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शनिवार, 2 अप्रैल 2011

आप अकेली नहीं हैं एलिना सेन


मैं इसे एक अनौपचारिक मुलाकात के रूप में अपनी स्मृतियों में दर्ज रखना चाहती हूं. न कोई सवाल, न कोई जवाब. एक आत्मीय सी मुलाकात. गले मिलना और हथेलियों को कसकर दबाते हुए प्यार और विश्वास एक-दूसरे को सौंप देना. आंखों में रोप देना भरोसा कि आप अकेली नहीं हैं, हम हैं ना.
 
ये मुलाकात थी एलिना सेन से. मेरे लिए वो डॉक्टर बिनायक सेन की पत्नी भर नहीं थीं. वो एक ऐसी मजबूत स्त्री थीं जो अन्याय के खिलाफ जमकर खड़ी थी. यह जानते हुए कि इस लड़ाई में उनका सामना राज सत्ता से है. यह जानते हुए कि उनके हर सच को काटकर बड़ा सा झूठ लिखने वालों की कमी नहीं है


एलिना सेन से मिलकर न जाने क्यों मुझे कार्ल मार्क्स  की पत्नी जेनी, लेनिन की पत्नी क्रूप्सकाया, गांधी की पत्नी कस्तूरबा की याद आ गई. इतिहास पुरुषों की ये पत्नियां. इनका संघर्ष किन्हीं मायनों में कम नहीं रहा. न ही ये वैचारिक स्तर पर कम थीं. अपने पति के विचारों को, उनकी लड़ाई को आगे बढ़कर हाथ में लेना, उसे आगे बढ़ाना, घर-परिवार को संभालना, आलोचना, प्रवंचना, प्रताडऩा, धमकियां और न जाने क्या-क्या इनके हिस्से आता है. इन स्त्रियों के योगदान पर कितनी बात होती है.


एलिना वर्धा में पढ़ाती हैं. उन पर दो बेटियों की जिम्मेदारी है. बेटियों के ढेर सारे सवाल हैं. उनके मासूम दिल और दिमाग को संभालते हुए, अपनी नौकरी को चलाते हुए डॉ बिनायक सेन के लिए वे पूरे देश में एक माहौल बनाना चाहती हैं.

 
वे प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहती हैं डॉ. सेन माओवादी नहीं हैं. वे उस कानूनी कार्रवाई के खिलाफ कानूनी तरह से लड़ रही हैं जिसने उनके पति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. उन्हें देश की जनता पर भरोसा है. उन्हें विश्वास है कि उन्हें न्याय मिलेगा. ये विश्वास उन्हें क्यों है, पता नहीं. वे धीमी आवाज में कहती हैं क्योंकि हमारे घर में स्टेथोस्कोप नहीं मिला, इसलिए पुलिस ने डॉ. सेन को डॉक्टर मानने से इनकार कर दिया.
 
एलिना पत्रकारों के सारे सवालों के जवाब पूरे धीरज के साथ देती हैं. एक ही सवाल के बार-बार पूछे जाने पर खीझती नहीं. हालांकि उनकी आवाज थकती है कभी-कभी. मैं अपनी आवाज को पूरे देश की आवाज बनाना चाहती हूं. मैं अपनी आवाज को सच का साथ देने वालों की आवाज बना देना चाहती हूं. मैं बहुत जोर से चिल्लाना चाहती हूं, कहना चाहती हूं कि एलिना आप अकेली नहीं हैं. मुट्ठियां भींच लेना चाहती हूं. लेकिन प्रेस क्लब के उस हॉल में बस उन्हें गले लगाती हूं.

  • प्रतिभा कटियार