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मंगलवार, 19 जुलाई 2011

हम भारतीय भाषा परिषद के संघर्षरत कर्मचारियों का समर्थन करते हैं

भारतीय भाषा परिषद ,कोलकाता मे कर्मचारियों की वेतन बढोत्तरी को लेकर हड्ताल चल रही है. हम उसका समर्थन करते हैं. हमारा मानना है कि कर्मचारियों को उचित वेतन मिलना ही चाहिए. इस मुद्दे पर कवि नीलकमल का लेख उनके फेसबुक नोट्स से साभार

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता में काम करने वाले कर्मचारी हमारे अपने लोग ही हैं । आज वे अपनी आर्थिक मांगों को लेकर धरना और प्रदर्शन कर रहे हैं । लेखक बिरादरी की तरफ़ से इस धरने के प्रति समर्थन जताने की बेचैनी और तत्परता प्रशंसनीय है । इन कर्मचारी बन्धुओं में कुछ तो मेरे अति प्रिय और करीब के लोग भी हैं । इनका आर्थिक शोषण किसी भी प्रकार से जायज नहीं ठहराया जा सकता । मेरी संवेदना और नैतिक समर्थन इस आन्दोलन के प्रति है । लेकिन इस आन्दोलन से कुछ सवाल भी पैदा होते है जिन्हें नजर-अन्दाज नहीं किया जाना चाहिए । 

कवि एकान्त श्रीवास्तव जो परिषद की मासिक पत्रिका वागर्थ के सम्पादक भी हैं , को अकेले में घेर कर उनके खिलाफ़ नारेबाजी की गई , उन्हें मैनेजमेन्ट का आदमी कह कर उन्हें बिना पूर्व सूचना के अपदस्थ किया गया जिसके लिए कर्मचारियों को बाद में अधिकारिक रूप से दुख भी प्रकट करना पड़ा । यह किसी भी प्रकार से समर्थन योग्य नहीं है । हिन्दी के एक प्रतिष्ठित कवि पर निशाना साध कर हमारे ये साथी क्या संकेत देना चाहते हैं ? वे चाहते तो एकान्त श्रीवास्तव को विश्वास में लेकर अपने आन्दोलन को और ज्यादा व्यापक बना सकते थे । 

हम सभी जानते हैं कि हमारे ये साथी कर्मचारी दो से पांच हजार वेतन पर काम करते हैं । परिषद का सबसे पुराना कर्मचारी जो पिछले पच्चीस तीस वर्षों से वहां काम करता है वह भी अधिकतम पांच हजार ही पाता है । यह प्रवंचना लम्बे समय से चल रही है । राज्य में सत्ता परिवर्तन के साथ यह आन्दोलन जोर पकड़ने लगा । क्या यह संयोग ही है या इसके दूसरे कारण भी है ? लेखकों का काफ़ी समर्थन इस धरने को मिला है जिसमें कुछ स्टार लेखक भी हैं । दिल्ली , बंगलौर और भोपाल में बैठे साथी फ़ेसबुक पर अपनी व्यथा जता रहे हैं । कोलकता के साथी भी समव्यथी हैं । होना भी चहिए । लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या हम अपनी मोटी तनख्वाहों से कुछ भी त्याग कर इन कर्मचारी साथियों की सहायता करने के लिए तैयार है ? एक समिति बना कर भी यह काम किया जा सकता है । कुछ लोगों को इस बात का दुख ज्यादा है कि वागर्थ बन्द हो जाएगा । साहित्य का नुकसान होगा । ऐसा लगता है कि आन्दोलन पर बैठे साथियों  के प्रति संवेदना की जगह वागर्थ के बन्द हो जाने का दुख घेरता जा रहा है । मुझे विश्वास है कि आपसी बात चीत से रास्ता जरूर निकलेगा । मै तो कहूंगा कि वागर्थ को बन्द कर के भी यदि कर्मचारियों को आर्थिक लाभ दिया जा सकता है तो ऐसा ही किया जाना चाहिए । आखिर रोटी का सवाल साहित्य से बड़ा है

रविवार, 25 अप्रैल 2010

तू ज़िंदा है तो ज़िन्दगी की जीत पर यक़ीन कर

आष्ट्रेलिया में काम के घंटे आठ किये जाने के लिये 1886 में लगाया गया पोस्टर

( (युवा संवाद के प्रदेश संयोजक प्रदीप की मई दिवस पर लेखमाला का तीसरा और अंतिम अंश)

