचट्ट क्यों कर दिया।
बाजार से जुआघर तक का महाप्रस्थान
यह परिवर्तन सद्भाव में किया गया था। शुरु में पूंजीवाद ने आजादी और समानता लाने के लिए बाजार खड़े किए ताकि हर कोई तेजी से औद्योगिक दौलत कमा सके। आम आदमी अपनी गाढ़ी कमाई की बचत से कंपनियों के शेयर खरीद सकता था और बढ़ते लाभ कमा सकता था। फिर अचानक पैसे की जरूरत पड़े तो शेयर बाजार में डिस्काउंट पर अपने शेयर बेच दे। खरीदने वाले को भविष्य में कमाई की संभावना रहेगी और बेचने वाला कुछ फायदा कमा कर बेचेगा। मतलब दोनों फायदे में रहेंगे। शेयर बाजार के बारे में सबको यह जानकारी है। अर्थशास्त्र की पाठय पुस्तकों में करोड़ों विद्यार्थियों को यही पढ़ाया जाता है। और प्रोफेसर इस पढ़ाई पर यकीन करते हैं।
लेकिन दसवें दशक तक आते आते शेयर बाजार के चरित्र में आमूल चूल परिवर्तन आ चुका था। अब सारी दुनिया में 80% से ज्यादा कारोबार सट्टेबाजी के लिए किए जाते हैं ताकि शेयरों की कीमतों में हेर-फेर किया जा सके। बात यहीं पूरी नहीं होती। एक नई लिखत की खोज भी कर ली गई है जिसे 'डेरिवटिव' कहते हैं। यह भी  शेयर कीमतों पर ही निर्भर है और ये आवास ऋण के जमानती कागजों की तरह हैं। इनका कारोबार डेरिवेटिव मार्केट में होता है। पहले किताबी और मासूम शेयर बाजारों में सट्टेबाजी का एक तत्व रहता था लेकिन वह कंपनी के असली कामकाज से निकलने वाले बुनियादी मूल्य पर छोंक के बराबर ही होता था। आज यह हालत उलट चुके हैं। शेयर और डेरिवेटिव बाजार अब सट्टेबाजी के अड्डे बन गए हैं और बुनियादी कीमतें सिर्फ बघार लगाने का काम करती हैं। यह बीसवीं सदी का बेहद विनाशकारी परिवर्तन है, जिस न तो पढ़ाने वाले प्रोफैसर हैं और न ही अभी पुस्तकें तैयार हुई हैं।
जनता जनार्दन को इस बारे में जानकारी नहीं है और वे बाजार के 5% लेन देन तक ही सीमित हैं। तो बाकी कारोबार कौन करता है? ये कारोबारी हैं - निवेश बैंक, पेंशन फंड, बीमा फंड और निडी फंड। अब यह वैश्विक सट्टेबाजी कंपनी बन चुकी है। बाजार असल में जुआघर बन चुके हैं। यह कोई रूपक या शब्दालंकार नहीं है, बल्कि रोजमर्रा जिंदगी का एक निर्लज्ज तथ्य है।
यह परिवर्तन किसी संयोग से नहीं हुआ, यह उन्नीसवीं सदी की औद्योगिक क्रांति में से उभर रही अर्थव्यवस्था में ही छिपा हुआ एक लक्षण था। पूंजीवाद का भविष्यवक्ता अर्थशास्त्री केन्स 1930 की महामंदी को भांपते हुए लिख रहा था और चेतावनी दे रहा था, कि ''जब तक कोई उद्यम कोई झरना हो और सट्टेबाजी एक बुलबुला, तब तक वह नुकसान नहीं कर सकता, लेकिन जब सट्टेबाजी के भंवर में उद्यम एक बुलबुला बन जाए, तो मामला गंभीर हो जायेगा। जब किसी देश का पूंजीगत विकास किसी जुआघर की हरकतों का उप उत्पाद बन जाए तो काम और भी बिगड़ जाएगा।''
सही बात है, काम बिगड़ा हुआ ही है। पिछले 20 सालों से विश्व अर्थव्यवस्था के बड़े उद्योग जैसे ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स, स्टील और धातु, उड्डयन वगैरह अपनी स्थापित क्षमता के सिर्फ 35% पर चल रहे हैं। इस बात के बहुत गहरे अर्थ हैं। 2008 के बाद दुनिया के सभी मुल्कों की महाकाय कंपनियां जैसे जनरल मोटर्स, टोयोटा, एआईजी वगैरह, दिवालिया हो गई हैं या होने वाली हैं।
दुनिया को अर्थशास्त्र की लाखों नई और सही पाठयपुस्तकों और प्रोफेसरों की जरूरत है।
जुआघरवाद की गहराई
भारत में कुछ पीढ़ी पहले तक शेयर बाजार में पैसा लगाना उतना ही बुरा माना जाता था, जितना घुड़दौड़ में पैसा लगाना। यह काम गुपचुप किया जाता था। यह शराबखोरी और वेश्यावृत्ति जैसा ही माना जाता था। आज नए फैशन के कपड़े पहने हुए फैशनेबल नौजवान लड़के लड़कियां दिन रात टेलिविजन पर शेयरों के उतार-चढ़ाव के बारे में बतियाते रहते हैं। शेयर बाजार से पैसा कूट कर अमीर होने वालों की शादी के बाजार में खूब मांग है। मां-बाप को अपने बच्चों के शेयर-ज्ञान पर गर्व है। आज सेंसेक्स राष्ट्रीय तरक्की का पैमाना बन गया है।
