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रविवार, 15 सितंबर 2013

जनसत्ता के झूठ और चंचल चौहान का जवाब


अपनी वाम विरोधी और अब तो कहा जा सकता है कि दक्षिण समर्थक मुहिम में जनसत्ता नामक अखबार के महत्त्वाकांक्षी, दम्भी और अलोकतांत्रिक सम्पादक ने पत्रकारिता के तमाम मानक बिसरा दिए हैं. वह बिना ठोस सबूतों के घटिया और व्यक्तिगत हमले करते हैं और फिर जवाब छापने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. ऐसा पिछले कुछ महीनों में कई बार हुआ है. शंकर शरण को दिया नन्द किशोर नीलम का जवाब नहीं छापा गया, झूठे आरोपों की धज्जीयाँ उड़ाता गिरिराज किराडू का ज़वाब नहीं छापा गया, मेरा खुद का जवाब मिलने पर उसे 'चार सौ शब्दों' में संक्षिप्त करने की मांग की गयी (जबकि उनका खुद का लेख आधे पन्ने का था) और कुछ अन्य मित्रों के साथ भी यही हुआ. ज़ाहिर है कि उनकी रूचि बहस में नहीं सिर्फ अपने आकाओं की नज़र में कुछ प्वाइंट्स हासिल कर लेने में है जिसका फ़ायदा उस पार्टी के सत्ता में आने पर लिया जा सके जिसके पक्ष में थोड़ा माहौल फेसबुक जैसी साइट्स पर बनता देख सम्पादक महोदय ने अपने धर्मनिरपेक्षता के दावों को ताक पर रख दिया है. कुछ छपास की बीमारी और कुछ दूसरे स्वार्थों से अंधे खुद के वाम होने का दावा करने वाले और अब तक बिला शक़ धर्मनिरपेक्ष रहे लोग भी उनकी इस मुहिम में जाने-अनजाने शामिल ही नहीं हो रहे बल्कि उसे खाद पानी भी उपलब्ध करा रहे हैं.

खैर, जनपक्ष ने लगातार इस मुहिम की मुखालिफ़त की है. पहले के प्रतिवाद आप यहाँ पढ़ सकते हैं. आज इसी क्रम में जनवादी लेखक संघ के महासचिव चंचल चौहान जी का प्रतिवाद.

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प्रेमचंद पर एक और झूठमिश्रित टिप्पणी


चंचल चौहान



जनसत्ता के 25 अगस्त 2013 के दिल्ली संस्करण में एक धुरदक्षिणपंथी सांप्रदायिक फासीवादी विचारधारा के भगवे रंग में रंगे लेखक की झूठमिश्रित टिप्पणी के साथ प्रेमचंद के एक बहुत ही यथार्थपरक लेख, "राज्यवाद और साम्राज्यवाद" की पुनर्प्रस्तुति कुछ इस तरह की गयी थी गोया प्रेमचंद उन्हीं की तरह घोर कम्युनिस्ट- विरोधी रचनाकार थे। मैंने जब झूठ का पर्दाफाश करते हुए अपनी टिप्पणी ओम थानवी के पास ईमेल से भेजी तो उन्होंने उसे छापना उचित नहीं समझा, संपादक भी ‘सांच कहौ तो मारन धावै’, इसलिए उस टिप्पणी को मैंने 1 सितंबर को अपने ब्लाग पर डाल दिया। 8 सितंबर को एक और झूठमिश्रित टिप्पणी एक लोहियावादी पत्रकार की लिखी छपी। ये महाशय तो कम्युनिस्टविरोध की मुहिम में उस संघी लेखक से भी दो कदम आगे निकल गये। उन्होंने मुक्तिबोध को भी प्रेमचंद वाली बहस में घसीट लिया और पाठकों को यह बताया कि मुक्तिबोध ने एक पत्र अंग्रेजी में ई एम एस नंबूदिरीपाद को लिखा था जिसका जवाब उन्हें नहीं मिला। इस 'मुदियापे' को क्या कहा जाये। मुक्तिबोध का लिखा यह पत्र कहां है, मिस्टर खोजीपत्रकार? उनकी रचनावाली के खंड 6 में एक पत्र अंग्रेजी में लिखा भारत भूषण अग्रवाल के नाम से छपा है, एक पत्र अमृतपाद डांगे के नाम है जिसमें हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर सटीक टिप्पणी और नयी कविता के रचनाकारों के प्रति कुछ मार्क्सवादी आलोचको के संकीर्णतावादी रवैये की ओर उनका ध्यान दिलाया गया है, और कुछ प्रलेस के बारे में रचनात्मक सुझाव दिये गये हैं, कहीं भी उसमें वह सब नहीं है जिसे इस खोजीपत्रकार ने झूठ का सहारा लेकर दिखाने की कोशिश की है। ये पत्रकार महोदय कहते हैं कि प्रेमचंद अगर कम्युनिस्ट होते तो मुक्तिबोध की तरह अपनी पार्टी से पूछते 'कि कामरेड आपकी पालिटक्स क्या है'। मुक्तिबोध ने यह सवाल पार्टी से नहीं, उन तमाम मध्यवर्गीय अवसरवादी रचनाकारों से पूछा था जो उस दौर में तय नहीं कर पा रहे थे कि "पथ कौन सा है"। आज की ही तरह उस समय भी बहुत से लेखक सर्वनिषेधवादी विचारों की जकड़बंदी में फंसे थे, जो ‘कोउ नृप होउ हमहिं का हानी’ की मंथर बुद्धि के शिकार थे। 