ऐसा नहीं है कि आज पूंजी के निजाम के खिलाफ दुनिया में मजदूर प्रतिरोध नहीं कर रहे है। लेकिन इस दौरान पूंजी के आंतरिक और बाह्य चरित्र में काफी परिवर्तन आये हैं। आज के पूंजीवाद की वयाख्या 19 वी सदी के औद्योगिक पूंजीवाद को ध्यान में रखकर नही की जा सकती । पूंजीवाद के अधीन उत्पादन शक्तियों के विकास ने नए-नए सेक्टर पैदा किए है। उसने अपना आंतरिक पुर्नगठन किया है। उदाहरण के लिए दुनिया के सभी पूंजीवादी देशों में सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण व बड़ा हिस्सा है। पूंजीवाद की आंतरिक पुर्नगठन की इस प्रक्रिया ने इसके अंदर आने वाली मंदी की तीव्रता को कम करने में मदद पहुॅचायी है। मार्क्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टों में पूंजीवाद की जिस विश्व-व्यापकता की बात कहीं थी, आज वो साकार हो रही है। अपने इतिहास के दौर में आज पंूजीवाद उत्पादन प्रणाली एवं राजनीति व्यवस्था के रूप में एक वैश्विक हकीकत बना है और लगातार बन रहा है। पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में आए इन परिवर्तनों ने मजदूर वर्ग के स्वरूप को भी बदल दिया है।

यदि हम आज भी मजदूर वर्ग को सिर्फ़ 19वी सदी के औद्योगिक सर्वहारा के रूप में देखना चाहते है तो हमें निराशा ही हाथ लगेगी। आज जब परिवर्तकामी लोगों में मजदूर तबके के बीच काम करने का सवाल आता है तो सबसे पहले यहीं बात सामने आती है कि हमें शहर की झुग्गी-बस्ती में रहने वाले गरीब मजदूरों के बीच काम करना चाहिए या औद्योगिक क्षेत्र की गरीब मजदूर बस्तियों में। मैं यह नहीं कह रहा हूॅ कि गरीब मजदूर वर्ग के तबकों को संगठित करना और उनके मुद्दों पर काम करना जरूरी नहीं है। लेकिन मेरा सवाल यह है कि आखिरा हमारे जहन में मजदूर वर्ग की यही एकमात्र छवि क्यों बनती है? क्या इसका कारण मजदूर वर्ग की पुराने दौर की राजनीतिक समझ में तो नहीं है? इस बात पर गौर किया जाना चाहिए। हमें पूंजीवाद के अंदर आए बदलावों और उससे पैदा हुआ श्रम-विभाजन के कारण मजदूर वर्ग के स्वरूप में आये बदलावों व उसके लिए जिम्मेदार कारकों पर भी गौर करना चाहिए।

आज मजदूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अपने को मजदूर ही नहीं समझता। ये वहीं मजदूर वर्ग का हिस्सा है जिसे हम आज मध्यम वर्ग के रूप में देखते है जो अपने आप को एग्जीक्यूटिव, इंजीनियर, टेकनीशियन आदि के रूप में देखता है न कि मजदूर वर्ग के सदस्य के रूप में। अपने आप को मजदूर न समझने वाला मजदूरों का यह तबका भी मुख्यतः अपने श्रम के बाजार में बिक्री पर निर्भर करता है। ये लोग कम्पनीयों के थोडे़-बहुत शेयर भी लिए रहते है या कोई कम्पनी अपने इन कर्मचारियों में शेयर का एक छोटा सा हिस्सा दे देती है। ऐसी परिस्थिति में इनकों मजदूरों द्वारा पैदा किए गए अधिशेष में एक छोटा टुकड़ा लाभांश के रूप में मिल जाता है लेकिन वे इसके बारे में चिंता नहीं करते कि वे अपने श्रम से मिलने वाले पारिश्रमिक की तुलना में कई गुना अधिशेष पैदा कर रहे हैं और जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। पिछलें दिनों जब मंदी का असर अर्थव्यस्था पर पड़ा और उसी समय कुछ कम्पनियों के शेयर के दाम भी नीचे गिरे तो मेंरे एक मित्र जोकि एक प्रतिष्ठित कम्पनी में एग्जीक्यूटिव है वह अपनी नौकरी से ज्यादा वह उस कम्पनी के शेयरों के दाम गिरने से ज्यादा परेशान था जिसके चंद शेयर उसने भी खरीदे हुए थे। ये मजदूर यह भूल जाते हैं कि मजदूर वर्ग ही सारी संपदा पैदा करते है लेकिन यह सारी संपदा उनके हाथ में पहूंच जाती है जो पूंजी कि नियमों के मुताबिक उसके ‘मालिक’ होते है।

