अभी हाल में


विजेट आपके ब्लॉग पर
कार्ल मार्क्स लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कार्ल मार्क्स लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 12 मई 2020

प्रिय पूंजीवाद, मार्क्स अभी अप्रासंगिक नहीं हुये है

  • पुरुषोत्तम अग्रवाल 
  • अनुवाद : तरुण भारद्वाज 


मार्क्स यदि जीवित होते तो 5 मई 2018 को 202 वर्ष के हो गए होते। तो क्या? क्या मार्क्स के विचारों को याद करने और उन पर चिंतन करने से अब कोई फायदा है ? क्या यह एक तथ्य नहीं है कि पूंजीवाद ने मार्क्सवाद द्वारा बुरी तरह पछाड़ दिया है। क्या यह एक तथ्य नहीं है की स्वयं आज वामपंथी बुद्धिजीवी “वर्ग” की जगह “पहचान” की तरफ अधिक झुके हुये है, इतिहास की जगह “संस्कृति” से ज्यादा सरोकार रकते है, और “सार्वभौम मूल्यों” की तुलना मे “विभेदों” की उपस्थिती मे ज्यादा विश्वास रखते है।

क्या इतिहास ने स्वयं यह निर्णायक फैसला नहीं कर दिया है की मार्क्स अब प्रासंगिक नहीं रह गए है? क्या साम्यवादी शासन भयावह रूप से दमनकारी नहीं रहे है और क्या मार्क्सवादी राजनीतिक पार्टियां समकालीन विश्व और उसकी समस्याओं, मुद्दों से कटी हुई नहीं है?

सारांश यही है की 21वीं सदी बिना किसी बड़े बौद्धिक जोखिम के मार्क्स को अनदेखा कर सकती है; या ज्यादा से ज्यादा, कोई महत्व दिये बिना बस एक औपचारिक जिक्र कर आसानी से आगे बढ़ सकती है।

मार्क्स-एक मानव, न कि पैगंबर 

लेकिन ऐसा करना भारी भूल होगी । मार्क्स को लेनिन, स्टेलिन, माओ या किसी अन्य मार्क्सवादी के अच्छे-बुरे कृत्यों के लिए उत्तरदाई ठहराने का कोई मतलब नहीं है। उनका मूल्यांकन उनकी अपनी राजनित्क गतिविधियों के लिए किया जा सकता है, और किया भी गया है, लेकिन मार्क्स के दशकों बाद आने वाले लोगों की राजनीतिक गतिविधियों के लिए उन्हे को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं।


फिर, यह भी नहीं भूलना चाहिए की मार्क्स कोई पैगंबर नहीं थे जो कोई गलती न कर सके। वे बेशक कई मामलों मे गलत थे, लेकिन फिर भी मार्क्स एवं फ़्रेडरिक एंजेल्स और “भौतिक परिस्थितियों” की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे मे उनकी सूक्ष्मदृष्टि हमे इतिहास के उतार-चढ़ावों और मानव जीवन के मूलभूत मुद्दों और समस्याओं को समझने मे काफी मदद कर सकती है।

यदि मार्क्स से अपने परवर्तियों के कृत्यों के उस बोझे को हटा लिया जाये जो उनपर जबर्दस्ती लाद दिया गया है, तो मानव स्वभाव के बारे मे मार्क्स की समझ और पूंजीवाद के बारे मे उनकी अंतर्दृष्टि बहुत प्रासंगिक है और हम उनसे काफी कुछ सीख सकते है। लेकिन यह सीख मार्क्स का ज्यों का त्यों अनुरसरण करना नहीं हो सकती ।आज हमे मार्क्स से सिर्फ अंतर्दृष्टि की ही उम्मीद करनी चाहिए, आज की परिस्थ्तियों के लिये पहले से तैयार समाधानों की नहीं।


पूंजीवाद और मानवता की निराशा

पुरुषोत्तम अग्रवाल 
20वी सदी सपनों और आशाओं के टूटने और निराशा एवं दुःस्वप्न मे बदलने की सदी थी। न सिर्फ साम्यवाद बल्कि कई अन्य देवताओं ने मानवता को धोखा दिया था। इसका नतीजा यह हुआ की किसी सार्वभौमिक महत्व के ग्रांड नरेटिव की बात करना भी राजनीतिक दृष्टि से गलत समझा जाने लगा।

लेकिन साथ ही, मानव चेतना की समस्या महामारी का रूप ग्रहण करने लगी है। सबसे ज्यादा सफल माने जाने वाले पूंजीवादी देश –अमरीका मे “मन की शांति” प्रदान करने वाले पोंगा पंडितों की संख्या बढ़ती जा रही है। वहाँ मनोचिकित्सा के व्यवसाय का भी दिनों दिन विस्तार हो रहा है।अधिकांश अमरीकी अवसाद दूर करने की दवाओं को लेने के लिए मजबूर है। ऐसा लगता है मानो सामाजिक सम्बन्धों का टूटना “विकास” की पूर्वशर्त बन गया है; आज हमारा अपना समाज इसका उदाहरण है। गांधीजी इस खतरे को अपने अंदाज मे पहले ही भाप चुके थे, और नेहरू जी भी, जैसा की उन्होने 1960 मे आर॰के॰ करांजीया को बताया था, “हमारी तकनीकी सभ्यता के आध्यात्मिक खोखलेपन” के प्रति चिंतित थे ।
मानवता का ह्रास, मानव होने के एहसास का खो जाना –मानव स्वभाव से अलगाव –मार्क्स के जीवन की सबसे बड़ी चिंता थी। 30 वर्ष से भी कम की आयु मे लिखी उनकी “इकोनोमिक एंड फिलोसोफ़िकल मेन्यूस्क्रिप्ट्स ऑफ 1844” मे मार्क्स ने मनुष्य को सोशल-बीइंग ही नहीं उस से भी बढ़कर “स्पीसीज़ बीइंग” बताते हुए, मानव के इसी पहलू का सार पकड़ने का प्रयास किया है। इन नोट्स मे मार्क्स लुडविग फ्यूअरबेक और हिगल से प्रभावित थे।

मार्क्स मनुष्य की “अद्वितीयता” को रेखांकित करते है। अन्य प्राणियों से इतर मनुष्य महज प्रकृति का जैविक विस्तार नहीं है; वह प्रकृति मे है और, अन्य प्राणियों से भिन्न, वह इस बात को जानता भी है। अपने होने की इस चेतना से मनुष्य और प्रकृति के बीच का संबंध अन्य प्राणियों के प्रकृति के साथ संबंध की तुलना मे गुणांत्मक रूप से भिन्न हो जाता है। मार्क्स ने स्वयं इस संबंध को “अजैविक, आध्यात्मिक(स्प्रिच्यूअल)” (मार्क्स के स्वयं के शब्दों का हिन्दी अनुवाद) कहा है ।


जब मनुष्य की स्वाभाविक शारीरिक-मानसिक गतिविधि को बाजार मे बिकने वाली वस्तु बना दिया जाता है तो उसका अपने ही उपरोक्त आध्यात्मिक पक्ष से अलगाव हो जाता है। अलगाव की यह प्रक्रिया सामाजिक संगठन की शुरुआत से शुरू हो जाती है जो पूंजीवाद मे पहुच कर एक भयावह रूप धरण कर लेती है। पूंजीवाद मे मनुष्य का बाह्य-प्रकृति और उसके अपने आध्यात्मिक पक्ष से ही नहीं, स्वयं अपने शरीर तक से अलगाव हो जाता है।


धर्म बतौर दर्द-निवारक

मार्क्स ने संस्थागत धर्म पर भी इसी दृष्टि से विचार किया है। मार्क्स ने बताया कि धर्म “मानव कल्पना की स्वतःस्फूर्त गतिविधि” से मनुष्य का अलगाव कर उसके स्थान पर दैवीय-पिशाचीय के चिंतन को स्थापित कर देता है। साधारण शब्दों मे धर्म विश्व के साथ एकत्व महसूस करने की भावना को, ब्रह्मांडीय-आश्चर्य को और चेतना की अभिव्यक्ति को एक बाहरी वस्तु का रूप दे देता है।


मार्क्स ने धर्म को जनता के लिए अफीम कहा है । मार्क्स की यह उक्ति जितनी प्रख्यात है उतनी ही ज्यादा गलती इसे समझने मे हुई है। अफीम से मार्क्स का तात्पर्य नीद की दवा या दर्द निवारक से है जो विध्यमान परिस्थितियों के कारण जरूरी हो गई है। जैसे ही इस संदर्भ मे मार्क्स का पूरा कथन पढते है यह बात बिलकुल साफ हो जाती है-“धार्मिक-पीड़ा, वास्तविक पीड़ा की अभिव्यक्ति भी है और साथ ही साथ उस वास्तविक पीड़ा का विरोध भी। धर्मं शोषित व्यक्ति के लिए राहत की सांस का काम करता है, वह हृदयहीन विश्व का हृदय है, आत्माहीन-अमानवीय परिस्थितियों की आत्मा है। धर्म जनता के लिए अफीम है”।


कालांतर मे मार्क्स ने “आध्यात्मिक (स्प्रिच्यूअल)” जैसे शब्दों का प्रयोग बंद कर दिया और अपने विचारों को अधिक सेकुलर शब्दावली मे प्रस्तुत किया, किन्तु अब भी उनकी चिंता वही अलगाव ही था। अपनी सबसे प्रख्यात कृति “केपिटल” मे मार्क्स पूंजीवाद की कठोर निंदा इसलिए की है कि वह श्रमिक को बहुआयामी मनुष्य से गिराकर मशीन का ही एक अनुलग्नक मात्र, महज मजदूर, मे तब्दील कर देता है, उसके श्रम को “पीड़ा” मे बदल देता है और उसके जीवन-जीने-के-समय को काम-करने–के-समय मे बदल देता है जिसकी वजह से श्रमिक अपनी बौद्धिक शक्यता से दूर हो जाता है ।

गलत भविष्यवाणियाँ या गलत समझ ?

