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बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

सदाचार की गठरी : हिमांशु पांड्या

हिन्दी की युवा कहानीकार ज्योति कुमारी द्वारा दर्ज यौन दुर्व्यवहार की शिकायत के बाद उठे विवाद में ताज़ा कड़ी में हमारी भाषा के एक समर्थ लेखक अनिल कुमार यादव का लेख एक साथ दो ब्लोग्स पर शाया हुआ है.इन दोनों में से कम से कम एक ब्लॉग इससे पहले खुलकर ज्योति कुमारी के समर्थन में आया था और इसके मॉडरेटर ने ज्योति की बहादुरी को सलाम किया था. अनिल यादव का लेख घोषित रूप से हिन्दी पट्टी में सेक्सुअलिटी को लेकर छाई घनघोर चुप्पी पर सवाल उठाता है , इसी चुप्पी को महिलाओं के साथ होने वाले यौन दुर्व्यवहारों के लिए उत्तरदायी मानता है और इसे मिटा देने का आव्हान करता है. अनिल जी हिसाब से इसका सबसे मुफीद तरीका ये है कि ‘स्त्री विमर्श’ के पुरोधा राजेन्द्र यादव से उनके जीवन में सेक्स और सृजनात्मकता के अंतर्संबंधों पर बात की जाए , उनके जीवन में आयी ‘महिला लेखिकाओं और सेक्स और क्रियेटिविटी’ पर बात की जाए. हालांकि अनिल जी की इच्छा ‘पुरानी लेखिकाओं’ पर बात करने की थी पर बात ज्योति कुमारी पर केन्द्रित हो जाती है और फिर बड़ी चतुराई से राजेन्द्र यादव को कठघरे में खडा करने का ऊपरी दिखावा करते हुए यह बातचीत एक युवा लेखिका के शाब्दिक गरिमा हनन में जुट जाती है. वह सारा हिस्सा आपइन लिंक्स पर जाकर पढ़ सकते हैं , मेरी उद्धृत करने की कोइ इच्छा नहीं है , मैं इस लगभग पोर्नोग्राफिक पूर्वार्ध पर नहीं उत्तरार्ध पर बात करूंगा जो ज्योति कुमारी के ‘हमदर्द’ अनिल कुमार यादव द्वारा उन्हें सलाह के रूप में लिखा गया है.
वे लिखते हैं ,"अस्मिता बचाने के साहसिक अभियान पर निकली ज्योति कुमारी सबको बता रही हैं कि राजेंद्र यादव उन्हें बेटी की तरह मानते थे. और इसके अलावा कोई रिश्ता नहीं था. वह ऐसा करके एक कल्पित नायिका स्टेटस और शुचिता की उछाल पाने के लिए एक संबंध और अपने जीवन को ही मैन्यूपुलेट कर रही हैं. " ठीक , मान लिया. तो क्या अनिल ये कह रहे हैं कि ज्योति को अपने संबंधों का ऐलानिया स्वीकार बेहिचक करके अपने साहस का परिचय देना चाहिए था . ( इसमें ये तो आ ही गया कि राजेन्द्र यादव का दावा - हो सकता है , हो सकता है कि वह एक वृद्ध की कुंठा का प्रदर्शन हो कि'देखो मैं शारीरिक रूप से अक्षम हूँ तो क्या आज भी शिकार कर सकता हूँ !' /  हो सकता है कि यह दावा एक तरह की खीझ से उपजा हो उस लेखक के प्रति जो एक अस्सी  साला लेखक से स्त्री विमर्श के नाम पर 'सेक्स और सर्जनात्मकता के रिश्तों' पर ही बात करना चाहता था -जो भी हो पर - उनका ही दावा सही है, ज्योति का 'पिता समान' वाला दावा खोखला है. ) लेकिन ऐसा होता तो वे ये क्यों लिखते , "यह अस्वाभाविक नहीं है कि लोग मानते हैं कि एक कहानीकार के तौर खुद को धूमधड़ाके से प्रचारित करने के लिए उन्होंने ऐसा ही एक और मैन्यूपुलेशन किया होगा." यह सबसे अच्छा तरीका होता है , अपनी राय को ‘लोग मानते हैं’ की गिरह में लपेटकर पेश करदो ,और चूंकि ‘यह अस्वाभाविक नहीं है’ अतः आप अपनी नहीं जनमत की राय व्यक्त कर रहे हैं. इसे कहते हैं एक तीर से दो शिकार ! यानी वे - यदि स्पष्ट कहूं तो इन दो व्यक्तियों के संबधों को 'मैनिपुलेशन' कह रहे हैं , इसे एक सीढ़ी बता रहे हैं जिसे ज्योति ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ती के लिए इस्तेमाल किया.
 ध्यान से देखिये , एक ओर वे भारतीय समाज की सेक्सुअलिटी पर चुप्पी के खिलाफ प्रगतिशील बयान दे रहे हैं . यौन अपराध का बदला यौन हिंसा नहीं होती - जैसी मार्के की बात कह रहे हैं और दूसरी ओर वे राजेन्द्र यादव की उन 'चेलियों' (ध्यान दीजिये, चेलों नहीं सिर्फ चेलियों ) को गरिया रहे हैं जिन्हें उन्होंने "साहित्य के बाजार में उत्पात मचाने के लिए छोड़ दिया जो खुद उन्हें भी अपने करतबों से चकित कर रही हैं. "  ज्यादा दिन नहीं हुए जब विभूतिनारायण राय ने एक ख़ास शब्द का प्रयोग किया था तब उसके प्रतिरोध में सारा हिन्दी समाज उठ खडा हुआ था . वह एक शब्द विशेष से लड़ाई थी या एक विचार से ? वह एक स्त्री के सम्मान का मसला था या सारी स्त्री जाति के ? अब कृपया इस पूरे वाक्य को एक बार ध्यान से पढ़िए और बताइये कि इसमें उन सारी स्त्रियों को कठघरे में नहीं खडा कर दिया गया है जो 'हंस' में छपीं, छपती रहीं और जिन्होंने अपनी रचनात्मकता के लिए इस पत्रिका को चुना ? -
"लेकिन उनका कसूर यह है अपनी ठरक को सेक्सुअल प्लेज़र तक पहुंचाने की लालसा में उन्होंने आलोचकों (जिसमें नामवर सिंह भी शामिल हैं), प्रकाशकों, समीक्षकों की मंडली बनाकर ढेरों अनुपस्थित प्रतिभाओं के अनुसंधान का नाटक किया, चेलियां बनाईं और साहित्य के बाजार में उत्पात मचाने के लिए छोड़ दिया जो खुद उन्हें भी अपने करतबों से चकित कर रही हैं."
क्या चेले नहीं होते संपादकों के और क्या वे साहित्येतर कारणों से नहीं छपते ? पर नहीं , स्त्री हमेशा साहित्येतर कारणों से ही छपती है और वह साहित्येतर कारण ‘सिर्फ एक’ होता है. ( आप चाहें तो ये जोड़ सकते हैं कि ऑफिस ,स्कूल,कॉलेज,अस्पताल आदि आदि जगहों पर भी उसे तरक्की ‘अन्य ही’ कारणों से मिलती है और आप चाहें तो किसी ऑफिस के मरदाना पेशाबघर में इसकी दृश्यात्मक व्याख्या भी देख सकते हैं.)