अपनी संपदा की बढोत्तरी के लिए पूंजीवाद मेहनतकशों के एक तबके की क्षमताओं में लगातार वृद्धि करता है व उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन पूंजीवाद मजदूर वर्ग के बहुत बड़े हिस्से को अमानवीय विपन्नता और स्थायी असुरक्षा के हालात में बनाए रखता है। जिन्हें काम मिल जाता है उन्हे चंद पैसों के लिए दिन-रात पसीना बहाना पड़ता है क्योकि उनके अलावा बहुत सारे लोग ऐसे भी है जिन्हें काम नहीं मिला है और वे इनसे से भी कम पैसों पर काम करने के लिए तैयार है। इस प्रकार पूंजीवाद मजदूरों को एक-दूसरे के ही खिलाफ खड़ा कर देता है। जो मुट्ठी भर लोग किसी प्रकार का हुनर हासिल कर लेते है और अच्छी नौकरियां पा लेते हैं, अच्छी तनख्वाह पाने लगते हैं और खुद को मजदूर नहीं मानते वे पूंजी के इस बेरहम तर्क से अछुते नहीं रह पाते। उन्हें भी अपनी हैसियत और पद बनाए रखने के लिए लगातार और ज्यादा, और कठोर परिश्रम करते रहना पड़ता है।

पूंजी और श्रम के बीच के इस अंतर्विरोध को यह व्यवस्था समाप्त नहीं कर सकती। जिस पूंजीवाद ने पूंजीपति वर्ग को पैदा किया है उसी ने मजदूर वर्ग को भी जन्म दिया है। आज मजदूर वर्ग व पूरी मानवता पर जिस अमानवीयता को पूंजीवाद ने थोप रखा है वह इसके लिए किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकता। पूंजी की अपने मुनाफे तथा उसे लगातार बढ़ाते जाने के लिए प्रकृति के निमर्म दोहन के तर्क के कारण आज पृथ्वी के अस्तित्व पर ही खतरें मडराने लगे हैं। पूंजीवाद पहले पर्यावरण को बर्बाद करके मुनाफा कमाता है और फिर पर्यावरण सुधाराने के नाम पर भी मुनाफा बनाता है। इसलिए आज मजदूर वर्ग पर मानवता को पूंजी के शोषण से बचाने के एतिहासिक कार्यभार के साथ-साथ उस प्रकृति को बचाने का जिम्मा भी है जिसका मानवता एक अभिन्न हिस्सा है।

अब दुनिया के पैमाने पर इतिहास में पहली बार मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश तबकों के सामने पूंजीवाद से लड़ने की सीधी चुनौती सामने है। भविष्य में जब भी इंकलाब होगें वे सीधे पूंजीवाद की परिस्थितियों में पूंजीवाद के खिलाफ सम्पन्न होगें और इसके लिए उचित रणनीति बनाने एवं समाजवाद के अगले दौर की रूपरेखा पेश करने का कार्यभार मजदूर वर्ग व उसके अगुवाओं की आज सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। इस बार वे समाजवाद के निर्माण के लिए अपने वर्ग के तमाम तबकों को साथ लाने के लिए तैयार होंगे। इस बार समाजवाद जनतंत्र, समानता और आजादी का तथा उत्पादकता, सृजनात्मकता और समृद्धि का प्रेरक माॅडल होगा। मजदूर वर्ग इतिहास से सबक लेते हुए पंूजीवाद को विष्व ऐतिहासिक मुकम्मल शिकस्त देने के लिए फिर उठ खड़ा होगा। मजदूर दुनिया का सृजन करते हैं, परंतू दुनिया उनके हाथों में नहीं है। वे स्वर्ग का निर्माण करते हैं, लेकिन स्वर्ग से बाहर धकेल दिए जाते है। जिंदा रहने के लिए मजदूरी और वेतनों पर आश्रित ये मजदूर अभी भी पूंजीवाद के ‘‘उजरती गुलाम’’ है। अपनी जीवन परिस्थितियों में आये तमाम बदलावों के बावजूद आज भी दुनिया के मजदूरों के पास खोने के लिए कुछ नहीं है; आज भी उनके सामने जीतने के लिए एक सारी दुनिया पड़ी है।

शनिवार, 27 मार्च 2010

किस युग में रह रहे हैं हम

समाज में ऐसे विचारों के लिए जगह क्यों है ?