कुछ लोग मार्क्स की अप्रासंगिकता का प्रमाण उनकी इस भविष्यवाणी के सच नहीं होने मे देखते है कि “पूंजीवाद मे दिनों-दिन गरीबी बढ़ती जाएगी और मजदूरों की दशा खराब होती जाएगी”। यह सच है कि मार्क्सोत्तर पश्चिम मे पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर भी मजदूर समृद्ध हुये है। बस समस्या यह है की यदि विश्व अर्थव्यवस्था को एक इकाई के रूप मे देखा जाये तो, पूंजीवादी व्यवस्था मे पश्चिम के मजदूरों की तरक्की की भयावह और घिनौनी कीमत पश्चिमेत्तर विश्व के लोगों ने चुकाई है, और आज भी चुका रहे है।


ब्रिटेन के श्रमिक इसीलिए ‘समृद्ध’ हो सके क्यों की अंग्रेजों ने भारत का सोचे-समझे तरीके से वि-औध्योगीकरण किया और गरीब बनाया; अमरीकी श्रमिक विश्व के विभिन्न हिस्सों मे “एक्सपोर्ट ऑफ डेमोक्रेसी” के नाम पर पर थोपे गए शोषण के बिना समृद्ध नहीं हो सकता। यहाँ तक की भारत,चीन जैसे उन देशों मे जो विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ रहे है वहाँ भी शहरों और उनके निवासियों को स्मार्ट बनाए जाने की कीमत दूसरे लोग चुका रहे है । ये लोग कहीं गायब नहीं हुये है, बस दिखना बंद हो गए है क्यों की मीडिया और बुद्धिजीवियों ने इनकी ओर आँख मूँद ली है।


बड़ी बड़ी कंपनियो के तथाकथित ‘बिजनेस प्रेक्टिसेज’ से तो सभी भली भांति परिचित है। वालमार्ट स्टोर्स मे सेल्स्पर्सन को बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं दी जाती है, उनसे यह अपेक्षित है की वे 8-10 घंटे खड़े रहें।


सामान्य तौर पर कहा जाये तो आज नियमित रोजगार का स्थान “संविदा मजदूरों” और “आकस्मिक एवं अस्थायी कामगारों” (प्रबंधन शब्दावली मे “जस्ट इन टाइम”) ने ले लिया है । ‘पकोड़ा और पान की अर्थव्यवस्था’ इसी सोच का देशी अवतार है । नैतिकता से असंपृक्त मुनाफाखोरी के लिए जरूरी है की जितना संभव हो सके उतने लोगों को कल की रोजी-रोटी के लिए असमंजस मे रखा जाये । याद है किस प्रकार बहुत सारे अर्थशास्त्रियों ने मनरेगा का इसलिये विरोध किया था की इसकी वजह से ‘सस्ता श्रम’ ‘महंगा’ हो गया है और श्रमिक मिलने मे कठिनाई आ रही है ।

रोजी की यह अनिश्चितता चिंता और क्रोध को जन्म देती है जिसे या तो आक्रामक राजनीति की तरफ मौड़ दिया जाता है या फिर फर्जी ‘अध्यात्म’ या ‘मनोचिकित्सा’ की तरफ । और फिर, जैसा की मार्क्स ने कटाक्ष पूर्वक कहा था, “अपराधी सिर्फ अपराध को ही जन्म नहीं देते, बल्कि इससे निपटने के लिए जरूरी कानूनी ढांचे को भी जन्म देते है”।


आध्यात्मिक संकट, पूंजीवादी जड़ें

विश्व अर्थव्यवस्था को एक इकाई के रूप मे देखने पर मार्क्स अप्रासंगिक और पुराने नहीं दिखाई देते है खास तौर पर जब वे कहते है –“एक सिरे पर धन का संकेन्द्रण उसी समय दूसरे सिरे पर दुख, श्रम की पीड़ा, दासता, अज्ञानता, अमानवीयता और नैतिक अवमूल्यन का संकेन्द्रण है”।


वे मार्क्स ही थे जिनहोने अपने मित्र एंजेल्स के साथ मिलकर ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ (1948) मे पूंजी की वैश्वीकरण की तरफ यात्रा की और बढ़ी बड़ी कंपनियों के विश्व के वास्तविक शासक बन जाने की –डेमोक्रेसी को कोर्पोरेटोक्रेसी द्वारा -बदल दिये जाने की भविष्यवाणी की थी।


आप इसे आध्यात्मिक कहे या कुछ और नाम दे, लेकिन अलगाव द्वारा पैदा हुये संकट को नकारा नहीं जा सकता ।मार्क्स ने इस संकट के “भौतिक” आधार और “ऐतिहासिक” परिप्रेक्ष्य को उजागर कर बहुत महत्वपूर्ण सेवा की है । सनद रहे, भौतिकवाद सुखवाद (नैतिकता से असंपृक्त सुख प्राप्ति की अंधी दौड़ ) नहीं है । बल्कि मार्क्सवादी भौतिकवाद सुखवाद की कड़ी आलोचना करता है।

जब कबीर अपनी एक कविता मे भीतर और बाहरी (‘भीतर बाहर शबद निरंतर’) की सतत अन्तरक्रिया की बात करते है तब वे परंपरागत भारतीय समझ को ही दोहराते है जो सही और गलत की एकांतवादी सोच के शिकंजे को खारिज करता है। जब मार्क्स इस बात पर ज़ोर देते है की मानव चेतना और भोतिक परिस्थितियाँ एक दूसरे पर द्वन्द्वात्मक रूप से कार्य करती है तो वे भी अपनी दार्शनिक परंपरा की शब्दावली मे, अपने तारीक से यही करते है।


‘आधात्मिक सुनेपन’ की समस्या का समाधान करने के लिए जरूरी है की उत्पादन और वितरण की सारी व्यवस्था का मानवीयकरण हो। ‘आत्मा के संकट’ का इलाज महज आध्यात्मिक या मनोचिकित्सकीय उपायों से नहीं किया जा सकता। इसके समाधान हेतु भीतर चेतना की तरफ किये जाने वाले इस उपायों के साथ-साथ बाहरी की, जगत की समस्याओं का न्यायपूर्ण समाधान खोजना आवश्यक है।

------------------

मूल रूप से THEQUINT.COM पर प्रकाशित

सोमवार, 5 मई 2014

वर्ग एवं वर्ग संघर्ष

यह आलेख "मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांत" लेखमाला के तहत लिखे जा रहे लेखों की श्रृंखला के तहत लिखा गया था और युवा संवाद में प्रकाशित हुआ था. आज मार्क्स के जन्मदिन पर आप सबके लिए.







हमने देखा है कि कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स ने कहा कि ‘दुनिया का अब तक का इतिहास वर्ग संघर्षों इतिहास है.’ पिछले अध्यायों में भी हमने वर्ग संघर्ष का कई बार ज़िक्र किया है.  पिछले अध्याय में हमने वर्गों की उत्पति पर भी बात की. आम बोलचाल में वर्ग और वर्ग संघर्ष अक्सर अस्पष्ट अर्थों में उपयोग किये जाते हैं. अख़बारों की हेडिंग्स में ‘फलाँ शहर में वर्ग संघर्ष की स्थिति’ या फिर ‘दो वर्गों में बीच ख़ूनी संघर्ष’ जैसे वाक्य दिख जाते हैं. लेकिन मार्क्सवादी शब्दावली में वर्ग का एक विशिष्ट अर्थ है. एमिल बर्न्स अपनी बेहद प्रसिद्ध पुस्तिका ‘मार्क्सवाद क्या है’ में लिखते हैं, ‘साधारण शब्दों में कहा जाय तो वर्ग ऐसे लोगों के समूह को कहते हैं जो अपनी जीविका एक ही ढंग से कमाते हों. सामंती समाज का उत्पादन कार्य अर्द्ध-ग़ुलाम किसान- विशेषकर खेती के द्वारा- करते थे, और बादशाह तथा सामंत इन अर्द्ध ग़ुलामों से वसूल किये जाने वाले किसी न किसी प्रकार के कर से (चाहे वह मेहनत के रूप में, चाहे वस्तु के रूप में वसूल किया जाता हो) अपनी जीविका चलाते थे. अतः सामंतों का एक वर्ग था जिसके कुछ वर्ग हित थे. सामंत चाहते थे कि अर्द्ध ग़ुलामों की मेहनत से अधिक से अधिक फ़ायदा उठायें. सामंतों की सदा यही इच्छा रहती थी कि अपनी ज़मीन की सीमा को और उस पर काम करने वालों की संख्या को अधिक से अधिक बढ़ाएँ. दूसरी ओर, अर्द्ध ग़ुलाम किसानों का एक वर्ग था जिनके अपने विशेष वर्ग हित थे. वे चाहते थे कि जो कुछ पैदा करें उसका अधिक से अधिक भाग मालिकों को सौंप देने के बजाय अपने लिए तथा अपने परिवारों के लिए बचा लें. वे ख़ुद अपने लाभ के लिए मेहनत करने की आज़ादी चाहते थे.’  अपने अत्यंत सरलीकृत रूप में यह परिभाषा दो बातें साफ़ करती है, पहली यह कि एक वर्ग के लोग उत्पादन प्रक्रिया में एक जैसी स्थिति में होते हैं और दूसरी यह कि दो वर्गों के हित एक दूसरे के एकदम विपरीत होते हैं.