अंदर तक गहराई में कुछ हो गया है। हिंदुस्तान में 110 करोड़ लोगों में से सिर्फ 4 करोड़ शेयर बाजार में निवेश करते हैं। इसलिए यह नव धनाडय की प्रतिष्ठा के अलावा कुछ और नहीं है। लेकिन यह वैश्विक परिघटना है।
विकसित पश्चिमी देशों में सिर्फ एक दिन में शेयरों और डेटिवेटिवों में जितना कारोबार होता है, वह इन मुल्कों के सालाना सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा है। जरा सोचिए इसका क्या मतलब हुआ? इसका मतलब है कि अमरीका एक साल में जितना उत्पादन करता है, वह सारा का सारा एक दिन में शेयर मार्केट में दांव पर लग जाता है। हां, इनमें से ज्यादातर सौदों की असल में खरीद-फरोख्त ही नहीं होती, सिर्फ ''कीमत-प्रबंधन'' ही होता है।
अब सवाल है कि इन बाजारों में दांव कौन खेलता है?
प्रत्यक्ष और ज्ञानी जुआरी
ये जाने माने ''खुदरा'' निवेशक हैं, जो लोगों, अखबारों, टीवी या इंटरनेट से मिली टिप्स के आधार पर शेयरों में पैसा लगाते हैं।
अप्रत्यक्ष और अधज्ञानी जुआरी
अपने फैसले खुद लेने वालों के सिवा ज्यादातर पुराने खुदरा जुआरी अब अपना पैसा लेकर म्युचुअल फंडों के पास पहुंच गए हैं। इन फंडों के मैनेजर इस पैसे का पेशेवराना ढंग से ''निवेश'' करते हैं। ऐसा करने से खुदरा निवेशक शेयर मार्केट के रोजाना के झटकों से बच जाता है और उसे कमोबेश निश्चित लाभ मिल जाता है। व्यवहार में म्यूचुअल फंड मलाई खाते हैं।
ज्यादातर विकसित देशों में कर्मचारियों के स्वास्थ्य और जीवन बीमा की किश्तें उनके वेतन से काटी जाती हैं। फिर यह पैसा इकट्ठा करके महा बीमा फंडों में लगाया जाता है। ये बीमा फंड बीमे के पैसे के ज्यादातर हिस्से को शेयर और डेरिवेटिव बाजार में लगा देते हैं ताकि कर्मचारियों को ज्यादा ''सुरक्षा'' मिले। इसका मतलब यह हुआ कि बेरोजगारों को छोड़कर सारे कामकाजी महिला - पुरुषों की बीमा किश्तें इन बाजारों में पहुंच जाती हैं।
सब जानते हैं कि कर्मचारी की तनख्वाह में से हर हफ्ते या महीने ये किश्तें इसलिए काटी जाती हैं ताकि बुढ़ापे में उन्हें पेंशन मिले या हारी-बीमारी में इलाज हो सके। पेंशन फंड इस पैसे को इकट्ठा करके ''बढ़िया'' पेंशन देने के लिए शेयर बाजारों में लगा देते हैं। ये पेंशन फंड कितने बड़े हैं या इनकी माली हालत कितनी विराट है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमरीका में ये फंड कंपनियों, बैंकों और सरकारों से भी बड़े हैं।
चतुर जुआरी
ये कल तक महान खिलाड़ी थे - लेहमान ब्रदर्स, गोल्डमैन सैच, मॉर्गन स्टेनली और ऐसे ही बड़े-बड़े निवेश बैंक। ये अमीरों से पैसा लेते हैं और शेयर बाजारों में दांव पर लगाते हैं। इनके हाथ और भी लंबे हैं। अपने नाम और काम का फायदा उठाते हुए ये इन बाजारों को प्रभावित करते हैं और अपने हिसाब से मोड़ लेते हैं। यानी उन्हें मैनेज कर लेते हैं। जब तक कर सकें।
फिर इस सूची में वाणिज्यिक बैंक आते हैं, जिनका प्रमुख काम बचत संभालना और कर्जे देना है। उन्हें मौका मिले तो वे भी कर्ज देने का मेहनती काम करने के बजाय इकट्ठा की गई सारी बचत को शेयर बाजार में झोंक दें। लेकिन रिजर्व बैंक इन बैंकों पर लगाम लगाए रखते हैं ताकि जमाकर्ताओं की बचत का नुकसान न हो जाए।
अधिक चतुर और कुटिल जुआरी
ये निर्माण, खनन और सेवा क्षेत्र की पारंपरिक कंपनियां हैं। शेयर बाजार में पैसा लगाना इनका काम नहीं है। पर आज ये सभी लगाती हैं। क्यों?