  • अंजलि सिन्हा


खाप पंचायतें लोगों के निजी जीवन को निर्देशित करने के लिए पंचायत और महापंचायत करती हैं और सार्वजनिक रूप से कत्ल का फरमान सुनाती हैं। सोचने का मुद्दा यह है कि ऐसा कर पाने में वे सफल क्यों हो रही हैं ? इन ताकतों और विचारों पर प्रश्न खड़ा करने का वातावरण तैयार करने के बजाय स्थानीय लोग इसे मजबूती प्रदान करने में क्यों लगे हैं ? देखने में आया है कि हजारों की संख्या में एकत्रा होकर दिनभर और कई दिन की मीटिंग करते हैं और फिर फैसला लेेते हैं कि अन्तरजातीय या सगोत्रा विवाह करने पर जान गंवानी पड़ेगी। इतनाही नहीं वे अब अपने फरमानों को लागू करवाने के लिए कानूनी वैधता हासिल करने का भी प्रयास कर रहे हैं। पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आयोजित एक ऐसे ही महापंचायत में घोषणा की गयी है कि वे हाईकोर्ट में अपील दायर करेंगे कि ‘‘हिन्दू विवाह अधिनियम 1956’’ में संशोधन करके सगोत्रा विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया जाए। इन पंचायतों को अपने निरंकुश आदेश को लागू करवाने में किसी कानूनी अड़चन का सामना न करना पड़े इसके लिए वे खाप पंचायतों को कानूनी वैधता के लिए प्रयास कर रहे हैं।

पिछले 13 सितम्बर को शामली में उत्तर भारत के कई राज्यों के विभिन्न खापों के प्रमुखों ने एकत्रा होकर महापंचायत की। इसमें दो अलग अलग खापों के मुखिया हरिकिशन सिंह तथा महेन्द्र सिंह टिकैत ने सुर मिलातेे हुए सगोत्र विवाह करने वाले युगलों के लिए कत्ल का फरमान जारी किया। क्या ऐसे सार्वजनिक बयानों पर हत्या के लिए उकसानेवाली धारायें लगा कर कानूनी कार्रवाई नहीं किया जाना चाहिए ? विभिन्न न्यायालयों ने इन जनविरोधी कार्रवाइयों के खिलाफ फैसला भी दिया है जैसे कि जिन्द जिले के वेदपाल मोर को पंजाब एवम हरियाणा हाईकोर्ट ने सोनिया के साथ उसके विवाह को वैध ठहराते हुए अपनी पत्नी को गांव से लाने का आदेश दिया था। लेकिन कोर्ट के निर्णय को ठेंगा दिखाते हुए गांववालों ने वेदपाल को पीट पीट कर मार डाला जब वह पुलिस को साथ लेकर वहां पहुंचा। जिन युगलों या परिवारों को ये पंचायतें गांव से निकाल देती हैं और कोर्ट उन्हें वापस गांव जाने का हक देता है तथा पंचायतों के व्यवहार के खिलाफ उन पर कार्रवाई के भी आदेश देता है लेकिन गांव में पुरूषप्रधान तथा दबंगई के वातावरण में सबकुछ निष्प्रभावी हो जाता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि न्याय के पक्षधर तथा जनतांत्रिक आवाजें गांव के अन्दर एकजुट नहीं हो पायी हैं। 8 जुलाई 2006 को भी एक मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ‘‘अक्सर अपनी मर्जी से अन्तरजातीय या अन्तरधर्मीय शादी करनेवालों को मार डालने की ख़बरंे आती हैं। दरअसल यह क्रूर और सामन्ती दिमाग के लोगों द्वारा किया गया ऐसा जघन्य कृत्य है जिसके लिए कठोर दण्ड मिलना चाहिए। ’’ गृहमंत्राी पी चिदम्बरम ने भी अपनी टिप्पणी में कहा कि बिरादरी के नाम पर की जानेवाली हत्याओं को भारतीय कानून में अलग से परिभाषित नहीं किया गया है इसीलिए क्राइम रेकार्ड ब्युरो के आंकड़ों में भी इन हत्याओं को अलग से पहचाना नहीं जाता है और इन्हें पारिवारिक मामला बता कर दबा दिया जाता है।’’ कोर्ट और सरकार की ये प्रतिक्रियाएं सुन कर ऐसा प्रतीत होता है कि इतना बड़ा तंत्र जिसने अपने नागरिकों को न्याय दिलाने तथा सुरक्षा मुहैया कराने की कसमें खायी हैं वह निरीह हो गया है। वह पड़ोसी देशों को अपने हद में रहने के लिए दहाड़ें मारता है और आतंकवादी मंसूबों को धूल में मिला देने का हौसला और ताकत रखने की बात करता है, फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम देने में भी वह सोचता नहीं है तथा अपने हकों के लिए आन्दोलन करनेवालों के खिलाफ अपनी ताकत और संसाधन झोंक देने में भी संकोच नहीं करता है।