लेकिन यहाँ रूककर हमें ‘उत्पादन प्रक्रिया में एक जैसी स्थिति’ वाली बात की थोड़ी विवेचना करनी होगी. जैसा कि बर्न्स ने अपने उदाहरण में बताया, कृषि में यह सम्बन्ध बहुत स्पष्ट था. लेकिन पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में यह इतना स्पष्ट नहीं है. कारखाने में सीधा श्रम करने के अलावा भी मैनेजर से लेकर सेल्स डिपार्टमेंट तक ऐसे तमाम लोग होते हैं जो सीधे उत्पादन की प्रक्रिया में संलग्न तो नहीं होते, न ही उस तरह का शारीरिक श्रम कर रहे होते हैं लेकिन मालिकान में भी वे शामिल नहीं होते. हालाँकि उनका जीवन स्तर बेहतर होता है लेकिन उन्हें भी महीने की एक निश्चित तनख्वाह मिलती है और उनकी नौकरी भी मालिकान के रहम-ओ-करम पर ही निर्भर होती है. यहाँ हमें बुर्ज़ुआ और सर्वहारा की परिभाषा को याद करना होगा. कम्युनिस्ट घोषणापत्र के सवाल-ज़वाब वाले खंड में एंगेल्स बताते हैं कि, ‘सर्वहारा समाज का वह वर्ग है जिसका जीवनयापन पूरी तरह से और केवल अपने श्रम की बिक्री से ही होता है पूँजी से होने वाले किसी मुनाफ़े से नहीं. जिसकी खुशियाँ और दुःख, जीवन और मृत्यु, जिसका सम्पूर्ण अस्तित्व श्रम की माँग पर निर्भर करता है और इस तरह गलाकाट प्रतियोगिता के परिणामस्वरूप होने वाले उतार-चढ़ावों से होने वाले अच्छे-बुरे व्यापार पर. एक शब्द में सर्वहारा उन्नीसवीं सदी का कामगार वर्ग है.’ ज़ाहिर है कि ख़ुद को श्रमिकों से अलग और ऊंचा समझने वाला कथित प्रोफेशनल वर्ग भी दरअसल इसी सर्वहारा वर्ग का हिस्सा है. याद कीजिए मंदी के समय पाँच-पाँच छः-छः अंकों की तनख्वाह पाने वाले आई टी प्रोफेशनल भी सूरत के हीरा कारीगरों की तरह ही अमेरिका से भारत तक नौकरियों से हाथ धो रहे थे. इस तरह एक जैसी स्थिति का अर्थ केवल एक जैसा काम करने से नहीं बल्कि उत्पादन संबंधों में अपनी स्थिति से है. एक ओर वह वर्ग है जिसका पूँजी (मार्क्सवादी शब्दावली में पूँजी का अर्थ पैसे रुपये से नहीं अपितु उत्पादन कर सकने में समर्थ उत्पादक मशीनों और अन्य साधनों से है) पर अधिकार है और जो मुनाफ़ा कमाता है, इसे हम बुर्ज़ुआ वर्ग कहते हैं और दूसरी तरफ वह वर्ग जो अपना मानसिक या शारीरिक श्रम इन्हें बेचता है और बदले में तनख्वाह पाता है, उसे हम सर्वहारा कहते हैं. इस तरह वर्गों में समाज का विभाजन आर्थिक कारणों से होता है. एंटी ड्यूहरिंग में एंगेल्स कहते हैं कि, ‘ समाज के ये युद्धरत वर्ग हमेशा उत्पादन पद्धति और विनिमय के परिणाम होते हैं, दूसरे शब्दों में अपने काल की आर्थिक परिस्थितियों के.’ इनमें से एक वर्ग जो प्रभावी होता है, जिसके हाथ में उत्पादक शक्तियों का नियंत्रण होता है वही राजसत्ता को भी नियंत्रित करता है और जिसे  समाज में उसी के विचार भी प्रभावी विचार के रूप में स्थापित होते हैं. मार्क्स ज़र्मन विचारधारा में लिखते हैं कि ‘हर युग में शासक वर्ग के विचार की प्रबल विचार रहे है. अतः जो वर्ग समाज की भौतिक शक्तियों को शासित करता है वहीं इस युग की बौद्धिक शक्ति पर भी शासन करता है.  जिसे अक्सर सहज बोध (common sense), सार्वभौमिक या सामान्य सत्य के रुप में प्रस्तुत किया जाता है वह मार्क्स के अनुसार वस्तुतः विचारधारा होती है, या दूसरे शब्दों में कहे तो एक वर्ग के परिप्रेक्ष्य में चीजों को देखने तथा विश्वबोध का तरीका और यही वर्ग न केवल उत्पादन के साधनों पर अपितु काफी हद तक प्रतिनिधित्व एवं व्याख्या के साधनों पर भी नियंत्रण करता है.’ आख़िर स्कूल, कालेज़, न्याय, संविधान सब जब उसके नियंत्रण में होते हैं तो यह एकदम स्वाभाविक है कि निष्पक्ष दिखने वाले उसके विचार और निर्णय दरअसल उसके वर्गीय हितों से ही संचालित हों. क्या आश्चर्य है कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में भगत सिंह को आतंकवादी बताया जाय और आज़ादी की लड़ाई के उन्हीं किरदारों को महत्त्वपूर्ण कह कर प्रस्तुत किया जाए तो सत्ता की विचारधारा से जुड़े हुए हैं!

उत्पादन संबंधों और वर्ग के रिश्ते की बात करें तो यह स्पष्ट है कि सामंती काल में जब कृषि उत्पादन का प्रमुख साधन थे तो वर्गीय संरचना अलग थी और औद्योगिक क्रान्ति के बाद उत्पादन के साधन के रूप में मशीन के साथ यह बदल गयी जिससे सर्वहारा और बुर्जुआ के रूप में नए वर्ग पैदा हुए. यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी ज़रूरी है कि ये वर्ग अनादि काल से, उत्पादन के आरम्भ होने और सभ्य समाज के विकास के साथ ही अस्तित्वमान हो गए थे. मार्क्स ने जोसेफ वेडेमेयर को लिखे एक पत्र में लिखा है, ‘आधुनिक समाज में वर्गों के अस्तित्व की खोज का श्रेय मुझे नहीं जाता है और न ही उनके बीच संघर्ष की खोज का. पूँजीवादी इतिहासकारों ने मुझसे काफी पहले वर्ग संघर्ष के विकास का वर्णन किया था और पूँजीवादी अर्थशास्त्रियों ने वर्गों की आर्थिक संरचना का. मैंने जो साबित किया वह यह था : (1) वर्गों का अस्तित्व उत्पादन के विकास में विशेष ऐतिहासिक चरणों से जुड़ा हुआ है, (2) वर्ग संघर्ष अनिवार्य रूप से सर्वहारा के अधिनायकत्व से जुड़ा होता है, (3) यह अधिनायकत्व सभी वर्गों के विलयन और वर्ग विहीन समाज की ओर ले जाता है.’

स्पष्ट है कि अब तक के ऐतिहासिक विकास में उत्पादन संबंधों में बदलाव के साथ पुराने वर्ग नष्ट हुए हैं और उनकी जगह नए वर्गों ने ली है लेकिन मार्क्सवाद वर्गों के विनाश की बात करता है. वह एक ऐसी उत्पादन प्रणाली की बात करता है जहाँ मालिक और मज़दूर का भेद मिट जाए, जहाँ मानसिक और शारीरिक श्रम का विभेद मिट जाए और श्रमिकों के श्रम का शोषण करके मुनाफ़ा कमाना मुमकिन न रहे. वह एक वर्ग विहीन समाज की बात करता है जहाँ सर्वहारा का अनन्य शासन हो. इसे उन्होंने सर्वहारा का अधिनायकत्व कहा. मार्क्स के इन शब्दों को अक्सर गलत तरीके समझा और व्याख्यायित किया गया है. अधिनायकवाद (dictatorship या तानाशाही) को एक घृणित शब्द की तरह व्यवहृत किया जाता है. इसके मूल में पूंजीवादी व्यवस्था की कोख से पिछले लगभग सौ वर्षों में जन्मी नाजीवाद जैसी अनेक घृणित तथा बर्बर प्रवृत्तियां है. जब मार्क्स ने इस शब्द का प्रयोग किया था तब इसके ये मानी नहीं थे. दरअसल वे ‘सभी’ प्रकार के राज्यों की बात कर रहे थे चाहे इनमें जिस हद तक भी जनतंत्र हो. मार्क्स के लिए हर राज्य वर्ग शासन का एक उपकरण था। फ्रांस और जर्मनी में क्रान्ति के बाद स्थापित शासन, जिनमें कई ऐसे मंत्री भी शामिल थे जो जनतंत्र के लिये संघर्ष में एक समय मजदूरों के साथ कार्य कर चुके थे, पूरी बर्बरता से मजदूरों के  विरुद्ध हो गए थे। मार्क्स के समक्ष प्रश्न यह था कि ‘किस प्रकार का शासन बहुसंख्यक के हितों की रक्षा कर सकता है?’ और उनका उत्तर था...’सामाजिक स्थितियों में पूर्ण क्रांतिकारी परिवर्तन के साथ सर्वहारा का अनन्य राजनैतिक शासन जो जिससे उससे किसी तरह अलग न किया जा सके.’ केवल ऐसी ही राज्य व्यवस्था सर्वहारा द्वारा अर्जित सफलताओं की रक्षा तथा सामाजिक स्थितियों के रुपांतरण को निर्देशित कर सकती थी। उनके लिए ऐसे शासन का अर्थ था सर्वहारा वर्ग का वह शासन जिसमें उसके वर्ग हित ही सत्ता व सामाजिक व्यवस्था की संचालक शक्ति हों. वह किसी व्यक्ति की तानाशाही की बात नहीं कर रहे थे.

अब ज़ाहिर है कि एकदम विपरीत हितों वाले ये वर्ग अपने हितों के लिए मुसलसल संघर्ष में होंगे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण मैनेजमेंट और ट्रेड यूनियनों के बीच के संघर्ष का दिया जा सकता है. लेकिन इसके निहितार्थों को समझने के लिए इस पर विस्तार से बात करनी ज़रूरी है.  

जैसा कि शुरू में कहा गया, आम भाषा में वर्ग संघर्ष को कोई अच्छी बात नहीं माना जाता है. ऐसे उपदेश हम अक्सर सुनते हैं कि सबको मिल जुल कर रहना चाहिए, आपसी वैमनस्य अच्छी बात नहीं है. गाँधी से लेकर अहिंसा के तमाम प्रवर्तक वर्ग संघर्ष की जगह वर्ग समन्वय की बात करते हैं. पूँजीवादी इतिहासकार तथा समाजवादी इसे ‘ग़लतफहमी’, ‘आपसी सँवाद की कमी’ या ‘शासकों की ग़लत नीतियों’ से लेकर ‘समाज विरोधी तत्वों के भड़काने’ तक का नतीज़ा सिद्ध करने की कोशिश करते हैं. लेकिन यह सोचना कि ऐसे दो वर्ग जिनके हित बिलकुल विपरीत हैं, शान्ति और समन्वय के साथ रह सकते हैं या तो नादानी है या फिर सत्ताधारी पूँजीपति वर्ग को बचाने की साजिश. गाँधी के प्रति पूरी इज्ज़त के बावजूद हम इस तथ्य को नहीं भूल सकते कि उन्होंने नाविक विद्रोह से लेकर मज़दूरों के तमाम आंदोलनों का विरोध किया था. यह विरोध था तो अहिंसा के नाम पर लेकिन इसका फ़ायदा पूँजीपति वर्ग को हुआ. क्या यह कल्पना की जा सकती है कि कोई पूँजीपति बिना संघर्ष किए मज़दूरों को उनका हक़ दे देगा?  गाँधी अपने ट्रस्टीशिप के सिद्धांत में यह कल्पना करते हैं कि जब पूंजीपति के पास पर्याप्त धन हो जाएगा तो वह ट्रस्ट बना कर इसे सभी ग़रीबों में वितरित कर देगा. एंटीलिया जैसे महामहलों में रहने वाले अम्बानियों के युग में यह सिद्धांत क्या एक क्रूर मज़ाक नहीं लगता? क्या हमने नहीं देखा है कि पूँजीपति की मुनाफ़े की हवस असमाप्य है. क्या हम नहीं जानते कि पिछले पचास वर्षों में अमेरिका से लेकर भारत में अमीर ग़रीब की खाई ही नहीं बढ़ी है बल्कि सबसे ऊपरी दस फ़ीसदी तबके के पास संपत्ति का संकेन्द्रण लगातार बढ़ता चला गया है. तो ऐसे में सर्वहारा हाथ पर हाथ धरे उनकी सदिच्छा और उनकी कृपा की प्रतीक्षा में नहीं रह सकता.