  वे लिखते हैं , " ऐसा क्यों हुआ कि विवेक के फिल्टर से जो कुछ जीवन भर निथारा उसे अनियंत्रित सीत्कार और कराहों के साथ मुंह से स्खलित हवा में उड़ जाने दिया. अगर वे मूल्य इतने ही हल्के थे तो राजेंद्र यादव को 'हंस' निकालने की क्या जरूरत थी? " अब समझना बहुत मुश्किल है कि अनिल किन मूल्यों की बात कर रहे हैं ? सबसे पहली बात तो ये कि उनके इस इंटरव्यू से राजेन्द्र यादव का कोई ऐसा पक्ष नहीं उभर रहा है जो उनकी कसौटी - "अगर सेक्सुअलिटी की अभियक्ति हमारे जीवन का हिस्सा होती तो शायद किसी महिला या पुरूष के साथ जोर जबर्दस्ती की स्थितियां ही नहीं बनतीं." इस कसौटी पर राजेन्द्र यादव को अपराधी बना रहा हो. मूल मुद्दा ये था ही नहीं कि ज्योति कुमारी और राजेन्द्र यादव की बीच उनकी सहमति से किसी कमरे में क्या घटा , और उसे उन दोनों ने अपनी अपनी सामाजिक प्रस्थिति के हिसाब से कैसे प्रस्तुत किया, दरअसल इस पर टिप्पणी का किसी तीसरे को अधिकार है ही नहीं . मूल मुद्दा एक स्त्री की ब्लैकमेलिंग , उस पर एक व्यक्ति की आपराधिक चुप्पी का था , पर वह तो न जाने कहाँ बिला गया .यही असली राजनीति है, एक स्त्री द्वारा अपनी गरिमा पर हमले , यौन दुर्व्यवहार की शिकायत करने पर उसके ‘चरित्र’ को ही संदेह में ला दो  , जिसका पहले से ही कुछ ‘लफडा’ है उसके साथ तो थोड़ा बहुत दुर्व्यवहार हो भी गया तो क्या ! अनिल यादव को मथुरा नामक लडकी के साथ पुलिस लौकअप में हुए बलात्कार के सन्दर्भ में आये फैसले और उसके बाद भारत के स्त्री आन्दोलन में आ गए जलजले के बारे में जरूर पढ़ना चाहिए. जो नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं , उनके भी नागरिक के रूप में वही अधिकार होते हैं जो आपके हमारे, इस बात को उनसे बेहतर कौन जानता होगा.