इतनी सारी ताकत रखने के बावजूद आखिर क्या वजह है कि वह खाप पंचायतों की जनविरोधी भूमिका तथा अमानवीय क्रूर गतिविधियों पर अंकुश लगाने में असमर्थ दिखता है ! वह यह संकेत नहीं दे पा रहा है कि इस लोकतांत्रिक देश को तालिबानी रंग में नहीं रंग सकते हैं। उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करनी होगी।

मेरे खयाल से जिस तरह हमारे समाज के एक मुखर हिस्से में ऐसी ताकतों या उनकी हरकतों की स्वीकार्यता है, जो उन्हें शेष समाज पर भी अपना दबदबा कायम रखने में सहूलियत प्रदान करती है उसी तरह यह भी देखा जा सकता है कि इन सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों के लिए भी इन खाप पंचायतों के जरिये अपना आधार या दबदबा बनाये रखना आसान जान पड़ता है। हरियाणा में इन दिनों सत्तासीन कांग्रेस पार्टी की चुनावी जीत में खाप पंचायतों की भूमिका को विश्लेषकों ने रेखांकित किया था, जिन दिनों जिन्द या झज्जर में खाप पंचायतों की निरंकुश कार्रवाइयों को लेकर विरोध तीव्र हो रहा था, उन दिनों कांग्रेस के युवा सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने इन्हें ‘सामाजिक परिघटना या सामाजिक परम्परा का हिस्सा’ कह कर मामले को हल्का करने की कोशिश की थी।

सगोत्र विवाह करनेवालों के खिलाफ मौत का फरमान जारी करनेवाले टिकैत जो किसानों के हकों के लिए सरकारो ंसे लड़ते रहते हैं वे नहीं चाहते कि बेटियों को अपनी पिता की सम्पत्ति में बराबर का हक मिले या युवा पीढ़ी अपनी मर्जी से अपने जीवनसाथी का चुनाव करे।

जरूरत है कि ऐसी ताकतों और फरमानों के खिलाफ कानूनी सख्ती के साथ साथ आम स्थानीय लोग भी कमर कसें तथा देश भर की न्यायप्रिय तथा प्रगतिशील ताकतें भी इसमें मदद के लिए आगे आएं।


(अंजलि सिन्हा, ‘स्त्री अधिकार संगठन’ से सम्बद्ध हैं एवम दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती काॅलेज (सांन्ध्य) में कौन्सिलर के पद पर कार्यरत हैं , यह आलेख युवा दख़ल के ताज़े अंक में प्रकाशित)

मंगलवार, 23 मार्च 2010

शहीदों की चिताओं पर…

शहीद भगत सिंह
(27 सितंबर 1907- 23 मार्च 1931)

अवतार सिंह पाश
(9 सितंबर 1950 से 23 मार्च 1988)




भगत सिंह ने कहा…

बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन हो सकते हैं…। विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता। यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का परिणाम क्रांति हो। क्रांति शब्द का अर्थ प्रगति के लिये परिवर्तन की भावना एव आकांक्षा है। यह ज़रूरी है कि पुरानी व्यवस्था हमेशा न रहे और वह एक नई व्यवस्था के लिये जगह ख़ाली करती रहे, जिससे कि एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके।
'इंक़लाब ज़िन्दाबाद क्या है' से
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धर्म का रास्ता अकर्मण्यता का रास्ता है, सब कुछ भगवान के सहारे छोड़कर भगवान के सहारे हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाने का रास्ता है। वह कभी मेरा रास्ता नहीं बन सकता। जो लोग इस जगत को मिथ्या समझते हैं, वे कभी दुनिया की भलाई और इस देश की आज़ादी के लिये ईमानदारी से नहीं लड़ सकते। धर्म का रास्ता श्रमजीवी जनता के शोषण का हिंसक रास्ता है
1928 में अवैद्यनाथ घोष से बहस में
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अवतार सिंह पाश की कविता