पहली बात, अपने शेयरों की कीमत बढ़ाने और कभी-कभी घटाने के लिए, क्योंकि अपने शेयरों के ''मूल्य'' को आधार बनाते हुए वे अपना व्यवसाय चलाने के लिए कर्जे लेती हैं। भारत सहित बहुत से देशों में अपने ही शेयरों के कारोबार पर रोक है। लेकिन यह रोक बेमानी है।
दूसरे, अपने तुलन-पत्रों को बेहतर बनाने के लिए। अमरीका का ही उदाहरण लें तो पिछले 20 साल से ज्यादातर बड़ी कंपनियां ''परिचालन हानियां'' दिखाती रही हैं जिसका मतलब है कागजों में हानि दिखाना। इससे होता यह है कि वे अपने तुलन पत्र में ''गैर-परिचालन'' आमदनी पाने के लिए शेयर बाजार में दांव खेलते हैं ताकि ''शुध्द लाभ'' दिखाया जा सके।
तीसरे, शेयर बाजारों में अपने विरोधियों के शेयरों की कीमतें गिराने के लिए। यह तो पुरानी आर्थिक लड़ाई का एक तरीका है।
चालू जुआरी
ये प्रमुख तौर पर सरकारी संस्थाएं हैं, केंद्र, राज्य सरकारें और नगर निगम आदि, जिनके अधिकारी अपने बेकार पड़े पैसे को निजी फायदे के लिए शेयर बाजार में लगाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो धोखाधड़ी करते हैं। पहले बैंक को लूट कर मालामाल हुआ जा सकता था, अब नहीं। आज शेयर बाजार हैं, बल्कि अब तो यही कहना चाहिए थे।
आज साफ तौर पर नजर आता है कि सारे देश, खास तौर से विकसित समाज शेयर बाजार के परोक्ष निवेशक बन गए हैं।
हां यह सच है, पिछले 20 सालों की यही कहानी है। एक नई पीढ़ी पैदा हो गई है। उसने और कुछ नहीं सीखा है, सिवा इस जुआ संस्कृति के। आज की लगभग-आधुनिक सभ्यता की संस्कृति और चरित्र के लिए इसका बड़ा भारी महत्व है, क्योंकि इसका केंद्रीय पेशा वैश्विक स्तर पर जुआघरों में ''खेलना'' हो गया है। सोचने की बात है हम पुरानी कामकाजी नैतिकता से कितनी दूर आ चुके हैं।
बाजार की विचारधारा
सामंतवाद करीब हजार साल चला होगा। उस युग में उत्पादन सिर्फ स्थानीय खपत के लिए होता था। जो बच जाए वही बाजार में जाता था। बाजार की यह अन्तर्मुखी और स्थान-केंद्रित चाल लंबे समय तक बनी रही और बाजार में उत्पादन का महत्व बना रहा। फिर धीरे-धीरे बेचा जाने वाला सामान बढ़ने लगा। इससे दृश्य उल्टी दिशा में खुल गया। पहले जहां उत्पादन बाजार को चलाता था, अब बाजार उत्पादन को चलाने लगा। इस तरह मनुष्य जाति  के सामने समानता, स्वतंत्रता और पूंजीवादी बिरादरी जैसी खिड़कियां खुल गईं। पूंजीवाद के कई भाई-बंध साथ आए जैसे विज्ञान, धर्मनिरपेक्षता, कार्य-संबंधी नैतिकता और लोकतंत्र। चलिए, वैसे यह कहानी हमें पता ही है।
लेकिन जनाब तेजी से विकसित होता पूंजीवाद थी 200 साल पुराना हो गया है। और चक्का एक बार फिर पूरी तरह घूम गया है। और हमारे सामने एक तरह का नव सामंतवाद प्रकट हो रहा है।