अनिल यादव को राजेन्द्र यादव से यह 'उम्मीद नहीं थी कि वह किसी लड़की को दाबने-भींचने के लिए जीवन भर की अर्जित विश्वसनीयता, संबंधों और पत्रिका की सर्कुलेशन पॉवर को सेक्सुअल प्लेज़र के चारे की तरह इस्तेमाल करने ' लगेंगे , पर उन ढेरों संपादकों का क्या जो चापलूसों, टुकड़खोरों,  रैकेटियरों, अफवाहबाजों, सत्ताधारियों, आला अफसरों, विज्ञापनदाताओं  आदि आदि आदि को अपनी पत्रिकाओं के जरिये साधते रहते हैं. ‘चरित्र’ की दुधारी तलवार उन्हें नहीं हलाल करती ना. ‘सदाचार’ का ताल्लुक सिर्फ ‘यौन शुचिता’ से है . ‘राष्ट्रभक्ति’ की गिलोटीन पर मुस्लिम हलाल होंगे और ‘सदाचार’ की गिलोटीन पर स्त्रियाँ .   और इस तरह अंत तक आते आते अनिल निष्कर्ष सुना ही देते हैं, "ज्योति कुमारी का महत्वाकांक्षी होना अपराध नहीं था लेकिन उन्होंने इसे उसकी कमजोरी की तरह देखा, उसे साहित्य का सितारा बनाने के प्रलोभन दिए और उसका इस्तेमाल किया. "  
    
  इस तरह निष्कर्ष क्या निकला : स्त्रियों के लिए मर्यादा,सीमा तय है जिसे पह्चानना उनके लिए जरूरी है . हिदी साहित्य की दुनिया में आना और धूमकेतु की तरह छा जाना कम से कम एक स्त्री के लिए तो अक्षम्य है , उसका सार्वजनिक आखेट किया ही जाना चाहिए. पुरुषों की तिकड़में जाहिर होना उनके लिए ईर्ष्या भाव पैदा करता है और स्त्री की तिकड़में जाहिर होना उसके लिए दयनीयता की स्थिति लाता है. कम से कम आज अनेक प्रगतिशील साथियों द्वारा इस पर लिखी स्टेटस पढ़कर तो यही लगा .

ज्यादा समय नहीं बीता जब एक बहादुर लड़की की लड़ाई को आगे बढाने के लिए इस मुल्क के लाखों नौजवान लड़के लडकियां सड़कों पर उतर आये थे. उस समय भी एक संरक्षणवादी पितृसत्तात्मक दृष्टि थी जो कह रही थी कि यदि स्त्रियाँ अपनी मर्यादा को समझें तो ऐसे अपराध कम होंगे , खुशी की बात है कि हमारे नौजवानों ने उस दृष्टि को पूरी तरह से नकारा और चिल्ला चिल्ला कर ,बेरिकेड्स तोड़कर, हर मंच पर अपनी बात रखकर इसे लड़कियों की आज़ादी की लड़ाई में बदल दिया. भारतीय स्त्री विमर्श आज बहुत दूर तक रास्ता तय कर चुका है , उसे ‘मर्यादा’ के छलावे में अब नहीं बहकाया जा सकता.
हिमांशु पंड्या