इसके बाद इस खोजी पत्रकार के झूठ को देखिए, वे फरमाते हैं : ' कुछ इसी विह्वलता से मुक्तिबोध ने उस समय के उच्चतम कम्युनिस्ट नेता ईएमएस नंबूदरीपाट को एक सुदीर्घ पत्र लिखा था - अंग्रेजी में, ताकि वे समझ सकें।----' क्या समझ सकें, यह बताना वे भूल गये या उन्हें उस पत्र में कहीं मिला नहीं। शरारतन हरकिशन सिंह सुरजीत का नाम भी घसीट लिया है जिसका लेख से कोई ताल्लुक नहीं है। क्या खोजीपत्रकार महोदय ईएमएस नंबूदिरिपाद के नाम लिखे उस पत्र की फोटोकापी हम पाठकों को दिखा सकते हैं, मूल तो वे भला कहां से लायेंगे, या अपने झूठ पर शर्मशार हो कर पाठकों से माफी मांगेंगे कि उन्हें खामख्वाह गुमराह किया। हम जानते हैं कि ऐसी हिम्मत ओछे और बोदे जिगरे में नहीं होती। कायराना हमले करना ऐसे दिमागों की फितरत ही होती है। ईएमएस और सुरजीत, दोनों मार्क्सवादी पार्टी के नेता जरूर थे, उनके प्रति इस तरह का रवैया दिखाने और उन्हें इस बहस में घसीट लेने के पीछे क्या मंशा है? लेख के शुरू में खोजी पत्रकार महोदय ने “कम्युनिस्ट नैतिकता” के बरक्स जो उपदेश पाठक को दिया कि ‘हम व्यक्तियों से घृणा नहीं करते, उनकी विकृतियों से जरूर घृणा करते हैं,’ पैराग्राफ के अंत तक झूठ पर आधारित व्यक्तिगत घृणा पर ही खुद उतर आते हैं। नसीहत दूसरों के लिए, अपने आचरण के लिए नहीं।

लेख के अंत तक इस खोजीपत्रकार ने अपना छिपा एजेंडा जाहिर कर दिया, 25 अगस्त के संघी लेखक के झूठ को ज्यों का त्यों उधार ले कर इन महाशय ने भी लिख दिया कि प्रेमचंद ने “बोल्शेविक उसूलों'” के कायल होने की बात बाद में ‘एक बार भी नहीं दुहरायी, बल्कि कम्युनिस्टों की आलोचना ही की।‘ हे खोजी पत्रकार महोदय, यह ‘कम्युनिस्टों की आलोचना’ आपने प्रेमचंद के लेखन में कहां पढ़ ली, प्रेमचंद के लेखन में से कोई मनगढंत सबूत ही पेश कर देते तो आपके इस झूठ पर पाठक विश्वास कर भी लेते, जैसे ईएमएस के नाम लिखे पत्र का झूठ गढ़ लिया, आप क्या नहीं कर सकते, कवि हुए बगैर भी वहां पहुंच सकते हैं जहां न पहुंचे रवि। धन्य हैं आप, आपको धिक्कार है, सब जान गये हैं आपको झूठ पर आश्रित “महाजनी सभ्यता” से ही प्यार है।