पूंजीपति वर्ग और सर्वहारा वर्ग वैमनस्यपूर्ण वर्ग हैं क्योंकि उनके हित परस्पर एक दुसरे के विरुद्ध और आपस न मिलने वाले हैं. जो सर्वहारा के लिए फ़ायदा है वह पूंजीपति के लिए नुक्सान. सर्वहारा एक शोषित वर्ग है और पूँजीपति का अस्तित्व ही उसके शोषण पर टिका है. इसलिए इन वर्गों के बीच संघर्ष तो अवश्यंभावी है.

लेकिन यह होता कैसे है? मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में यह विस्तार से बताया है. कि जैसे जैसे पुरानी व्यवस्था से पूंजीवाद विकसित होता है छोटी कार्यशालाएं औद्योगिक पुंजीपति के विशाल कारखाने में बदल जाती हैं. विकसित हो रहे नगरों को आपूर्ति करने वाले आधुनिक फार्मों के गहन उत्पादन तंत्र में किसान खेत मजदूर बन जाते है, चिरंतन विकासमान राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक इकाईयों के चलते छोटे व्यापारी नष्ट हो जाते है, और बहुराष्ट्रीय निगमों के निर्माण  की प्रक्रिया आरंभ हो जाती हैं. शहरों में और उसके इर्द गिर्द  विकसित उद्योगों में काम करने को मजबूर कामगार एक नई क्रूरता के शिकार होते है.

“कारखाने में ठुंसे झुंड के झुंड मजदूरों को सैनिकों की तरह संगठित किया जाता है. औद्योगिक फौज के सिपाहियों की तरह वे बाकायदा एक दरजावार तरतीब में बंटे हुए अफसरों और जमादारों की कमान में रखे जाते हैं. वे सिर्फ बुर्जुआ वर्ग या बुर्जुआ राज्य के ही दास नहीं है बल्कि उन्हें घड़ी घड़ी, दिन ब दिन, अधीक्षक और सर्वोपरि खुद बुर्जुआ कारखानेदार द्वारा भी दासता में ले लिया जाता है. यह निरंकुशता जितना ही अधिक प्रच्छन्न तौर पर मुनाफे को अपना लक्ष्य घोषित करती है, वह उतनी ही तुच्छ, घृणित और कटु होती जाती है.[1]                     
“प्रांरभ में जैसे जैसे हताशा बढ़ती जाती है पहले इक्के दुक्के मजदूर लड़ते हैं, फिर एक कारखाने के मजदूर मिलकर लड़ते हैं और फिर एक पेशे के, एक इलाके के सब मजदूर एक  साथ उस साझा दुश्मन -बुर्जुआ से मोर्चा लेते हैं, जो उनका सीधे सीधे शोषण करते हैं. वे अपने हमले उत्पादन की बुर्जुआ अवस्थाओं के विरूद्ध नहीं बल्कि उत्पादन के उपकरणों के विरूद्ध लक्षित करते हैं. अपनी मेहनत के साथ होड़ करने वाले आयातित सामानों को नष्ट कर देते हैं, मशीनों को तोड़ देते है, फैक्ट्रियों में आग लगा देते हैं. वे मध्ययुग की खोई हुई हैसियत को बलपूर्वक प्राप्त करने कोशिश करते हैं.”[2]

लेकिन दरअसल विडंबना तो यह है कि मशीन नहीं इनका वास्तविक शत्रु तो वह प्रयोजन है जिसके लिए इनका प्रयोग होता है. यह विरोधाभास ही है जैसा कि मार्क्स  स्पष्टतः रेखांकित करते हैं, कि मनुष्य जितना अधिक उत्पादन करने में सफल होता है मनुष्य को श्रम की दासता से मुक्त कराने की संभावना उतनी ही मजबूत होती जाती है. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में यह संभावना नष्ट कर दी जाती है. मानवता को मुक्त करने की जगह मशीन इसकी दासता में और अधिक अभिवृद्धि करती हैं. लेकिन इसके साथ ही एक और  प्रक्रिया होती है- सर्वहारा या श्रमिक वर्ग केवल शहरों की तरफ धकेला ही नहीं जाता बल्कि जैसे जैसे उत्पादन मुनाफे की होड़ में और परिष्कृत तथा यांत्रिक होता जाता है कालांतर में इसकी वजह से मजदूरों की सामूहिक शक्ति भी बढ़ती जाती है. जिससे उनके लिए संगठित होकर मशीनों के मालिकों से लोहा ले पाना संभव हो पाता है.

  इस प्रकार मार्क्स की दृष्टि  में सर्वहारा ही समाजवादी क्रांति का प्रतिनिधि है. वह मजदूरों का किसी रूप में आदर्शीकरण नहीं करते. न तो वह उन्हें दूसरे संघर्षरत लोगों से मजबूत या बेहतर घोषित करते हैं और न ही उन्हें पूंजीवाद समाज में पैदा होने वाले अंतर्विरोधो से मुक्त समझते है. एक आम मजदूर व्यक्तिगत स्तर पर किसी भी दूसरे व्यक्ति की तरह ही स्वार्थी, पतित, पुरूष अहं की ग्रंथि का शिकार कुछ भी हो सकता है लेकिन इस नवीन पूँजीवादी समाज में एक वर्ग के रूप में वह ऐसी विशिष्ट स्थिति में होता है कि एक तरफ इसे बदलना उसके हित में होता है और दूसरी तरफ उसमें ऐसा करने की क्षमता भी होती है. सर्वहारा वर्ग के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और सामूहिक शक्ति ही उसका इकलौता हथियार होती है.

लेकिन वर्ग संघर्ष सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं होता. यह अनेकानेक रूपों में समाज के भीतर चलता रहता है. आगे के अध्याय में हम इसके विभिन्न रूपों के बारे में विस्तार से बात करेंगे.





[1] वही, पेज 39
[2] वही, पेज 40

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

कार्ल मार्क्स और कम्युनिस्ट घोषणा पत्र

आज मार्क्स की बरसी है. बीसवीं सदी का वह क्रांतिकारी दार्शनिक जिसने दुनिया को देखने-समझने का नया नज़रिया दिया. उन्हें सलाम करते हुए आज अपनी सद्य प्रकाशित किताब "कार्ल मार्क्स और उनका दर्शन" से कम्युनिस्ट घोषणापत्र पर लिखा अध्याय यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. 
किताब की कीमत 100/- रुपये है और इसे आधार प्रकाशन से 09417267004 से मंगाया जा सकता है.




कम्यूनिस्ट घोषणा पत्र – सर्वहारा की ऐतिहासिक उपलब्धि


“घोषणा पत्र” मार्क्स और की एक महान उपलब्धि थी जिसने उस समय के मज़दूर आंदोलनों की मूल भावना को स्पष्टतः प्रकट किया. यह सारी दुनिया के सामने एक ऐसे राजनैतिक दृष्टिकोण का प्रमाण था जो अपने समय के भौतिक यथार्थ पर आधारित था तथा अक्सर सतह के नीचे दबे तनावों तथा अंतर्विरोधों की सटीक पहचान भी करता था. घोषणा पत्र की प्रसिद्ध आंरभिक पंक्ति में ही उन्होंने देख लिया था -  

“ यूरोप को एक भूत आतंकित कर रहा है... कम्यूनिज्म का भूत ! इस भूत को भगाने के लिए पोप और ज़ार, मेटरनिख और गीज़ो, फ्रांसीसी उग्रवादी और जर्मन पुलिस के भेदिये...बूढ़े यूरोप के सारे सत्ताधारी एक हो गए है.” [1]

यह कोई साधारण राजनीतिक पर्चा मात्र नहीं है, यह एक उत्कट घोषणापत्र तथा  एक नवीन दृष्टि है. इक्कीसवीं सदी के उन सभी प्रबुद्ध पाठकों के लिए जो पंक्तियों के बीच की इबारत को पढ़ना जानते है, यह अविश्वसनीय रूप से सामयिक है. यह एक ऐसे विश्व की विवेचना करता है जिसे हम आज भी फौरन पहचान लेते हैं, जबकि जिस समय यह घोषणा पत्र लिखा  गया था, वह बस आकार ही ले रहा था. जिस औद्योगिक पूँजीवाद को मार्क्स ने इतनी गहरी अंतर्दृष्टि से समझा और व्याख्यायित किया है, वह उस दौर में अपने क्रूर विकास की आरंभिक अवस्था में ही था. जब मार्क्स ओर एंगेल्स ने शोषण पर आधारित इस तंत्र तथा मुनाफ़ाखोरी की अंधी दौड़ से पैदा होने वाली अमानवीकरण की प्रवृत्ति पर से परदा हटाया था तो शायद उन्हें यह भान भी नहीं  था कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उनके शब्द कितने सही साबित होगें.