बुधवार, 25 सितंबर 2013

बहिष्कार भी समर्थन की तरह एक राजनीतिक हथियार है : सन्दर्भ हंस का सम्पादकीय

यह लेख भोपाल की एक पत्रिका के कहने पर लिखा गया था. छपा या नहीं छपा यह पता नहीं, क्योंकि कोई सूचना नहीं आई. अब इस महीने का हंस का सम्पादकीय पढने के बाद इसे यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.
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हंस और विवादों का रिश्ता नया नहीं है. पत्रिका में लिखे को लेकर तो कभी पत्रिका के बाहर राजेन्द्र जी और उनकी मंडली के कारनामों पर विवाद होते ही रहे हैं. इस बार यह विवाद प्रेमचंद जयंती पर हंस के वार्षिक आयोजन को लेकर है. इस आयोजन में गोविन्दाचार्य, अशोक वाजपेयी, अरुंधती राय और वरवरराव के आने तथा ‘अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता’ विषयक व्याख्यानमाला में उनकी हिस्सेदारी की सूचना थी. लेकिन कार्यक्रम में अरुंधती नहीं आईं और वरवर राव ने दिल्ली आने के बाद भी कार्यक्रम में हिस्सेदारी से इंकार कर दिया. उनके बहिष्कार को लेकर सवाल उठने शुरू हुए तो उन्होंने इंटरनेट पर एक पत्र ज़ारी किया और फिर हिंदी के साहित्यिक विवादों के ‘प्रसंस्करण केंद्र’ जनसत्ता में इसे लेकर उनकी लानत-मलामत करता हुआ एक सम्पादकीय और अपूर्वानंद की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई, जिसके उत्तर में उन्होंने एक और पत्र ज़ारी किया. संभव है आगे और वाद-प्रतिवाद आयें. फेसबुक और सोशल मीडिया पर अशोक वाजपेयी कैम्प के तमाम स्वनामधन्य साहित्यकार और जनसत्ता सम्पादक ओम थानवी तो लगातार तलवारें भांज ही रहे हैं.

देखना होगा कि वरवरराव या अरुंधति के हंस के इस सालाना उत्सव में न आने के क्या मानी हो सकते हैं? यहाँ यह याद दिला देना भी बेहतर होगा कि इसके पहले छत्तीसगढ़ के तत्कालीन पुलिस प्रमुख विश्वरंजन और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय की उपस्थिति के कारण अरुंधती ने पहले भी हंस के ही एक आयोजन का बहिष्कार किया था. उसकी वजूहात क्या थीं? ज़ाहिर है कि छत्तीसगढ़ में जिस तरह सलवा जुडूम के नाम पर राज्य दमन ज़ारी था (जो अब भी एक भिन्न रूप में रुका तो नहीं ही है) उसकी अगुवाई कर रहे व्यक्ति के साथ मंच शेयर करना आदिवासियों के दमन के खिलाफ लगातार लिख रही अरुंधती ने उचित नहीं समझा था. मुझे नहीं याद कि उसे लेकर तब किसी तरह का कोई विवाद मचा था. आज लोकतंत्र और आवाजाही के सिद्धांत पेश कर रहे लोग तब शायद इसलिए भी चुप थे कि अशोक वाजपेयी खुद विश्वरंजन और विभूति नारायण राय के बहिष्कार (छिनाल प्रकरण के बाद) में शामिल थे. मजेदार बात यह है कि तब वर्धा विश्विद्यालय और छतीसगढ़ के प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान (जिसके सर्वे सर्वा विश्वरंजन थे) के  बहिष्कार को सही बताने वाले और उसमें शामिल होने वाले लोग आज बहिष्कार की पूरी अवधारणा पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं और इसे ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ के ख़िलाफ़ बता रहे हैं. ओम थानवी सवाल उठाते हैं कि ‘अगर ‘लोकतंत्र में सभी मंच एकतान हो गए तो जिस वैचारिक और सांस्कृतिक बहुलता को हम अपने लोकतंत्र का असली आधार मानते हैं, वह समाप्त हो जायेगी’ तो अपूर्वानंद कहते हैं ‘भारत में, जो अब भी एक-दूसरे से बिलकुल असंगत विचारधाराओं और विचारों के तनावपूर्ण सहअस्तित्व वाला देश है , किसी विचार को चाह कर भी सार्वजनिक दायरे से अपवर्जित करना संभव नहीं है.’ सवाल वही है कि यह लोकतंत्र ‘वर्धा’ या ‘प्रमोद स्मृति संस्थान’ में लागू क्यों नहीं होता है? क्यों यह थानवी साहब के अखबार में अपने विरोधियों के प्रतिवाद को स्थान देने के क्रम में लागू नहीं होता? (सी आई ए को लेकर लम्बे चले विवाद में थानवी ने वीरेन्द्र यादव, मेरे या गिरिराज किराडू के प्रतिवाद छापने से शब्द सीमा निर्धारण के नाम पर इंकार कर दिया था) 