घास

मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा
बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर
बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर
मुझे क्‍या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊंगा
बंगे को ढेर कर दो
संगरूर मिटा डालो
धूल में मिला दो लुधियाना ज़िला
मेरी हरियाली अपना काम करेगी...
दो साल... दस साल बाद
सवारियाँ फिर किसी कंडक्‍टर से पूछेंगी
यह कौन-सी जगह है
मुझे बरनाला उतार देना
जहाँ हरे घास का जंगल है
मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूंगा
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा
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शहीदी दिवस पर जनपक्ष परिवार की ओर से राजगुरु,सुखदेव, भगत सिंह और पाश को सलाम तथा आप सबका क्रांतिकारी अभिनंदन!

बुधवार, 17 मार्च 2010

शलाका को तमाचे के लिये आभार!


केदार जी…सच मानिये इस एक पुरस्कार को लौटा के आपने हमें वह ख़ुशी दी है जो सारे संकलनों को कई-कई बार पढ़कर नहीं मिलती। पहले पुरुषोत्तम अग्रवाल ने जब इस पुरस्कार को न लेने की घोषणा की तो ग्वालियर का रहवासी होने पर फ़क्र हो आया था…अब आपके निर्णय के बाद मूलतः पूरबिहा होने पर भी फ़क्र हो रहा है। विमल कुमार , प्रियदर्शन,रेखा जैन, पंकज सिंह, गगन गिल सहित सात साहित्यकारों के भी यही निर्णय ले लेने पर साहित्य-संस्कृति ग्राम के (नान रजिस्टर्ड सही) नागरिक होने के नाते सर ऊंचा हो गया।

सच कहुं तो कृष्ण बलदेव बैद कभी मेरे प्रिय लेखक नहीं रहे। परंतु उनकी अपनी एक शैली है, एक विशिष्ट भाषा और अपनी एक सबलाईम स्टाईल। चीज़ों को देखने का उनका नज़रिया क्रांतिकारी भले न हो लेकिन आधुनिक तो है ही।

अब यह एक विडंबना ही है कि उन्हें परखने का काम एक घोषित भांड को दिया गया है अब अश्लील चुटकुलों पर ठहाका लगाने वाले और अंग्रेज़ीदां राजनैतिक 'विद्वान' ( जिनके कहे हिंद स्वराज गांधी ने नहीं हाथरसी भांड ने लिखी थी) करेंगे तो उन्हें वह अश्लील और दोयम दर्ज़े के लगेंगे ही। सैमसंग से पुरस्कार लेने को आतुर हिन्दी बिरादरी के कलकतिया और दिल्लीवासी लेखकों को चुप रहकर उनकी हां में हां मिलाते देखना अब बुरा भी नहीं लगता। लेकिन जीवन भर रेडिकल विचारों का दामन थामे लोगों को उन्हीं से सम्मानित होते देख ज़रूर बुरा लग रहा था। अब इस निर्णय के बाद चैन आया है।

हम स्वागत करते हैं इन सब लेखकों का और इनका पुष्पहार-पैसा-प्रशस्तिपत्र के बिना हार्दिक सम्मान करते हैं

मंगलवार, 16 मार्च 2010

महिलाओं को आरक्षण क्यूं चाहिये?


मौलाना कल्वे ज़व्वाद, भूमण्डलीकरण समर्थक अमीर किसानों के अमीर नेता शरद जोशी और योगी आदित्यनाथ के बाद अब दिल्ली के मौलाना बुख़ारी भी महिला आरक्षण बिल के ख़िलाफ़ सामने आ गये हैं। उनका कहना है कि औरतों को राजनीति या कोई भी दूसरा पेशा पर्दानशीं होके ही अपनाना चाहिये। कल मुलायम सिंह भी कह चुके हैं कि औरतों को आरक्षण की कोई ज़रूरत नहीं है। लालू यादव तथा दूसरे समाजवादी आरक्षण के भीतर आरक्षण की बात कर रहे हैं…लेकिन यह भी संख्या बल कम होने की मज़बूरी ही लगती है क्योंकि पहले कभी भी इस मुद्दे पर वे गंभीर दिखाई नहीं दिये। आश्चर्य तो यह कि कल यहां ग्वालियर में एक आयोजन में कुछ आधुनिक महिलाओं ने भी कहा कि हमें भीख नहीं चाहिये।
 