मुंशी प्रेमचंद के समय में भारत के कम्युनिस्ट एक पार्टी के रूप में संगठित हो ही रहे थे, मजदूरवर्ग की उभरती हिरावल राजनीतिक शक्ति बनते ही 1920 से 1925 के दौर में उसने मजदूरों के बीच काम करना शुरू किया कि तभी ब्रिटिश हुकूमत ने मेरठ षड्यंत्र केस के नाम से पार्टी के नेतृत्वकारी साथियों को जेल में डाल दिया जो 1929 से 1933 तक सजा भुगतते रहे, उसके बाद पूरे देश मे वामपंथ की लहर दौड़ गयी, मजदूरों से ले कर किसान, महिलाएं, युवक, छात्र, कवि, रचनाकार, कलाकार,सभी संगठित होने लगे। सज्जाद जहीर तथा मुल्कराज आनंद ने लेखकों को संगठित करने की जो पहल की, उसका स्वागत प्रेमचंद ने किया, उन्होंने उनके दस्तावेज प्रलेस के गठन से पहले ही हंस में छापे। रेखा अवस्थी की पुस्तक, "प्रगतिवाद और समानांतर साहित्य" में मुंशी प्रेमचंद के सहयोग के तमाम सबूत मौजूद हैं जिन्हें पढ़ कर कोई भी इस झूठ को पहचान सकता है कि "प्रेमचंद ने कम्युनिस्टों की आलोचना ही की"। सच्चाई यह है कि उस दौर मे कम्युनिस्टों की आलोचना केवल ब्रिटिश सरकार के फरमानों में ही दर्ज है, जो उपलब्ध हैं, किसी भारतीय लेखक की कलम से लिखी हुई नहीं मिलेगी, तो यह आलोचना प्रेमचंद के किस लेखन में इस खोजी पत्रकार को मिल गयी। सन् 1930 से 1936 तक का दौर तो पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट विचारों के प्रसार और वैचारिक सैलाब का दौर था, इसी उभार ने संसार को महानतम उपन्यासकार, कवि, लेखक, आलोचक, कलाकार, नाटककार दिये। मगर जब झूठ ही प्रसारित करना हो, तो इस सब को देखने जानने की जरूरत ही कहां रह जाती है।
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चंचल चौहान 

जाने माने आलोचक और जलेस के राष्ट्रीय महासचिव. 'नया पथ' का संपादन 

यह लेख उनके ब्लॉग से साभार.

बुधवार, 5 मई 2010

जवाब दें संघी ब्लाग भोंपू

(दंतेवाड़ा घटना के तुरत बाद संघ के गोएबल्स ने यह प्रचार किया कि जे एन यू के छात्रों ने इस 'खुशी' में पटाखे छोड़े और ख़ुशियां मनाईं। गांधी की मौत पर जलसे मनाने वालों को वैसे भी दुष्प्रचार की आदत और लंबी प्रैक्टिस है, लेकिन इस बार मीडिया ने भी कन्फ़र्म किये बिना इस संवेदनशील मसले पर दुष्प्रचार में सहयोग किया। अब रेयाज़ उल हक़ ने जनसत्ता में एक पत्र लिख कर वस्तुस्थित से अवगत कराया है। ऐसे में संघी (दुष) प्रचारकों और ब्लाग भोपूओं को सामने आके अपने झूठ के पक्ष में तर्क देने चाहिये)
हिटलर और गोएबल्स अपने साथियों के साथ
चित्र यहां से

नमस्ते थानवी जी

उम्मीद है आप अच्छे होंगे। एक पत्रकार होने के नाते मैं जनसत्ता द्वारा स्थापित पत्रकारीय मूल्यों और उसूलों का कायल रहा हूं। जिस तरह यह अखबार पूरी गंभीरता और अधिकतम वस्तुगतता के साथ खबरें पेश करता है, वह भारत के मीडिया में (दुनिया भर में जारी प्रक्रिया के एक हिस्से के तौर पर) खत्म होता जा रहा है। जिस तरह आज सच्चाई जाने बगैर, पुष्टि किये बगैर केवल सरकारी, सत्ता या पुलिस या सिर्फ एक पक्ष द्वारा पेश किये गये नजरिये को ही खबर के रूप में रखने का चलन बढ़ता जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, जनता के – व्यापक जनता के – हितों, लोकतंत्र और उसके जानने के अधिकार के खिलाफ भी है। एसी स्थिति में हम जनसत्ता से उम्मीद करते रहे हैं कि यह इस प्रवृत्ति से जहां तक हो सकेगा खुद को दूर रखेगा। यह उम्मीद ठोस जमीन पर टिकी हुई है और आपके अखबार का इतिहास बताता है कि किसी भी विचारधारा की बात हो (भले ही वह अखबार की संपादकीय नीति के विरुद्ध भी हो), तब भी उसके बारे में खबरें पूरे संतुलन के साथ रखी जाती रही हैं।

लेकिन आज एक खबर में वर्णित तथ्य को देख कर अफसोस हुआ। यह खबर दिल्ली में हुई कुछ ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली स्थित विश्वविद्यालयों में सामने आये उनके कथित संपर्कों के संबंध में थी। मैं इस खबर के उस हिस्से पर आपत्ति जताना चाहूंगा, जिसमें यह कहा गया है कि जेएनयू में दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ जवानों की माओवादियों द्वारा की गयी हत्या की घटना के समर्थन में एक सभा बुलायी गयी थी।