सवाल यहाँ यह भी है कि वाकई हंस कोई ऐसा आयोजन कर रहा था जिसमें किसी बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश थी? ज़ाहिर है कि यह कोई पैनल डिस्कशन या परिचर्चा नहीं, व्याख्यानमाला थी. इस व्याख्यानमाला में सबको अपने-अपने भाषण देने थे और किसी तरह की बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी. ऐसे में यह तर्क कि वहां वैचारिक विरोधियों से बहस की जानी चाहिए थी, बिना नींव का है. साम्प्रदायिकता के धुर विरोधी अशोक वाजपेयी ने वहाँ कट्टर साम्प्रदायिक गोविन्दाचार्य से क्या बहस की? फिर यह हंस का आयोजन था जिसे आमतौर पर एक वामपंथी मैगजीन की तरह जाना जाता रहा है. उसके उत्सव में एक धुर वामपंथ विरोधी बुर्जुआ और एक कट्टर साम्प्रदायिक को मंच पर क्यों होना चाहिए था? और अगर उत्सव में वे शामिल थे तो फिर वहां एक घोषित नक्सलवादी वामपंथी वरवरराव और आदिवासी अधिकारों की प्रवक्ता तथा कार्पोरेट विरोधी अरुंधती राय को क्यों होना चाहिए था? संसद में सबके साथ बैठने का उदाहरण देने वाले बताएँगे कि कौन सी पार्टी अपने घरेलू समारोहों में विपरीत विचारधारा के लोगों को बुलाती है? कब ऐसा होता है कि कांग्रेस के किसी समारोह में मुख्य वक्ता भाजपा या कम्युनिस्ट पार्टी का होता है? समारोह के मंच के भागीदार आपके वैचारिक हमसफ़रों की घोषणा होते हैं. ज़ाहिर है हंस अपने मंच पर इन लोगों को बुलाकर कुछ और साबित करना चाहता था तो फिर किसी वरवर राव को उससे खुद को अलग करने का हक क्यों न हो? क्या भारत और विश्व के साहित्यिक परिदृश्य में बहिष्कार पहले नहीं हुए हैं? क्या सार्त्र ने नोबेल का बहिष्कार नहीं किया था? क्या एक समय में अज्ञेय ने भारत भवन का बहिष्कार नहीं किया था? क्या अरुंधती ने साहित्य अकादमी नहीं ठुकराया? क्या फोर्ड फाउंडेशन जैसे स्रोतों का लम्बे समय तक (और अब भी) तमाम जनपक्षधर साहित्यकारों और कलाकारों ने बहिष्कार नहीं किया? क्या अमेरिका ने चार्ली चैपलिन जैसे कलाकार को देशनिकाला नहीं दिया? क्या ब्रेख्त को अमेरिकी साम्राज्यवाद और हिटलर के फासीवाद के विरोह की क़ीमतें तमाम देशों से दर-ब-दर होकर नहीं चुकानी पड़ीं? और क्या आज लोकतंत्र की दुहाई दे रहे वाजपेयी कैम्प ने अपने किसी आयोजन में वरवर राव या ग़दर जैसे कलाकारों को बुलाया? क्या यह एक तरह का अघोषित बहिष्कार नहीं था/ है? फिर वरवर राव अगर साम्प्रदायिक गोविन्दाचार्य और वाम विरोधी अशोक वाजपेयी के साथ एक समारोह में मंच शेयर नहीं करना चाहते तो इतनी चिल्ल-पों क्यों? बहिष्कार भी समर्थन की तरह एक राजनीतिक हथियार है और एक लेखक को इसके प्रयोग का पूरा अधिकार है. 