“उत्पादन उपकरणों में, लगातार  क्रांति लाये बिना बुर्जुआ वर्ग जीवित नहीं रह सकता इसके विपरीत सभी पुराने औद्योगिक वर्गों के अस्तित्व की पहली शर्त पुरानी उत्पादन विधियों को ज्यों का त्यों बनाए रखना थी. उत्पादन प्रक्रिया का निरंतर क्रांतिकरण, सभी सामाजिक अवस्थाओं में लगातार उथल पुथल, चिरंतन अनिश्चितता और हलचल - ये चीजें बुर्जुआ युग को पहले के सभी युगों से अलग करती हैं सभी स्थिर और जड़ीभूत संबंध अपने सहगामी, प्राचीन व पवित्र पूर्वाग्रहों तथा मतों सहित ध्वस्त हो जाते हैं, सभी नवनिर्मित संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते है जो कुछ भी ठोस है, वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है, और अंततः मनुष्य को संजीदा दृष्टि से  जीवन की वास्तविक अवस्थाओं तथा पारस्परिक संबंधों को देखने के लिए मजबूर होना पड़ता है.”
“...अपने उत्पादों के लिए निरंतर विस्तारमान बाज़ार की ज़रूरत बुर्जुआओं का दुनिया भर में पीछा करती है हर जगह घुसना, हर जगह पैर जमाना तथा हर जगह संपर्क कायम करना होता है.”
“कम्युनिस्ट अपने दृष्टिकोण और लक्ष्य छिपाने से घृणा करते हैं. वे खुले तौर पर एलान करते हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ समस्त मौजूदा सामाजिक दशाओं को बलपूर्वक उखाड़ फेंकने से ही हासिल हो सकता हैं. शासक वर्गों को कम्युनिस्ट क्रांति के भय से कांपने दो. सर्वहाराओं के पास अपनी बेड़ियों के सिवाय खोने के लिए कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.”
            दुनिया के मज़दूरों एक हो ! [2]

इसे पढ़ते हुए पाठक के लिए यह विश्वास कर पाना बेहद मुश्किल होता है कि यह सब मध्यपूर्व में तेल के भंडार मिलने के साथ इस क्षेत्र के दुनिया के दूसरे छोर पर बसे देशों के हितों चलते युद्धक्षेत्र में परिवर्तित हो जाने या फिर कोक और नाइक जैसे बहुराष्ट्रीय उत्पादों के विश्व की हजारों विभिन्न सभ्यताओं को प्रभावित करने या उस परिदृश्य के भी पहले बहुत पहले लिखा गया था जहां बम्बई के शेयर बाजार के एक निर्णय से लाखों करोड़ों लोग प्रभावित हो जाते हैं.

घोषणा पत्र में सटीक विवेचना और पूंजीवादी तंत्र की कार्यप्रणाली तथा प्रभावों का विशद विवरण ही प्रभावशाली नहीं हैं अपितु जिस उत्कट तरीके से उन्होंने इसे बेपरदा किया है, जिस दृढ़ता के साथ इसकी भर्त्सना की है वह भी अद्भुत है. आखिकार यह एक कम्युनिस्ट घोषणा पत्र है जो कि पूँजीवादी तंत्र की आक्रामक गतिकी की पहचान इसकी प्रशंसा के लिए नहीं, इसे दफनाने के लिए करता है प्रश्न यह है कि इसकी कब्र खोदेगा कौन ?

इसका उत्तर हमें घोषणा पत्र में थोड़ा आगे मिलता है. जैसे जैसे पुरानी व्यवस्था से पूँजीवाद विकसित होता है छोटी कार्यशालाएँ औद्योगिक पूँजीपति के विशाल कारखाने में बदल जाती हैं. विकसित हो रहे नगरों को आपूर्ति करने वाले आधुनिक फार्मों के गहन उत्पादन तंत्र में किसान खेत-मज़दूर बन जाते है, चिरंतन विकासमान राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक इकाईयों के चलते छोटे व्यापारी नष्ट हो जाते हैं और बहुराष्ट्रीय निगमों के निर्माण  की प्रक्रिया आरंभ हो जाती हैं. शहरों में और उसके इर्द गिर्द  विकसित उद्योगों में काम करने को मज़बूर कामगार एक नई क्रूरता के शिकार होते है.

“कारखाने में ठुंसे झुंड के झुंड मज़दूरों को सैनिकों की तरह संगठित किया जाता है. औद्योगिक फौज के सिपाहियों की तरह वे बाकायदा एक दरजावार तरतीब में बंटे हुए अफ़सरों और जमादारों की कमान में रखे जाते हैं. वे सिर्फ बुर्जुआ वर्ग या बुर्जुआ राज्य के ही दास नहीं है बल्कि उन्हें घड़ी घड़ी, दिन ब दिन, अधीक्षक और सर्वोपरि खुद बुर्जुआ कारखानेदार द्वारा भी दासता में ले लिया जाता है. यह निरंकुशता जितना ही अधिक प्रच्छन्न तौर पर मुनाफे को अपना लक्ष्य घोषित करती है, वह उतनी ही तुच्छ, घृणित और कटु होती जाती है.[3]                     
“प्रांरभ में जैसे जैसे हताशा बढ़ती जाती है पहले इक्के दुक्के मज़दूर लड़ते हैं, फिर एक कारखाने के मज़दूर मिलकर लड़ते हैं और फिर एक पेशे के, एक इलाक़े के सब मज़दूर एक  साथ उस साझा दुश्मन – बुर्जुआ-  से मोर्चा लेते हैं, जो उनका सीधे सीधे शोषण करते हैं. वे अपने हमले उत्पादन की बुर्जुआ अवस्थाओं के विरूद्ध नहीं बल्कि उत्पादन के उपकरणों के विरूद्ध लक्षित करते हैं. अपनी मेहनत के साथ होड़ करने वाले आयातित सामानों को नष्ट कर देते हैं, मशीनों को तोड़ देते है, फैक्ट्रियों में आग लगा देते हैं. वे मध्ययुग की खोई हुई हैसियत को बलपूर्वक प्राप्त करने कोशिश करते हैं.”[4]

लेकिन दरअसल विडंबना तो यह है कि मशीन नहीं इनका वास्तविक शत्रु तो वह प्रयोजन है जिसके लिए इनका प्रयोग होता है. यह विरोधाभास ही है जैसा कि मार्क्स  स्पष्टतः रेखांकित करते हैं, कि मनुष्य जितना अधिक उत्पादन करने में सफल होता है मनुष्य को श्रम की दासता से मुक्त कराने की संभावना उतनी ही मज़बूत होती जाती है. लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था में यह संभावना नष्ट कर दी जाती है. मानवता को मुक्त करने की जगह मशीन इसकी दासता में और अधिक अभिवृद्धि करती हैं. लेकिन इसके साथ ही एक और  प्रक्रिया होती है- सर्वहारा या श्रमिक वर्ग केवल शहरों की तरफ धकेला ही नहीं जाता बल्कि जैसे जैसे उत्पादन मुनाफे की होड़ में और परिष्कृत तथा यांत्रिक होता जाता है कालांतर में इसकी वजह से मजदूरों की सामूहिक शक्ति भी बढ़ती जाती है. जिससे उनके लिए संगठित होकर मशीनों के मालिकों से लोहा ले पाना संभव हो पाता है.

  इस प्रकार मार्क्स की दृष्टि  में सर्वहारा ही समाजवादी क्रांति का प्रतिनिधि है. वह मज़दूरों का किसी रूप में आदर्शीकरण नहीं करते. न तो वह उन्हों दुसरे संघर्षरत लोगों से मज़बूत या बेहतर घोषित करते हैं और न ही उन्हें पूँजीवाद समाज में पैदा होने वाले अंतर्विरोधो से मुक्त समझते है. एक आम मज़दूर व्यक्तिगत स्तर पर किसी भी दूसरे व्यक्ति की तरह ही स्वार्थी, पतित, पुरुष अहं की ग्रंथि का शिकार कुछ भी हो सकता है लेकिन इस नवीन पूँजीवादी समाज में एक वर्ग के रूप में वह ऐसी विशिष्ट स्थिति में होता है कि एक तरफ इसे बदलना उसके हित में होता है और दूसरी तरफ उसमें ऐसा करने की क्षमता भी होती है. सर्वहारा वर्ग के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और सामूहिक शक्ति ही उसका इकलौता हथियार होती है.

मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणा पत्र का ज्यादातर हिस्सा ब्रुसेल्स  के ब्लू पैरट रेस्त्रां में लिखा था. 1848 के फरवरी माह में यह छापाखाने में पहुँचा और जब यह छपकर आया तो फ्रांस से विद्रोहों की ख़बर आनी शुरू हो गई थी. वहाँ के अलोकप्रिय प्रधानमंत्री गीजो ने इस्तीफा दे दिया और अगले दिन राजा लुई फिलिप का भी पतन हो गया. कुछ ही हफ्तों में विद्रोह की लपटें बर्लिन तक पहुँच गईं और एक और सरकार गिर गई. एंगेल्स ने उत्साहपूर्वक लिखा “ट्यूलेरिज और शाही महल की लपटें सर्वहारा के उदय की प्रतीक हैं...अब बुर्जुआ शासन हर जगह ध्वस्त हो जायेगा...हमें उम्मीद है कि जर्मनी में भी यही होगा.” फरवरी क्रांति के फलस्वरुप कम्यूनिष्ट लीग की लंदन स्थित केन्द्रीय समिति ने समस्त अधिकार ब्रुसेल्स के उच्च मंडल को हस्तांरित कर दिये। पर जब यह फैसला ब्रुसेल्स पहुंचा तो वहाँ का प्रशासन यूरोप मे फैलते विद्रोह के मद्देनज़र सावधान हो चुका था और घेराबंदी शुरु हो चुकी थी। जर्मन लोगों की बैठकों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। अतः नई केन्द्रीय समिति ने अपने को भंग कर दिया और सारे  अधिकार मार्क्स को सौंप कर उन्हें फौरन पेरिस में एक नई केन्द्रीय समिति गठित करने का निर्देश दिया। यह निर्णय करने वाले पाँच आदमियों ने (3 मार्च 1848 को) अपने अपने अलग रास्ते पकड़े ही थे कि पुलिस मार्क्स के घर में घुस आई और उन्हे गिरफ्तार कर अगले ही दिन फ्रांस जाने को, जहाँ वह ख़ुद ही जाना चाह रहे थे, मज़बूर कर दिया। पेरिस में कम्यूनिष्ट लीग का नया मुख्यालय घोषित किया गया। बाद में एंगेल्स भी वहाँ आ गए और दोनो जन वापिस जर्मनी लौटने की कोशिश मे जुट गये। लेकिन उन दिनो पेरिस मे निर्वासितों के बीच क्रांतिकारी दस्ते कायम करने की एक ख़ब्त सी फैली हुई थी। स्पेनी, इतालवी, बेल्जियम, पोल और ज़र्मन सभी अपने देशों को आज़ाद कराने के लिये ग्रुपों में एकत्र हो रहे थे. हरवे,बोर्न्स्तेड और बर्नस्टीन के नेतृत्व में गठित जर्मन सैन्य दस्ते द्वारा इस काम को अंजाम देने की (जिसमें नई सरकार भी सहयोग की बात कर रही थी) योजना को क्रांति के साथ खिलवाड़ बताते हुये मार्क्स ने इसका पुरज़ोर विरोध किया। उनके अनुसार जर्मनी की तात्कालिक उथन पुथल के मध्य आक्रमण संगठित करने यानी बाहर से संगठित क्रांति का बलपूर्वक आयात करने का अर्थ खुद जर्मनी की क्रांति की जड़ें काटना, सरकारों के हाथ मज़बूत करना और इन सैनिकों को हाथ पैर बांध कर जर्मन फौज के हवाले करना था।