आर्थिक, नजर से देखें तो बाजार उत्पादन से कई गुना बढ़ गए हैं लेकिन दुनिया भर में जितने उत्पादन की खपत होती है वह स्थिर हो गया है। यह उत्पादन सकल घरेलू उत्पादन के आकंड़ों में सही ढंग से नहीं दिखता। सारी अर्थव्यवस्थाएं कुछ दर्जन पूंजीवादी कुलीन गुटों के हाथ में हैं, विशाल कामकाजी औद्योगिक मजदूर और नौकरी पेशा लोग नव-कृषिदासों की तरह बंधुआ हैं; सरकारों की सर-परस्ती में होने वाले गठजोड़ ने प्रतिस्पर्धा की जगह ले ली हैजहां किस्म किस्म की लॉबियां बिचौलिए का काम करती हैं, अब जंग बाजार हथियाने के लिए होते हैं; विज्ञान और धर्मनिरपेक्षता हमले की जद में आ गए हैं; कामकाजी नैतिकता की जगह जुएबाजी की कला विराज गई है; लोकतंत्र को लाइन-हाजिर कर दिया गया है।
सब बातों के ऊपर, इस बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों की बाजार-विचारधारा का सिध्दांत भी बाजार है और विश्वास भी बाजार। सभी सिध्दांतों की तरह इसका भी सिक्का चलता है, जबकि तथ्य कुछ और सच्चाई बयान करते हैं। बाजार के कुछ मत हैं:
. बाजार असल में दौलत का सृजन करते हैं (सिर्फ पुनर्वितरण नहीं करते)
. बाजार स्व-विनियामक होते हैं
. बाजार उचित और न्यायोचित होते हैं
. बाजार तसंगति को बढ़ावा देते हैं
. बाजार मनुष्य की आजादी को संवारते हैं
ठीक है। जॉर्ज सोरोस इसी बाजार में बहुत ही सफल और लाभ कमाने वाला हेज फंड मैनेजर है, जो मडॉफ जैसा घोटालेबाज नहीं है। जरा सुनें तो जॉर्ज क्या कहता है : ''बदकिस्मती से हमें बाजार चरमपंथ के बारे में मालूम है। इस विचारधारा का अब बड़ा वर्चस्व है। इसमें यह माना जाता है कि बाजार खुद को खुद ही ठीक कर लेते हैं। लेकिन यह बात मिथ्या है क्योंकि जब भी बाजार संकट में फंसते हैं, वे सरकारी हस्तक्षेप से ही बच पाते हैं। अगर मैं तीन नाम भी गिनाऊं तो सन् 1980 के बाद से पांच या छ: बार संकट का आ चुका है- 1982 का अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग का संकट, 1984 में कौंटिनेंटल इलिनॉइस का दिवाला और 1998 में दीर्घावधि पूंजीगत प्रबंधन का असफल होना। हर बार सरकारें ही बाजार की नैया पार लगाती हैं या कंपनियों से ऐसा करवाती हैं - लेकिन न जाने क्यों सब तरफ इस बात को मान लिया गया है कि बाजारों में (खुद ही) संतुलित हो जाने की प्रवृत्ति रहती है और विचलन तो कभी-कभार ही होते हैं। और निवेश के नए-नए तरीके जैसे डेटिवेटिव इसी जमीन पर खड़े किए गए हैं।''
सन् 2008 के संकट में बुश, ओबामा, ब्राउन, सरकोजी, मनमोहन सिंह वगैरह एक के बाद एक सहायता पैकेज बना रहे हैं। किस पैसे से? मौजूदा और अगली पीढ़ियां जो कर देंगी, उससे। हैरानी की बात है कि साथ ही, बाजारों पर उनका भरोसा कायम है। इसका मतलब है कि इस रवैये को सिध्दांत ही बना डाला गया है।
यह मुक्त होता बुध्दिवाद या पूंजीवाद की समझदारी नहीं है, बल्कि मध्यकालीन अंधविश्वास का प्रकोप फिर  से हुआ है। इसका नैतिक असर विनाशकारी है, जिसकी शाखा-प्रशाखाएं अभी भी फूट रही हैं। पिछले साल के  नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने दिसंबर 2008 में न्यूयॉ टाइम्स में कहा : ''पिछली पीढ़ी की तुलना में वित्तीय सेवा उद्योग ने राष्ट्र की आय के सतत बढ़ते हिस्से पर दावा कर लिया है, जिससे उद्योग चलाने वाले लोग बेतहाशा अमीर हो गए हैं। बावजूद इसके, इस समय ऐसा लगता है ज्यादा उद्योग मूल्य का निर्माण नहीं कर रहे हैं, नष्ट कर रहे हैं .... जो लोग दूसरों के पैसे का इंतजाम करके बेतहाशा अमीर हुए, उनका समग्रता में हमारे समाज पर भ्रष्टकारी प्रभाव है।'' और इस उत्तर - आधुनिक बाजार-विचारधारा के ''भ्रष्टाचार'' के तंतु हैं क्या? यह भी तो जान लें -