वरवर राव अशोक वाजपेयी को कारपोरेट कल्चर का समर्थक कहते हैं और इस रूप में अपना वैचारिक विरोधी कहते हैं. इसे लेकर बहुत शोरगुल मचाया गया और अशोक वाजपेयी के सेकुलर होने का उदाहरण पेश किया गया. सवाल यह है कि कौन उनके सेकुलर होने पर सवाल खड़ा कर रहा है? लेकिन बुर्जुआ वर्ग सेकुलर होता ही है, इससे उसका कारपोरेट विरोधी हो जाना तो सिद्ध नहीं होता? आखिर कांग्रेस, सपा, बसपा जैसी सभी पार्टियां ही नहीं हमारी फिल्म इंडस्ट्री के तमाम कलाकार और कारपोरेट भी धर्मनिरपेक्षता का दावा करते हैं और उनमें से काफी हैं भी. एक दौर में राजनीति में कारपोरेट कल्चर के सबसे बड़े प्रतिनिधि के रूप में उभरे अमर सिंह तो उस नरेंद्र मोदी के बेहद कटु आलोचक रहे जिसके खिलाफ लेखकों को इकट्ठा करने के वाजपेयी जी के प्रयास को रेखांकित कर उनके आलोचकों पर सवाल उठाये जा रहे हैं. साफ है कि साम्प्रदायिकता का विरोध और कारपोरेट का विरोध दो अलग-अलग चीजें हैं. अशोक वाजपेयी का पूरा लेखन और जीवन सबके सामने है और अगर उसमें कारपोरेट कल्चर या पूंजीवाद का विरोध नहीं है तो वरवर राव को उसे रेखांकित करने और उसके आधार पर उन्हें अपना वैचारिक शत्रु घोषित करने का हक है. लगातार शासन और निजी तंत्र के गठजोड़ के हाथों उत्पीडन और दमन झेल रहे लोगों के साथ सक्रिय वरवर राव का नज़रिया आई आई सी और हैबिटाट में बैठकर साहित्यिक षड्यंत्र रचने और पद-पुरस्कार-फेलोशिप-यात्रा की जुगाड़ में लगे लोगों से अलग तो होना ही है.
इस देश के लोकतंत्र और फिर उसमें  ‘बिलकुल असंगत विचारधाराओं और विचारों के तनावपूर्ण सहअस्तित्व’ की बात करने वाले लोग वरवर राव की विचारधारा के साथ सत्ता और उसके प्रतिनिधि साहित्यकारों के सुलूक को किस आसानी से भुला देते हैं. क्या सच में तनावपूर्ण ही सही, उस विचारधारा को किसी तरह का सह अस्तित्व मयस्सर होता है इस लोकतंत्र में? क्या उनके प्रति किसी तरह की कोई सहानूभूति या समानुभूति सत्ता और उसके प्रतिनिधि लेखकों-संपादकों के यहाँ दिखती है? अगर नहीं तो उनसे यह उम्मीद क्यों? और क्या यह सच नहीं है कि क्रांतिकारी वामपंथ के अलावा इस ‘बहुलता वादी’ देश के सभी वैचारिक समूह कारपोरेट लूट के मसले पर नव आर्थिक उदारवाद की विचारधारा के साथ ‘एकतान’ हो चुके हैं और यह सेकुलर और साम्प्रदायिक दोनों विचारों की प्रतिनिधि राजनीतिक संरचनाओं की सामान आर्थिक नीतियों के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है.

दरअसल लोकतंत्र की यह दुहाई अक्सर अपने दमनकारी विचारों और अवसरवाद को लोक मानस में स्वीकार्यता दिलाने के लिए दी जाती है. इसका एक उदाहरण हंस से ही. जब हंस ने उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री की एक कहानी हंस में छापी तब ऐसे ही एक सालाना आयोजन में एक युवा पाठक के सवाल उठाने पर राजेन्द्र जी लोकतंत्र की ही दुहाई देते हुए कहानी के छपने का औचित्य साबित किया. खैर..मुख्यमंत्री महोदय ने मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कोई ऐसी कहानी नहीं लिखी शायद जिसे अपने भरपूर लोकतंत्र के बावजूद राजेन्द्र जी हंस में छाप पाते!