अप्रैल में मार्क्स जर्मनी लौट आये और क्रांतिकारी आन्दोलन में राजनीतिक बहसों द्वारा सक्रिय हस्तक्षेप के उद्देश्य से एक दैनिक समाचार पत्र नया राईन समाचारनिकालने की तैयारी करने लगे. चार साल पहले जब ‘राईन समाचार’ के पिछले संस्करण निकले थे तो इसे जर्मनी के हताश मध्यवर्ग का व्यापक समर्थन मिला था। लेकिन इस बार वे मार्क्स के दृष्टिकोण का समर्थन करने में उतनी रुचि नहीं दिखा रहे थे। मार्क्स का पूरा ज़ोर पुरानी व्यवस्थाओं क विनाश के बाद उभरी नई विधानसभा जैसी व्यवस्थाओं के आलोचनात्मक विश्लेषण पर था. इन दिनों पूरे जर्मनी में मज़दूरों के ग्रुप बनाए जा रहे थे, हालाँकि उनकी मांग या तो पूरी तरह तात्कालिक आर्थिक लाभों पर केन्द्रित थी या फिर विशुद्ध लोकतांत्रिक सुविधाओं पर. जून में अखबार का पहला अंक प्रकाशित हुआ तो मार्क्स और एंगेल्स ने इस कम्यूनिष्ट ताक़तों के संगठन के केन्द्रीय बिंदु के रुप में देखा।

कम्यूनिष्ट लीग का क्या हुआ ? मार्क्स और एंगेल्स दोनों ने महसूस किया कि यह इतनी  छोटी थी कि तत्कालीन परिस्थितियों में, जब हज़ारों लोग सड़कों पर आ रहे थे तो आंदोलन पर कोई व्यापक प्रभाव छोडने में सफल नहीं हो पा रही थी। मूलभूत बात तीव्र परिवर्तनो और उफान के समय आंदोलन का हिस्सा बनकर उसको प्रभावित करना था न कि कम्यूनिष्टों को इससे अलग या फिर इसके विरुद्ध खड़ा करना। मार्क्स की इस नवीन विश्वदृष्टि  के केन्द्र में यह विचार था कि चेतना में महान रुपांतरण अपने आप नही अपितु भौतिक परिवर्तनों के संदर्भ में ही आता है। नए विचार केवल उसी सीमा तक  स्वीकार तथा अंगीकार किए जायेंगे जितना वे आंदोलन के भीतर प्रतिबिंबित होगें. इस तर्क ने मार्क्स की एक दूसरे महत्वपूर्ण जर्मन समाजवादी गोथे से उग्र बहस को जन्म दिया। गोथे जर्मन मजदूरों में काफी लोकप्रिय थे लेकिन उनके विचार इस धारणा को मज़बूत करते थे कि ‘मजदूरो को व्यापक क्रांतिकारी आंदोलनों  से  दूर रहना चाहिये.’

सच्चाई यह है कि उन दिनों जर्मन मजदूर आंदोलन अपने विकास की उस मंजिल पर था जहाँ वह जनतांत्रिक अधिकार प्राप्त करने की लड़ाई लड़ रहा था. इसके विपरीत इंग्लैड में चार्टिस्ट आंदोलन का प्रभाव अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका था और मार्क्स एंगेल्स इसे निश्चित तौर पर यूरोपीय मज़दूर आंदोलन के अग्रिम दस्ते के रुप मे देखते थे. साथ ही वे इस बात से भी अवगत थे कि ‘उदार’ तत्वों के साथ संघर्ष में साझा हिस्सेदारी का अर्थ कभी भी उनके हाथ में आंदोलन का राजनैतिक नेतृत्व सौंप देना नही हो सकता।

‘नए राईन समाचार पत्र’ की पहली प्रतियाँ जब गलियों में आई तो यूरोप में एक बार फिर परिस्थितियाँ नए उच्चतर स्तर पर पहुँच रहीं थीं। फ्रांस में राजशाही को  अपदस्थ कर सत्ता में आई उदारवादी सरकार के जनतांत्रिक दावे खोखले साबित हो रहे थे. फरवरी क्रांति से प्राप्त अधिकार पर नव निर्वाचित राष्ट्रीय एसेंबली में प्रभावी दक्षिणपंथियों द्वारा कुठाराघात किया जा रहा था। ज़र्मनी में शहरी मजदूरों को न्यूनतम मज़दूरी की गारंटी देने वाली राष्ट्रीय कार्यशालाएं बंद कर दिये जाने से मज़दूर एक  बार फिर निराश्रित हो गए। इसके विरोध में लोग पेरिस की सड़कों पर उतर आए। इस बार वे बर्बर दमन का शिकार हुये। जब मार्क्स ने फ्रांस की कायर बुर्जुआजी की इस कारवाई का विरोध किया तो जर्मन प्रशासन ने इसे अपने ख़िलाफ़ भी समझा और उनके अखबार को समर्थन देना बंद कर दिया.

जुलाई में जर्मनी की अपेक्षाकृत उदार सरकार की जगह प्रतिक्रयावादी सरकार ने ले ली. मार्क्स और उनका अखबार उसकी दमनकारी नीति के पहले शिकार हुये और अगले महीने इसके प्रंबधन में एकाधिक बार बाधा पहुँचाई गई लेकिन वियना से बर्लिन तक लोकतांत्रिक अधिकारों पर गहराते जा रहे खतरों के बीच मार्क्स और उनका अखबार पूरी आक्रमकता के साथ मज़दूरों के अधिकारों का पुरज़ोर समर्थन करते रहे. उनकी रणनीति का सबसे प्रमुख उद्देश्य मज़दूरों के बीच अपने वैचारिक दृष्टिकोण का प्रभाव बढ़ाना था जिसे बाद में उन्होने “क्रांति की सततता” कहा. लेकिन साथ ही उन्होंने इस दौरान स्टीफन बोर्न की मज़दूर बिरादरी की पंचमेल वैचारिक खिचड़ी पर आधारित उस कार्यनीति का भी सक्रिय विरोध किया जिसके तहत हड़तालों, ट्रेड यूनियनों, उत्पादकों की सहकारी समितियों का आयोजन किया गया और यह भुला दिया कि सर्वोपरि प्रश्न राजनैतिक जीतों द्वारा वह भूमि विजित करने का है जिस पर चीजें टिकाऊ आधार पर प्राप्त की जा सकती हैं। मार्क्स और एंगेल्स इस आंदोलन की कमज़ोरियों को अच्छी तरह पहचानते थे. इसलिये उन्होने 1848 के उस समय को ‘क्रांतिकारी संयम’ का समय कहा।

वियना में आंदोलन का बर्बर दमन हुआ तो सड़कों पर आस्ट्रियाई मज़दूरों के समर्थन में विशाल जनांदोलन उमड़ पड़ा। अक्टूबर के अंत तक उसे भी  दबा दिया गया लेकिन बर्लिन तथा जर्मनी के दूसरे हिस्सों पर पूर्ण अधिकार करने में प्रतिक्रांतिकारियों को दो और महीने का समय लग गया और तब जाकर फ्रेडरिक चतुर्थ के हाथ में प्रशियाई सत्ता का पूर्ण अधिकार आ गया। इसके बाद के महीनों में मार्क्स और एंगेल्स ने ख़ासतौर पर अपने समाचार पत्र के जरिये जनतांत्रिक ताकतों को एक मंच पर लाने मज़दूरों और किसानों के बीच एकता कायम करने और सबसे महत्वपूर्ण तौर पर जर्मन आंदोलन को अंतराष्ट्रीय परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में समझने तथा व्याख्यायित करने का अथक परिश्रम किया।
जर्मनी के कई असफलताओं के बाबजूद यूरोप के दूसरे हिस्सों में जारी संघर्षों ने मार्क्स के मन में क्रांतिकारी संभावनाओं के प्रति आशा की दीप जलाये रखा और अब भी प्रतिरोध कर रहे बेडेन तथा फैंकफर्ट की अस्थाई प्रतिनिधि सभाओं का समर्थन करने के लिये प्रोत्साहित किया।

लेकिन 13 जून 1849 को रुसी जार द्वारा हंगरी की क्रांति के कुचल दिये जाने के साथ 1848 की क्रांति के महान युग का अंत हो गया। 16 मई को मार्क्स को कोलोन से निष्कासित करने का आदेश थमा दिया गया और अगले ही दिन वह पेरिस के लिये रवाना हो गए। इस बीच एंगेल्स बेडेन के विद्रोहियों के साथ संघर्ष में शामिल हो गए. जर्मनी छोडने से पहले नए राईन समाचार पत्र के अंतिम अंक में, जो पूरा लाल स्याही में निकाला गया था, उन्होंने लिखा ...
“हमें अपना दुर्ग छोडना पड़ रहा है. लेकिन हम अपने हथियारों और साज़-ओ- समान के साथ पीछे हट रहे हैं... युद्धक बैंडों और फहराते हुए झंडे के साथ...  हमारे अंतिम शब्द हमेशा और हर जगह बस एक ही होंगे.... ‘सर्वहारा वर्ग की मुक्ति’.”