यह किसी भी लिहाज से एक गलत सूचना है। मैं उस सभा में न सिर्फ मौजूद था, बल्कि उस आयोजन और उसकी तैयारियों के बारे में 20-25 दिन पहले से जानता था। ग्रीन हंट के नाम से कार्पोरेट लूट और आदिवासियों की जमीन छीनने के लिए चलाये जा रहे युद्ध को बंद करने की मांग करनेवाला यह आयोजन पहले तो 5 अप्रैल को होना था, लेकिन कुछ कारणों से इसे 9 को करना पड़ा। ये कारण कोई गोपनीय नहीं थे।

उन दिनों जेएनयू में आरक्षण के लगातार जारी उल्लंघन के विरोध में आंदोलन चल रहा था। 5 तारीख को विवि में हड़ताल थी और छह को ईसी मीटिंग के समय विरोध प्रदर्शन होना था। इन वजहों से इस कार्यक्रम को 9 तक टाल दिया गया, क्योंकि इन गतिविधियों में उन छात्रों को भी शामिल होना था, जिन पर जनता पर युद्ध के खिलाफ सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेदारी थी। मेरे पास इस आयोजन के लिए छपे हुए पर्चे हैं – और जेएनयू के लगभग हर छात्र ने मेस और दूसरे ढाबों-कैंटीनों पर ये पर्चे पढ़े होंगे – जिसमें आयोजन की तारीख 5 अप्रैल छपी थी और जिसे हाथ से काट कर 9 किया गया था। इसके अलावा इस कार्यक्रम के आयोजक – जेएनयू फोरम अगेंस्ट वार ऑन पीपुल – की समन्वय समिति द्वारा इस कार्यक्रम के आयोजन की तारीख 5 से बढ़ा कर 9 किये जाने की सूचना देनेवाला 3 अप्रैल को भेजा गया एसएमएस भी मेरे मोबाइल में सेव है।

मुझे लगता है कि ये तथ्य इस बात के लिए काफी सबूत मुहैया कराते हैं कि यह आयोजन पहले से तय था और इसके बारे में कैंपस के अधिकतर छात्र जानते थे।

जहां तक सैनिकों की मौत पर जश्न मनाने का सवाल है – यह झूठ भाजपा और कांग्रेस के छात्र संगठनों ने फैलाया और मीडिया ने हाथोंहाथ लिया। उस आयोजन के दौरान लगभग 300 छात्र मौजूद थे और साथ ही जेएनयू के सुरक्षा गार्ड थे। वे वास्तविक स्थिति की सूचना दे सकते हैं। क्या मीडिया ने उनसे वास्तविक स्थिति के बारे में जानने की कभी कोशिश की? किसी ने भी एसी कोशिश नहीं की। एसी बातों का प्रचार भी मीडिया में किया जा रहा है कि ‘देशविरोधी नारों’ और ‘शहादत पर जश्न’ के कारण छात्र गुस्सा गये और उन्होंने विरोध किया। जबकि वास्तव में केवल 8-10 लोगों, जो एबीवीपी और एनएसयूआई से जुड़े हुए थे और उनमें से हो सकता है कि कुछ छात्र न भी हों, ने हंगामा किया। उस प्रोजेक्टर को तोड़ दिया जिस पर एक फिल्म दिखायी जानी थी। बिजली की लाइन काट दी और माइक तोड़ दिया। वे लगातार मंच पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे और इस कारण से आयोजन स्थल पर एक भगदड़ की स्थिति सी बन गयी थी। इस क्रम में हल्की हाथापाई जरूर हुई थी। इसके साथ ही एनएसयूआई के 4-5 लोगों ने आयोजन स्थल पर पत्थर भी फेंके। इसके बावजूद कार्यक्रम एक-डेढ़ बजे रात तक चला। हबीब तनवीर के नाटक सड़क का प्रदर्शन हुआ और जनवादी गीत गाये गये और तब तक सौ-दो सौ से अधिक संख्या में छात्रों की मौजूदगी बनी रही।

ऐसा लगता है कि किसी को इन तथ्यों से मतलब नहीं है।

लेकिन मुझे उम्मीद है कि जनसत्ता ने खुद जिस तरह की पत्रकारिता की मिसाल कायम की है, उसमें एसे तथ्यों के लिए जगह होगी। इसी उम्मीद से यह पत्र लिख रहा हूं।

रेयाज उल हक, 3 मई 2010