आरक्षण को लेकर भीख, बैसाखी जैसी तमाम शब्दावलियां अक्सर ही उपयोग की जाती हैं। लेकिन यह सुविधाप्राप्त वर्ग द्वारा आविष्कृत एक भ्रष्ट शब्दावली है। आरक्षण न तो भीख है न वैसाखी यह सदियों से सामाजिक-आर्थिक संरचना में वंचित रहे समुदायों - जैसे दलित, पिछड़ों, आदिवासियों और महिलाओं का अधिकार है।
 
वैसे अगर इमानदारी से देखें तो समाज में आरक्षण हमेशा से रहा है। पुजारी का पद सवर्ण ब्राह्मण पुरुष, राजा का पद सवर्ण क्षत्रिय पुरुष, सेनापति का पद सवर्ण क्षत्रिय पुरुष, न्यायधीश का पद सवर्ण ब्राहमण पुरुष और चौकीदार जैसे तमाम हेय समझे जाने वाले पद दलित पुरुषों के लिये आरक्षित था। इस अमानवीय तथा ग़ैरबराबरी वाली व्यवस्था के कारण एक तरफ़ सवर्ण कहे जाने वाली जातियां हमेशा वर्चस्वशाली पदों पर काबिज़ रहीं तो दलित कहे जाने वाली जातियां हमेशा से ही सामाजार्थिक जीवन के निचले पायदान पर ही रहीं। अम्बेडकर ने इसी अपरिवर्तनीयता की तुलना बिना सीढ़ी वाली बहुमंजिली इमारत से की थी।
 
अब अगर देखें तो सभी जातियों की औरतों के लिये तो बस घर, हरम और वैश्यालय ही आरक्षित किये गये थे। सामाजिक-आर्थिक जीवन में तो उनका कोई स्थान था ही नहीं। उनमें से बहुतायत के लिये तो किसी भी तरह की शिक्षा भी वर्जित थी। ऐसे में उनसे हुए अन्याय की तो कोई सीमा ही नहीं। जितने घटिया विशेषण औरतों को दिये जाते हैं वे सब उन्हीं परिस्थितियों और पितृसत्तात्मक मानसिकता के चलते हैं।
 
ऐसे में सच तो यह है कि औरतों को न केवल संसद अपितु सभी प्रकार की नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण मिलना ही चाहिये। लेकिन उसी पितृसत्तात्मक मानसिकता के कारण धर्मगुरु और नेता इसका विरोध करेंगे ही। लेकिन ज़रूरी यह है कि प्रगतिशील जनवादी विचारों को मानने वाले सारे लोग पूर्वाग्रह छोड़ इसके साथ आयें।

शनिवार, 13 मार्च 2010

जनता का पक्ष

ब्लाग आज अभिव्यक्ति का एक बड़ा माध्यम बन चुका है। यहां हर तरह के विचार से जुड़े लोग हैं…हर तरह के ब्लाग हैं…कविता,कहानी,व्यंग्य और भी अनेक विधाओं पर आधारित ब्लाग खूब फलफूल रहे हैं। ऐसे में यह नया ब्लाग क्यूं? ख़ासतौर पर तब जब मेरे ख़ुद के कई ब्लाग पहले से हैं। दरअसल, इस ब्लाग को लेकर हमारी परिकल्पना एक ऐसे सामूहिक ब्लाग की है जिसमें ब्लागजगत के तमाम प्रतिबद्ध और जनपक्षधर लोग तमाम मुद्दों पर अपनी राय खुलकर रख सकें। वामपंथी नज़रिये से चीज़ों को प्रस्तुत और पुनर्प्रस्तुत किया जा सके और तीखी वैचारिक लड़ाईयां लड़ी जा सके। ऐसे में इस ब्लाग की सफलता भी ऐसे तमाम लोगों के सहयोग से ही संभव है। ऐसे तमाम साथियों से मेरा अनुरोध है कि इस ब्लाग से जुड़ें और सक्रिय योगदान करें। सद्स्यता के लिये मेल करें -- ashokk34@gmail.com क्रांतिकारी अभिवादन सहित