[1] देखें, कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, पीपीएच , दिल्ली, 1986
[2] देखें, कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, पेज 34, पीपीएच , दिल्ली, 1986
[3] वही, पेज 39
[4] वही, पेज 40

सोमवार, 7 मई 2012

मार्क्स, बुद्ध और अनिल म्ह्माने

अनिल म्हमाने महाराष्ट्र की फुले-आम्बेडकरवादी-मार्क्सवादी परम्परा के पोएट-एक्टिविस्ट (एक्टिविस्ट-पोएट नहीं) हैं. वे जनवादी और प्रगतिशील साहित्य छापने वाला एक प्रकाशन निर्मिति संवादभी चलाते हैं.


27 अक्टूबर 2007 को नागपुर में बाबासाहब आम्बेडकर के स्मारक दीक्षा-भूमि पर अपनी किताबें बेचने जाते समय अजनी रेलवे स्टेशन पर पुलिस ने अनिल म्हमाने, बाबासाहब सायमोते, दिनकर काम्बले और बापू पाटिल को नक्सलवादीहोने के संदेह में गिरफ्तार कर लिया. उनके पास से बरामद पुस्तकों में एक भी प्रतिबंधित पुस्तक नहीं थी; बहुत सी किताबें डॉ. आम्बेडकर, महात्मा फुले, अन्ना भाऊ साठे, भगत सिंह की लिखी हुई थीं. मुक़दमा लगभग चार सालों तक चला और महाराष्ट्र में प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े तमाम लोगों ने इस उत्पीडन की केवल निंदा-भर्त्सना ही नहीं की, बल्कि मुक़दमा लड़ने के लिए हर तरह का सहयोग भी प्रदान किया. 30 जुलाई 2011 को नागपुर सत्र न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए चारों एक्टिविस्टों को निर्दोष मानते हुए बाइज़्ज़त बरी कर दिया.


इन चार सालों में छह महीने अनिल ने जेल में बिताये. कट्टर नक्सलवादीबताकर उन्हें जेल के आईसीयू में रखा गया था. उन छह महीनों में उन्होंने जो भुगता, जो अनुभव किया, वह लिखा- ऐसी छत्तीस कविताओं का संग्रह तुरुंगातील अस्वस्थ रात्रींच्या कविता’ (क़ैदखाने की बेचैन रातों की कविताएँ’) हाल ही में उनके अपने प्रकाशन से छपकर आया है. पाँच मई को कार्ल मार्क्स के जन्मदिन और छह मई को बुद्ध जयंती के अवसर पर पेश हैं अनिल के ज़िन्दांनामेसे दो कविताएँ. - भारत भूषण तिवारी

कार्ल मार्क्स

मार्क्स बाबा!
कहीं रह न जाए इसलिए लिख रहा हूँ
और तुम्हें छोड़ कर आगे जाया नहीं जाता इसलिए कह रहा हूँ
वैसे सभी मुझे मार्क्सवादी कहते हैं
मगर! सच कहूँ तो
मेरी समझ में तुम कभी आये ही नहीं

तुम्हारे दर्शन के ब्राम्हणीय विश्लेषक
तुम्हारे पूंजीवाद-विरोधी दर्शन को
मेरे भेजे में सीधे घुसने ही नहीं देते
तो फिर जाति के अन्त की बात छोड़ ही दो
तुम्हारे साम्यवादी घोषणापत्र की तो
इन्होने वाट ही लगा दी

तुमने भारत के बारे में कुछ तो लिखा
जो मुझ तक पहुँचा ही नहीं

मार्क्स बाबा! तुम भारत आते हुए
सीधे गाँव के बाहर की बस्ती में अगर आये होते
तो बाबासाहब के जिगरी दोस्त बन गए होते
मेरे बाबासाहब भी तुम जैसे ही सामर्थ्य वाले

तो बताओ?
भारतीय क्रान्ति होने में देर होती?

पर वैसा हुआ नहीं कहने की बजाय
होने नहीं दिया गया
तुम्हें खड़ा किया गया
बाबासाहब और बुद्ध के खिलाफ

आज तो बाबासाहब के कुछ अनुयायी
तुम्हारे खिलाफ खड़े हैं

पर मार्क्स बाबा!
ये स्वार्थपूर्ण दाँव-पेच
अब सभी की समझ में आ रहे है
इसलिए मैं बाबासाहब और तुम्हें देख रहा हूँ
समानता की नज़र से एक ही ऊँचाई पर पहुँचे हुए
तुम लोग दिखाई दे रहे हो
मुझे विचार-विनिमय करते हुए
विषय है
भारतीय क्रान्ति का!




गौतम!

गौतम तुम्हारे लिए एक सवाल?
तुम बुद्ध हुए मतलब वास्तव में क्या हुए?

तुम्हारे अनुयायी आवेगपूर्ण ढंग से से बताते हैं
कहते हैं तुमने बड़ी तपस्या की
विपश्यना करने से ही तुम्हें ज्ञान प्राप्ति हुई
तुम भौतिक जगत से पार के विश्व के
भविष्यवेत्ता थे

तुम्हें एक पीपल के पेड़ ने
ईश्वरीय शक्ति प्रदान की
तुमने क्रान्ति के लिए बस अहिंसा का ही मार्ग दिखाया
और तुम बुद्ध हो गए...

गौतम! यह सच है क्या?

तुम राजवैभव अस्वीकार कर रास्ते पर आये
इंसानों के दुख खत्म करने के लिए
अपनी सारी ज़िंदगी बिता दी
दुर्बलों को खड़ा करने के लिए
सारी ज़िंदगी रास्तों पर जीते रहे
रास्ते के क्रियाशील कार्यकर्ता के तौर पर
तुम खड़े रहे मानवी समता के पक्ष में

ब्राम्हणीय विषमतावादी व्यवस्था को नकार कर
लोकतंत्र के बारे में भी तुमने ही लिखा सर्वप्रथम
और धक्का दिया वैदिक यज्ञ संस्कृति को
तुमने नकारा दासप्रथा को
और खड़े रहे स्त्रियों के पक्ष में
उसे समाज में जीने का सम्मान देते हुए

तुमने बड़ी हिम्मत के साथ बताया
इस दुनिया में ईश्वर नहीं

तुम मनुष्य की स्वतंत्रता के बारे में बड़ी शिद्दत के साथ बोले
बंधुत्व भी तुम्हारे ही विचार का है एक तत्व
तुमने लिखा मानव मुक्ति के नए दर्शन पर
तुम्हारा कथन और व्यवहार एक सा था
बहुत अध्ययन किया तुमने
और तुम्हारे इंसानी मस्तिष्क की सीमाएँ फैलीं
तुमने मानवीय बुद्धि के विकास का शिखर अर्जित कर लिया
इसलिए मुझे लगता है कि
तुम बुद्ध हो गए!

मैं ठीक कह रहा हूँ न गौतम?

अध्ययन और प्रत्यक्ष जीवन का अनुभव
तुम्हें बुद्ध बना गया

मगर, कुछ अनुयायियों को यह मंज़ूर नहीं
भगवान बुद्ध कह कर
वे खड़ा करते हैं तुम्हें दैवीय अवतार के तौर पर
उनकी समझ में आता ही नहीं
तुम कौन थे और बुद्ध कैसे हुए?

तुम्हारा दर्शन कभी उनकी समझ में नहीं आया
पर गौतम मेरी समझ में आ गया है
इसलिए दृढ़ता से कह रहा हूँ
सारी दुनिया से
तुम कौन थे?

तुम बुद्ध कैसे हुए?



गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

मार्क्स और बाज़ार-गिरीश मिश्रा




(भले ही सोवियत संघ और उसका समाजवादी खेमा अब अस्तित्व में नहीं है फिर भी वैज्ञानिक समाजवाद के जनक कार्लमार्क्स की प्रासंगिकता कम नहीं हुई हैं।जाने-माने अर्थशास्त्री श्री गिरीश मिश्र का यह आलेख हमने जगदीश्वर चतुर्वेदी जी की फेसबुक वाल से लिया है )

 वस्तुत: अतिमंदी के वर्तमान दौर में जिन चार चिंतकों के प्रति झुकाव बढ़ा है उनमें कार्लमार्क्स प्रमुख हैं। तीन अन्य है : जॉन मेनार्ड केंस, उपन्यासकार ऐन रैंड और हीमान मिंस्की। वर्ष 2002 में न्यूयार्क से छपी जेर्री जेड मुल्लर की पुस्तक 'द माइंड एंड द मार्केट' में रेखांकित किया गया है कि एक राजनीतिक आन्दोलन के रूप में मार्क्सवाद के प्रति तत्काल आकर्षण कम हुआ लगता है मगर विश्लेषण के आधार और बाजार की समीक्षा के रूप में उसकी प्रासंगिकता बरकरार है। इस आकर्षण के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, मार्क्स द्वारा औद्योगिक मजदूर वर्ग की बढ़ती भौतिक विपन्नता का जोरदार तथ्यात्मक विवेचन और उसके पीछे बाजार की भूमिका को उजागर करना।

दूसरा बाजार में अन्तर्निहित प्रतिस्पर्धा को मानव संबंधों को पशु संबंधों के बराबर लाने के लिए जिम्मेदार ठहराना। बाजार द्वारा लोगों को हमेशा के लिए पेशा विशेष की जंजीर में जकड़ रखने के तथ्य को उजागर कर उसके अमानवीय स्वभाव को स्पष्ट करना।

मार्क्स का सामना पूंजीवाद बाजार से पहली बार हुआ जब वे 'राइनिशे साइतुंग' के संपादक थे। राइनलैंड के किसानों पर उस समय मुकदमा किया गया था कि उन्होंने जंगल से ईंधन के लिए लकड़ी इकट्ठी की जबकि जंगल सामंतों की निजी संपत्ति थी। जांच के बाद मार्क्स ने पाया कि जंगल से जलावन के लिए किसानों द्वारा लकड़ी लेना नया नहीं था।

किसान ऐसा करना अपना परंपरागत अधिकार मानते थे। सामंतों द्वारा उनको इस प्रचलित रिवाज से वंचित करने की कोशिश उनके द्वारा पूंजीवादी दृष्टिकोण अपनाने का परिणाम था। किसानों के साथ उनका पुराना संबंध खत्म हो गया था और उनके ऊपर निजी संपत्ति और मुनाफे का भूत हावी हो चुका था। इस कारण चोरी की परिभाषा भी बदल गई थी।