. यह विचार कि कोई सोलोमन की तरह फटाफट अमीर हो जाए
. किसी को कुछ नहीं में से कुछ मिल जाए। धन-दौलत और आत्मसम्मान काम से नहीं किस्मत से मिलते हैं।
. जुए में दांव खेलना असल में ''बाजारों'' में पैसे का ''निवेश'' करना है।
. स्मार्ट और कूल बनने के लिए अमीर होना जरूरी है।
. हर कोई अकेला है, समाज से उसका कोई रिश्ता नहीं।
अब अंतत: सवाल उठता है कि यह सब क्यों?
हर मालिक अपने कर्मचारियों को जहां तक संभव हो, उतना कम देने की कोशिश करता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लाभ अपने पास रख सके। ठीक है। लेकिन ये कर्मचारी दूसरे मालिक द्वारा बनाई गई चीजों के उपभोक्ता भी तो हैं। तनख्वाह कम होगी तो वे उपभोग ज्यादा नहीं कर सकते। और यह बात हरेक मालिक पर लागू होती है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो समाज में दो तरह के लोग रह जाते हैं, थोड़े से अमीर जो नौकरियां देते हैं और बहुत कम उपभोग करने वाले बहुत से नौकर। इसलिए बिक्री में वृद्धि नहीं होती। यह हमारे समाजों का खुद को रोकने और सीमित करने वाला चरित्र है। इसलिए उद्योगों की संस्थापित क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं हो पाता है।
समाज अपना पुनरुत्पादन रोक सकते हैं पर पैसा स्थिर नहीं रह सकता। यह उसकी फितरत में नहीं है। इसलिए यह असली दुनिया से बाहर नकली, जुएबाजी वाली पूंजी की दुनिया में भटकने को अभिशप्त है। और बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में यही हुआ है। और यह पूंजी बार बार ऊपर उछलती है और संकट के रूप में फट पड़ती है। और हर बार ज्यादा बेल आउट पैकेज खाती है। यह बेल आउट पैकेज और कुछ नहीं वह असली पैसा है जिसे भविष्य के कर्मचारी, नौकर, मजदूर, दास कर के रूप में अदा करेंगे। जुएबाजी वाली पूंजी भविष्य का भक्षण करके ही जीवित रहती है। सारे बुश, ओबामा, ब्राउन, सरकोजी, मनमोहन सिंह वगैरह इस वैश्विक जुआघर के क्रुपिअर और मैनेजर हैं जो यहां चल रही जुएबाजी के पैसों के लेन देन का काम करते हैं।

इस बात का एक छोटा सा सबूत है कि नवंबर 2008 में जब दुनिया के सारे देश निजी क्षेत्र की दिवालिया कंपनियों को बेल आउट पैकेज दे रहे थे और अमरीका फेल हो गई दुनिया की सबसे बड़ी बीमा कंपनी का लगभग राष्ट्रीयकरण कर रहा था, मनमोहन सरकार का मंत्रिमंडल जल्दबाजी में भारतीय बीमा उद्योग में निजी क्षेत्र की भूमिका और उसका नियंत्रण बढ़ाने के कानून पारित कर रहा था। और चुनावों के बाद वित्त मंत्री ने निजी क्षेत्र की भूमिका  को बढ़ाने की बात और भी जोशो-खरोश के साथ की। मतलब यह कि वाचाल बाजार और उसके आकाओं पर हमारी सरकार का भरोसा कुछ ऐसा है कि सनम हमें क्या ले डूबेंगे, हम ही खुद सनम के साथ डूब मरेंगे।