उधर इंग्लैण्ड में रहते हुए फ्रेडरिक एंगेल्स ने महसूस किया कि बाजार अब पारस्परिकता के सिध्दांत पर आधारित नहीं रह गया है। उस पर लालच सवार हो गया है। यही लालच एडम स्मिथ ने 'स्वहित' के बतौर पेश किया था। एंगेल्स का निष्कर्ष था कि पूंजीवाद प्रतिस्पर्धा पर आधारित होने के कारण आदमी को आदमी से भिड़ाता है। इस तरह सब परस्पर युध्दरत हैं। लोग भुक्खड़ जानवर की तरह एक दूसरे को निगलने के लिए तत्पर हैं। बाजार में व्याप्त अनिश्चितता ने लोगों को सट्टेबाज बना दिया है। मार्क्स पर एंगेल्स के इस विश्लेषण का गहरा असर पड़ा जो उनकी कृतियों को पढ़ने से स्पष्ट है। वर्ष 1844-45 मार्क्स और एंगेल्स ने अपने विचारों को स्पष्ट और सुव्यवस्थित करने में व्यतीत किया। उन्होंने कई खंडन-मंडन वाली पुस्तकें लिखीं। उन सब का प्रकाशन तुरंत न हो सका। जिस पुस्तक का उनके विचारों के सार संग्रह बतौर प्रकाशन हुआ और जिसने यूरोप में तहलका मचा दिया वह थी 'कम्युनिस्ट में निफेस्टो' या 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र'।

इसमें उन्होंने उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का वर्णन किया है जिसने बाजार को जन्म दिया। उन्होंने यह तथ्य उजागर किया कि व्यक्तिगत स्वहित पर आधारित बाजार ने पहले की सारी पहचानों को धराशायी कर दिया है जो पुश्तैनी हैसियत, राष्ट्रीयता, धर्म आदि पर आधारित थीं। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य श्रमशक्ति धारक माल यानि क्रय-विक्रय की वस्तु में बदल गए और उनका मानवीय पहलू लुप्त-सा हो गया। उनकी नई कानूनी स्वतंत्रता ऐसा आवरण बन गई जिसने बाजार में माल के रूप में बनी उनकी असली हैसियत को ढंकने का काम किया। वस्तुत: तत्कालीन नई परिस्थितियों में उसने उन्हें नए प्रकार का गुलाम बना दिया। जिनका अपने समय और शरीर पर पहले की अपेक्षा काफी कम नियंत्रण रह गया।
इसके बावजूद मार्क्स ने बाजार द्वारा परम्परागत पहचानों को मिटाए जाने को एक सकारात्मक घटना बतलाई। उसने धार्मिक धारणाओं और रीति-रिवाजों द्वारा युगों से ओढ़ाई गई भ्रांति की चादर को उतार फेंका। जिससे वे अपनी असली पहचान को देख पाने में सक्षम हो गए। उनमें से अधिकतर यह जान पाए कि वे शोषित-उत्पीड़ित मजदूर या सर्वहारा वर्ग के सदस्य हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि पूंजीवाद द्वारा लाई गई संपदा और प्रौद्योगिकी मानव समाज की वास्तविक मुक्ति को संभव बनाएगी और लोग प्रकृति एवं अभाव के बंधनों से स्वतंत्र हो पाएंगे।

मार्क्स का कहना था कि बाजार से सबसे अधिक फायदा पूंजीपति वर्ग को होता है जो आरंभ में क्रांतिकारी भूमिका अदा करता है और निंरतर रूपांतरण की प्रक्रिया को आरंभ करता है। जिसके दूरगामी परिणाम हैं और जिससे कोई भी अछूता नहीं रह पाता। उत्पादन के साधन लगातार बदलते हैं जिनसे न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी भारी परिवर्तन होते हैं। मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा: अमेरिका की खोज और उत्तमाशा अंतरीय का रास्ता निकाल लेने से उदीयमान पूंजीपति वर्ग के प्रसार के लिए नया क्षेत्र खुल गया। ईस्टइंडीज और चीनी बाजारों, अमेरिका के उपनिवेशीकरण, उपनिवेशों के साथ व्यापार, विनियम के साधनों और माल उत्पादन में आम वृध्दि ने वाणिज्य, नौ परिवहन और उद्योग को, और फलस्वरूप लड़खड़ाते हुए सामंती समाज के क्रांतिकारी तत्वों को तेजी के साथ विकास करने का अभूतपूर्व अवसर दिया।

उद्योग की सामंती प्रणाली, जिसमें औद्योगिक उत्पादन पर बंद दरवाजों वाले शिल्प संघों का एकाधिकार होता था, नए बाजारों की बढ़ती हुई जरूरतों की पूर्ति के लिए अब काफी न थी। अत: उसकी जगह विनिर्माण ने ले ली। शिल्प संघ के उस्ताद कारीगरों को विनिर्माता मध्यम वर्ग ने ढकेलकर एक ओर कर दिया। अलग-अलग निगमित शिल्पसंघों का श्रम-विभाजन प्रत्येक पृथक-पृथक वर्कशाप के श्रम विभाजन के आगे लुप्त हो गया। इस बीच बाजार बराबर बढ़ते गए और माल की मांग भी निंरतर बढ़ती गई।  तब भाप और मशीन के उपयोग ने औद्योगिक उत्पादन में क्रांति पैदा कर दी। अत: मैन्युफैक्चर का स्थान दैत्याकार आधुनिक उद्योग ने और मध्यम वर्ग का स्थान औद्योगिक धन्नासेठों ने, पूरी की पूरी औद्योगिक फौजों के नेताओं ने, आधुनिक पूंजीपतियों ने ले लिया। आधुनिक उद्योग ने विश्व बाजार की स्थापना की है, जिसके लिए अमेरिका की खोज ने पथ प्रशस्त कर दिया था। इस बाजार ने वाणिज्य, नौपरिवहन और थल संचार की जबर्दस्त उन्नति की। आगे चलकर इस उन्नति का प्रभाव उद्योग के विस्तार पर पड़ा, और जिस अनुपात में उद्योग, वाणिज्य, नौपरिवहन और रेल्वे में वृध्दि हुई, उसी अनुपात में पूंजीपति वर्ग ने उन्नति की और उसकी पूंजी बढ़ी; और उसने मध्य युग से चले आते हुए प्रत्येक वर्ग को पृष्ठभूमि में ढकेल दिया। पूंजीवादी बाजार के आगे बढ़ने के साथ ही पुराने सामंती संबंध धराशायी हो गए। उसने मनुष्य को अपने स्वाभाविक बड़ों के साथ बांध रखने वाले नाना प्रकार के सामंती संबंधों को निर्ममता से तोड़ डाला, और नग्न स्वार्थ के 'नकद पैसे-कौडी' क़े हृदय शून्य व्यवहार के सिवाय मनुष्यों के बीच और कोई दूसरा संबंध बाकी रहने नहीं दिया। धार्मिक श्रध्दा के स्वर्गोपम आनंदातिरेक को, वीरोचित उत्साह और कूपमंडूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब के बर्फीले पानी में डुबो दिया है। मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय मूल्य बना दिया है, और पहले के अनगिनत अनपहरणीय अधिकार पत्र द्वारा प्रदत्त स्वातंत्र्यों की जगह अब उसने एक ऐसे अंत:करण शून्य स्वातंत्र्य की स्थापना की है जिसे मुक्त व्यापार कहते हैं। संक्षेप में, धार्मिक और राजनीतिक भ्रमजाल के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न, निर्ला, प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की है।' जिन पेशों के संबंध में अब तक लोगों के मन में आदर और श्रध्दा की भावना थी, उन सब का प्रभामंडल पूंजीपति वर्ग ने छीन लिया। डॉक्टर, वकील, पुरोहित, कवि और वैज्ञानिक सभी को उसने अपना उजरती मजदूर बना लिया है। पूंजीपति वर्ग ने पारिवारिक संबंधों के ऊपर से भावुकता का पर्दा उतार फेंका है और पारिवारिक संबंध को केवल द्रव्य के संबंध में बदल डाला है। पूंजीवाद ने अपने बढ़ते माल उत्पादन के लिए बाजार की खोज में सारी दुनिया की खाक छानी। नवोदित उद्योगों के लिए कच्चे मालों की तलाश में दूरदराज गया। कालक्रम में तैयार और कच्चे माल के बढ़ते बाजार ने राष्ट्रीय एकांगीपन और संकुचित दृष्टिकोण को खत्म करना आरंभ किया। जिसका एक परिणाम हुआ साहित्य का उदय। पूंजीवादी उत्पादन का पैमाना बढ़ने से मालों का मूल्य घटा। 

बाजार में टिके रहने की मजबूती उत्पादन के उपकरणों और प्रौद्योगिकी को निरंतर बेहतर बनाने के लए प्रेरित करती है।  इस प्रकार पिछली व्यवस्थाओं की तुलना में पूंजीवाद निरंतर गतिशील मगर अस्थिर होता है। पुरानी मान्यताएं, विचार, पूर्वग्रह और मूल्य निरंतर तेजी से धराशायी होते जाते हैं। 'उत्पादन में निरंतर क्रांतिकारी परिवर्तन, सभी सामाजिक अवस्थाओं में लगातार उथल-पुथल, शाश्वत अनिश्चितता और हलचल ये चीजें पूंजीवादी युग को पहले के सभी युगों से अलग करती हैं। सभी स्थिर और जड़ीभूत संबंध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रृंखला जुड़ी हुई होती है, मिटा दिए जाते हैं, और सभी नए बनने वाले संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं। जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन की वास्तविक हालतों को मानव-मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।


बाजार में पूंजीपतियों के ऊपर भारी दबाव होता है जिससे वे श्रमिकों से अधिकाधिक अधिशेष मूल्य उगाहने की हर कोशिश करते हैं। इसके लिए कार्य दिवस को यथासंभव बढ़ाने की कोशिश होती है। इस दृष्टि से अभिनवीकरण द्वारा ऐसी मशीनों, उपकरणों और प्रौद्योगिकी को काम में लाया जाता है जिससे कम समय में यथासंभव अधिशेष मूल्य के सृजन के लिए दबाव हो। कहना न होगा कि बाजार जहां एक ओर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देता है वहीं मेहनतकशों को अपनी ताकत पहचानकर संगठित होने के लिए प्रेरित करता है।